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Wednesday, July 9, 2014

अपना और पराया मसला-हिन्दी व्यंग्य कवितायें(apna aur paraya masla-hinsi satire poem)



पराये मसले पर लोग जमकर बोलते हैं,
अपना राज खुल जाये तो मुंह नहीं खोलते हैं।
कहें दीपक बापू अपनी छवि बनाने के लिये
दूसरों पर  कीचड़ उछालना गुणहीन लोगोें की मजबूरी हैं,
अपनी पर लगे दाग छिपाने के लिये वह यूं ही डोलते हैं।
--------
गैरों के दर्द पर जो लोग हंसते हैं,
खून के आंसु रोते जब जाल में खुद फंसते हैं।
कहें दीपक बापू कमजोर का जो उड़ाते मजाक
ताकतवर इंसान की बेशरम अदाओं  पर भी
अपनी आंखें नीचे कर जमीन में धंसते हैं।
--------
किसी के दर्द भी हंसकर लोग दिल बहलाते हैं,
कसते हैं फब्तियां बुद्धिमान स्वयं को कहलाते हैं,
कहें दीपक बापू कामयाबी हज़म करना भी सरल नहीं
चढ़ जाता जिस पर दौलत और शौहरत का नशा
 बदजुबानी से ज़माने का दिल बहलाते हैं
-------------

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com
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Tuesday, July 1, 2014

रौशनी में अंधे अल्फ़ाज-हिन्दी कविता(roshni mein andhe alfaz-hindi poem or kavita)



हर इंसान की जुबान फिसल जाती है चलते चलते,
कामयाबी का नशा सिर चढ़कर जब बोलता है,
अंधे अल्फ़ाज निकलते हैं रौशनी के जलते जलते।
फर्क इतना है ऊंचाई पर आवाज बुलंद हो जाती है,
नीचे बोलने पर नक्कारखाने में तूती की तरह खो जाती है,
मुश्किल यह है कि शिखर पर पहुंचे हैं बौने चरित्र के लोग,
पीछा करते हुए साथ जाते हैं उनकी छोटी औकात के रोग,
कहें दीपक बापू ओहदा दौलत और शौहरत
हर इंसान को यूं ही हजम नहीं होती,
विरले ही है जिनका काबू होता अपने पर
जिनकी नज़र में उगते सूरज के लिये इज्जत है
यह जानकर भी कि खो जायेगा वह शाम ढलते ढलते।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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Friday, June 20, 2014

दौलत के भूखे खूनखराबा कराते-हिन्दी व्यंग्य कविता(daulat ke bhookhe khoonkhraba karate-hidi vyangya kavita)



हाथ में हथियार लेकर निकले हैं लोग करने जंग,
मुद्दे का तानाबाना बुनकर चुन लेते झंडे का कोई भी रंग।
खूनखराबे करने पर उतारू हैं वह नहीं सुनते अपील,
निर्दोष इंसानों को मारकर अपनी बहादुरी की देते दलील।
वैसे भी हथियार अपनी आंख से काम नहीं करते,
जिनके हाथ में उनमें ही खौफ और डर भरते,
जिनके पेट पाप की रोटी से भरे हैं,
इंसानियत के नाम पर उनके दिल दया से परे हैं।
दौलत के भूखे वह लोग  रोज खूनखराबे के नये पैतरे अपनाते,
सर्वशक्तिमान के लिये काम करने का दावा वही जताते।
कहें दीपक बापू धरती पर इंसाफ लाने के करते जो पाखंड
निहत्थों की जान लेते मासूमों करते बुरी तरह जलील।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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Saturday, May 31, 2014

स्वर्ग और नरक यहीं हैं-हिन्दी कवितायें(swarg aur narak yahin hain-hind shortQ poem)



स्वर्ग और नरक इस धरती पर ही यहीं कहीं है,
कहीं आम इंसान बसते तो राक्षसों के महल भी यहीं है।
कहें दीपक बापू इंसानों में नहीं मिलता देवत्व
काली करतूत को रोकना इसलिये संभव नहीं है।
-------
बेबसों पर ताकत आजमाते  वह दबंग हो नहीं सकते,
खाते  मछलियां मगरमच्छ समंदर के वह राजा हो नहीं सकते।
कहें दीपक बापू सभी इंसान बन गये थलचर
स्वार्थ के सिद्ध हैं बेबसों के देवता हो नहीं सकते।
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बेबसों के आंसूओं पर सभी हमदर्दी जताते हैं,
भूल जाते फिर सभी अपने काम में लग जाते हैं।
कहें दीपक बापू मजबूरों के दर्द पर चल रहा धंधा
हमदर्द की छवि बनाकर लोग कामयाबी पा जाते हैं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Tuesday, May 13, 2014

सपने देखकर गमों से पीछा छुड़ायें-तीन हिन्दी क्षणिकायें(sapne dekhkar gamon se peechha chudayen-three short hindi poem)



बेचैन दिल लेकर कहां जायें,

हर जगह यादें साथ चली आयें।

कहें दीपक बापू दर्द भूलाने की आदत जरूरी है

आगे के सपने देखते हुए गमों से पीछा छुड़ायें।

---------

हम अपने मन की उदासी ज़माने को क्या दिखाते हैं,

हमारे दर्द पर लोग खुद को खुश्ी से  तसल्ली दिलाते हैं।

कहें दीपक बापू हैरान परेशान लोग क्या हमदर्द बनेंगे

अपने ही मसलों के हल का आसरा जो दूसरों पर टिकाते हैं।

-----------

कभी आती हंसी कभी दिल उदास हो जाता है,

घड़ी की सुई चलती है हमेशा पर कभी वक्त खो जाता है।

कहें दीपक बापू जिंदगी का हर पल बीतता है

कोई लड़ता गम से कोई खामोश होकर सो जाता है।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Wednesday, May 7, 2014

संस्कारों में बची ख्वाहिश पाने की-हिन्दी कवितायें(sanskaron mein bachi khwahish pane ki-hindi kavitaen)



रूढ़ियों की अग्नि में जलकर राख हुए समाज
अस्थियां उठाने वाला कोई नहीं है,
संस्कारों में बसी है केवल पाने की ख्वाहिश
टूटते रिश्तों के जिंदा रहने की उम्मीद
अभी  इसलिये खोई नहीं है।
कहें दीपक बापू अपनी भावना आहत होने पर
सभी चिल्लाते हैं
किसी ने दूसरे के गम पर हमदर्दी
अपनी नम आंखों से ढोई नहीं है।
------------
किसी की याद में कोई मरता नहीं है,
अपनी जान फंसी हो तो
कोई किसी का सहायक बनता नहीं है।
कहें दीपक बापू समय की आंधी
उड़ा ले जाती है जिनके दिल के आशियाने
उन यायावरों का पता भी यहीं कहीं है।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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Wednesday, April 23, 2014

खबर बिन शांति-लघु हिन्दी व्यंग्य कवितायें(khabar bin shanti-short hindi satire poem's)



न कोई खबर पढ़ी न सुनी हमने
दिल में बहुत शांति हैं,
पर्दे पर फिल्म देखते और गाने सुनते
नाच रहा मन मयूर की भांति है।
कहें दीपक बापू उकता गये हैं खबरों से
बहुत नारे सुने
कई आंदोलन भी देखे
अनसुलझे विषय अभी भी खड़े हैं प्रश्नों के साथ
उठाने वाले बन गये शिखर पुरुष
कभी मचाया था शोर उन्होंने होने वाली जैसे क्रांति है।
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पर्दे पर चलती हुई सनसनीखेज खबर,
उन पर बहस खिंच रही तर्क हो रहे बर्बर।
कहें दीपक बापू प्रायोजन का युग है
विज्ञापनों से बन जाते हैं बड़े लोग
कोई नृत्य कर
कोई कुकृत्य कर
मुफ्त में बना लेता है अपनी खबर।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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Monday, April 14, 2014

चाय के प्याले में तूफ़ान-हिन्दी व्यंग्य कविता(chaya ke pyale mein toofan-short hindi poem)




किसी से वफादारी की उम्मीद नहीं की
इसलिये कभी हमने धोखा नहीं खाया,
हमारी खामोशी ने हमेशा झूठ बोलने की
बीमारी से बचाया।
कहें दीपक बापू जहां भीड़ होती है लोगों की
वहां अभिनय करने वाले चले ही आते हैं,
कुछ अपनी अदायें दिखाते कुछ नाचते
कोई दूसरों को नचाने आते हैं,
चाय के प्याले में तूफ़ान उठाते  इंसाफ के लिये शोर मचाने वाले,
दर्द झेलते है मेहनतकश हमेशा उनके पांव में पड़ जाते छाले,
बरसों से हम भी चीखे हालातों के बदलाव के लिये
वादे और नारे सुने पर ज़माने को वहीं खड़ा पाया।
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Tuesday, April 8, 2014

कागजी नायक-हिन्दी व्यंग्य कविता(paper hero-hindi satire poem)



सवाल उठा रहे जहान की हालातों पर
वह अक्लमंद लोग जिनको जवाब देने हैं,
बहस होती  उनमें पर्दे पर विज्ञापनों के बीच
मगर फैसला लापता है
जुबान से निकले शब्दों के
मतलब अक्लमंदों से भी लेने हैं।
कहें दीपक बापू  जहान की मुसीबतों का हल
किसी फरिश्ते के पास भी नहीं मिल सकता
फिर भी कागजी नायक तैयारी करते दिखते हैं
हर कोई टाल रहा असली मुद्दे
क्योंकि लोगों के मसले बहुत पैने हैं।
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Tuesday, April 1, 2014

अपनी जान की पहचान-हिन्दी क्षणिका(apni jaan ki pahachan-hindi short poem)



इंसान भेजता रहता है चांद पर अंतरिक्ष यान,
आंकाश के रहस्य की तलाश में है
मगर अपनी धरती के स्वभाव से हो गया है अनजान।
कहें दीपक बापू संसार में विज्ञान की तरक्की बुरी नहीं है
मगर दुःखदायी है बिना इंसानियत के ज्ञान,
पत्थर और लोहे का सामान रंग से चमकता है
आंखों देखती है तो दिल धमकता है,
फिर भी लगता है कहीं खालीपन
क्योंकि होती नहीं अपनी जान की पहचान
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Friday, March 28, 2014

उनका भरोसा-हिन्दी व्यंग्य क्षणिका(unka bharosa-hindi vyangya short poem)



हमें ऊंचे लक्ष्य की तरफ उन्होंने मदद का
भरोसा देकर ऊबड़ खाबड़ रास्ते पर  धकेल दिया
मौका आया तो बताने लगे अपने मसले और मजबूरी,
यूं ही छोड़ जाते तो कोई बात नहीं
उन्होंने बना ली दिल से दूरी।
कहें दीपक बापू तन्हाई इतना नहीं सताती,
बिछड़ने के दर्द दूर करने की कोई दवा नही आती
हमने भी तय किया है
उसी जंग में उतरेंगे जो लड़ सकेंगे खुद ही पूरी।

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Monday, March 24, 2014

शब्दों के व्यापारी-हिन्दी व्यंग्य कविता(shabdon ke vyapari-hindi vyangya kavita)



जहान की चिंत्ताओं का बोझ ढोते दिखते हैं शब्दों के व्यापारी,
बाज़ार में कोई शय नहीं बेचने के लिये वादों से करते छवि भारी,
एक चेहरा बदनामी से पुराना हुआ  फिर नया कोई आ जाता है,
भलाई की दुकान का हक कोई जन्म से कोई कर्म से पाता है,
चतुरों ने  अंग्रेजी सेे सभी को भरमाया फिर हिन्दी से भी कमाया,
लगने लगा जब फैशन पुराना अब हिंग्लिश को जरिया बनाया,
उड़ते हैं आसमान में ज़मीन पर रैंगने वालों के बनते वफादार,
नारे लगाने से  जल्दी पा जाते तख्त फिर बन जाते दागदार,
कहें दीपक बापू  अपने जख्मों का इलाज खुद ही करना सीखो
निभाने आयेंगे बहुत सारे हमदर्द दवा पर होगी उनकी नीयत सारी
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Sunday, March 16, 2014

होली का मजाक-हिन्दी व्यंग्य कविता(holi ka mazak-hindi vyangya kavita)




चेहरे का रंग उड़ा है जिनका उन पर कौनसा रंग लगायें,
हुलिया बिगाड़ा है जिन्होंने स्वयं का उनके साथ कैसे होली मनायें।
हर पल देते हैं जो धोखा वह  लोग क्या समझेंगे हास परिहास,
शब्दों का जो अनर्थ करते वह क्या जायेंगे किसी के दिल के पास,
सभी के साथ वादे करते हुए जिंदगी गुजारी कभी पूरे किये नहीं,
दिखाकर सपने दिल का सौदा किया  दाम कभी पूरे दिये नहीं,
भूख, भ्रष्टाचार और भय के विषय बेचते हैं बाजार में सस्ता जताकर,
अपनी मंजिल पर पहुंचते हैं वही दूसरों को रास्ता भटकाकर,
चाल जिनकी टेढ़ीमेढ़ी चरित्र लापता  चेहरे पर पाखंड की छाया है,
चमक रहे  कैमरे पर वही चेहरे जिनकी  असुंदर नीयत और काया है
कहें दीपक बापू होली पर झूठ बोलकर करते हैं  लोग मजाक
करें प्रतिदिन  प्रलाप उनके शब्दों में कहां हास्य का तत्व हम पायें।
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Tuesday, March 11, 2014

दवा के दाम में हिस्से-हिन्दी व्यंग्य कविता(dawa ke dam mein hisse-hindi vyangya kavita)




अंगद जैसे उनके पांव नहीं पर फिर भी सेवा के लिये अड़े हैं,
चंदे और दान से व्यापार चलाते शर्म नहीं वह चिकने घड़े हैं।
कागजों पर अपना खुद लिखते हुए इतिहास वह बन गये महान,
मदद का पैसा आत्मप्रचार पर फूंककर पर्दे पर सीना रहे तान,
अपनी चाहतों का पूरा करने के लिये दूसरे का दर्द दिखाते,
खुद करते कमाई ज़माने को तरक्की के सपने देखना सिखाते,
सबके चरित्र पर दाग हैं उन पर कोई उंगली नहीं उठायेगा,
बेआबरुओं से सभी डरते हैं अपनी इज्जत कोई नहीं लुटायेगा,
मशहुर हुए वह ं करके बाज़ारों के सौदागरों से गठबंधन,
जिनके नाम का लिया सहारा उन बेबसों का जारी है कं्रदन,
कहें दीपक बापू अपनी सेहत बचाने का जिम्मा खुद पर है
देह हो या दिल की बीमारी दवा के दाम में उनके हिस्से बड़े हैं।
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Wednesday, March 5, 2014

दिल के चैन के लिये-हिन्दी व्यंग्य कविता(dil ke chain ke liye-hindi vyangya kavita)




नित्य स्वांग कर इंसानों की भीड़ लगाकर उन्हें भेड़ की तरह हांको,
खबरों में बनने के लिये पत्थरों को किसी दीवार पर फैंक कर टांको।
भलाई करने की बात करना सरल पर कठिन है करना,
कोई काम  न कर सकों बहाओ आश्वासनों का झरना,
हल्दी लगे न फिटकरी चीखने से चेहरे का रंग चोखा आयेगा,
लोगों के सामने पर्दे से जो शख्स  दूर रहेगा प्रचार में धोखा खायेगा,
इंसान की चाल और चरित्र में जोरदार सनसनी होना चाहिये,
कैमर रहेगा हमेशा पीछे इसलिये माहौन में तनातनी बनाईये,
कहें दीपक बापू बैचैनी से बचना हो तो आंखें और कान बंद कर लो,
दिल बहलाने के लिये घर के अंदर बाहर होते झगड़ों में न झांको।

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