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Wednesday, August 10, 2016

हमदर्दी मांगना नहीं-हिन्दी कविता (Hamdardi Mangna nahin-Hindi Kavita)

दिल की बात
हम छिपायें
यह ख्याल आता है।

सुनायें चौराहे पर दर्द
ज़माना हंसता
 हर कोई 
 मजाक का जाल लाता है।

कहें दीपकबापू जज़्बात से
जिंदगी जीना जरूर
देना हमदर्दी मांगना नहीं
दरियादिली हर कोई
अंदर नहीं पाल पाता है।
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Thursday, July 21, 2016

सत्य साधना-हिन्दी कविता (Satya Sadhna-HindiPoem)


जहां अपनी याद रखनी हो
वहां से चले जाना जरूरी है।
अपना दिल बचाने के लिये
स्मृतियों से बिछोह जरूरी है।
कहें दीपकबापू सपनों का बोझ
ढोते ढोते जिंदगी बर्बाद करने से
बचने के लिये
सत्य साधना जरूरी है।
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Tuesday, July 12, 2016

फकीर अमीर और वजीर-हिन्दी व्यंग्य कविता(Faqir Amir aur vazir-HindiSatirePoem)

मुफ्त का माल मिले
भले चंगे लोग
फकीर बन जाते हैं।

जहां पाखंड की पूजा हो
खाली जेब वाले भी
अमीर बन जाते हैं।

कहें दीपकबापू काबलियत से
नाता नहीं होता जिनका
टेढ़ा चलते हुए पैदल भी
वज़ीर बन जाते हैं।
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Thursday, June 23, 2016

दरियादिल संख्या में चंद हैं-हिन्दी व्यंग्य कविता(Dariyadil Sankhya mein chand hain-HindiSatirepoem)

उनके घर क्या जायें
जहां दिल के
दरवाजे बंद हैं।

क्या आशा करें उनसे
जो मतलबपरस्ती के
हमेशा पाबंद हैं।

कहें दीपकबापू फिर भी
निराशा नहीं होती
कभी इस जहान के रवैये से
जहां दरियादिल बसते
चाहे संख्या में चंद हैं।
-----------

Monday, June 13, 2016

शीतलता की तस्वीर-हिन्दी व्यंग्य कविता (Sheetalta ki Tasweer-Hindi Satire Poem)


विद्युत से चलते सामान
इंसानों के दिल की
धड़कन बढ़ा रहे हैं।

संवाद से सहजता का
भाव मिलने की बजाय
असहजता चढ़ा रहे हैं।

कहें दीपकबापू दिल में
अतिक्रमण कर लिया आग ने
मस्तिष्क में शीतलता की
तस्वीर जबरन लगा रहे है।
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Wednesday, June 1, 2016

खुशी कहीं दाम से नहीं मिलती-दीपकबापूवाणी (Khushi kahin dam se nahin miltee-DeepakBapuWani)

सभी इंसान स्वभाव से चिकने हैं, स्वार्थ के मोल हर जगह बिकने हैं।
‘दीपकबापू‘ फल के लिये जुआ खेलें, सत्संग में कहां पांव टिकने हैं।।
--------------
सामानों के दाम ऊंचाई पर डटे हैं, समाज में रिश्तों के दाम घटे हैं।
‘दीपकबापू’ राख से सजाते चेहरा, अकेलेपन से दिल सभी के फटे हैं।।
----------------------
खुशी कहीं दाम से नहीं मिलती, सोचने से कभी तकदीर नहीं हिलती।
‘दीपकबापू’ दिल लगाया लोहे में, जहां संवेदना की कली नहीं खिलती।
--------------
इंसानों ने जिंदगी सस्ती बना ली, ऋण का घृत पीकर मस्ती मना ली।
‘दीपकबापू’ ब्याज भूत लगाया पीछे, छिपने के लिये अंधेरी बस्ती बना ली।।
------------------
संवेदनाओं को लालच के विषधर डसे हैं, दिमाग में जहरीले सपने बसे हैं।
‘दीपकबापू’ हंस रहे पराये दर्द पर, सभी इंसान अपने ही जंजाल में फसे हैं।।
--------------------
किसी की छवि खराब करना जरूरी है, प्रचार युद्ध में सभी की यही मजबूरी है।
‘दीपकबापू’ अपने पराये में भेद न करें, कचड़ा शब्द फैंकने की तैयारी पूरी है।।
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कागज के शेर रंगीन पर्दे पर छाये हैं, काले इरादे से सफेद चेहरा लाये हैं।
‘दीपकबापू’ शोर से आंख कान लाचार, रोशनी के सौदे में अंधेरा सजाये हैं।
--------------
पीपल की जगह पत्थर के वृ़क्ष खड़े हैं, विकास के प्रतीक की तरह अड़े हैं।
‘दीपकबापू’ किताब पढ़ प्यास बुझाते, जलाशय उसमें चित्र की तरह जड़े हैं।।
----------------
कुचली जाती हर दिन धूल पांव तले, सिर पर करे सवारी जब आंधी चले।
‘दीपकबापू’ ज्ञानी मत्था टेकते धरा पर, गिरें कभी तो दिल में दर्द न पले।।
-----------------
बेचैन दिल बाहर भी न रम पाये, घर की याद हर जगह जम जाये।
‘दीपकबापू’ पैसे से पा रहे मनोरंजन, हिसाब लगाकर फिर गम पाये।।
----------------
समाज कल्याण के लिये सक्रिय दिखते, विरासत परिवार के नाम लिखते।
‘दीपकबापू’ मानव उद्धार के बने विक्रेता, पाखंड से ही बाज़ार में टिकते।।
---------------------
स्वाद लोभी अन्न का पचना न जाने, रंग देखते चक्षु अंदर का इष्ट न माने।
‘दीपकबापू’ बाज़ार की रोशनी में अंधे, उजाले के पीछे छिपा अंधेरा न जाने।।
------------------ 
ढोंगी भ्रम का मार्ग बता नर्क में डालें, फिर स्वर्ग का ख्वाब दिखाकर टालें।
‘दीपकबापू’ ओम का जाप नित करें, घर में ही बाहरी सुख का मंत्र पालें।।
---------------

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
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Tuesday, May 17, 2016

भूले से रहते हैं-हिन्दी कविता(Bhoole se Rahate hain-Hindi Poem)

आकाश में उड़ने वाले
जमीन का दर्द
भूले से रहते हैं।

चौपाये पर सवार
सर्दी गर्मी का दर्द
भूले से रहते हैं।

कहें दीपकबापू मौसम से
कभी मित्रता कभी शत्रुता
जमीन पर निभाते श्रमजीवी
जो पसीने से नहाते अपना दर्द
भूले से रहते हैं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Tuesday, May 3, 2016

हताश कंकाल-हिन्दी कविता(Hatash Kankal-Hindi Poem)

हांडमांस के बुत
बरसों से आंखों के
सामने खड़े हैं।

कोई पैमाना नहीं
नाप सकें बुद्धि का कद
दावे तो सभी करते
उनके दिल बड़े हैं।

कहें दीपकबापू पर्यावरण में
हवाओं के साथ 
आग की जंग चल रही है
दग्ध हो चुकी संवेदनायें
हताश कंकाल सोच में खड़े हैं।
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Thursday, April 28, 2016

गुलामी का ज़हर-हिन्दी कविता(Gulami Ka Zahar-Hindi Kavita)


अपने अपने दर्द के
बयान में सब लोग
शब्द बोल रहे हैं।

हमदर्दी के सौदागर भी
रुपयों के अनुसार
शब्द तोल रहे हैं।

कहें दीपकबापू भावना में
बहना मना है
इश्क की आड़ में
लोग गुलामी का
जहर घोल रहे हैं।
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Saturday, April 16, 2016

पसीने से बीमारी हारी है-हिन्दी कविता(Pasine se Bimari hari hai-HindiPoem)

गर्मी की तपती दोपहर
सड़क पर सन्नाटे में
जीवन की जंग जारी है।

ठेला ढकेलते 
पसीने में नहाये लोगों की
बेबसी से यारी है।

कहें दीपकबापू परिश्रम से
मुंह चुराने वालों को
वातानुकूलित  कक्ष में भी
नहीं छोड़ती ज्वाला
मगर बहते पसीने से
हर बीमारी हारी है।
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Wednesday, April 6, 2016

जो भीड़ पायेगी-हिन्दी कविता (Public Ane A Men-Hindi Poem)


अच्छा हो गया बुरा
जहां नाटक सजेगा
भीड़ भी आयेगी।

अदाओं का मतलब
समझे या नहीं
वाह शब्द भीड़ भी गायेगी।

कहें दीपकबापू अक्ल से
इंसानों का वास्ता होता है
इस्तेमाल कौन करता
चलते सभी मिलकर
सोचते हम भी वही पायेंगे
जो भीड़ भी पायेगी।
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Friday, March 18, 2016

सामने यार बन जाते हैं-हिन्दी कविता (Samne yaar ban jate hain-Hindi Kavita)

दिल में भरी नफरत
अपनी जुबान से
वह प्यार भी जताते हैं।

पीठ पीछे करते
जमकर दुष्प्रचार
सामने यार भी बन जाते हैं।

कहें दीपकबापू हिसाब से
कभी चले नहीं
जहां मतलब निकले
रिश्ता बनाते वहीं
सिंहासन चढ़ने के लिये
अपनी डोली के
वही कहार भी बन जाते हैं।
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Thursday, March 10, 2016

नायक खलनायक-हिन्दी कविता(Nayak Khalnayak-HindiKavita, Hero Wilen-HindiPoem)

रुपहले पर्दे पर
इधर नायक उधर खलनायक
खड़ा कर दिया।

चंद पल का नाटक
शब्द के जाल बुनकर
बड़ा कर दिया।

कहें दीपकबापू प्रचार पर
चल रहा संसार
विज्ञापन के मजे ने
बढ़ा दी मन की भूख
रोटी को कड़ा कर दिया।
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Monday, February 29, 2016

मोहब्बत का सौदा-हिन्दी शायरी(Mohbbat ka Suada-Hindi Shayri)


खुशी हो या गम
दावत का बहाना
बन जाते हैं।

ज़ज्बात मृत हों या जिंदा
सौदे का बहाना
बन जाते हैं।

कहें दीपकबापू लाचार दिल से
मोहब्बत का सौदा करते लोग
कमाने का मौका मिले
नफरत फैलाने के भी
तब हजार बहाने
बन जाते हैं।
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Thursday, February 18, 2016

दर्द की खबर-हिन्दी कविता (Dard Ki Khabar-Hindi Kavita)

घर से निकलते
गरीबों को अमीर बनाने
चंदा समेटने लग जाते।

हमदर्दी के सौदागर
दर्द की खबर सुनते ही
जग जाते हैं।

कहें दीपकबापू पांखडियों से
बचकर रहना यारो
मतलबपरस्त चले
परोपकार करने
दोस्ती कर ठग जाते हैं।
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Wednesday, January 27, 2016

जुबान रही भाषा से लाचार-हिन्दी कविता (juban rahi Bhasha se lachar-Hindi Kavita)

समेट लिया सभी सामान
फिर भी दिल का चैन
नहीं पा सके।

सजा लिये हर तरह के
इतने पकवान कि
सब खा नहीं सके।

कहें दीपकबापू घूमते हुए
खूबसूरत स्थान देखे
जुबान रही भाषा से लाचार
मिली थी जो खुशी
ज़माने से जता नहीं सके।
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Thursday, January 14, 2016

आजादी-हिन्दी शायरी(Azadi-HindiShayri)

आजादी-हिन्दी शायरी(Azadi-HindiShayri)
अगर सिर झुकाना
सीखा होता
हम भी गुलाम शरीर
आजाद चेहरा लिये
जहान में पहचाने जाते।

दीपकबापू सीख लेते
आवाज बेचना
मिल जाती महंगी महफिल
मगर फिर नहीं
आजादी से गरियाते।
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Wednesday, December 30, 2015

स्मरण शक्ति-हिन्दी कविता(Smaran Shakti-Hindi Kavita)


जिंदगी के संघर्ष में
बहुत हारे
अनेक बार जीते हैं।

कई सहायक मिले
विरोधी भी गरजे
हम आज ही में जीते हैं।

कहें दीपकबापू स्मरण शक्ति
हमेशा बुरी नहीं होती
समझदार वही कहलाते
बुरे दृश्य भूल जायें
बेहतर पूंजी के साथ
हर पल जीते हैं।
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Monday, December 21, 2015

उन्मुक्त भाव-हिन्दी कविता(UnmuktBhav-HIndi Kavita)

राजा स्वयं को राजा
इसलिये समझे
क्योंकि प्रजा स्वयं को
प्रजा  समझे

साहुकार स्वयं को धनी
इसलिये समझे
क्योंकि गरीब स्वयं को
मजबूर समझे।

कहें दीपकबापू सोच से
रिहाई जरूरी है
उन्मुक्त भाव से जीने की
आदत हो जाये
तभी कोई जिंदगी समझे।
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Friday, December 11, 2015

हमख्याल-हिन्दी कविता(HamKhyal-Hindi Kavita)

खुशी के मौके पर
दिल बहलाने के लिये
पंडालों में जायें।

जब न मिले हमख्याल
दिमाग कहता अच्छा है
पेट में पकवान सजायें।

कहें दीपकबापू मधुर संगीत से
कर्ण कहां आनंदित होते
जब हाथ जाम थामे हो
साथ तश्तरी में काजू आयें।
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