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Wednesday, August 29, 2012

कसाब को सजा देना ही काफी नहीं-हिन्दी लेख (kasab ko saja dena kafi nahin-hindi lekh and article)

           मुंबई हमले में पकड़े गये एक अपराधी कसाब को फांसी की सजा सुप्रीम कोर्ट ने बहाल रखी है।  प्रचार माध्यमों में इसे प्रमुखता से इस तरह प्रचारित किया गया है जैसे कि इस कांड का असली अपराधी वह एक ही है।  एक बात तय है कि कसाब को मौत से कम सजा नहीं मिल सकती क्योंकि वह अपराध में प्रत्यक्ष  रूप् से शामिल है पर इसका एक दूसरा प़क्ष यह भी है कि वह इस अपराध मे एक अस्त्र शस्त्र के रूप में उपयोग लाया गया है।  जिन लोगों के हृदय में इस हमले को लेकर बहुत क्षोभ है उनके लिये कसाब को सजा देना एक मामूली बात है।  यह ऐसे ही जैसे कि किसी हत्या में प्रयुक्त चाकू, तलवार और पिस्तौल को जब्त कर लेना। जब्त हथियार किसी को फिर प्रयोग के लिये नहीं  देकर उसे नष्ट कर  दिया जाता।  कसाब की जिंदगी भी वापस नहीं होगी पर उसकी मौती की सजा किसी हथियार को नष्ट करने से अधिक नहीं है।
     एक प्राणहीन हथियार इंसान के निर्देश के अनुसार चलता है पर जिस इंसान की बुद्धि ही  हर ली जाये वह भी प्राणहीन हथियार की तरह अन्य व्यक्ति के इशारे पर  अपराध की राह पर चलता है। जिस तरह हम किसी हथियार को सजा न देकर उसे नष्ट करते हैं पर प्रयोग करने वाले इंसान को ही दंड देते हैं वैसे ही इस कांड कसाब को हथियार की तरह उपयोग करने वाले इंसानों का सजा दिये बिना इस कांड की सजा पूरी नहीं मानी जा सकती है।  जब किसी इंसान के हाथ के हथियार से किसी व्यक्ति की हत्या होती है तो हम यह नहीं कहते कि अमुक हथियार ने मारा है। तब उसका इस्तेमाल करने वाले इंसान को दंड देते हैं।  हथियार को नष्ट करते हैं यह अलग बात है।
       जब हम मुंबई के दर्दनाक हादसे को याद करते हैं तो कसाब प्रत्यक्ष रूप से दिखता है  पर उसे हथियार की तरह इस्तेमाल करने वाले लोग अभी भी पाकिस्तान में घूम रहे हैं।
        अस्त्र वह है जो आदमी अपने हाथ में पकड़कर कर इस्तेमाल करता है-जैसे तलवार, चाकू , गदा और त्रिशूल। उसी तरह शस्त्र वह है जो फैंककर उपयोग में लाया जाता है जैसे तीर, भाला या पत्थर।  तीरकमान और गोली अस्त्रों शस्त्रों का संयुक्त रूप है।  यहां कसाब शस्त्र का रूप है जिसे भारत में फैंका गया है कि ताकि निर्दोष  लोग मारे जायें।
      भारतीय प्रचार माध्यम हर छोटे बड़े विषय को अपने हल्के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण बनाकर उस पर चर्चा करते हैं।  उसमें शामिल विद्वानों  के विचार भी अत्यंत हल्के होते हैं। कसाब एक युवक है जो गरीब परिवार का है पर लालच लोभ तथा क्रूरता के कारण वह इस अपराध में शामिल हुआ। जिन लोगों ने उसे इस अपराध में शामिल किया उन्होंने उसे तमाम तरह के प्रलोभन देकर जीवन की सुरक्षा वादा कर इसमें शामिल किया।  कसाब ने जिनको मारा उनसे उसकी प्रत्यक्ष शत्रुता नहीं थी।  वह तो भारत पर हमले के लिये दुश्मनों का हथियार बना। हम इस हथियार को समाप्त कर यह मान रहे हैं कि भारी जीत मिल गयी तो मुंबई अपराध से नाखुश लोगों को हैरानी होती है।
        जिन लोगों के दिमाग में 1971 के भारत पाक युद्ध की स्मृतियां हैं उन्हें स्मरण होगा कि अनेक जगह पाकिस्तानी सेना के हाथ से भारतीय सेना ने जो हथियार छीने थे उनकी प्रदर्शनी हुई थी। चूंकि भारत ने उस युद्ध में पाकिस्तान को परास्त किया था इसलिये रुचि के साथ यह हथियार देखे गये।  कसाब की मौत तो ऐसे युद्ध का हथियार दिखाना भर होगी जो अभी जीता नहीं गया है। कुछ लोगों ने कसाब नाम का यह शस्त्र फैंककर हमारे निर्दोष लोगों को मारा है हम उसे नष्ट कर जीत का जश्न नहीं मना सकते।  जब मुंबई के गुनाहगारों के पाकिस्तान में खुलेआम घूमते देखते हैं तो कसाब जैसे शस्त्र को नष्ट करना एक मामूली बात नज़र आती है।  हमारा मानना है कि कसाब को जल्द से जल्द सजा देने के साथ ही पाकिस्तान से असली गुनाहगारों लेने का प्रयास करना चाहिए।  कसाब के साथ कानूनी रूप से कोई रियायत नहीं होना चाहिए।  उसे खाने पीने मेंवह सब भी नहीं देना चाहिए जो वह मांगता है।  वह शस्त्र है पर मनुष्य भी है।  उसकी बुद्धि हर ली गयी और उसने ऐसा होने दिया यह भी उसका अपराध है इसलिये उसे मानसिक प्रताड़ना देना भी बुरा नहीं है।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
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Thursday, July 26, 2012

अन्ना हजारे के आंदोलन की छवि कमजोर होने के बुरे संकेत-हिन्दी लेख(new post on anna hazare's movement against corruption-new article and post)

                    अन्ना हजारे की टीम ने एक बार फिर जनलोकपाल बनाने के लिये अपना आंदोलन प्रारंभ कर दिया है।  अगर जरूरत पड़ी  और स्वास्थ्य न ेसाथ दिया तो अन्ना हजारे स्वयं भी अनशन पर बैठ सकते हैं।  अगर मगर किन्तु परंतु और यह वह के चक्कर में अन्ना हजारे जी का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन अपनी उज्जवल छवि खो चुका है इसका पता तो इसके पा्ररंभ होने के एक दिन पहले ही इंटरनेट पर उन लोगों को चल गया होगा जो लेखन और रचनाओं के माध्यम से ब्लाग लिखने के साथ ही उसे पढ़ने वालों का मार्ग भी देखते हैं।  सर्च इंजिनों में इस आंदोलन के लिये खोज कम हुई है यह हम बड़े सादगी से लिख रहे हैं हकीकत यह है कि लोगों की रुचि इसमें खत्म हो गयी लगती है।  कुछ लोग यह कहें कि पूरे भारत की जनता इंटरनेट से जुड़ी नहीं है इसलिये इस आधार इस आंदोलन की लोकप्रियता कम होने की बात ठीक नहीं है पर हमारा अनुभव यह कहता है कि जब प्रचार माध्यमों में इस आंदोलनों का जोर था तब इंटरनेट पर भी इसकी खोज जमकर हो रही थी।  कहने का अभिप्राय यह है कि समाज की रुचियों में समानता होती है यह अलग बात है कि लोग अपने अपने स्तर के अनुसार साधनों का चयन कर समान विषयों से जुड़ते हैं।

            आखिर यह सब कैसे हो गया? इस आंदोलन से भले ही कुछ चेहरे चमके हों, अनेक लोगों को बौद्धिक विलास का सामग्री मिली हो तथा इसके समाचारों के साथ ही बहसें प्रसारित कर समाचार चैनलों ने भले ही विज्ञापनों के लिये जमकर समय का इस्तेमाल किया हो पर इसका परिणाम वहीं का वहीं है जहां से यह प्रारंभ हुआ था। अगर हम परिणामों को आंकड़ों में नापें तो सामने शून्य ही आता है।

          अन्ना हजारे के साथ जुड़े संगठनो के कर्णधारों ने उनके चेहरे का खूब उपयोग किया पर यह साफ दिखाई दिया कि कहीं न कहीं उनके लक्ष्य अस्पष्ट थे।  साफ बात यह है कि अन्ना और उनकी टीम आज भी दो अलग भाग दिखाई देते हैं।  अन्ना अकेले हैं पर उनके साथ जुड़े अन्य लोग अपने संगठन उनके पीछे लाकर स्वयं के  चेहरे चमकाने के अलावा कुछ नहीं कर पाये। जब यह अंादोलन अपने स्वर्णिम दौर  में था तब लोगों की भावनायें उच्च स्तर पर उसके साथ जुड़ी थीं।  उन भावनाओं से विभोर होकर आंदोलन के कर्णधार अनेक  तरह के ऐसे बयान देने लगे थे जिससे आंदोलन के लक्ष्य तथा विचार अस्पष्ट दिखाई देने लगे  थे।  उनके शब्दों में उत्साह  अधिक पर  गंभीर तथा स्पटतः विचारों का अभाव दिखाई देने लगा था।  उनकी कोई स्पष्ट योजना नही थी न ही  भविष्य के स्परूप की कोई कल्पना थी।  खाली बयानबाजी तथा अस्पष्ट वादों के बीच यह आंदोलन लंबे समय तक लोकप्रिय नहीं बना रह सका।
              अब सब थम चुका है।  हमारा मानना है कि अन्ना अब शायद ही स्वयं अनशन पर बैठें क्योंकि वह हवा का रुख देखकर अपनी चाल चलने वाली ऐसी शख्सियत हैं जो अपने इसी गुण की वजह से लोकप्रिय हैं।  प्रचार माध्यम अन्ना हजारे के आंदोलन को फ्लाप शो कर रहे हैं तो यह बात मानना ही पड़ती है।  यकीनन अन्ना यह सब भांपने में माहिर हैं और वह अपने कदम उस तरह आगे न बढ़ायें जैसे कि उनकी टीम अपेक्षा कर रही है। इतना अनुमान तो प्रचार प्रबंधको ने लगा ही लिया होगा कि इस बार यह आंदोलन अब उनके लिये विज्ञापन प्रसारित करने का इतना समय नहीं दिला सकता।  अगर हम वर्तमान समय में लोकप्रियता का आधार तय करें तो वह केवल यही है कि किसी शख्सियत की लोकप्रियता उतनी ही होती है जितनी वह प्रचार  माध्यमों को विज्ञापन के बीच प्रसारित खाली समय में अपनी जगह बना सके।  अन्ना समाचारों में तो हैं पर विज्ञापनों के लिये समय जुटाने का सामर्थ्य उनके आंदोलन में अब उतना नहीं है।  यही कारण है कि प्रचार माध्यम अब शायद इस आंदोलन के लिये वैसे काम न करें जैसे कि पहले करते रहे थे।  9 अगस्त से बाबा रामदेव भी अपना आंदोलन चलाने वाले हैं। वह इस समय देश में लगातार इसका प्रचार कर रहे हैं।  उनके इस आंदोलन की स्थिति पर भी लिखेंगे पर पहले अवलोकन करें।
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Friday, August 12, 2011

आम आदमी की जाग्रति के बिना कोई आंदोलन सफल नहीं हो सकता -हिन्दी लेख (anna hazare ka aandolan aur aam aadmi-hindi lekh)

                  अन्ना हजारे का 16 अगस्त से महानायक के रूप में राष्ट के दृश्य पटल पर पुनः अवतरण हो रहा है। देश के समस्थ्त प्रचार माध्यम इस महानायक के महिमामंडल में लगे हुए हैं क्योंकि उनके आंदोलन के दौरान प्रचार प्रबंधकों ऐसी विषय सामग्री मिलेगी जो उनके प्रकाशन तथा प्रसारणों वालेक विज्ञापन के साथ काम आयेगी। उनके कई घंटे इस दौरान उनको विज्ञापन का संग्रह कर कमाई करने का अवसर देंगे। सच बात तो यह है कि हमारे देश के प्रचार माध्यमों की स्थापना में लक्ष्य विज्ञापनों को पाना ही होता है, मगर अभिव्यक्ति के झंडाबरदार होने की छवि की वजह से प्रचार प्रबंधक कुछ ऐसी विषय सामग्री भी प्रकाशित और प्रसारित करते हैं जिससे माध्यमों का पत्रकारिता संस्थान होने का प्रमाण दिख सके। अगर ऐसा न होता तो टीवी चैनल को अपने प्रसारणों में अब निर्धारित समाचार, विश्लेषण तथा चर्चा की न्यूनतम मात्रा होने का प्रचार नहीं करना पड़ता। उनको अपने प्रचार यह सािबत करना पड़ता है कि वह विज्ञापन चैनल नहीं बल्कि समाचार चैनल चलाते हैं कि और कम से कम उनके यहां इतने समाचार तो प्रसारित होते ही हैं।
              इसमें कोई संदेह नहीं है कि अन्ना हजारे और बाबा रामदेव व्यक्तित्व और कृतित्व की दृष्टि से सात्विक प्रवृत्ति के है। अन्ना हजारे अपनी धवल तो बाबा रामदेव अपनी धार्मिक छवि के कारण देश के जनमानस में निर्विवाद व्यक्तित्व के स्वामी हैं। दोनों के व्यक्तित्व पर कोई आक्षेप नहीं है ऐसे में उनका व्यक्तित्व किसी भी ऐसे मुद्दे को निरंतर बनाये रखने में अत्यंत सहायक है जो जनमानस से जुड़ा हो। इस समय भ्रष्टाचार का मुद्दा ज्वलंत बन गया है और इससे जनमानस प्रभावित भी है और समाचार के साथ विश्लेषण विज्ञापनों के साथ निरंतर प्रचार किया जा रहा है। इसके बाद हम टीवी चैनल और समाचार पत्रों की कार्यप्रणाली पर भी विचार करते हैं  जिसमें उनको जनमानस के बीच अपनी छवि बनाये रखना होती है। उनको रोज नवीनता चाहिए। नये चेहरे, नये विषय और नये रोमांच आज के प्रचार माध्यमों को रोज जुटाने हैं। ऐसे में कभी कभी तो यह लगता है कि पूर्वनियोजित समाचार बन रहे हैं। इसका संदेह इसलिये होता है कि हमने देखा है हमारे प्रचार प्रबंधकों के आदर्श पश्चिमी गोरे राष्ट्र हैं जहां ऐसी भी खबरों सुनने को मिलती हैं कि सनसनी फैलाने के लिये प्रचार कर्मियों ने हत्यायें तक करा डालीं। हमारे देश के लोगों में   यह दुस्साहस करने की पशुवृत्ति नहीं है। यह अच्छी बात है पर अहिंसक योजनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता। देश में जब पुराने चेहरों से उकताहट महसूस की जाने लगी तो उसी समय बाबा रामदेव और अन्ना हजारे का अपने मूल सक्रिय क्षेत्रों से हटकर भ्रष्टाचार विरोधी देतवा के रूप में अवतरण हुआ। बाबा रामदेव योग साधना सिखाते हुए पूरे विश्व में लोकप्रिय हो गये थे। उनके शिविरों के कार्यक्रमों का टीवी चैनलों पर प्रसारण हुआ तो समाचार पत्रों में भी खूब चर्चा हुई। इधर अन्ना हजारे भी अपने महाराष्ट्र प्रदेश में कुछ आंदोलनों से चर्चित होने के बाद फिर कहीं खोये रहे। ऐसे में अचानक दोनों ही भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के अगुआ बने या बनाये गये इसको लेकर सवाल उठता है। ऐसा लगता है कि इन दोनों के चेहरे का उपयोग शयद इसलिये हो रहा है ताकि भारत की छवि विश्व में धवल रहे जो कि कथित रूप से स्विस बैंकों में देश के लोगों के काला धन जमाने होने के कारण धूमिल हो रही है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि देश के आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक पुरुषों ने विश्व में अपनी छवि बनायी है पर लगता है कि उनको अन्य देशों के समक्क्षों के सामने अपने देश के भ्रष्ट आचरण के कारण शार्मिंदा होना पड़ता है। संभव है उनको मुर्दाकौम का शीर्षस्थ होने का ताना मिलता हो। इसलिये एक आंदोलन की आवश्यकता उनको अनुभव हुई जिससे यहां की जीवंत छवि बने और उनका सम्मान हो। ऐसे में आंदोलनों को अप्रत्यक्ष रूप से मदद देने से एक लाभ उनको तो यह होता है कि विश्व में उनकी छवि धवल होती है तो वही दूसरा लाभ यह है कि जनमानस मनोंरजन और आशा के दौर में व्यस्त रहता है और शिखर पुरुषों को अपने नियंत्रित समाज से अचानक विद्रोह की आशंका नहीं रहती। फिर प्रचार माध्यम तो उनके हाथ में तो उसमें विज्ञापित उत्पादों के भी वही निर्माता है। ऐसे में उनका विनिवेश कभी खाली नहीं जाता।
          बाबा रामदेव और अन्ना हजारे जनमानस के नायक हैं पर कहीं न कहीं उनके इर्दगिर्द ऐसे लोगों का जमावड़ा है जो पेशेवर अभियानकर्ता हैं और उनसे निष्काम भाव से काम करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। यही कारण है कि भले अन्ना साहेब और स्वामी रामदेव निच्छल भाव के हैं पर अपने सलाहकारों के कारण अनेक बार अपने अभियानों के संचालन के दौरान वैचरिक दृढ़ता का प्रदर्शन नहीं कर पाते। उनके अभियानों के दौरान वैचारिक लड़खड़ाहट की अनुभति होती है। मुख्य बात यह है कि अनेक बार ऐसा लगता है कि कहीं न कहीं दोनों के पेशेवर अभियानकर्ता सलाहकार देश के शिखर पुरुषों से अप्रत्यक्ष रूप से संचालित हैं। इनमें एक तो ऐसे हैं जो कभी नक्सलियों के समर्थन में आते हैं तो्र कभी कभी कश्मीर के उग्रतत्वों के साथ खड़े दिखते हैं। भारतीय धर्म पर व्यंग्यबाण कसते हैं। ऐसा लगता है कि अन्ना हजारे और बाबा रामदेव की धवल छवि की आड़ में कोई ऐसा ही समूह सक्रिय है जो ऐसे अभियानों को पेशेवर अंदाज में चला रहा है। टीवी पर एक संगीत कार्यक्रम में अन्ना साहेब की उपस्थित और राखियों पर छपे चेहरे से यह बात साफ लगती है कि कहीं न कहीं बाज़ार को भी उनकी जरूरत है। ऐसे में 16 अगस्त से चलने वाले अन्ना साहेब के आंदोलन के परिणामों की प्रतीक्षा करने के अलावा अन्य कोई निष्कर्ष करना जल्दबाजी है पर बाज़ार और प्रचार प्रबंधकों की इसमें सक्रिय होना फिलहाल दिख रहा है जिनकी शक्ति के चलते भ्रष्टाचार खत्म होना अस्वाभाविक बात लगती है।
            आखिरी बात यह है कि भ्रष्टाचार के लिये कानून पहले से ही बने हुए हैं। मुख्य बात यह है कि कानून लागू करने वाली व्यवस्था कैसी हो। दूसरी बात यह है कि समाज स्वयं लड़ने को तैयार नहीं है। क्या आपने कभी सुना है कि कोई अपने रिश्तेदार या मित्र का इसलिये बहिष्कार करता है कि उस पर भ्रष्टाचार का संदेह है।
         यकीनन नहीं! दूसरी बात यह है कि अगर हम गौर करें तो हमारे देश में कानूनों की संख्या इतनी अधिक है कि सामान्य आदमी की समझ में ही नहीं आता कि उसके पक्ष में कौनसी धारा है। बिना जागरुकता के भ्रष्टाचार मिट नहीं सकता और यह तभी संभव है कि जब संक्षिप्त कानून हों जिनको आम आदमी समझ सके। आम आदमी को लगता है कानून का विषय उसके लिये कठिन है इसलिये वह व्यवस्था को केवल शक्ति का प्रतीक मानते हुए उदासीन रहता है। बार बार यह दावा किया जाता है कि देश का विकास आखिरी आदमी तक पहुंचना चाहिए पर हमारा मानना है कि यह तभी संभव है जब देश में कानून इतना सरल और संक्षिप्त बने जिसे आम आदमी उसे समझ सके। सच तो यह है कि अपने को कम जानकार मानने की वजह से कोई आम आदमी भ्रष्टाचार से लड़ना नहीं चाहता। भ्रष्टाचार होने का एक कारण यह भी है कि समाज ने ही इसे मान्यता दी है और भ्रष्ट लोगों को हेय दृष्टि से देखने की आदत नहीं डाली। एक आम लेखक के रूप में हम देश के लिये हमेशा कामना करते हैं कि यहां सभी लोग खुशहाल रहें इसलिये जब कोई बड़ी हलचल होती है तो उस पर नज़र जाती है। हम अपेक्षा करते हैं कि अच्छा हो पर जब चिंतन करते हैं तो लगता है कि अभी दिल्ली दूर है। फिर भी आशायें जिंदा रखते हैं क्योंकि जिंदा रहने का सबसे अच्छा तरीका भी यही है।
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Monday, April 4, 2011

नकली ट्राफी का खेल-व्यंग्य चिंत्तन (nakli cup or trofy ka khel-vyangya chittan)

             समझ में नहीं आ रहा है कि व्यंग्य लिखें कि गंभीर चिंत्तन। क्रिकेट को वैसे ही यकीनी खेल नहीं मानते। यहां तक कि जिसे लोग टीम इंडिया कहकर देश के लोग सिर पर उठाये रहते हैं उसके लिये भी हमने केवल एक क्लब बीसीसीआई की टीम मानते हैं। यह क्लब अपने क्रिकेट के व्यापार के लिये भारत के नाम, झंडे और गान का इस्तेमाल करता है इसलिये ही उसे भारत में दर्शक भारी मात्रा में मिलते हैं जिनकी जेब की दम पर पूरी दुनिया का क्रिकेट चल रहा है। बहरहाल हमारी टीम ने विश्व कप जीता खुशी की बात है-जीतने पर हम ऐसा ही करते हैं, हारने पर बीसीसीआई की टीम कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं-खिलाड़ियों के हाथ में ट्राफी या कप देखकर खुशी हुई।
            धोनी और गंभीर ने मन मोह लिया, मगर सारी प्रसन्नता चौबीस घंटे में हवा हो गयी। पता लगा कि उनको नकली कप या ट्राफी दी गयी है और असली भारतीय कस्टम विभाग के भंडार कक्ष की शोभा बढ़ा रही है। गनीमत है कि नागरिक सेवाओं से जुड़े कर्मचारी गोपनीयता के नियमों का पालन करते हैं वरना भंडार कक्ष में रखी ट्राफी का सरेआम दृश्य प्रसारित होता तब देश की इज्जत पर जो बट्टा लगता वह दुःखदायी होता।

            वैसे प्रचार माध्यम घुमाफिरा रहे हैं। बीसीसीआई के प्रवक्ता ने जब यह माना है कि ट्राफी नकली है तब उसमें शक की गुंजायश नहंी रहती। फिर भी आईसीसी कहती है कि असली ट्राफी यह कप है। वैसे प्रचार माध्यमों ने प्रमाणित कर दिया है कि वानखेड़े स्टेडियम में खेले गये विश्व कप 2011 के मैच के बाद भारत को दी गयी ट्राफी नकली है। उसमें विश्व कप का वह लोगो नहीं दिख रहा जिसे कोलंबो में अनावरण के समय देखा गया था। चूंकि यह ट्राफी अत्यंत महत्वपूर्ण है इसलिये यह संभव नहीं है कि उसे कहीं खुले में रखा गया हो जिससे उसका रंग उड़ जाये।
मतलब यह कि यह नकली ट्राफी है।
                  यह देश के साथ मजाक है और यकीनन बिना सोचे समझे नहीं किया गया। यह चिढ़कर किया गया है ताकि भारतीय लोग खुशी के बाद अवसाद के वातावरण का सामना करें। कोई है जो भारत की जीत से चिढ़ गया है। कौन हैं वह लोग? इसकी पड़ताल जरूरी है।

               इसमें कोई संदेह नहीं है कि सट्टेबाजों की ताकत जहां व्यापक है वहीं उनके हाथ लंबे हैं। कहा जाता है कि दुनियां के देशों के कानूनों से अलग आईसीसी तथा सट्टेबाजों का के नियम हैं। वह कई जगह कानून बनकर काम चलाते हैं वहां उनके हाथ भी लंबे हैं। भले ही कहा जाता है कि गोरे ईमानदार होते हैं पर जिस तरह अपराधियों के हाथ वह बिकते देखे गये हैं उससे यह भ्रम टूट गया है। ऐसा लगता है कि इस विश्व कप में कहीं न कहीं सट्टेबाजों को अपना काम सही तरह से करने का अवसर नहीं मिला। सेमीफायनल में पाकिस्तान और फायनल में श्रीलंका पर भारत की जीत तय मानी जा रही थी। ऐसे में सट्टेबाजों के लिये विपरीत परिणाम ही फायदेमंद हो सकता था पर ऐसा हुआ नहीं। हालांकि सट्टेबाजों ने अब स्पॉटफिक्सिंग का रास्ता निकाल लिया है पर लगता है कि वह अपनी कमाई से संतुष्ट नहीं है। फिर सेमीफायनल में पहुंची चार टीमों में-भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका तथा न्यूजीलैंड-से तीन गोरवर्ण का प्रतिनिधित्व नहीं करती। क्या गोरों के मन में यह मलाल रह गया था?
                  दूसरा सेमीफायनल और फायनल मैचों को भारत के अनेक संवैधानिक, राजनीतिक, आर्थिक, फिल्मी तथा अन्य विशिष्ट क्षेत्रों से जुड़े शिखर पुरुषों ने देखा। अपने कामकाज से फुरसत निकालकर वह कुछ देर आम इंसानों की तरह मैच देखने आये? उनकी मासुमियत तथा रुचियों को मजाक उड़ाने का कहीं यह इरादा तो नहीं है? क्या गोरे तथा भारत के विरोधियों को यह लगता है कि अमेरिका की लीबिया पर चल रही बमबारी को ही हम लोग देखते रहें और अपने क्रिकेट मैचों को देखना बंद कर देते।
क्रिकेट मैचों में हारने या जीतने पर भावुक नहीं होना चाहिए, यह हम हमेशा ही कहते रहे हैं पर नकली कप का मामला राष्ट्रवादियों को चिढ़ाने वाला है। भारत में आज नववर्ष विक्रम या विक्रमी संवत् 2068 के आगमन का स्वागत हो रहा है। ईसाई संवत् मानने वालों को यह बात समझ में नहीं आयेगी कि ऐसे अवसर इस तरह की अपमान जनक खबर बेहद दुःखदायी है। दो कौड़ी की आईसीसी-विश्व की क्रिकेट पर नियंत्रण करने वाली संस्था-और एक कोड़ी का फायनल मैच, पर देश का नाम अनमोल है। क्रिकेटर और उससे जुड़े संघों के लोग पैसे कमाने के चक्कर में चुप बैठ जायेंगे पर जिनको क्रिकेट से अधिक देश के प्रति प्रेम का भाव है वह इस व्यवहार से क्षुब्ध अवश्य होंगे।
          यह तो एक विचार है। इसका दूसरा पक्ष यह भी हो सकता है कि यह समाचार ही फिक्स कर बनाया गया हो। विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता का फायनल देखने के बाद यहां के लोगों का क्रिकेट से मन भर सकता है। इधर एक क्लब स्तरीय प्रतियोगिता शुरु हो रही है और उसे दर्शक कम मिल सकते हैं क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता और क्लब स्तरीय क्रिकेट मैचों में अंतर होता है। कहीं यह विश्व कप प्रतियोगिता का स्तर कमतर साबित करने का प्रयास तो नहीं है ताकि दर्शक इसे भूल जायें और क्लब स्तरीय प्रतियोगिता की तरफ जायें।
इधर यह भी सुनने में आया था कि कुछ सट्टेबाज इधर उधर पकड़े गये। उनके साथ आस्ट्रेलिया के दो गोरे खिलाड़ियों की मिलीभगत की बात सामने आयी। शायद इससे गोरे लोगों को सदमा लगा हो।
                  कहने का अभिप्राय है कि यह घटना पूर्वनियोजित है। इससे दो उद्देश्य या दोनों में से एक प्राप्त करने का प्रयास हो सकता है।
        एक तो भारत को अपमानित करना या फिर विश्व कप प्रतियोगिता को कमतर साबित करना ताकि क्लब स्तरीय प्रतियोगिता की तरफ जायें। लंबे समय तक विश्व कप की खुमारी उन पर न रहे क्योंकि छह अप्रैल से क्लब स्तरीय प्रतियोगिता प्रारंभ होने वाली है। शक की पूरी गुंजायश है कि इतनी बड़ी प्रतियोगिता में सब कुछ ठीकठाक रहा तो यह ट्राफी कस्टम का कर चुकाकर स्टेडियम में लायी क्यों न गयी? क्या वह इसे फ्री में लाना चाहते थे? करोड़ो रुपये की मालिक संस्थायें 20 लाख रुपये खर्च करने से मुकर क्यों गयीं? आखिरी बात दूसरी नकली ट्राफी अचानक कैसे बनकर आ गयी? मतलब जांच हो तो मामला कुछ का कुछ निकल सकता है।
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कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर 
poet writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwalior
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Friday, February 4, 2011

भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनयुद्ध में व्यवस्था में बदलाव बिना विजय संभव नहीं-हिन्दी लेख (bhrashtachar aur januddh-hindi lekh)

सुनने में आया है कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध कहीं जनयुद्ध शुरु हो गया है। बड़े बड़े नाम हैं जो इस युद्ध की अगुआई कर रहे हैं। ऐसे नामों की छबि को लेकर कोई संदेह है क्योंकि वह स्वच्छ है। कुछ विद्वान हैं तो कुछ कानूनविद! हम यहां कि इस जनयुद्ध के सकारात्मक होने पर संदेह नहीं कर रहे पर एक सवाल तो उठायेंगे कि कहीं यह अभियान भी तो केवल नारों तक ही तो नहीं सिमट जायेगा?
विश्व प्रसिद्ध योग शिक्षक बाबा रामदेव के व्यक्त्तिव को कोई चुनौती नहीं दे सकता पर उनके चिंतन की सीमाओं की चर्चा हो सकती है। श्रीमती किरण बेदी की सक्रियता प्रसन्नता देने वाली है पर सवाल यह है कि वह भ्रष्टाचार का बाह्य रूप देख रही हैं यह उसका गहराई से भी उन्होंने अध्ययन किया है। बाबा रामदेव योग के आसन सिखाते हैं मगर उनके परिणामों के बारे में वह आधुनिक चिकित्सकीय साधनों का सहारा लेते हैं। सच बात तो यह है कि बाबा रामदेव योग आसन और प्राणायाम जरूर सिद्धहस्त हैं पर उसके आठों अंगों के बारे में में पूर्ण विद्वता प्रमाणिक नहीं है। फिर भी भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनयुद्ध प्रारंभ करने वाले महानुभावों को साधुवाद! उनकी प्रशंसा हम इस बात के लिये तो अवश्य करेंगे कि वह इस देश में व्याप्त इस निराशावाद से मुक्ति दिलाने में सहायक हो रहे हैं कि भ्रष्टाचार को मिटाना अब संभव नहीं है।
सवाल यह है कि भ्रष्टाचार समस्या है या समस्याओं का परिणाम! इस पर शायद बहस लंबी खिंच जायेगी पर इतना तय है कि वर्तमान व्यवस्था में भ्रष्टाचार अपनी जगह बनाये रखेगा चाहे जितने अभियान उसके खिलाफ चलाये जायें। मुख्य समस्या व्यवस्था में है कि उससे जुड़े लोगों में, इस बात का पता तभी लग सकता है जब एक आम आदमी के चिंतक के रूप में विचार किया जाये।
जो विद्वान भ्रष्टाचार को मिटाने की बात करते हैं तो वह भ्रष्ट तत्वों को पकड़ने या उनकी पोल खोलने के लिये तैयार हैं मगर यह हल नहीं है। सबसे बड़ी बात यह है कि हम अपने राज्य, समाज, परिवार तथा समाजसेवी संस्थाओं की संचालन व्यवस्था को देखें जो अब पूरी तरह पश्चिम की नकल पर चल रही है। ऐसा नहीं है कि कभी कोई राज्य भ्रष्टाचार से मुक्त रहा हो। अगर ऐसा न होता तो हम अपने यहां राम राज्य के ही सर्वोत्तम होने की बात स्वयं मानते हैं। इसका आशय यह है कि उससे पहले और बाद की राज्य व्यवस्थायें दोषपूर्ण रही हैं। इसके बावजूद भारतीय राज्य व्यवस्थाओं में राजाओं की जनता के प्रति निजी सहानुभूति एक महत्वपूर्ण पक्ष रहा है। इसमें राजा भले ही कोई कैसे भी बना हो वह प्रजा के प्रति निजी रूप से संवेदनशील रहता था-कुछ अपवादों को छोड़ना ही ठीक रहेगा। आधुनिक लोकतंत्र में भले ही राजा का चुनाव जनता करती हो पर वह निजी रूप से संवेदनशील हो यह जरूरी नहीं है। राज्य कर्म से जुड़ने वाले जनता का मत लेने के लिये प्रयास करते हैं। इस दौरान उनका अनाप शनाप पैसा खर्च होता है जो अंततः धनवानों से ही लिया जाता है जिनको राजकीय रूप से फिर उपकृत करना पड़ता है। उनको अपनी कुर्सी जनता की नहीं धन की देन लगती है। बस, यहीं से भ्रष्टाचार का खेल प्रारंभ हो जाता है।
अब जो देश की स्थिति है उसमें हम आधुनिक लोकतंत्र से पीछे नहीं हट सकते पर व्यवस्था में बदलाव के लिये यह जरूरी है कि राज्य पर समाज का दबाव कम हो। यह तभी संभव है जब समाज की सामान्य व्यवस्था में राजकीय हस्तक्षेप कर हो। सबसे बड़ी बात यह है कि हमें अपना पूरा संविधान फिर से लिखना होगा। पहले तो यह निश्चय करना होगा कि जो अंग्रेजों ने कानून बनाये उनको पूरी तरह से खत्म करें। अंग्रेजों ने हमारे संविधान के कई कानून इसलिये बनाये थे जिससे कि वह यहां के लोगों को नियंत्रण में रख सकें। वह यहां के समाज में दमघोंटू वातावरण बनाये रखना चाहते थे जबकि उनका समाज खुले विचारों में सांस लेता है। उनके जाने के बाद भारत का संविधान बना पर उसमें अंग्रेजों के बनाये अनेक कानून आज भी शामिल हैं। सीधी बात कहें तो यह कि समाज में राज्य का हस्तक्षेप कम होना चाहिये। भारतीय संविधान की व्यवस्था ऐसी है कि उसकी किताबों की पूरी जानकारी बड़े बड़े से वकील को भी तब होती है जब संबंधित विषय पर पढ़ता है। उसी संविधान की हर धारा की जानकारी आम आदमी होना अनिवार्य माना गया है। अनेक प्रकार के कर जनता पर लगाये गये हैं पर राजकीय संस्थाओं के लिये आम जनता के प्रति कोई दायित्व अनिवार्य और नियमित नहीं है। केंद्रीय सरकार को जनता के प्रति सीधे जवाबदेह नहंी बनाया जा सकता। कुछ हद तक राज्य की संस्थाओं को भी मुक्ति दी जा सकती है पर स्थानीय संस्थाओं के दायित्वों को कर वसूली से जोड़ा जाना चाहिये। इतना ही स्थानीय संस्थाओं में कार्यरत अधिकारियों और कर्मचारियों की जनता के प्रति सीधी जवाबदेही तय होना चाहिये। प्रशासनिक व्यवस्थाओं से अलग जनसुविधाओं वाले विभागों को-स्वास्थ्य, शिक्षा तथा परिवहन-जनोन्मुखी बनाया जाना न कि धनोन्मुखी।
सबसे बड़ी बात यह है कि सभी प्रकार के करों की समीक्षा कर उनकी दरों का मानकीकरण होना चाहिये। जनता से सीधे जुड़े काम होने की निर्धारित अवधि तय की जाना चाहिये-इस मामले में हाल ही में मध्यप्रदेश सरकार के उठाये गये कदम प्रशंसनीय है। कहने का अभिप्राय यह है कि जब लोकतंत्र है तो सरकार की शक्ति को लोगों से अधिक नहीं होना चाहिये। आखिरी बात यह कि भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिये वर्तमान व्यवस्था में बदलाव की बात सोची जानी चाहिये। यह भारी चिंतन का काम है पर इसके बिना काम भी नहीं चलने वाला। खाली नारे लगाने से कुंछ नहीं होगा।
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कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Friday, October 15, 2010

भाषा में स्ट्रांग रहना-लघु हास्य व्यंग्य (hindi news pepar and megazine-laghu hasya vyangya(

‘पापा, यह कांफिडेंस क्या होता है।’ 14 साल के बच्चे ने अपने पास ही चाय पी रहे पिताजी से पूछा।’
उन्होंने जवाब दिया-‘बेटा, अंग्रेजी के कांफिडेंस शब्द का हिन्दी में मतलब होता है, आत्म विश्वास।’
बेटा बोला-‘ यह तो मुझे भी पता है पर हिन्दी में यह कांफिडेंस क्या होता है? आप देखो अखबार में लिखा है कि हर समय कांफिडेंस रखना चाहिये।’
पिताजी ने कहा-‘अरे, ऐसे ही लिख दिया होगा। आजकल हिन्दी में अखबार यही करने लगे हैं।
थोड़ी देर बात फिर बेटे ने पूछा-‘यह गुड लुक क्या होता है।’
पिताजी ने कहा-‘बेटा, यह भी अंग्रेजी भाषा का शब्द है जिसका मतलब है अच्छा दिखना।’
बेटा बोला-‘यह तो मुझे भी पता है पर यह हिन्दी में क्या होता है? इस अखबार में लिखा है कि हमेशा गुड लुक रहें।’
पिताजी ने कहा-‘ऐसे ही लिख दिया होगा।’
थोड़ी देर बाद फिर बेटे ने कहा-‘पापा, यह बी केअरफुल मस्ट ड्यूरिंग प्रिगनैंसी का क्या मतलब होता है।’
पिताजी ने कहा-‘बेटा आप अखबार में वही शब्द पढ़ो जो हिन्दी में समझ में आता हो, बाकी छोड़ दो।’
बेटा बोला-‘ठीक है पापा, अब मैं अखबार में वही पढ़ूंगा जो समझ में आये पर इसमें कोई भी ऐसा छपा नहीं मिल रहा है तो क्या करूं।
पिताजी ने कहा-‘तुम समाचार पढ़ो यह लेख मत पढ़ो।’
बेटा बोला-‘समाचारों में भी ऐसे ही शब्द लिखे हैं जो हिन्दी में न होने के कारण समझ में नहीं आते। मैं जब हिन्दी पढ़ता हूं तो हिन्दी याद रहती है और जब अंग्रेजी पढ़ता हूं तो वही याद रहती है।
पिताजी चुप हो गये।
थोड़ी देर बाद फिर बेटे ने पूछा-‘यह ‘सैक्सी सीन’ क्या होता है। इस अखबार एक समाचार में लिखा है कि इंटरनेट पर ‘सैक्सी सीन’ ज्यादा देखे जाते हैं।
पिताजी के समझ में कुछ नहीं आया तब वह बोले-‘बेटे, अगर अपनी हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में एक ही जैसे ‘स्ट्रांग’ रहना चाहते हो तो हिन्दी अखबार पढ़ना छोड़ दो। यह भी बता देता हू कि स्ट्रांग अंग्रेजी का शब्द है जिसका मतलब है ‘मजबूत’।
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Friday, May 14, 2010

पैसा खेल रहा था क्रिकेट नहीं’-हिन्दी व्यंग्य (money and cricket T-20-hindi satire ariticle)

बीसीसीआई की-भारत का क्रिकेट नियंत्रक मंडल-टीम के खिलाड़ी वेस्टइंडीज के एक बार में वहां कुछ क्रिकेट प्रशंसकों के हाथों पिट गये। ताज्जुब है इस समय किसी बुद्धिजीवी को देश का अपमान नहीं अनुभव हो रहा है। शायद इसका कारण यह है कि मारने वाले भारत भक्त थे जिनकी शिकायत यह थी कि एक तो इन भारत के नाम पर खेलने वाले इन खिलाड़ियों ने कोई खेल नहीं दिखाया फिर हारने के बाद भी मौज करने के लिये बारों में घूम रहे हैं। इधर चैनल वालों की हवा निकल रही है क्योंकि क्रिकेट के आधार पर समय पास करने वाले उनके कार्यक्रम उनकी टीआरपी गिरा सकते हैं। वैसे भी भारत के समाचार चैनल केवल दस मिनट के समाचार देते हैं और बाकी फिल्म, टीवी धारावाहिक तथा क्रिकेट में मनोरंजन कार्यक्रम पेश कर पास करते हैं।
फिर इधर अपने देश में भी टीम की हार को लेकर आक्रोश नहीं दिखाई दे रहा। आक्रोश न दिखने का कारण यह भी हो सकता है कि क्रिकेट की लोकप्रियता शायद उतनी न रही हो जितना पहले थी पर नयी पीढ़ी का वह वर्ग जो मनोरंजन के साथ दाव लगाकर खुशी और गम मनाने के लिये जुड़ा है वह भी शायद अधिक नहीं है-अलबत्ता इतना तो है कि वह क्रिकेट के कर्णधारों का जेब भर सके। दूसरा यह भी कि विज्ञापनदाताओं को अपने उत्पादों के प्रचार से मतलब है न कि कार्यक्रम की गुणवता से इसलिये वह कोई दबाव नहीं डालते और यही कारण है कि क्रिकेट खेल के लिये मिलने वाले विज्ञापनों को देखकर यह भ्रम हो जाता है कि शायद क्रिकेट अधिक लोकप्रिय है।
बहरहाल समाचार पत्रों ने खिलाड़ियों के पिटने की खबर छापकर यह तो सिद्ध कर दिया कि देश का प्रबुद्ध वर्ग इस विषय पर उनके साथ नहीं है। इसका कारण यह नहीं है कि बीसीसीआई के खिलाड़ी केवल हारे नहीं ल्कि बहुत बदतमीजी से हारे। देश से क्या अपनी टीम से ही वफादारी उन्होंने नहीं निभाई। आज वह जो भी हैं बीसीसीआई की टीम में खेलने की वजह से है पर उनको उसकी उपसमिति से ज्यादा वफादारी हो गयी है। भारतीय कप्तान से जब विश्व  कप  की बात की जाती है तो वह बड़े रुखेपन से जवाब देता है और अगर आईपीएल की बात की जाये तो वह खुश हो जाता है। उसने यहां इतना पैसा कमाया कि उसका नशा अभी उतरा नहीं है। अगर उनके चेहरे को पढ़ा जाये तो बीसीसीआई को अपने खिलाड़ियों से इस बात का आभार व्यक्त करना चाहिये कि वह उनकी टीम के लिये खेले। इतने अमीर खिलाड़ी खेले क्या यह कम बात है?
एक समाचार चैनल पत्रकार वार्ता में भारतीय कप्तान के हंसने से नाराज है। अब उसे कैसे समझायें कि उसकी हंसी का राज क्या है?
दरअसल वह कप्तान हंस रहा है दूसरी टीमों पर जो सेमीफाइनल में पहुंच गयी हैं। वह मन ही मन सोच रहा होगा कि देखो इन मूर्ख खिलाड़ियों  को विश्व कप जीतकर भी क्या कमायेंगे जितना हमने आईपीएल में हमने कमाया। अरे, यहां तो केाई रात्रिकालीन पाटियों का भी प्रावधान नहीं है जबकि आईपीएल में बहुत कुछ मजा था। पार्टियों में अमीर मिलते तो कुछ खूबसूरत चेहरे भी दृष्टिगोचर होते। जिनके साथ फोटो अखबार में छपता तो मजा भी आता। यहां क्या है, जो सेमीफायनल और फायनल खेलने में वक्त खराब किया जाये। इसलिये जल्दी घर पहुंचो तो जो पैसा कमाया है उसे देखकर मजा लिया जाये। इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि कोई अपने काम में दक्ष आदमी अगर सौ रुपया लेता है तो वह बीस रुपये में काम नहीं करता। अगर किसी चिकित्सक की फीस सौ रुपया है तो वह बीस रुपये वाले मरीज को नहीं देखना पसंद करता। अब लोगों को कौन समझाये कि बीसीसीआई के इन खिलाड़ियों को बस आईपीएल में मैच खेलना ही पसंद है क्योंकि वह अपने देश में विदेश जैसा आनंद देते हैं। कमाई और इज्जत एक साथ मिलती है। अपने चाणक्य महाराज कहते हैं कि विदेश में जाकर ही आदमी सम्मान अर्जित करता है ऐसे में जिन लोगों को घर में विदेश जैसा आराम और सम्मान मिले तो फिर बाहर जाकर क्यों खेलें?
आखिरी बात टीम के कोच गैरी कर्स्टन का कहना है कि इस टीम में आठ खिलाड़ी अनफिट थे और उनका वजन अधिक हो गया था। उनकी आदतें खराब हो गयी हैं जिसमें वह सुधार नहीं लाना चाहते। भारतीय खिलाड़ी हारने के बावजूद बार में गये-यकीनन वहां अमृत नहीं मिलता है। आईपीएल की रात्रिकालीन पार्टियों की आदत अब उनसे नहीं छूट सकती। अगर इस टीम के आठ खिलाड़ी अनफिट थे जो एक दिन में नहीं हुए होंगे। यहां हुई क्ल्ब स्तरीय मैचों के दौरान ही ऐसा हुआ होगा पर पता नहीं चला क्योंकि अपने देश में गेंद उछलती कम है और वेस्टइंडीज में स्थिति उलट है। वहां बाउंसरों के सामने उनकी पोल खुल गयी। इसका मतलब यह है कि आईपीएल में अनफिट खिलाड़ियों को दर्शकों ने देखा और पसंद किया। अनफिट यानि कूड़ा।
अपने देश की साथ ही यही होता है। यहां कूड़ा भी हिट होता है। फिर क्रिकेट लोग देखते अधिक हैं खेलने वाले उतने नहीं है। उनको यह पता ही नहंी पड़ता कि कौन कूड़ा है और कौन सोना! फिर सोने की पहचान किसे है? जौहरी अगर पीतल को भी सोना बताये तो कौन उस पर यकीन नहीं करेगा। क्रिकेट के जौहरी तो यही कर रहे हैं। आखिरी बात देश में पैसा बहुत है पर यह तरक्की का प्रमाण नहीं है। शराब पीने और और रोटियां खाने से पेट बढ़ाकर पहलवान नहीं हो जाया करते। यह अलग बात है कि मोहल्ले में कोई पहलवान न हो तो चाहे जैसा दावा करते फिरो। अगर धनी आदमी हो तो फिर कहना ही क्या? कुश्ती मत लड़ो! दूसरे लड़ें तो उन पर हंसो। वैसे अपने देश के पैसा लेकर कूड़ा ही बेचा जा रहा है-हम चीन का उदाहरण देख सकते हैं जो अपने घटिया सामान भेज रहा है। अब क्या करें पैसा आने से अक्ल नहीं आती भले ही हमारी अमीर को अक्लमंद मानने की आदत हो। फिर अमीरी सभी को हजम नहीं होती चाहे वह क्रिकेट खिलाड़ी हो। इसलिये हम कह सकते हैं कि भारत में पैसा क्रिकेट खिला रहा था और वेस्टइंडीज में उसने साथ छोड़ दिया।
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Wednesday, March 31, 2010

अंग्रेज और किताबें-हिन्दी व्यंग्य (inlishman and books-hindi satire article)

इस संसार का कोई भी व्यक्ति चाहे शिक्षित, अशिक्षित, ज्ञानी, अज्ञानी और पूंजीवादी या साम्यवादी हो, वह भले ही अंग्रेजों की प्रशंसा करे या निंदा पर एक बात तय है कि आधुनिक सभ्यता के तौर तरीके उनके ही अपनाता है। कुछ लोगों ने अरबी छोड़कर अंग्रेजी लिखना पढ़ना शुरु किया तो कुछ ने धोती छोड़कर पेंट शर्ट को अपनाया और इसका पूरा श्रेय अंग्रेजों को जाता है। मुश्किल यह है कि अंग्रेजों ने सारी दुनियां को सभ्य बनाने से पहले गुलाम बनाया। गुलामी एक मानसिक स्थिति है और अंग्रेजों से एक बार शासित होने वाला हर समाज आजाद भले ही हो गया हो पर उनसे आधुनिक सभ्यता सीखने के कारण आज भी उनका कृतज्ञ गुलाम है।
अंग्रेजों ने सभी जगह लिखित कानून बनाये पर मजे की बात यह है कि उनके यहां शासन अलिखित कानून चलता है। इसका आशय यह है कि उनको अपने न्यायाधीशों के विवेक पर भरोसा है इसलिये उनको आजादी देते हैं पर उनके द्वारा शासित देशों को यह भरोसा नहीं है कि उनके यहां न्यायाधीश आजादी से सोच सकते हैं या फिर वह नहीं चाहते कि उनके देश में कोई आजादी से सोचे इसलिये लिखित कानून बना कर रखें हैं। कानून भी इतने कि किसी भी देश का बड़ा से बड़ा कानून विद उनको याद नहीं रख सकता पर संविधान में यह प्रावधान किया गया है कि हर नागरिक हर कानून को याद रखे।
अधिकतर देशों के आधुनिक संविधान हैं पर कुछ देश ऐसे हैं जो कथित रूप से अपनी धाार्मिक किताबों का कानून चलाते हैं। कहते हैं कि यह कानून सर्वशक्तिमान ने बनाया है। कहने को यह देश दावा तो आधुनिक होने का करते हैं पर उनके शिखर पुरुष अंग्रेजों के अप्रत्यक्ष रूप से आज भी गुलाम है। कुछ ऐसे भी देश हैं जहां आधुनिक संविधान है पर वहां कुछ समाज अपने कानून चलाते हैं-अपने यहां अनेक पंचायतें इस मामले में बदनाम हो चुकी हैं। संस्कृति, संस्कार और धर्म के नाम पर कानून बनाये मनुष्य ने हैं पर यह दावा कर कि उसे सर्वशक्तिमान  ने बनाया है दुनियां के एक बड़े वर्ग को धर्मभीरु बनाकर बांधा जाता है।
पुरानी किताबों के कानून अब इस संसार में काम नहीं कर सकते। भारतीय धर्म ग्रंथों की बात करें तो उसमें सामाजिक नियम होने के साथ ही अध्यात्मिक ज्ञान भी उनमें हैं, इसलिये उनका एक बहुत बड़ा हिस्सा आज भी प्रासंगिक है। वैसे भारतीय समाज अप्रासांगिक हो चुके कानूनों को छोड़ चुका है पर विरोधी लोग उनको आज भी याद करते हैं। खासतौर से गैर भारतीय धर्म को विद्वान उनके उदाहरण देते हैं। दरअसल गैर भारतीय धर्मो की पुस्तकों में अध्यात्मिक ज्ञान का अभाव है। वह केवल सांसरिक व्यवहार में सुधार की बात करती हैं। उनके नियम इसलिये भी अप्रासंगिक हैं क्योंकि यह संसार परिवर्तनशील है इसलिये नियम भी बदलेंगे पर अध्यात्म कभी नहीं बदलता क्योंकि जीवन के मूल नियम नहीं बदलते।
अंग्रेजों ने अपने गुलामों की ऐसी शिक्षा दी कि वह कभी उनसे मुक्त नहीं हो सकते। दूसरी बात यह भी है कि अंग्रेज आजकल खुद भी अपने आपको जड़ महसूस करने लगे हैं क्योंकि उन्होंने अपनी शिक्षा पद्धति भी नहीं बदली। उन्होंनें भारत के धन को लूटा पर यहां का अध्यात्मिक ज्ञान नहीं लूट पाये। हालत यह है कि उनके गुलाम रह चुके लोग भी अपने अध्यात्मिक ज्ञान को याद नहीं रख पाये। अलबत्ता अपने किताबों के नियमों को कानून मानते हैं। किसी भी प्रवृत्ति का दुष्कर्म रोकना हो उसके लिये कानून बनाते हैं। किसी भी व्यक्ति की हत्या फंासी देने योग्य अपराध है पर उसमें भी दहेज हत्या, सांप्रदायिक हिंसा में हत्या या आतंक में हत्या का कानून अलग अलग बना लिया गया है। अंग्रेज छोड़ गये पर अपनी वह किताबें छोड़ गये जिन पर खुद हीं नहीं चलते।
यह तो अपने देश की बात है। जिन लोगों ने अपने धर्म ग्रंथों के आधार पर कानून बना रखे हैं उनका तो कहना ही क्या? सवाल यह है कि किताबों में कानून है पर वह स्वयं सजा नहीं दे सकती। अब सवाल यह है कि सर्वशक्तिमान की इन किताबों के कानून का लागू करने का हक राज्य को है पर वह भी कोई साकार सत्ता नहीं है बल्कि इंसानी मुखौटे ही उसे चलाते हैं और तब यह भी गुंजायश बनती है कि उसका दुरुपयोग हो। किसी भी अपराध में परिस्थितियां भी देखी जाती हैं। आत्म रक्षा के लिये की गयी हत्या अपराध नहीं होती पर सर्वशक्तिमान के निकट होने का दावा करने वाला इसे अनदेखा कर सकता है। फिर सर्वशक्तिमान के मुख जब अपने मुख से किताब प्रकट कर सकता है तो वह कानून स्वयं भी लागू कर सकता है तब किसी मनुष्य को उस पर चलने का हक देना गलत ही माना जाना चाहिये। इसलिये आधुनिक संविधान बनाकर ही सभी को काम करना चाहिए।
किताबी कीड़ों का कहना ही क्या? हमारी किताब में यह लिखा है, हमारी में वह लिखा है। ऐसे लोगों से यह कौन कहे कि ‘महाराज आप अपनी व्याख्या भी बताईये।’
कहते हैं कि दुनियां के सारे पंथ या धर्म प्रेम और शांति से रहना सिखाते हैं। हम इसे ही आपत्तिजनक मानते हैं। जनाब, आप शांति से रहना चाहते हैं तो दूसरे को भी रहने दें। प्रेम आप स्वयं करें दूसरे से बदले में कोई अपेक्षा न करें तो ही सुखी रह सकते हैं। फिर दूसरी बात यह कि गुण ही गुणों को बरतते हैं। मतलब यह कि आप में अगर प्रेम का गुण नहीं है तो वह मिल नहंी सकता। बबूल का पेड़ बोकर आम नहीं मिल सकता। पुरानी किताबें अनपढ़ों और अनगढ़ों के लिये लिखी गयी थी जबकि आज विश्व समाज में सभ्य लोगों का बाहुल्य है। इसलिये किताबी कीड़े मत बनो। किताबों में क्या लिखा है, यह मत बताओ बल्कि तुम्हारी सोच क्या है यह बताओ। जहां तक दुनियां के धर्मो और पंथों का सवाल है तो वह बनाये ही बहस और विवाद करने के लिये हैं इसलिये उनके विद्वान अपने आपको श्रेष्ठ बताने के लिये मंच सजाते हैं। जहां तक मनुष्य की प्रसन्नता का सवाल है तो उसके लिये भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान के अलावा कोई रास्ता नहीं है। दूसरी बात यह कि उनकी किताबें इसलिये पढ़ना जरूरी है कि सांसरिक ज्ञान तो आदमी को स्वाभाविक रूप से मिल जाता है और फिर दुनियां भर के धर्मग्रंथ इससे भरे पड़े हैं पर अध्यात्मिक ज्ञान बिना गुरु या अध्यात्मिक किताबों के नहीं मिल सकता। जय श्रीराम!

हिन्दी साहित्य,समाज,अध्यात्म,मनोरंजन,संपादकीय,आलेख

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Wednesday, March 10, 2010

बौद्धिक शोध-हिन्दी व्यंग्य चिंतन (Intellectual research - Hindi satirical article)

अगर आप लेखक या चित्रकार हैं और केवल अभिव्यक्ति के लिय ही रचनाकर्म करते हुए उससे आय की आशा नहीं करते तो फिर अपने पुजने का अहंकार भी छोड़ देना चाहिये। पता नहीं भारतीय समाज की यह पुरानी आदत है या फिर अंग्रेज इसे छोड़ गये कि यहां लेखक या चित्रकार की कामयाबी का पैमाना उसकी इन पेशों से कमाई या सम्मान ही माना जाता है। दरअसल हम यह विषय एक चित्रकार के भारत छोड़कर खाड़ी के ही एक देश में स्थाई रूप से बसने के संदर्भ में उठा रहे हैं। वह एक चित्रकार है और कथित रूप विश्व प्रसिद्ध होने के बावजूद भारतीय जनमानस में उसकी कोई छबि नहीं है। पिछले कई बरसों से देश के बुद्धिजीवी और प्रचार माध्यम लगे हुए हैं उसका प्रचार करने में! इसके बावजूद आम जनमानस में कोई उसका स्थान नहीं है।
अनेक लोग तो आज तक यही समझ नहीं पाये कि आखिर उस चित्रकार को इतना महत्व क्यों दिया जा रहा है? कागज पर आड़ी तिरछी रेखायें-एक आम आदमी के लिये यही स्थिति है-खींचने को आधुनिक चित्रकला कहा जाता है। ऐसे चित्रों की भारत के बाहर बहुत मांग होती है और जिसने बाजार प्रबंधन अपने साथ कर लिया वह स्थापित चित्रकार हो सकता है। वह भी अमेरिका और ब्रिटेन जैसे मुल्कों में अपनी जगह बना सकता है जहां चित्रकला नयी है-दूसरे शब्दों में कहें कि जहां के लोग चित्रों के बारे में अधिक नहीं जानते। भारत, इटली और मिस्त्र जैसे देश जहां प्राचीन काल से ही चित्रकला संपन्न रही है वहां आधुनिक चित्रकला सिवाय आड़ी तिरछी रेखाओं के अलावा कुछ नहीं समझी जाती। जिस तरह कहा जाता है कि चाहे कोई कितना भी अच्छा लिख ले पर तुलसीदास जी की तरह रामचरितमानस नहीं लिख सकता वही स्थिति चित्रकला की है। चाहे कोई कितना भी अच्छा चित्रकार हो वह खजुराहो और अजन्ता एलोरा जैसी कलाकृतियां नहीं बना सकता। हम कहते हैं कि हमारे देश में अशिक्षित और निरक्षर लोगों की भरमार है पर सच तो यह है कि असली कला के असली पारखी वही हैं। बात दूसरी भी है कि यहां भगवान राम, कृष्ण, ब्रह्मा, शिवजी तथा माताओं के ऐसे चित्र कलाकार बनाते हैं कि लोग उनको ही पसंद कर अपने घरों में लगाते हैं। मजे की बात यह है कि दीवार पर लगे चित्र पुराने हो जायें तो फिर उनकी जगह दूसरे आ जाते हैं पर मन का चित्र तो हमेशा ही ताजा रहता है और हर कोई अपने इष्ट का नया चित्र लगाये पर वह उसे बदलता नहीं है।
इससे अलग भी फिल्मी हीरो और हीरोईनों के चित्र भी लोग रखते हैं। भारत का शिवाकाशी कैलेंडर चित्रों के लिये मशहूर है और वहां से अनेक प्रकार की तस्वीरें बाजार में आती है। एक भारतीय गहरे रंगों में स्पष्ट तस्वीर को देखने का आदी है इसलिये उसे आधुनिक चित्रकला से अधिक सरोकार नहीं है।
भारत मेें ऐसे अनेक कलाकार देखे गये हैं जो आदमी को सामने बैठाकर या फोटो से उसकी तस्वीर बनाते हैं। इनको काम अधिक नहीं मिलता इसलिये वह बोर्ड़ आदि रंगने का काम भी करते हैं। ऐसे ही एक पेंटर का चित्र इस लेखक ने देखा था जो उसने एक सज्जन का फोटो देखकर हाथ से बनाया था जिसे देखकर ऐसा लगता था कि कैमरे से हुबहु खींचा गया है। कहने का तात्पर्य यह है कि चित्रकार तो यहां गली मोहल्ले में रहे हैं पर रोजी रोटी के कारण उनको स्वतंत्र रूप से अपनी चित्रकला से काम करने का अवसर नहीं मिला।
इधर नया समाज बनाने का सपना देखने वालों ने विदेशों से विचाराधारायें उठायीं तो वहां के कुछ रिवाज भी उठा लिये। फिर इधर प्रचार माध्यम भी बाजार से प्रतिबद्ध रहा है सो कुछ चित्रकार आड़ी तिरछी रेखाओं के कारण लोकप्रिय बनाये गये हैं। ऐसे ही वह चित्रकार है जिन्होंने भारतीय देवी देवताओं के बारे में मजाक उड़ाने वाले चित्र बनाये। इन चित्रों के बारे में शायद किसी को पता ही नहीं चलता अगर कथित रूप से उनके विरोधियों ने उसका प्रचार नहीं किया होता। फिर विरोधियों के विरोधी उनके समर्थक नहीं हो गये होते। कभी कभी तो लगता है कि यह एक प्रायोजित विवाद है जिसे लोगों को मानसिक रूप से व्यस्त रखने के लिये ही समय समय पर उठाया जाता है। वह चित्रकार खाड़ी के एक देश में गये हैं जो बहुत छोटा है पर जहां माया बरसती है।
एक मजे की बात यह है कि हमें उनके चित्र उनके विरोधियों ने ही दिखाये हैं इसका मतलब यह कि अगर वह नहीं दिखाते तो हम देख ही नहीं पाते। दूसरी बात यह कि वह ऐसे देश में गये हैं जहां अगर उन्होंने वहां के महापुरुषों पर कहीं ऐसे चित्र बनाये तो फिर उनका क्या हश्र होगा, यह कहना कठिन है।
अब अनेक बुद्धिजीवी उनके वापस आने की बात कह रहे हैं। अनेक बुद्धिजीवी स्यापा कर परंपरवादी लोगों को कोस रहे हैं। इधर परंपरावादी लोग भी उनकी वापसी पर नाराज न होने की बात कह रहे हैं। सवाल यह है कि एक मामूली चित्रकार-कहने को स्वतंत्र है पर यकीनन वह दूसरों के कहने पर ही चित्र बनाते हैं ऐसा भी पता लगा-पर इतना बवाल क्यों? यह समझ में परे है। हम न तो उनके समर्थक न विरोधी क्योंकि हमने देखा है कि अनेक चित्रकार और लेखक अपनी कुंठाओं के साथ जीते हैं और उनकी रचनाओं में कलुषिता का भाव दिखाई देता है। अपनी रचना या चित्र के साथ आनंद उठाने वाले बहुत कम हैं क्योंकि वह उसे बेच कर दूसरों को आनंदित करने के लिये परिश्रम करते हैं।
आखिरी बात उनके समर्थक और विरोधी दोनों के लिये। हमने अध्यात्मिक पुस्तकों का अध्ययन करते हैं तो उससे पता चलता है कि भले ही देवताओं को न माने पर उनका न तो अपमान करें और न ही मजाक उड़ायें वरना वह कुपित होकर दंड देते हैं। याद रखिये विश्व के भूगर्भशास्त्री कहते हैं कि भारत में जलस्तर सबसे ऊंचा है और ऐसा अन्यत्र देखने को नहीं मिलता। यह जल ही जीवन है जो प्राणवायु का संचार भी करता है। अपने देश में इंद्र, वायु, अग्नि तथा अन्य देवताओं की पूजा होती है इसलिये प्रकृति की कृपा भी यहीं है जिसकी वजह से अपने यहां भगवान अवतार लेकर यहां का उद्धार करते हुए अध्यात्मिक ज्ञान का प्रचार भी करते हैं। इस कारण भारत विश्व में अध्यात्म गुरु भी माना जाता है। ऐसा देश छोड़कर एक ऐसे देश में रहना जहां अकेले तेल देवता की-अब भारत में पेट्रोल की खपत बढ़ गयी है इसलिये कभी कमी न हो इसलिये उनको भी ऐसी मान्यता देते हैं-कृपा हो, वहां उनका बसना हमें दंड से कम नहीं लगता। यह तेल देवता बेजान गाड़ियां कुछ देर खींच सकता है पर जल एवं वायु की तरह हमेशा सहजता से सभी जगह उपलब्ध नहंी रहता। फिर सुनने में आया है कि उन्होंने मां सरस्वती का भी विकृत चित्र बनाया था जो कि मनुष्य की बुद्धि की स्वामिनी है। ऐसे में अगर अब उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो गयी जो इतना हरा भरा विशाल देश छोड़कर एक छोटे देश में बसाहट कर ली तो कहना चाहिये कि देवताओं ने एक तरह से उनको सजा दी है। ऐसे में उनके समर्थक या विरोधी उनका नाम ले लेकर खाली पीली बहसें कर रहे हैं। उनका नाम लेने की बजाय बुद्धिमान लोग देवताओं का नाम लें तो अच्छा है क्योंकि इधर पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है और देवताओं को प्रसन्न किये बिना उसमें सुधार नहीं आने वाला। वैसे चिंता की बात नहीं है। आम भारतीय देवताओं की आराधना करता रहता है और इसलिये आशा है कि देवता अधिक प्रसन्नता दिखाते हुए यहां जल और वायु की प्रचुरता बनाये रखेंगे। आम आदमी की आड़ में बुद्धिजीवी सुरक्षित हैं इसलिये उनको इसका आभास नहीं है कि देवताओं का प्रकोप कैसा होता है? जिसकी दुर्गति करनी हो उसकी पहले ऐसे ही बुद्धि हर लेते हैं और फिर आदमी स्वयं ही ऐसा कदम उठाता है कि उसे शत्रु के रूप में इंसान की आवश्यकता ही नहीं होती। कमबख्त इतना लिख लिया पर उस चित्रकार का नाम हमें याद नहीं आया। इसकी जरूरत भी क्या है? अपने देश के बुद्धिजीवी कोई दूसरा खड़ा कर लेंगे। ऐसी कहानियां    तो बनती रहेंगी। उसके नायकों और खलनायकों पर भी यह लेख फिट हो जायेगा। पता नहीं हम गलत हैं या सही पर अपने बौद्धिक शोध से हमें ऐसा ही लगता है कि अपने कर्म आदमी का पीछा करते हैं और बुरे होने पर दंड से कोई बचा नहीं सकता।
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Monday, February 22, 2010

साइकिल, क्रिकेट और फिल्म-हिन्दी हास्य व्यंग्य (cycle,cricket and film-hindi haysa vyangya)

भारत में आयोजित एक निजी क्लब स्तरीय क्रिकेट प्रतियोगिता में पाकिस्तानियों को नहीं खरीदा गया। पाकिस्तान इसका बदला लेने की फिराक में था और उसने लिया भी, भारत की साइकिलिंग टीम को अपने यहां न बुलाकर। एक अखबार में कोने में छपी इस खबर ने दिल को हैरान कर दिया। न देशभक्ति के जज़्बात जागे न अपने साइकिल चलाने को लेकर अफसोस हुआ। भारत में इसकी कोई खास प्रतिक्रिया नहीं दिखाई दी। अनेक्र लोगों को तो यह खबर ही समझ में नहीं आयी होगी कि साइकिल की भी प्रतियोगिता होती है और इसे ओलम्पिक में एक खेल का दर्जा प्राप्त है। मामला साइकिल से जुड़ा तो अनेक बुद्धिजीवियों को इस टिप्पणी करते हुए शर्म भी आयेगी यह सोचकर कि ‘साइकिल वालों का क्या पक्ष लेना?’
हमारी नज़र और दिमाग में यह खबर फंस गयी और अपने भाव व्यंग्य के रूप में ही अभिव्यक्त होने थे। सच तो यह है कि जिसे चिंतन और व्यंग्य में महारत हासिल करना है उसे साइकिल जरूर चलाना चाहिये। जहां तक हमारी जानकारी है हिन्दी में उन्हीं आधुनिक काल के लेखकों ने जोरदार लिखा जिन्होंने रिक्शा, पैदल या साइकिल की सवारी की। पाकिस्तान द्वारा साइकिलिंग टीम को रोकने पर ऐसी हंसी आयी जिसे हम खुद भी नहीं समझ पाये कि वह दुःख की थी या व्यंग्य से उपजी थी। ऐसे में तय किया इस पर शाम को लिखेंगे।
शाम को लिखने का विचार आया तो लगा कि पहले साइकिल चला कर आयें। इसलिये दस दिन बाद फिर साइकिल निकाली-ब्लाग लिखने के बाद साइकिल चलाना कम हो गयी है पर जारी फिर भी है। हमें पता था कि केवल कोई साइकिल चालक ही इस पर अच्छा सोच सकता है। जहां तक रही देशभक्ति की बात तो एक किस्सा हम लिख चुके हैं, उसका संक्षिप्त में वर्णन कर देते हैं।
एक बार स्कूटर पा जा रहे थे कि रेल की वजह से फाटक बंद हो गया। हम एक तरफ स्कूटर खड़ा कर उस पर ही विराजमान थे। उसी समय एक कार आकर रुकी। कार के पीछे एक गैस मैकनिक साइकिल पर आ रहा था। उसने बहुत कोशिश की पर वह कार को छू गयी।
वह गरीब मैकनिक चुपचाप हमारे आगे साइकिल खड़ी कर वहीं ठहर गया। उधर कार से एक सज्जन निकले-जो वस्त्रों से नेता लग रहे थे-और उस कार वाले को बुलाया। वह उनके पास गया और उन्होंने बड़े आराम से उसके गाल पर जोरदार थप्पड़ दिया। वह मासूम सहम गया। फिर वह उससे बोले-‘भाग साले यहां से!’
जब से स्कूटरों, कारों और मोटर साइकिलों का प्रचलन बढ़ा है साइकिल चालकों के लिये रास्ते पर चलना दुर्घटना से ज्यादा अपमान की आशंकाओं से ग्र्रसित रहता है। हमने भी अनेक बार झेला है। इसलिये जब साइकिल पर होते हैं तो हर तरह का अपमान सहने को तैयार रहते हैं। ऐसे में पाकिस्तान के द्वारा किया गया यह व्यवहार अपमाजनकर हमें अधिक दुःखदायी नहीं लगा। हमारे लिये उसके खिलाड़ियों को नहीं खिलाना साइकिल द्वारा कार को छूने जैसी घटना है और उसके व्यवहार थप्पड़ मारने जैसा तो नहीं चिकोटी काटने जैसा है। दरअसल दोस्ती और दुश्मनी अब दोनों देशों के खास वर्ग के लिये एक फैशन बन गया है। यह खास वर्ग अपने हिसाब से दोनों तरफ के आम इंसानों को कभी आपस में प्रेम रखना तो कभी दुश्मनी करने का संदेश देता है।
पाकिस्तान खिसिया गया है और खिसियाया गया आदमी कुछ भी कर सकता है। ऐसे में वह दूसरे को थप्पड़ मारते हुए अपना हाथ ही कटवा बैठता है। भारत के धनपतियों ने तो उससे गुलाम नहीं खरीदे थे पर उसने तो खिलाड़ियों को रोका है। याद रहे क्रिकेट को ओलम्पिक में खेल ही नहीं माना जाता। फिर इधर क्रिकेट और फिल्म तो संयुक्त व्यवसाय हो गये हैं। क्रिकेट खिलाड़ी रैम्प पर अभिनेत्रियों के साथ नाचते हैं तो फिल्म अभिनेत्रियां और अभिनेता उनकी टीमों के मालिक बन गये हैं। ऐसे ही एक अभिनेता मालिक ने पाकिस्तान से गुलाम न खरीदने पर अफसोस जताया! इस पर देश में एक सीमित वर्ग ने बेकार बावेला मचाया! दरअसल उसके प्रचार प्रबंधक चाहते यही थे इसलिये एक अभिनेत्री मालकिन से कहलवाया गया कि ‘चंद लोगों की धमकी के चलते ऐसा हुआ।’

जहां तक हमारी जानकारी पाकिस्तान के गुलामों को खरीदने को लेकर बयान से पहले कुछ कहा नहीं था। मगर अभिनेता मालिक ने जब बयान दिया तो उस पर हल्ला मचा। आखिर प्रचार प्रबंधकों ने ऐसा क्यों किया? अभिनेता की वह फिल्म पाकिस्तान के दर्शकों के बीच भी जानी थी। दूसरी बात यह कि उसमें उस जाति सूचक शब्द को शीर्षक में शामिल किया गया जो पाकिस्तानियों का सिर गर्व से ऊंचा कर देता है। सच तो यह है कि क्रिकेट के उस बयान को भारत में अनदेखा कर देना चाहिये था क्योंकि यह फिल्म के पाकिस्तानी प्रसारण को रोकने से बचाने के लिये दिया गया था। शायद भारत में कम ही लोग जानते हैं कि पाकिस्तान में अब भारतीय फिल्मों का प्रसारण सार्वजनिक रूप से किया जाने लगा है। कहीं पाकिस्तान के लोग चिढ़कर फिल्म का बहिष्कार न कर दें इसलिये उसे यहां रोकने का अभियान चलाया गया जिससे वहां के आम आदमी को यह अनुभव हो कि भारत के लोग इसे देखने पर चिढेंगे। इधर भारत में फिल्म रोकने के प्रयास को अभिव्यक्ति से जोड़ा गया।
होना तो यह चाहिये था कि पाकिस्तान उस अभिनेता की फिल्म को रोकता मगर विवाद इस तरह फंस गया कि उसके प्रसारण में वहां के प्रबंधकों ने अपना हित देखा। ऐसे में वह बदला कैसे ले! साइकिल वालों को रोक लो!
उसने सही पहचाना! दरअसल साइकिल वाले ऐसे सतही विवादों में नहीं पड़ते। यह कार, स्कूटर, और मोटर साइकिल वाले क्या लड़ेंगे! एक मील पैदल चलने में हंफनी आ जाती है। मामला दूसरा भी है। साइकिल वाले पेट्रोल के दुश्मन हैं यह अलग बात है कि भारत में अभी भी इस देश में कुछ लोग इस पर चल ही रहे हैं। पेट्रोल बेचने वाले देश पाकिस्तान के खैरख्वाह हैं। इस तरह उसने उनको भी बताया कि देखो कैसे भारत के साइकिल वालों को आने से रोका। कहीं यह प्रतियोगिता भारत के खिलाड़ी जीतते तो संभव है कि जिस तरह 1983 की विजय के बाद क्रिकेट का खेल यहां लेाकप्रिय हुआ था, अब कहीं साइकिल भी वहां लोकप्रिय न हो जाये।
एक टीवी पर विज्ञापन आता है। जिसमें स्वयं बच्चा साइकिल पंचर की दुकान खोलकर बाप को पेट्रोल बचाने का उपदेश देते हुए कहता है कि ‘इस तरह तो आपको साइकिल चलानी पड़ेगी, तब पंचर कौन जोड़ेगा।’
तब हंसी आती है क्योंकि पेट्रोल खत्म होने पर न बाप साइकिल चलाने वाला लगता है न लड़का ही कभी पंचर जोड़ने वाला बनते नज़र आता है। वैसे बड़े शहरों का पता नहीं पर छोटे शहरों में साइकिल पंचर जोड़ने वालों की कमी हमें नज़र नहीं आती। पेट्रोल कल खत्म हो जाता है, आज खत्म हो जाये, हमारी बला से! यह देश पानी से चल रहा है पेट्रोल से नहीं। यह भी विचित्र है कि जो पानी हमारे यहां बिखरा पड़ा है उसे बचाने का संदेश कोई नहीं देता बल्कि उस पेट्रोल को बचाने की बात है जिसका अपने देश में उत्पादन बहुत कम है।
हमें तो ऐसा लगता है कि जैसे जैसे साइकिल लोगों ने चलाना कम कर दिया वैसे ही उनकी विचार शक्ति भी क्षीण होती गयी है। कथित सभ्रांत वर्ग के युवाओं के लिये तो साइकिल अब एक अजूबा है। उनके पास समय पास करने के लिये पर्दे पर फिल्में देखना या क्रिकेट में आंखें झौंकने के अलावा अन्य कोई साधन नहीं है। जहां पहुंचना है फट से पहुंच जाते हैं। साइकिल पर जायें तो थोड़ा समय अधिक पास हो। हमारा तो यह अनुभव है कि घुटने घूमते हैं तो दिमाग भी घूमता है। उसमें नित नये विचार आते हैं। कल्पनाशक्ति तीव्र होती है। जब दिमाग विकार रहित होता है तो दूसरा उसका दोहन नहीं कर सकता। आजकल का बाजार जिन लोगों का दोहन कर रहा है उनके पास पैसा है और दिमाग के जड़ होने के कारण वह मनोरंजन का इंतजार करते रहते हैं। बाजार घर में उठाकर उठकार मनोरंजन फैंक रहा है। साइकिल पर चलते फिरते मनोरंजन करने वाले उसके दायरे से बाहर हैं। यही बाजार पूरे विश्व में फैल रहा है और पाकिस्तान ने भारत की साइकिलिंग टीम को रोककर साबित किया कि वह भी उसके दबाव में है। वह फिल्म अभिनेताओं और क्रिकेट खिलाड़ियों का आगमन तो रोक हीं नहीं सकता न!


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Sunday, December 27, 2009

ढपली और राग-व्यंग्य चिंतन (dhapli aur rag-hindi vyangya)

ज्यादा देखने से फायदा भी क्या था? जितना देखा उससे ही समझना काफी था। एक चेहरा निढाल पड़ा हुआ है कोई नारी या नारियां बार बार अपना चेहरा उसके पास ले जाती हैं। वह एक सनसनीखेज खबर है। 86 वर्ष के बुजुर्ग राजनीतिज्ञ पर यौन प्रकरण (sex scandle) का आरोप दर्ज करती वह खबर उसके नायक नायिका (या नायिकायें) की क्रियाओं का दृश्य प्रस्तुत करती है। जिस पर आरोप है उसका चेहरा निढाल पड़ा हुआ है। उसकी कोई हलचल नहीं दिखाई दे रही। अंतर्जाल पर इससे अधिक नहीं दिख रहा। वैसे तो समाचार पत्र पत्रिकाओं और टीवी चैनलों में उस बुजुर्ग नायक के साथ तीन पायजामें और तीन नायिकाओं का भी जिक्र है पर जो अंतर्जाल पर देखा उससे तो लगता है कि जो टीवी चैनल बुजुर्ग नायक की कथित ‘रंगीन मिजाजी का रहस्योद्घाटन करने का दावा कर रहा है उसके बाकी अंश भी कुछ ऐसे ही प्रश्नवाचक चिन्ह लिये खड़े मिलेंगे।
एक आम आदमी की राजनीति में कभी सक्रिय भूमिका नहीं होती सिवाय कि वह उससे संबंधित घटनाओं को पढ़े और विचार करे। इतिहास गवाह है कि राजनीति का क्षेत्र बहुत ही अविश्वसनीय और अनिश्चित है। राज्य कर्ता अच्छा है या बुरा यह इतना महत्वपूर्ण नहीं होता जितना कि वह अपने विरोधियों से सतर्क कितना रहता है और यही बात उसे कार्यकुशलता का प्रमाण देती है।
राजनीति में सत्ता के लिये षड्यंत्र सदियों से चल रहे हैं और आगे भी जारी रहेंगे। सच तो यह है कि दैहिक लोभ का चरम ही है राज्य करने की भावना और इसमें अध्यात्मिक या धर्म की बात एक तरफ उठाकर रखनी पड़ती है। राजनीति इतनी विकट है कि इसमें माता और पुत्र जैसा रिश्ता भी अविश्वसनीय हो जाता है ऐसे में बाकी रिश्तों का महत्व देखना या सोचना बेकार है। यह अलग बात है कि कुछ लोग राजकाज से जुड़े होने पर भी धर्म, अध्यात्मिक तथा समाज का विचार करते हैं-ऐसे लोग धन्य हैं और ऐसा नहीं है कि इतिहास कोई उनको महत्व नहीं देता। इसके बावजूद यह सत्य है कि इतिहास में श्रेष्ठ राजाओं की गिनती अधिक नहीं मिलती बल्कि अधिकतर षड़यंत्रों का शिकार बनते हैं या फिर किसी का शिकार कर स्वयं राजा बनते रहे हैं।
वैसे आजकल की वैश्विक लोकतांत्रिक व्यवस्था में सीधे राजकाल से जुड़े न होने पर भी कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जिनमें रहकर उस पर नियंत्रण किया जा सकता है। यह क्षेत्र है धर्म का। धर्म के क्षेत्र में भी कुछ ऐसे लोग हैं जो अपनी पूज्यनीयता के आधार पर राजकाज पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण करते हैं। यही कारण है कि वहां भी ऐसी उठापठक होती रहती है जैसे कि राज्य जीतने का युद्ध हो।
प्रसंगवश भारत के ही एक 80 वर्षीय संत पर विदेश में ही यौन प्रकरण का ऐसा आरोप लगा था। यह आरोप इतना गंभीर था कि इसके विवाद की आग अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दिखाई दी और उस देश ने उसके निपटारे तक उन संत भारत लौटने पर रोक लगा दी। हालांकि कहा यह गया कि संत अपनी इच्छा से उस विवाद के निपटारे तक वह देश नहीं छोड़ेंगे। आप देखिये उस देश की सरकार ने भी इसका खंडन नहीं किया। इससे यह साफ लगा कि कहीं न कहीं धर्म का राजनीति से कोई अप्रत्यक्ष प्रगाढ़ रिश्ता है। बाद में वह उस आरोप से बरी हो गये। सच बात तो यह है कि श्रीमद्भागवत पर प्रवचन करने वाले उस संत का प्रवचन इस लेखक को भी बहुत अच्छा लगता है। अगर आप श्रीगीता का सूक्ष्म पूर्वक अध्ययन करेंगे तो ऐसे यौन प्रकरण आपको विचार के विषय नहीं लगेंगे। संभव है कि अगर आप अल्पज्ञानी हों तो ऐसे प्रकरण में लिप्त हो जायें पर ज्ञानी हों तो फिर उससे दूर रहेंगे।
एक अध्यात्मिक लेखक के रूप में इस घटना को लेकर कोई क्षोभ या प्रसन्नता नहीं है। याद रखिये कि किसी बड़े आदमी पर कीचड़ उछलने से कुछ लोग प्रसन्न भी होते हैं पर यह उनके अज्ञान और कुंठा का परिणाम होता है।
इसके बावजूद राजनीति का समाज पर प्रभाव होता है तब उसे देखना जरूरी होता है। अब इस प्रकरण की तरफ देखें। एक निढाल चेहरा जिस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं है? प्रश्न आता है कि वह रंगीन मिजाजी कब कर रहा होगा?
बुजुर्ग के समर्थक कहते हैं कि ‘यह एक षड्यंत्र है!’
हो सकता है कि उनका कहना सही हो? पर एक राजनेता को हमेशा सतर्क रहना चाहिये। वह अगर सतर्क नहीं रहे तो फिर उनकी योग्यता पर भी प्रश्न उठता है न!
उनके एक समर्थक कहना है कि वह बुजुर्ग राजनेता एकदम लाचार हैं। यहां तक कि दीप प्रज्जवलित करने के लिये उनको किसी की सहायता चाहिए।
सवाल यह है कि क्या बड़े पदों पर शारीरिक रूप से लाचार लोगों की नियुक्ति होना चाहिए। जिस तबियत का बहाना कर उन्होंने अब इस्तीफा दिया वह पहले क्यों नहीं किया? राजनीति का क्षेत्र लोगों की सेवा करने के लिये या करवाने के लिये? राजनीति में शासन के द्वारा जलकल्याण करने आये हैं या उपभोग कर सेवा पाने।
समर्थकों का यह कहना है सही है कि जहां यह फिल्म बनायी गयी है वह उस स्थान की सुरक्षा तथा कानून से जुड़े अनेक पहलुओं को चुनौती देती है जो कि एक चिंता का विषय है। यौन प्रकरण को गंभीर बनाने के लिये इससे गरीबी और नौकरी जैसे विषय भी जोड़े गये हैं ताकि आम लोगों के तटस्थ रहने की गुंजायश कर रहे।
यह लेखक अंतर्जाल पर वह सब देखने का प्रयास नहीं करता अगर अंतर्जाल लेखकों ने ही बहुत सादगी (?) से आंध्रप्रदेश, तेलगु और यू ट्यूब का उल्लेख नहीं किया होता। यह भी एक तरीका होता है कि आप किसी को लोकप्रिय बनाना चाहें तो उसकी आलोचना कीजिये। है न चालाकी! आप बताईये कि वहां बुरी चीज है! लोग अपने आप जायेंगे और आपका काम भी हो जायेगा।
प्रसंगवश बुजुर्ग के समर्थकों का दावा है कि ‘वह पहले भी ऐसे हमलों से उबरते रहे हैं और अब भी उबर आयेंगे।’
मतलब यह कि उन बुजुर्ग सज्जन का इतिहास भी उनका पीछा कर रहा है। बुजुर्ग महोदय के विरोधियों ने भी इसका पहले इंतजाम कर लिख दिया कि ‘हो सकता है कि यह सभी प्रायोजित हो। वह बुजुर्ग राष्ट्रीय राजनीति में आने को इच्छुक हों और वहां से निकलने के लिये यह नाटक स्वयं ही रचवाया हो ताकि बाद में उसे निकलकर वाह वाही लूट सकें।’
पता नहीं सच क्या है? पर जिस तरह अंतर्जाल पर यह दो तीन फोटो दिखे उससे उन बुजुर्ग सज्जन पर किया यह शाब्दिक आक्रमण अधिक प्रभावी नहीं दिखता। हम तो एक अध्यात्मिक विचारक हैं और उनका सम्मान करेंगे पर इस मामले के कुछ पैंच हमारी समझ में आये वह लिखना जरूरी लगा।
इस बकवास में आखिरी बात यह है कि हमने युट्यूब पर ही कुछ प्रतिकियायें देखी। एक तरह से सभी छद्म नाम थे
एक प्रतिकिया देखी जिसमें भारतीय लोगों के प्रतिकूल टिप्पणी थी।
उसका जवाब भी एक छद्म नाम ‘पाकिस्तानी चुप रह’ लिख दिया।
सवाल यह है कि उस भारतीय को कैसे पता लगा कि वह पाकिस्तानी है। कहीं यह तयशुदा जंग तो नहीं थी।
एक प्रतिक्रिया यह थी कि ‘उत्तर भारतीयों को दक्षिण भारत के किसी प्रदेश में बड़े पर पर नियुक्त नहीं किया जाना चाहिये।’
उसका भी जवाब भी एक दूसरे ने लिखा था कि ‘यह समस्या तो विश्वव्यापी है इसलिये इसमें क्षेत्रवाद जैसी बात नहीं देखनी चाहिये।’
कहने का तात्पर्य यह है कि इस घटना के दूरगामी परिणाम होंगे। एक तमिल मित्र ने बताया था कि दक्षिण में उत्तरी लोगों के दक्षिण के लोगों पर अनाचार के अनेक किस्से किसी समय वहां प्रचलित थे। इनका प्रभाव यह था कि दक्षिण के लोगों का उत्तर के लोगों पर ही विश्वास नहीं रहता था। यह तो आजादी के बाद लोग एक दूसरे के पास आये तो अब वह बात नहीं है। उसने इस लेखक से कहा था कि ‘तुम जैसे मित्र यहां मिलते हैं यह मैं अपने रिश्तेदारों को बताता हूं तो वह हैरान रह जाते हैं।’
उस मित्र ने बताया था कि अपने शहर में बहुत समय तक लोग उससे यह पूछते थे कि‘ क्या वहां रहते हुए तुम्हें लोग परेशान तो नहीं करते?’
अब वह इस तरह के सवाल नहीं करते पर प्रचार माध्यमों को लंबे समय तक चर्चा में रहने के लिये विषय चाहिये तो संभव है वह इस पर बाल कल्याण, नारी कल्याण, संस्कृति और संस्कार के साथ जोड़कर आगे बढ़ाते रहें। संभव है कि क्षेत्रवाद के भूत को शरीर पैदा करने का प्रयास भी हो। बड़े लोगों की बड़ी बातें हैं जी! आम आदमी के रूप में जितना समझें उतना ही कम हैं! वैसे धाार्मिक, सामाजिक तथा आर्थिक क्षेत्रों में विराजमान शिखरपुरुषों ने अपने ओहदे को शासन और अपने उपभोग योग्य समझा न कि जनकल्याण तथा समाज सेवा के लिये। यही कारण है कि अब आम आदमी की सहानुभूति उनके प्रति उतनी नहीं जितना पहले थी। बल्कि आचरण को लेकर विश्वसीनयता का भाव नहीं रहा जो खास आदमी को आम आदमी में महानता की श्रेणी दिलाता है। बाकी सच क्या है? जो आयेगा वह सच भी होगा या नहीं। आजकल प्रायोजन तो सभी जगह होने लगा है न! यहां तो बस यह कहा जा सकता है कि ‘अपनी अपनी ढपली, अपना अपना राग।’
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Thursday, November 26, 2009

जिंदगी का अहसास-हिंन्दी चिंतन और कविता(zindagi ka ahsas-hindi chintan aur kavita)

आदमी अपनी जिंदगी को अपने नज़रिये से जीना चाहता है पर जिंदगी का अपना फलासफा है। आदमी अपनी सोच के अनुसार अपनी जिंदगी के कार्यक्रम बनाता है कुछ उसकी योजनानुसार पूर्ण होते हैं कुछ नहीं। वह अनेक लोगों से समय समय पर अपेक्षायें करता है उनमें कुछ उसकी कसौटी पर खरे उतरते हैं कुछ नहीं। कभी कभी तो ऐसा भी होता है कि संकट पर ऐसा आदमी काम आता है जिससे अपेक्षा तक नहीं की जाती। कहने का तात्पर्य यह है कि जिंदगी भी अनिश्तताओं का से भरी पड़ी है पर आदमी इसे निश्चिंतता से जीना चाहता है। बस यहीं से शुरु होता है उसका मानसिक द्वंद्व जो कालांतर में उसके संताप का कारण बनता है। अगर आदमी यह समझ ले कि उसका जीवन एक बहता दरिया की तरह चलेगा तो उसका तनाव कम हो सकता है। जीवन में हर पल संघर्ष करना ही है यही भाव केवल मानसिक शक्ति दे सकता है। इस पर प्रस्तुत हैं कुछ काव्यात्मक पंक्तियां-
खुद तरसे हैं
जो दौलत और इज्जत पाने के लिये
उनसे उम्मीद करना है बेकार।
तय कोई नहीं पैमाना किया
उन्होंने अपनी ख्वाहिशों
और कामयाबी का
भर जाये कितना भी घर
दिल कभी नहीं भरता
इसलिये रहते हैं वह बेकरार।
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समंदर की लहरों जैसे
दिल उठता और गिरता है।
पर इंसान तो आकाश में
उड़ती जिंदगी में ही
मस्त दिखता है।
पांव तले जमीन खिसक भी सकती है
सपने सभी पूरे नहीं होते
जिंदगी का फलासफा
अपने अहसास कुछ अलग ही लिखता है।
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कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Sunday, November 2, 2008

देवताओं की कृपा है इसलिये अमीरी भी बसती है-आलेख

भारत की गरीबी पूरे विश्व में हमेशा चर्चित रही है। यही कारण है कि भारत के जब आर्थिक विकास की चर्चा होती है तो यहां की गरीबी पर भी दृष्टिपात किया जाता है। अभी तक विश्व के अनेक लोग यह तय नहीं कर पा रहे कि भारत एक गरीब देश है या अमीर।
स्विस बैंक एसोसिएशन में विभिन्न देशों के लोगों द्वारा जमा के आंकड़े देकर यह सवाल पूछा गया है कि ‘कौन कहता है कि भारत एक गरीब देश है’। इसमें क्रमवार पहले पांच देशों का नाम दिया गया है। ताज्जुब की बात है कि भारत का पहला नंबर है और शायद इसी कारण यह प्रश्न किया गया है।
कुछ लोग हैरान है! हर कोई अपने दृष्टिकोण से टिप्पणी कर रहा है। इस लेखक ने भी इसे पढ़ा पर उसकी दिलचस्पी केवल स्विस बैंक द्वारा दिये गये आंकड़े और ऊपर ब्लाग में लिखे गये शीर्षक में थी।
पहले तो यह बात है कि हम कतई नहीं कहते कि भारत एक गरीब देश है। हां, दुनियां के सबसे अधिक गरीब यहां रहते हैं और औसत आंकड़े भी अन्य देशों से अधिक है इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता। यही गरीब एक शोपीस बन गया है। उसके नाम पर जितनी सहायता देश और विदेशों से आती है वह अगर उसके पास पहुंच जाये तो शायद वह अपनी गरीबी भूल जाये। ऐसा होना नहीं है क्योंकि फिर दुनियां भर के अमीर क्या करेंगे? यहां की गरीबी मिटती नहीं तो केवल इसलिये कि वह विश्व की दर्शनीय वस्तु बनकर रह गयी है जिसके आधार पर अनेक फिल्में और उपन्यास बिक जाते हैं। कुछ लोग यहां भी उनके नाम पर नारे और वाद चलाकर अपना काम चला लेते हैं इस आशा में शायद उनको विदेश में कोई पुरस्कार मिल जाये। अनेक फिल्में बनीं और उपन्यास लिखे गये और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उनको पुरस्कार मिला। कथित रूप से सम्मानित फिल्मकार और उपन्यासकार उसके परिणाम स्वरूप यहां अपने जलवे पेलते रहे। कई लोग मूंह बनाकर गरीबों को दर्द का बयां करते हैं तो कुछ विदेश से सम्मानित होकर यहां अनर्गल बातें करते हैं और उनको अखबार में जगह मिल जाती है।

एक उपन्यासकारा हैं जिनका उपन्यास विदेश में सम्मानित हो गया उसके बाद ही उनको इस देश में पहचाना गया। आजकल उनके अनेक विषयों पर विचार प्रकाशित होते हैं और यकीन मानिये वह एकदक अनर्गल प्रलाप लगते हैं। अंतर्जाल पर मित्र लोग उसके विचार प्रकाशित कर अपने आपको धन्य समझते हैं। कई बार विचार आता है कि यहां जवाब दें पर एक तो यहां पाठक कम है दूसरे यह लेखक कोई प्रसिद्ध नहीं कि कोई उसकी सुनेगा। इसलिये ऊर्जा बेकार करना ठीक नहीं लगता है । बहरहाल भारत की गरीबी और कथित सामाजिक दुर्दशा पर अंग्रेजी में लिखने वाले बहुत लोकप्रिय होते हैं पर हिंदी में उनका कोई सम्मान नहीं होता। हिंदी वाले वैसे ही गरीब हैं भला वह क्यों ऐसी बोरिंग रचनाऐं पढ़ेंगे। वैसे भी कहा जाता है कि आदमी के मन को अपनी विपरीत परिस्थितियों का देख और पढ़कर ही मनोरंजन प्राप्त होता है और अंग्रेजी वालों के पास धन और वैभव इसलिये उनको ही ऐसी रचनायें पसंद आती हैं।

बहरहाल हम देश की अमीरी और यहां गरीबों की स्थिति पर नजर डालें। यह देश अमीर है क्योंकि यहां देवताओं का वास है। इंद्र,वायु और अग्नि देवता यहां वास करते हैं और उनकी कृपा से अमीर और गरीब दोनों ही पल जाते हैं। यह कोई अंधविश्वास की स्थापना का प्रयास नहीं है। यह तो पश्चिम के भूवैज्ञानिक द्वारा दी गयी यह जानकारी है कि जितना भूजल भारत में उपलब्ध है उतना अन्य किसी देश में नहीं है। इस मामले में वह भारत को भाग्यशाली मानते हैं। अब यह तो सभी जानते हैं कि इस प्रथ्वी पर जीवन का आधार तो जल ही है। जल की वजह से यहां वायु और अग्नि देवता की भी कृपा है। यही कारण लोग उनको पूजते हैं और वह उनकी रक्षा करते हैं। ब्रह्मा जी ने देवताओं की उत्पति कर यही कहा था कि देवता प्रथ्वी पर जीवन का सृजन कर उसका पालन करें और मनुष्य उनकी पूजा करें। यही तो सब सदियों से चल रहा है। ब्रह्मा जी ने धन धान्य से इस देश को संपन्न किया और फिर लोगों को मानसिक शांति दिलाने के लिये भक्ति अध्यात्म ज्ञान के लिये भी यहां अपने विचार भी रखे। याद रखिये भारत को विश्व में अध्यात्म गुरु भी माना जाता है और सोने की चिडि़या तो पहले भी कहा जाता था पर बीच में छोड़ दिया था अब फिर सवाल उठा है तो जवाब देना पड़ता है कि हां भई यहां लक्ष्मीजी का भी वास है।

इस देश का आकर्षण सदियों से विश्व की दृष्टि में रहा है क्योंकि यहां का अध्यात्मिक ज्ञान और धन धान्य से संपन्नता सभी को लुभाती है। यही कारण है कि इस पर आक्रमण होते रहे। लोग यहां से लूटकर सामान अपने देश में पहुंचाते रहे, मगर फिर भी यह देश गरीब नहीं हुआ क्योकि यहां प्राकृतिक साधनों में की स्थिति यथावत रही। अन्य हमलावार तो यहां की संस्कृति नहीं मिटा सके पर अंग्रेजों ने यह काम भी कर दिया। देश के विभिन्न राजाओं और अन्य शीर्षस्थ लोगों में व्याप्त अहंकार का लाभ उठाकर उनको ही आपस में लड़ाया। आये थे ईस्ट इंडिया कंपनी के नाम से व्यापार करने और देश के शासक बन गये। इस देश में हमेशा शासन रहे इसलिये ऐसी शिक्षा पद्धति का निर्माण किया जो केवल गुलाम पैदा करती है। वह चले गये पर अपना तंत्र ऐसा बना गये कि आज भी देश का छोटा बड़ा आदमी उनको ही पदचिन्हों पर चल रहा है। आपस में ही एक दूसरे पर विश्वास नहीं है।

पैसा तो गरीब का ही है क्योंकि उसके पसीने से ही बनता है आर्थिक सम्राज्य। किसान जमीन में जो फसल उगाते हैं उसी से ही सारे देश का काम चलता है। मजदूर और किसान को अपने श्रम का जो प्रतिफल मिलना चाहिये वह पूरा नहीं मिलता। उसको प्रतिफल में हुई कमी बनाते हैं किसी को अमीर और वहीं पैसा आज स्विस बैंक में जमा है।
भारतीय अध्यात्म में दान की महिमा बहुत है पर गरीबों के मसीहाओं को वह रास नहीं आता क्योंकि उसमें हक जैसा आभास नहीं आता। गरीबों को हक दिलाने का नारा यहां के लोगों को आज भी प्रिय लगता है और जो जितनी जोर से यह नारा लगाता है वह उनका दिल जीत लेता है। यही कारण है कि जन कल्याण एक फैशन और व्यापार की तरह हो गया है। जो जन कल्याण समाज के शक्तिशाली लोग स्वेच्छा करते थे वह भी इस कारण पीछे हट गये। अब जल कल्याण केवल राज्य के अधीन है और सभी समाजों और समुदायों के शीर्षस्थ लोग केवल उन पर नियंत्रण करने के लिये कल्याण का दिखावा करते हैं।

इस देश से पैसा ले जायेंगे फिर भी यह देश हारेगा नहीं-यह बात अंग्रेजों ने देख ली थी। वह यहां के लोगों के मन मस्तिष्क से भारतीय अध्यात्म और दर्शन की स्मृतियां मिटाना चाहते थे। इसलिये उन्होंने ऐसी विचारधाराओं को आगे बढ़ाया जो उसे नष्ट कर सकते है।
मूर्तिपूजा अंध विश्वास है। सभी भगवान के स्वरूप मिथक हैं। सभी साधु सन्यासी भ्रष्ट हैं। यज्ञ हवन से कुछ नहीं होता। आदि आदि ऐसी बातें कही गयीं। आज भारत में उनके अग्रज भी यही कहते हैं। वैसे कहने वाले कुछ भी कहते रहें पर यह वास्तविकता यह है कि अनेक लोग उनकी परवाह नहीं करते। मंदिर जाकर पत्थर की प्रतिमा पर माला या जल चढ़ाने वाले सुखी नहीं है तो वह भी कौन सुखी हैं जो नहंी जाते। आस्तिक दुखी है तो नास्तिक कौन यहां स्वर्ग भोग रहे हैं। इसके विपरीत जो मंदिरों पर जाकर माला या जल चढ़ाकर अपने आस्तिक भाव से जुड़े है उनके चेहरे पर फिर भी रौनक लगती है और अवसर पर पड़े तो वही किसी गरीब की सहायता कर देते हैं। जो अपने नास्तिक होने के अहंकार में हैं वह तो बस गरीबों की तरफ देखकर अपनी बातें बोल और लिखकर प्रसिद्ध जरूर पा लेते हैं पर किसी गरीब के लिये व्यक्तिगत रूप से कुछ नहीं करते। इसके लिये वह राज्य की तरफ देखते हैं और उसे ही कोसते है।

पहले अनेक लोग ऐेसे होते थे जो थोड़ा पैसा होने पर कहीं तीर्थ वगैरह करने चले जाते थे। वहां अनेक सेठ साहुकारों द्वारा बनी गयी धर्मशालायें होती थीं पर अब तो सभी जगह फाइव स्टार होटल हो गये हैं और यकीनन उनको उनमे सामान्य आदमी के रहने की शक्ति नहीं होती। इसके बावजूद लोग जाते हैं क्योंकि देवताओं की कृपा से खाना और पानी तो मिल ही जाता है। अमीर और गरीब आज भी अपने देवताओं को पूजते है और अभी भी यह पश्चिम के लिये यह असहनीय है। इसलिये वह ऐसा सवाल उठाते हैं कि ‘कौन कहता है कि भारत गरीब है‘। मगर उनसे यह कहा किसने था? कार्ल माक्र्स ने अपनी विचारधारा को पश्चिम में बैठकर लिखा था। उनका मित्र भी एक पूंजीपति था। मजे की बात यह है कि पश्चिम और पूंजीपति ही उनकी विचारधारा के विरोधी रहे पर पूर्व के लोगों ने उसे हाथों हाथ लिया क्योंकि उसमें थे केवल गरीबों के नारे जिसमें गरीब आसानी से बहल जाये।

पूर्व में समाज स्वसंचालित थे पर धीरे धीरे समाज को सरकार से नियंत्रित बना कर उनको समाप्त कर दिया गया । अब अमीर लोग समाज के गरीब लोगों के लिये स्वयं कल्याण करने का काम नहीं करते बल्कि यह राज्य की जिम्मेदारी मानते हैं। धन तो धन है वह उनके पास बढ़ता ही जाता है और वह उनको पश्चिम में भेज देते हैं। पश्चिम की मौज है और यहां चलती रहते हैं बस खालीपीली बहसें। समाज,भाषा और क्षेत्रों को लेकर लोग आपस में झगडे करते है। चीन अपने समाज को मिटा चुका है अब वह दूसरी जगह यही करने का काम कर रहा है। वह अपनी प्रगति का प्रचार कर रहा है पर उसकी वास्तविकता बताने के लिये वहां कोई स्वतंत्र माध्यम नहीं है। भारत में कम से कम यह तो है कि सब सामने आ जाता है। जैसे यह बात आ गयी कि स्विस बैंकों में सबसे अधिक भारतीयों का पैसा जमा है। बहरहाल यह बात तो है कि भारत में देवताओं की कृपा के कारण प्राकृतिक साधनों का बाहुल्य है इसलिये यहां गरीबी के साथ अमीरों की भी बस्ती है। यह अलग बात है कि अमीर अपना अतिरिक्त धन गरीबों के साथ नहीं बांटते बल्कि पश्चिम वालों पर भरोसा कर उनको सौंप देते हैं।
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Friday, October 10, 2008

जैसा ज्ञान, वैसा बखान-हास्य व्यंग्य

सिनेमा या टीवी के पर्दे पर चुंबन का दृश्य देखकर लोगों के मन में हलचल पैदा होती है। अगर ऐसे में कहीं किसी प्रसिद्ध हस्ती ने किसी दूसरी हस्ती का सार्वजनिक रूप से चंुबन लिया और उसकी खबर उड़ी तो हाहाकार भी मच जाता है। कुछ लोग मनमसोस कर रह जाते हैं कि उनको ऐसा अवसर नहंी मिला पर कुछ लोग समाज और संस्कार विरोधी बताते हुए सड़क पर कूद पड़ते हैं। चुंबन विरोधी चीखते हैं कि‘यह समाज और संस्कार विरोधी कृत्य है और इसके लिये चुंबन लेने और देने वाले को माफी मांगनी चाहिये।’

अब यह समझ में नहीं आता कि सार्वजनिक रूप से चुंबन लेना समाज और संस्कारों के खिलाफ है या अकेले में भी। अगर ऐसा है तो फिर यह कहना कठिन है कि कौन ऐसा व्यक्ति है जो कभी किसी का चुंबन नहीं लेता। अरे, मां बाप बच्चे का माथा चूमते हैं कि नहीं। फिर अकेले में कौन किसका कैसे चुंबन लेता है यह कौन देखता है और कौन बताता है?

सार्वजनिक रूप से चुंबन लेने पर लोग ऐसे ही हाहाकार मचा देते हैं भले ही लेने और देने वाले आपस में सहमत हों। अगर किसी विदेशी होंठ ने किसी देशी गाल को चुम लिया तो बस राष्ट्र की प्रतिष्ठा के लिए खतरा और समाज और संस्कार विरोधी और भी न जाने कितनी नकारात्मक संज्ञाओं से उसे नवाजा जाता है। कहीं कहीं तो जाति,धर्म और भाषा का लफड़ा भी खड़ा हो जाता है। पश्चिमी देशों में सार्वजनिक रूप से चुंबन लेना शिष्टाचार माना जाता है जबकि भारत में इसे अभी तक अशिष्टता की परिधि में रखा जाता है। यह किसने रखा पता नहीं पर जो रखते हैं उनसे बहस करने का साहस किसी में नहीं होता क्योंकि वह सारे फैसले ताकत से करते हैं और फिर समूह में होते हैं।

इतना तय है कि विरोध करने वाले भी केवल चुंबन का विरोध इसलिये करते हैं कि वह जिस सुंदर चेहरे का चुंबन लेता हुआ देखते हैं वह उनके ख्वाबों में ही बसा होता है और उनका मन आहत होता है कि हमें इसका अवसर क्यों नहीं मिला? वरना एक चुंबन से समाज,संस्कृति और संस्कार खतरे में पड़ने का नारा क्यों लगाया जाता है।
दूसरे संदर्भ में इन विरोधियों को यह यकीन है कि समाज में कच्चे दिमाग के लोग रहते हैं और अगर इस तरह सार्वजनिक रूप से चुंबन लिया जाता रहा तो सभी यही करने लगेंगे। ऐसे लोगों की बुद्धि पर तरस आता है जो पूरे समाज को कच्ची बुद्धि का समझते हैं।

फिल्मों में भी नायिका के आधे अधूरे चुंबन दृश्य दिखाये जाते हैं। नायक अपना होंठ नायिका के गाल के पास लेकर जाता है और लगता कि अब उसने चुुंबन लिया पर अचानक दोनों में से कोई एक या दोनों ही पीछे हट जाते हैं। इसके साथ ही सिनेमाहाल में बैठे लड़के -जो इस आस में हो हो मचा रहे होते हैं कि अब नायक ने नायिका का चुंबन लिया-हताश होकर बैठ जाते हैं। चुम्मा चुम्मा ले ले और देदे के गाने जरूर बनते हैं नायक और नायिक एक दूसरे के पास मूंह भी ले जाते हैं पर चुंबन का दृश्य फिर भी नहीं दिखाई देता।

आखिर ऐसा क्यों? क्या वाकई ऐसा समाज और संस्कार के ढहने की वजह से है। नहीं! अगर ऐसा होता तो फिल्म वाले कई ऐसे दृश्य दिखाते हैं जो तब तक समाज में नहीं हुए होते पर जब फिल्म में आ जाते हैं तो फिर लोग भी वैसा ही करने लगते हैं। फिल्म से सीख कर अनेक अपराध हुए हैं ऐसे मेंं अपराध के नये तरीके दिखाने में फिल्म वाले गुरेज नहीं करते पर चुंबन के दृश्य दिखाने में उनके हाथ पांव फूल जाते हैंं। सच तो यह है कि चूंबन जब तक लिया न जाये तभी तक ही आकर्षण है उसके बाद तो फिर सभी खत्म है। यही कारण है कि काल्पनिक प्यार बाजार में बिकता रहे इसलिये होंठ और गाल पास तो लाये जाते हैं पर चुंबन का दृश्य अधिकतर दूर ही रखा जाता है।

यह बाजार का खेल है। अगर एक बार फिल्मों से लोगों ने चुंबन लेना शुरू किया तो फिर सभी जगह सौंदर्य सामग्री की पोल खुलना शुरू हो जायेगी। महिला हो या पुरुष सभी सुंदर चेहरे सौंदर्य सामग्री से पुते होते हैं और जब चुंबन लेंगे तो उसका स्पर्श होठों से होगा। तब आदमी चुंबन लेकर खुश क्या होगा अपने होंठ ही साफ करता फिरेगा। सौंदर्य प्रसाधनों में केाई ऐसी चीज नहीं हेाती जिससे जीभ को स्वाद मिले। कुछ लोगों को तो सौदर्य सामग्री से एलर्जी होती और उसकी खुशबू से चक्कर आने लगते हैं। अगर युवा वर्ग चुंबन लेने और देने के लिये तत्पर होगा तो उसे इस सौंदर्य सामग्री से विरक्त होना होगा ऐसे में बाजार में सौंदर्य सामग्री के प्रति पागलपन भी कम हो जायेगा। कहने का मतलब है कि गाल का मेकअप उतरा तो समझ लो कि बाजार का कचड़ा हुआ। याद रखने वाली बात यह है कि सौदर्य की सामग्री बनाने वाले ही ऐसी फिल्में के पीछे भी होते हैं और उनका पता है कि उसमें ऐसी कोई चीज नहीं है जो जीभ तक पहुंचकर उसे स्वाद दे सके।

कई बार तो सौंदर्य सामग्री से किसी खाने की वस्तु का धोखे से स्पर्श हो जाये तो जीभ पर उसके कसैले स्वाद की अनुभूति भी करनी पड़ती है। यही कारण है कि चुंबन को केवल होंठ और गाल के पास आने तक ही सीमित रखा जाता है। संभवतः इसलिये गाहे बगाहे प्रसिद्ध हस्तियों के चुंबन पर बवाल भी मचाया जाता है कि लोग इसे गलत समझें और दूर रहें। समाज और संस्कार तो केवल एक बहाना है।

एक आशिक और माशुका पार्क में बैठकर बातें कर रहे थे। आसपास के अनेक लोग उन पर दृष्टि लगाये बैठै थे। उस जोड़े को भला कब इसकी परवाह थी? अचानक आशिक अपने होंठ माशुका के गाल पर ले गया और चुंबन लिया। माशुका खुश हो गयी पर आशिक के होंठों से क्रीम या पाउडर का स्पर्श हो गया और उसे कसैलापन लगा। उसने माशुका से कहा‘यह कौनसी गंदी क्रीम लगायी है कि मूंह कसैला हो गया।’

माशुका क्रोध में आ गयी और उसने एक जोरदार थप्पड़ आशिक के गाल पर रसीद कर दिया। आशिक के गाल और माशुका के हाथ की बीचों बीच टक्कर हुई थी इसलिये आवाज भी जोरदार हुई। उधर दर्शक तो जैसे तैयार बैठे ही थे। वह आशिक पर पिल पड़े। अब माशुका उसे बचाते हुए लोगों से कह रही थी कि‘अरे, छोड़ो यह हमारा आपसी मामला है।’

एक दर्शक बोला-‘अरे, छोड़ें कैसे? समाज और संस्कृति को खतरा पैदा करता है। चुंबन लेता है। वैसे तुम्हारा चुंबन लिया और तुमने इसको थप्पड़ मारा। इसलिये तो हम भी इसको पीट रहे हैं।’

माशुका बोली‘-मैंने चुंबन लेने पर थप्पड़ थोड़े ही मारा। इसने चुंबन लेने पर जब मेरी क्रीम को खराब बताया। कहता है कि क्रीम से मेरा मूंह कसैला हो गया। इसको नहीं मालुम कि चुंबन कोई नमकीन या मीठा तो होता नहीं है। तभी इसको मारा। अरे, वह क्रीम मेरी प्यारी क्रीम है।’

तब एक दर्शक फिर आशिक पर अपने हाथ साफ करने लगा और बोला-‘मैं भी उस क्रीम कंपनी का ‘समाज और संस्कार’रक्षक विभाग का हूं। मुझे इसलिये ही रखा गया है कि ताकि सार्वजनिक स्थानों पर कोई किसी का चुंबन न ले भले ही लगाने वाला केाई भी क्रीम लगाता हो। अगर इस तरह का सिस्टम शुरु हो जायेगा तो फिर हमारी क्रीम बदनाम हो जायेगी।’

बहरहाल माशुका ने जैसे तैसे अपने आशिक को बचा लिया। आशिक ने फिर कभी सार्वजनिक रूप से ऐसा न करने की कसम खाइ्र्र।

हमारा देश ही नहीं बल्कि हमारे पड़ौसी देशों में भी कई चुंबन दृश्य हाहाकर मचा चुके हैं। पहले टीवी चैनल वाले प्रसिद्ध लोगों के चुंबन दृश्य दिखाते हैं फिर उन पर उनके विरोधियों की प्रतिक्रियायें बताना नहीं भूलते। कहीं से समाज और संस्कारों की रक्षा के ठेकेदार उनको मिल ही जाते हैं।

वैसे पश्चिम के स्वास्थ्य वैज्ञानिक चुंबन को सेहत के लिये अच्छा नहीं मानते। यह अलग बात है कि वहां चुंबन खुलेआम लेने का शिष्टाचार है। भारतीय उपमहाद्वीप में इसे बुरा समझा जाता है। चुंबन लेना स्वास्थ्य के लिये बुरा है-यह जानकर समाज और संस्कारों के रक्षकों का सीना फूल सकता है पर उनको यह जानकर निराशा होगी कि अमेरिकन आज भी आम भारतीयों से अधिक आयु जीते हैं और उनका स्वास्थ हम भारतीयों के मुकाबले कई गुना अच्छा है।

वैसे सार्वजनिक रूप से चुंबन लेना अशिष्टता या अश्लीलता कैसे होती है इसका वर्णन पुराने ग्रंथों में कही नहीं है। यह सब अंग्रेजों के समय में गढ़ा गया है। जिसे कुछ सामाजिक संगठन अश्लीलता कहकर रोकने की मांग करते हैं,कुछ लोग कहते हैं कि वह सब अंग्रेजों ने भारतीयों को दबाने के लिये रचा था। अपना दर्शन तो साफ कहता है कि जैसी तुम्हारी अंतदृष्टि है वैसे ही तुम्हारी दुनियां होती है। अपना मन साफ करो, पर भारतीय संस्कृति के रक्षकों देखिये वह कहते हैं कि नहीं दृश्य साफ रखो ताकि हमारे मन साफ रहें। अपना अपना ज्ञान है और अलग अलग बखान है।
जहां तक चंबन के स्वाद का सवाल है तो वह नमकीन या मीठा तभी हो सकता है जब सौंदर्य सामग्री में नमक या शक्कर पड़ी हो-जाहिर है या दोनों वस्तुऐं उसमें नहीं होती।
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कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप

Friday, June 20, 2008

सनसनी गद्दारी से फैलती है वफादारी से नहीं-व्यंग्य

जब शाम को घर पहुंचने के बाद आराम कर रहा था तो पत्नी ने कहा-‘आज इंटरनेट का बिल भर आये कि नहीं!
मैंने कहा-‘तुम बाजार चली जाती तो वहीं भर जाता। मेरे को काम की वजह से ध्यान नहीं रहता।’
पत्नी ने कहा-‘घर पर क्या कम काम है? बाजार जाने का समय ही कहां मिलता है? अब यह बिल भरने का जिम्मा मुझ पर मत डालो।’
मैंने कहा-‘तुम घर के काम के लिये कोई नौकर या बाई क्यों नहीें रख लेती।’
मेरी पत्नी ने कहा-‘क्या कत्ल होने या करने का इरादा है। वैसे भी तुम जिस तरह कंप्यूटर से रात के 11 बजे चिपकने के बाद सोते हो तो तुम्हें होश नहीं रहता। कहीं मेरा कत्ल हो जाये तो सफाई देते परेशान हो जाओगे। अभी मीडिया वाले पूछते फिर रहे हैं कि आठ फुट की दूरी से किसी को अपने बेटी की हत्या पर कोई चिल्लाने की आवाज कैसे नहीं आ सकती। अगर मेरा कत्ल हो जाये तो तुम तो आठ इंच की दूरी पर आवाज न सुन पाने की सफाई कैसे दोगे? मीडिया वाले कैसे तुम पर यकीन करेंगे? यही सोचकर चिंतित हो जाती हूं। ऐसे में तुम नौकर या बाई रखने की बात सोचना भी नहीं। वैसे अगर स्वयं काम करने की आदत छोड़ दी तो फिर हाथ नहीं आयेगा। समय से पहले बुढ़ापा बुलाना भी ठीक नहीं है।
मैंने कहा-‘इतने सारे नौकर काम कर रहे हैं सभी के घर कत्ल थोड़े ही होते हैं। तुम कोई देख लो। मैं फिर उसकी जांच कर लूंगा।’
मेरी पत्नी ने हंसते हुए कहा-‘कहां जांच कर लोगे? अपनी जिंदगी में कभी कोई नौकर रखा है जो इसका अभ्यास हो।’

मैंने कहा-‘तुम तो रख लो। हम तो बड़े न सही छोटे सेठ के परिवार में पैदा हुए इसलिये जानते हैं कि नौकर को किस तरह रखा जाता है।’

मेरी पत्नी ने कहा-‘दुकान पर नौकर रखना अलग बात है और घर में अलग। टीवी पर समाचार देखो ऐसे नौकरों के कारनामे आते हैं जिनको घर के परिवार के सदस्य की तरह रखा गया और वह मालिक का कत्ल कर चले गये।’
मैंने कहा-‘क्या आज कोई इस बारे में टीवी पर कोई कार्यक्रम देखा है?’
उसने कहा-‘हां, तभी तो कह रही हूं।’
मैंने कहा-‘तब तो तुम्हें समझाना कठिन है। अगर तुम कोई टीवी पर बात देख लेती हो तो उसका तुम पर असर ऐसा होता है कि फिर उसे मिटा पाना मेरे लिये संभव नहीं है।’

बहरहाल हम खामोश हो गये। वैसे घर में काम के लिये किसी को न रखने का यही कारण रहा है कि हमने जितने भी अपराध देखे हैं ऐसे लोगों द्वारा करते हुए देखे हैं जिनको घर में घुस कर काम करने की इजाजत दी गयी । सात वर्ष पहले एक बार हमारे बराबर वाले मकान में लूट हो गयी। उस समय मैं घर से दूर था पर जिन सज्जन के घर लूट हुई वह मेरे से अधिक दूरी पर नहीं थी। कोई बिजली के बिल के बहाने पड़ौसी के घर में गया और उनकी पत्नी चाकू की नौक पर धमका कर हाथ बांध लिये और सामान लूट कर अपराधी चले गये। मेरी पत्नी अपनी छत पर गयी तो उसे कहीं से घुटी हुई आवाज में चीखने की आवाज आई। वह पड़ौसी की छत पर गयी और लोहे के टट्र से झांक कर देख तो दंग रह गयी। वह ऊपर से चिल्लाती हुई नीचे आयी। उसकी आवाज कर हमारे पड़ौस में रहने वाली एक अन्य औरत भी आ गयी। दोनो पड़ौसी के घर गयी और उस महिला को मुक्त किया। उनके टेलीफोन का कनेक्शन काट दिया गया था सो मेरी पत्नी ने मुझे फोन कर उस पड़ौसी को भी साथ लाने को कहा।
मैं एक अन्य मित्र को लेकर उन पड़ौसी के कार्यालय में उनके पास गया। सबसे पहले उन्होंने अपनी पत्नी का हाल पूछा तो मैने अपनी पत्नी से बात करायी। तब वह बोले-‘यार, अगर पत्नी ठीक है तो मैं तो पुलिस में रपट नहीं करवाऊंगा।’
वह अपने एक मित्र को लेकर स्कूटर पर घर की तरफ रवाना हुए और मैं अपनी साइकिल से घर रवाना हुआ। चलते समय मेरे मित्र ने कहा-‘ अगर यह पुलिस में रिपोर्ट नहीं लिखवाते तो ठीक ही है वरना तुम्हारी पत्नी से भी पूछताछ होगी।’
हम भी घर रवाना हुए। वहां पहुंचे तो पुलिस वहां आ चुकी थी। मेरी पत्नी ने पड़ौसी के भाई को भी फोन किया था और उन्होंने वहीं से पुलिस का सूचना दी। अधिक सामान की लूट नहीं हुई पर सब दहशत में तो आ ही गये थे।

एक दो माह बीता होगा। उस समय घर में किसी को काम पर रखने का विचार कर रहे थे तो पता लगा कि पड़ौसी के यहां लूट के आरोपी पकड़े गये और उनमें एक ऐसा व्यक्ति शामिल था जो उनके यहां मकान बनते समय ही फर्नीचर का काम कर गया था। इससे हमारी पत्नी डर गयी और कहने लगी तब तो हम कभी भी किसी ऐसे व्यक्ति को घुसने ही न दें जिसे हम नहीं जानते। यही हमारे लिये अच्छा रहेगा।’
यह घटना हमारे निकट हुई थी उसका प्रभाव मेरी पत्नी पर ऐसा पड़ा कि फिर घर में किसी बाई या नौकर को घुसने देने की बात सोचने से ही उसका रक्तचाप बढ़ जाता है। फिर उसके बाद जब भी कभी वह काम अधिक होने की बात करती हैं मैं किसी को काम पर रखने के लिये कहता हूं पर टीवी पर अक्सर ऐसी खबरें आती हैं कि अपना विचार स्थगित कर देती हैं।’

उस दिन कहने लगी-‘पता नहीं लोग अपना काम स्वयं क्यों नहीं करते। नौकर रख लेते हैं।
मैंने कहा-‘तुम भी रख सकती हो। अगर यह टीवी चैनल देखना बंद कर दो। कभी सोचती हो कि ग्यारह सौ वर्ग फुट के भूखंड पर बने मकान की सफाई में ही जब तुम्हारा यह हाल है तो पांच-पांच हजार वर्ग फुट पर बने मकान वाले कैसे उसकी सफाई कर सकते हैं? मुझसे बार बार कहती हो कि छोटा प्लाट लेते। क्या जरूरी था कि इतना बड़ा पोर्च और आंगन भी होता। तब उन बड़े लोगों की क्या हालत होगी जो जमाने को दिखाने के लिये इतने बड़े मकान बनाते हैं। वह अपनी पत्नियों के तानों का कैसे सामना कर सकते हैं जब मेरे लिये ही मुश्किल हो जाता है।’
हमारी पत्नी सोच में पड़ गयी। इधर सास-बहू के धारावाहिकों का समय भी हो रहा था। वह टीवी खोलते हुए बोली-‘इन धारावाहिकों में तो नौकर वफादार दिखाते हैं।
मैंने हंसते हुुए कहा-‘तो रख लो।’
फिर वह बोली-‘पर वह न्यूज चैनल तो कुछ और दिखा रहे है।
मैंने कहा-‘तो फिर इंतजार करो। जब दोनों में एक जैसा ‘नौकर पुराण दिखाने लगें तब रखना। वैसे समाचार हमेशा सनसनी से ही बनते हैं और गद्दारी से ही वह बनती है वफदारी से नहीं। इसलिये दोनों ही जगह एक जैसा ‘नौकर पुराण’ दिखे यह संभव नहीं है। इसलिये मुझे नहीं लगता कि तुम किसी को घर पर काम पर रख पाओगी।’
मेरी पत्नी ने मुस्कराते हुए पूछा-‘तुम्हारे ब्लाग पर क्या दिखाते हैं?’

मैंने कहा-‘अब यह तो देखना पड़ेगा कि किसने टीवी पर क्या देखा है? बहरहाल मैंने तो कुछ नहीं देखा सो कुछ भी नहीं लिख सकता। सिवाय इसके कि वफदारी से नहीं गद्दारी से फैलती है सनसनी।’
मेरी पत्नी ने पूछा-‘इसका क्या मतलब?’
मैंने कहा-‘मुझे स्वयं ही नहीं मालुम

दीपक भारतदीप

Monday, April 14, 2008

क्रिकेट में अब वह रोमांच नहीं रहा

कानपुर में कल खत्म तीसरे टेस्ट मैच को देखकर तो ऐसा लगता है कि खिलाड़ी अब पांच दिवसीय मैचों में भी ट्वंटी-ट्वंटी जैसा खेलने चाहते हैं। पिच बहुत खराब थी या उस पर खेला नहीं जा सकता है यह केवल एक प्रचार ही लगता है। इसी पिच पर लक्ष्मण और गांगुली जमकर खेले और शायद इसलिये कि उनको अब इसका आभास हो गया है कि ट्वंटी-ट्वंटी के चक्क्र में रहे तो इससे भी जायेंगे। बाकी खिलाडी तो इसी चक्कर में है कि अब ट्वंटी-ट्वंटी का समय आ रहा है और उसके लिये इन्हीं टेस्ट मैचों में ही प्रयास किये जायें तो अच्छा है। चाहे कितनी भी सफाई दी जाये पर तीन दिन मे चार परियों का होना इस बात का प्रमाण है कि खिलाडि़यों में अब पिच पर टिक कर बल्लेबाजी करने की धीरज समाप्त हो गया है।
मैने यह मैच नहीं देखा। कल ऐसा लगा रहा कि भारत जीत रहा है तब काम से चला गया। जिस तरह राहुल द्रविड़ और गांगुली को खेलते देखा तो यह लगा कि पिच कैसी भी हो बल्लेबाज पर भी बहुत कुछ निर्भर होता है। संभव है कि अब ट्वंटी-ट्वंटी की जो प्रतियोगिता हो रही है उसके लिये कुछ खिलाड़ी तैयारी कर रहे हों और जिनको वहां पैसा कमाने का अवसर नहीं मिला हो वह इस प्रयास में रहे हो कि ट्वंटी-ट्वंटी के किसी प्रायोजक की नजर उस पर पड़ जाये। भारत जीत गया इससे कुछ लोगों को बहुत तसल्ली हो गयी होगी क्योंकि पिछले टेस्ट मैच में कुछ लोग भारत की हार पर रुआंसे हो गये होंगे। कुछ मिलाकर अब क्रिकेट के प्रशंसकों के दायरा सिमट रहा है और मुझे नहीं लगता कि इसकी किसी को फिक्र है। राष्ट्रीय भावना को इस खेल से जोड़ने का कोई मतलब नहीं रहा क्योंकि अब तो विदेशी खिलाड़ी भी इसमें कुछ देश के खिलाडियों के साथ मिलकर अपनी टीमों का मोर्चा संभालेंगे। भारत के संवेदनशील लोगों को यह गवारा नहीं होगा पर यह भी सच है कि आर्थिक उदारीकरण के इस युग में यह सब तो चलता रहेगा।
1983 में विश्व कप जीतने पर ही भारत में एकदिवसीय क्रिकेट मैच लोकप्रिय हुए थे और उसका कारण था कि लोगों में राष्ट्रप्रेम का भाव जाग उठा था। अब भले ही क्रिकेट में पैसा अधिक हो गया है पर उसका जो नया रूप सामने आ रहा है उसे देखते हुए उसमें ऐसी कोई भावना रखना अपने आपको धोखा देना होगा। हम जैसे लोगों के लिये तो अब भावनात्मक रूप से इस खेल में जुड़ना मुश्किल है जो हर बात में कुछ रोमांच तो चाहते हैं पर उसके साथ अपने क्षेत्र, प्रदेश और राष्ट्र की भावना की संतुष्टि चाहते हैं। अब तो इस खेल के साथ वही लोग जुड़ेंगे जो शुद्ध रूप से मनोरंजन तथा आर्थिक फायदे चाहते हैं।

Monday, March 31, 2008

इसलिए आत्मकथा नहीं लिखते-व्यंग्य

बरसों पहले कृश्न चंदर का उपन्यास देख ‘एक गधे की आत्मकथा’। पूरा नहीं पढ़ा क्योंकि उसमें गधे का बोलना-चालना समझ में नहीं आ रहा था। मैंने अपने जीवन में पढ़ने की शूरूआत पंचतंत्र की कहानियों और रामचरित मानस से की है इसलिये मुझे कई ऐसे उपन्यास भी नहीं समझ में आते जो बहुत प्रसिद्ध हैं। हां, ‘स्वर्णलता’ मेरा प्रिय उपन्यास है। बंगाली भाषा में लिखे गये इस उपन्यास का हिंदी अनुवाद मैने पढ़ा और मुझे बहुत पंसद आया जिन लोगों ने इसे पढ़ा होगा वह समझ सकते हैं कि वह मुझे क्यों पसंद आया। मुझे संघर्ष करने वाले पात्र पसंद है और वह भी जब कहीं न कहीं विजेता होते हैं। कृश्न चंदर के उस उपन्यास को मैने अपने बचपन में पढ़ने की बहुत कोशिश की पर नहीं पढ़ सका। हां, तब ख्याल आता था कि अगर जिंदगी में अच्छा लेखन नहीं कर पाये तो आत्म कथा जरूर लिखेंगे।

अभी भी कई बार ख्याल आता है कि आत्मकथा लिख डालें पर होता यह कि हमें उस उपन्यास की याद आ जाती है और तब सोचते हैं कि उसमें लिखें क्या? उसका शीर्षक क्या लिखे? कहीं न कहीं तो लिखना पड़ेगा कि आत्मकथा। अपना नाम लिखें या मेरी आत्मकथा लिख ही काम चलाये। मुख्य मुद्दा तो है उसमें लिखने वाली संभावित सामग्री। हम उसमें लिखेंगे तो अपने तन और मन पर जो बोझ उठाते हुए ही दिखेंगे। हमारी जिन्दगी भी मस्खरी से कम नहीं रही। लिखने की दृष्टि से भी अपनी भाषा शैली कृश्न चंदर जैसी नहीं हो सकती। वैसे तो ब्लाग लेखक के रूप में कोई नाम नहीं है और लेखक के रूप में भी कोई पहचान नहीं है पर मान लीजिये कोई थोड़ा बहुत नाम पढ़कर किताब ले भी तो वह कहेगा यह तो आदमी की कम गधे की आत्मकथा अधिक लगती है। अपने तन और मन पर इतना बोझ तो कोई गधा ही उठा सकता है। इतना अपमान सहन करने की ताकत तो केवल गधे में ही होती है। ऐसी बहस तो केवल तो कोई गधा ही कर सकता है। एक के बाद एक गल्तियां तो कोई गधा ही कर सकता है।

हम खुद बदनाम हों तो कोई बात नहीं है पर अगर हमने वाकई उसमें कई सच लिखे तो कई ऐसे लोग बदनाम हो जायेगे जिनके मूंह पर हमने कभी उनकी मूर्खताऐं और बेईमानियां उनके मूंह पर नहीं कही। आदमी दूसरे को धोखा देता है या खुद खाता है इस प्रश्न की खोज अगर हमने अपनी आत्मकथा में दिखाई तो ऐसे लोगों पर कीचड़ के छींटे गिरेंगे जिनको वह हमसे छिपाने की आशा करते हैं। जीवन के सत्य के साथ भी बहूत लोग जीते हैं यह हमने देखा है पर अधिकतर लोग बनावटी जिन्दगी जीते हैं। अपने भ्रम को दूसरे शिक्षा और संस्कार के नाम पर थोपते हैं। चारों तरफ जीवन का ज्ञान देने वाले लोग अपने जीवन में जिस अज्ञान के अंधेरे में रहते हैं उसे देखकर उन पर कभी हंसी तो कभी तरस आता है। हमारे आसपास अपने जीवन के झंझावतों में फंसे लोग यह आशा तो करते हैं कि हम उनकी मदद करें पर उनकी शर्तों के अनुसार। हमने देखा है कि हमने ही दूसरों की शर्तें मानी पर हमारा अवसर आया तो अपनी शर्तें थोपीं फिर भी वैसी मदद भी नहीं की जैसी हमने अपेक्षा की थी।

मतलब यह कि अपनी आत्मकथा लिखने से अच्छा है कि किश्तों में कहानियों और व्यंग्यों में अपनी बात कहते रहें। इतनी बड़ी किताब लिखें और फिर अपने पैसे लेकर प्रकाशक ढूंढें और इस बात की कोई गारंटी नहीं कि कोई उसे पढ़ेगा। हमारे एक मित्र से जब हमने आत्मकथा लिखने की बात की तो वह बोला-‘‘अभी तुम अपने व्यंग्यों में हम पर बहुत फब्तियां कस जाते हो और किताब में भी कोई अपनी गल्तियां थोड़े ही लिखोगे हमारे ऊपर ही सब लिखोगे। मत लिखो क्योंकि अपने को जितना सही साबित करने की करोगे उतना ही झूठे माने जाओगे। अपनी रचनाओं में तुम अपनी चर्चा नहीं करते इसलिये कोई तुम्हारे नाम से अधिक चर्चा नहीं करता पर आत्मकथा में सब तुम्हें झूठा ही समझेंगे।’’

सो तमाम विचार कर हमने आत्मकथा लिखने का कार्यक्रम स्थगित कर दिया।

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