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Thursday, July 26, 2012

अन्ना हजारे के आंदोलन की छवि कमजोर होने के बुरे संकेत-हिन्दी लेख(new post on anna hazare's movement against corruption-new article and post)

                    अन्ना हजारे की टीम ने एक बार फिर जनलोकपाल बनाने के लिये अपना आंदोलन प्रारंभ कर दिया है।  अगर जरूरत पड़ी  और स्वास्थ्य न ेसाथ दिया तो अन्ना हजारे स्वयं भी अनशन पर बैठ सकते हैं।  अगर मगर किन्तु परंतु और यह वह के चक्कर में अन्ना हजारे जी का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन अपनी उज्जवल छवि खो चुका है इसका पता तो इसके पा्ररंभ होने के एक दिन पहले ही इंटरनेट पर उन लोगों को चल गया होगा जो लेखन और रचनाओं के माध्यम से ब्लाग लिखने के साथ ही उसे पढ़ने वालों का मार्ग भी देखते हैं।  सर्च इंजिनों में इस आंदोलन के लिये खोज कम हुई है यह हम बड़े सादगी से लिख रहे हैं हकीकत यह है कि लोगों की रुचि इसमें खत्म हो गयी लगती है।  कुछ लोग यह कहें कि पूरे भारत की जनता इंटरनेट से जुड़ी नहीं है इसलिये इस आधार इस आंदोलन की लोकप्रियता कम होने की बात ठीक नहीं है पर हमारा अनुभव यह कहता है कि जब प्रचार माध्यमों में इस आंदोलनों का जोर था तब इंटरनेट पर भी इसकी खोज जमकर हो रही थी।  कहने का अभिप्राय यह है कि समाज की रुचियों में समानता होती है यह अलग बात है कि लोग अपने अपने स्तर के अनुसार साधनों का चयन कर समान विषयों से जुड़ते हैं।

            आखिर यह सब कैसे हो गया? इस आंदोलन से भले ही कुछ चेहरे चमके हों, अनेक लोगों को बौद्धिक विलास का सामग्री मिली हो तथा इसके समाचारों के साथ ही बहसें प्रसारित कर समाचार चैनलों ने भले ही विज्ञापनों के लिये जमकर समय का इस्तेमाल किया हो पर इसका परिणाम वहीं का वहीं है जहां से यह प्रारंभ हुआ था। अगर हम परिणामों को आंकड़ों में नापें तो सामने शून्य ही आता है।

          अन्ना हजारे के साथ जुड़े संगठनो के कर्णधारों ने उनके चेहरे का खूब उपयोग किया पर यह साफ दिखाई दिया कि कहीं न कहीं उनके लक्ष्य अस्पष्ट थे।  साफ बात यह है कि अन्ना और उनकी टीम आज भी दो अलग भाग दिखाई देते हैं।  अन्ना अकेले हैं पर उनके साथ जुड़े अन्य लोग अपने संगठन उनके पीछे लाकर स्वयं के  चेहरे चमकाने के अलावा कुछ नहीं कर पाये। जब यह अंादोलन अपने स्वर्णिम दौर  में था तब लोगों की भावनायें उच्च स्तर पर उसके साथ जुड़ी थीं।  उन भावनाओं से विभोर होकर आंदोलन के कर्णधार अनेक  तरह के ऐसे बयान देने लगे थे जिससे आंदोलन के लक्ष्य तथा विचार अस्पष्ट दिखाई देने लगे  थे।  उनके शब्दों में उत्साह  अधिक पर  गंभीर तथा स्पटतः विचारों का अभाव दिखाई देने लगा था।  उनकी कोई स्पष्ट योजना नही थी न ही  भविष्य के स्परूप की कोई कल्पना थी।  खाली बयानबाजी तथा अस्पष्ट वादों के बीच यह आंदोलन लंबे समय तक लोकप्रिय नहीं बना रह सका।
              अब सब थम चुका है।  हमारा मानना है कि अन्ना अब शायद ही स्वयं अनशन पर बैठें क्योंकि वह हवा का रुख देखकर अपनी चाल चलने वाली ऐसी शख्सियत हैं जो अपने इसी गुण की वजह से लोकप्रिय हैं।  प्रचार माध्यम अन्ना हजारे के आंदोलन को फ्लाप शो कर रहे हैं तो यह बात मानना ही पड़ती है।  यकीनन अन्ना यह सब भांपने में माहिर हैं और वह अपने कदम उस तरह आगे न बढ़ायें जैसे कि उनकी टीम अपेक्षा कर रही है। इतना अनुमान तो प्रचार प्रबंधको ने लगा ही लिया होगा कि इस बार यह आंदोलन अब उनके लिये विज्ञापन प्रसारित करने का इतना समय नहीं दिला सकता।  अगर हम वर्तमान समय में लोकप्रियता का आधार तय करें तो वह केवल यही है कि किसी शख्सियत की लोकप्रियता उतनी ही होती है जितनी वह प्रचार  माध्यमों को विज्ञापन के बीच प्रसारित खाली समय में अपनी जगह बना सके।  अन्ना समाचारों में तो हैं पर विज्ञापनों के लिये समय जुटाने का सामर्थ्य उनके आंदोलन में अब उतना नहीं है।  यही कारण है कि प्रचार माध्यम अब शायद इस आंदोलन के लिये वैसे काम न करें जैसे कि पहले करते रहे थे।  9 अगस्त से बाबा रामदेव भी अपना आंदोलन चलाने वाले हैं। वह इस समय देश में लगातार इसका प्रचार कर रहे हैं।  उनके इस आंदोलन की स्थिति पर भी लिखेंगे पर पहले अवलोकन करें।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com
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Wednesday, May 12, 2010

टी-ट्वंटी विश्व कप में घटोत्कच वध जैसा दृश्य -हिन्दी लेख (T-20 world cup cricket match)

बीसीसीआई की क्रिकेट टीम टी-ट्वंटी विश्व कप से बाहर हो गयी। टीवी चैनल वाले इसको लेकर प्रलाप कर रहे हैं। अब उन्हें अपने देश की इज्जत लुट जाने का गम साल रहा है। वाह यार! क्या गजब़ है!
जब पाकिस्तान के खिलाड़ियों को भारत के आयोजित क्लब स्तरीय प्रतियोगिता में नहीं खरीदा गया तब यही चैनल वाले देशभक्ति की बात ताक पर रखकर इसका विरोध कर रहे थे। 26/11 के जख्म की वरसी पर मोमबत्तियां जलाने के दृश्य दिखाने वाले यह टीवी चैनल भूल गये थे कि यह कार्य उस पाकिस्तान ने किया है जहां की जनता भारत से नफरत करती है। अब फिर क्रिकेट में हारने पर देश के जज़्बातों की आड़ में गम बेचने का प्रयास कर रहे हैं जिसे अब कोई भी देख सकता है।
दरअसल इन चैनलों को इस बात का गम नहीं कि देश की इज्जत की लुटिया डूब गयी बल्कि उनको लग रहा है कि अब निकट भविष्य में उनके क्रिकेट के कार्यक्रम लोकप्रियता के अंक बढ़ाने में सहायक नहीं होंगे। दूसरे यह भी कि खिलाड़ियों के विरुद्ध अपने देश के आम लोगों में एक मानसिक विद्रोह पैदा होगा जिससे उनके अभिनीत विज्ञापनों के उत्पाद भी अलोकप्रिय हो सकते हैं। कुछ के विज्ञापन भी शायद उत्पादक वापस लेना चाहें जैसे कि 2007 के विश्व कप में बीसीसीआई की टीम की हार पर हुआ था। इसका सीधा आशय यह है कि इन टीवी चैनलों को आर्थिक नुक्सान हो सकता है-यहां यह बात साफ कर दें कि यह केवल अनुमान है क्योंकि बाज़ार और प्रचार के खिलाड़ी येनकेन प्रकरेण क्रिकेट की लोकप्रियता बचाने का प्रयास करेंगे।
एक चैनल इस हार के बाद धोनी के मुस्कराने पर एतराज जता रहा था। अरे भई, इस हार पर तो वह हर ज्ञानी आदमी खुश होगा जो सोचता है कि क्रिकेट की लोकप्रियता गिरे तो उस पर सट्टा खेलने वाली नयी पीढ़ी के सदस्यों का भविष्य अंधकारमय न हो। आये दिन ऐसी खबरे पढ़ने को मिलती हैं कि कर्ज में डूबे आदमी ने अपने परिवार के सदस्यों को मारा। अखबारों में आये दिन यह भी खबर आती है कि सट्टा खेलने और खिलाने वाले पकड़े गये। आज तक इस बात का आंकलन नहीं हुआ कि इस खेल का देश के परिवारों पर अप्रत्यक्ष रूप से कितना दुष्प्रभाव पड़ता है।
धोनी के मुस्कराने पर इतना एतराज करना ठीक नहीं है। ऐसा लगता है कि घटोत्कच वध जैसा प्रसंग उपस्थित हो गया है। महाभारत युद्ध में जब कर्ण की ब्रह्म शक्ति से घटोत्कच का वध हुआ तब सारे पांडव दुःखी होकर उसके शव के निकट गये पर कृष्ण प्रसन्नता से अपना शंख बचा रहे थे। वजह पूछने पर उन्होंने बताया कि ‘घटोत्कच राक्षस था। वह इस युद्ध से बचता भी तो मैं उसे मारता। दूसरे यह कि जब तक कर्ण के पास शक्ति के रहते मैं अर्जुन को मरा हुआ मानता था। कर्ण की उस शक्ति ने घटोत्कच का वध करके अर्जुन को जीवनदान दिया है।’
बात सीधी है कि क्रिकेट के कारण अनेक युवा बुरे रास्ते का शिकार हो रहे हैं। दूसरे यह खेल आलसी खेल है और इससे शरीर या मन को कोई लाभ नहीं होता। ऐसे में फुटबाल, टेनिस या अन्य खेलों को प्रोत्साहन मिले तो अच्छा ही रहेगा।
जहां तक देश भक्ति की बात है तो उसके लिये बहुत सारे क्षेत्र हैं। इस गुलामों के खेल में उसे देखने की आवश्यकता नहीं है। जिसमें समय और धन की बर्बादी क अलावा शारीरिक तथा मानसिक विकार पैदा होते है-यह बात खिलाड़ियों पर नहीं केवल दर्शकों के लिये लिखी जा रही है। हम तो अपने देश को भारत के नाम से जानते हैं और चैनल वाले भी इसे टीम इंडिया कहते हैं तब इसके प्रति आत्मीय भाव वैसे भी अनेक लोगों के मन में नहीं रह जाता। फिर बीसीसीआई की टीम है जिसकी एक कथित उपसमिति क्लब स्तरीय प्रतियोगितायें कराती हैं। यह बात भी आम लोगों को तब पता लगी जब उसमें तमाम गोलमाल की बात सामने आयी। तब यह भी प्रश्न उठा कि पिछली बार जब इनको भारत में प्रतियोगिता कराने की अनुमति नहीं मिली तब उसे दक्षिण अफ्रीका में उसे कराया गया। सीधी बात यह है कि बीसीसीआई को क्रिकेट से मतलब है देश से नहीं। वह एक कंपनी की तरह काम करती है और कोई भी कंपनी चाहे कितनी भी प्रसिद्ध या बड़ी हो वह देश की प्रतीक नहीं हो सकती।
हाकी हमारा राष्ट्रीय खेल है और उसमें अपनी टीम आजकल जोरदार प्रदर्शन कर रही है। आशा है वह आगे भी जारी रखेगी। अगर इस हार से देश में क्रिकेट की लोकप्रियता गिरती है और हमारी नयी पीढ़ी तमाम तरह की बुराईयों से बचती है तो यह बुरी नहीं है। हम तो यही चाहते हैं कि देश की युवा पीढ़ी को संबल मिले। अन्य खेलों में बढ़कर खिलाड़ी देश का नाम करें और उनको युवा पीढ़ी दर्शक के रूप में प्रोत्साहन दे। प्रसंगवश कर्ण की शक्ति से आहत होने की बावजूद घटोत्कच ने अपना कद बहुत बढ़ा लिया और जब गिरा तो उसने कौरवों की बहुत सारी सेना मारकर अपने बड़ों का भला किया। अब युद्ध तो होते नहीं खेल भी युद्ध जैसे हो गये हैं। दूसरे अब चौसर वाली जुआ नहीं खेली जाती कुछ खेलों ने उसकी जगह ले ली है। इसलिये अब बीसीसीआई की टीम की हार से देश क्रिकेटिया व्यसनों से बचता है तो अच्छा ही होगा।
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कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Saturday, November 21, 2009

हाथ में हथियार हो तो मति भ्रष्ट हो ही जाती है-आलेख (hath men hathiyar-hindi lekh)

 यह आश्चर्य की बात है कि इस देश के कुछ बुद्धिजीवी हिंसक आंदोलनों में समाज के आदर्श तलाश रहे हैं।  इन बुद्धिजीवियों में कई लोग तो जो उस पश्चिम से ही अपनी रचनाओं के कारण पुरुस्कृत हैं जिनकी सम्राज्यवादी नीति के खिलाफ जूझ रहे हैं। मजे की बात यह है कि इस देश के प्रचार माध्यम-टीवी चैनल और समाचार पत्र पत्रिकायें-उनकी बात को छापते हैं जबकि आम आदमी उनको जानता तक नहीं हैं। शायद इस देश के प्रचार माध्यमों की आदत है कि वह कमाते  हिंदी भाषा से  हैं पर उनको लेखक अंग्रेजी के पंसद आते हैं और यह कथित अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भारतीय विजेता अंग्रेजी में लिखते हैं। उनका विषय भी वही होता है भारतीय गरीबी और सामाजिक शोषण।  बहरहाल उन्हें वर्तमान में हर भारतीय शिष्ट व्यक्ति शोषक नजर आता है सिवाय अपने।  इसके अलावा भी कुछ अन्य बुद्धिजीवी भी है जो इस आशा के साथ गरीब और शोषक के लिये संघर्ष करते हुए नजर आते हैं कि शायद कभी किसी पश्चिमी देश की नजर उन पर पड़ जाये और वह पुरुस्कार प्राप्त करें।  कभी कभी तो लगता है कि यह बुद्धिजीवी प्रायोजित हैं जिनको यह दायित्व दिया गया है कि जितना भी हो सके भारतीय समाज को अपमानित करो।  बहरहाल ऐसे ही बुद्धिजीवी देश में चल रहे हिंसक आंदोलनों  में नये समाज के आधार ढूंढ रहे हैं।  सच तो यह है कि वह जिसका खाते हैं उसी की कब्र खोदते हैं। 

इससे पहले कश्मीर में चल रही हिंसा में उन्होंने अपनी असलियत दिखाते रहे और अब पूर्वोत्तर में चल रही हिंसा में भी वही उनका रवैया है जो इस देश के समाज के अनुकूल कतई नहीं है।  इनमें कई तो लेखक चीन की माओवादी नीति के समर्थक हैं जो इस एशिया में हथियारों को बेचने वाला सबसे बड़ा सौदागर है।  अगर हम चीन और पश्चिमी देशों की नीतियों को देखें तो वह हिंसा भड़काकर ही अपने हथियार बेचते हैं।  कभी कभी तो लगता है कि उसके दलालों के रूप में ही यहां अनेक बुद्धिजीवी हैं जो इस हिंसा का प्रत्यक्ष समर्थन करते हैं।  दरअसल आज हम जिन आंदोलनों  में प्राचीन विद्रोहों जैसी परिवर्तन की संभावना देखते हैं वह निर्मूल हैं।  आजकल के ऐसे आंदोलनकारियों का नेतृत्व हिंसा के व्यापरियों से जुड़े दलालों  के हाथों में जाता प्रतीत होता है जिनको नेता तो बस कहा जाता है।

इनके तर्क हास्यास्पद और निराधार ही होते हैं। हम पूर्वोत्तर की हिंसा में अगर देखें तो उसमें चीनी सरकार के हाथ होने के आरोप लगते हैं।  बहरहाल किसी भी वाद या भाषा, धर्म, क्षेत्र तथा जाति के नाम पर देश में कहीं भी चल रही हिंसा को देखें तो वह केवल एक व्यापार लगती है और उनमें कोई सिद्धांत या आदर्श ढूंढना एक प्रायोजित प्रयास प्रतीत होता है।  जहां तक गरीबों और शोषकों के भले की बात है तो वह केवल एक भ्रामक प्रचार है जो आम आदमी में कल्पना की तरह स्थापित किया जाता है।  पहली बात तो आधुनिक लोकतंत्र की कर लें जिसे यह बुद्धिजीवी ढकोसला कहते हैं। चीन का मसीहा माओ कभी भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पक्षधर नहीं था पर भारत के इन बुद्धिजीवियों का अगर वह अध्ययन करता तो शायद अपने यहां इसकी इजाजत देता क्योंकि उसे लगता कि इसकी तो उसके अनुयायियों को जरूरत ही नहीं है।  इन बुद्धिजीवियों ने जितनी बातें यहां  की हैं उसके दसवें हिस्से में तो उनको चीन  में  फांसी हो जाती-वहां कितनी असहिष्णुता है सभी जानते हैं। यह लोकतंत्र ही जहां जो  मजे कर रहे हैं। समाज पर आक्षेप करके और कभी कभी तो कश्मीर पाकिस्तान को देने जैसी राष्ट्रद्रोही बातें करने पर भी  यहां प्रचार माध्यमों में लोकप्रिय प्राप्त करते हैं। फिर  जब वह कहते हैं कि देश की राजनीति, आर्थिक तथा सामाजिक पर बैठे शिखर पुरुष भ्रष्ट हैं तो उन्हें यह भी बताना चाहिये कि-

1-क्या उन हिंसक आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हिंसा के व्यापारिक दलाल-कथित नेता-दूध के धुले हैं?  आखिर यह बुद्धिजीवी किस आधार पर उनको अन्य शिखर पुरुषों से अलग मानते हैं। इनके व्यक्तिगत चरित्र का क्या उन्होंने पूरा आंकलन कर लिया है या करना नहीं चाहते। आप जब देश के आर्थिक, राजनीति, और सामाजिक शिखर पर बैठे लोगों के चरित्र की मीमांसा करते हैं तो आपको यह नहीं बताना चाहिये कि आपके द्वारा समर्थित हिंसक आंदोलनों के प्रमुखों का कैसा चरित्र है? क्या सभी पवित्र हैं। 

2-मुखबिरी के आरोप में आदिवासियों, गरीबों और शोषकों को ही मारने वालों में वह किस तरह उन्हीं के समाजों का रक्षक मानते हैं? क्या जिन स्वजातीय या वर्ग के जिन लोगों को उन्होंने मारा उनको सजा देने का हक उनको था? फिर जब तब वह अपहरण या हमले की वारदात करते हैं उस समय तीन चार सौ लोगों की भीड़ जुटाते हैं क्या वह डर के मारे उनके साथ नहीं आती?

3-इन हिंसक आंदोलनों के नेताओं का राजनीतिक प्रशिक्षण आखिर किन लोगों के बीच में हुआ है?

देश में शोषण और संघर्ष हुआ है पर उनमें इन हिंसक तत्वों में ही समाज का बदलाव देखना अपने आपको धोखा देना है।  इन पंक्तियों का लेखक जाति, भाषा, क्षेत्र और धर्म के नाम बने समूहों को ही भ्रामक मानता है पर दूसरा सच यह है कि फायदे के लिये लोग अपने समूहों का उपयोग करते हैं।  दलित, आदिवासियों और मजदूरों के कथित संरक्षकों  क्या यह पता है कि चीन में एक ही जाति और वर्ग के लोग सत्ता पर हावी हैं और वहां आज भी जातीय संघर्ष होते हैं। इसके अलावा तिब्बत पर कब्जा जमाये बैठा चीन भारतीय क्षेत्रों पर भी दावा जताकर अपने सम्राज्यवादी होने का सबूत देता है।  चीन की तरक्की एक धोखा है।  कुछ अमेरिकी विशेषज्ञ साफ कहते हैं कि उसके विकास के पीछे अपराध जगत का भी योगदान है।  माओ भारत का शत्रु था और उसका यहां नाम लेना एक तरह से भारतीय समाज को चिढ़ाना ही है।  गरीब और शोषक की चिंता समाज को करना चाहिये वह नहीं करता तो उसकी सजा भी वह भोगता है पर कम से कम यह हिंसक तत्व किसी भी तरह उन लोगों के हितैषी नहीं है जो बंदूक सामने रखकर लोगों को इस बात के लिये बाध्य करते हैं कि वह उनके आंदोलन का हिस्सा बने। अगर वह यह साबित करना चाहते हैं कि लोग उनके साथ आंदोलन दिल से जुड़े हैं तो वह अपने कंधों से वह बंदूक हटा लें तो अपनी औकात का पता लग जायेगा? जहां तक लोकतंत्र का सवाल है तो सत्याग्रह और प्रदर्शन कर वह अपने मसले उठा सकते हैं पर ऐसा कोई प्रयास उन्होंने किया हो कभी ऐसा समाचार देखने या पढ़ने में नहीं आता-जैसा कि अभी किसानों ने कर दिखाया था।  इन बुद्धिजीवियों ने भी भारत में यह फैला रखा है कि यहां जातीय तनाव है जबकि चीन इससे मुक्त नहीं है-संभव है इस लेख में टिप्पणियों के रूप में कोई इस बात का प्रमाण भी रख जाये जैसे कि पहले के लेखों पर लिखी गयी थी। इन टिप्पणियों से ही यह पता लगा कि वहां भी उच्च वर्ग और जातियां हैं जिन्होंने कार्ल माक्र्स की आड़ में अपनी सत्ता कायम की है। इसी कारण वहां भी जातीय संघर्ष कम नहीं होता है।  सच बात तो यह है कि अंग्रेजी लेखकों के मोह ने ही भारतीय प्रचार माध्यमों को भी आज इस हालत में पहुंचाया है कि उन पर लोग उंगली उठा रहे हैं। अपने देश के हिंदी लेखकों के प्रति अत्यंत निम्न कोटि का व्यवहार रखने वाले प्रचार माध्यमों का साथ आम आदमी इसलिये जुड़ा है क्योंकि उसे कोई अन्य मार्ग नहीं मिलता।  यही कारण है कि विदेशी लोग उन भारतीय लेखकों को पुरुस्कृत करते रहे हैं जो अंग्रेजी में लिखते हैं उनको पता है कि हिंदी में लिखे की तो यहां भी इज्जत नहीं है फिर उनको प्रचार माध्यम हाथों हाथ उठाते हैं।  इसलिये वह भारतीय समाज की खिल्ली उड़ाने  या बेइज्जती करने वाले अंग्रेजी लेखकों को पुरुस्कार देते हैं।  हिन्दी भाषा के महान लेखक श्री नरेंद्र कोहली ने  अपने भाषण में इसकी चर्चा की थी-याद रहे भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों और संस्कृति में सामयिक रूप से लिखने में उनका कोई सानी नहीं है।

कहने का तात्पर्य यह है कि गरीबों, आदिवासियों, मजदूरों और दलितों को सम्मान पूर्वक जीवन जीने का अधिकार मिलना चाहिये। इसके लिये सामाजिक आंदोलन किये जायें अच्छी बात है पर जिसमें राजनीतिक और आर्थिक-जी हां, इन हिंसक आंदोलन के अनेक नेताओं पर तमाम तरह के आर्थिक और सामाजिक आरोप हैं जो उनके ही लोग लगाते हैं-हित साधने की बात हैं वहां सिद्धांत और आदर्श तो केवल दिखावा रह जाते हैं।  बार बार यह कहना कि हिंसक आंदोलनों को कुचलने की बजाय राज्य सत्ता उनसे बात करे, पूरी तरह गलत है।  राज्य सत्ता के पास इसके अलावा कोई मार्ग नहीं होता कि वह अपने देश में चल रही हिंसा के साथ  कड़ाई से निपटे, यह उसका जिम्मा है क्योंकि हर नागरिक के मौलिक अधिकारों की रक्षा करना उसका दायित्व है और जिसे यह हिंसक तत्व नष्ट करते हैं।  सामान्य नागरिक को हिंसा से परहेज करना चाहिये पर राजसत्ता ऐसा नहीं कर सकती। इन बुद्धिजीवियों को पता ही नहीं इस दुनियां में चलने के दो ही मार्ग हैं। एक तो अध्यात्मिक सत्संग का है जिसमें अपनी दाल रोटी खाओ और प्रभु के गुन गाओ। दूसरा राजधर्म है जिसमें अपने नागरिकों की रक्षा के लिये राज्य प्रमुख किसी भी हद तक चला जाये।  हिंसक तत्वों से यह आशा करना ही बेकार है कि वह कोई सौहार्द भाव किसी के प्रति रखते हैं क्योंकि हमारा अध्यात्मिक दर्शन कहता है कि जिसके हाथ में हथियार है उसकी मति भ्रष्ट हो ही जाती है। ऐसे में इन हिंसक तत्वों द्वारा प्रचारित विचारों और योजनाओं पर चर्चा करना भी बेमानी लगती है।
कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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