समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
Showing posts with label क्रिकेट. Show all posts
Showing posts with label क्रिकेट. Show all posts

Wednesday, May 12, 2010

टी-ट्वंटी विश्व कप में घटोत्कच वध जैसा दृश्य -हिन्दी लेख (T-20 world cup cricket match)

बीसीसीआई की क्रिकेट टीम टी-ट्वंटी विश्व कप से बाहर हो गयी। टीवी चैनल वाले इसको लेकर प्रलाप कर रहे हैं। अब उन्हें अपने देश की इज्जत लुट जाने का गम साल रहा है। वाह यार! क्या गजब़ है!
जब पाकिस्तान के खिलाड़ियों को भारत के आयोजित क्लब स्तरीय प्रतियोगिता में नहीं खरीदा गया तब यही चैनल वाले देशभक्ति की बात ताक पर रखकर इसका विरोध कर रहे थे। 26/11 के जख्म की वरसी पर मोमबत्तियां जलाने के दृश्य दिखाने वाले यह टीवी चैनल भूल गये थे कि यह कार्य उस पाकिस्तान ने किया है जहां की जनता भारत से नफरत करती है। अब फिर क्रिकेट में हारने पर देश के जज़्बातों की आड़ में गम बेचने का प्रयास कर रहे हैं जिसे अब कोई भी देख सकता है।
दरअसल इन चैनलों को इस बात का गम नहीं कि देश की इज्जत की लुटिया डूब गयी बल्कि उनको लग रहा है कि अब निकट भविष्य में उनके क्रिकेट के कार्यक्रम लोकप्रियता के अंक बढ़ाने में सहायक नहीं होंगे। दूसरे यह भी कि खिलाड़ियों के विरुद्ध अपने देश के आम लोगों में एक मानसिक विद्रोह पैदा होगा जिससे उनके अभिनीत विज्ञापनों के उत्पाद भी अलोकप्रिय हो सकते हैं। कुछ के विज्ञापन भी शायद उत्पादक वापस लेना चाहें जैसे कि 2007 के विश्व कप में बीसीसीआई की टीम की हार पर हुआ था। इसका सीधा आशय यह है कि इन टीवी चैनलों को आर्थिक नुक्सान हो सकता है-यहां यह बात साफ कर दें कि यह केवल अनुमान है क्योंकि बाज़ार और प्रचार के खिलाड़ी येनकेन प्रकरेण क्रिकेट की लोकप्रियता बचाने का प्रयास करेंगे।
एक चैनल इस हार के बाद धोनी के मुस्कराने पर एतराज जता रहा था। अरे भई, इस हार पर तो वह हर ज्ञानी आदमी खुश होगा जो सोचता है कि क्रिकेट की लोकप्रियता गिरे तो उस पर सट्टा खेलने वाली नयी पीढ़ी के सदस्यों का भविष्य अंधकारमय न हो। आये दिन ऐसी खबरे पढ़ने को मिलती हैं कि कर्ज में डूबे आदमी ने अपने परिवार के सदस्यों को मारा। अखबारों में आये दिन यह भी खबर आती है कि सट्टा खेलने और खिलाने वाले पकड़े गये। आज तक इस बात का आंकलन नहीं हुआ कि इस खेल का देश के परिवारों पर अप्रत्यक्ष रूप से कितना दुष्प्रभाव पड़ता है।
धोनी के मुस्कराने पर इतना एतराज करना ठीक नहीं है। ऐसा लगता है कि घटोत्कच वध जैसा प्रसंग उपस्थित हो गया है। महाभारत युद्ध में जब कर्ण की ब्रह्म शक्ति से घटोत्कच का वध हुआ तब सारे पांडव दुःखी होकर उसके शव के निकट गये पर कृष्ण प्रसन्नता से अपना शंख बचा रहे थे। वजह पूछने पर उन्होंने बताया कि ‘घटोत्कच राक्षस था। वह इस युद्ध से बचता भी तो मैं उसे मारता। दूसरे यह कि जब तक कर्ण के पास शक्ति के रहते मैं अर्जुन को मरा हुआ मानता था। कर्ण की उस शक्ति ने घटोत्कच का वध करके अर्जुन को जीवनदान दिया है।’
बात सीधी है कि क्रिकेट के कारण अनेक युवा बुरे रास्ते का शिकार हो रहे हैं। दूसरे यह खेल आलसी खेल है और इससे शरीर या मन को कोई लाभ नहीं होता। ऐसे में फुटबाल, टेनिस या अन्य खेलों को प्रोत्साहन मिले तो अच्छा ही रहेगा।
जहां तक देश भक्ति की बात है तो उसके लिये बहुत सारे क्षेत्र हैं। इस गुलामों के खेल में उसे देखने की आवश्यकता नहीं है। जिसमें समय और धन की बर्बादी क अलावा शारीरिक तथा मानसिक विकार पैदा होते है-यह बात खिलाड़ियों पर नहीं केवल दर्शकों के लिये लिखी जा रही है। हम तो अपने देश को भारत के नाम से जानते हैं और चैनल वाले भी इसे टीम इंडिया कहते हैं तब इसके प्रति आत्मीय भाव वैसे भी अनेक लोगों के मन में नहीं रह जाता। फिर बीसीसीआई की टीम है जिसकी एक कथित उपसमिति क्लब स्तरीय प्रतियोगितायें कराती हैं। यह बात भी आम लोगों को तब पता लगी जब उसमें तमाम गोलमाल की बात सामने आयी। तब यह भी प्रश्न उठा कि पिछली बार जब इनको भारत में प्रतियोगिता कराने की अनुमति नहीं मिली तब उसे दक्षिण अफ्रीका में उसे कराया गया। सीधी बात यह है कि बीसीसीआई को क्रिकेट से मतलब है देश से नहीं। वह एक कंपनी की तरह काम करती है और कोई भी कंपनी चाहे कितनी भी प्रसिद्ध या बड़ी हो वह देश की प्रतीक नहीं हो सकती।
हाकी हमारा राष्ट्रीय खेल है और उसमें अपनी टीम आजकल जोरदार प्रदर्शन कर रही है। आशा है वह आगे भी जारी रखेगी। अगर इस हार से देश में क्रिकेट की लोकप्रियता गिरती है और हमारी नयी पीढ़ी तमाम तरह की बुराईयों से बचती है तो यह बुरी नहीं है। हम तो यही चाहते हैं कि देश की युवा पीढ़ी को संबल मिले। अन्य खेलों में बढ़कर खिलाड़ी देश का नाम करें और उनको युवा पीढ़ी दर्शक के रूप में प्रोत्साहन दे। प्रसंगवश कर्ण की शक्ति से आहत होने की बावजूद घटोत्कच ने अपना कद बहुत बढ़ा लिया और जब गिरा तो उसने कौरवों की बहुत सारी सेना मारकर अपने बड़ों का भला किया। अब युद्ध तो होते नहीं खेल भी युद्ध जैसे हो गये हैं। दूसरे अब चौसर वाली जुआ नहीं खेली जाती कुछ खेलों ने उसकी जगह ले ली है। इसलिये अब बीसीसीआई की टीम की हार से देश क्रिकेटिया व्यसनों से बचता है तो अच्छा ही होगा।
________________________
कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
------------------------

दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

Monday, April 14, 2008

क्रिकेट में अब वह रोमांच नहीं रहा

कानपुर में कल खत्म तीसरे टेस्ट मैच को देखकर तो ऐसा लगता है कि खिलाड़ी अब पांच दिवसीय मैचों में भी ट्वंटी-ट्वंटी जैसा खेलने चाहते हैं। पिच बहुत खराब थी या उस पर खेला नहीं जा सकता है यह केवल एक प्रचार ही लगता है। इसी पिच पर लक्ष्मण और गांगुली जमकर खेले और शायद इसलिये कि उनको अब इसका आभास हो गया है कि ट्वंटी-ट्वंटी के चक्क्र में रहे तो इससे भी जायेंगे। बाकी खिलाडी तो इसी चक्कर में है कि अब ट्वंटी-ट्वंटी का समय आ रहा है और उसके लिये इन्हीं टेस्ट मैचों में ही प्रयास किये जायें तो अच्छा है। चाहे कितनी भी सफाई दी जाये पर तीन दिन मे चार परियों का होना इस बात का प्रमाण है कि खिलाडि़यों में अब पिच पर टिक कर बल्लेबाजी करने की धीरज समाप्त हो गया है।
मैने यह मैच नहीं देखा। कल ऐसा लगा रहा कि भारत जीत रहा है तब काम से चला गया। जिस तरह राहुल द्रविड़ और गांगुली को खेलते देखा तो यह लगा कि पिच कैसी भी हो बल्लेबाज पर भी बहुत कुछ निर्भर होता है। संभव है कि अब ट्वंटी-ट्वंटी की जो प्रतियोगिता हो रही है उसके लिये कुछ खिलाड़ी तैयारी कर रहे हों और जिनको वहां पैसा कमाने का अवसर नहीं मिला हो वह इस प्रयास में रहे हो कि ट्वंटी-ट्वंटी के किसी प्रायोजक की नजर उस पर पड़ जाये। भारत जीत गया इससे कुछ लोगों को बहुत तसल्ली हो गयी होगी क्योंकि पिछले टेस्ट मैच में कुछ लोग भारत की हार पर रुआंसे हो गये होंगे। कुछ मिलाकर अब क्रिकेट के प्रशंसकों के दायरा सिमट रहा है और मुझे नहीं लगता कि इसकी किसी को फिक्र है। राष्ट्रीय भावना को इस खेल से जोड़ने का कोई मतलब नहीं रहा क्योंकि अब तो विदेशी खिलाड़ी भी इसमें कुछ देश के खिलाडियों के साथ मिलकर अपनी टीमों का मोर्चा संभालेंगे। भारत के संवेदनशील लोगों को यह गवारा नहीं होगा पर यह भी सच है कि आर्थिक उदारीकरण के इस युग में यह सब तो चलता रहेगा।
1983 में विश्व कप जीतने पर ही भारत में एकदिवसीय क्रिकेट मैच लोकप्रिय हुए थे और उसका कारण था कि लोगों में राष्ट्रप्रेम का भाव जाग उठा था। अब भले ही क्रिकेट में पैसा अधिक हो गया है पर उसका जो नया रूप सामने आ रहा है उसे देखते हुए उसमें ऐसी कोई भावना रखना अपने आपको धोखा देना होगा। हम जैसे लोगों के लिये तो अब भावनात्मक रूप से इस खेल में जुड़ना मुश्किल है जो हर बात में कुछ रोमांच तो चाहते हैं पर उसके साथ अपने क्षेत्र, प्रदेश और राष्ट्र की भावना की संतुष्टि चाहते हैं। अब तो इस खेल के साथ वही लोग जुड़ेंगे जो शुद्ध रूप से मनोरंजन तथा आर्थिक फायदे चाहते हैं।

Sunday, January 6, 2008

क्रिकेट में बेईमानी:ज़रा चाणक्य नीति देख लें

आस्ट्रेलिया में जो बीसीसीआई की टीम से जो व्यवहार हुआ उस पर सब चैनल दिखा रहे हैं और अपने देश के पुराने विद्वान खिलाड़ी अपनी-अपनी राय दे रहे हैं-उनकी बातें समझ में नहीं आ रहीं है । इस हालत में क्या करना चाहिए? मैंने सोचा क्यों न चाणक्य नीति देखी जाये। यहाँ मैं बता दूं कि महापुरुषों के सन्देश ज्ञान बघारने के लिए नहीं बल्कि स्वाध्याय करने के लिए लिखता हूँ। आज मैंने पुन: अपना लिखा ढूँढा उसमें मुझे कुछ वाक्य सही लगे और उन्हें प्रस्तुत कर रहा हूँ।

1.किसी भी व्यक्ति का सम्मान जिस क्षेत्र में न हो उसे त्याग देना चाहिऐ क्योंकि सम्मान के बिना जीवन का कोई अर्थ नहीं रह जाता।

मैं सोच रहा था कि क्या वहाँ बीसीसीआई की टीम का सम्मान कहीं रह गया है जो वहाँ अभी भी रुकी हुई है।

2.अपने कर्तव्य से विमुख होकर होकर कहीं भी सम्मान नहीं पाता है। अपने सम्मान के रक्षा स्वयं करनी होती है।

क्या उसकी टीम जो अपने देश के नाम को धारण किये बैठी है देश के सम्मान की रक्षा का कर्तव्य निर्वाह कर रही है और अपमानित करने वालों के खिलाफ कहीं कोई कार्यवाही की है।

3.ऐसा धन जो बैरियों की शरण में जाने पर मिलता है उसे त्याग देना चाहिए।
जिस तरह आस्ट्रेलिया में खिलाडियों और अंपायरों ने उसके साथ व्यवहार किया है क्या उसे बैरियों जैसा नहीं है और अब भी यह टीम तीसरे टेस्ट के लिए तैयार हो गयी है। क्या यह व्यवासायिक मजबूरी निभाना अब भी जरूरी है।

यह रचनाएँ जरूर पढ़ें

Related Posts with Thumbnails

हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर

यह रचनाएँ जरूर पढ़ें

Related Posts with Thumbnails

विशिष्ट पत्रिकाएँ