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Thursday, July 21, 2016

सत्य साधना-हिन्दी कविता (Satya Sadhna-HindiPoem)


जहां अपनी याद रखनी हो
वहां से चले जाना जरूरी है।
अपना दिल बचाने के लिये
स्मृतियों से बिछोह जरूरी है।
कहें दीपकबापू सपनों का बोझ
ढोते ढोते जिंदगी बर्बाद करने से
बचने के लिये
सत्य साधना जरूरी है।
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Tuesday, July 12, 2016

फकीर अमीर और वजीर-हिन्दी व्यंग्य कविता(Faqir Amir aur vazir-HindiSatirePoem)

मुफ्त का माल मिले
भले चंगे लोग
फकीर बन जाते हैं।

जहां पाखंड की पूजा हो
खाली जेब वाले भी
अमीर बन जाते हैं।

कहें दीपकबापू काबलियत से
नाता नहीं होता जिनका
टेढ़ा चलते हुए पैदल भी
वज़ीर बन जाते हैं।
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Tuesday, May 17, 2016

भूले से रहते हैं-हिन्दी कविता(Bhoole se Rahate hain-Hindi Poem)

आकाश में उड़ने वाले
जमीन का दर्द
भूले से रहते हैं।

चौपाये पर सवार
सर्दी गर्मी का दर्द
भूले से रहते हैं।

कहें दीपकबापू मौसम से
कभी मित्रता कभी शत्रुता
जमीन पर निभाते श्रमजीवी
जो पसीने से नहाते अपना दर्द
भूले से रहते हैं।
------------

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
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Tuesday, May 3, 2016

हताश कंकाल-हिन्दी कविता(Hatash Kankal-Hindi Poem)

हांडमांस के बुत
बरसों से आंखों के
सामने खड़े हैं।

कोई पैमाना नहीं
नाप सकें बुद्धि का कद
दावे तो सभी करते
उनके दिल बड़े हैं।

कहें दीपकबापू पर्यावरण में
हवाओं के साथ 
आग की जंग चल रही है
दग्ध हो चुकी संवेदनायें
हताश कंकाल सोच में खड़े हैं।
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Thursday, April 28, 2016

गुलामी का ज़हर-हिन्दी कविता(Gulami Ka Zahar-Hindi Kavita)


अपने अपने दर्द के
बयान में सब लोग
शब्द बोल रहे हैं।

हमदर्दी के सौदागर भी
रुपयों के अनुसार
शब्द तोल रहे हैं।

कहें दीपकबापू भावना में
बहना मना है
इश्क की आड़ में
लोग गुलामी का
जहर घोल रहे हैं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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Saturday, April 16, 2016

पसीने से बीमारी हारी है-हिन्दी कविता(Pasine se Bimari hari hai-HindiPoem)

गर्मी की तपती दोपहर
सड़क पर सन्नाटे में
जीवन की जंग जारी है।

ठेला ढकेलते 
पसीने में नहाये लोगों की
बेबसी से यारी है।

कहें दीपकबापू परिश्रम से
मुंह चुराने वालों को
वातानुकूलित  कक्ष में भी
नहीं छोड़ती ज्वाला
मगर बहते पसीने से
हर बीमारी हारी है।
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Thursday, February 18, 2016

दर्द की खबर-हिन्दी कविता (Dard Ki Khabar-Hindi Kavita)

घर से निकलते
गरीबों को अमीर बनाने
चंदा समेटने लग जाते।

हमदर्दी के सौदागर
दर्द की खबर सुनते ही
जग जाते हैं।

कहें दीपकबापू पांखडियों से
बचकर रहना यारो
मतलबपरस्त चले
परोपकार करने
दोस्ती कर ठग जाते हैं।
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Thursday, September 3, 2015

सन्यासी और सिंहासन-हिन्दी व्यंग्य कविता(Sanyasi aur singhasan-hindi sarite poem)

ज्ञान की किताबों से
अपने स्वार्थ के अनुसार
शब्द छांटते हैं।

ज्ञान की राह चलने वाले
रहते मौन
बेचने वाले लगाते रट्टा
दाम लेकर बांटते हैं।

कहें दीपक बापू फकीरी के लिबास में
अमीरी के खिताब भी लिये जाते
नाम सन्यासी रख
सिंहासन की इच्छा किये जाते
सत्य शब्द कमीज में
बटन की तरह टांकते हैं।
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Friday, August 28, 2015

गीताप्रेस की रक्षा संचालक श्रमिकों के प्रति सद्भाव अपनाकर ही कर सकते हैं-हिन्दीलेख(sevegitapress with worker setisfication-hindiarticle

                                   गीताप्रेस के बारे में हमने कल लिखा था कि हमें उसके बंद होने के कारणो का पता नहीं है पर टीवी चैनलों के समाचारों से तमाम जानकारी मिल गयी। गीताप्रेस ट्रस्ट और वहां के कर्मचारियों के बीच विवाद चल रहा है।  वहां  बरसों से कार्यरत कर्मचारियों की दयनीय हालत ने हमें विचलित किया।  जहां तक हमारी जानकारी है गीता प्रेस एक ट्रस्ट से संचालित है। वहां के कर्मचारियों की हड़ताल के बारे में हमने बहुत दिन पहले पढ़ा था तब लगा कि मामला हल हो जायेगा।  अब प्रकाशन बंद होने की खबर आयी तो हमें लगा कि शायद आर्थिक तंगी के कारण ऐसा हो रहा है पर स्थिति वह नहीं निकली।
                                   हड़ताली कर्मचारियों की बातें सुनी। उनका कहना था कि आठ हजार प्राप्त करने के हस्ताक्षर कराकर राशि कम यह कहकर दी जाती कि बाकी ठेकेदार को दी गयी है।   ठेकेदार का नाम उनको नहीं बताया जाता। यह शोषण वाली बात सुनकर धक्का लगा।
                                   बहलहाल हमें ऐसा लगा कि भारतीय अध्यात्मिक के इस प्राचीन मंदिर की तरह स्थापित गीता प्रेस के स्वामियों में कहीं न कहंी अहंकार के साथ पुरानी यह रूढ़िवादिता भी है जिसमें अकुशल श्रम को हेय समझा जाता है-श्रीमद्भागवत गीता ऐसा करना आसुरी प्रवृत्ति का मानती है।
                                   दूसरी बात यह कि गीताप्रेस के स्वामियों को चाणक्य का यह सिद्धांत ध्यान रखना चाहिये कि धर्म से मनुष्य और अर्थ से धर्म की रक्षा होती है। यहां अर्थ के साथ न स्वार्थ जोड़ें न परमार्थ का नारा लगायें।  एक बात तय रही है कि आपके धर्म की रक्षा हो तो सबसे पहले इस बात का प्रयास करें कि लोगों के पास अपनी तथा परिवार की रक्षा के लिये अर्थ की उपलब्धि पर्याप्त मात्रा में  होती रहे। स्वामी का अहंकार तभी तक ठीक है जबतब श्रमिक प्रसन्न है। हमारे अनुमान से  गीता प्रेस के पास संपत्ति और आय की कमी नहीं है और श्रमिक चाहे ठेके के हों या नियमित उन्हें प्रसन्न करना पहला धर्म होना चाहिये। एक श्रमिक ने कहा कि हम कोई पच्चीस या पचास हजार नहीं मांग रहे। अपना हक मांग रहे हैं।
                                   उसका हक से आशय शायद जितनी राशि की प्राप्ति ली जाती है उतनी ही देने से भी है। हम स्वामियों से कह रहे हैं कि पच्चीस पचास हजार भी दे दिये तो कौनसा तूफान आने वाला है।  वह श्रमिक धर्म के सैनिक हैं और गीता प्रेस के अंदरूनी लोग हैं। विश्व में जिस तरह गीता प्रेस का भव्य नाम है उसे देखते हुए अगर उन्हें अगर पच्चीस हजार भी दे दिये तो कौन वह भारी अमीर हो जायेंगे।
याद रहे जिसके सैनिक प्रसन्न नहीं होते वह राजा लड़ाई हार जाता है, यह कौटिल्य ने कहा है।  अगर यह धर्म सैनिक अप्रसन्न है तो फिर गीता प्रेस का प्रतिष्ठित नहीं रह पायेगा। फिर बंद हो या नहीं।  अकुशल श्रम के प्रति हेयता का यह भाव अगर गीता प्रेस में है तो उसके बंद होने या खुले रहने के प्रति हमारी रुचि समाप्त हो जाती है। इसलिये हमारी बात अगर गीता प्रेस के संचालकों तक कोई पहुंचा सके ठीक वरना हम तो यह आग्रह कर ही रहे हैं कि श्रमिकों के साथ सद्भावना से मामला निपटाये। हम जैसे स्वतंत्र अध्यात्मिक लेखक और पाठक यही चाहते हैं।
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Sunday, August 23, 2015

आज शांतिवार है-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन लेख (today is peace day-hindi satire thought article,aaj shantiwar hai-hindi vyangya lekh)

                     
                                   उधर उत्तर और दक्षिण कोरिया इधर भारत और पाक के बीच तीन दिन तक प्रचार युद्ध हुआ। शनिवार तक चले इस युद्ध में दोनों ही स्थानों पर आज का रविवार एक तरह से शांतिवार लग रहा है। उधर उत्तर कोरिया सीमा पर दक्षिण कोरिया के लाउडस्पीकरों से हो रहे प्रचार पर इतना उत्तेजित था कि लगा रहा था कि अब युद्ध छिड़ने वाला ही है। अंतर्जाल पर भाई लोग इस इंतजार में लगे थे कि वह इस युद्ध के प्रारंभ होने की प्रथम सूचनावाहक बने। ऐसा हुआ नहीं। अचानक दोनों देशों के बीच शांतिवार्ता प्रारंभ हो गयी।  इधर भारत और पाकिस्तान के बीच शांतिवार्ता प्रारंभ करने का शोर इतना था कि नहीं हुआ तो एकदम युद्ध प्रारंभ हो जायेगा। शांतिवार्ता नहीं हुई पर युद्ध होने जैसी कोई संभावना भी नहीं दिख रही।
                                   उधर का तो पता नहीं कि वहां प्रचार माध्यमों ने विज्ञापन से कमाई की या नहीं पर यहां जमकर विज्ञापन प्रसारित हुए। वैसे हमारा अनुमान है कि वहां भी इसी तरह के व्यवसायिक प्रचार माध्यम हैं और उन्होंने इतना ही शोर मचाया होगा।  इधर का पता है। यहां भारत और पाकिस्तान के प्रचार माध्यम विज्ञापन के मैदान में युद्धरत लग रहे थे।  पाकिस्तान के सुरक्षा सलाहकार सरताज अजीज की भारत के अपने समकक्ष अनिल डोभाल से भेंट होनी थी। जहां तक हमारी जानकारी है दोनों सभ्रांत वर्ग के हैं और मुलाकात में एक दूसरे से शब्दों का आदान प्रदान करने वाले थे। प्रचार माध्यमों की तरफ देखें तो ऐसा लग रहा था कि दोनों कोई युद्ध करने वाले हैं।  पाकिस्तान के प्रचार माध्यम जहां अपने सुरक्षा सलाहकार को कमजोर बताकर अपने देश के लोगों से निराशा की सामग्री परोस रहे थे तो इधर भारत के प्रचार माध्यम अपने सुरक्षासलाहकार की शक्ति बखान करने में लगे थे।  हमारे समझ में यह नहीं आया कि चल क्या रहा है।  ऐसा लग रहा था कि क्रिकेट मैच चल रहा है जिसमेें कभी ओवर के बीच में विज्ञापन आ रहे हों। कहीं गेंद बदली जा रही है तो विज्ञापन आ रहा है।
                                   ऐसा लगता है कि प्रचार माध्यमों ने अपनी कमाई का कोटा पूरा कर लिया है इसलिये आज वैसी आक्रामकता नहीं दिख रही।  आमतौर से सुपर संडे या चमत्कृत रविवार इतना ठंडा नहीं रहता। आमतौर से शनिवार को ही सुपर संडे या चमत्कृत रविवार की सामग्री प्रचार प्रबंधक तैयार करते हैं पर आज शनिवार के बाद रविवार कम शांतिवार ज्यादा लग रहा है।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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Sunday, August 16, 2015

जिंदगी के रंग-हिन्दी व्यंग्य कविता(zindagi ke rang-hindi poem)

समंदर में अमृत के साथ
विष भी मिलता है।

कांटों के बीच गुलाब
कीचड़ में कमल खिलता है।

कहें दीपक बापू जिंदगी के रंगों से
नफरत और प्यार का
रिश्ता निभाना बेकार
जिस दुकान पर
ठंड रोकने का कंबल बिकता
मुर्दे के लिये कफन भी
वहीं मिलता है।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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Wednesday, August 12, 2015

15 अगस्त आजादी का दिन-हिन्दी व्यंग्य कविता (15 augurst azadi ka din-hindi satire poem)

आजादी का दिन
एक फिर मनायेंगे।

गुलामी पाने की होड़ में
किताबें पढ़ते छात्र
गुलामी जैसे पढ़ाते शिक्षक
आजादी का गीत गायेंगे।

कहें दीपक बापू अंग्रेेज मर गये
औलाद छोड़ गये
किताबों से मिले गुलामी
नवाबी नखरों जैसी खामी
समाज में जोड़ गये
मन उड़ना चाहता
आजाद पंछी की तरह
रूढ़ियों के बंधन की लाचारी
उसे कैसे समझायेंगे।
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Monday, August 3, 2015

परोपदेशे कुशल बहुतेरे-हिन्दी कविता(parodeshe kushal bahuter-hindi poem)


भूख सहने की ताकत
रखने की सलाह
वह लोग दे रहे
जो खाते स्वयं मलाई।

सस्ते में जिंदगी
गुजारने की बात कहते
सजी सोने से उनकी कलाई।

कहें दीपक बापू इस युग में
खोटे सिक्के भी चल जाते हैं
पानी से चमत्कार करने वालों के घर
घी के चिराग जल जाते हैं
हुनरमंद है वह लोग
करते सारे काम छोड़ भलाई।
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Sunday, July 26, 2015

सार्वजनिक छवि चमकाने के लिये फांसी का विरोध-हिन्दी चिंत्तन लेख(sarvjanik chhavi chamkane ke liye faansi ke liye virodh-hindi chintta article)


            मुंबई बम धमाकों के एक आरोपी को फांसी की सजा मिले या आजीवन कारावास की इस पर हम कोई निजी राय कायम नहीं कर पाये। इसका कारण यह है कि 22 वर्ष पूर्व हुए उन बमविस्फोटों के भयावह दृश्य हमने अखबारों में देखे थे। उसके बाद गंगा नदी में बहुत पानी बह गया तो हमारी स्मरण शक्ति की धारा में बहुत सारे नये तत्व घुल गये हैं। बहरहाल फांसी की सजा से पहले न्यायालय में एक प्रकरण कई दौर से निकलता है जिसमें सबूतों के आधार पर न्यायाधीश निर्णय देते हैं।  इसमें एक लंबा समय निकल जाता है। इन निर्णयों पर सार्वजनिक रूप से प्रतिकूल टिप्पणी करना अपराध है फिर भी प्रचार माध्यमोें जगह बनाने के लिये अब करने लगे हैं।  मुंबई धमाके के आरोपी की पृष्ठभूमि में कहीं न न कहीं मुंबईया फिल्म से भी जुड़ी है इसलिये अनेक अभिनेता अब जाकर उसे फांसी की सजा न देने की मांग कर रहे हैं।  उनके साथ मुंबई में रहने वाले अनेक  बुद्धिजीवी भी हो गये हैं। एक अभिनेता ने तो बाकायदा उसे बेगुनाह तक बता दिया और जब बवाल मचा तो उसे बयान वापस लिया।
                              हमारी सजा पर कोई राय नहीं है पर जिस तरह का वातावरण बना है उससे हैरान जरूर हैं। अगर वह बेगुनाह तो उसके यह नये हितचिंत्तक न्यायालय में जाकर उसके पक्ष में बोल सकते थे पर न बोले।  फांसी की सजा भी एक दिन में नही होती। पहले न्यायालय सजा देता है फिर वह राष्ट्रपति के पास जाती है।  इस प्रक्रिया के बीच भी इन हितचिंत्तकों के पास अवसर था पर वह अब जाकर चिट्ठी लिख रहे हैं जब राष्ट्रपति दया याचिका खारिज कर चुके हैं। फांसी के करीब पहुंचने के पहले उस आरोपी के हितचिंत्तकों के पास बहुत सार अवसर थे पर वह कुछ करना तो दूर सोचते हुए भी नहीं दिखे।  ऐसे में संदेह उठेंगे।  ऐसा लगता है कि आरोपी के समर्थन के बयान उसकी हित की अपनी सार्वजनिक छवि चमकाने की चिंता में ही दिये जा रहे हैं।
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Sunday, July 19, 2015

इतिहास के फरिश्ते-हिन्दी व्यंग्य कविता(itihas ke farishtey-hindi satire poem)

पंचतत्वों से बने इंसान
कभी हीरे या
सोने जैसे नहीं होते।

आदतों से मजबूर सभी
चरित्र में चालाकी के बीज
बोने जैसे नहीं होते।

कहें दीपक बापू इतिहास में
खल भी बन गये महानायक
दर्दनाक हादसे करने वाले
पर्दे पर बने घायल के सहायक
कहलाये फरिश्ते ऐसे नाम
जो भले इंसानों की जुबान पर
ढोने जैसे नहीं होते
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Thursday, July 16, 2015

बिके बुद्धिमान-हिन्दी कविता(bike buddhiman-hindi poem)


देश के अक्लमंदों ने
हर रंग के भाव की
अलग पहचान बताई है।

सभी रंगों के मेल की
तारीफ करते जरूर
यह अलग बात है
टकराव से रोटी कमाई है।

कहें दीपक बापू बिके बुद्धिमानों से
बहस करना बेकार है
अपने आकाओं से
हर रंग की पहचान
उन्होंने लिफाफे में
कागज पर रुपये से लिखी पायी है।
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Friday, July 10, 2015

सब गोलमाल है-हिन्दी व्यंग्य कविता(sab golmal hai-hindi satire poem)


चरण छूकर
सेवक की स्वयंभू उपाधि
धारण कर जाते हैं

आशीर्वाद लेकर
उड़ जाते आकाश में
स्वामीपन के अहंकार से
सभी डर जाते हैं।

कहें दीपक बापू सब गोलमाल है
 सेवा से मिलता मेवा
पर काम दिखता नहीं
अदाओं से ही प्रचार के
पन्ने भर जाते हैं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com
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Monday, June 29, 2015

सिर पर ताज से-हिन्दी कविता(sir par taz se-hindi poem)

बड़े आदमी की
नीयत के काले दाग
वेशभूषा से छिप जाते हैं।

मध्य आदमी के
बनियान के दाग
कमीज से छिप जाते हैं।

गरीब आदमी के दाग
फटे वस्त्रों से
भला कहां छिप पाते हैं।

कहें दीपक बापू आम इंसानों से
पैसा पद और प्रतिष्ठा की
जंग लड़ना व्यर्थ है
चाहे सिर पर ताज से
चरित्र पर लगे दाग
चमक में छिप जाते हैं ।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Wednesday, June 24, 2015

घबड़ाते हैं चालाक लोग-हिन्दी कविता(ghabadate hain chalak log-hindi poem)

इंतजार करो
आग बुझाने आयेंगे वही लोग
जिन्होंने लगाई है।

इंतजार करो
रोटी लेकर आयेंगे वही लोग
जिन्होंने भूख जगाई है।

कहें दीपक बापू लाचारी ओढ़कर
बैठने का सहारा इंतजार है,
बेबस का वादा यार है,
कमजोर के उठ खड़े होने से
घबड़ाते हैं वह चालाक लोग
जिन्होंने ज़माने की तरक्की
अपने घर लगाई है।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Friday, June 19, 2015

योग साधना का औषधि जैसे महत्व का प्रचार संकीर्णता का परिचायक-21 जून अंतर्राष्टीय योग दिवस विश्व योग दिवस पर विशेष हिन्दी चिंत्तन लेख


                             21 जून 2015 को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर हमारे देश में प्रचार का दौर चल रहा है वह बहुत जोरों पर है।  जहां पूरे विश्व में योग दिवस की तैयारियां चल रही हैं वहीं भारत में कहीं उबाऊ तो कहीं रुचिकर बहस भी जारी है।  जहां योग समर्थक हल्के तथा नारेयुक्त तर्कों से प्रचार पाने के मोह में प्रचाररत हैं तो अनेक लोग उनका विरोध करते हुए अनेक आजीबोगरीब तर्क भी दे रहे हैं। योग के विरोधी अनेक  ऐसे योग समर्थकों की चर्चा करते हैं जो मूलतः भारतीय चिकित्सा पद्धतियों के समर्थक होते हुए भी अंततः अस्वस्थ होने पर अंग्रेजी चिकित्सा पद्धति की शरण में गये हैं। इनमेें तो एक विश्व प्रसिद्ध योग शिक्षक भी हैं जो भूख हड़ताल के बाद कमजोर होने पर अंग्रेजी पद्धति वाले चिकित्सालय में भर्ती हुए-हमारा मानना है कि वह योगी होते हुए भी असहज योग की राह चलने के कारण उन्हें इस दशा का सामना करना पड़ा तो क्षणिक तनाव की वजह से उन्होंने अपनाया था।
                              बहरहाल योग के साथ चिकित्सा पद्धति की चर्चा करना ही  हमें व्यर्थ लगता है पर एक योग तथा ज्ञान साधक होने के कारण हम इस प्रयास में है कि 21 जून तक हम अपने अनुभव बांटते रहें इसलिये प्रतिदिन योग चर्चा करते हैं। हमारा अनुभव कहता है कि योगासन के समय बीमारियों की चर्चा करना एकदम बेकार है।   यह अलग बात है कि कुछ पेशेवर येागाचार्य चिकित्सक की तरह भी अपनी भूमिका निभा रहे हैं। अनेक बार तो स्थिति यह दिखती है कि बीमारियों के दूर करने वाले विशेष योग शिविर आयोजित किये जाते हैं।  हमारा मानना है कि ऐसे अवसरों पर साधक के दिमाग में अपनी बीमारी की बात रहती है जो उसे योग के निष्काम भाव से दूर कर देती है। दूसरी बात यह कि चाहे भले ही कोई भारतीय अध्यात्मिक दर्शन का प्रचारक होने का दावा करते हुए भारतीय योग तथा चिकित्सा पद्धति का समर्थन करे पर उसे अपनी प्रतिबद्धता दिखाने के लिये उससे संबंध प्रतिदिन रखना चाहिये।  जो प्रतिदिन योग साधना करेगा वह अस्वस्थ होने पर अंग्रेजी पद्धति और आयूर्वेद की बात तो छोड़िये घरेलू इलाज से भी ठीक हो जायेगा-ऐसा हमारा मत है।  जो इतना अस्वस्थ हो जाता है कि उसे अंग्र्रेजी पद्धति की शरण में जाना पड़े तो मान लेना चाहिये कि वह प्रतिदिन योगाभ्यास नहीं करता या फिर ज्ञान की राह से भटक कर उसने अपने अभ्यास में कमी ला दी है।
                              जिन लोगों को योग से विरोध है वह इसे न करें-हमें उनसे कोई गिला नहीं है।  वह ऐसे योग समर्थकों की सूची भी जारी करें जो भारतीय अध्यात्मिक दर्शन का दावा करने के बाद भी अंग्रेजी संस्कृति, शिक्षा, संस्कार तथा चिकित्सा पद्धति की शरण में चले जाते हैं-इस पर भी कोई आपत्ति नहीं है। हमारा कहना है कि योग तो जीवन जीने की कला है। करो तो जानो।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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