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Wednesday, January 1, 2014

लोकतंत्र में बाज़ार और प्रचार समूहों की शक्ति अधिक-ईसवी संवतः 2014 पर एक संदेशपूर्ण चिंत्तन लेख (loktanta mein bazar aur prachar samoohon ki shakti adhik- a massege and thought article on new year 2014)



            ईसवी संवत् 2014 प्रारंभ हो गया है।  वैसे देखा जाये तो हमारे यहां हिन्दू संवत् अध्यात्मिक रूप से हमारे हृदय के अधिक निकट होता है पर उसका राजकीय महत्व न होने से उसे केवल सामाजिक उत्सव मनाया जाता है जिसे बाज़ार और प्रचार माध्यम अधिक समर्थन नहीं देते। आजकल समाज पर बाज़ार और प्रचार का अधिक प्रभाव है और इससे सामाजिक संस्कार और संस्कृति निश्चित रूप से प्रभावित हो रही है।  देखा जाये तो जब तक पारंपरिक पर्वों से बाज़ार का लाभ होता था तब तक प्रचार माध्यम अपने विज्ञापन स्वामियों के लिये भारतीय संस्कृति का बोझ ढोते रहे।  अब पश्चिमी संस्कृति से बाज़ार में  विदेशी प्रभाव से परिष्कृत उत्पादों का प्रभाव बढ़ा है। खान पान, रहन सहन तथा मनोरंजन के साधन अब स्वदेशी रूप का प्रभाव खो चुके हैं। इसलिये वैलंटाईन डे तथा ईसवी नव संवत् पर नये उपभोग के रूपों के निर्मित  उत्पाद बेचने के लिये प्रचार माध्यम अपनी रणनीति बनाते हैं।
            एक बात हमारे समझ में नहीं आती कि आनंद में यह उत्तेजना क्या होती है? टीवी पर बर्फीले इलाके में घूम रहे पर्यटक ने साक्षात्कार में कहा कि ‘यहां बहुत एक्साईटमेंट हो रहा है।’’
            हमें अंग्रेजी कम आती है पर एक्साईटमेंट का आशय उत्तेजना से होता है।  आनंद की यह उत्तेजना शराब से अधिक मिलती है।  इस तरह की उत्तेजना मनुष्य के विवेक का हरण करती है। शराब के बाद दूसरा आंनद तब आता है जब उसके चरम पर होते ही आदमी  किसी से लिपट जाता है। मां अपने बच्चे की लीला से जब आनंदित होती है तब वह उसे गले से लिपटा देती हैं। पिता जब बेटी से प्रसन्न होता है तो उसके सिर पर हाथ फेरता है।  कहने का आशय यह है कि आदमी आनंद की उत्तेजना में किसी दूसरे देह का स्पर्श करता है।  इस तरह बर्फ पर पांव रखकर चलना या उसे उछालना किस तरह आनंद के चरमोत्कर्ष पर पहुंचाता है यह कहना कठिन है।  बहरहाल बाज़ार के प्रचारक आदमी को आनंद के चरमोत्कर्ष पर पहुंचाने का तीव्र प्रयास करता है जिसमें विवेक के हृास के साथ  परंपरा और संस्कारों की मूल्यहीनता प्रकट होने की संभावना अधिक रहती है।
            बाज़ार और प्रचार समूहों की शक्ति के आगे समाज किस तरह नाचता है यह हम देख ही चुके हैं।  जिसे समाज पर नियंत्रण करना हो वह बाज़ार के सौदागरों सांठगांठ कर प्रचार प्रबंधकों के दम पर ढेर सारी लोकप्रियता हासिल कर सकता है। देश में उदारीकरण के बाद मध्यमवर्गीय समाज बुरी तरह से बिखरा है। खासतौर से लड़कों को रोजगार और लड़कियों के विवाह की समस्या इस वर्ग के लिये जटिल हुई है।  सबसे बड़ी बात यह कि रोजगार में असुरक्षा का भाव पैदा हुआ है।  एक अर्थशास्त्री के नाते हम देखें तो आज से पंद्रह बीस वर्ष पूर्व तक एक स्थिर समाज था जो स्वयं को अस्थिर अनुभव कर रहा है।  बड़ी कंपनियों के आगमन से नौकरियों का सृजन हुआ है पर लघु तथा व्यवसायों में लगे मध्यम वर्ग के लिये अब अस्तित्व बचाने का संकट सामने हैं। कंपनी नामक दैत्य समाज को खाता जा रहा है। छोंटे व्यवसायी का सम्मान लगभग खत्म हो चुका है।
            अभी हाल ही में राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य पर एक नये दल का उदय हुआ है। अन्ना हजारे जी ने एक भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन प्रारंभ किया जिससे उनके कुछ भक्तों को विशेष प्रचार मिला।  उन्होंने एक राजनीतिक दल बनाया और सफल रहे। इस दल को पूरी तरह से प्रचार समूहों का सहारा मिला इसमें संशय नहीं है। अन्य स्थापित दल इससे विचलित हो गये हैं क्योंकि अब देश के युवा इस दल की तरफ आकर्षित हो रहे हैं।  इसका कारण भी वाली है। इस दल ने भले ही दंत तथा नखहीन अल्पमत वाली सरकार बनायी है पर उसके मंत्री एकदम आम आदमी रहे हैं।  पच्चीस छब्बीस साल की लड़की मंत्री बन गयी है। अनेक युवा मंत्री बने है। इससे पहले स्थापित राजनीतिक दलों में युवाओं को कभी इस तरह उभरने का अवसर नहीं मिला।  सच बात तो यह है कि आज कोई भी आम परिवार अपने युवा पुत्र तथा पुत्री को राजनीतिक क्षेत्र में जाने की सलाह नहीं देता। यह एक तरह स्थापित रजनीतिक दलों में व्याप्त जड़ता के भाव के अनेक ऐसे प्रमाण है कि युवाओं के नाम राजनीतिक दलों में परिवारवाद के आधार पर चयन को प्राथमिकता दी। नये दल ने राजनीति मे ंव्याप्त इस जड़भाव के स्थान पर आशावाद का संचार किया है।  इससे वही लोग समझते हैं जिन्होंने कभी किसी राजनीतिक दल से नाता नहीं रखा।  दूसरी बात यह कि इसके मंत्री आम आदमी के बीच जिस तरह विचर रहे हैं उससे लोगों में उत्सुकता का भाव पैदा हो रहा है। आधुनिक लोकतंत्र में प्रचार के सहारे ही चुनाव में जीत या हार मिलती है ऐसे में आम आदमी का इस नये के प्रति रुझान एक या दो नहीं वरन् समस्त राजनीतिक दलों के संकट का कारण बन सकता है, एक सामान्य निरपेक्ष लेखक के रूप में हमारा तो ऐसा ही मानना है।
            आज 1 जनवरी 2014 को इसी नये दल के हमने कुछ जगह सदस्यता अभियान के लिये स्टॉल लगे देखे।  ऐसा लगा कि किसी कंपनी का प्रचार हो या जैसे एक नयी दुकान खुल गयी है। हमें पता नहीं इस दल के पीछे कौनसे वास्तविक तत्व हैं पर जब अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन चल रहा था तब हमने कहा था कि वह प्रायोजित किया गया हो सकता है। विश्व में चल रहे असंतोष का प्रभाव भारत में परिलक्षित न हो इसलिये बाजार तथा प्रचार समूही इसे प्रायोजित कर रहे हैं। दूसरा यह भी कि बाज़ार तथा प्रचार समूहों के शिखर पुरुष विदेश में अपने समकक्ष लोगों के सामने सीना तानकर कह सकते होंगे कि उनके यहां भी इस तरह का आंदोलतन चल रहा है। इस तरह के ंसदेह का  कारण यह था कि इस अंादोलन के समाचारों तथा बहसों के बीच बाज़ार के उत्पादों का ही विज्ञापन हो रहा था। नया दल इसी आंदोलन की देन है और संभव  है कि वही आर्थिक ताकतें राजनीतिक प्रभाव बनाये रखने के लिये इस आशा के साथ मदद कर रही हों ताकि लोगों का आज की राजनीति के प्रति खत्म हो रहा रुझान बना रहे। इस तरह का अनुमान इसलिये भी किया जा सकता है कि इस दल के पर्दे पर दिख रहे कर्णधार पेशेवर समाज सेवक यानि चंदा लेकर लोगों का भला करते रहे हैं।  संभव है पर्दे के पीछे कुछ उत्साही, निष्कर्मी, तथा विद्वान इसे सहायता कर रहे हों क्योंकि उनका लक्ष्य समाज हित करना ही रहता है। कम से कम हम जैसे बौद्धिक लोग तो यह मानते हैं कि इस दल का उदय होना ही चाहिये था।  देश के निर्जीव होते जा रहे लोकतंत्र के लिये यह आवश्यक भी था।  संभव है कि हम जैसी सोच अनेक लोगों की हो बाज़ार और प्रचार समूहों ने इसे समझा हो इसलिये ही इस दल के अभ्युदय में जुटे हों।  इस दल को ढेर सारे सदस्य और चंदा मिल जायेगा इसमें संदेह नहीं है पर सवाल यह है कि देश में राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक क्षेत्र मेें जो समस्यायें उनके निराकरण में यह दल कितना सहायका होगा? दिल्ली देश नहीं है पर वहां से कोई  निकले हल्के आशावादी संदेश पर लोगों का ध्यान जाता है।  संभव है कि कि हम जैसे लोगों यह सोच भी  बाज़ार तथा प्रचार समूहों के संयुक्त समाज नियंत्रण की रणनीति के प्रभाव में फंसने के कारण बनी हो। हमारे पास अपना कोई साधन तो है नहीं इसलिये वर्तमान सक्रिय प्रचार माध्यमों के आधार पर ही अपना चिंत्तन लिखते हैं।
            हमें सबसे अधिक चिंता अस्थिर समाज को लेकर है।  जाति, भाषा, वर्ण, धर्म तथा अन्य आधारों पर बने समाज टूट चुके हैं पर नया कुछ नहीं बन रहा है।  उम्मीद है नये ईसवी संवत् में कुछ नया होगा।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com
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Monday, December 23, 2013

आम इंसान की मजबूरी-हिन्दी व्यंग्य कविता (aam insan ki mazboori-hindi vyangya kavita)




पर्दे पर कई चेहरे रोज आते हैं,
अपनी जुबान से कुछ करते
जन कल्याण का दावा
कुछ भ्रष्टाचार का राजफाश करने आते हैं।
कहें दीपक बापू
वोट कमाने के लिये
नोटों का होना जरूरी है,
शिखर पर जो बैठ गया
इसलिये बनाता गरीब से दूरी है,
पुराने चेहरे बासी जब हो जाते,
सौदागर कोई नया चेहरा फिर सजाते,
वादे करते करते जमाना गुजर गया
मगर देश बदहाल रहा,
नाम लिया सभी ने जनसेवा का
गरीब हमेशा बेहाल रहा,
आम इंसानों की टूटती एक से आस
मजबूरी में नये चेहरे के कंधे पर
अपनी उम्मीद का आकाश टिकाते हैं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
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Thursday, October 24, 2013

सौदागरों के लफड़े-हिन्दी व्यंग्य कविता(saudagaron ke lafde-hindi vyangya kavita)



शोर मचा है कहीं बाज़ार में
सौदागर काले हाथ करते हुए  पकड़े हैं,
कानून की जंजीरों में अब जकड़े  है,
हैरान है सौदागरों के कारिंदे
यह सोचकर कि अपना काफिला
कैसे आगे चलेगा,
कहंी उनके घर में घी की बजाय
तेल का चिराग तो नहीं जलेगा,
इसलिये नारे लगाते हुए
अपने मालिक की ईमानदारी पर
सीना तानकर खड़े अकड़े हैं।
कहें दीपक बापू
दौलतमंद चाहे कितने भी आगे हों
सारे जहान में
मगर ईमान के रास्ते चलने पर
उनकी नानी हमेशा मरती,
हुकुमत पर काबू रखने का
ख्वाब अच्छा है
मगर उसके आगे चलने की ख्वाहिश भी
उनकी आहें भरती,
यह अलग बात है
कानून अंधा है
कभी कभी चल पड़ता है
अपने ही दोस्तों की तरफ
अपने हाथ बढ़ाते हुए,
खरीदते हैं जो उसे अपने सिक्कों की दम पर
चल पड़ता है डंडा लेकर कभी
उनको डराते हुए,
सौदागरों के हमदर्द
ज़माने के बिखर जाने का खौफ दिखाते हैं
आवाज इतनी जोर से करते
ताकि कोई न पूछे
उनके मालिकों के दूसरे कितने लफड़े हैं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Tuesday, September 17, 2013

हादसे होते रहेंगे-हिन्दी व्यंग्य कविता



देश में तरक्की बहुत हो गयी है
यह सभी कहेंगे,
मगर सड़कें संकरी है
कारें बहुत हैं
इसलिये हादसे होते रहेंगे,
रुपया बहुत फैला है बाज़ार में
मगर दौलत वाले कम हैं,
इसलिये लूटने वाले भी
उनका बोझ हल्का कर
स्वयं ढोते रहेंगे।
कहें दीपक बापू
टूटता नहीं तिलस्म कभी माया का,
पत्थर पर पांव रखकर
उस सोने का पीछा करते हैं लोग
जो न कभी दिल भरता
न काम करता कोई काया का,
फरिश्ते पी गये सारा अमृत
इंसानों ने शराब को संस्कार  बना लिया,
अपनी जिदगी से बेजार हो गये लोगों ने
मनोरंजन के लिये
सर्वशक्तिमान की आराधना को
खाली समय
पढ़ने का किस्सा बना लिया,
बदहवास और मदहोश लोग
आकाश में उड़ने की चाहत लिये
जमीन पर यूं ही गिरते रहेंगे।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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Wednesday, August 7, 2013

यह बस्ती-हिन्दी कविता




जरूरत का सामान महंगा है
गैर जरूरी है
इसलिये जिंदगी सस्ती है।
देश  हो या देवता की
सच्ची भक्ति करने वालों को पूछता कौन है
जिनके काले चेहरे पर लगी सफेद क्रीम
चाल जिनकी आवारा है
चरित्र पर लगे हैं दाग
उनकी रही हमेशा मस्ती है।
कहें दीपक बापू
दर्द नहीं सीने में जिनके
प्याज से आंखों में आंसू वही लाते हैं,
मर गया है जमीर जिनका
आकाओं के लिये फरिश्तों की तरह
गीत वही गाते है
कदम नहीं पड़ते कभी जमीन पर
जमाने के साथ चलने का दावा करने वालों से
भरी यह बस्ती है।
 
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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Saturday, May 25, 2013

क्रिकेट मैचों में फिक्सिंग का भूत फिर बाहर आया-हिन्दी व्यंग्य लेख (cricket matchon mein fising ka bhoot fir samne aaya-hind vyangya lekh,satire article on cricket match)



       मामला अगर रुपये को हो तो कोई भी बिक सकता है।  कोई गेंद बेचकर गेंद फैक सकता है तो कोई बिककर बल्ला रोक सकता है।  कैच पकड़ने के लिये मेहनत होती है पर छोड़ने के लिये केवल हाथ रोकना है इसलिये कोई भी उंगलियों में फंसी गेंद टपका सकता है।  बल्ले से गेंद लगने पर एक सिरे से दूसरे सिरे पर खिलाड़ी पहुंचते ही हैं पर जिसने कदम बेचे हों वह रन आउट भी हो सकता है। जीतना सहज है पर आत्मसम्मान जिसने बेचा हो वह हार भी सकता है। क्रिकेट में कई ऐसे मैच भी सुनने को मिले हैं जिसमें आपस में जीत के लिये जूझती दिख रही टीमें वास्तव में हार के लिये खेल रही थीं।  उन्होंने अपनी हार बेची थी इसलिये जीतकर अपनी रकम खोना नहीं चाहती थीं।
         गेंद और बल्ले से खेले जाने वाले क्रिकेट को प्रचार की जरूरत नहीं है पर उसके विकास के नाम पर चलता हुआ खेल सट्टे की तरफ मुड़ गया है। कुछ लोग कह रहे हैं कि क्रिकेट बदनाम हो रहा है। एक दम हास्यास्पद बात है।  दरअसल क्रिकेट के नाम पर चल रही संस्थायें बदनाम हो रही है। उनकी साख बर्बाद हो रही है। यह संस्थायें केवल सार्वजनिक मैचों का आयोजन कर सकती हैं पर गली मोहल्लों में चलने वाले खेल पर उनका कोई नियंत्रण नही है। अगर इस तरह की संस्थाओं से खेल चलते तो कबड्डी खेलते हुए लोग कहीं नहीं दिखते।  अनेक मैदानों और पार्कों में कबड्डी खेलते हुए लोग मिल जायेंगे।  हमारा मानना है कि भारत में अनेक संस्थायें खेलों को बर्बाद ही अधिक करती हैं।  हाकी की बात करें। जब तक सामान्य प्राकृतिक मैदान पर हाकी खेली जाती थी तब तक सभी जगह उसके मैच होते थे।  दूसरे देशों से संपर्क बनाये रखने के प्रयास में हॉकी को कृत्रिम मैदान पर लाया गया।  उसके लिये विशेष मैदान होना जरूरी है जिनका हमारे देश में हर आम जगह पर होना संभव नहीं है। हॉकी बर्बाद हो गयी। इससे तो अच्छा होता तो विश्व स्तर पर हमारा देश हॉकी खेलना छोड़ देता तब लोग इसके पुराने संस्करण को स्वयं ही इसे ढोते रहते जैसे कबड़डी और खोखो को ढो रहे हैं।  विश्व के हाकी खेल नक्शे परं भारत का नाम नहीं होता पर भारत में हाकी खेली जा रही होती।
       बहरहाल क्रिकेट में हारजीत का रोमांच अब खत्म हो गया है।  भारतीय प्रचार माध्यम जबरन इसे जनता पर थोप रहे हैं। सट्टा और फिक्सिंग की खबरों में अब कोई नयापन नहीं है। सभी जानते हैं इंडियन प्रीमियर लीग में पैसे का खेल चल रहा है।  क्रिकेट खेल एक मंच की तरह है और खिलाड़ी उसमें बेजान पुतले बन गये हैं। मुख्य बात यह कि क्रिकेट खेल के अंतर्राष्ट्रीय मैचों होने वाला हार्दिक रोमांच इसमें अब  नहीं है। जब था तब मजा लिया। बाद में पता लगा कि वह भी नकली खेल था।  बड़े बड़े खिलाड़ियों के नाम फिक्सिंग में आये। एक खिलाड़ी ने तो अपने कप्तान पर उस पाकिस्तान के विरुद्ध कमतर प्रदर्शन करने के लिये दबाव डाला जिसे दुश्मन देश समझा जाता है।  उस समय भी इसी तरह फिक्सिंग की खबरों का क्रम चला। तब खेल में रोमांच के साथ ही देशभक्ति के भाव पर भी विचार करना पड़ा।  यह प्रचार माध्यम अपने बाज़ार के सौदागरों के लिये चाहे जब खेल के रोमांच को बिना देशभक्ति के भाव के बेचते हैं और चाहे जब उसमें से उसे निकाल देते हैं। ठीक उसी तरह जैसे दही की लस्सी में चाहे नमक मिलाओ या शक्कर ग्राहक तो पियेगा ही, झकमारकर पियेगा।
      जब क्रिकेट के रोमांच का भ्रम टूटा तब हृदय में  देशभक्ति के तत्व भी विचलित हुए।  उस समय हालत यह हो गयी थी कि हम सोचते थे कि क्या फिल्मी गानो को सुनना और उन पर झूमना ही देश भक्ति है? दूसरी बात यह भी कि हम देशभक्ति दिखायें तो किस तरह? लोग कहते हैं कि देशभक्त बनो।  क्या बीसीसीआई की टीम को भारत का प्रतिनिधि मानकर  उसकी टीम की जीत पर नाचना ही देशभक्ति का प्रमाण है? उस समय कुछ स्थानों पर पाकिस्तान की जीत पर सांप्रदायिक तनाव होने की संभावनाओं की बात सामने आती थी।  समुदाय विशेष के लोगो को संदेह की नज़र से देखा जाता था। खिलाड़ी के कप्तान के आरोप के बाद हमें लगा कि ऐसी खबरें भी प्रायोजित थी ताकि दूसरे समुदाय के लोग धर्म के नाम ही सही इस खेल को देखते रहें।  यह बाज़ार और प्रचार समूहों का संयुक्त प्रयास था।  अब जब बीसीसीआई को आरटीआई कानून से बाहर रखने के लिये उसके निजत्व का हवाला दिया जा रहा है तब मन ही मन यह बात तो उठ ही  सकती है कि हम अपने अंदर किसके लिये देशभक्ति का भाव लाते रहे थे। सबसे बड़ी बात तो यह कि एक तुच्छ खेल को देश का धर्म बताया जा रहा है। यकीनन हमारे जैसे लोग क्रिकेट को तुच्छ ही मानते हैं। केवल समय पास करने वाला खेल जीवन में सब कुछ नहीं हो सकता।
            हमें तो फिक्सिंग की खबरें प्रचार माध्यमों पर देखकर संदेह होता है कि कहीं वह भी तो प्रायोजित तो नहीं है।  कुछ पैदल मार कर शतरंज की बाजी जीतने का दावा कोई खिलाड़ी नहीं करता जब तक वह  को परास्त न करे।  यहां तो पैदल पकड़ ही क्रिकेट खेल को शुद्ध करने की बात कही जा रही है। एक बात बता दें कि शतरंज मे राजा मरता नहीं है, वह फसता हैं। हमने क्रिकेट खेलते थे और अब  शतरंज खेलते है। मालुम है जब फिक्सिंग का राजा नहीं फंसेगा तब कोई शुचिता नहीं आ पायेगी। तेरह साल पहले भी फिक्सिंग की खबरें आयी थीं तब दिल टूटा था।  अब जो खबरे आ रही हैं उसमें हम शायद दिलचस्पी नहीं लेते अगर उसमें जांच एजेंसियां और पुलिस शामिल नही होती।  पहले मामला ऊपर ही खत्म हो गया पर इस बात पुलिस राशन पानी लेकर फिक्सरों के पीछे पड़ी है। पहले बुकी जाते थे अब खिलाड़ी भी जेल गये हैं। भद्र लोग पर्दे के पीछे जमकर अभद्रता करते रहे। पुलिस का खौफ नहीं था।  अब पुलिस वाले घुसे हैं जिनके मारे अच्छे खासे की पेंट ढीली हो जाती हैं।  आमतौर से परंपरागत अपराध करने वाले मजबूत होते है जिनके साथ पुलिस सख्ती से पेश आकर ही अपराध उगलवा पाती है मगर क्रिकेट के भद्र पुरुषों के साथ पुलिस को अधिक प्रयास करने की आवश्यकता नहीं है।  पुलिस उनके साथ सख्ती कर भी नहीं सकती। धनवानों की सहनशक्ति कम होती है और पुलिस यह जानती है। एक डंडा देखकर ही भद्र पुरुष सब उगले दे रहे हैं।  क्रिकेट को भद्रजनों का खेल कहा जाता रहा है इसलिये पूरा देश इसमें लगा रहा। अब इसकी नाम पर पर्दे के पीछे खेले जाने वाले अभद्र खेल को देखकर सभी सोचने को मजबूर होंगे।  दूसरी बात यह कि भद्र खेल के नियंत्रणकर्ता अभी तक बेफिक्र थे कि कोई पुलिस वाला उनके घर में नहीं झांकेगा।  अब यह  भ्रम टूट गया है। लोगों को लगता है कि अब भी कुछ नहीं होगा मगर  हमारा मानना है कि पुलिस की घुसपैठ का प्रभाव पड़ेगा।  फिर जिस तरह पुलिस के हवाले से समाचार आये हैं कि किस तरह एक खिलाड़ी को हर दो घंटे में नींद से उठाती हैं।  उसे सोने नहीं देती है। न पकड़े गये राज्य रूपी भद्र लोगों की नींद हराम करने के लिये ऐसी खबरें पर्याप्त हैं। यह भद्र पुरुष प्रकटतः चाहे जो कुंछ कहें मगर कहीं न कहीं पुलिस का खौफ उनके दिमाग में हैं और आगे भी बना रहेगा।  तब संभव है कि फिक्सिंग पूरी तरह खत्म न हो पर उसे बड़े स्तर पर संरक्षण देना मुश्किल होगा।  पुलिस ने कुछ खिलाड़ियों पर फिक्सिंग के नहीं वरन् सट्टेबाजी के साथ ही धोखाधड़ी का आरोप लगाया है। एक धारा के अनुसार इस मामले में उनको उम्रकैद तक हो सकती है। हालांकि न्यायालय ने पुलिस को इसके लिये लताड़ा है पर भद्र पुरुषों के लिये पुलिस का व्यवहार ही डरावना है और यह डर इतना अधिक होगा कि उन्हें यह बात याद भी नहीं रहेगी कि न्यायालय में पुलिस का फटकारा है। ऐसे में भद्र पुरुष अब इस धंधे  को आगे कितना जारी रख पायेंगे, पता नहीं।

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Sunday, May 5, 2013

गर्मी में वाणी का मौन ही बरफ का काम कर सकता है-ग्रीष्म ऋतु पर हिन्दी लेख (Garmi mein vani ka maun he baraf ka kam kar sakta hai-greeshma ritu par hindi lekh)



    उत्तर भारत में अब गर्मी तेजी से बढ़ती जा रही है। जब पूरा विश्व ही गर्म हो रहा हो तब नियमित रूप से गर्मी में रहने वाले लोगों को  पहले से अधिक संकट झेलने के लिये मानसिक रूप से तैयार होना ही चाहिये।  ऐसा नहीं है कि हमने गर्मी पहले नहीं झेली है या अब आयु की बजह से गर्मी झेलना कठिन हो रहा है अलबत्ता इतना अनुभव जरूर हो रहा है कि गर्मी अब भयानक प्रहार करने वाली साबित हो रही है।  मौसम की दूसरी विचित्रता यह है कि प्रातः थोड़ा ठंडा रहता है जबकि पहले गर्मियों में निरंतर ही आग का सामना होता था।  प्रातःकाल का यह मौसम कब तक साथ निभायेगा यह कहना कठिन है।
   मौसम वैज्ञानिक बरसों से इस बढ़ती गर्मी की चेतावनी देते आ रहे हैं।  दरअसल इस धरती और अंतरिक्ष के बीच एक ओजोन परत होती है  जो सूर्य की किरणों को सीधे जमीन पर आने से रोकती है।  अब उसमे छेद होने की बात बहुत पहले सामने आयी थी।  इस छेद से निकली सीधी किरणें देश को गर्म करेंगी यह चेतावनी पहुत पहले से वैज्ञानिक देते आ रहे हैं।  लगातार वैज्ञानिक यह बताते आ रहे हैं कि वह छेद बढ़ता ही जा रहा है। अब कुछ वैज्ञानिक कहते हैं कि विश्व में विकास के मंदिर कारखाने ऐसी गैसें उत्सजर्तित कर रहे हैं जो उसमें छेद किये दे रही हैं तो कुछ कहते हैं कि यह गैसे वायुमंडल में घुलकर गर्मी बढ़ा रही हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि ओजोन पर्त के बढ़ते छेद की वजह से गर्मी बढ़ रही है या फिर गैसों का उपयोग असली संकट का कारण है या फिर दोनों ही कारण इसके लिये तर्कसंगत माने, यह हम जैसे अवैज्ञानिकों के लिये तय करना कठिन है ।  बहरहाल विश्व में पर्यावरण असंतुलन दूर करने के लिये अनेक सम्मेलन हो चुके हैं। अमेरिका समेत विश्व के अनेक देशों के राष्ट्राध्यक्ष उनमें शािमल होने की रस्म अदायगी करते हैं। फिर गैस उत्सर्जन के लिये विकासशील देशों को जिम्मेदार बताकर विकसित राष्ट्रों के प्रमुख अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। यह अलग बात है कि अब इस असंतुलन के दुष्प्रभाव विकसित राष्ट्रों को भी झेलनी पड़ रहे है।
        एक बात तय है कि आधुनिक कथित राजकीय व्यवस्थाओं वाली विचाराधारायें केवल रुदन तक ही सभ्यता को ले जाती हैं।  लोकतंत्र हो या तानाशाही या राजतंत्र कोई व्यवस्था लोगों की समस्या का निराकरण करने के लिये राज्यकर्म में लिप्त लोगों को प्रेरित करते नहीं लगती। दरअसल विश्व में पूंजीपतियों का वर्चस्प बढ़ा है। यह नये पूंजीपति केवल लाभ की भाषा जानते हैं। समाज कल्याण उनके लिये निजी नहीं बल्कि शासन तंत्र का विषय  है। वह शासनतंत्र जिसके अनेक सूत्र इन्हीं पूंजीपतियों के हाथ में है।  यह पूंजीपति यह तो चाहते है कि विश्व का शासनतंत्र उनके लाभ के लिये काम करता रहे। यह वर्ग तो यह भी चाहता है कि  शासनतंत्र आम आदमी तथा पर्यावरण की चिंता करता तो दिखे, चाहे तो समस्या हल के लिये दिखावटी कदम भी उठाये पर उनके हितों पर कुठाराघात बिल्कुल न हो। जबकि सच यह है कि यही इन्हीं पूंजीपतियों  के विकास मंदिर अब वैश्विक संकट का कारण भी बन रहे हैं। सच बात तो यह है कि वैश्विक उदारीकरण ने कई विषयों को  अंधरे में ढकेल दिया है।  आर्थिक विकास की पटरी पर पूरा विश्व दौड़ रहा है पर धार्मिक, सामाजिक तथा कलात्मक क्षेत्र में विकास के मुद्दे में नवसृजन का मुद्दा अब गौण हो गया है।  पूंजीपति इस क्षेत्र में अपना पैसा लगाते हैं पर उनका लक्ष्य व्यक्तिगत प्रचार बढ़ाना रहता है। उसमें भी वह चाटुकारों के साथ ही ऐसे शिखर पुरुषों को प्रोत्साहित करते हैं जो उनकी पूंजी वृद्धि में गुणात्मक योगदान दे सकें।  अब वातानुकूलित भवनों, कारों, रेलों तथा वायुयानों की उपलब्धता ने ऐसे पूंजीपतियों को समाज के आम आदमी सोच से दूर ही कर दिया है।
          बहरहाल अगले दो महीने उत्तरभारत के लिये अत्ंयंत कष्टकारक रहेंगे।  जब तक बरसात नहीं आती तब तक सूखे से दुर्गति के समाचार आते रहेंगे।  यह अलग बात है कि बरसात के बाद की उमस भी अब गर्मी का ही हिस्सा हो गयी है।  इसका मतलब है कि आगामी अक्टुबर तक यह गर्म मौसम अपना उग्र रूप दिखाता रहेगा।  कुछ मनोविशेषज्ञ मानते हैं कि गर्मी का मौसम सामाजिक तथा पारिवारिक रूप से भी तनाव का जनक होता है। यही सबसे बड़ी समस्या हेाती है। सच बात तो यह है कि कहा भी जाता है कि तन की अग्नि से अधिक मन की अग्नि जलाती हैं संकट तब आता है जब आप शांत रहना चाहते हैं पर सामने वाला आपके मन की अग्नि भड़काने के लिये तत्पर रहता है।  ऐसे में हम जैसे लोगों के लिये ध्यान ही वह विधा है जो ब्रह्मास्त्र का काम करती है।  जब कोई गर्मी के दिनों में हमारे दिमाग में गर्मी लाने का प्रयास करे ध्यान में घुस जायें।  वैसे भी गर्मी के मार से लोग जल्दी थकते  लोग अपनी उकताहट दूसरे की तरफ धकेलने का प्रयास करते हैं।  उनसे मौन होकर ही लड़ा जा सकता है।  वहां मौन ही बरफ का काम कर सकता है।           

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
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Tuesday, February 26, 2013

मन का गुलशन-हिन्दी शायरी (man ka gulshan-hindi shayari)

बालपन की कच्ची माटी में
खिला था गुलशन
उम्र के दौर के साथ मुरझा गया
ख्वाहिशों ने बढ़ाये कदम दिल में
पत्थरों के शहर में सपना सजा नया,
कहें दीपक बापु
उस्ताद के ओहदे पर बैठे लोगों ने
सिखाई केवल मतलबपरस्ती,
दिखाई दौलत के दरिया में मस्ती,
अपनी उम्र से अब वह टूटेबालपन की कच्ची माटी में
खिला था गुलशन
उम्र के दौर के साथ मुरझा गया
ख्वाहिशों ने बढ़ाये कदम दिल में
पत्थरों के शहर में सपना सजा नया,
कहें दीपक बापु
उस्ताद के ओहदे पर बैठे लोगों ने
सिखाई केवल मतलबपरस्ती,
दिखाई दौलत के दरिया में मस्ती,
अपनी उम्र से अब वह टूटे बालपन की कच्ची माटी में
खिला था गुलशन
उम्र के दौर के साथ मुरझा गया
ख्वाहिशों ने बढ़ाये कदम दिल में
पत्थरों के शहर में सपना सजा नया,
कहें दीपक बापु
उस्ताद के ओहदे पर बैठे लोगों ने
सिखाई केवल मतलबपरस्ती,
दिखाई दौलत के दरिया में मस्ती,
अपनी उम्र से अब वह टूटे
हैं उनके ख्वाब आंखों से रूठे हैं,
अब ताक रहे हैं
जवां शार्गिदों के माटी से बने पत्थर दिल में
कब बहेगी नदी बनकर दया।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Friday, February 1, 2013

दर्द का समंदर सूख गया है-हिन्दी शायरी (dard ka samandar sookh gaya hai-hindi shayri or poem

दर्द का समंदर सूख गया है
आंसुओं की कोई नदी
अब बहकर वहां नहीं आती,
कितना भी दर्दनाक मंजर हो
होठों पर कड़वी
बस यूं ही चली आती।
कहें दीपक बापू
कब तक रोते ज़माने के हाल पर
सभी ने बोये हैं बबूल
आम के लिये मुंह खोले बैठे हैं
स्वाद के लिये ललचाये लोग
चल पड़ते हैं अंधेरी राहों पर
अपनी ही मंजिल की तस्वीर
कभी उनकी आंखों में नहीं आती,
मर गये जज़्बात
सांस भले चलती रहे
पर खुशबू और बदबू  पहचान नहीं पाती।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
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Wednesday, January 23, 2013

इस संसार में मन लगाने के दो सहज साधन हैं, कमाना और परनिंदा करना-हिन्दी चिंत्तन लेख (is sansar mein man lagane ke do sahaj sadhan hain, kamana aur parninda karna)

       आदमी का मन उसे भटकाता है।  थोड़ा है तो आदमी दुःखी है और ज्यादा है तो भी खुश नहीं है। धन, संपदा तथा पद अगर कम है तो आदमी इस बात का प्रयास करता है कि उसमें वृद्धि हो।  यदि वह सफलता के चरमोत्कर्ष है तो वह उसका मन इस  चिंता में घुलता है कि वह किसी भी तरह अपने वैभव की रक्षा  करता रहे।
           कहा जाता है कि दूसरे की दौलत बुद्धिमान को चार गुनी और मूर्ख को सौ गुनी दिखाई देती है।  इसका मतलब यह है कि मायावी संसार बुद्धिमान को भी विचलित करता है भले ही मूर्ख की अपेक्षा उसके तनाव की मात्रा कम हो।  कुछ महानुभाव अच्छा काम करने के इच्छुक हैं तो समय नहीं मिलता और समय मिलता है तो उनका मन नहीं करता।
   एक सज्जन उस दिन अपनी शारीरिक व्याधियों का बखान दूसरे सज्जन से कर  रहे थे।  पैर से शुरु हुए तो सिरदर्द कर ही दम लिया।  दूसरे सज्जन ने कहा-‘‘यार, आप सुबह उठकर घूमा करो। हो सके तो कहीं योग साधना का अभ्यास करो।’’
      पहले सज्जन ने कहा-‘‘कैसे करूं? रात को देर से सोता हूं!  दुकान से से घर दस बजे आता हूं। फिर परिवार के सदस्यों से बात करने में ही दो बज जाते हैं। किसी भी हालत में सुबह आठ बजे से पहले उठ नही सकता।
      दूसरे सज्जन ने कहा-‘‘अब यह तो तुम्हारी समस्या है। बढ़ती  उम्र के साथ शारीरिक व्याधियां बढ़ती ही जायेंगी।  अब तो तरीका यह है कि दुकान से जल्दी आया करो। अपने व्यापार का कुछ जिम्मा अपने लड़के को सौंप दो।  दूसरा उपाय यह है कि रात को जल्दी सोकर सुबह जल्दी उठने का प्रयास करो।  बाहर से घूमकर आओ और चाय के समय परिवार के सदस्यों से बातचीत करो।
      पहले सज्जन ने कहा-‘‘बच्चे को तो मैं इंजीनियरिंग पढ़ा रहा हूं।  मैं नहीं चाहता कि बच्चा व्यापार में आये।  व्यापार की अब कोई इज्जत नहीं बची है। कहीं अच्छी नौकरी मिल जायेगी तो उसकी भी जिंदगी में चमक होगी।’’
         दूसरे सज्जन ने कहा-‘‘अगर बच्चे को इंजीनियर बनाना है तो फिर इतना कमाना किसके लिये? तुम दुकान से जल्दी आ जाया करो।’’
      पहले सज्जन ने कहा-‘‘यह नहीं हो सकता।  भला कोई अपनी कमाई से मुंह कैसे मोड़ सकता है।
         दूसरे सज्जन ने एक तीसरे सज्जन का नाम लेकर कहा-‘‘हम दोनों के ही  एक मित्र ने भी अपनी बच्चे को चिकित्सा शिक्षा के लिये भेजा है। अब वह जल्दी घर आ जाता है। सुबह उठकर उसे उद्यान में घूमने जाते मैंने  कई बार देखा है।’’
         पहले सज्जन ने कहा-‘‘अरे, उसकी क्या बात करते हो? उसकी दुकान इतनी चलती कहां है? उसने अपनी जिंदगी में कमाया ही क्या है? वह मेरे स्तर का नहीं है।  तुम भी किसकी बात लेकर बैठ गये। मैं अपनी बीमारियों के बारे में तुमसे उपाय पूछ रहा हूं और तुम हो कि उसे बढ़ा रहे हो।’
             दूसरे सज्जन ने हंसते हुए कहा-‘‘तुम्हारी बीमारयों का कोई उपाय मेरे पास तो नहीं है।  किसी चिकित्सक के पास जाओ।  मैं तुम्हें गलत सलाह दे बैठा।  दरअसल इस संसार में मन लगाने के लिये दो बढ़िया साधन हैं एक है कमाना दूसरा परनिंदा करना। कुछ लोगों के लिये तीसरा काम है मुफ्त में सलाह देना जिसकी गलती मैं कर ही चुका।’’
          वास्तव में हर आदमी राजनीति, धर्म, अर्थ, फिल्म, साहित्य तथा कला के क्षेत्रों पर स्थित प्रतिष्ठित लोगों को देखकर उन जैसा बनने का विचार तो करता है पर उसके लिये जो निज भावों का त्याग और परिश्रम चाहिये उसे कोई नहीं करना चाहता।  जिन लोगों को प्रतिष्ठत क्षेत्रों में सफलता मिली है उन्होंने पहले अपने समय का कुछ भाग मुफ्त में खर्च किया होता है।  जबकि सामान्य हर आदमी हर पल अपनी सक्रियता का दाम चाहता है। कुछ लोग तो पूरी जिंदगी परिवार के भरण भोषण में इस आशा के साथ गुजार देते है कि वह उनसे फुरसत पाकर कोई रचनात्मक कार्य करेंगे।  हालांकि उन्हें अपने काम के दौरान भी फुरसत मिलती है तो वह उस दौरान दूसरों के दोष निकालकर उसे नष्ट कर देते हैं।  राजनीति, धर्म, अर्थ, फिल्म, साहित्य तथा कला के क्षेत्र में प्रतिष्ठत लोगों के बारे में आमजन में यह भावना रहती है कि वह तो जन्मजात विरासत के कारण बने हैं।  सच बात तो यह है कि हमारे समाज में अध्यात्म ज्ञान से लोगों की दूरी बढ़ती जा रही है।  अनेक लोगों ने अपने आसपास सुविधाओं का इस कदर संग्रह कर लिया है कि उन्हें अपने पांव पर चलना भी बदनामी का विषय लगता है।  लोग परोपकार करना तो एकदम मूर्खता मानते हैं  इसी कारण एक दूसरे की प्रशंसा करने की बजाय निंदा कर अपनी श्रेष्ठता साबित करते हैं। दूसरे को दोष गिनाते हैं ताकि अपने को श्रेष्ठ साबित कर सकें।  रचनात्मक प्रवृत्तियों से परे लोगों के पास दो ही काम सहज रहे गये हैं कि एक अपने स्वार्थ की पूर्ति दूसरा परनिंदा करना।
         रुग्ण हो चुके समाज में कुछ लोग ऐसे हैं जो स्वयं अध्यात्म ज्ञान के साधक हैं पर सांसरिक विषयों से संबंध रखने की बाध्यता की वजह से दूसरों के अज्ञान के दोष को सहजता से झेलते हैं।  यही एक तरीका भी है।  अगर आप योग, ज्ञान, ध्यान और भक्ति साधक हैं तो दूसरों के दोषों को अनदेखा करें।  अब लोगों के सहिष्णुता का भाव कम हो गया है। थोड़ी आलोचना पर लोग बौखला जाते है।  पैसे, पद और प्रतिष्ठा से सराबोर लोगों के पास फटकना भी अब खतरनाक लगता है।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Sunday, December 30, 2012

अशिष्य को उपदेश देना व्यर्थ-हिन्दी सामाजिक लेख एंव चिंत्तन (ashishya ki updesh dena vyarth-hindi social article evn thought)

              हमारे देश में अंग्रेजों ने राज्य किया। वह चले गये पर अपने पीछे कुछ अपने अनुजनुमा-यानि ऐसे भारतीय जो उनकी संस्कृति को अत्यंत वैज्ञानिक मानते है-को यहीं छोड़ गये। इन्हीं अनुजों ने भारत में उनकी संस्कृति का विकास इस तरह किया कि पूरा देश ही उनकी चपेट में आ गया है।  ग्रामीण क्षेत्र भले बचे हुए हों  पर शहरी क्षेत्र तो पूरी तरह इस संस्कृति की चपेट में आ गये हैं। अंग्रेजी संस्कृति की सबसे बड़ी खूबी यह है कि हमेशा ही बड़ी बड़ी बातें करो, बिना पूछे ज्ञान दो। हर विषय पर बोलो।  विज्ञान में पढ़े लोग सामाजिक विषय पर बोलते हैं और समाजशास्त्र पढ़े लोग विज्ञान में अपना ज्ञान बघारते हैं।  मजे की बात यह है कि इस देश में राजनीति शास्त्र बहुत कम लोगों ने पढ़ा होगा पर देश की हालत पर जगह जगह चर्चा होती मिल जायेगी।
      देश में कहीं बड़ा हादसा हो या महिलाओं के विरुद्ध अनाचार की घटना टीवी चैनलों पर बड़े बड़े विद्वान बहस करने आते हैं। उन्हें बोलना है इसलिये बोलते हैं। टीवी चैनल वालों के कर्णधारों को  बड़े शहरों में रहने वाले इन पेशेवर बुद्धिजीवियों की शिक्षा का पता होता है पर उनकी धारणा शक्ति का ज्ञान नहीं होता।  पता कौन करेगा? हमारे देश में कमाने की प्रवृत्ति तो सभी में है पर व्यवसायिकतता का अभाव है। व्यवसायिक भाव का मतलब यह है कि जिस काम से धन कमाना हो उसे पूरे ज्ञान के साथ पूर्ण किया जाये।  फिल्म, टीवी, पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में केवल सतही ज्ञान वालों को आगे बढ़ने का अवसर मिल रहा है इसलिये अधिक कला कौशल की आशा करना व्यर्थ दिखता है।
      दरअसल अंग्रेजी संस्कृति ने देश में खान पान, रहन सहन और आचार विचार में जो बदलाव किया है उससे धन कमाने के नये स्त्रोतों का सृजन हुआ जरूर है पर काम करने का नया तरीका कोई सीख नहीं पाया। मनोवृत्तियां पुरानी हैं अंग्रेज अपना काम पूरी लगन के साथ व्यवसायिक प्रवृत्ति से करते हैं।  जबकि भारत में काम किसी भी तरह कर पैसा कमाना है, यही लक्ष्य रहता है। इस प्रवृत्ति की वजह से हमारे देश में प्रबंध कौशल का अभाव कहीं भी किसी क्षेत्र में देखा जा सकता है। सेठ जैसे हैं वैसे ही कर्मचारी हैं। सेठों को ज्ञान नहीं कि अलग अलग विषयों मे श्रेष्ठता क्या होती है तो कर्मचारियों को भी क्या पड़ी है कि विशेषज्ञता प्राप्त कर उनकी चाकरी करें।
विदुर नीति में कहा गया है कि
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तत्वज्ञं सर्वभूतानां योगज्ञः सर्वकर्मणाम्।
उपायज्ञो मनुष्याणां नर पण्डित उच्यते।।
     हिन्दी में भावार्थ-जो मनुष्य संपूर्ण भौतिक पदार्थों का ज्ञान तथा सभी कर्मों का काम करने का तरीका समझता है वह पण्डित कहलाता है।

अशिष्यं शास्ति यो राजन् पश्च शून्यमुपासते।
कदर्य भजते यश्च तमाहुर्मूढचेतासम्
      हिन्दी में भावार्थ-जो अशिष्य को उपदेश देता है, शून्य की उपासना करता है और कृपण का आश्रय लेता है वह मूढ़ चित्त वाला कहलाता है।
          यही कारण है कि प्रचार माध्यमों में मनोरंजन के साथ रुदन भी एक व्यापार का हिस्सा बन गया है।  अभी हाल में दिल्ली में घटित एक सामूहिक घटना पर प्रचार माध्यमोें में हो हल्ला मचा।  इसमें कोई संदेह नहीं है कि देश में नारियों के प्रति अपराधों की घटनायें बढ़ गयी हैं मगर जिस तरह राजधानी में घटित इस घटना को प्रतीक बनाकर सभी जगह बहस गयी वह हैरान करने वाली थी।  घटना यह थी एक बस में एक लड़का और लड़की चढ़़े। बस में मौजूद छह लोगों ने लड़के को घायल कर लड़की के साथ बलात्कार किया। इतना ही नहीं उसके बाद लड़की को इस तरह मारा कि वह मर ही जाये।  यह बलात्कार की घटना थी पर सामान्य नहीं थी। यह नारी अत्याचर से जुड़ी तो थी पर इसमें व्यवस्था संबंधी दोष भी जिम्मेदार थे।  आमतौर से सामाजिक विशेषज्ञ यह बताते हैं कि नारियों के प्रति 99 प्रतिशत अपराधों में उनके निज संपर्क में रहने वाले लोग जिम्मेदार होते हैं। वाकई यह समाज से जुड़ा विषय है पर जिस तरह बस में अनजान लड़कों ने यह अपराध किया वह व्यवस्था संबंधी अनेक प्रश्न खड़े करता है पर किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया।
        सभी विद्वान उस समाज को जाग्रत करते रहे जो उनका शिष्य नहीं है।  वह इस घटना से समाज को जगाना चाहते थे।  अपीलें कर रहे थे।  अब यह किसे समझायें कि इस संसार में देव और असुर दो प्रकार के मनुष्य होते हैं।  सामान्य मनुष्य को कानून से डर लगता है इसलिये वह अपराध नहीं करता। उससे नारियों पर अनाचार करने की  अपील करने की आवश्यकता भी नहीं है मगर जिनकी प्रवृत्तियां आसुरी हैं वह आग्रहों से नहीं दंड से डराये जा सकते हैं। न मानने पर दंडित किये जा सकते हैं।
        अनेक विशेषज्ञ  तो इस घटना के प्रचार से इतना डर गये कि देश में पहले ही फैशन की तरह प्रचलित कन्या भ्रुण हत्या अधिक बढ़ न जाये।  अभी तक तो यह स्थिति है कि पहली संतान के रूप में बेटी होने तक सामान्य लोग स्वीकार कर लेते हैं मगर अगर इस तरह अनजान लोगों से लड़कियों के लिये खतरे बढ़े तो हो सकता है कि यह सीमा भी टूट जाये।  ऐसे में लड़के और लड़कियों का अनुपात संतुलन अधिक बिगड़ सकता है।
      बहरहाल ऐसी अनेक घटनायें हैं जिस पर कथित लोग रटी रटायी बातें करते हैं।  जहां अपराध हों पर वहां समाज क्या कर लेगा? समाज पर नियंत्रण के लिये तो राज्य व्यवसथा बनी है।  अगर समाज में अपराधों की स्थिति शून्य हो जाये तो राज्य व्यवस्था की आवश्यकता क्या है? चूंकि इस संसार में देव तथा असुर दोनों का निवास रहना ही है तो अपराध संख्या शून्य नहीं हो सकती। हमारे बुद्धिजीवी चाहे कितना भी जोर लगाकर नारे लगाते रहें अपराध शून्य नहीं होंगे पर कम जरूर हो सकते हैं।  समाज कोई एक इकाई नहीं होता। हर व्यक्ति का अपना  अपना  स्वभाव होता है।  उसके अनुसार ही सभी का आचरण अलग अलग हैं। सभी देव नहीं है पर सभी असुर भी नहीं है।  अनियंत्रित व्यक्ति पर अंकुश के लिये ही राज्य व्यवस्था होती है।  राजधानी की इस घटना में राज्य व्यवस्था से प्रथक आर्थिक तथासामाजिक तत्व भी जिम्मेदार थे।  इस प्रकरण में पूरी बात पुलिस पर डालना भी ठीक नहीं लगता।  पुलिस तो व्यवस्था लागू करने वाली अंतिम संस्था है जबकि यह प्रकरण संपूर्ण व्यवस्था के अनेक भागों पर प्रश्न खड़ा करता है। उन पर किसी ने दृष्टिपात नहीं किया। यह प्रमाणित करता है कि अनाधिकार बोलने की छूट केवल मनोरंजन सामग्री बढ़ाने के लिये प्रचार माध्यमों पर मिल ही जाती है।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
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Monday, December 24, 2012

आदमी का दिल और दिमाग-हिन्दी कविता (admi ka dil aur dimag-hindi poem or kavita)

आदमी का दिल और दिमाग-हिन्दी कविता
समाज में चेतना अभियान
कहां से प्रारंभ करें
यहां कोई दुआ
कोई दवा
और कोई दारु के लिये बेकरार है,
अपने शब्दों से किसे  खुश करे
कोई रोटी
कोई कपड़ा
कोई छत पाने के लिये
जंग लड़ने को खड़ा तैयार है।
कहें दीपक बापू
अपनी समस्याओं पर सोचते हुए लोग रोते,
हर पल  चिंताओं में होते,
दिल उठा रहा है
लाचारियों का बोझ
दिमाग में बसा है वही इंसान
जो उनके मतलब का यार है।


हिन्दी साहित्य,समाज,मस्ती,मनोरंजन,hindi sahitya,society

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Sunday, December 2, 2012

भर्तृहरि नीति शतक-मौन रहने का गुण आभूषण की तरह (maun rahana abhushan ki tarah-bhritrihari neeti shatak)

               आदमी का मन  अपनी इंद्रियों के वश में है।  हाथ खाली है तो मन काम करने की सोचता है। पांव बैठे बैठे थक गये हों तो वह चलना चाहता है।  आंखे हमेशा कुछ देखना चाहती हैं। सबसे ज्यादा परेशान करती है
तो वह है मनुष्य की जीभ।  खाते खाते थक जाये तो बोलने के लिये उतावली हो उठती है। उस समय  न मन बुद्धि में विषय सोचता है न कोई उसे विषय सूझता है।  इसलिये चार लोगों में जो विषय उठ जाये उसी पर ही आदमी बोलने लगता है। टीवी पर या अखबार में कोई विषय बोलने के लिये ढूंढ लेता है। कहने का अभिप्राय यह है कि मनुष्य कोई अपना विषय नहीं चुनता बल्कि बाहर से कोई सूझाये तभी बोल पाता है।  ऐसे में आदमी बोलने के लिये बोलता है। जो मन में आये वह तत्कला बोलता है और बुद्धि से काम लेना उसके लिये तब संभव नहीं होता। यही कारण है कि हमारे समाज में सभी एक दूसरे को पीठ पीछ  मूर्ख कहते हैं।
          अगर कोई मौन होकर सामूहिक वार्तालापों में बैठे तो उसकी चिंतन ग्रंथियां जाग्रत हो उठती हैं।  ऐसे में वह अनुभव कर सकता है कि आजकल लोग निरर्थक विषयों पर चर्चा कर समय नष्ट करते हैं।  मौन होकर यही अनुभव किया जा सकता है कि किस तरह लोग अहंकार वश  आत्मप्रवंचना करने के साथ ही अपनी झूठी शक्ति का बखान करते हैं।  सभी मोह में फंसे हैं और दूसरे को भी  वैसे ही जाल में फंसाते हैं।
भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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स्वायत्तमेकांतगुणं विधात्रा विनिर्मितम् छादनज्ञतायाः।
विशेषतः सर्वविदं समाजे विभूषणं मौनपण्डितानाम्।।
           हिन्दी में भावार्थ-विधाता ने स्वतंत्र रहने के लिये एक गुण मौन रहने का सृजन विधाता ने किया है जिसका चाहे जब प्रयोग किया जा सकता है। खासतौर से जब विद्वान समाज में उपस्थित होने का अवसर मिल तब मौन रहने का गुण  एक तरह आभूषण का काम करता है। लोग समझते हैं कि यह भी ज्ञानी है।
अज्ञः सुखमाराध्य सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञः।
ज्ञानलावदुर्विदग्धं ब्रह्माऽप तं नरं न रञ्जयति।।
                हिन्दी में भावार्थ-अज्ञानियों के पास अगर थोड़ी बुद्धि हो तो उसे समझाया जा सकता है पर जिसके पास उसका लेशमात्र अंश भी नहीं है उसे समझाना ब्रह्मा के  बस का भी नहीं है।
               जिन लोगों के पास थोड़ी बहुत बुद्धि है पर ज्ञान नहीं तो उसे समझाया जा सकता है, पर जिन्होंने तय कर लिया है कि वह सबसे बड़े बुद्धिमान है उन्हें समझाना एकदम कठिन है। बुद्धिहीनता अहंकार को जन्म देती है।  उस आदमी के पास स्वार्थों से इतर विषयों में जिज्ञासा में कतई नहीं रहती।  यही बुद्धिहीनता  दैहिक और मानसिक व्याधियों का शिकार बनाती है, ऐसे में कोई मनुष्य अध्यात्मिक दर्शन की तरफ झांकने की सोच भी नहीं सकता।  अध्यात्मिक ज्ञान के बिना कोई मनुष्य जीवन में प्रसन्न नहीं रह सकता यह भी सच है।  मुश्किल यह है कि आदमी मौन नहीं रहना चाहता। वह हर बार अभिव्यक्त होने के लिये लालायित रहता है।  चुप बैठना मौन नहीं होता। मौन का मतलब है समस्त इंद्रियां निष्क्रिय हों और मनुष्य अपनी आत्मा से संपर्क रखे।  सरल दिखने वाला यह काम उन लोगों के लिये कठिन है जिनके पास बुद्धि नहीं है। ज्ञानियों के लिये एक सहज कार्य है,  जिनके पास बुद्धि है उनको कोई समझा भी सकता हैं पर जिनके मन में अहंकार, काम, क्रोध लोभ, लालच और प्रतिष्ठा पाने का मोह ही संसार का सबसे बड़ा विषय है उनसे ज्ञान चर्चा करना ही व्यर्थ है।   
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com
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