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Saturday, November 10, 2012

मरे आशिक का भूत-हिन्दी हास्य कविता (mare ashik ka bhoot-hindi hasya kavita)

चेले ने कहा उस्ताद से
‘‘महाराज,
केवल झाड़ फूंकने से अब काम नहीं चलने वाला,
कुछ नया करो वरना लग जायेगा आपकी दरबार में ताला,
आप भी अब फिल्मी हीरो की तरह
माशुका पटाने के नुस्खे बताना शुरु करें,
शायद नये युवा आपके नाम के साथ  शब्द गुरु भरें,
वरना यही सब थम जायेगा,
खालीपन का यहां गम आयेगा,
मेरा भी अब यहां मन नहीं लगता
छोड़ दूंगा आना जब वह उचट जायेगा।

सुनकर उस्ताद ने कहा
‘‘जाना है तो चला जा,
तू ही इश्क गुरु बन कर आ,
हमसे यह बेईमानी नहीं हो पायेगी,
इश्क तो मिल जाये पैसे के धोखे मे,ं
अपनी तबाही पर रोते  लोग
जब जिंदगी की सच्चाई दिखती अभाव के खोके में,
महंगाई का हाल यह है कि
सामान हो गये महंगे
आदमी सस्ता हो गया है,
आशिकी हो सकती है थोड़ी देर
जिंदगी का हाल खस्ता हो गया है,
जब तक किसी ने इश्क करने के तरीके पूछे
तभी तक ठीक है
हम फिल्म के हीरो नहीं
जिंदगी के फलासफे के उस्ताद है
किसी ने पूछा अगर गृहस्थी चलाने का तरीका
तब हमारे पास जवाब मुश्किल होगा,
कमबख्त,
जिस रास्ते से भाग कर
सर्वशक्तिमान का यह डेरा जमाया है
कुछ नहीं केवल उस्ताद का खिताब कमाया है
हम जानते हैं जो इश्क में हमने भोगा,
तू भी कर बंद आना कल से
वरना हमारे अंदर मरे आशिक का
भूत जाकर तेरी पीछे लग जायेगा।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com
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