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Saturday, June 6, 2009

अमृत और विष-लघुकथा (amrut aur vish-hindi laghu katha)

वह कोई गेहुंआ वस्त्र पहने साधु या संत नहीं बल्कि कोई शिक्षित और सज्जन पुरुष थे। कहीं बैठकर लोगों से ज्ञान चर्चा कर रहे थे। उनके सामने तीन लोग श्रोता के रूप में बैठ कर उनकी बातें सुन रहे थे। उन सज्जन ज्ञानी पुरुष ने पुराने शास्त्रों से अनेक उद्धरण देते हुए कुछ महापुरुषों के संदेश भी सुनाये।
उनके पीछे एक अन्य व्यक्ति भी बैठा यह सब सुन रहा था। उसे यह चर्चा बेकार की लग रही थी। अचानक वह उठा और उन सज्जन पुरुष के पास आकर उनसे बोला- तुम यह क्या बकवास कर रहे हो? इस ज्ञान चर्चा से क्या होगा,? तुम इतना सब सुना रहे हो वह सब मैंने भी किताबों में पढ़ा है पर तुम्हारी तरह इधर उधर ज्ञान नहीं बघारता। तुम इतना ज्ञान बघार रहे हो पर क्या उस पर चलते भी हो?‘
उस सज्जन ने कहा-‘कोशिश बहुत करता हूं कि उस राह पर चलूं। अब यह तो लोग ही बता सकते हैं कि मेरा व्यवहार किस तरह का है? बाकी रहा ज्ञान बघारने का सवाल तो भई, फालतू की बातें सोचने अैार कहने से अच्छा है तो इसी तरह की बातें की जाये। अच्छा, हम जब यह ज्ञान चर्चा कर रहे थे तब तुम्हारे मन में क्या विचार आ रहे थे।
उस आदमी ने कहा-‘मेरे को इस तरह की ज्ञान चर्चा पर गुस्सा आ रहा था। मैं तुम जैसे ढोंगियों को देखकर क्रोध में भर जाता हूं। पता नहीं यह तीनों तुम्हें कैसे झेल रहे थे?’
उन सज्जन ने कहा-‘मुझे बहुत दुःख है कि मेरी ज्ञान चर्चा से तुम्हें बहुत गुस्सा आया पर मैं भी अनेक ढोंगियों को देखता हूं पर गुस्सा बिल्कुल नहीं होता। उनकी ज्ञान की बातें सुनता हूं पर उनके आचरण पर ध्यान देकर अपना मन खराब नहीं करता। वैसे तुम इन श्रोताओं से पूछो कि आखिर हम दोनों में वह किसे पसंद करेंगे?’
उन्होंने तीनों श्रोताओं की तरफ प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा तब एक श्रोता उस बीच में बोलने वाले आदमी से बोला-‘हम इन सज्जन पुरुष की बातें सुन रहे थे तो मन को शांति मिल रही थी। हमें इससे क्या मतलब कि यह कहां से आये है और क्या करते हैं? बस इनकी बातें सुनकर आनंद आ रहा था। यह सब बातें हमने भी सुनी है पर इनके मुख से सुनकर भी अच्छा लगा रहा था। हां, तुम्हारे बीच में आने से जरूर हमें दुःख पहुंचा है।’
दूसरा श्रोता ने कहा-‘तुमने बताया कि तुमने यह सब पढ़ा है तो हमने भी सुना है। इन सज्जन की वाणी से हमें सुख मिल रहा था पर तुम्हारे आने से ऐसा लग रहा है कि जैसे यज्ञ में किसी राक्षस ने बाधा डाली हो!
तीसरे कहा-‘तुम्हारी अंतदृष्टि में यह सज्जन ढोंगी हैं पर हमारी नजर में ज्ञानी हैं क्योंकि इनकी बात से हमें आत्मिक सुख मिल रहा था भले ही यह पुरानी बातें दोहरा रहे हैं मगर तुम शिक्षित और ज्ञानी होते हुए भी भटक रहे हो क्योंकि ज्ञान धारण न भी किया हो पर उसकी चर्चा कर अच्छा वातावरण तो बनाया जा सकता है और तुमने इसे विषाक्त बना दिया।’
बीच में बोलने वाले सज्जन का मूंह उतर गया। वह पैर पटकता हुआ वहां से चला गया तो एक श्रोता ने उस सज्जन से कहा-‘आखिर यह आपकी बात पर गुस्सा क्यों हुआ?’
सज्जन ने कहा-‘भई, एक तो यह अपने घर से परेशान होगा दूसरे यह कि इस समाज में ज्ञान चर्चा केवल गेहूंए वस्त्र पहनने वाले ही कर सकते हैं। उन्होंने इतनी सामाजिक और राजनीतिक शक्ति एकत्रित कर ली होती है कि किसी की हिम्मत नहीं होती कि सामने जाकर कोई उनको ढोंगी कह सके इसलिये उनकी कुंठायें ऐसे लोगों के सामने निकालते हैं जो सादा वस्त्र पहनकर ज्ञान चर्चा करते हैं। सभी सुविधायें जुटाकर सन्यासी होने का ढोंग करने वालों से कहना कठिन है पर कोई सद्गृहस्थ ज्ञान चर्चा करे तो उस पर उंगली उठाकर अपनी कुंठा निकालना अधिक आसान है। शायद इसलिये उसने जमाने भर का गुस्सा यहां निकाल दिया। बहरहाल तुम उसकी बात भूल जाना क्योंकि इससे तुम्हारे अंदर उसका फैलाया विष असर दिखाने लगेगा और अगर मेरी बात से कुछ बूँद अमृत बना है तो वह भी दवा कर का नहीं कर पायेगा।
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Friday, May 1, 2009

छोटा प्रश्न-लघु कथा (ek chhota saval-hindi laghu katha)

वह विशेष बुत अपना भाषाण दे रहा था। उसका विषय था समाज की समस्यायें और उनका हल। उसने अपना भाषण समाप्त किया। सामने बैठी आम बुतों की भीड़ ने तालियां बजाईं। उसने अपना भाषण समाप्त किया और फिर कहा-‘अगर किसी को मेरी बात पर कोई शक हो तो अपना प्रश्न बेहिचक पूछ सकते हैं।’
भीड में बैठे समान्य बुत खामोश रहे पर एक ने कहा-‘आप यह बतायें कि मेरे घर में पानी की तंगी हमेशा रहती है। आपने कहा था कि पानी का संचय करें और इसके लिये पेड़ पौधे भी लगायें। मेरे घर के बाहर सारी जमीन पक्की है तो बाहर आंगन में खुदाई करवा कर कच्चा करवा दूं तो ठीक रहेगा।’

उस विशेष बुत ने कहा-‘यहां हम समाज की समस्याओं के हल के लिये एकत्रित हुए हैं न कि निजी विषयों पर चर्चा के लिये। फिर भी जवाब देता हूं कि किसी विशेषज्ञ से चर्चा कर फिर ऐसा करें।’
वह विशेष बुत उठकर चला गया। इधर सारे आम बुत उस प्रश्नकर्ता बुत को ऐसे देखा जैसे कि वह कोई अजूबा हो।’
उसका मित्र बुत उसके पास आया और बोला-‘क्या ज्रूरत थी प्रश्न करने की?’
प्रश्नकर्ता बुत ने कहा-‘पर मेरे प्रश्न पर सभी मुझे ऐसे क्यों देख रहे हैं? क्या प्रश्न करना बुरा है?’
मित्र बुत ने कहा-‘हां, प्रश्न करने का मतलब तुम सोचते हो। इसका मतलब है कि तुम फालतू आदमी हो! आजकल किसे फुरसत है सोचने की जो प्रश्न करे। फिर उनके उत्तर असहज करते हैं क्योंकि उन पर भी सोचना पड़ता है। फिर वह विशेष बुत था और हम उसे सुनने आये थे। उसकी बात सुनना जरूरी था क्योंकि वह विश्ेाष है। प्रश्न करने का अर्थ यह कि तुम आम बुत की बजाय विशेष बनना चाहते हो और भला यह भीड़ कैसे सहन कर सकती है? तुम्हारा प्रश्न ही तुम्हें आम बुतों की भीड़ में विशिष्टता प्रदान कर रहा था और वह उसे नहीं देख सकते। इसलिये तुम्हें हास्याप्रद दृष्टि से देखकर अपनी खिसियाहट निकाल रहे थे।
प्रश्नकर्ता ने कहा-‘पर उस विशेष बुत को इतनी देर सुना! तब तो कुछ नहीं और मैंने प्रश्न किया तो सब दुःखी हो गये।’
मित्र बुत ने कहा-‘हां, यहां बिना सोचे सुनना और सुनाना ही चलता है। प्रश्न करने का मतलब यह है कि तुम सोचते हो। सोचते हुए आदमी को देखकर दूसर चिढ़ जाते हैं क्योंकि वह सोचते नहीं इसलिये प्रश्न करना उन्हें असहज लगता है और गलती से कर भी डालें तो उसके उत्तर से उनको सोचना पड़ता है। यह कठिन प्रक्रिया है और जब हम आराम से हैं तो क्यों उसे अपनायें?’
प्रश्नकर्ता बुत ने पूछा-’पर तुम परेशान क्यों हो?’
मित्र बुत ने कहा-‘इस बात से कि तुम अगर अपने घर के बाहर जमीन कच्ची करवाकर उस पेड़ पौधे लगाओगे तो हो सकता है तुम्हारी लिये अच्छा हो जाये। पानी का संचय भी होगा तो अच्छी वायु भी मिलने लगेगी। तुम्हें देखकर मेरे अंदर भी ऐसा करने का विचार आयेगा तब मुझे खर्च भी करना पड़ेगा और मेहनत भी करना पड़ेगी। अब बताओ, जिंदगी आराम से चल रही है। पानी की कमी है तो कोई बात नहीं! इधर उधर गुस्सा निकालकर व्यक्त तो कर लेते हैं। मगर इतनी सारी मेहनत से तो बचते हैं। सोचने की तकलीफ तो नहीं होती।’
प्रश्नकर्ता बुत ने कहा-‘मगर तुम सोच रहे हो? फिर अच्छा करने की क्यों नहीं सोचते?’
मित्र बुत ने कहा-‘मैं कुछ न करने की सोच रहा हूं, इसमें कोई बुराई नहीं है। इससे दिमाग और शरीर को कोई तकलीफ नहीं होगी, पर तुम्हारा प्रश्न और उसका उत्तर कुछ करने के लिये प्रेरित करता है। बस यही नहीं चाहता! इसलिये कभी ऐसी जगह पर मेरे साथ चलो तो सोचने के लिये प्रेरित करने वाले प्रश्न नहीं उठाया करो क्योंकि फिर उत्तर भी ऐसे ही आयेंगे।’
मित्र बुत चला गया पर प्रश्नकर्ता बुत अभी तक यही सोच रहा था कि‘आखिर उसके एक छोटा प्रश्न करने में बुराई क्या थी?’
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Tuesday, March 17, 2009

सबसे बड़ा कौन-लघुकथा

डूबता हुआ सूरज रोज अट्टहास के साथ अपने से ही सवाल करता था कि ‘इस दुनियां में सबसे बड़ा कौन?’
फिर दोबारा अट्टहास करते हुए स्वयं ही जवाब देता था कि ‘मैं’! मेरी रौशनी के बिना इस संसार के उस हिस्से में अंधेरा छा जाता है जहां से मैं विदा लेता हूं।’
एक दिन डूबने से पहले उसने कुछ देर पहले धरती पर झांक कर देखा तो उसे एक औरत अपने घर के बाहर बने छोटे चबूतरे पर एक जलता चिराग रखते हुए दिखाई दी। पड़ौसन ने उससे कहा-‘यह चिराग तुम क्यों जलाकर रखती हो। अपने कमरे में ही चिराग जलते है, फिर यहां रखने से क्या लाभ? बेकार में तेल का अपव्यय करना भला कहां की अक्लमंदी है?’
उस महिला ने कहा-‘यहां गली में रात को अंधेरा रहता है। अनेक राहगीर यहां से गुजरते हैं। इस चिराग से उनको सहायता मिलती है। अपने लिये तो सभी रौशनी करते हैं पर दूसरे के लिये करने पर एक अलग प्रकार का ही आनंद आता है।’

सूरज वहां से विदा हो गया पर उस महिला की बात उसके मन में घर कर गयी। उसने अपने आप से कहा-’मैं भी तो यही करता हूं पर अपने अहंकार की वजह से कभी उस आनंद का अनुभव नहीं कर पाया जो वह महिला करती है। एक छोटा चिराग भी वही कर लेता है जो मैं करता हूं। मतलब न इस दुनियां में रौशनी करने वाला मै अकेला हूं, दूसरों को रौशनी देने की सोचने वाला’
यह सोचकर सूरज मौन हो गया। फिर कभी डूबते समय उसने अट्टहास नहीं किया। उस चिराग और महिला ने ज्ञान का प्रकाश दिखाकर उसके अहंकार को परे कर दिया।

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Tuesday, February 3, 2009

शायरी का पोस्टमार्टम-लघु व्यंग

सड़क पर रोज लड़का उस लड़की को देखता था। बात करने की हिम्मत जुटा नहीं पाता था। आखिर उसने अपने मित्र से पूछकर एक रास्ता निकाला। एक बच्चे को एक कागज पकड़+ा दिया और उसे चाकलेट का लालच देकर उसे उस लड़की को देने के लिये कहा।

बच्चे ने वह कागज लिया और उस लड़की को पकड़ाते हुए लड़के की तरफ इशारा करते हुए कहा-‘उसने दिया है।’
लड़की ने उस बच्चे के हाथ से वह कागज ले लिया और घूरकर उस लड़के को देखने लगी। उसे हाथ में आते ही लड़का वहां से खिसक लिया। लड़के ने उसमें लिखा था कि ‘मैं तुम्हें बहुत मोहब्बत करता हूं। तुम्हारी वजह से मेरी रात की नींद और दिन का चैन हराम हो गया है। मैं तो बस एक ही बात कहना हूं कि
चांदनी चांद से होती है सितारों से नहीं
मोहब्बत एक से होती है हजारों से नहीं

तुम्हारा बस तुम्हारा
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लड़की ने उसे पढ़ा और अगले दिन रास्ते से अपने मंगेतर को साथ लेकर निकली और उस लड़के के पास गयी और एक कागज का टुकड़ा उसके हाथ में थमा दिया
उसमें लिखा था कि
तुम भी किस जमाने में रह रहे हो। तुम्हारा यह पत्र मैंने अपने मंगेतर को दिखाया जो पोस्टमार्टम करता है। उसने तुम्हारी शायरी का पोस्टमार्टम कुछ इस तरह किया है।
न चांद में होती है न सितारों में होती है
रौशनी उनमें तो सूरज की आग से ही होती है
आदमी चाहे चेहरे बदल कर रोज करे
पर एक बार में मोहब्बत तो बस एक से ही हेाती है

याद रखना मेरे साथ मंगेतर था। इस बार वह खामोश रहा अगली बार वह जवाब लिख कर लायेगा। वह पुरानी शायरियों का पोस्टमार्टम करता है।
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