आदमी का मन उसे भटकाता है। थोड़ा है तो आदमी दुःखी है और ज्यादा है तो भी खुश नहीं है। धन, संपदा तथा पद अगर कम है तो आदमी इस बात का प्रयास करता है कि उसमें वृद्धि हो। यदि वह सफलता के चरमोत्कर्ष है तो वह उसका मन इस चिंता में घुलता है कि वह किसी भी तरह अपने वैभव की रक्षा करता रहे।
कहा जाता है कि दूसरे की दौलत बुद्धिमान को चार गुनी और मूर्ख को सौ गुनी दिखाई देती है। इसका मतलब यह है कि मायावी संसार बुद्धिमान को भी विचलित करता है भले ही मूर्ख की अपेक्षा उसके तनाव की मात्रा कम हो। कुछ महानुभाव अच्छा काम करने के इच्छुक हैं तो समय नहीं मिलता और समय मिलता है तो उनका मन नहीं करता।
एक सज्जन उस दिन अपनी शारीरिक व्याधियों का बखान दूसरे सज्जन से कर रहे थे। पैर से शुरु हुए तो सिरदर्द कर ही दम लिया। दूसरे सज्जन ने कहा-‘‘यार, आप सुबह उठकर घूमा करो। हो सके तो कहीं योग साधना का अभ्यास करो।’’
पहले सज्जन ने कहा-‘‘कैसे करूं? रात को देर से सोता हूं! दुकान से से घर दस बजे आता हूं। फिर परिवार के सदस्यों से बात करने में ही दो बज जाते हैं। किसी भी हालत में सुबह आठ बजे से पहले उठ नही सकता।
दूसरे सज्जन ने कहा-‘‘अब यह तो तुम्हारी समस्या है। बढ़ती उम्र के साथ शारीरिक व्याधियां बढ़ती ही जायेंगी। अब तो तरीका यह है कि दुकान से जल्दी आया करो। अपने व्यापार का कुछ जिम्मा अपने लड़के को सौंप दो। दूसरा उपाय यह है कि रात को जल्दी सोकर सुबह जल्दी उठने का प्रयास करो। बाहर से घूमकर आओ और चाय के समय परिवार के सदस्यों से बातचीत करो।
पहले सज्जन ने कहा-‘‘बच्चे को तो मैं इंजीनियरिंग पढ़ा रहा हूं। मैं नहीं चाहता कि बच्चा व्यापार में आये। व्यापार की अब कोई इज्जत नहीं बची है। कहीं अच्छी नौकरी मिल जायेगी तो उसकी भी जिंदगी में चमक होगी।’’
दूसरे सज्जन ने कहा-‘‘अगर बच्चे को इंजीनियर बनाना है तो फिर इतना कमाना किसके लिये? तुम दुकान से जल्दी आ जाया करो।’’
पहले सज्जन ने कहा-‘‘यह नहीं हो सकता। भला कोई अपनी कमाई से मुंह कैसे मोड़ सकता है।
दूसरे सज्जन ने एक तीसरे सज्जन का नाम लेकर कहा-‘‘हम दोनों के ही एक मित्र ने भी अपनी बच्चे को चिकित्सा शिक्षा के लिये भेजा है। अब वह जल्दी घर आ जाता है। सुबह उठकर उसे उद्यान में घूमने जाते मैंने कई बार देखा है।’’
पहले सज्जन ने कहा-‘‘अरे, उसकी क्या बात करते हो? उसकी दुकान इतनी चलती कहां है? उसने अपनी जिंदगी में कमाया ही क्या है? वह मेरे स्तर का नहीं है। तुम भी किसकी बात लेकर बैठ गये। मैं अपनी बीमारियों के बारे में तुमसे उपाय पूछ रहा हूं और तुम हो कि उसे बढ़ा रहे हो।’
दूसरे सज्जन ने हंसते हुए कहा-‘‘तुम्हारी बीमारयों का कोई उपाय मेरे पास तो नहीं है। किसी चिकित्सक के पास जाओ। मैं तुम्हें गलत सलाह दे बैठा। दरअसल इस संसार में मन लगाने के लिये दो बढ़िया साधन हैं एक है कमाना दूसरा परनिंदा करना। कुछ लोगों के लिये तीसरा काम है मुफ्त में सलाह देना जिसकी गलती मैं कर ही चुका।’’
वास्तव में हर आदमी राजनीति, धर्म, अर्थ, फिल्म, साहित्य तथा कला के क्षेत्रों पर स्थित प्रतिष्ठित लोगों को देखकर उन जैसा बनने का विचार तो करता है पर उसके लिये जो निज भावों का त्याग और परिश्रम चाहिये उसे कोई नहीं करना चाहता। जिन लोगों को प्रतिष्ठत क्षेत्रों में सफलता मिली है उन्होंने पहले अपने समय का कुछ भाग मुफ्त में खर्च किया होता है। जबकि सामान्य हर आदमी हर पल अपनी सक्रियता का दाम चाहता है। कुछ लोग तो पूरी जिंदगी परिवार के भरण भोषण में इस आशा के साथ गुजार देते है कि वह उनसे फुरसत पाकर कोई रचनात्मक कार्य करेंगे। हालांकि उन्हें अपने काम के दौरान भी फुरसत मिलती है तो वह उस दौरान दूसरों के दोष निकालकर उसे नष्ट कर देते हैं। राजनीति, धर्म, अर्थ, फिल्म, साहित्य तथा कला के क्षेत्र में प्रतिष्ठत लोगों के बारे में आमजन में यह भावना रहती है कि वह तो जन्मजात विरासत के कारण बने हैं। सच बात तो यह है कि हमारे समाज में अध्यात्म ज्ञान से लोगों की दूरी बढ़ती जा रही है। अनेक लोगों ने अपने आसपास सुविधाओं का इस कदर संग्रह कर लिया है कि उन्हें अपने पांव पर चलना भी बदनामी का विषय लगता है। लोग परोपकार करना तो एकदम मूर्खता मानते हैं इसी कारण एक दूसरे की प्रशंसा करने की बजाय निंदा कर अपनी श्रेष्ठता साबित करते हैं। दूसरे को दोष गिनाते हैं ताकि अपने को श्रेष्ठ साबित कर सकें। रचनात्मक प्रवृत्तियों से परे लोगों के पास दो ही काम सहज रहे गये हैं कि एक अपने स्वार्थ की पूर्ति दूसरा परनिंदा करना।
रुग्ण हो चुके समाज में कुछ लोग ऐसे हैं जो स्वयं अध्यात्म ज्ञान के साधक हैं पर सांसरिक विषयों से संबंध रखने की बाध्यता की वजह से दूसरों के अज्ञान के दोष को सहजता से झेलते हैं। यही एक तरीका भी है। अगर आप योग, ज्ञान, ध्यान और भक्ति साधक हैं तो दूसरों के दोषों को अनदेखा करें। अब लोगों के सहिष्णुता का भाव कम हो गया है। थोड़ी आलोचना पर लोग बौखला जाते है। पैसे, पद और प्रतिष्ठा से सराबोर लोगों के पास फटकना भी अब खतरनाक लगता है।