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Monday 16 November 2009

पाखंड की तस्वीर-व्यंग्य कविता (pakhand ke tasvir-vyangya kavita)

कब तक पाखंड को
सच माने
उसकी भी एक उम्र होती।
सोच के अंधेरे में
जब तक दिखता
सच लगता है
जो रौशन हुए ख्याल
उसकी तस्वीर खंड खंड होती।
सौ बार बोलने से झूठ भी
सच लगने लगता है
पर उसकी तस्वीर मुकम्मल नहीं होती।

कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Sunday 15 November 2009

कपड़ो की राशि कम से कम भरना-दो हास्य व्यंग्य कविताएँ (kapdon ke rakam-hindi hasya vyangka kavitaen

अश्लीलता और श्लीतता में
अंतर कितना रह गया है
बस छह इंच के कपड़े का।
क्यों इतना रोज छोड़ मचता है
खत्म कर दो हर कायदा
कोई पहने या न पहने
लगा दो एक नारा चैराहे पर
अपनी इज्जत की रक्षा खुद करें
दूसरे में तब देखें
पहले अपनी आंखों में शर्म भरें
नहीं मिलेगा कोई पहरेदार
आपनी आबरू के लिये बनो खुद्दार
और भी जमाने में मुसीबतें हैं
नहीं करेगा कोई कायदा हिफाजत
हल खुद ही करो पहनावे के लफड़ा।
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निर्देशक ने अपनी फिल्म के
कपड़ा निर्देशक से
चर्चा करते हुए कहा
‘भई, यह कम बजट की फिल्म है
इसलिये अधिक पैसे की उम्मीद नहीं करना।
इसमें केवल नायक के कपड़े ही
अधिक बनाने होंगे
नायिका तो पूरी फिल्म में छह इंच के ही
वस्त्र धारण करेगी
कभी कभी एक फुट का भी वेश धरेगी
इसलिये अपने अनुबंध में
कपड़ों की राशि कम से कम भरना।

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Thursday 12 November 2009

इश्क का सबूत-हास्य व्यंग्य कविता (ishq ka saboot-hasya vyangya kavita)

आशिक ने कहा माशुका से
‘तुझे में इतना प्यार करता हूं
तेरी हर अदा पर मरता हूं
तुम कहो तो चांद को जमीन
पर ले आंऊ।’
सुनकर माशुका ने कहा
’‘किस जमाने में रहते हो
जो यह पौंगापंथी बातें कहते हो
चांद क्या सिर में डालूंगी
छोटे से कमरे में
मेरा ही दम घुटता है
उसे रखकर मैं कैसे चैन पा लूंगी
वैसे तो मेरी समस्या पानी की है
जिससे भरते हुए
मेरी सुबह परेशानी में गुजरती है
नल कभी आते नहीं हैं
टैंकर के इंतजार में बैठकर आहें भरती हूं
नहीं आता तो फिर
दूर जाकर बर्तन में पानी भरती हूं
सुना है चांद पर भी पानी है
हो सके तो वहां से
पानी को धरती पर लाने का जुगाड़ बनाओे
शादी बाद में होगी
पहले तुम आधुनिक भागीरथ बन कर दिखाओ
तो मैं सारे जमाने को अपने इश्क का सबूत दिखाऊं।’’

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Wednesday 11 November 2009

पैसे से वाहन खरीदा है सड़क नहीं-व्यंग्य लेख (vahan aur sadak-vyangya lekh)

अब यह फिल्मों का ही प्रभाव कहा जा सकता है कि रास्ते पर गाड़ी चलाने वाले लड़के लड़कियां अपने आपको नायक नायिका से कम नहीं समझा करते। फिल्मों में अनेक गीत नायक नायिका को रास्ते पर कार या मोटर साइकिलें चलाते हुए फिल्माये जाते हैं। वह लड़के लड़कियों के दिमाग में इस तरह अंकित रहते हैं कि जब गाड़ी पर उनका पंाव आता है तो वह ऐसे सोचते हैं जैसे कि वह किसी फिल्म का अभिनय कर रहे हैं। उनको शायद पता ही नहीं नायक नायिका के ऐसे गाने वाले दृश्य रास्ते पर पैदल या गाड़ियों चलाते हुए फिल्माये दृश्यों को स्टूडियो में तैयार किया जाता है। वहां उनके आसपास ऐसा आदमी नहीं आ सकता जिसे फिल्म का निदेशक न चाहे।
आम सड़क पर ऐसा नहीं होता। वह निजी सड़क नहीं है और न ही वहां आपके लिये ऐसी कोई सुविधा है।
एक समस्या दूसरी भी है जिसे समझ लें। खराब सड़कों पर कम ही दुर्घटना होती है क्योंकि वहां लोग वाहन पर ही क्या पैदल ही सोचकर धीमी गति से चलते हैं। कभी कभी तो इतनी धीमी गति हो जाती है कि स्कूटर बंद कर ही उस पर बैठकर उसे घसीटा जाता है। अधिकतर दुर्घटनायें साफ सुथरी और डंबरीकृत सड़कों पर ही होती है जहां गाड़ियां तीव्र गति से चलाने में मजा आता है।
जब भी दुर्घटना की खबरें आती हैं ऐसी ही सड़कों से आती हैं। कार या मोटर साइकिल निजी रूप से आकर्षक वाहन हैं पर सड़कें केवल उनके लिये नहीं है। इन पर ट्रक और बसें भी चलती हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि ट्राली के साथ जुड़े ट्रेक्टर भी चलते हैं जिनके कुछ चालक उनको बैलगाड़ी की तरह चलाते हैं। यह ट्राली ऐसे ही जैसे भैंस! पत नहीं कब सड़क पर थोड़ा झटका खाने से उसकी कमर मटक जाये। उसके समानांतर चलते हुए हमेशा चैकस रहना चाहिये।
आखिर यह ख्याल क्यों आया? उस दिन सड़क पर दो लड़के अपनी मोटर साइकिल पर ट्रेक्टर और ट्राली के एकदम समानातंर जा रहे थे। आगे बैठा लड़का अपनी धुन में कुछ ऐसा आया कि दोनो हाथ छोड़कर मोटर साइकिल चलाता रहा। पता नहीं वहां उसके आगे कोई छोटा पत्थर का टुकड़ा या कागज को कोई छोटा ठोस पुलिंदा आ गया जिससे मोटर साइकिल लड़खड़ी गयी। मोटर साइकिल ट्राली की तरफ बढ़ती इससे पहले ही लड़के ने संभाल लिया। यह दृश्य देखकर किसी की भी सांस थम सकती थी। याद रखिये जब वाहन की गति तीव्र होती है तब रास्ते पर पड़ी कोई छोटी ठोस चीज भी उसको विचलित कर सकती है। हवाई जहाज को आकाश में चिड़िया भी विचलित कर देती है-ऐसी अनेक घटनाएं अखबारों में पढ़ी जा सकती हैं।
यह तो केवल एक वाक्या है? यह सड़कें गरीब और अमीर दोनों के लिये बनी है। अपनी कार पर इतना मत इतराओ कि साइकिल छू जाने पर किसी गरीब को मारने लगो। यह सड़क केवल अमीर की नहीं है क्योंकि जिंदगी भी केवल वह नहीं जीते! यह सड़के के्रवल अमीरों की इसलिये भी नहीं है क्योंकि मौत भी केवल गरीब की नहीं होती। एक दिन वह अमीरों को भी लपेटती है। कार या मोटर साइकिल से टकराकर साइकिल सवार गरीब मरेगा तो कार और मोटर साइकिल वाले भी ट्रक, बस और ट्रेक्टर ट्राली से टकराकर बच नहीं सकते। तुम अपने पैसे से वाहन खरीदते हो सड़क नहीं।
नित प्रतिदिन दुर्घटनाऐं और टकराने पर जिस तरह झगड़े होते हैं उससे तो देखकर यही लगता है कि हम लोगों को रास्ते पर चलने की तमीज नहीं है। फिल्मी और धारावाहिक दृश्यों ने हमारी अक्ल का बल्ब फ्यूज कर दिया है।
कभी कभी तो लगता है कि सड़के तो उबड़ खाबड़ ही ठीक हैं क्योंकि लोग वाहनों को चलाते नहीं बल्कि घसीटते ही ठीक रहते हैं जहां उनको गति बढ़ाने का अवसर मिला वहां अपना होश हवास खो देते हैं। इसका मतलब क्या यह समझें कि हम अच्छी सड़कों के लायक नहीं है। याद रखो दुर्घटना के लिये सैकण्ड का हजारवां हिस्सा भी काफी है। इसलिये सड़क पर चलते हुए जल्दबाजी से बचो। इसलिये नहीं कि घर पर तुम्हारा कोई इंतजार कर रहा है बल्कि इसलिये क्योंकि बेमौत किसी को दूसरे क्यों मारना चाहते हो या मरना चाहते हो। न भी मरे तो शरीर का अंग भंग हमेशा ही जीवन का दर्द बन जाता है। हो सकता है कि इसमें लेख में कुछ कटु बातें हों पर क्या करें दर्द की दवा तो कड़वी भी होती है। वैसे भी कहते हैं कि नीम कड़वा है पर स्वास्थ के लिये उसका बहुत महत्व है। इस पर कुछ काव्यात्मक अभिव्यक्ति के रूप में पंक्तियां।


सड़कों पर इतनी तेज मत चलो कि
जमीन पर आ गिरो
पांव जमीन पर ही रखो
हवा में उड़ने की कोशिश मत करो कि
अपने ही ओढ़े दर्द के जाल में घिरो।
एक पल ही बहुत है दुर्घटना के लिये
वाहनों पर बिना अक्ल साथ लिये यूं न फिरो।
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Monday 9 November 2009

शब्द ऋषि और क्रिकेट-आलेख (shabda rishi aur cricket maich-hindi lekh)

उन महान शब्द ऋषि की मृत्यु की खबर ने स्तब्ध कर दिया। यह लेखक घर से बाहर अपने काम पर जाने की तैयारी कर रहा था। उसी समय टीवी पर यह खबर दिखाई दी। खबर यह थी कि‘अपने प्रिय खिलाड़ी के आउट होने के बाद भारतीय टीम की हार का सदमा उनसे सहन नहीं हुआ।’
मन ही मन यह शब्द फूट पड़े‘हे शब्द ऋषि! आप तो सत्य के अन्वेषण करने वाले तपस्वी थे फिर कहां इस मिथ्या खेल में मन फंसाये बैठे थे।’
एक तरफ उनके निधन का दुःख और दूसरा क्रिकेट के प्रति उनके लगाव पर आश्चर्य एक साथ हो रहा था। ऐसे में अधिक शब्द नहीं सूझ पाये।
इस हिंदी भाषा में अनेक पत्रकार आये और गये पर जिसने आजादी के बाद एक हिंदी पत्रकार के रूप में अकेले ख्याति अर्जित की तो उसमें वही एक व्यक्ति थे। कहने को तो अनेक प्रकाशक ही अपना नाम संपादक के रूप में लिखते हैं। इसके अलावा अधिकतर समाचार पत्र अंग्रेजी के लेखकों के अनुवाद कर उनको हिंदी में प्रतिष्ठित करते हैं इसलिये हिंदी में एक प्रतिष्ठित और ऐतिहासिक पत्रकार बनना हरेक के बूते नहीं होता। केवल हिंदी के दम पर महान पत्रकार का दर्जा केवल उन्हीं महर्षि को ही दिया जा सकता है क्योंकि उनका लिखा अनुवाद के माध्यम से नहीं पढ़ा गया।
एक गैरपूंजीपति पत्रकार हमेशा अपना जीवन एक सामान्य आदमी की तरह व्यतीत करता है और उन्होंने भी यही किया। लिखने में जब विशिष्टता प्राप्त होती है तब आदमी अत्यंत सहज हो जाता है। उसे अपनी विशिष्टता का अहंकार नहीं आता क्योंकि उसे एक के बाद दूसरी रचना करनी होती है।
वह शब्द ऋषि एक आदमी की तरह जिया। इस लेखक से कभी उनकी मुलाकात नहीं हुई पर उनके अनेक लेख पढ़े। क्या गजब की लेखनी थी? हर पंक्ति में अपना अर्थ था। उनकी भाषा शैली की नकल अनेक पत्रकार करने का प्रयास करते हैं। लंबें चैड़े वाक्यों में हिंदी के आकर्षक शब्दों का प्रयोग करने की शैली को कोई दूसरा छू नहीं पाया पर कुछ लोग कोशिश करते हैं पर जो पढ़ने वाले जानते हैं उनका स्तर कितना ऊंचा था।
फिर क्रिकेट जैसे खेल में उनका मन कैसे फंसा। वह खेल प्रेमी थे। अपने ही अखबारों में क्रिकेट के संबंध में समय समय पर जो प्रतिकूल छपता है क्या वह पढ़ते नहीं थे? हमने तो उनका अखबार पढ़ते ही पढ़ते क्रिकेट देखा और फिर देखना कम कर दिया। किसी पर यकीन नहीं है। किसी क्रिकेट खिलाड़ी में लगाव नहीं है। हार जीत के समाचार जबरन सामने आते हैं तो देख लेते हैं। जिस मैच को देखने के बाद उनके दिल ने साथ छोड़ा उसकी खबर हमने उनके परमधाम गमन के साथ ही सुनी।
संभव है कि जान बूझकर इसका प्रचार किया गया हो कि देखो कैसे इस देश में जुनून की तरह माना जाता है-हालांकि मैच के समय जिस तरह पहले सड़कों पर इसकी चर्चा देखते थे अब नहीं दिखती । एक तरह से संदेश होता है कि अगर आप क्रिकेट नहीं देखते तो इसका मतलब है कि आप युवा नहीं है-जैसे कि क्रिकेट कोई सैक्सी खेल हो।
बहरहाल उन शब्द ऋषि के देहावसान की खबर ने दुःख तो दिया पर सच बात तो यह है कि एक दिन यह सभी के साथ होना है। फिर हम कहें कि क्रिकेट की वजह से यह हुआ-गलत होगा। सत्य के अन्वेषक एक ऋषि का दिल एक मैच से टूट जाये यह संभव नहीं है। मृत्यु के लिये कोई न कोई बहाना तो बनता ही है।
इतने सारे मैच भारत हारा। सच तो यह है कि अनेक लोग तो पक गये हैं कि जीतने पर ही यकीन नहीं करते। जिसने मैच न देखा हो उसे कसम खाकर बताना पड़ता है कि भारत मैच जीत गया। उनका जो प्रिय खिलाड़ी है तो उसका कहना ही क्या? ढेर सारे रिकार्डों से लोग खुश जरूर होते हैं पर टीम कभी विश्व नहीं जीत सकी। केवल एक मैच की वजह से उनका दिल टूटेगा यह संभव नहीं हो सकता। जो आदमी जितनी सांसे लिखवाकर लाया है उतनी ही ले पायेगा।
अलबत्ता क्रिकेट वह शौकीन जो बड़ी उम्र के हैं उनको अब इसे देखना बंद करना चाहिये। कुछ लोग इसे देखते हुए ही वृद्ध हो गये हैं पर फिर भी उनका दिल मानता नहीं है। जिन लोगों ने यकीन कम होने के कारण क्रिकेट देखना बंद कर दिया है वह बहुत आराम अनुभव करते हैं। वरना पहले जब भारत हारता था तो अनेक लोगों का सदमे से सारा शरीर सुन्न हो जाता था। सारा दिन मैच आंखें लगाकर देखा और जब भारत हार गया तो बाहर जाने पर ऐसा लगता था कि नरक से बाहर आये हैं। सुबह मैच हो तो रात को नींद नहीं आती थी। वह तो भला उस भारतीय खिलाड़ी का जिसने पाकिस्तानी खिलाड़ी द्वारा इसके काले पक्ष को उजागर करने के बाद उसका समर्थन किया जिससे अनेक क्रिकेट प्रेमियों की आंखें खुल गयीं। इधर हम यह भी देखते हैं कि भारत पाकिस्तान के बीच अन्य विषयों पर भले ही दुश्मनी हो पर क्रिकेट के विषय पर एका दिखता है। इससे हमें क्या? लब्बोलुआब यह कि क्रिकेट एक पैसे का खेल है जिसमें आगे पैसा, पीछे पैसा, नीचे पैसा, ऊपर पैसा, दायें पैसा, बायें पैसा यानि हर बात में पैसा है।
उन शब्द ऋषि जैसा हम तो नहीं लिख सकते पर उन जैसे हमारे गुरु भी थे। उनके परमधाम गमन के समय हमें अपने गुरुजी की भी याद आयी। वही हमसे कहते कि क्रिकेट गुलामों का खेल है। सच तो यह है कि हमारा मन भर आया था। लोग रोये भी होंगे पर सोच रहे थे कि ‘क्या यह सच नहीं है कि आजादी के बाद वही ऐसे एकमात्र शख्स रहे हैं जिन्होंने पत्रकार के रूप में बिना धन लगाये केवल शब्दों के सहारे ख्याति अर्जित की। उनको नमन करने का मन करता है क्योंकि वह भी हमारे लेखन के प्रेरक रहे थे।
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Sunday 8 November 2009

शब्द धन-त्रिपदम (shabda dhan-hindi kavita)

शब्द योद्धा
छोड़ गया संसार
पता न चला।

छायी चुप्पी
बयान करती है
वह था भला।।

अमीर होता
ऐसे जमाना रोता
हुआ अबला।

लिखो या नहीं
दिखो शब्दयोद्धा
चमके गला।

अमीरा रूप
यहां पूजा जाता है
इंसानी कला।

कलम योगी
सच समझता है
शब्द जला।

धन चंचल
नाम पते के साथ
मुख बदला।

शब्द धन
रचयिता के साथ
हमेशा चला।

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Wednesday 4 November 2009

कदमों के निशान-हिंदी कविता (kadmon ke nishan-hindi vyangya kavita)

यूं तो दर-ब-दर भटकते रहे
इस नीले आसमान के नीचे।
कभी सोचा न था कि
इस दौर में भी छप रहे हैं
धरती पर हमारे कदमों के निशान पीछे।

पल पल अपने दर्द के साथ जीते रहे
अपने गम खुद ही पीते रहे
पर अल्फाजों में कभी नहीं कहे
जमाने ने चाहे
हमारे पांव बढ़ने से रोकने के लिये खींचे।

जब बैठते हुए मुड़कर देखा
तब दिल में हुई खुशी यह देखकर कि
उन जगहों पर अल्फाजों के शेर
खिले थे फूल की तरह
जिस रास्ते हम चले थे
हमारे पांवों से गिरे पसीने ने ही वह सींचे।
---------
अपनी चाहतों का
कभी पूरा करने का मौका ही न मिला
जब एक रुपया था जेब में
तब कीमत थी दो रुपया
जब दो था तब हो गयी चार।
पैमाने के नीचे ही
झूलते रहे
जिन्होंने हमेशा साथ निभाया
वही ख्वाहिशें हमेशा बनी रही यार।


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Monday 2 November 2009

रामचरित मानस में त्रुटियों की चर्चा-हिंदी आलेख (disscusion on mistak of ramcharit manas-hindi lekh)

रामचरित मानस लिखने के 387 वर्ष बाद एक संत ने यह शोध प्रस्तुत किया है कि उसमें व्याकरण और भाषा की तीन हजार गल्तियां हैं। हाय! भगवान राम जी के भक्त यह सुनकर उद्वेलित हो जायेंगे कि ‘देखो, रामचरित मानस का अपमान हो रहा है।’

शायद ऐसा न हो क्योंकि वह भारतीय धर्म से ही जुड़े एक संत हैं अगर ऐसा न होता तो उस पर अनेक लोग क्रोध प्रकट कर चुके होते। तुलसीदासजी ने रामचरित मानस बड़े पावन हृदय से लिखा था इसमें संदेह नहीं है। एक तो कवि मन होता ही बहुत भोला है दूसरे उन्होंने पहले ही अपने विरोधियों को यह बता दिया था कि उनका भाषा ज्ञान अल्प है-क्षमा याचना भी पहले ही कर ली थी।
यह अलग बात है कि 387 वर्ष बाद -भई, यह आंकड़ा हमें टीवी पर ही सुनाई दिया, अगर गलती हो तो क्षमा हम भी मांग लेते हैं- एक संत को यह क्या सूझा कि उसमें दोष ढूंढने बैठ गये। अगर कोई प्रगतिशील होता तो उस पर तमाम तरह की फब्तियां कसी जा सकती थीं यह कहते हुए कि ‘आप तो उसमें दोष ही ढूंढोगे’ मगर वह तो विशुद्ध रूप से पंरपरावादी विद्वान हैं। फिर संत! हमारे समाज मे जो भी कोई संतों का चोगा पहन ले वह पूज्यनीय हो जाता है-फिर लोग उसकी नीयत का फैसला उसी पर छोड़कर उसे प्रणाम करते हुए अपनी राह पकड़ते हैं। वैसे आजकल तो कथित संतों पर फब्तियां कसने वालों की कमी नहीं है पर वह लोग भी सावधानी बरतते हैं कि कहीं अधिक न लिखें।

हम भाषा से पैदल रहे हैं-इससे कमी से स्वतः ही अवगत हैं। कभी कभी कोई शब्द लिखने से कतराते हैं कि कहीं पढ़ने वाले भाषा ज्ञान को संदिग्ध न मान ले। हिंदी के बारे में हमारे गुरु की बस एक ही बात हमारे गले उतरी कि ‘जैसी बोली जाती है वैसी लिखी जाती है।’ फिर इधर हमने यह भी बात गांठ बांधली है कि ‘यहां हर पांच कोस पर बोली बदल जाती है’,मतलब किसी शब्द पर कोई बहस करे तो उससे पूछ लेते हैं कि हमसे कितना दूर रहता है? उसके पता बताने पर जब अपने घर से पांच कोस की दूरी अधिक मिलती है तो कह देते हैं कि-‘भई, हमारे इलाके में ऐसा ही है। तुम ठहरे दूर इलाके के। हमारे यहां जैसा बोला जाता है वैसा ही तो लिखा भी जायेगा न! हिंदी का नियम है।’
मगर संतों से बहस कैसे करें-तिस पर तुलसीदास जी की भाषा हिंदी की सहयोगी भाषा रही हो तब तो और भी कठिन है-संभव हो वह संत उस भाषा के ज्ञाता हों और उनके निवास की पांच कोस की परिधि मेें ही रहते हों। फिर हम तो उस प्रदेश के बाहर के ही हैं जहां तुलसीदास जी बसते थे और संभवतः संत उन्हीं के प्रदेश के हैं। एक बात तय रही कि तुलसीदास कोई दूसरा बन नहीं सकता-पर बनने की चाहत सभी में है। कई लोग इसके लिये संघर्ष करते हुए स्वर्ग में जगह बनाने में सफल रहे पर नहीं मिला तो तुलसीदास जी जैसा वह पद, जिसकी जगह लोगों के हृदय में सदैव रहती है।

तुलसीदास जी की रामचरित मानस न केवल भाषा साहित्य बल्कि अध्यात्मिक दृष्टि से भी बहुत महत्व रखती है। पहले एक पुस्तक आती थी जिसमें तुलसीदास जी को समाज का पथप्रदर्शक न बताकर पथभ्रष्ट बताया जाता था। उसमें बताया गया कि उन्होंने बाल्मीकी रामायण के श्लोकों का हुबहु अनुवाद भर किया है। इसके अलावा भी तमाम तरह की टीका टिप्पणियां भी थी।
इस पर हमने एक अखबार में संपादक के नाम पत्र में लिखा था-हां, हमारे अधिकतर कचड़ा चिंतन वहीं जगह पाते थे-कि ‘चलिये, सब बात मान ली। मगर एक बात हम कहना चाहते हैं कि उस दौर में जब समाज के सामने वैचारिक संकट था तब भगवान श्रीराम जी के चरित्र को लगभग लुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी संस्कृत भाषा से निकालकर देशी भाषा में इतने बृहद ढंग से प्रस्तुत करने का जो काम तुलसीदास जी ने किया उसके लिये समाज उनका हमेशा ऋणी रहेगा। इसका केवल साहित्य महत्व नहीं है बल्कि उन्होंने राम को इस देश जननायक बनाये रखने की प्रक्रिया को निरंतरता प्रदान की जो संस्कृत के लुप्त होने के बाद बाधित हो सकती थी। वैसे राम चरित्र भारत में सदियों गाया जाता रहेगा पर रामचरित मानस ने उसे एक ऐसा संबल दिया जिससे उसमें अक्षुण्ण्ता बनी रहेगी।’
वैसे तुलसीदासकृत राम चरित मानस एक भाव ग्रंथ है। उसमें शब्द गलत हों या सही पर वह पढ़ने वाले के हृदय को उनके भाव वैसे ही छूते हैं जैसे उनका अर्थ है। उसमें भाषा और व्याकरण संबंध त्रुटियों को निकलाने की क्षमता शायद ही किसमें हो क्योंकि अपने यहां बोली वाकई हर पांच कोस पर बदलती है। अभी भी गांव से जुड़े शिक्षित लोग शहर में आकर ‘इतके आ’, ‘काहे चलें’ ‘वा का मोड़ा’ तथा कई ऐसे शब्द बोलते हैं पर उनकी बात पर कोई आपत्ति नहीं करता। वजह! वह अपने अर्थ के अनुसार भाव को संपूर्णता से प्रकट करते हैं। इनको आप भाषा संबंधी त्रुटि मानकर अपनी अज्ञानता और असहजता का परिचय देते हैं।
आखिरी बात संत कहते हैं कि दूसरे में दोष मत देखो। उनकी बात सिर माथे पर। संत एक सामाजिक चिकित्सक हैं इसलिये उनको तो इलाज करने के लिये दोष और विकार देखने ही पड़ते हैं-यह भी सच! मगर एक सच यह भी है कि संत को किसीके दोषों की चर्चा दूसरों के सामने-कम से कम सार्वजनिक रूप से-तो नहीं करना चाहिए। वैसे उस संत की महत्ता ज्ञानियों की दृष्टि में कम हो जाती है जो दूसरों के दोष इस तरह गिनाते हैं। कहते हैं कि तुलसीदासकृत रामचरित मानस में तीन हजार गल्तियां ढूंढने वाले विद्वान ने स्वयं भी अस्सी पुस्तके लिखी हैं, मगर इससे उनको इस तरह की टिप्पणी से बचना ही चाहिये था।
आप कितने भी अच्छे हिंदी भाषी ज्ञाता हों पर लेखक अच्छे नहीं हो जाते। लेखक होते हैं तो भी पाठक पसंद करे तो यह जरूरी नहीं। यह सच है कि लिखने में जितना हो सके त्रुटियों से बचें पर यह भी याद रखें दूसरे के लिखे का अगर भाव सही मायने में प्रकट हो तो आक्षेप न करना ही अच्छा। दूसरी बात हिंदी का यह नियम याद रखें कि जैसी बोली जाती है वैसी ही लिखी जाती है। ऐसे में यह भी देखना चाहिये कि लेखक किस इलाके का है और उसका शब्द कहीं ऐसे ही तो नहीं बोला जाता। सच तो यह है कि तुलसीदास जी की रामचरित मानस एक शाब्दिक या साहित्य रचना नही बल्कि भाव ग्रंथ है और उसमें तीन लाख त्रुटियां भी होती तो इसकी परवाह कौन करता जब समाज का वह अभिन्न हिस्सा बन चुका है। वैसे इसकी टीवी पर चर्चा सुनी तो लगा कि संभव है कि इस बहाने उस पर अपनी विद्वता दिखाने और प्रचार पाने का एक नुस्खा हो।
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Sunday 1 November 2009

कर्मजोग और धर्मजुद्ध-हिंदी व्यंग्य कविता (karmyog aur dharamuyddh-hindi vyangya kavita)

वह धर्मजुद्ध से करने निकले
जमाने भर की सफाई।
अमन का नारा लगाते किया शोर
शीतलता के लिये चहुं ओर आग लगाई।।

तलवार से लड़ते धर्मजुद्ध तो
धरा पर सिर कटकर गिरते हैं,
शब्द घौंपते है खंजर की तरह तो
भले इंसानों के दिल भी हिलते हैं,
एक पल भी मोहब्बत का नहीं जुटाते
कर लेते हैं धर्मजोद्धा नाम की कमाई।।

कहें दीपक बापू
इतिहास भरा पड़ा है
पहले से ही तयशुदा धर्मजुद्धों से
मिले जहां दो धर्मजोद्धा
बन जाते हैं इंसानियत के पुरोधा
बांटकर आपस में किताबें
कहीं शाब्दिक शास्त्रार्थ करते
कहीं तलवार से प्रहार करते
सारे जमाने को लोगों का सिर कट जाये
या दिल फट जाये
पर धर्मजोद्धाओं ने अपनी
जान कभी न गंवाई,
उनके जाल में फंसा वही
जिसकी खुद की मति काम न आई।
ओ भलेमानसों!
धर्मजुद्धों से कभी इंसानियत पैदा नहीं होती,
उनके बुरे नतीजों से
हर बार दुनियां रोती,
कर्मजोगी इसलिये देते हैं
हमेशा अहिंसा, प्रेम और दया की दुहाई।
धर्मजोद्धाओं के जुद्ध में
कभी न दिखलाओ अपनी दिलचस्पी
अपने कर्मजुद्ध का मोर्चा संभाले रहो
यह दुनियां कर्मजोगियों ने ही चलाई।

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Monday 26 October 2009

चलता रहेगा यह सिलसिला-व्यंग्य कविता (yah silsila-hindi vyangya kavita)

गरीब से हमदर्दी
परेशानहाल की फांकेगर्दी
और जमाने की बेरुखी और बेदर्दी
जिन किताबों में है
वह बाजार में बिकती महंगे दाम।
कहीं कहीं पुरस्कार के लिये भी
सज जाता है उसका नाम।

अपनी अय्याशी से उकताये
अपने बड़े ओहदे पर आराम के सताये
और अपनी ही सोच गुलाम रख आये
लोगों को जमाने के रोते चेहरे
और उससे कागज पर छपे शब्द गहरे
देते है दिल को बहुत आराम।
हम बेहतर है इनसे
यह सोचकर मिलता
उनके दिमाग को विराम।
दिल बहलाने को भी दर्द उनको चाहिये
सुबह और शाम।
चलता रहेगा यह सिलसिला
जब तक गरीब
उन जैसे होने के ख्वाब देखते
देगा अपनी सोच को आराम।

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Sunday 25 October 2009

अन्दर के अँधेरे में-हिंदी कविता (andar ke andhere men-hindi kavita)

अपनी महफ़िल में उन्होंने बुलाया नहीं
हमारी परवाह न होने का अहसास जताया.
खूब चिराग जलाए उन्होंने
पर अन्दर के अँधेरे में
चमकता रहा हमारा चेहरा और नाम
बड़ी मेहनत से उन्होंने छिपाया.
हमारा नाम लेने पर उन्होंने
अपने मेहमान पर गुस्सा दिखाकर
अपनी नापसंदगी दिखाई
पर सच है कि जो खौफ है
उनके दिमाग में
हमारे हाथ से जलते चिरागों से
ज़माने के रौशन होने का
वही अनजाने में बाहर आया.

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Saturday 24 October 2009

अदाओं से पहचाना जाता है-हिंदी कविता (adaon se pahachan-hindi poem)

रोज रचते हैं नया स्वांग
चेहरे पर लगाते नए मुखौटे
और बदलकर आते हैं कपड़े
मगर छद्म होकर भी करते हैं हमेशा लफड़े.
आदमी अपना बाहर का रूप
कितना भी बदल ले
अदाओं से पहचाना जाता है,
जहां स्वर बदले
शब्दों से पकड़ा जाता है,
खुलकर सांस लेने से घबड़ाते हैं जो लोग
छिपकर करते वार
पर अपने हथियारों की शकल
और तौरतरीकों से जाते हैं पकड़े.

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Friday 23 October 2009

जिंदगी धुऐं में-व्यंग्य कविता (jindgi dhuen men-vyangya kavita)

पूरे रास्ते जलते हुए ईंधन के
धुंऐं के रूप में प्रतिशोध
और वाहनों के पहिये तले
कुचली जाती धूल का प्रतिरोध
आंखों को जला और थका देता है।
देता है ऐसे अपराध की सजा जो
मैंने किया ही नहीं
गागर से भरकर पानी
जब मूंह और आंखों पर छिड़कता हूं
तब मिलती है राहत
सोचता हूं
इतना क्यों महंगा है वाहनो का तेल
जिंदगी तो है पानी का खेल
दुनियां में सबसे अधिक धनी है
अपनी नदियों और तालाबों के कारण
सस्ता है फिर भी जिंदगी देता है।
क्या कहूं शिक्षित हो रहे जमाने को
जो गंवारों की तरह अपनी जिदंगी धुंऐं में
उड़ा देता है।
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Thursday 22 October 2009

पहले अपने शब्द चखें-हिंदी कविता (pahle apne shabd chakhen-hindi poem)

पहले पीछे से वार कर दें, जखम।
फिर सामने आकर लगायें महरम।।
जमाने में चमकना है जिनको सदा,
पहले करें हमला, फिर दिखायें रहम।।
शोर मचाते हैं इतनी जोर से अमन का,
जमाना खामोशी ओढ़ लेता, जाता सहम।।
चेहरे बदल बदल कर सामने आते बुत,
पहले कत्ल करते, फिर मनाते आकर मातम।।
फरिश्ते के भेष में छिपा शैतान, सभी जानते,
‘भारतदीप’ खराब नीयत देखकर भी खामोश हैं हम।
..................................

मुखिया हमेशा अंग्रेजी में बोलें, चमचे हिंदी बकें।
भाषा के झगड़े, अंतर्जाल पर भी अब लोग रखें।।
चालांकियों साथ लिये चले रहे हैं यहां और वहां
‘हिंदी सेवक’ की उपाधि अपने साथ रखें।।
हिंदी जिनकी अभिव्यक्ति का एकमात्र सहारा
उनको गरीब कहकर, अपनी प्रतिष्ठा खुद रखें।।
‘लिखो-लिखो’ का नारा लिखकर होते खामोश
कविता समझे नहीं, कहानियों से आंख परे रखें।
उठाये झंडा, बन रहे खैरख्वाह हिंदी भाषा के,
भूले लोग ‘भारतदीप’, पहले अपने शब्द को चखें।।
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Wednesday 21 October 2009

सेल का रोग-हास्य व्यंग्य कविता (sele ka rog-hindi hasya vyangya kavita)

अपने साथ फंदेबाज एक पर्चा लेकर आया
और हाथ में देते हुए बोला-
‘दीपक बापू,
बूढ़े आदमियों के लिये
तैयार कपड़ों की एक सेल लगी है
चलो तुम्हें वहां से
टोपी, कुर्ता धोती और स्वेटर दिलवायें
बहुत पुराने लगते हैं तुम्हारी तरह
तुम्हारें कपड़े भी सजायें।
यह ठीक है अभी तक फ्लाप हो
चिंता की बात नहीं
पर कल हिट हो जाओगे
तो कैसे सम्मेलनों में अपना चेहरा दिखाओगे
सेल में एक चीज पर एक मुफ्त है
एक रख लेना रोज पहनने के लिये
दूसरा बाहर के लिये रख लेना
चलो तो मौके का पूरा फायदा उठायें।’

सुनते ही भड़के फिर
अपनी पुरानी टोपी की तरफ
निहारते हुए बोले दीपक बापू
‘कमबख्त, हमारे फ्लाप होने का ताना
देने के लिये कोई बहाना ढूंढ जरूर लेना
अरे, इस टोपी, धोती और स्वेटर के
पुराने होने पर तुम्हें तरस आ रहा है
पर कोई दूसरा तो नहीं गा रहा है
एक के साथ एक फ्री ले आये थे
पहले इसी इरादे से
पर दोनों ही घिस गये
अंतर्जाल पर टाईप करते
पर हमारे ब्लाग अभी आहें भरते
पैकिंग में धोती, कुर्ता, टोपी और स्वेटर
बहुत अच्छे दिखे
पर घर लाये तो सभी में छेद दिखे
फिर तुम सभी जगह हमारे
फ्लाप होने की कथा सुना रहे हो
आपने हिट दोस्त होने का अच्छा साथ भुना रहे हो
हम किस हाल में है
भला कौन पाठक जानता है
इतना ही ठीक है
इस ‘एक के साथ एक फ्री’ में
पगला गये हैं कई लोग
जिसका इलाज नहीं है
ऐसा बन गया है यह सेल का रोग
हम तो मुफ्त में ब्लाग लिखने के साथ
यह दूसरा फ्री का रोग नहीं पाल सकते
रुपये भला कैसे लगायें।
दो रोग पालना एक साथ मूर्खता है
यह तुम्हें कैसे समझायें’’
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Sunday 18 October 2009

‘पुराने माल' का नया स्वयंवर-व्यंग्य आलेख (purane mal ka naya svyanvar-hindi vyangya)

जहां तक भारत की स्वयंवर परंपराओं से जुड़ी कथाओं की हमें जानकारी है तो उसके नायक नायिका तो नयी उम्र के एकदम ताजा पात्र होते थे पर इधर दूरदृश्य प्रसारणों (टीवी कार्यक्रम) में देख रहे हैं उस परंपरा के नाम पर एक तरह से पुराना कबाड़ सजाया जा रहा है।
उच्च शिक्षा-अजी, यही वाणिज्य स्नातक की-के दौरान महाविद्यालयों के आचार्य अपने अपने विषयों के पाठ्य पुस्तकें लाने के निर्देश साथ उनके लेखकों का नाम भी लिखाते थे। चूंकि अपने यहां शिक्षा के दौरान उस समय तक-अब पता नहीं क्या स्थिति है- आचार्य का वाक्य ब्रह्म वाक्य समझा जाता था इसलिये हम उन पुस्तकों ढूंढने निकलते थे। पुराने साथी छात्रों ने बता दिया कि इसके लिये ‘द्वितीय हस्त पुस्तकें (सैकिण्ड हैण्ड बुक्स) लेना बेहतर रहेगा। वह यह राय इसलिये देते थे कि वह अपनी पुस्तकें बेचकर आगे की पुस्तकें इसी तरह लाते थे। उनके मार्गदर्शन का विचार कर हम भी ‘द्वितीय हस्त पुस्तकें’ हम खरीद लाते थे अलबत्ता उनको बेचने कभी नहीं गये।
उस समय शहर में एक दुकान तो ऐसी थी जो उच्च और तकनीकी शिक्षा की द्वितीय हस्त पुस्तकों का ही व्यापार करती थी। पहले से दूसरे हाथ में जाती पुस्तकें उनके लिये कमीशन जुटाने का काम करती थी। हम सोचते थे कि ‘द्वितीय हस्त पुस्तकें’ खरीद रहे हैं पर बाद में जब थोड़ा भाषा ज्ञान हुआ तो पता लगा कि पुस्तकें तो पुस्तकें हैं उनके लिये द्वितीय हस्त -हो सकता है तृतीय और चतुर्थ भी हो- हम ही उनके लिये होते थे।
बहरहाल इतना तय रहा कि हमने अपनी उच्च शिक्षा ऐसी ‘द्वितीय हस्त पुस्तकों’ के सहारे ही प्राप्त की। इसलिये जब कहीं नयी पुरानी चीज की चर्चा होती है तब हमें उस द्वितीय हस्त पुस्तकों का ध्यान आता है।

देखा जाये तो हम जीवन में कभी न कभी द्वितीय हस्त या कहें पुराना माल बन ही जाते हैं। कम से कम शादी के मामले में तो यही होता है। पहली शादी का महत्व हमेशा ही रहता है दूसरी शादी का मतलब ही यही है कि आप सैकिण्ड हैंड हैं या आपकी साथी? इस पर विवाद हो सकता है।
इधर एक दूरदृश्य (टीवी कार्यक्रम) धारावाहिक में हमने देखा कि एक तलाकशुदा आदमी अपना स्वयंवर रचा रहा है। तब हमें भी सैकिण्ड पुस्तक का ध्यान आया। हम आज तक तय नहीं कर पाये कि उन पुस्तकों के लिये हम द्वितीय हस्त थे या वही हमारे लिये पुरानी थी। अलबत्ता उन पुस्तकों को पाठक मिला और हमें ज्ञान-इसका प्रमाण यह है कि हम इतना लिख लेते हैं कि लोगों की हाय निकल जाती है। फिर हम स्वयंवर प्रथा पर विचार करते हैं जिनका अध्यात्म पुस्तकों में-जी, वह बिल्कुल नयी खरीद कर लाते थे क्योंकि पाठ्य पुस्तकों के मुकाबले वह कुछ सस्ती मिलती थी-इस प्रथा का जिक्र पढ़ते रहे हैं। जहां तक हमारी जानकारी है स्वयंवर ताजा चेहरों के लिये आयोजित किया जाता था। तलाक शुदा या जीवन साथी खो चुके लोगों के लिये कभी कोई स्वयंवर आयोजित हुआ हो इसका प्रमाण नहीं मिलता। हम यह जरूर कहते हैं कि स्त्री के प्रति समाज के मानदण्ड अलग हैं पर जहां तक पहली शादी की बात है तो उसका ताजगी का पैमाना दोनों पर एक जैसा लागू होता है। वैसे हमारे यहां प्रचलित विदेशी विचार के अनुसार पहला प्यार ही आखिरी प्यार होता है पर देसी भाषा में ‘पहली शादी’ को ही आखिरी शादी माना गया है। उसके बाद आदमी हो या औरत- जहां तक सामाजिक रूप से शादी का प्रश्न है-बासी चेहरे की श्रेणी में आ जाते हैं। अगर स्त्री का दूसरा विवाह हो तो एकदम सादगी से होता है और पुरुष का कुछ धूमधाम से होने के बावजूद बारातियों का चेहरा बासी लगता है क्योंकि वह इतने खुश नहीं दिखते जितना पहली शादी में थे-यह अनुभव की हुई बात बता रहे हैं। तात्पर्य यह है कि यह स्वयंवर केवल ताजा चैहरे वाले नवयुवा वर्ग-जी, युवा वर्ग से पहले का वर्ग- के सदस्यों के लिये रहा है। इसमें लड़का लड़की आपस में दूर किसी दूसरे से भी नहीं मिले होते थे। इसलिये उनके विवाहों का वर्णन आज भी ताजगी से भरा लगता है।
अभी एक अभिनेत्री का स्वयंवर हुआ था। वह वर चुनने नहीं आई बल्कि मंगेतर चुनने आयी थी और फिर उसे प्रेमी बताने लगी। उसी अभिनेत्री का एक अभिनेत्रा से प्रेम संबंध कुछ दिन पहले ही विच्छेद हुआ था। देखा जाये तो उसे एकदम ताजा चेहरा नहीं माना जा सकता था क्योंकि अंततः उसने प्रचार माध्यमों में अनेक बार उस अभिनेता से प्रेम संबंध होने की बात स्वीकारी थी। मगर बाजार ने उसका स्वयंवर बेचा और कमाया भी।

इधर एक बड़े आदमी का बेटे ने भी दूरदृश्य धारावाहिकों में अपने को अभिनेता के रूप में स्थापित कर लिया है। उस पर मादक द्रव्यों के सेवन का आरोप तो एक बार लग ही चुका है साथ ही उसने एक विवाह भी किया जिसकी परिणति तलाक के रूप में हुई। अब उसके स्वयंवर का कार्यक्रम हो रहा है। देश में जो बौद्धिक जड़ता है उसे देखकर उसके कार्यक्रम की सफलता में कोई संदेह नहीं है। कहने को तो लोग कहते हैं कि भारतीय अध्यात्म ग्रंथों को पढ़ने से कुछ नहीं होता पर बाजार उसमें से बेचने योग्य परंपराओं क्यों ला रहा है? सच बात तो यह है कि हमारे धर्म ग्रंथों में शिक्षा, तत्व ज्ञान के साथ मनोरंजन भी है इसलिये उनका आकर्षण सदाबहार रहता है। दूसरा सच यह भी है कि रामायण, श्रीमद्भागवत, महाभारत, वेद, पुरान, उपनिषद जिस तरह लिखे गये हैं उसकी बराबरी अब कोई लिखने वाला कर ही नहीं सकता। शायद यही कारण है कि आधुनिक विद्वानों ने जहां तक हो सके समाज से उनको बहिष्कृत करने के लिये हर संभव प्रयास किया है क्योंकि उनके प्रचलन में रहते उनकी रचनायें प्रतिष्ठित नहीं हो पाती। आधुनिक भारत में विवेकानंद जैसे जो दिग्गज हुए हैं वह भी इन्हीं महाग्रंथों के अध्ययन के कारण हुए हैं। इसलिये बकायदा इन महाग्रंथों से समाज को दूर रखने का प्रयास किया गया। उसका परिणाम यह हुआ कि आजकल की नयी पीढ़ी के वही सदस्य अपने देश को समझ सकते हैं जिन्होंने घर पर इनका अध्ययन किया है, बाकी के लिये यह संभव नहीं है क्योंकि इनके अध्ययन के लिये कोई औपचारिक शिक्षा केंद्र नहीं है। अगर भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों के लिये कोई शैक्षणिक केंद्र खुले तो आज भी लोग उसमें अपने बच्चों को ही नहीं पढ़ायेंगे बल्कि स्वयं भी जायेंगे। यह कमी पेशेवर संतों से नहीं पूरी हो सकती। ऐसे मे स्वयंवर जैसी व्यवस्था के बारे में किसी को अधिक पता नहीं है या फिर लोग ध्यान में नहीं ला रहे।
बाजार के प्रभाव में तो प्रचार माध्यम खलनायकों को नायक बनाये जा रहे हैं। पता नहीं वह कैसे वह इन सितारों को चमका रहे हैं जिनके चरित्र पर खुद इन्हीं प्रचार माध्यमों ने कभी दाग दिखाये हैं। देखा जाये तो यह स्वयंवर कार्यक्रम देश का मजाक उड़ाने जैसा ही है। अगर विदेशी लोग इनको देखेंगे तो यही सोचेंगे कि-‘अरे, यह कैसी इस देश की घटिया प्रथा है? जिसमें चाहे कभी भी किसी का स्वयंवर रचाया जा सकता है
वैसे बाजार जो कर रहा है उस पर किसी का नियंत्रण नहीं है। होना भी नहीं चाहिए पर लोगों में जागरुकता आ जाये तो हो सकता है ऐसे कार्यक्रम ऊंची वरीयता प्राप्त नहीं कर सकते। कम से कम सैकिण्ड हैण्ड पुस्तक को नया बेचने का काम तो करने से उन्हें रोका जा सकता है।
................................................
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Friday 16 October 2009

उनको चाहिए और रौशनी-हिन्दी कविता (unko chahie aur roshni)

जिनको रौशनी दी थी
वही बांट रहे हैं जमाने में अंधेरा
अपने विश्वास में टूट गये हैं
किससे करें शिकायत
अपनों ने ही गैर बनकर घेरा।

लेकर जमाने भर की रौशनी
वादा करते रहे हमेशा चिराग जलाने का
अब लगे हैं इस कोशिश में
चाहे जमाने में रौशनी न हो
पर कभी खुद के घर में न हो अंधेरा।

रुख बदल गये हैं तेल के दरिया
जो बांटते थे रौशनी इंसानों को
मुड़कर चले जा रहे उनके घरों में
जहां पहले ही है, रौशनी का डेरा।

आंखों में जब पड़ती है रौशनी
इंसान अंधा हो ही जाता है
मगर ‘और चाहिये रौशनी’ की चाहत
करने वालों को भला यह कहां समझ में आता है
फिर मजा तो सभी को मिलता है
जब अपने घर में हो रौशनी
दूसरे के घर में हो धुप्प अंधेरा।
गैरों से जंग लड़ते लड़ते थक गये
कैसे लड़े
जो किया अपनों ने ही अंधेरा।

.....................

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Monday 12 October 2009

खड़ा कर दो किराये का शैतान-हिंदी व्यंग्य कविता (kiraye ka shaitan-hindi vyangya kavita)

अमन का फरिश्ता बनने के लिये
पहले इस जहां में आग लगा दो
फिर उसे बुझा दो।
खड़ा कर दो किराये का शैतान
जिससे लड़ो नकली लड़ाई
तना रहे जब तक तुम चाहो
फिर उसे अपने सामने झुका लो।
ऐसे ही अफसाने खेलते हुए
अपना नाम आकाश में उड़ा दो।
जहां तक चलता है तुम्हारी
दौलत और शौहरत का रुतवा
वहीं तक खेलो नाटक
चाटुकार दर्शक बन जायेंगे
चाहे जब पर्दा गिराओ
चाहे जब उठा दो।
........................
कामयाबी का नशा
जब सिर चढ़कर बोलता है
तब इंसान के नजरिये में
जहर घोलता है।
तब कामयाब इंसान ही
दूसरे इंसान को
दौलत और शौहरत के भाव से तोलता है।

.................................

लेखक संपादक-दीपक भारतदीप
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Monday 5 October 2009

दूसरे के जख्म देखकर मुस्कराते-हिंदी कविता (doosre ke jakhma-hindi kavita)

अक्सर सोचते हैं कि
कहीं कोई अपना मिल जाए
अपने से हमदर्दी दिखाए
मिलते भी हैं खूब लोग यहाँ
पर इंसान और शय में फर्क नहीं कर पाते.
हम अपने दर्द छिपाते
लोग उनको ही ढूंढ कर
ज़माने को दिखाने में जुट जाते
कोई व्यापार करता
कोई भीख की तरह दान में देता
दिल में नहीं होती पर
पर जुबान और आखों से दिखाते.
हमदर्दी होती एक जज़्बात
लोग बेजान होकर जताते.
दूसरे के जख्म देखकर मन ही मन मुस्कराते.
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Friday 2 October 2009

लकीर के फकीर-हिंदी लघुकथा (lakir ke faqir-short hindi story)

उस उद्यान में ज्ञानियों के बीच देश की गरीबी मिटाने के लिये बहस चल रही थी। विषय था देश में गरीबी और शौषण खत्म कैसे किया जाये। सभी सजधजकर बहस करने आये थे। सभी वक्ता अपने अपने विचार रख रहे थे।
एक ने कहा ‘हमें गरीबों के दिमाग में अपने अधिकार के लिये चेतना जगाने का अभियान छेड़ना चाहिये।
वहीं एक फटीचर आदमी भी बैठा था। उसने उठकर पूछा-‘पर कैसे? क्या कहें गरीबों से जाकर कि अमीरों का पैसा छीन लो!’
सभा के संचालक ने उसे बिठा दिया और कहा‘-आप आमंत्रित वक्ता नहीं है इसलिये बहस मत करिये।’
दूसरे वक्ता ने कहा-‘हमें एक आंदोलन छेड़ना चाहिये।’
वह फटीचर फिर उठकर खड़ा हो गया और बोला-‘बहस और आंदोलन तो बरसों से चल रहे हैं।’
संचालक फिर चिल्लाया-‘चुपचाप बैठ जाओ। वरना बाहर फैंक दिये जाओगे। हम कितने गंभीर विषय पर बहस कर रहे हैं और तुम अपनी टिप्पणियां मुफ्त में दिये जा रहे हो।’
वह फटीचर आदमी वहां से चला गया तो एक विद्वान ने दूसरे से पूछा-‘यह कौन फटीचर यहां आ गया था।’
दूसरे ने कहा-‘पता नहीं।’
वहीं एक दूसरा फटीचर आदमी र्बैठा था वह बोला-‘वह मेरा दोस्त था। पहले किताबें पढ़कर बहुत बहस कर चुका है पर जब से बहुत ज्ञानी हो गया तब से उसने ऐसी बहसें बंद कर दी हैं। अलबत्ता कभी कभी चला आता है ऐसी बहसें देखने। क्योंकि इसे इसमें कामेडी नजर आती है।’
यह बात सुनते ही दोनों विद्वानों का खूल खौल उठा वह बोले-‘तू हमारी बहस को कामेडी कहता है।’
वह दोनों उठकर खड़े गये और चिल्लाने लगे कि‘यह हमारी बहस को कामेडी कह रहा है। इसे मारो पीटो।’
सब लोग उस पर चढ़ पड़े। वह चिल्लाता रहा‘मैं नहीं वह कहता है।’
उसके पुराने कपड़ों में पहले ही पैबंद लगे थे वह और अधिक फट गये। जब वह पिट पिटकर बेहोश हो गया तब उसे छोड़ दिया गया। विद्वान फिर बहस करने लगे। कुछ देर बात उसे होश आया तो वह दोनों विद्वान वहीं बैठे बहस मेें व्यस्त थे। उसने उनसे कहा-‘यार, मैं थोड़े ही कहता हूं। वह कहता है। तुम दोनों क्यों पिटवाया।’
उनमें से एक ने कहा-‘हम विद्वान है सांप को निकलने देते हैं उसके बाद लकीर पीटते हैं।’
वह बिचारा वापस अपने दोस्त के पास पहुंचा और पूरा हाल बताकर बोला-‘यार, किस मुसीबत में फंसा आये। हम तो सोच रहे थे कि विद्वान हैं पर वह हिंसा पर उतर आये।’
उसने जवाब दिया-‘यह भ्रम मुझे भी होता था। इसलिये तुझसे कहता हूं कि ऐसी जगहों पर अधिक मत रुका करो। वहां बहस वही करते हैं जो किताबी ज्ञानी हैं। कबीरदास जी कह गये हैं कि किताब पढ़ने वालों को अहंकार आ ही जाता है। मैं भी तुझसे कहता हूं कि ऐसी बहसें कामेडी नाटक की तरह हैं क्योंकि किताबी ज्ञानी लकीर के फकीर होते हैं पर वहां सबके बीच में नहीं कहा। सच बात भी सही जगह और सही समय पर बोलना चाहिये। बस तुम्हारे और मेरे बीच यही अंतर है। इसलिये मैं तुम्हें अल्पज्ञानी कहता हूं। मैंने खतरा देखा तो निकल लिया और तुम फंसं गये।’

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