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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

Thursday, April 28, 2016

गुलामी का ज़हर-हिन्दी कविता(Gulami Ka Zahar-Hindi Kavita)


अपने अपने दर्द के
बयान में सब लोग
शब्द बोल रहे हैं।

हमदर्दी के सौदागर भी
रुपयों के अनुसार
शब्द तोल रहे हैं।

कहें दीपकबापू भावना में
बहना मना है
इश्क की आड़ में
लोग गुलामी का
जहर घोल रहे हैं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com
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Saturday, April 16, 2016

पसीने से बीमारी हारी है-हिन्दी कविता(Pasine se Bimari hari hai-HindiPoem)

गर्मी की तपती दोपहर
सड़क पर सन्नाटे में
जीवन की जंग जारी है।

ठेला ढकेलते 
पसीने में नहाये लोगों की
बेबसी से यारी है।

कहें दीपकबापू परिश्रम से
मुंह चुराने वालों को
वातानुकूलित  कक्ष में भी
नहीं छोड़ती ज्वाला
मगर बहते पसीने से
हर बीमारी हारी है।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh
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Wednesday, April 6, 2016

जो भीड़ पायेगी-हिन्दी कविता (Public Ane A Men-Hindi Poem)


अच्छा हो गया बुरा
जहां नाटक सजेगा
भीड़ भी आयेगी।

अदाओं का मतलब
समझे या नहीं
वाह शब्द भीड़ भी गायेगी।

कहें दीपकबापू अक्ल से
इंसानों का वास्ता होता है
इस्तेमाल कौन करता
चलते सभी मिलकर
सोचते हम भी वही पायेंगे
जो भीड़ भी पायेगी।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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