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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

Saturday, August 8, 2015

धर्म की पेशेवर कला से चिढ़ते हैं प्रचार और समाचार व्यवसायी-हिन्दी लेख(profeshnal art of busniness in religion and indian media-hindi new post in nindi article)


                    सामाजिक दृष्टि से भारत में माता की चौकी एक व्यवसाय के रूप में स्वीकार की गयी है तो उसे धर्म का धंधा कहना ठीक नहीं। शादी तथा अन्य घरेलू कार्यक्रमों पर अनेक जगह माता की चौकी का आयोजन होता है। इसे धर्म का व्यवसाय कहें तो गलत होगा। अगर कहते भी हैं तो बताना पड़ेगा कि उसमें बुराई क्या है? बार बार किसी पर माता की चौकी के नाम पर पैसे लेने पर उसे खलनायक कहना लोगों की आस्था से खिलवाड़ करना है। ऐसा लग रहा है कि प्रचार व्यवसाय के लोग चाहते हैं कि भारत में भक्ति के रूप में भजन और अन्य कार्यक्रम होते हैं वह मुफ्त में हों ताकि उसका पैसा उनकी फिल्मों को देखने या उनके विज्ञापनों में प्रचारित वस्तंुओं पर खर्च हो।
                                   हम भारतीय अध्यात्मिक दर्शन की बात करें तो उसमें किसी भी कर्म, रहन सहन, आचरण तथा विचारा को बुरा नहीं बताया गया।  उसमें तो मनुष्य को उसके कर्म, रहन सहन, खान पान, आचरण तथा विचार का परिणाम बताया गया हैं।  किसी के अनिष्ट की सोचना  बुरा नहीं है पर उसका स्वयं पर जो विपरीत प्रभाव होगा यह बताया गया है।   उपभोग की वस्तुओं के त्याग से अधिक उसके साथ संपर्क होने पर लिप्तता का भाव न रखने के लिये कहा गया है। संकल्प त्याग के भाव के आधार पर देखा जाये तो कोई संत अगर सोने के आभूषण पहनता है तो उस पर आपत्ति उठाना बेकार है जब तक यह पता न चले कि उसका भाव उसके प्रति लिप्तता का है या नहीं।  कोई संत भक्तों को दिखाने के लिये अच्छे कपड़े और  गहने पहनता है तो बुरी बात नहीं है। उसकी भाव लिप्तता  जाने बिना  प्रतिकूल टिप्पणी करना ठीक नहीं। प्रचार और समाचार के व्यवसायी संतों की सौंदर्य लीला में अश्लीलता और अपने फिल्म नायकों की अश्लील लीला में सौंदर्य का बोध जताते हैं। एक महिला संत बिकनी पहने तो धर्म विरोधी और उनकी फिल्मी नायिकायें पहिने तो सौंदर्य की मूर्ति हो जाती हैं।
                                   हम यहां पेशवर धार्मिक लोगों के कृत्यों का समर्थन नहीं कर रहे पर यह समझ लेना चाहिये भारतीय अध्यात्म मे भक्त चार प्रकार के भक्त होते हैं। अर्थार्थी, आर्ती, जिज्ञासु और ज्ञानी।  ज्ञानी भक्त भगवत् नाम  में अपना आसरा ढूंढ लेते हैं पर शेष तीनों वर्ग के भक्त इन्हीं भक्ति के व्यवसायियों में पास मन की शांति ढूंढते हैं। एक योग और ज्ञान साधक के रूप में हम इनकी निंदा करने की बजाय इस बात की प्रशंसा करते हैं कि वह अर्थार्थी और आर्ती भाव के भक्तों का समूह संभालते हैं। याद रखें भक्ति मन के भटकाव को रोकती है इससे समाज में हिंसक मनुष्यों की संख्या सीमित रहती है।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
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Monday, August 3, 2015

परोपदेशे कुशल बहुतेरे-हिन्दी कविता(parodeshe kushal bahuter-hindi poem)


भूख सहने की ताकत
रखने की सलाह
वह लोग दे रहे
जो खाते स्वयं मलाई।

सस्ते में जिंदगी
गुजारने की बात कहते
सजी सोने से उनकी कलाई।

कहें दीपक बापू इस युग में
खोटे सिक्के भी चल जाते हैं
पानी से चमत्कार करने वालों के घर
घी के चिराग जल जाते हैं
हुनरमंद है वह लोग
करते सारे काम छोड़ भलाई।
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Friday, July 31, 2015

जनमानस में राज्य प्रबंध के साथ ही अन्य क्षेत्रों में बदलाव की चाहत पूरी होना ही चाहिये(janmanas mein rajya prabandh ke sath hi anya kshetron min badlaw ki chahat puri hona hi chahiye)

         
                    भारत में सामाजिक, आर्थिक, धाार्मिक, शिक्षा पत्रकारिता, खेल, फिल्म, टीवी तथा अन्य सभी सार्वजनिक विषयों में राज्य का हस्तक्षेप हो गया है।  अनेक ऐसे काम जो समाज को ही करना चाहिये वह राज्य प्रबंध पर निर्भर हो गये हैं। ऐसे में जब कोई राजनीतिक बदलाव होता है तो हर क्षेत्र में उसके प्रभाव देखने को मिलते हैं।  देश में गत साठ वर्षों से राजनीतिक धारा के अनुसार ही सभी सार्वजनिक विषयों तथा उनसे संबद्ध संस्थाओं में राज्य का हस्तक्षेप का हस्तक्षेप हुआ तो विचाराधाराओं के अनुसार ही वहां संचालक भी नियुक्त हुए।  हमारे देश में तीन प्रकार की राजनीतिक विचाराधारायें हैं-समाजवादी, साम्यवादी और दक्षिणपंथी।  उसी के अनुसार रचनाकारों के भी तीन वर्ग बने-प्रगतिशील जनवादी तथा परंपरावादी।  अभी तक प्रथम दो विचाराधारायें संयुक्त रूप से भारत की प्रचार, शिक्षा तथा सामाजिक निर्माण में जुटी रहीं हैं पर परिणाम ढाक के तीन पात।  उल्टे समाज असमंजस की स्थिाित में है।
                    पिछले साल हमारे देश में एतिहासिक राजनीतिक परिवर्तन हुआ। पूरी तरह से दक्षिणपंथी संगठन राजनीतिक परिवर्तन के संवाहक बन गये।  भारत में यह कभी अप्रत्याशित लगता  था पर हुआ।  अब दक्षिणपंथी संगठन अपने प्रतिपक्षी विचाराधाराओं की नीति पर चलते हुए वही कर रहे है जो पहले वह करते रहे थे।  प्रतिपक्षी विचाराधारा के विद्वान शाब्दिक विरोध करने के साथ ही  हर जगह अपने मौजूदा तत्वों को प्रतिरोध  के लिये तत्पर बना रहे हैं।
                    इस लेखक ने तीनों प्रकार के बुद्धिजीवियों के साथ कभी न कभी बैठक की है।  प्रारंभ  में दक्षिण पंथ का मस्तिष्क पर  प्रभाव था पर श्रीमद्भागवत गीता, चाणक्य नीति, कौटिल्य, मनुस्मृति, भर्तुहरि नीति शतक, विदुर नीति तथा अन्य ग्रंथों पर अंतर्जाल पर लिखते लिखते अपनी विचाराधारा भारतीय अध्यात्मिक दर्शन से मिल गयी है।  हमें लगता है कि हमारे अध्यात्मिक दर्शन में न केवल आत्मिक वरन् भौतिक विषय में भी ढेर सारा ज्ञान है। पश्चिमी अर्थशास्त्र में दर्शन शास्त्र का अध्ययन नहीं होता और हमारे यहां दर्शन शास्त्र में भी अर्थशास्त्र रहता है।  दक्षिणपंथ की विचाराधारा से यही सोच हमें प्रथक करती है।
          बहरहाल हमारा मानना है कि समाजवाद और साम्यवादियों की विचाराधारा के आधार  पर समाज और उसकी संस्थाओं का राज्य प्रबंध की शक्ति से  ही चलाया गया था।  अब अगर राज्य प्रबंध बदल गया है तो अन्य संस्थाओं में  दक्षिणपंथी विद्वानों का नियंत्रण चाहें तो न चाहें तो होगा तो जरूर।  अध्यात्मिक विचारधारा के संवाहक होने की दृष्टि से हम भी चाहते हैं कि परिवर्तन हो। आखिर समाज और उसके विचार विमर्श तथा शिक्षण की संस्थाओं में जनमानस के दिमाग में परिवर्तन की वही चाहत तो है जो लोगों ने राज्य प्रबंध में बदलाव कर जाहिर की है।
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Sunday, July 26, 2015

सार्वजनिक छवि चमकाने के लिये फांसी का विरोध-हिन्दी चिंत्तन लेख(sarvjanik chhavi chamkane ke liye faansi ke liye virodh-hindi chintta article)


            मुंबई बम धमाकों के एक आरोपी को फांसी की सजा मिले या आजीवन कारावास की इस पर हम कोई निजी राय कायम नहीं कर पाये। इसका कारण यह है कि 22 वर्ष पूर्व हुए उन बमविस्फोटों के भयावह दृश्य हमने अखबारों में देखे थे। उसके बाद गंगा नदी में बहुत पानी बह गया तो हमारी स्मरण शक्ति की धारा में बहुत सारे नये तत्व घुल गये हैं। बहरहाल फांसी की सजा से पहले न्यायालय में एक प्रकरण कई दौर से निकलता है जिसमें सबूतों के आधार पर न्यायाधीश निर्णय देते हैं।  इसमें एक लंबा समय निकल जाता है। इन निर्णयों पर सार्वजनिक रूप से प्रतिकूल टिप्पणी करना अपराध है फिर भी प्रचार माध्यमोें जगह बनाने के लिये अब करने लगे हैं।  मुंबई धमाके के आरोपी की पृष्ठभूमि में कहीं न न कहीं मुंबईया फिल्म से भी जुड़ी है इसलिये अनेक अभिनेता अब जाकर उसे फांसी की सजा न देने की मांग कर रहे हैं।  उनके साथ मुंबई में रहने वाले अनेक  बुद्धिजीवी भी हो गये हैं। एक अभिनेता ने तो बाकायदा उसे बेगुनाह तक बता दिया और जब बवाल मचा तो उसे बयान वापस लिया।
                              हमारी सजा पर कोई राय नहीं है पर जिस तरह का वातावरण बना है उससे हैरान जरूर हैं। अगर वह बेगुनाह तो उसके यह नये हितचिंत्तक न्यायालय में जाकर उसके पक्ष में बोल सकते थे पर न बोले।  फांसी की सजा भी एक दिन में नही होती। पहले न्यायालय सजा देता है फिर वह राष्ट्रपति के पास जाती है।  इस प्रक्रिया के बीच भी इन हितचिंत्तकों के पास अवसर था पर वह अब जाकर चिट्ठी लिख रहे हैं जब राष्ट्रपति दया याचिका खारिज कर चुके हैं। फांसी के करीब पहुंचने के पहले उस आरोपी के हितचिंत्तकों के पास बहुत सार अवसर थे पर वह कुछ करना तो दूर सोचते हुए भी नहीं दिखे।  ऐसे में संदेह उठेंगे।  ऐसा लगता है कि आरोपी के समर्थन के बयान उसकी हित की अपनी सार्वजनिक छवि चमकाने की चिंता में ही दिये जा रहे हैं।
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Sunday, July 19, 2015

इतिहास के फरिश्ते-हिन्दी व्यंग्य कविता(itihas ke farishtey-hindi satire poem)

पंचतत्वों से बने इंसान
कभी हीरे या
सोने जैसे नहीं होते।

आदतों से मजबूर सभी
चरित्र में चालाकी के बीज
बोने जैसे नहीं होते।

कहें दीपक बापू इतिहास में
खल भी बन गये महानायक
दर्दनाक हादसे करने वाले
पर्दे पर बने घायल के सहायक
कहलाये फरिश्ते ऐसे नाम
जो भले इंसानों की जुबान पर
ढोने जैसे नहीं होते
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Thursday, July 16, 2015

बिके बुद्धिमान-हिन्दी कविता(bike buddhiman-hindi poem)


देश के अक्लमंदों ने
हर रंग के भाव की
अलग पहचान बताई है।

सभी रंगों के मेल की
तारीफ करते जरूर
यह अलग बात है
टकराव से रोटी कमाई है।

कहें दीपक बापू बिके बुद्धिमानों से
बहस करना बेकार है
अपने आकाओं से
हर रंग की पहचान
उन्होंने लिफाफे में
कागज पर रुपये से लिखी पायी है।
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Friday, July 10, 2015

सब गोलमाल है-हिन्दी व्यंग्य कविता(sab golmal hai-hindi satire poem)


चरण छूकर
सेवक की स्वयंभू उपाधि
धारण कर जाते हैं

आशीर्वाद लेकर
उड़ जाते आकाश में
स्वामीपन के अहंकार से
सभी डर जाते हैं।

कहें दीपक बापू सब गोलमाल है
 सेवा से मिलता मेवा
पर काम दिखता नहीं
अदाओं से ही प्रचार के
पन्ने भर जाते हैं।
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Sunday, July 5, 2015

सभी क्रूर नहीं होते-हिन्दी कविता(sabhi kroor nahin hote-hindi poem)

दुनियां के सभी मजदूर
हमेशा मजबूर नहीं होते।

धरती के सभी गरीब
नरक के रहते करीब
स्वर्ग से भी दूर नहीं होते।

कहें दीपक बापू दिल से
साफ इंसानों का समंदर है,
काली नीयत वाले
महल के अंदर हैं,
जिंदगी के सफर में
अनजाने भी बन जाते हमदर्द
सौदागरों जैसे सभी क्रूर नही होते।
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Monday, June 29, 2015

सिर पर ताज से-हिन्दी कविता(sir par taz se-hindi poem)

बड़े आदमी की
नीयत के काले दाग
वेशभूषा से छिप जाते हैं।

मध्य आदमी के
बनियान के दाग
कमीज से छिप जाते हैं।

गरीब आदमी के दाग
फटे वस्त्रों से
भला कहां छिप पाते हैं।

कहें दीपक बापू आम इंसानों से
पैसा पद और प्रतिष्ठा की
जंग लड़ना व्यर्थ है
चाहे सिर पर ताज से
चरित्र पर लगे दाग
चमक में छिप जाते हैं ।
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Wednesday, June 24, 2015

घबड़ाते हैं चालाक लोग-हिन्दी कविता(ghabadate hain chalak log-hindi poem)

इंतजार करो
आग बुझाने आयेंगे वही लोग
जिन्होंने लगाई है।

इंतजार करो
रोटी लेकर आयेंगे वही लोग
जिन्होंने भूख जगाई है।

कहें दीपक बापू लाचारी ओढ़कर
बैठने का सहारा इंतजार है,
बेबस का वादा यार है,
कमजोर के उठ खड़े होने से
घबड़ाते हैं वह चालाक लोग
जिन्होंने ज़माने की तरक्की
अपने घर लगाई है।
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Friday, June 19, 2015

योग साधना का औषधि जैसे महत्व का प्रचार संकीर्णता का परिचायक-21 जून अंतर्राष्टीय योग दिवस विश्व योग दिवस पर विशेष हिन्दी चिंत्तन लेख


                             21 जून 2015 को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर हमारे देश में प्रचार का दौर चल रहा है वह बहुत जोरों पर है।  जहां पूरे विश्व में योग दिवस की तैयारियां चल रही हैं वहीं भारत में कहीं उबाऊ तो कहीं रुचिकर बहस भी जारी है।  जहां योग समर्थक हल्के तथा नारेयुक्त तर्कों से प्रचार पाने के मोह में प्रचाररत हैं तो अनेक लोग उनका विरोध करते हुए अनेक आजीबोगरीब तर्क भी दे रहे हैं। योग के विरोधी अनेक  ऐसे योग समर्थकों की चर्चा करते हैं जो मूलतः भारतीय चिकित्सा पद्धतियों के समर्थक होते हुए भी अंततः अस्वस्थ होने पर अंग्रेजी चिकित्सा पद्धति की शरण में गये हैं। इनमेें तो एक विश्व प्रसिद्ध योग शिक्षक भी हैं जो भूख हड़ताल के बाद कमजोर होने पर अंग्रेजी पद्धति वाले चिकित्सालय में भर्ती हुए-हमारा मानना है कि वह योगी होते हुए भी असहज योग की राह चलने के कारण उन्हें इस दशा का सामना करना पड़ा तो क्षणिक तनाव की वजह से उन्होंने अपनाया था।
                              बहरहाल योग के साथ चिकित्सा पद्धति की चर्चा करना ही  हमें व्यर्थ लगता है पर एक योग तथा ज्ञान साधक होने के कारण हम इस प्रयास में है कि 21 जून तक हम अपने अनुभव बांटते रहें इसलिये प्रतिदिन योग चर्चा करते हैं। हमारा अनुभव कहता है कि योगासन के समय बीमारियों की चर्चा करना एकदम बेकार है।   यह अलग बात है कि कुछ पेशेवर येागाचार्य चिकित्सक की तरह भी अपनी भूमिका निभा रहे हैं। अनेक बार तो स्थिति यह दिखती है कि बीमारियों के दूर करने वाले विशेष योग शिविर आयोजित किये जाते हैं।  हमारा मानना है कि ऐसे अवसरों पर साधक के दिमाग में अपनी बीमारी की बात रहती है जो उसे योग के निष्काम भाव से दूर कर देती है। दूसरी बात यह कि चाहे भले ही कोई भारतीय अध्यात्मिक दर्शन का प्रचारक होने का दावा करते हुए भारतीय योग तथा चिकित्सा पद्धति का समर्थन करे पर उसे अपनी प्रतिबद्धता दिखाने के लिये उससे संबंध प्रतिदिन रखना चाहिये।  जो प्रतिदिन योग साधना करेगा वह अस्वस्थ होने पर अंग्रेजी पद्धति और आयूर्वेद की बात तो छोड़िये घरेलू इलाज से भी ठीक हो जायेगा-ऐसा हमारा मत है।  जो इतना अस्वस्थ हो जाता है कि उसे अंग्र्रेजी पद्धति की शरण में जाना पड़े तो मान लेना चाहिये कि वह प्रतिदिन योगाभ्यास नहीं करता या फिर ज्ञान की राह से भटक कर उसने अपने अभ्यास में कमी ला दी है।
                              जिन लोगों को योग से विरोध है वह इसे न करें-हमें उनसे कोई गिला नहीं है।  वह ऐसे योग समर्थकों की सूची भी जारी करें जो भारतीय अध्यात्मिक दर्शन का दावा करने के बाद भी अंग्रेजी संस्कृति, शिक्षा, संस्कार तथा चिकित्सा पद्धति की शरण में चले जाते हैं-इस पर भी कोई आपत्ति नहीं है। हमारा कहना है कि योग तो जीवन जीने की कला है। करो तो जानो।
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Saturday, June 13, 2015

गम खुशी और कूड़ा-हिन्दी हास्य कविता(gum kuda aur khushi-hindi comedy poem)

पंगेबाज ने हमसे पूछा
दीपक बापू क्या मैं तुमसे मजाक
कर सकता हूं

हमारे हां कहते ही
घर के बाहर झाड़ू
लगाना शुरु कर दिया
और कहने लगा
मै अपना गम और खुशी
बांटने के लिये
दोस्त केवल कूड़े को ही
बना सकता हूं।
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Tuesday, June 9, 2015

भलाई का फूल-हिन्दी कविता(BHALAI KA FOOL-HINDI POEM)

आदर्श व्यक्तित्व की
तलाश में भटकते हैं
पर कोई मिलता नहीं।

बड़े बड़े नाम सुनते हैं
बड़े जाल वह बुनते हैं
पास जाकर देखते
मतलब के बिना कोई हिलता नहीं है।

कहें दीपक बापू सफेद कागज पर
काले अक्षरों में धवल छवि का प्रचार
रंगीन पर्दे पर प्रसिद्धि का व्यापार
बना देता है किसी को भी देवता
जिनकी छांव में भलाई का फूल
कभी खिलता नहीं है।
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Thursday, June 4, 2015

संकट के बादल-हिन्दी कविता(sankat ke badal-hindi poem)


उनकी रस भरी बातें
सुनकर खुश हुए
मगर हाथ में उन्होंने
सूखा कागज ही थमाया।

अपनी भड़ास से
हमारे कान किये घायल
बोरियत से जो संपर्क पाया।

कहें दीपक बापू दुनियां पर
काबिज है वह लोग
गुड़ नहीं देते कभी
गुड़ जैसी बात जरूर करते
उनकी अदाओं पर लोग मरते
इसलिये जब बरसते संकट के बादल
मदद की मिलती नहीं छाया।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com
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Saturday, May 30, 2015

कमीशन की आग-हिन्दी क्षणिकायें(fire of commision-hindi poem)

कागज पर नक़्शे में  था
पर तालाब बनाया नहीं,
कमीशन की आग में
जल गया प्यास बुझाने का सपना
इसलिये हिसाब का
कागज  बनाया नहीं।
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कमीशन के आग में
सड़कें जल रहीं हैं
इसलिये ही गर्मी में पिघल रही हैं।
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यकीन करो
सभी के सपने
कभी तो पूरे हो जायेंगे,
कमीशन की आग में
चावल के दाने पककर
तारों की तरह
आखों को बहलायेंगे।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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Sunday, May 24, 2015

देसी सोच में विदेशी तड़का-हिन्दी कविता(disi soch mein videshi tadka-hindi poem)

वातानुकूलित कक्ष में
टेबलों पर माईक के सामने
कुछ सूरते सजी हैं।

शौचालयों और शिवालयों के
महत्व पर चर्चा होगी
सभी के दिमाग में
तर्कों की घंटियां बजी हैं।

कहें दीपक बापू देसी सोच में
लगेगा विदेशी तड़का
पेशेवर दिमागों ने लिया
समाज बदलने का ठेका
जिन्होंने अभी तक
विदेशी विकास की तस्वीर भजी हैं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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Sunday, May 17, 2015

दौलतमंद का हिसाब-हिन्दी कविता(daulatmand ka hisab-hindi poem)

आकाश में उड़ते हुए
सभी को धरती
हरी दिखाई देती है।

वातानुकूलित कक्षों में
हिसाब करने वालों को
सभी की तिजोरी
भरी दिखाई देती है।

कहें दीपक बापू सवारी करते
जो दौलत और शौहरत के रथ से
सड़क पर विचरते हर राहगीर के
बागी होने की सोच में
उनकी नीयत
डरी दिखाई देती है
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Sunday, May 10, 2015

राजमार्ग पर कौन त्यागी होता-हिन्दी कविता(rajmarg par kaun tyagi hot-hindi poem)


राजपद पर विराजे इंसान
अपनी प्रतिष्ठा के मद में
बह जाते हैं।

सवालों के जवाब में
विनम्र शब्द भी चेतावनी की
भाषा में कह जाते हैं।

कहें दीपक बापू अहंकार
पेशेवर सन्यासियों में भी होता है,
राजमार्ग पर विचरता
भला कौन त्यागी होता,
आम इंसान से प्यार दिखाओ
या जतलाओ गुस्सा
सब सह जाते हैं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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Monday, May 4, 2015

सिक्कों की खनक गरीब का दर्द-हिन्दी कविता(sikkon ki khanak garib ka dard-hindi poem)


चालाकियों से कामयाब लोग
अक्ल से भी अमीर
कहलाते हैं।

नहीं जानते कोई तरीका
सिक्कों की खनक से ही
वह अपना दिल
बहलाते हैं।

कहें दीपक बापू ताजमहल से
अधिक भव्य महल बन गये हैं,
अमीर शाह की तरह तन गये हैं,
नहीं निकालते जेब से
एक भी सिक्का
खाली बातों से गरीब का दर्द
सहलाते हैं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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