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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

Sunday, December 30, 2012

अशिष्य को उपदेश देना व्यर्थ-हिन्दी सामाजिक लेख एंव चिंत्तन (ashishya ki updesh dena vyarth-hindi social article evn thought)

              हमारे देश में अंग्रेजों ने राज्य किया। वह चले गये पर अपने पीछे कुछ अपने अनुजनुमा-यानि ऐसे भारतीय जो उनकी संस्कृति को अत्यंत वैज्ञानिक मानते है-को यहीं छोड़ गये। इन्हीं अनुजों ने भारत में उनकी संस्कृति का विकास इस तरह किया कि पूरा देश ही उनकी चपेट में आ गया है।  ग्रामीण क्षेत्र भले बचे हुए हों  पर शहरी क्षेत्र तो पूरी तरह इस संस्कृति की चपेट में आ गये हैं। अंग्रेजी संस्कृति की सबसे बड़ी खूबी यह है कि हमेशा ही बड़ी बड़ी बातें करो, बिना पूछे ज्ञान दो। हर विषय पर बोलो।  विज्ञान में पढ़े लोग सामाजिक विषय पर बोलते हैं और समाजशास्त्र पढ़े लोग विज्ञान में अपना ज्ञान बघारते हैं।  मजे की बात यह है कि इस देश में राजनीति शास्त्र बहुत कम लोगों ने पढ़ा होगा पर देश की हालत पर जगह जगह चर्चा होती मिल जायेगी।
      देश में कहीं बड़ा हादसा हो या महिलाओं के विरुद्ध अनाचार की घटना टीवी चैनलों पर बड़े बड़े विद्वान बहस करने आते हैं। उन्हें बोलना है इसलिये बोलते हैं। टीवी चैनल वालों के कर्णधारों को  बड़े शहरों में रहने वाले इन पेशेवर बुद्धिजीवियों की शिक्षा का पता होता है पर उनकी धारणा शक्ति का ज्ञान नहीं होता।  पता कौन करेगा? हमारे देश में कमाने की प्रवृत्ति तो सभी में है पर व्यवसायिकतता का अभाव है। व्यवसायिक भाव का मतलब यह है कि जिस काम से धन कमाना हो उसे पूरे ज्ञान के साथ पूर्ण किया जाये।  फिल्म, टीवी, पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में केवल सतही ज्ञान वालों को आगे बढ़ने का अवसर मिल रहा है इसलिये अधिक कला कौशल की आशा करना व्यर्थ दिखता है।
      दरअसल अंग्रेजी संस्कृति ने देश में खान पान, रहन सहन और आचार विचार में जो बदलाव किया है उससे धन कमाने के नये स्त्रोतों का सृजन हुआ जरूर है पर काम करने का नया तरीका कोई सीख नहीं पाया। मनोवृत्तियां पुरानी हैं अंग्रेज अपना काम पूरी लगन के साथ व्यवसायिक प्रवृत्ति से करते हैं।  जबकि भारत में काम किसी भी तरह कर पैसा कमाना है, यही लक्ष्य रहता है। इस प्रवृत्ति की वजह से हमारे देश में प्रबंध कौशल का अभाव कहीं भी किसी क्षेत्र में देखा जा सकता है। सेठ जैसे हैं वैसे ही कर्मचारी हैं। सेठों को ज्ञान नहीं कि अलग अलग विषयों मे श्रेष्ठता क्या होती है तो कर्मचारियों को भी क्या पड़ी है कि विशेषज्ञता प्राप्त कर उनकी चाकरी करें।
विदुर नीति में कहा गया है कि
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तत्वज्ञं सर्वभूतानां योगज्ञः सर्वकर्मणाम्।
उपायज्ञो मनुष्याणां नर पण्डित उच्यते।।
     हिन्दी में भावार्थ-जो मनुष्य संपूर्ण भौतिक पदार्थों का ज्ञान तथा सभी कर्मों का काम करने का तरीका समझता है वह पण्डित कहलाता है।

अशिष्यं शास्ति यो राजन् पश्च शून्यमुपासते।
कदर्य भजते यश्च तमाहुर्मूढचेतासम्
      हिन्दी में भावार्थ-जो अशिष्य को उपदेश देता है, शून्य की उपासना करता है और कृपण का आश्रय लेता है वह मूढ़ चित्त वाला कहलाता है।
          यही कारण है कि प्रचार माध्यमों में मनोरंजन के साथ रुदन भी एक व्यापार का हिस्सा बन गया है।  अभी हाल में दिल्ली में घटित एक सामूहिक घटना पर प्रचार माध्यमोें में हो हल्ला मचा।  इसमें कोई संदेह नहीं है कि देश में नारियों के प्रति अपराधों की घटनायें बढ़ गयी हैं मगर जिस तरह राजधानी में घटित इस घटना को प्रतीक बनाकर सभी जगह बहस गयी वह हैरान करने वाली थी।  घटना यह थी एक बस में एक लड़का और लड़की चढ़़े। बस में मौजूद छह लोगों ने लड़के को घायल कर लड़की के साथ बलात्कार किया। इतना ही नहीं उसके बाद लड़की को इस तरह मारा कि वह मर ही जाये।  यह बलात्कार की घटना थी पर सामान्य नहीं थी। यह नारी अत्याचर से जुड़ी तो थी पर इसमें व्यवस्था संबंधी दोष भी जिम्मेदार थे।  आमतौर से सामाजिक विशेषज्ञ यह बताते हैं कि नारियों के प्रति 99 प्रतिशत अपराधों में उनके निज संपर्क में रहने वाले लोग जिम्मेदार होते हैं। वाकई यह समाज से जुड़ा विषय है पर जिस तरह बस में अनजान लड़कों ने यह अपराध किया वह व्यवस्था संबंधी अनेक प्रश्न खड़े करता है पर किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया।
        सभी विद्वान उस समाज को जाग्रत करते रहे जो उनका शिष्य नहीं है।  वह इस घटना से समाज को जगाना चाहते थे।  अपीलें कर रहे थे।  अब यह किसे समझायें कि इस संसार में देव और असुर दो प्रकार के मनुष्य होते हैं।  सामान्य मनुष्य को कानून से डर लगता है इसलिये वह अपराध नहीं करता। उससे नारियों पर अनाचार करने की  अपील करने की आवश्यकता भी नहीं है मगर जिनकी प्रवृत्तियां आसुरी हैं वह आग्रहों से नहीं दंड से डराये जा सकते हैं। न मानने पर दंडित किये जा सकते हैं।
        अनेक विशेषज्ञ  तो इस घटना के प्रचार से इतना डर गये कि देश में पहले ही फैशन की तरह प्रचलित कन्या भ्रुण हत्या अधिक बढ़ न जाये।  अभी तक तो यह स्थिति है कि पहली संतान के रूप में बेटी होने तक सामान्य लोग स्वीकार कर लेते हैं मगर अगर इस तरह अनजान लोगों से लड़कियों के लिये खतरे बढ़े तो हो सकता है कि यह सीमा भी टूट जाये।  ऐसे में लड़के और लड़कियों का अनुपात संतुलन अधिक बिगड़ सकता है।
      बहरहाल ऐसी अनेक घटनायें हैं जिस पर कथित लोग रटी रटायी बातें करते हैं।  जहां अपराध हों पर वहां समाज क्या कर लेगा? समाज पर नियंत्रण के लिये तो राज्य व्यवसथा बनी है।  अगर समाज में अपराधों की स्थिति शून्य हो जाये तो राज्य व्यवस्था की आवश्यकता क्या है? चूंकि इस संसार में देव तथा असुर दोनों का निवास रहना ही है तो अपराध संख्या शून्य नहीं हो सकती। हमारे बुद्धिजीवी चाहे कितना भी जोर लगाकर नारे लगाते रहें अपराध शून्य नहीं होंगे पर कम जरूर हो सकते हैं।  समाज कोई एक इकाई नहीं होता। हर व्यक्ति का अपना  अपना  स्वभाव होता है।  उसके अनुसार ही सभी का आचरण अलग अलग हैं। सभी देव नहीं है पर सभी असुर भी नहीं है।  अनियंत्रित व्यक्ति पर अंकुश के लिये ही राज्य व्यवस्था होती है।  राजधानी की इस घटना में राज्य व्यवस्था से प्रथक आर्थिक तथासामाजिक तत्व भी जिम्मेदार थे।  इस प्रकरण में पूरी बात पुलिस पर डालना भी ठीक नहीं लगता।  पुलिस तो व्यवस्था लागू करने वाली अंतिम संस्था है जबकि यह प्रकरण संपूर्ण व्यवस्था के अनेक भागों पर प्रश्न खड़ा करता है। उन पर किसी ने दृष्टिपात नहीं किया। यह प्रमाणित करता है कि अनाधिकार बोलने की छूट केवल मनोरंजन सामग्री बढ़ाने के लिये प्रचार माध्यमों पर मिल ही जाती है।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com
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Monday, December 24, 2012

आदमी का दिल और दिमाग-हिन्दी कविता (admi ka dil aur dimag-hindi poem or kavita)

आदमी का दिल और दिमाग-हिन्दी कविता
समाज में चेतना अभियान
कहां से प्रारंभ करें
यहां कोई दुआ
कोई दवा
और कोई दारु के लिये बेकरार है,
अपने शब्दों से किसे  खुश करे
कोई रोटी
कोई कपड़ा
कोई छत पाने के लिये
जंग लड़ने को खड़ा तैयार है।
कहें दीपक बापू
अपनी समस्याओं पर सोचते हुए लोग रोते,
हर पल  चिंताओं में होते,
दिल उठा रहा है
लाचारियों का बोझ
दिमाग में बसा है वही इंसान
जो उनके मतलब का यार है।


हिन्दी साहित्य,समाज,मस्ती,मनोरंजन,hindi sahitya,society

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
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Sunday, December 2, 2012

भर्तृहरि नीति शतक-मौन रहने का गुण आभूषण की तरह (maun rahana abhushan ki tarah-bhritrihari neeti shatak)

               आदमी का मन  अपनी इंद्रियों के वश में है।  हाथ खाली है तो मन काम करने की सोचता है। पांव बैठे बैठे थक गये हों तो वह चलना चाहता है।  आंखे हमेशा कुछ देखना चाहती हैं। सबसे ज्यादा परेशान करती है
तो वह है मनुष्य की जीभ।  खाते खाते थक जाये तो बोलने के लिये उतावली हो उठती है। उस समय  न मन बुद्धि में विषय सोचता है न कोई उसे विषय सूझता है।  इसलिये चार लोगों में जो विषय उठ जाये उसी पर ही आदमी बोलने लगता है। टीवी पर या अखबार में कोई विषय बोलने के लिये ढूंढ लेता है। कहने का अभिप्राय यह है कि मनुष्य कोई अपना विषय नहीं चुनता बल्कि बाहर से कोई सूझाये तभी बोल पाता है।  ऐसे में आदमी बोलने के लिये बोलता है। जो मन में आये वह तत्कला बोलता है और बुद्धि से काम लेना उसके लिये तब संभव नहीं होता। यही कारण है कि हमारे समाज में सभी एक दूसरे को पीठ पीछ  मूर्ख कहते हैं।
          अगर कोई मौन होकर सामूहिक वार्तालापों में बैठे तो उसकी चिंतन ग्रंथियां जाग्रत हो उठती हैं।  ऐसे में वह अनुभव कर सकता है कि आजकल लोग निरर्थक विषयों पर चर्चा कर समय नष्ट करते हैं।  मौन होकर यही अनुभव किया जा सकता है कि किस तरह लोग अहंकार वश  आत्मप्रवंचना करने के साथ ही अपनी झूठी शक्ति का बखान करते हैं।  सभी मोह में फंसे हैं और दूसरे को भी  वैसे ही जाल में फंसाते हैं।
भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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स्वायत्तमेकांतगुणं विधात्रा विनिर्मितम् छादनज्ञतायाः।
विशेषतः सर्वविदं समाजे विभूषणं मौनपण्डितानाम्।।
           हिन्दी में भावार्थ-विधाता ने स्वतंत्र रहने के लिये एक गुण मौन रहने का सृजन विधाता ने किया है जिसका चाहे जब प्रयोग किया जा सकता है। खासतौर से जब विद्वान समाज में उपस्थित होने का अवसर मिल तब मौन रहने का गुण  एक तरह आभूषण का काम करता है। लोग समझते हैं कि यह भी ज्ञानी है।
अज्ञः सुखमाराध्य सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञः।
ज्ञानलावदुर्विदग्धं ब्रह्माऽप तं नरं न रञ्जयति।।
                हिन्दी में भावार्थ-अज्ञानियों के पास अगर थोड़ी बुद्धि हो तो उसे समझाया जा सकता है पर जिसके पास उसका लेशमात्र अंश भी नहीं है उसे समझाना ब्रह्मा के  बस का भी नहीं है।
               जिन लोगों के पास थोड़ी बहुत बुद्धि है पर ज्ञान नहीं तो उसे समझाया जा सकता है, पर जिन्होंने तय कर लिया है कि वह सबसे बड़े बुद्धिमान है उन्हें समझाना एकदम कठिन है। बुद्धिहीनता अहंकार को जन्म देती है।  उस आदमी के पास स्वार्थों से इतर विषयों में जिज्ञासा में कतई नहीं रहती।  यही बुद्धिहीनता  दैहिक और मानसिक व्याधियों का शिकार बनाती है, ऐसे में कोई मनुष्य अध्यात्मिक दर्शन की तरफ झांकने की सोच भी नहीं सकता।  अध्यात्मिक ज्ञान के बिना कोई मनुष्य जीवन में प्रसन्न नहीं रह सकता यह भी सच है।  मुश्किल यह है कि आदमी मौन नहीं रहना चाहता। वह हर बार अभिव्यक्त होने के लिये लालायित रहता है।  चुप बैठना मौन नहीं होता। मौन का मतलब है समस्त इंद्रियां निष्क्रिय हों और मनुष्य अपनी आत्मा से संपर्क रखे।  सरल दिखने वाला यह काम उन लोगों के लिये कठिन है जिनके पास बुद्धि नहीं है। ज्ञानियों के लिये एक सहज कार्य है,  जिनके पास बुद्धि है उनको कोई समझा भी सकता हैं पर जिनके मन में अहंकार, काम, क्रोध लोभ, लालच और प्रतिष्ठा पाने का मोह ही संसार का सबसे बड़ा विषय है उनसे ज्ञान चर्चा करना ही व्यर्थ है।   
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh
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