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Tuesday, September 17, 2013

हादसे होते रहेंगे-हिन्दी व्यंग्य कविता



देश में तरक्की बहुत हो गयी है
यह सभी कहेंगे,
मगर सड़कें संकरी है
कारें बहुत हैं
इसलिये हादसे होते रहेंगे,
रुपया बहुत फैला है बाज़ार में
मगर दौलत वाले कम हैं,
इसलिये लूटने वाले भी
उनका बोझ हल्का कर
स्वयं ढोते रहेंगे।
कहें दीपक बापू
टूटता नहीं तिलस्म कभी माया का,
पत्थर पर पांव रखकर
उस सोने का पीछा करते हैं लोग
जो न कभी दिल भरता
न काम करता कोई काया का,
फरिश्ते पी गये सारा अमृत
इंसानों ने शराब को संस्कार  बना लिया,
अपनी जिदगी से बेजार हो गये लोगों ने
मनोरंजन के लिये
सर्वशक्तिमान की आराधना को
खाली समय
पढ़ने का किस्सा बना लिया,
बदहवास और मदहोश लोग
आकाश में उड़ने की चाहत लिये
जमीन पर यूं ही गिरते रहेंगे।
----------------

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com
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Wednesday, August 7, 2013

यह बस्ती-हिन्दी कविता




जरूरत का सामान महंगा है
गैर जरूरी है
इसलिये जिंदगी सस्ती है।
देश  हो या देवता की
सच्ची भक्ति करने वालों को पूछता कौन है
जिनके काले चेहरे पर लगी सफेद क्रीम
चाल जिनकी आवारा है
चरित्र पर लगे हैं दाग
उनकी रही हमेशा मस्ती है।
कहें दीपक बापू
दर्द नहीं सीने में जिनके
प्याज से आंखों में आंसू वही लाते हैं,
मर गया है जमीर जिनका
आकाओं के लिये फरिश्तों की तरह
गीत वही गाते है
कदम नहीं पड़ते कभी जमीन पर
जमाने के साथ चलने का दावा करने वालों से
भरी यह बस्ती है।
 
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh
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Saturday, May 25, 2013

क्रिकेट मैचों में फिक्सिंग का भूत फिर बाहर आया-हिन्दी व्यंग्य लेख (cricket matchon mein fising ka bhoot fir samne aaya-hind vyangya lekh,satire article on cricket match)



       मामला अगर रुपये को हो तो कोई भी बिक सकता है।  कोई गेंद बेचकर गेंद फैक सकता है तो कोई बिककर बल्ला रोक सकता है।  कैच पकड़ने के लिये मेहनत होती है पर छोड़ने के लिये केवल हाथ रोकना है इसलिये कोई भी उंगलियों में फंसी गेंद टपका सकता है।  बल्ले से गेंद लगने पर एक सिरे से दूसरे सिरे पर खिलाड़ी पहुंचते ही हैं पर जिसने कदम बेचे हों वह रन आउट भी हो सकता है। जीतना सहज है पर आत्मसम्मान जिसने बेचा हो वह हार भी सकता है। क्रिकेट में कई ऐसे मैच भी सुनने को मिले हैं जिसमें आपस में जीत के लिये जूझती दिख रही टीमें वास्तव में हार के लिये खेल रही थीं।  उन्होंने अपनी हार बेची थी इसलिये जीतकर अपनी रकम खोना नहीं चाहती थीं।
         गेंद और बल्ले से खेले जाने वाले क्रिकेट को प्रचार की जरूरत नहीं है पर उसके विकास के नाम पर चलता हुआ खेल सट्टे की तरफ मुड़ गया है। कुछ लोग कह रहे हैं कि क्रिकेट बदनाम हो रहा है। एक दम हास्यास्पद बात है।  दरअसल क्रिकेट के नाम पर चल रही संस्थायें बदनाम हो रही है। उनकी साख बर्बाद हो रही है। यह संस्थायें केवल सार्वजनिक मैचों का आयोजन कर सकती हैं पर गली मोहल्लों में चलने वाले खेल पर उनका कोई नियंत्रण नही है। अगर इस तरह की संस्थाओं से खेल चलते तो कबड्डी खेलते हुए लोग कहीं नहीं दिखते।  अनेक मैदानों और पार्कों में कबड्डी खेलते हुए लोग मिल जायेंगे।  हमारा मानना है कि भारत में अनेक संस्थायें खेलों को बर्बाद ही अधिक करती हैं।  हाकी की बात करें। जब तक सामान्य प्राकृतिक मैदान पर हाकी खेली जाती थी तब तक सभी जगह उसके मैच होते थे।  दूसरे देशों से संपर्क बनाये रखने के प्रयास में हॉकी को कृत्रिम मैदान पर लाया गया।  उसके लिये विशेष मैदान होना जरूरी है जिनका हमारे देश में हर आम जगह पर होना संभव नहीं है। हॉकी बर्बाद हो गयी। इससे तो अच्छा होता तो विश्व स्तर पर हमारा देश हॉकी खेलना छोड़ देता तब लोग इसके पुराने संस्करण को स्वयं ही इसे ढोते रहते जैसे कबड़डी और खोखो को ढो रहे हैं।  विश्व के हाकी खेल नक्शे परं भारत का नाम नहीं होता पर भारत में हाकी खेली जा रही होती।
       बहरहाल क्रिकेट में हारजीत का रोमांच अब खत्म हो गया है।  भारतीय प्रचार माध्यम जबरन इसे जनता पर थोप रहे हैं। सट्टा और फिक्सिंग की खबरों में अब कोई नयापन नहीं है। सभी जानते हैं इंडियन प्रीमियर लीग में पैसे का खेल चल रहा है।  क्रिकेट खेल एक मंच की तरह है और खिलाड़ी उसमें बेजान पुतले बन गये हैं। मुख्य बात यह कि क्रिकेट खेल के अंतर्राष्ट्रीय मैचों होने वाला हार्दिक रोमांच इसमें अब  नहीं है। जब था तब मजा लिया। बाद में पता लगा कि वह भी नकली खेल था।  बड़े बड़े खिलाड़ियों के नाम फिक्सिंग में आये। एक खिलाड़ी ने तो अपने कप्तान पर उस पाकिस्तान के विरुद्ध कमतर प्रदर्शन करने के लिये दबाव डाला जिसे दुश्मन देश समझा जाता है।  उस समय भी इसी तरह फिक्सिंग की खबरों का क्रम चला। तब खेल में रोमांच के साथ ही देशभक्ति के भाव पर भी विचार करना पड़ा।  यह प्रचार माध्यम अपने बाज़ार के सौदागरों के लिये चाहे जब खेल के रोमांच को बिना देशभक्ति के भाव के बेचते हैं और चाहे जब उसमें से उसे निकाल देते हैं। ठीक उसी तरह जैसे दही की लस्सी में चाहे नमक मिलाओ या शक्कर ग्राहक तो पियेगा ही, झकमारकर पियेगा।
      जब क्रिकेट के रोमांच का भ्रम टूटा तब हृदय में  देशभक्ति के तत्व भी विचलित हुए।  उस समय हालत यह हो गयी थी कि हम सोचते थे कि क्या फिल्मी गानो को सुनना और उन पर झूमना ही देश भक्ति है? दूसरी बात यह भी कि हम देशभक्ति दिखायें तो किस तरह? लोग कहते हैं कि देशभक्त बनो।  क्या बीसीसीआई की टीम को भारत का प्रतिनिधि मानकर  उसकी टीम की जीत पर नाचना ही देशभक्ति का प्रमाण है? उस समय कुछ स्थानों पर पाकिस्तान की जीत पर सांप्रदायिक तनाव होने की संभावनाओं की बात सामने आती थी।  समुदाय विशेष के लोगो को संदेह की नज़र से देखा जाता था। खिलाड़ी के कप्तान के आरोप के बाद हमें लगा कि ऐसी खबरें भी प्रायोजित थी ताकि दूसरे समुदाय के लोग धर्म के नाम ही सही इस खेल को देखते रहें।  यह बाज़ार और प्रचार समूहों का संयुक्त प्रयास था।  अब जब बीसीसीआई को आरटीआई कानून से बाहर रखने के लिये उसके निजत्व का हवाला दिया जा रहा है तब मन ही मन यह बात तो उठ ही  सकती है कि हम अपने अंदर किसके लिये देशभक्ति का भाव लाते रहे थे। सबसे बड़ी बात तो यह कि एक तुच्छ खेल को देश का धर्म बताया जा रहा है। यकीनन हमारे जैसे लोग क्रिकेट को तुच्छ ही मानते हैं। केवल समय पास करने वाला खेल जीवन में सब कुछ नहीं हो सकता।
            हमें तो फिक्सिंग की खबरें प्रचार माध्यमों पर देखकर संदेह होता है कि कहीं वह भी तो प्रायोजित तो नहीं है।  कुछ पैदल मार कर शतरंज की बाजी जीतने का दावा कोई खिलाड़ी नहीं करता जब तक वह  को परास्त न करे।  यहां तो पैदल पकड़ ही क्रिकेट खेल को शुद्ध करने की बात कही जा रही है। एक बात बता दें कि शतरंज मे राजा मरता नहीं है, वह फसता हैं। हमने क्रिकेट खेलते थे और अब  शतरंज खेलते है। मालुम है जब फिक्सिंग का राजा नहीं फंसेगा तब कोई शुचिता नहीं आ पायेगी। तेरह साल पहले भी फिक्सिंग की खबरें आयी थीं तब दिल टूटा था।  अब जो खबरे आ रही हैं उसमें हम शायद दिलचस्पी नहीं लेते अगर उसमें जांच एजेंसियां और पुलिस शामिल नही होती।  पहले मामला ऊपर ही खत्म हो गया पर इस बात पुलिस राशन पानी लेकर फिक्सरों के पीछे पड़ी है। पहले बुकी जाते थे अब खिलाड़ी भी जेल गये हैं। भद्र लोग पर्दे के पीछे जमकर अभद्रता करते रहे। पुलिस का खौफ नहीं था।  अब पुलिस वाले घुसे हैं जिनके मारे अच्छे खासे की पेंट ढीली हो जाती हैं।  आमतौर से परंपरागत अपराध करने वाले मजबूत होते है जिनके साथ पुलिस सख्ती से पेश आकर ही अपराध उगलवा पाती है मगर क्रिकेट के भद्र पुरुषों के साथ पुलिस को अधिक प्रयास करने की आवश्यकता नहीं है।  पुलिस उनके साथ सख्ती कर भी नहीं सकती। धनवानों की सहनशक्ति कम होती है और पुलिस यह जानती है। एक डंडा देखकर ही भद्र पुरुष सब उगले दे रहे हैं।  क्रिकेट को भद्रजनों का खेल कहा जाता रहा है इसलिये पूरा देश इसमें लगा रहा। अब इसकी नाम पर पर्दे के पीछे खेले जाने वाले अभद्र खेल को देखकर सभी सोचने को मजबूर होंगे।  दूसरी बात यह कि भद्र खेल के नियंत्रणकर्ता अभी तक बेफिक्र थे कि कोई पुलिस वाला उनके घर में नहीं झांकेगा।  अब यह  भ्रम टूट गया है। लोगों को लगता है कि अब भी कुछ नहीं होगा मगर  हमारा मानना है कि पुलिस की घुसपैठ का प्रभाव पड़ेगा।  फिर जिस तरह पुलिस के हवाले से समाचार आये हैं कि किस तरह एक खिलाड़ी को हर दो घंटे में नींद से उठाती हैं।  उसे सोने नहीं देती है। न पकड़े गये राज्य रूपी भद्र लोगों की नींद हराम करने के लिये ऐसी खबरें पर्याप्त हैं। यह भद्र पुरुष प्रकटतः चाहे जो कुंछ कहें मगर कहीं न कहीं पुलिस का खौफ उनके दिमाग में हैं और आगे भी बना रहेगा।  तब संभव है कि फिक्सिंग पूरी तरह खत्म न हो पर उसे बड़े स्तर पर संरक्षण देना मुश्किल होगा।  पुलिस ने कुछ खिलाड़ियों पर फिक्सिंग के नहीं वरन् सट्टेबाजी के साथ ही धोखाधड़ी का आरोप लगाया है। एक धारा के अनुसार इस मामले में उनको उम्रकैद तक हो सकती है। हालांकि न्यायालय ने पुलिस को इसके लिये लताड़ा है पर भद्र पुरुषों के लिये पुलिस का व्यवहार ही डरावना है और यह डर इतना अधिक होगा कि उन्हें यह बात याद भी नहीं रहेगी कि न्यायालय में पुलिस का फटकारा है। ऐसे में भद्र पुरुष अब इस धंधे  को आगे कितना जारी रख पायेंगे, पता नहीं।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
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Friday, February 1, 2013

दर्द का समंदर सूख गया है-हिन्दी शायरी (dard ka samandar sookh gaya hai-hindi shayri or poem

दर्द का समंदर सूख गया है
आंसुओं की कोई नदी
अब बहकर वहां नहीं आती,
कितना भी दर्दनाक मंजर हो
होठों पर कड़वी
बस यूं ही चली आती।
कहें दीपक बापू
कब तक रोते ज़माने के हाल पर
सभी ने बोये हैं बबूल
आम के लिये मुंह खोले बैठे हैं
स्वाद के लिये ललचाये लोग
चल पड़ते हैं अंधेरी राहों पर
अपनी ही मंजिल की तस्वीर
कभी उनकी आंखों में नहीं आती,
मर गये जज़्बात
सांस भले चलती रहे
पर खुशबू और बदबू  पहचान नहीं पाती।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Friday, January 11, 2013

खबर और बहस के बीच सुंदरियां-हिन्दी व्यंग्य कविता (khabar aur bahas ke beech sundriyan-hindi vyangya kavita,beuty queen news and disscusion-hindi satire poem)

कुछ खबरें खुशी में झुलाती हैं,
कुछ खबरें जोर से रुलाती हैं।
कमबख्त!
किस पर देर तक गौर करें
अपनी खूंखार असलियतें भी
जल्दी से अपनी तरफ बुलाती हैं।
कहें दीपक बापू
खबरचियों का धंधा है
लोगों के जज़्बातों से खेलना,
कभी होठों में हंसी लाने की कोशिश होती
कभी शुरु होता आंखों में आंसु पेलना,
बिकने के लिये बाज़ार में बहुत सामान है,
ग्राहक खुश है खरीद कर शान में,
हमारे जज़्बातों से न कर पाये खिलवाड़ कोई
इसलिये फेर लेते हैं नज़रे
विज्ञापनों में दिखने वाली सुंदरियों से
खबर और बहस के बीच कंपनियों के
उत्पाद बिकवाने के लिये
अपने हाथ में झुलाती हैं।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Monday, December 24, 2012

आदमी का दिल और दिमाग-हिन्दी कविता (admi ka dil aur dimag-hindi poem or kavita)

आदमी का दिल और दिमाग-हिन्दी कविता
समाज में चेतना अभियान
कहां से प्रारंभ करें
यहां कोई दुआ
कोई दवा
और कोई दारु के लिये बेकरार है,
अपने शब्दों से किसे  खुश करे
कोई रोटी
कोई कपड़ा
कोई छत पाने के लिये
जंग लड़ने को खड़ा तैयार है।
कहें दीपक बापू
अपनी समस्याओं पर सोचते हुए लोग रोते,
हर पल  चिंताओं में होते,
दिल उठा रहा है
लाचारियों का बोझ
दिमाग में बसा है वही इंसान
जो उनके मतलब का यार है।


हिन्दी साहित्य,समाज,मस्ती,मनोरंजन,hindi sahitya,society

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Monday, April 2, 2012

पहले अपने को सिखायें-हिन्दी कविता (pahale ko sikhayen-hindi kaivta or poem)

आओ
जो भटके हैं उनको रास्ता दिखायें,
ऊंचे इंसानों में अपना नाम लिखायें
यकीन करो
कोई हमारी बात मानेगा नहीं
जिद्दी है जमाना
डूब जायेगा हर कोई अपनी
मतलब परस्ती के कीचड़ में
पर कोई समझना नहीं चाहेगा
जिंदगी जीना उसूलों के साथ सरल है
अलबत्ता साफ नीयत जरूरी है
यह हम अपने को सिखायें।
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Tuesday, March 13, 2012

असलियत किसी को न समझाना-हिन्दी कविता (asliyat kisee ko n samjhana-hindi kavita or poem)

अपनी आँखों से जो देखा है
वह सच किसी को न बताना,
अपने कानों से जो सुना नहीं
वह स्वर किसी को समझाना,
अपने दिमाग में भले ही पालो सपने
वह किसी के सामने न सजाना।
कहें दीपक बापू
जमाने के लोग अपने जिस्म का बोझ उठाने से लाचार है,
खरीदने वहाँ खड़े जाते, जहां खुशी का लगता बाज़ार है,
मरे जज़्बातों में हमदर्दी
ढूँढने में अपना वक्त गंवाना।
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Wednesday, February 29, 2012

ज़िंदगी के आसरे-हिन्दी कविता (zindagi ke aasre-hindi poem)

हम तो कई बार टूटे और बिखरे
मगर आकाश के मालिक ने
फिर ज़मीन पर खड़ा कर दिया
उसकी कृपा पर
अपनी ज़िंदगी के सारे आसरे
बस यूं ही पार लगाएँगे।
कहें दीपक बापू
तुम अपनी फिक्र करो
अपने आसरे जिन कंधों पर
तुमने टिकाये हैं
सांसें चलना वह तुम्हारी बंद कर देंगे
मगर कब्र तक साथ नहीं आएंगे।
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Thursday, February 16, 2012

अपनी औकात-हिन्दी शायरी (apni aukat-hindi shayri)

गफलत में हम कुछ यूं रहे कि
जिन पर भरोसा किया
वह उसे निभाना जानते नहीं थे,
दूसरों से उम्मीद करते वह
पर खुद भी वफा निभाएँ यह
कभी मानते नहीं थे।
कहें दीपक बापू
लोगों के कायदे
अपने मतलब से बदल जाते हैं,
चालक ढूंढें अपने फायदे
मूर्ख हाथ मलते रह जाते हैं,
जिंदगी में दोस्ती और रिश्ते भी
सौदे की तरह जिये जाते हैं
जब तक हमारे जज़्बात कुचले न गए
दूसरों की क्या
हम अपनी औकात जानते नहीं थे।
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Thursday, February 9, 2012

टूटे बोल-हिन्दी शायरियाँ (toote bol-hindi shayriyan)

खत अब हम कहाँ लिखते हैं,
जज़्बातों को फोन पर
बस यूं ही फेंकते दिखते हैं।
कहें दीपक बापू
बोलने में बह गया
ख्यालों का दरिया
खाली खोपड़ी में
लफ्जों का पड़ गया है अकाल
आवाज़ों में टूटे बोल जोड़ते दिखते हैं।
----------------
इस जहां में
लोगों से क्या बात करें
पहले अपनी रूह की तो सुन लें।

कहें दीपक बापू
बात का बतंगड़ बन जाता है
मज़े की महफिलों में
दूसरों की बातें सुनकर
हैरान या परेशान हों
बेहतर हैं लुत्फ उठाएँ
अपने दिल के अंदर ही
जिन्हें खुद सुन सकें
उन लफ्जों का जाल बुन लें।
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Saturday, January 28, 2012

किकेट मैच के लिये पांच गुना शक्ति वाला च्यवनप्राश लायें-लघु हिन्दी व्यंग्य (cricket match and chyavanprash-hindi vyangya or satire)

           च्यवनप्राश में तीन गुना शक्ति होती है-ऐसा कहना है बीसीसीआई क्रिकेट टीम के कप्तान का! अब इस तीन गुना शक्ति का पैमाना नापा जाये तो उसके सेवन से तीन दिन तक ही क्रिकेट खेलने लायक ही हो सकती है। गनीमत है कप्तान ने च्यवनप्राश के विज्ञापन में यह नहीं कहा कि इस च्यवनप्राश के सेवन से पांच गुना शक्ति मिलती है। वरना कंपनी पर उपभोक्ता फोरम में मुकदमा भी हो सकता था। फर्जी प्रचार से वस्तुऐं बेचना व्यापार की दृष्टि से अनुचित माना जाता है।
           बीसीसीआई की क्रिकेट टीम (indian cricket team and his australia tour)विदेश में पांच दिन के मैच खेलने  के लिये मैदान पर उतरती है पर तीन दिन में निपट जाती है। देश के शेर बाहर ढेर हो जाते हैं। सामने वाली टीम के तीन दिन में पांच विकेट जाते हैं और इनके बीस विकेट ढह जाते हैं। क्या करें? एक दिन खेलने की क्षमता है, च्यवनप्राश खाने पर तीन गुना ही शक्ति तो बढ़ती है। बाकी दो दिन कहां से दम दिखायें? इससे अच्छा है तो दो दिन मिलने पर तैराकी करें! क्लब में जायें। जश्न मनायें कि तीन दिन खेल लिये।
         च्यवनप्राश के नायक कप्तान ने तो यहां तक कह दिया है कि टेस्ट अब बंद होना चाहिये। उसकी खूब आलोचना हो रही है। हमारे समझ में नहीं आया कि उसका दोष क्या है? सब जानते हैं कि हमारे देश में शक्तिवर्द्धक के नाम पर च्यवनप्राश ही एक चीज है। अगर उसमें तीन गुना शक्ति आती है तो खिलाड़ी से अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि पांच गुना शक्ति अर्जित करे। इधर बीसीसीआई की क्रिकेट टीम की पांच दिन नहीं चली तो देश में हायतौबा मच गया है। यह हायतौबा मचाने वाले वह पुराने क्रिकेटर हैं जो विज्ञापनों के बोझ तले नहीं दबे। उनको नहीं मालुम कि अधिक धन का बोझ उठाना भी हरेक आदमी के बूते का काम नहीं है। शुद्ध रूप से क्रिकेट एक व्यवसाय है। टीम में वही खिलाड़ी होते हैं जिनके पास कंपनियों के विज्ञापन है। कंपनियां ही इस खेल की असली स्वामी है सामने भले ही कोई भी चेहरा दिखता हो। यही कारण है कि कंपनियों के चहेते खिलाड़ियों को टीम से हटाना आसान नहीं है। पुराने हैं तो फिर सवाल ही नहीं है क्योंकि एक नहीं दस दस कंपनियों के विज्ञापनों के नायक होते हैं। मैच के दौरान वही विज्ञापन आते हैं। इन्हीं कपंनियों के बोर्ड मैदान पर दिखते हैं। क्रिकेट सभ्य लोगों का खेल है और सभ्य लोगों के व्यवसाय और खेल कंपनी के बोर्ड तले ही होते हैं।
          बीसीसीआई की क्रिकेट टीम के विदेश में लगातार आठ बार हारने पर देश भर में रोना रहा है पर वहां क्रिकेट खिलाड़ियों को इसकी परवाह नहीं होगी। उनके पास तो इतना समय भी नहीं होगा कि वह हार के बारे में सोचें। मैच के बचे दो दिन वह अपने व्यवसाय की कमाई का हिसाब किताब जांच रहे होंगे। नये विज्ञापनों का इंतजार कर रहे होंगे। कंपनियां भी आश्वस्त होंगी यह सोचकर कि कोई बात नहीं देश के शेर है फिर यहां करिश्मा दिखाकर लोगों का गम मिटा देंगे। वैसे ही कहा जाता है कि जनता की याद्दाश्त कमजोर होती है।
        बहरहाल कुछ लोग बीसीसीआई की क्रिकेट टीम की दुर्दशा के लिये पूरे संगठन को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। हम इस राय के खिलाफ हैं। इससे अच्छा है तो यह है कि ऐसा च्यवनप्राश बनवाना चाहिए जो पांच गुना शक्ति दे सके। इसके लिये अपने यहां अनेक योग भोग चिकित्सक हैं उनकी सहायता ली जा सकती है। क्या इसकी दुगुनी खुराक लेकर छह गुना शक्ति पाई जा सकती है, इस विषय पर भी अनुंसधान करना चाहिए। बीसीसीआई की क्रिकेट टीम के कप्तान ने तो पूरी तरह से ईमानदारी से अपना काम किया है। उसने एक दिवसीय क्रिकेट में जमकर खेला है और च्यवनप्राश के सेवन से तीन गुना शक्ति प्राप्त कर तीन दिन तक पांच दिवसीय क्रिकेट में अपना किला लड़ाया है। अब यह अपने देश के आयुर्वेद विशेषज्ञों की गलती है कि उन्होंने पांच या छह गुना शक्ति वाला च्यवनप्राश नहीं बनाया जिसका विज्ञापन उसे दिया जाता। उससे आय पांच गुना होती तो खेलने का उत्साह भी उतना ही बढ़ता। जब नये संदर्भों में भारतीय अध्यात्म का नये तरह से विश्लेषण हो रहे हैं तो आयुर्वेद को भी इससे पीछे नहीं रहना चाहिए। बिचारे खिलाड़ियों को पांच या छह गुना शक्ति बढ़ाने वाला च्यवनप्राश नहीं दिया गया तो वह क्या करते? सो इस हार को भी व्यंग्य का हाजमोला खाकर हज़म कर लो।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

Friday, January 20, 2012

‘द सैटेनिक वर्सेज’ के लेखक सलमान रुशदी और जयपुर साहित्य सम्मेलन-हिन्दी लेख The Satanic Verses, Salman Rushdie and jaypur sahitya sammelan-hindi lekh article)

          द सैटेनिक वर्सेज (The Satanic Verses) के लेखक सलमान रुश्दी (Salman Rushdie) हमेशा विवादों में रहे है। अपने ही धर्म के प्रतिकूल किताब ‘‘ द सेटेनिक वर्सेज’’ लिखने वाले लेखक सलमान रुश्दी ने इसके पहले और बाद में अनेक किताबें लिखीं पर उनकी पहचान हमेशा इसी किताब की वजह से रही। हालांकि इस विवादास्पद किताब के बाद उनकी चर्चा अन्य किताबों की वजह से नहीं बल्कि बार शादियां कर बीवियां बदलने की वजह से होती रही है। हम जैसे अंग्रेजी से अनभिज्ञ लोगों को यह तो पता नहीं कि उनकी रचनाओं का स्तर क्या है पर कुछ विशेषज्ञ उनको उच्च रचनाकार नहीं मानते। अनेक अंग्रेजी विशेषज्ञों ने तो यहां तक लिखा था कि रुशदी की सैटनिक वर्सेज भी अंग्रेजी भाषा और शिल्प की दृष्टि से कोई उत्कृष्ट रचना नहीं है, अगर उन्होंने अपने धर्म के प्रतिकूल टिप्पणियां नहीं की होती और उनको तूल नहीं दिया जाता तो शायद ही कोई इस किताब को जानता।
         हम जब बाजार और प्रचार के संयुक्त प्रयासों को ध्यान से देखें तो यह आसानी से समझा जा सकता है कि सलमान रुशदी ही क्या अनेक रचनाकार केवल इसलिये लोकप्रिय होते हैं क्योंकि प्रकाशक ऐसे प्रचार की व्यवस्था करते है ताकि उनकी किताबें बिकें। अपने विवाद के कारण ही सैटेनिक वर्सेज अनेक भाषाओं में अनुवादित होकर बिकी। भारत में इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया इस कारण कभी इसका अन्य भाषा में प्रकाशन नहीं हुआ। इतना हीं नहीं किसी समाचार पत्र या पत्रिका ने इसके अंशों के प्रकाशन का साहस भी नहीं किया-कम से कम कम हिन्दी वालों में तो ऐसा साहस नहीं दिखा। इतना ही नहीं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के समर्थन में अनेक अवसर भीड़ जुटाने वालों में भी कोई ऐसा नहीं दिखा जिसने इस पर से प्रतिबंध हटाने की मांग की हो। हमारे लिये यह भूली बिसरी किताब हो गयी है।
         इधर कहीं  राजस्थान के जयपुर (Jaipur Literature Festival) शहर में साहित्य सम्मेलन हो रहा है। टीवी चैनलों के प्रसारण में वहां रुश्दी की किताब हमने रखी देखी। इसी सम्मेलन दो लोगों ने उसके अंश वाचन का प्रयास भी किया जिनको रोक दिया गया। जयपुर में हो रहे इस सम्मेलन की चर्चा भी इसलिये अधिक हुई क्योंकि उसमें सलमान रुशदी के आने की संभावना थी वरना शायद ही कोई चैनल इसे इस तरह स्थान देता। बहरहाल पता चला कि धमकियों की वजह से सलमान रुशदी जयपुर में नहीं आ रहे बल्कि वीडियो काफ्रेंस से संबोधित करेंगे। ऐसा लगता है कि इस बार भी बाज़ार और प्रचार का कोई फिक्स खेल चल रहा है। इसको नीचे लिखे बिंदुओं के संदर्भ में देखा जा सकता है।
         1. एक तरफ सैटेनिक वर्सेज के अंश पड़ने से दो महानुभावों को रोका जाता है दूसरी तरफ सलमान रुश्दी को इतना महत्व दिया जाता है कि उनके न आने पर उनको वीडियो प्रेस कांफ्रेंस के जरिये संबोधित करेंगे। यह विरोधाभास नहीं तो और क्या है कि जिस लेखक को अपनी विवादास्पद पुस्तक के जरिये प्रसिद्धि के कारण ही इतना बड़ा सम्मान दिया जा रहा है उसी के अंश वाचन पर रोक लग रही है।
       2. दूसरी बात यह कि इस पुस्तक पर देश में प्रतिबंध लगा था वह क्या हट गया है जो इसको प्रदर्शनी में रखा गया। हालांकि टीवी चैनलों पर हमने जो प्रदर्शनी देखी वह जयपुर की है या अन्यत्र जगह ऐसा हुआ है इसकी जानकारी हमें नहीं है। अगर प्रतिबंध नहीं हटा तो इसे भारत नहीं लाया जाना चाहिए था। यह अलग बात है कि हट गया हो पर इसकी विधिवत घोषणा नहीं की गयी हो।
       ऐसा लगता है जयपुर साहित्यकार सम्मेलन में सलमान रुश्दी के नाम के जरिये संभवत अन्य लेखकों को प्रकाशन बाज़ार विश्व में स्थापित करना चाहता है। यह संदेह इसलिये भी होता है क्योंकि सलमान रुश्दी के भारत आगमन की संभावनाओं के चलते ही हमें लगा था कि वह शायद ही आयें। उनके बाज़ार और प्रचार के संपर्क सूत्र उनसे कोई भी न आने का बहाना बनवा देंगे। देखा जाये तो प्रकाशन बाज़ार और प्रचार माध्यम हमेशा विवादास्पद और सनसनी के सहारे अपना काम चलाते हैं जिस कारण हिन्दी क्या किसी भी भाषा में साहित्यक रचनायें न के बराबर हो रही है। संभवतः जयपुर सम्मेलन अपने ही विश्व मे ही क्या उस शहर में ही प्रसिद्धि नहीं पाता जहां यह हो रहा है। सलमान रुश्दी के आने की घोषणा और फिर न आना एक तरह से तयशुदा योजना ही लगती है। आयोजक ने सैटेनिक वर्सेस के अंश पढ़ने से दो लोगों को इसलिये रोका क्योंकि इससे यहां लोग भड़क सकते है तो क्या उनका यह डर नहीं था कि सलममान रुशदी आने पर भी यह हो सकता है। ऐसे में यह शक तो होगा कि यह सब प्रचार के लिए  था।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

Monday, January 9, 2012

नर्क और स्वर्ग में कितनी दूरी-हिन्दी व्यंग्य कविताएँ (narak aur swarg ki doori-hindi vyangya kavitaen or satire poem)

हुकूमत की इज्ज़त करे
हर खास और आम इंसान
यह ज़रूरी है,
कभी दुश्मन का
कभी लुटेरों का खौफ ज़िंदा रखें
बादशाहों की यह मजबूरी है।
कहें दीपक बापू
फरिश्तों और शैतानों में
सदियों से चलता रहा है
यह फिक्सिंग का खेल
छुरी से निकाले कोई
कहीं आदमी श्रद्धा से
निकलवाने पहुँच जाता
अपने खून से तेल,
नहीं जानता कोई
नर्क की स्वर्ग से कितनी दूरी है।
----------------
शैतानों और फरिश्तों के बीच
दिखाने के लिए दुश्मनी का रिश्ता रहा है,
इधर जाये या उधर आसरा ले इंसान
लंबे बयानों में सभी का सोच पिसता रहा है।
कहें दीपक बापू
किसी ने बना लिया लुटेरों का गिरोह
किसी ने थाम लिया हुकूमत का चाबुक
दोनों एक दूसरे को ज़िंदा रखने को मजबूर
बेमतलब है यह सोचना कि
किसके बारे में क्या कहा है।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

Wednesday, December 28, 2011

दिल का झंडाबरदार-हिन्दी शायरियां (Dil ka jhandabardar-hindi shayriyan or poem's)

अपने अपने सभी के इलाके हैं
कोई न कोई कहीं का सरदार है,
डूब हैं सभी अपने घर बचाने के लिये
गलतफहमी में रहे हम कि वह असरदार हैं।
कहें दीपक बापू दोगलापन खून में है इंसानों के
मतलब निकलने तक सभी हमारे तरफदार हैं,
बाज़ार में बिकते मुद्दे पर चर्चा करना बकवास है
खुश वही है जो खुद के दिल का झंडाबरदार है।
---------
अपने जिस्म का पसीना
हमने उनके लिये बहाया
जो केवल दौलत के अहंसानमंद है,
उनसे तारीफ की क्या उम्मीद करना
जिनके ख्याल अपने ही मतलब में बंद हैं
---------------
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

Wednesday, December 14, 2011

दोस्ती का दम-हिन्दी शायरी (dosti ka dam-hindi shayri)

न वह दिल के पास हैं
न उनके कदम कभी हमारे घर की ओर
बढ़ते नज़र आते हैं,
कहें दीपक बापू
उनसे दोस्ती का दम क्या भरें
जिनकी वफा पर लगे ढेर सारे दाग
दिखते हैं जहां को
मगर वह खूबसूरती से
खुद से सच से ही आँखें फेर जाते हैं।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

Monday, November 28, 2011

वॉल मार्ट के आगमन का भय और भारतीय बाज़ार-हिन्दी लेख और एफ डी आई पर चर्चा (wal-mart and indian market-hindi lekh FDI)

        खेरिज किराना व्यापार में विदेशी निवेश लाने के फैसले पर देश में बवाल बचा है और इस पर बहस हो रही है। एक आम लेखक और नागरिक के रूप में हमें इस फैसले के विरोध या समर्थन करने की शक्ति नहीं रखते हैं क्योंकि इस निर्णय तो शिखर पुरुषों को करना होता है। साथ ही चूंकि प्रचार माध्यमों में चर्चा करने में हम समर्थ नहीं है इसलिये अपने ब्लाग पर इसका आम नागरिकों की दृष्टि से विश्लेषण कर रहे हैं। हमने देखा कि आम जनमानस में इस निर्णय की कोई अधिक प्रतिक्रिया नहीं है। इसका कारण यह है कि आम जनमानस समझ नहीं पा रहा है कि आखिर मामला क्या है?
        अगर भारतीय बुद्धिजीवियों की बात की जाये तो उनका अध्ययन भले ही व्यापक होता है जिसके आधार वह तर्क गढ़ लेते हैं पर उनका चिंत्तन अत्यंत सीमित हैं इसलिये अधिक गहन जानकारी उनसे नहीं मिल पाती और उनके तक भी सतही होते हैं। यही अब भी हो रहा है। अगर खेरिज किराने के व्यापार में विदेशी निवेश की बात की जाये तो उस पर बहस अलग होनी चाहिए। अगर मसला संगठित किराना व्यापार ( मॉल या संयुक्त बाज़ार) का है तो वह भी बहस का विषय हो सकता है। जहां तक खेरिज किराना व्यापार में विदेशी निवेश का जो नया फैसला है उसे लेकर अधिक चिंतित होने वाली क्या बात है, यह अभी तक समझ में नहीं आया। दरअसल यह निर्णय हमारी उदारीकरण की उस नीति का इस पर सारे राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक संगठन चल रहे हैं। अगर हम यह मानते हैं कि केवल वाल मार्ट के आने से इस देश के छोटे किराने व्यापारी और किसान तबाह हो जायेंगे तो यह एक भारी भ्रम होगा क्योंकि हम जिन नीतियों पर समाज को चलता देख रहे हैं वह उससे अधिक खतरनाक हैं। यह खतरा लगातार हमारे साथ पहले से ही चल रहा है जिसमें छोटे मध्यम व्यवसाय अपनी महत्ता खोते जा रहे हैं।
           हमें याद है कि इससे पहले भी बड़ी कंपनियों के किराना के खेरिज व्यापार में उतरने का विरोध हुआ पर अंततः क्या हुआ? बड़े शहरों में बड़े मॉल खुल गये हैं। हमने अनेक मॉल स्वयं देखे हैं और यकीनन उन्होंने अनेक छोटे व्यवसायियों के ग्राहक-प्रगतिवादियों और जनवादियों के दृष्टि से कहें तो हक- छीने हैं। हम जब छोटे थे तो मेलों में बच्चों को खिलाने के लिये विभिन्न प्रकार के झूले लगते थे। कभी कभार मोहल्ले में भी लोग ले आते थे। आज मॉल में बच्चों के आधुनिक खेल हैं और तय बात है कि उन्होंने कहीं न कहीं गरीब लोगों की रोजी छीनी है। हम यहां यह भी उल्लेख करना चाहेंगे कि तब और बच्चों के रहन सहन और पहनावे में भी अंतर था। हम अगर उन्हीं झूलों के लायक थे पर आज के बच्चे अधिक धन की फसल में पैदा हुए हैं। तब समाज में माता पिता के बच्चों को स्वयं घुमाने फिराने का फैशन आज की तरह नहीं  था। यह काम हम स्वयं ही कर लेते थे। एक तरह से साफ बात कहें तो तब और अब का समाज बदला हुआ है। यह समाज उदारीकरण की वजह से बदला या उसके बदलते हुए रूप के आभास से नीतियां पहले ही बन गयी। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि उदारीकरण में पूंजीपतियों का पेट भरने के लिये समाज का बौद्धिक वर्ग पहले ही लगा हुआ था।
                 अब खुदरा किराना व्यापार की बात कर लें। धन्य है वह लोग जो आज भी खुदरा किराना व्यापार कर रहे हैं क्योंकि जिस तरह अब नौकरियों के प्रति समाज का रुझान बढ़ा है उसमें नयी पीढ़ी के बहुत कम लोग इसे करना चाहते हैं।
          हम यहां शहरी किराना व्यापार की बात कर रहे हैं क्योंकि मॉल और संयुक्त व्यापार केंद्र शहरों में ही हैं। पहली बात तो यह है कि जो पुराने स्थापित किराने व्यापारी हैं उनकी नयी पीढ़ी यह काम करे तो उस पर हमें कुछ नहीं कहना पर आजकल जिसे देखो वही किराना व्यापार कर रहा है। देखा जाये तो किराना व्यापारी अधिक हैं और ग्राहक कम! हमारे एक मित्र ने आज से पंद्रह साल पहले महंगाई का करण इन खुदरा व्यापारियों की अधिक संख्या को बताया था। उसने कहा था कि यह सारे व्यापारी खाने पीने की चीजें खरीद लेते हैं। फिर वह सड़ जाती हैं तो अनेक दुकानें बंद हो जाती हैं या वह फैंक देते हैं। इनकी वजह से अनेक चीजों की मांग बढ़ी नज़र आती है पर होती नहीं है मगर उनके दाम बढ़ जाते हैं। उसका मानना था कि इस तरह अनेक कंपनियां कमा रही हैं पर छोटे दुकानदार अपनी पूंजी बरबाद कर बंद हो जाते हैं। इसका अन्वेषण हमने नहीं किया पर जब हम अनेक दुकानदारों के यहां वस्तुओं की मात्रा देखते हैं तो यह बात साफ लगता है कि कंपनियों का सामान अधिक होगा ग्राहक कम!
          हमारे देश में बेरोजगारी अधिक है। एक समय तो यह कहा जाने लगा था कि कि जो भी अपने घर से रूठता है वही किराने की दुकान खोल लेता है। इधर मॉल खुल गये हैं। ईमानदारी की बात करें तो हमें मॉल से खरीदना अब भी महंगा लगता है। एक बात यह भी मान लीजिये कि मॉल से खरीदने वाले लोगो की संख्या अब भी कम है। हमारे मार्ग में ही एक कंपनी का खेरिज भंडार पड़ता है जहां सब्जियां मिलती हैं पर वहां से कभी खरीदी नहीं क्योंकि ठेले वाले के मुकाबले वहां ताजी और सस्ती सब्जी मिलेगी इसमें संशय होता है। हमारे शहर में कम से कम दो कंपनियों के खेरिज भंडार खुले और बंद भी हो गये यह हमने देखा।
          भारतीय अर्थव्यवस्था के अंतद्वंद्वों और उनके संचालन की नीतियों की कमियों पर हम लिखने बैठें तो बहुत सारी सामग्री है पर उसे यहां लिखना प्रासंगिक है। हम इन नीतियों को जब देश के लाभ या हानि से जोड़कर देखते हैं तो लगता है कि यह चर्चा का विषय नहीं है। इस देश में दो देश सामने ही दिख रहे हैं-एक इंडिया दूसरा भारत! कभी कभी तो ऐसा लगता है कि हम एक भारतीय होकर इंडियन मामले में दखल दे रहे हैं। कुछ लोगों को यह मजाक लगे पर वह मॉल और मार्केट में खड़े होकर चिंत्तन करें तो यह बात साफ दिखाई देगी। वॉल मार्ट एक विदेशी कंपनी है उससे क्या डरें, देशी कंपनियों ने भला कौन छोड़ा है? सीधी बात कहें तो नवीन नीति से देश के किसानों या खुदरा व्यापारियों के बर्बाद होने की आशंका अपनी समझ से परे है। हम मान लें कि वह कंपनी लूटने आ रही है तो उसका मुकाबला यहां मौजूद देशी कंपनियों से ही होगा। मॉल के ग्राहक ही वॉल मार्ट में जायेंगे जो कि देशी कंपनियों के लिये चुनौती है। बड़े शहरों का हमें पता नहीं पर छोटे शहरों में हमने देखा है कि कम से पचास ग्राम चाय खरीदने कोई मॉल नहीं जाता। देश में रोज कमाकर खाने वाल गरीब बहुत हैं और उनका सहारा खुदारा व्यापारी हैं। गरीब रहेगा तो खुदरा व्यापारी भी रहेगा। वॉल मार्ट या गरीबी मिटाने नहीं आ रही भले ही ऐसा दावा किया जा रहा है।
            अपने पास अधिक लिखने की गुंजायश नहीं है क्योंकि पढ़ने वाले सीमित हैं। इतना जरूर कह सकते हैं कि यह बड़े लोगों का आपसी द्वंद्व है जो अंततः आमजन के हित का नारा लगाते हुए लड़ते हैं। आज के आधुनिक युग में शक्तिशाली प्रचारतंत्र के कारण आमजन भी इतना तो जान गया है कि उसके हित का नारा लगाना इन शक्तिशाली आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा धार्मिक समूहों के शिखर पुरुषों की मजबूरी है। इसलिये उनके आपसी द्वंद्वों को रुचि से देखता है।
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कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

Friday, November 18, 2011

क्रिकेट और भ्रष्टाचार-हिन्दी हास्य व्यंग्य कविता (cricket and corruption-hindi hasya vyangya kavita or comdey satire poem)

हिन्दी साहित्य,समाज,मस्ती,मनोरंजन,शायरी
क्रिकेट में भ्रष्टाचार नहीं है,
फिक्सिंग    को जुआ कहना
कतई शिष्टाचार नहीं है।
कहें दीपक बापू
भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के खैरख्वाह
बल्ला हाथ में लिये गेंद खेल रहे हैं,
बाज़ार सौदागरों से के इशारे पर
देश के मसलों पर नारे लगाकर
ज़माने मे रुतवे पेल रहे हैं
सुना है क्रिकेट मैच में हर बॉल होती है फिक्स,
कभी कभी चौके से भी सस्ता हो जाता है सिक्स,
अगर क्रिकेट देखना छोड़ दें देश के लोग
भागने लगेगा यहां से बेईमानी का रोग,
न विज्ञापन दिखेंगे,
न सस्ते उत्पाद महंगे बिकेंगे,
शराब के सौदागर
खेल का बाज़ार लगा रहे हैं,
मनोरंजन के नाम पर हवस जगा रहे हैं,
आम इंसानों ने अपना दिमाग दे दिया है
बेईमानों के हाथ,
उम्मीद जोड़े हैं कुसंतों के साथ,
दो नंबर के धंधे की चाहत सभी को है
फिर कहते हैं कि भ्रष्टाचार यहीं है।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

Saturday, November 12, 2011

दिल पर बात-हिन्दी शायरी (dil par baat, subject of heart-hindi shayri or poem)

इंसानों के सिर
अपनी दौलत, शौहरत और ओहदों से
ऊंचे हो जाते हैं,
धरती पर चलते हों भले ही
मगर उनके  दिमाग
आसमानों में खो जाते हैं।
कहें दीपक बापू
जब तक इंसान चल रहा है खुद
उससे दोस्ती करना ठीक है
हुक्मरानों की संगत में रहकर
हुक्म चलाने लगे जो
उनसे दूर रहना ही ठीक है
क्योंकि कितने भी दरियादिल हों वह
दिल पर बात आये तो
खूंखार हो जाते हैं।
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कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com
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यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका 

५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका
६.अमृत सन्देश पत्रिका

Monday, October 31, 2011

घर और जिंदगी-हिंदी शायरी (ghar aur jindagi-hindi shayri)

आओ कुछ सपने देखें
अपने घर खुशियाँ आने की
गम तो पल पल मिल जाते हैं ज़माने में,
दूसरों को दर्द देना आसान है
वक्त लगता हैं बहुत किसी को हंसाने में,
कहैं दीपक बापू
कागज के घर बनाने में
गुजर जाती है जिंदगी
पल लगता है उसे जलाने में.

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