समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
Showing posts with label entertainment. Show all posts
Showing posts with label entertainment. Show all posts

Wednesday, September 17, 2014

क्रांति की बात-हिन्दी कविता(kranti ki baat-hindi poem)




जिंदगी की यात्रा में
एक से दूसरे पड़ाव तक
चेहरे बदले नज़र आते हैं।

इंसन तो इंसान हैं
एक जाये दूसरा आये
स्वभाव नहीं बदलता
चरित्र एक समान ही पाते हैं।

कहें दीपक बापू क्रांति की बात
सुनते हुए कान पक गये
एक दशक एक  इंसान
हमारे साथ रहा,
हमने उसे भी शांति से सहा,
दूसरा आया उसने
वादा किया साथ निभाने का,
वह भी निकला सहयोगी दिखाने का,
हम तो सहते रहे हादसों के दौर
अकेले ही खड़े रहे
स्थान और हमलावर बदल जाते हैं।
----------------------

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com
-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका 

५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका

Thursday, September 11, 2014

दैवीय कण बनेगा मनोंरजन व्यवसाय का सहायक-हिन्दी व्यंग्य(Daviy kan banega manoranjan vyavasay ka sahara-hindi vyangya lekh, god porticla help for entertainment busines-hindi satire thought article)



            एक पाश्चात्य वैज्ञानिक ने बताया है कि दैवीय कण अत्यंत शक्तिशाली है और वह पल भर में सृष्टि का नाश कर सकता है। पश्चिम में ही एक वैज्ञानिक प्रयोग हुआ था जिसमें यह दावा किया गया कि इस सृष्टि के रचयिता दैवीय कण का पता चल गया है। इस संबंध में प्रयोग चल रहे हैं पर हम जब इसे भारतीय अध्यात्मिक विज्ञान की दृष्टि से देखते हैं तो यह एक प्रचार के लिये रचे गये प्रपंच से अधिक नहीं है।  हमें पाश्चात्य विज्ञान की समझ नहीं है पर दैवीय कण शब्द को प्रयोग ही इस बात पर संदेह पैदा करता है कि इस तरह की कोई खोज हुई है जिसके आधार पर भ्रम को सत्य स्प बताकर प्रचारित किया जायेगा।
            दैवीय कण की स्वीकार्यता का अर्थ है कि इस संसार के आधार में भौतिक तत्व की उपस्थिति मान लेना।  हमारा सिद्धांत कहता है कि परमात्मा प्रकट स्वरूप में नहीं है। इस सृष्टि में जीवन प्रवाहित करने के लिये पांच तत्व माने गये हैं-प्रथ्वी, वायु, सूर्य, जल और आकाश-अगर दैवीय कण सिद्धांत को मान लिया जाये तो वह भौतिक तत्व प्रथ्वी का संकेत देता है।  हमारे अध्यात्मिक विज्ञान के सिद्धांत के अनुसार इन पंच तत्वों को शक्ति प्रदान करने वाला अदृश्य, अप्रकट तथा अव्यक्त पर तत्व परमात्मा है। वह अनश्वर तथा स्पर्श से परे है, इसलिये दैवीय कण का सिद्धांत भारतीय दर्शन से मेल नहीं खाता।

            एक दूसरा सिद्धांत भी इस दैवीय कण के नियम से मेल नहीं खाता।  पश्चिम का दैवीय सिद्धांत कहता है कि वह शक्तिशाली है जबकि हमारा मानना है कि वह स्वयं शक्ति है। वह इस सृष्टि का धारक है पर इसमें कहीं स्वयं उपस्थित नहीं है।  इसलिये पश्चात्य वैज्ञानिकों का यह दावा स्वीकार करना कठिन है कि उसे देखा गया है।  उनकी बातों से ऐसा लगता है कि जैसे वह उनके हाथ लग गया है। अगर यह सही है तो वैज्ञानिकों से कई प्रमाण मांगे जा सकते हैं।  एक तो पानी से ही जुड़ा है।  हमें एक सज्जन कह रहे थे कि पानी में ऑक्सीजन और हाईड्रोजन होता है अगर वैज्ञानिकों के  हाथ दैवीय कण लग गया है तो वह ऑक्सीजन और हाईड्रजन मिलाकर पानी बनाकर दिखा दें।  इस तरह मिश्रित तत्वों से बनी प्रकृतिक वस्तुऐं जिनका मानव शक्ति से निर्माण संभव नहीं है उन्हें दैवीय कण से जोड़कर दिखाने पर ही पश्चात्य विज्ञान के दावों पर यकीन किया जा सकता है।
            जिस तरह भारत में मनोरंजन की विषय धर्म के नाम पर निर्धारित होते हैं उसी तरह पश्चिम में विज्ञान के आधार पर उनका सृजन होता है। पश्चिम की एक फिल्म आई थी जुरासिक पार्क जिसमें डायनासोर नाम के एक कल्पित शक्तिशाली जीव का सिद्धांत दिखा गया था।  भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में किसी ऐसे जीव का उल्लेख नहीं मिलता पर आजतक इस कथित डायनासोर के जीवाश्य मिल ही रहे है जिनकी चर्चा होती हैं।  उसी तरह पश्चिम ने दूसरे ग्रहों से आये एलियन का भी प्रचार कर रखा है।  इस पर जमकर मनोरंजन का व्यवसाय चल रहा है। यह अलग बात है कि आज तक किसी ने एलियन को देखा ही नहीं है। अभी पश्चिम में सात सौ वर्ष बाद का जीवन दर्शाने वाला एक वीडियो गेम प्रचारित हो रहा है। इसके बारे में दावा यह किया जा रहा है कि बड़े बड़े वैज्ञानिकों से चर्चा कर यह गेम बनाया गया है।  इन वैज्ञानिकों का मानना है कि जिस तरह विश्व में प्रयोग चल रहे हैं उसके आधार पर सात सौ वर्ष बाद इस संसार में मनुष्य का जीवन ऐसा ही होगा जैसा कि खेल में दिखा गया है।
            भारत में अधिकतर फिल्में कहीं न कहीं धर्म की आड़ लेकर बनती हैं पर उससे कोई भ्रम नहीं फैलता पर पश्चिम में कथित विज्ञान की सहायता से फिल्म बनाकर उसे भूत और भविष्य का सत्य मान लिया जाता है। वर्तमान के हालातों पर भ्रमित करना सहज नहीं है इसलिये पश्चिम रचनात्मक जगत  उससे दूर ही रहता है। बहरहाल अब हमें कथित दैवीय कण पर आधारित मनोंरजन सामग्री का इंतजार है।  एक बात तय रही कि इसमें गंभीर और हास्य दोनों तरह के विषय शमिल होंगे।  ठीक उसी तरह जैसे डायनासोर और एलियन के विषयों पर भारी मनोरंजक व्यवसाय हुआ उसी तरह दैवीय कण भी सहायक होंगे।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com
-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका 

५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका

Friday, September 5, 2014

स्वार्थ और परमार्थ-हिन्दी व्यंग्य कविता(swarth aur parmarth-hindi satire poem)



 भक्ति में शक्ति है
इसलिये होती कम
मगर बाहर ज्यादा दिखाते।

आकाश में देवता रहते
इसलिये हमेशा हाथ उठाकर
उनसे मांगना सिखाते।

कहें दीपक बापू नैतिकता से
परहेज करते स्वयं लोग,
इच्छा यह कि
दूसरा पाले आदर्श रोग,
स्वार्थ की राह पर चलने वाले,
परमार्थ की आशा दूसरे पर डाले,
स्वामीपन का अहंकार हृदय में
समाज सेवक की सूची में
कमाई के लिये नाम लिखाते।
--------------a
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com
-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका 

५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका

Thursday, August 21, 2014

प्रतिभावान बुत--हिन्दी कविता(pratibhawan but-hindi kavita or poem)



कोई इंसान वातानुकूल यंत्र की
ठंडी हवा लेते हुए
राजमहल में पल रहा है।

कोई सूरज की जलती किरणों में
रोटी के लिये सामान बेचता हुआ
सड़क पर आग में जल रहा है।

कोई समाजवाद का
झंडा उठाये अपने हाथ में
अपने कर्म से भाग्य बदल रहा है।

कोई पूंजीवाद के लिये
उदारीकरण का नारा लगाता
विकास के सांचे में
प्रतिभावान बुत की तरह ढल रहा है।

कहें दीपक बापू चमकीली रातों में
गुजारने की ख्वाहिशें
इंसानियत को अंधेरे में खड़ा कर देंगी
बढ़ती लालच की उष्मा में संसार का
पूरा दिल जल रहा है।
                                                               ------------------------------------
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com
-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका 

५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका

Monday, July 28, 2014

भागती भीड़-हिन्दी कविता(bhagtee bheed-hindi poem)



ऊंचाई पर पहुंच गये लो
चढ़ने के लिये उठाये कदमों का
उनसे हिसाब कौन पूछता है।

चमकाते रहे अपनी छवि
दूसरों के घर से रंग चुराकर
बेशरमी का हिसाब कौन पूछता है।

अपने से कमजोर पर आजमाते ताकत
सुर्खियों पर करता समाज चर्चा
तोड़े गये दिलों का हिसाब कौन पूछता है।

कहें दीपक बापू सरदार बनने के लिये
काने ढूंढ लेते हैं अंधों की फौज,
सच छिपा करते हैं मौज,
अक्लमंद रहते हैं मौन
भागती भीड़ में गिरे लोगों का
हिसाब कौन पूछता है।
--------------


लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com
-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका 

५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका

Saturday, July 19, 2014

जिंदगी जीने की तमीज-हिन्दी व्यंग्य कविता(zindagi jene ki tamiz-hindi satire poem)



ज़माने में चमकने के लिये
चरित्र ऊंचा हो या नहीं
मगर दिखना जरूरी हैं।

सम्मान पाने के लिये
योग्यता संग्रहण कर सकें या नहीं
चतुराई दिखाना जरूरी है।

स्चच्छ छवि हो तो
कितने भी दाग लगे हों चालचलन पर
छिपाये रखने के लिये
आगे धवल पर्दा दिखाना जरूरी है।

कहें दीपक बापू जिंदगी जीने की तमीज
हमें जिन उस्तादों ने सिखाई
सच की राह हमेशा दिखाई
मगर कभी यह नहीं बताया
भीड़ से अलग हटकर चलने पर
अकेले में तन्हाई झेलने की
अपने दिल में ताकत होना जरूरी है।
----------


लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com
-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका 

५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका

Wednesday, July 9, 2014

अपना और पराया मसला-हिन्दी व्यंग्य कवितायें(apna aur paraya masla-hinsi satire poem)



पराये मसले पर लोग जमकर बोलते हैं,
अपना राज खुल जाये तो मुंह नहीं खोलते हैं।
कहें दीपक बापू अपनी छवि बनाने के लिये
दूसरों पर  कीचड़ उछालना गुणहीन लोगोें की मजबूरी हैं,
अपनी पर लगे दाग छिपाने के लिये वह यूं ही डोलते हैं।
--------
गैरों के दर्द पर जो लोग हंसते हैं,
खून के आंसु रोते जब जाल में खुद फंसते हैं।
कहें दीपक बापू कमजोर का जो उड़ाते मजाक
ताकतवर इंसान की बेशरम अदाओं  पर भी
अपनी आंखें नीचे कर जमीन में धंसते हैं।
--------
किसी के दर्द भी हंसकर लोग दिल बहलाते हैं,
कसते हैं फब्तियां बुद्धिमान स्वयं को कहलाते हैं,
कहें दीपक बापू कामयाबी हज़म करना भी सरल नहीं
चढ़ जाता जिस पर दौलत और शौहरत का नशा
 बदजुबानी से ज़माने का दिल बहलाते हैं
-------------

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com
-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका 

५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका

Tuesday, July 1, 2014

रौशनी में अंधे अल्फ़ाज-हिन्दी कविता(roshni mein andhe alfaz-hindi poem or kavita)



हर इंसान की जुबान फिसल जाती है चलते चलते,
कामयाबी का नशा सिर चढ़कर जब बोलता है,
अंधे अल्फ़ाज निकलते हैं रौशनी के जलते जलते।
फर्क इतना है ऊंचाई पर आवाज बुलंद हो जाती है,
नीचे बोलने पर नक्कारखाने में तूती की तरह खो जाती है,
मुश्किल यह है कि शिखर पर पहुंचे हैं बौने चरित्र के लोग,
पीछा करते हुए साथ जाते हैं उनकी छोटी औकात के रोग,
कहें दीपक बापू ओहदा दौलत और शौहरत
हर इंसान को यूं ही हजम नहीं होती,
विरले ही है जिनका काबू होता अपने पर
जिनकी नज़र में उगते सूरज के लिये इज्जत है
यह जानकर भी कि खो जायेगा वह शाम ढलते ढलते।
---------------

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com
-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका 

५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका

Friday, June 20, 2014

दौलत के भूखे खूनखराबा कराते-हिन्दी व्यंग्य कविता(daulat ke bhookhe khoonkhraba karate-hidi vyangya kavita)



हाथ में हथियार लेकर निकले हैं लोग करने जंग,
मुद्दे का तानाबाना बुनकर चुन लेते झंडे का कोई भी रंग।
खूनखराबे करने पर उतारू हैं वह नहीं सुनते अपील,
निर्दोष इंसानों को मारकर अपनी बहादुरी की देते दलील।
वैसे भी हथियार अपनी आंख से काम नहीं करते,
जिनके हाथ में उनमें ही खौफ और डर भरते,
जिनके पेट पाप की रोटी से भरे हैं,
इंसानियत के नाम पर उनके दिल दया से परे हैं।
दौलत के भूखे वह लोग  रोज खूनखराबे के नये पैतरे अपनाते,
सर्वशक्तिमान के लिये काम करने का दावा वही जताते।
कहें दीपक बापू धरती पर इंसाफ लाने के करते जो पाखंड
निहत्थों की जान लेते मासूमों करते बुरी तरह जलील।
-----------------------

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com
-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका 

५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका

Saturday, May 31, 2014

स्वर्ग और नरक यहीं हैं-हिन्दी कवितायें(swarg aur narak yahin hain-hind shortQ poem)



स्वर्ग और नरक इस धरती पर ही यहीं कहीं है,
कहीं आम इंसान बसते तो राक्षसों के महल भी यहीं है।
कहें दीपक बापू इंसानों में नहीं मिलता देवत्व
काली करतूत को रोकना इसलिये संभव नहीं है।
-------
बेबसों पर ताकत आजमाते  वह दबंग हो नहीं सकते,
खाते  मछलियां मगरमच्छ समंदर के वह राजा हो नहीं सकते।
कहें दीपक बापू सभी इंसान बन गये थलचर
स्वार्थ के सिद्ध हैं बेबसों के देवता हो नहीं सकते।
---------------
बेबसों के आंसूओं पर सभी हमदर्दी जताते हैं,
भूल जाते फिर सभी अपने काम में लग जाते हैं।
कहें दीपक बापू मजबूरों के दर्द पर चल रहा धंधा
हमदर्द की छवि बनाकर लोग कामयाबी पा जाते हैं।
----------- 

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com
-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका 

५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका

Tuesday, May 13, 2014

सपने देखकर गमों से पीछा छुड़ायें-तीन हिन्दी क्षणिकायें(sapne dekhkar gamon se peechha chudayen-three short hindi poem)



बेचैन दिल लेकर कहां जायें,

हर जगह यादें साथ चली आयें।

कहें दीपक बापू दर्द भूलाने की आदत जरूरी है

आगे के सपने देखते हुए गमों से पीछा छुड़ायें।

---------

हम अपने मन की उदासी ज़माने को क्या दिखाते हैं,

हमारे दर्द पर लोग खुद को खुश्ी से  तसल्ली दिलाते हैं।

कहें दीपक बापू हैरान परेशान लोग क्या हमदर्द बनेंगे

अपने ही मसलों के हल का आसरा जो दूसरों पर टिकाते हैं।

-----------

कभी आती हंसी कभी दिल उदास हो जाता है,

घड़ी की सुई चलती है हमेशा पर कभी वक्त खो जाता है।

कहें दीपक बापू जिंदगी का हर पल बीतता है

कोई लड़ता गम से कोई खामोश होकर सो जाता है।

---------------

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com
-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका 

५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका

यह रचनाएँ जरूर पढ़ें

Related Posts with Thumbnails

हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर

यह रचनाएँ जरूर पढ़ें

Related Posts with Thumbnails

विशिष्ट पत्रिकाएँ