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Wednesday, January 1, 2014

लोकतंत्र में बाज़ार और प्रचार समूहों की शक्ति अधिक-ईसवी संवतः 2014 पर एक संदेशपूर्ण चिंत्तन लेख (loktanta mein bazar aur prachar samoohon ki shakti adhik- a massege and thought article on new year 2014)



            ईसवी संवत् 2014 प्रारंभ हो गया है।  वैसे देखा जाये तो हमारे यहां हिन्दू संवत् अध्यात्मिक रूप से हमारे हृदय के अधिक निकट होता है पर उसका राजकीय महत्व न होने से उसे केवल सामाजिक उत्सव मनाया जाता है जिसे बाज़ार और प्रचार माध्यम अधिक समर्थन नहीं देते। आजकल समाज पर बाज़ार और प्रचार का अधिक प्रभाव है और इससे सामाजिक संस्कार और संस्कृति निश्चित रूप से प्रभावित हो रही है।  देखा जाये तो जब तक पारंपरिक पर्वों से बाज़ार का लाभ होता था तब तक प्रचार माध्यम अपने विज्ञापन स्वामियों के लिये भारतीय संस्कृति का बोझ ढोते रहे।  अब पश्चिमी संस्कृति से बाज़ार में  विदेशी प्रभाव से परिष्कृत उत्पादों का प्रभाव बढ़ा है। खान पान, रहन सहन तथा मनोरंजन के साधन अब स्वदेशी रूप का प्रभाव खो चुके हैं। इसलिये वैलंटाईन डे तथा ईसवी नव संवत् पर नये उपभोग के रूपों के निर्मित  उत्पाद बेचने के लिये प्रचार माध्यम अपनी रणनीति बनाते हैं।
            एक बात हमारे समझ में नहीं आती कि आनंद में यह उत्तेजना क्या होती है? टीवी पर बर्फीले इलाके में घूम रहे पर्यटक ने साक्षात्कार में कहा कि यहां बहुत एक्साईटमेंट हो रहा है।’’
            हमें अंग्रेजी कम आती है पर एक्साईटमेंट का आशय उत्तेजना से होता है।  आनंद की यह उत्तेजना शराब से अधिक मिलती है।  इस तरह की उत्तेजना मनुष्य के विवेक का हरण करती है। शराब के बाद दूसरा आंनद तब आता है जब उसके चरम पर होते ही आदमी  किसी से लिपट जाता है। मां अपने बच्चे की लीला से जब आनंदित होती है तब वह उसे गले से लिपटा देती हैं। पिता जब बेटी से प्रसन्न होता है तो उसके सिर पर हाथ फेरता है।  कहने का आशय यह है कि आदमी आनंद की उत्तेजना में किसी दूसरे देह का स्पर्श करता है।  इस तरह बर्फ पर पांव रखकर चलना या उसे उछालना किस तरह आनंद के चरमोत्कर्ष पर पहुंचाता है यह कहना कठिन है।  बहरहाल बाज़ार के प्रचारक आदमी को आनंद के चरमोत्कर्ष पर पहुंचाने का तीव्र प्रयास करता है जिसमें विवेक के हृास के साथ  परंपरा और संस्कारों की मूल्यहीनता प्रकट होने की संभावना अधिक रहती है।
            बाज़ार और प्रचार समूहों की शक्ति के आगे समाज किस तरह नाचता है यह हम देख ही चुके हैं।  जिसे समाज पर नियंत्रण करना हो वह बाज़ार के सौदागरों सांठगांठ कर प्रचार प्रबंधकों के दम पर ढेर सारी लोकप्रियता हासिल कर सकता है। देश में उदारीकरण के बाद मध्यमवर्गीय समाज बुरी तरह से बिखरा है। खासतौर से लड़कों को रोजगार और लड़कियों के विवाह की समस्या इस वर्ग के लिये जटिल हुई है।  सबसे बड़ी बात यह कि रोजगार में असुरक्षा का भाव पैदा हुआ है।  एक अर्थशास्त्री के नाते हम देखें तो आज से पंद्रह बीस वर्ष पूर्व तक एक स्थिर समाज था जो स्वयं को अस्थिर अनुभव कर रहा है।  बड़ी कंपनियों के आगमन से नौकरियों का सृजन हुआ है पर लघु तथा व्यवसायों में लगे मध्यम वर्ग के लिये अब अस्तित्व बचाने का संकट सामने हैं। कंपनी नामक दैत्य समाज को खाता जा रहा है। छोंटे व्यवसायी का सम्मान लगभग खत्म हो चुका है।
            अभी हाल ही में राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य पर एक नये दल का उदय हुआ है। अन्ना हजारे जी ने एक भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन प्रारंभ किया जिससे उनके कुछ भक्तों को विशेष प्रचार मिला।  उन्होंने एक राजनीतिक दल बनाया और सफल रहे। इस दल को पूरी तरह से प्रचार समूहों का सहारा मिला इसमें संशय नहीं है। अन्य स्थापित दल इससे विचलित हो गये हैं क्योंकि अब देश के युवा इस दल की तरफ आकर्षित हो रहे हैं।  इसका कारण भी वाली है। इस दल ने भले ही दंत तथा नखहीन अल्पमत वाली सरकार बनायी है पर उसके मंत्री एकदम आम आदमी रहे हैं।  पच्चीस छब्बीस साल की लड़की मंत्री बन गयी है। अनेक युवा मंत्री बने है। इससे पहले स्थापित राजनीतिक दलों में युवाओं को कभी इस तरह उभरने का अवसर नहीं मिला।  सच बात तो यह है कि आज कोई भी आम परिवार अपने युवा पुत्र तथा पुत्री को राजनीतिक क्षेत्र में जाने की सलाह नहीं देता। यह एक तरह स्थापित रजनीतिक दलों में व्याप्त जड़ता के भाव के अनेक ऐसे प्रमाण है कि युवाओं के नाम राजनीतिक दलों में परिवारवाद के आधार पर चयन को प्राथमिकता दी। नये दल ने राजनीति मे ंव्याप्त इस जड़भाव के स्थान पर आशावाद का संचार किया है।  इससे वही लोग समझते हैं जिन्होंने कभी किसी राजनीतिक दल से नाता नहीं रखा।  दूसरी बात यह कि इसके मंत्री आम आदमी के बीच जिस तरह विचर रहे हैं उससे लोगों में उत्सुकता का भाव पैदा हो रहा है। आधुनिक लोकतंत्र में प्रचार के सहारे ही चुनाव में जीत या हार मिलती है ऐसे में आम आदमी का इस नये के प्रति रुझान एक या दो नहीं वरन् समस्त राजनीतिक दलों के संकट का कारण बन सकता है, एक सामान्य निरपेक्ष लेखक के रूप में हमारा तो ऐसा ही मानना है।
            आज 1 जनवरी 2014 को इसी नये दल के हमने कुछ जगह सदस्यता अभियान के लिये स्टॉल लगे देखे।  ऐसा लगा कि किसी कंपनी का प्रचार हो या जैसे एक नयी दुकान खुल गयी है। हमें पता नहीं इस दल के पीछे कौनसे वास्तविक तत्व हैं पर जब अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन चल रहा था तब हमने कहा था कि वह प्रायोजित किया गया हो सकता है। विश्व में चल रहे असंतोष का प्रभाव भारत में परिलक्षित न हो इसलिये बाजार तथा प्रचार समूही इसे प्रायोजित कर रहे हैं। दूसरा यह भी कि बाज़ार तथा प्रचार समूहों के शिखर पुरुष विदेश में अपने समकक्ष लोगों के सामने सीना तानकर कह सकते होंगे कि उनके यहां भी इस तरह का आंदोलतन चल रहा है। इस तरह के ंसदेह का  कारण यह था कि इस अंादोलन के समाचारों तथा बहसों के बीच बाज़ार के उत्पादों का ही विज्ञापन हो रहा था। नया दल इसी आंदोलन की देन है और संभव  है कि वही आर्थिक ताकतें राजनीतिक प्रभाव बनाये रखने के लिये इस आशा के साथ मदद कर रही हों ताकि लोगों का आज की राजनीति के प्रति खत्म हो रहा रुझान बना रहे। इस तरह का अनुमान इसलिये भी किया जा सकता है कि इस दल के पर्दे पर दिख रहे कर्णधार पेशेवर समाज सेवक यानि चंदा लेकर लोगों का भला करते रहे हैं।  संभव है पर्दे के पीछे कुछ उत्साही, निष्कर्मी, तथा विद्वान इसे सहायता कर रहे हों क्योंकि उनका लक्ष्य समाज हित करना ही रहता है। कम से कम हम जैसे बौद्धिक लोग तो यह मानते हैं कि इस दल का उदय होना ही चाहिये था।  देश के निर्जीव होते जा रहे लोकतंत्र के लिये यह आवश्यक भी था।  संभव है कि हम जैसी सोच अनेक लोगों की हो बाज़ार और प्रचार समूहों ने इसे समझा हो इसलिये ही इस दल के अभ्युदय में जुटे हों।  इस दल को ढेर सारे सदस्य और चंदा मिल जायेगा इसमें संदेह नहीं है पर सवाल यह है कि देश में राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक क्षेत्र मेें जो समस्यायें उनके निराकरण में यह दल कितना सहायका होगा? दिल्ली देश नहीं है पर वहां से कोई  निकले हल्के आशावादी संदेश पर लोगों का ध्यान जाता है।  संभव है कि कि हम जैसे लोगों यह सोच भी  बाज़ार तथा प्रचार समूहों के संयुक्त समाज नियंत्रण की रणनीति के प्रभाव में फंसने के कारण बनी हो। हमारे पास अपना कोई साधन तो है नहीं इसलिये वर्तमान सक्रिय प्रचार माध्यमों के आधार पर ही अपना चिंत्तन लिखते हैं।
            हमें सबसे अधिक चिंता अस्थिर समाज को लेकर है।  जाति, भाषा, वर्ण, धर्म तथा अन्य आधारों पर बने समाज टूट चुके हैं पर नया कुछ नहीं बन रहा है।  उम्मीद है नये ईसवी संवत् में कुछ नया होगा।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com
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Sunday, November 10, 2013

क्रिकेट खेल से शालीन विदाई के क्षण-हिन्दी लेख(cricket khel se shallen vidai ke kshan-hindi article or lekh on sachin fairwell)



            अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट से अलविदा करने के लिये तैयार कथित भगवान का अब भी बाज़ारीकरण हो रहा है।  आखिर उसे भगवान कहा किसने? यकीनन कोई सच्चा क्रिकेट खिलाड़ी या प्रेमी किसी भी खिलाड़ी के साथ भगवान की उपाधि स्वीकार नहीं कर सकता।  बाज़ार उसका कृतज्ञ है कि उसने अपने व्यक्तिगत खेल के प्रभाव से उनके उत्पादों के विज्ञापनों का संचालन कुशलता से किया।  उसका चेहरा आकर्षक है।  आंखों की मासूमियत स्त्रियों को प्रभावित करती है और उस पर फिल्माया गया कोई भी विज्ञापन अपनी वस्तु को लोकप्रियता दिलाता है।  बाज़ार के सहयोगी प्रचार माध्यम उसे भगवान कहकर लोगों को हसंने का अवसर देते रहे।  वह भगवान उन लोगों के लिये रहा जिनको इससे पैसा कमाना था।  वरना उसके निजी आंकड़े बीसीसीआई की क्रिकेट टीम की किसी एतिहासिक यात्रा के सहायक नहीं बने।  इसके पीछे सच यह है कि जब वह जब अकेले पराक्रम प्रकट कर रहा था तब उसके सहारे अनेक अक्षम खिलाड़ियों का खराब प्रदर्शन छिपता जा रहा था।  कुछ बेईमान खिलाड़ी भी उसके साथ रहे जिन्हें बाद में फिक्सिंग के कारण दंडित होना पड़ा।  देखा जाये तो जब उसका खेल चरम पर था तब फिक्ंिसग अपने पांव पूरी तरह जमा रही थी।  उसके खेल निर्विवाद श्रेष्ठ था पर बीसीसीआई की टीम का सामूहिक प्रदर्शन  उसी दौर में सबसे ज्यादा खराब रहा।  इस पर अलग से विश्लेषण करना चाहिये।
                        हैरानी की बात यह है कि पिछले कुछ दिन से अंतर्राट्रीय मैचों से सट्टे की चर्चा एकदम गायब थी पर जैसे ही वह अपने अंतिम मैच खेलने उतरा फिर सट्टे की चर्चा गरम हो गयी। वह कितने रन बनायेगा, कब आउट होगा, कितने रन बनायेगा इन बातों को लेकर सट्टा लग रहा है, ऐसा प्रचार माध्यम कह रहे हैं।  इधर प्रचार माध्यम भी अनेक सफेदपोश प्रतिष्ठित लोगों को एकत्रित कर उसकी विदाई को सम्मानजनक बनाने में लगे हैं।  क्रिकेट विशेषज्ञों में कुछ ऐसे हैं जो भले ही पैसा कमाने के लिये पर्दे पर उसकी विदाई को आकर्षक बनाने के लिये आंखों देखा हाल सुनाकर उसकी प्रशंसा कर रहे हों पर वह जानते हैं कि बीसीसीआई की वर्तमान  टेस्ट टीम में उसके लिये जगह ही नहीं बनती।  कलकत्ता में बीसीसीआई की जिस टीम ने वेस्टइंडीज की हराया उसमें शामिल खिलाड़ियों पर दृष्टिपात करें तो यही  भगवान योग्यता की दृष्टि से 11 वां होना चाहिये।  इसका मतलब यह है कि उससे ज्यादा योग्य खिलाड़ी देश में है और 11 वां नंबर इसलिये उसे मिला क्योंकि वह टीम में शामिल है। मुंबई में होने वाले अंतिम टेस्ट का महत्व केवल इसलिये है क्योंकि भगवान वहां से विदाई लेने वाला है। जहां तक परिणाम का प्रश्न है वेस्ट इंडीज की वर्तमान कमजोर टीम बीसीसीआई की टीम को हरा पाये इसकी संभावना नगण्य है।
            एक दूसरा सच भी है जैसे जैसे भगवान का पतन प्रारंभ हुआ वैसे  वैसे बीसीसीआई की टीम ने उत्कर्ष की तरफ कदम बढ़ाये।  अब तो लोगों ने यह कहना प्रारंभ कर दिया था कि पहले भगवान दूसरे खिलाड़ियों का बोझ उठा रहा था अब उसका बोझ नये खिलाड़ी उठा रहे हैं।  कुछ क्रिकेट विशेषज्ञ तो यह भी कहते रहे हैं कि भगवान को अनफिट हुए छह वर्ष हो गये हैं। इतने बरस तक वह खेला तो केवल बाज़ार और प्रचार समूहों के प्रभाव की सहायता उसे मिली। उसे टीम से हटाना सहज नहीं था। देखा जाये तो हम पर्दे पर जो अब टीमें देखते हैं उनका निष्पक्ष चयन एक दिखावा होता है क्योंकि बिना प्रायोजकों की सहमति से खिलाड़ियों का आना संभव नहीं है।  कभी आपने मैच के बाद पुरस्कारों के चयन के समय पीछे लगे कंपनियों के प्रचार वाले बोर्ड देखे होंगे।  क्या आप मान सकते हैं कि इतनी सारी कपंनियां निरपेक्ष भाव से क्रिकेट खेल को चलते देख सकती हैं। अपने उत्पाद के विज्ञापनों के माडलों की छवि बनाये रखने की चिंता नहीं करती होंगी जो खराब प्रदर्शन के बावजूद उन्हें टीम में रखने से जाहिर होती है। यह कंपनियां  खिलाड़ियों के चयन और खेल पर प्रभाव डालने का प्रयास नहीं करती होंगी, इस पर यकीन करना कठिन है।  वह खिलाड़ी भगवान इसलिये कहलाया क्योंकि उसकी वजह से कंपनियों को यह खेल एक सोने की खान की तरह हाथ आया। सट्टेयबाजों ने भी अपना काम किया।  भगवान कभी स्वयं गलत काम में शािमल न हो पर उसकी आड़ में कुछ गलत तत्व छिपते रहे।
            चलते चलते विराट कोहली के खेल की चर्चा करें।  दूसरी पारी में लक्ष्य का पीछा करते हुए जितने मैच उसने बीसीसीआई की टीम को इतनी कम अवधि में जितवायें होंगे उसके दस फीसदी का मुकाबला भी भगवान की पारियों के आंकड़े नहीं कर सकते। लोग विराट कोहली में भगवान का रूप देख रहे हैं और हम सोचते हैं कि भगवान विराट कोहली जैसा क्यों नहीं खेल सका। 1983 में भारत को विश्व कप जितवाने वाले कपिल देव और अब धोनी वास्तव में टीम के सदाबहार नायक कहे जा सकते हैं।  धोनी तो गजब का योद्धा है।  हम सोचते हैं कि भगवान के व्यक्तिगत कीर्तिमान भले ही उससे बेहतर हैं पर इतिहास उसके कुल पराक्रम को उस तरह प्रकट क्यों नहीं करता जैसा कि दावा प्रचार माध्यम करते हैं।  बहरहाल एक मामले में उसकी प्रशंसा करना चाहिये। उसका व्यवहार मैदान पर हमेशा शालीन रहा और यही देश के अन्य खिलाड़ियों को सीखना चाहिये।  क्रिकेट में ऐसी शालीन विदाई भी किसी की नहीं देखी गयी।                       


लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Thursday, October 24, 2013

सौदागरों के लफड़े-हिन्दी व्यंग्य कविता(saudagaron ke lafde-hindi vyangya kavita)



शोर मचा है कहीं बाज़ार में
सौदागर काले हाथ करते हुए  पकड़े हैं,
कानून की जंजीरों में अब जकड़े  है,
हैरान है सौदागरों के कारिंदे
यह सोचकर कि अपना काफिला
कैसे आगे चलेगा,
कहंी उनके घर में घी की बजाय
तेल का चिराग तो नहीं जलेगा,
इसलिये नारे लगाते हुए
अपने मालिक की ईमानदारी पर
सीना तानकर खड़े अकड़े हैं।
कहें दीपक बापू
दौलतमंद चाहे कितने भी आगे हों
सारे जहान में
मगर ईमान के रास्ते चलने पर
उनकी नानी हमेशा मरती,
हुकुमत पर काबू रखने का
ख्वाब अच्छा है
मगर उसके आगे चलने की ख्वाहिश भी
उनकी आहें भरती,
यह अलग बात है
कानून अंधा है
कभी कभी चल पड़ता है
अपने ही दोस्तों की तरफ
अपने हाथ बढ़ाते हुए,
खरीदते हैं जो उसे अपने सिक्कों की दम पर
चल पड़ता है डंडा लेकर कभी
उनको डराते हुए,
सौदागरों के हमदर्द
ज़माने के बिखर जाने का खौफ दिखाते हैं
आवाज इतनी जोर से करते
ताकि कोई न पूछे
उनके मालिकों के दूसरे कितने लफड़े हैं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Monday, October 14, 2013

उनका हिसाब-हिन्दी व्यंग्य कविता (unka hisab-hindi vyangya kavita)



जिनको उम्मीद है कोई तुमसे
उन पर  अपना आसरा
कभी नहीं टिकाना,
वादे पर वादे वह करेंगे
मतलब निकलते ही
बदल लेंगे  अपना ठिकाना।
कहें दीपक बापू
अगर वह चालाक नहीं होते,
गद्देदार पलंग की बजाय जमीन पर सोते,
वफादारी निभाने की अगर उनमें तमीज होती,
तब क्यों उनकी एकदम सफेद कमीज होती,
पसीने की एक बूंद नहीं है शरीर पर जिनके,
आम इंसान होते उनके लिये तिनके,
एक हाथ उठाकर वह एक चीज मांगें
तुम दोनो हाथों से दो चीज देना
किसी के खाते में उनका हिसाब न लिखाना,
आदत नहीं है उनको
मतलब पूरा होने के बाद अपनी शक्ल दिखाना।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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Friday, March 25, 2011

वफादारी का चोला-व्यंग्य कवितायें (vafadari ka chola-vyangya kavitaen)

अपनों पर नहीं यकीन
इसलिये गैरों से उनके शिकवे और शिकायत करते हैं,
परायों के कमरे में जाकर छूते हैं पांव,
उनसे मुलाकात का दंभ भरते है आकर अपने गांव,
कुछ खास हैं
यह दिखाने के लिये
आखिर अपने रिश्तों में ही दम भरते हैं।
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अपनों से छिप कर वह
परदेसियों से आंखें लड़ाते हैं,
जिनको अपनी गली में नहीं मिलती इज्जत
वही बाहर जाकर अपना दर्द
बयान कर आते हैं।
साथियों में फिर वैसे ही वफादारी का
चोला पहनकर खामोशी से खड़े हो जाते हैं।
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कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर 
poet writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwalior
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Wednesday, March 31, 2010

अंग्रेज और किताबें-हिन्दी व्यंग्य (inlishman and books-hindi satire article)

इस संसार का कोई भी व्यक्ति चाहे शिक्षित, अशिक्षित, ज्ञानी, अज्ञानी और पूंजीवादी या साम्यवादी हो, वह भले ही अंग्रेजों की प्रशंसा करे या निंदा पर एक बात तय है कि आधुनिक सभ्यता के तौर तरीके उनके ही अपनाता है। कुछ लोगों ने अरबी छोड़कर अंग्रेजी लिखना पढ़ना शुरु किया तो कुछ ने धोती छोड़कर पेंट शर्ट को अपनाया और इसका पूरा श्रेय अंग्रेजों को जाता है। मुश्किल यह है कि अंग्रेजों ने सारी दुनियां को सभ्य बनाने से पहले गुलाम बनाया। गुलामी एक मानसिक स्थिति है और अंग्रेजों से एक बार शासित होने वाला हर समाज आजाद भले ही हो गया हो पर उनसे आधुनिक सभ्यता सीखने के कारण आज भी उनका कृतज्ञ गुलाम है।
अंग्रेजों ने सभी जगह लिखित कानून बनाये पर मजे की बात यह है कि उनके यहां शासन अलिखित कानून चलता है। इसका आशय यह है कि उनको अपने न्यायाधीशों के विवेक पर भरोसा है इसलिये उनको आजादी देते हैं पर उनके द्वारा शासित देशों को यह भरोसा नहीं है कि उनके यहां न्यायाधीश आजादी से सोच सकते हैं या फिर वह नहीं चाहते कि उनके देश में कोई आजादी से सोचे इसलिये लिखित कानून बना कर रखें हैं। कानून भी इतने कि किसी भी देश का बड़ा से बड़ा कानून विद उनको याद नहीं रख सकता पर संविधान में यह प्रावधान किया गया है कि हर नागरिक हर कानून को याद रखे।
अधिकतर देशों के आधुनिक संविधान हैं पर कुछ देश ऐसे हैं जो कथित रूप से अपनी धाार्मिक किताबों का कानून चलाते हैं। कहते हैं कि यह कानून सर्वशक्तिमान ने बनाया है। कहने को यह देश दावा तो आधुनिक होने का करते हैं पर उनके शिखर पुरुष अंग्रेजों के अप्रत्यक्ष रूप से आज भी गुलाम है। कुछ ऐसे भी देश हैं जहां आधुनिक संविधान है पर वहां कुछ समाज अपने कानून चलाते हैं-अपने यहां अनेक पंचायतें इस मामले में बदनाम हो चुकी हैं। संस्कृति, संस्कार और धर्म के नाम पर कानून बनाये मनुष्य ने हैं पर यह दावा कर कि उसे सर्वशक्तिमान  ने बनाया है दुनियां के एक बड़े वर्ग को धर्मभीरु बनाकर बांधा जाता है।
पुरानी किताबों के कानून अब इस संसार में काम नहीं कर सकते। भारतीय धर्म ग्रंथों की बात करें तो उसमें सामाजिक नियम होने के साथ ही अध्यात्मिक ज्ञान भी उनमें हैं, इसलिये उनका एक बहुत बड़ा हिस्सा आज भी प्रासंगिक है। वैसे भारतीय समाज अप्रासांगिक हो चुके कानूनों को छोड़ चुका है पर विरोधी लोग उनको आज भी याद करते हैं। खासतौर से गैर भारतीय धर्म को विद्वान उनके उदाहरण देते हैं। दरअसल गैर भारतीय धर्मो की पुस्तकों में अध्यात्मिक ज्ञान का अभाव है। वह केवल सांसरिक व्यवहार में सुधार की बात करती हैं। उनके नियम इसलिये भी अप्रासंगिक हैं क्योंकि यह संसार परिवर्तनशील है इसलिये नियम भी बदलेंगे पर अध्यात्म कभी नहीं बदलता क्योंकि जीवन के मूल नियम नहीं बदलते।
अंग्रेजों ने अपने गुलामों की ऐसी शिक्षा दी कि वह कभी उनसे मुक्त नहीं हो सकते। दूसरी बात यह भी है कि अंग्रेज आजकल खुद भी अपने आपको जड़ महसूस करने लगे हैं क्योंकि उन्होंने अपनी शिक्षा पद्धति भी नहीं बदली। उन्होंनें भारत के धन को लूटा पर यहां का अध्यात्मिक ज्ञान नहीं लूट पाये। हालत यह है कि उनके गुलाम रह चुके लोग भी अपने अध्यात्मिक ज्ञान को याद नहीं रख पाये। अलबत्ता अपने किताबों के नियमों को कानून मानते हैं। किसी भी प्रवृत्ति का दुष्कर्म रोकना हो उसके लिये कानून बनाते हैं। किसी भी व्यक्ति की हत्या फंासी देने योग्य अपराध है पर उसमें भी दहेज हत्या, सांप्रदायिक हिंसा में हत्या या आतंक में हत्या का कानून अलग अलग बना लिया गया है। अंग्रेज छोड़ गये पर अपनी वह किताबें छोड़ गये जिन पर खुद हीं नहीं चलते।
यह तो अपने देश की बात है। जिन लोगों ने अपने धर्म ग्रंथों के आधार पर कानून बना रखे हैं उनका तो कहना ही क्या? सवाल यह है कि किताबों में कानून है पर वह स्वयं सजा नहीं दे सकती। अब सवाल यह है कि सर्वशक्तिमान की इन किताबों के कानून का लागू करने का हक राज्य को है पर वह भी कोई साकार सत्ता नहीं है बल्कि इंसानी मुखौटे ही उसे चलाते हैं और तब यह भी गुंजायश बनती है कि उसका दुरुपयोग हो। किसी भी अपराध में परिस्थितियां भी देखी जाती हैं। आत्म रक्षा के लिये की गयी हत्या अपराध नहीं होती पर सर्वशक्तिमान के निकट होने का दावा करने वाला इसे अनदेखा कर सकता है। फिर सर्वशक्तिमान के मुख जब अपने मुख से किताब प्रकट कर सकता है तो वह कानून स्वयं भी लागू कर सकता है तब किसी मनुष्य को उस पर चलने का हक देना गलत ही माना जाना चाहिये। इसलिये आधुनिक संविधान बनाकर ही सभी को काम करना चाहिए।
किताबी कीड़ों का कहना ही क्या? हमारी किताब में यह लिखा है, हमारी में वह लिखा है। ऐसे लोगों से यह कौन कहे कि ‘महाराज आप अपनी व्याख्या भी बताईये।’
कहते हैं कि दुनियां के सारे पंथ या धर्म प्रेम और शांति से रहना सिखाते हैं। हम इसे ही आपत्तिजनक मानते हैं। जनाब, आप शांति से रहना चाहते हैं तो दूसरे को भी रहने दें। प्रेम आप स्वयं करें दूसरे से बदले में कोई अपेक्षा न करें तो ही सुखी रह सकते हैं। फिर दूसरी बात यह कि गुण ही गुणों को बरतते हैं। मतलब यह कि आप में अगर प्रेम का गुण नहीं है तो वह मिल नहंी सकता। बबूल का पेड़ बोकर आम नहीं मिल सकता। पुरानी किताबें अनपढ़ों और अनगढ़ों के लिये लिखी गयी थी जबकि आज विश्व समाज में सभ्य लोगों का बाहुल्य है। इसलिये किताबी कीड़े मत बनो। किताबों में क्या लिखा है, यह मत बताओ बल्कि तुम्हारी सोच क्या है यह बताओ। जहां तक दुनियां के धर्मो और पंथों का सवाल है तो वह बनाये ही बहस और विवाद करने के लिये हैं इसलिये उनके विद्वान अपने आपको श्रेष्ठ बताने के लिये मंच सजाते हैं। जहां तक मनुष्य की प्रसन्नता का सवाल है तो उसके लिये भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान के अलावा कोई रास्ता नहीं है। दूसरी बात यह कि उनकी किताबें इसलिये पढ़ना जरूरी है कि सांसरिक ज्ञान तो आदमी को स्वाभाविक रूप से मिल जाता है और फिर दुनियां भर के धर्मग्रंथ इससे भरे पड़े हैं पर अध्यात्मिक ज्ञान बिना गुरु या अध्यात्मिक किताबों के नहीं मिल सकता। जय श्रीराम!

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Friday, December 4, 2009

पर्यावरण पर नाटकबाजी से काम नहीं चलेगा-आलेख (Environmental drama will not work -hindi Articles)

यह आश्चर्य की बात है कि सारे संसार में आधुनिक साधनों से पर्यावरण को प्रदूषित करने वाले देश ही उसकी सुरक्षा की बात कर रहे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस समय विश्व में जिस तरह तापमान बढ़ रहा है उससे मौसम में आया परिवर्तन इस धरती के जीवों के लिये खतरनाक है पर इसको लेकर किसी भी व्यक्ति या देश द्वारा अपनी यह कहकर अपनी शक्ति का यह प्रदर्शन करना ठीक नहीं है कि वह इसके लिये चिंतित है। केवल चिंता करना ही उनकी योग्यता का प्रमाण नहीं हो सकता। अगर किसी को अपनी चिंता की वास्तविकता सािबत करनी है तो उसे पहले अपने कृत्य से साबित करना भी होगा वरना उसे धूर्त ही समझा जायेगा। इस समय विश्व के कुछ विकसित देश अपने आपको दुनियां का सबसे बड़ा खैर ख्वाह समझ रहे हैं पर सच तो यह है कि वही इस देश का पर्यावरण बिगाड़ने के लिये जिम्मेदार हैं। सब जानते हैं कि ओजोन परत में छेद के बढ़ते जाने की वजह से हो रहा है और उसके लिये प्रथ्वी पर उपयोग में आने वाली गैस जिम्मेदार है।
यह प्रदूषण एक दिन में नहीं हुआ और न ही किसी एक गैस से हुआ है। कभी कहा जाता है कि एशिया के देश खाने की गैस का उपयोग करते हैं इसलिये यह गर्मी बढ़ रही है तो कभी अमेरिका की कंपनियों पर भी ऐसे ही आरोप लगते हैं।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि गैसों का अधिक उपयोग खतरनाक है पर इसके लिये किसी एक देश या महाद्वीप का जिम्मेदारी ठहराना ठीक नहीं है।
इस चर्चा में परमाणु ऊर्जा के उपयोग तथा उसके बमों का परीक्षण करने की चर्चा बिल्कुल नहीं आती जबकि अमेरिका और चीन ऐसे पता नहीं कितने प्रयोग समंदर और जमीन में कर चुके हैं। उससे जमीन को कितनी क्षति पहुंची और उससे कितनी गैस का विसर्जन हुआ इसका अनुमान कोई नहीं देता। इन दोनों देशों की मानसिकता ही साम्राज्यवादी है। इतना ही नहीं दोनों ही हथियारों के लिये अपना बाजार भी ढूंढते हैं। चीन ने ही पाकिस्तान को परमाणु संपन्न राष्ट्र बनने के लिये मदद की है। इन दोनों ने देशों ने परमाणु विस्फोटों से धरती को कितनी क्षति पहुुंचाई है इसका आंकलन जरूर किया जाना चाहिये। गैसों का उत्सर्जन कोई होने से कोई एक दिन में में पर्यावरण प्रदूषित नहीं हुआ। गैस कोई प्रकाश की गति से नहीं फैलती बल्कि इसके लिये पिछले कई वर्षों से मानवीय लापरवाही का यह नतीजा है। भारत जहां इस मामले में पूरी तरह ईमानदारी दिखा रहा है वहीं चीन और अमेरिका इसके लिये दिखावा अधिक करते हैं। भारत ने परमाणु परीक्षण भी इतने नहीं किये जितने इन देशों ने किये हैं। हालांकि चीन और रूस ने भारत द्वारा 25 प्रतिशत गैस उत्सर्जन कम किये जाने के प्रयास को सराहा है पर सवाल यह है कि यह दोनों देश स्वयं क्या करने जा रहे हैं और जो वादा कर रहे हैं उसे क्या निभायेंगे?
हमारे कहने का केवल यही आशय यह है कि पर्यावरण को राजनीतिक विषय न समझें बल्कि इस पर ईमानदारी से काम करें। विश्व भर में विकास के दावे तो बहुत किये जाते हैं पर साथ ही चल रहे विनाश की अनदेखी नहीं की जा सकती। इस पर अमेरिका तथा अन्य राष्ट्र ईमानदारी से सोचें। खाली नाटकबाजी से कुछ नहीं होने वाला है।
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Sunday, October 25, 2009

अन्दर के अँधेरे में-हिंदी कविता (andar ke andhere men-hindi kavita)

अपनी महफ़िल में उन्होंने बुलाया नहीं
हमारी परवाह न होने का अहसास जताया.
खूब चिराग जलाए उन्होंने
पर अन्दर के अँधेरे में
चमकता रहा हमारा चेहरा और नाम
बड़ी मेहनत से उन्होंने छिपाया.
हमारा नाम लेने पर उन्होंने
अपने मेहमान पर गुस्सा दिखाकर
अपनी नापसंदगी दिखाई
पर सच है कि जो खौफ है
उनके दिमाग में
हमारे हाथ से जलते चिरागों से
ज़माने के रौशन होने का
वही अनजाने में बाहर आया.

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Saturday, October 24, 2009

अदाओं से पहचाना जाता है-हिंदी कविता (adaon se pahachan-hindi poem)

रोज रचते हैं नया स्वांग
चेहरे पर लगाते नए मुखौटे
और बदलकर आते हैं कपड़े
मगर छद्म होकर भी करते हैं हमेशा लफड़े.
आदमी अपना बाहर का रूप
कितना भी बदल ले
अदाओं से पहचाना जाता है,
जहां स्वर बदले
शब्दों से पकड़ा जाता है,
खुलकर सांस लेने से घबड़ाते हैं जो लोग
छिपकर करते वार
पर अपने हथियारों की शकल
और तौरतरीकों से जाते हैं पकड़े.

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Monday, October 5, 2009

दूसरे के जख्म देखकर मुस्कराते-हिंदी कविता (doosre ke jakhma-hindi kavita)

अक्सर सोचते हैं कि
कहीं कोई अपना मिल जाए
अपने से हमदर्दी दिखाए
मिलते भी हैं खूब लोग यहाँ
पर इंसान और शय में फर्क नहीं कर पाते.
हम अपने दर्द छिपाते
लोग उनको ही ढूंढ कर
ज़माने को दिखाने में जुट जाते
कोई व्यापार करता
कोई भीख की तरह दान में देता
दिल में नहीं होती पर
पर जुबान और आखों से दिखाते.
हमदर्दी होती एक जज़्बात
लोग बेजान होकर जताते.
दूसरे के जख्म देखकर मन ही मन मुस्कराते.
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Friday, October 2, 2009

लकीर के फकीर-हिंदी लघुकथा (lakir ke faqir-short hindi story)

उस उद्यान में ज्ञानियों के बीच देश की गरीबी मिटाने के लिये बहस चल रही थी। विषय था देश में गरीबी और शौषण खत्म कैसे किया जाये। सभी सजधजकर बहस करने आये थे। सभी वक्ता अपने अपने विचार रख रहे थे।
एक ने कहा ‘हमें गरीबों के दिमाग में अपने अधिकार के लिये चेतना जगाने का अभियान छेड़ना चाहिये।
वहीं एक फटीचर आदमी भी बैठा था। उसने उठकर पूछा-‘पर कैसे? क्या कहें गरीबों से जाकर कि अमीरों का पैसा छीन लो!’
सभा के संचालक ने उसे बिठा दिया और कहा‘-आप आमंत्रित वक्ता नहीं है इसलिये बहस मत करिये।’
दूसरे वक्ता ने कहा-‘हमें एक आंदोलन छेड़ना चाहिये।’
वह फटीचर फिर उठकर खड़ा हो गया और बोला-‘बहस और आंदोलन तो बरसों से चल रहे हैं।’
संचालक फिर चिल्लाया-‘चुपचाप बैठ जाओ। वरना बाहर फैंक दिये जाओगे। हम कितने गंभीर विषय पर बहस कर रहे हैं और तुम अपनी टिप्पणियां मुफ्त में दिये जा रहे हो।’
वह फटीचर आदमी वहां से चला गया तो एक विद्वान ने दूसरे से पूछा-‘यह कौन फटीचर यहां आ गया था।’
दूसरे ने कहा-‘पता नहीं।’
वहीं एक दूसरा फटीचर आदमी र्बैठा था वह बोला-‘वह मेरा दोस्त था। पहले किताबें पढ़कर बहुत बहस कर चुका है पर जब से बहुत ज्ञानी हो गया तब से उसने ऐसी बहसें बंद कर दी हैं। अलबत्ता कभी कभी चला आता है ऐसी बहसें देखने। क्योंकि इसे इसमें कामेडी नजर आती है।’
यह बात सुनते ही दोनों विद्वानों का खूल खौल उठा वह बोले-‘तू हमारी बहस को कामेडी कहता है।’
वह दोनों उठकर खड़े गये और चिल्लाने लगे कि‘यह हमारी बहस को कामेडी कह रहा है। इसे मारो पीटो।’
सब लोग उस पर चढ़ पड़े। वह चिल्लाता रहा‘मैं नहीं वह कहता है।’
उसके पुराने कपड़ों में पहले ही पैबंद लगे थे वह और अधिक फट गये। जब वह पिट पिटकर बेहोश हो गया तब उसे छोड़ दिया गया। विद्वान फिर बहस करने लगे। कुछ देर बात उसे होश आया तो वह दोनों विद्वान वहीं बैठे बहस मेें व्यस्त थे। उसने उनसे कहा-‘यार, मैं थोड़े ही कहता हूं। वह कहता है। तुम दोनों क्यों पिटवाया।’
उनमें से एक ने कहा-‘हम विद्वान है सांप को निकलने देते हैं उसके बाद लकीर पीटते हैं।’
वह बिचारा वापस अपने दोस्त के पास पहुंचा और पूरा हाल बताकर बोला-‘यार, किस मुसीबत में फंसा आये। हम तो सोच रहे थे कि विद्वान हैं पर वह हिंसा पर उतर आये।’
उसने जवाब दिया-‘यह भ्रम मुझे भी होता था। इसलिये तुझसे कहता हूं कि ऐसी जगहों पर अधिक मत रुका करो। वहां बहस वही करते हैं जो किताबी ज्ञानी हैं। कबीरदास जी कह गये हैं कि किताब पढ़ने वालों को अहंकार आ ही जाता है। मैं भी तुझसे कहता हूं कि ऐसी बहसें कामेडी नाटक की तरह हैं क्योंकि किताबी ज्ञानी लकीर के फकीर होते हैं पर वहां सबके बीच में नहीं कहा। सच बात भी सही जगह और सही समय पर बोलना चाहिये। बस तुम्हारे और मेरे बीच यही अंतर है। इसलिये मैं तुम्हें अल्पज्ञानी कहता हूं। मैंने खतरा देखा तो निकल लिया और तुम फंसं गये।’

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