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Tuesday, September 17, 2013

हादसे होते रहेंगे-हिन्दी व्यंग्य कविता



देश में तरक्की बहुत हो गयी है
यह सभी कहेंगे,
मगर सड़कें संकरी है
कारें बहुत हैं
इसलिये हादसे होते रहेंगे,
रुपया बहुत फैला है बाज़ार में
मगर दौलत वाले कम हैं,
इसलिये लूटने वाले भी
उनका बोझ हल्का कर
स्वयं ढोते रहेंगे।
कहें दीपक बापू
टूटता नहीं तिलस्म कभी माया का,
पत्थर पर पांव रखकर
उस सोने का पीछा करते हैं लोग
जो न कभी दिल भरता
न काम करता कोई काया का,
फरिश्ते पी गये सारा अमृत
इंसानों ने शराब को संस्कार  बना लिया,
अपनी जिदगी से बेजार हो गये लोगों ने
मनोरंजन के लिये
सर्वशक्तिमान की आराधना को
खाली समय
पढ़ने का किस्सा बना लिया,
बदहवास और मदहोश लोग
आकाश में उड़ने की चाहत लिये
जमीन पर यूं ही गिरते रहेंगे।
----------------

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com
-------------------------
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Wednesday, December 28, 2011

दिल का झंडाबरदार-हिन्दी शायरियां (Dil ka jhandabardar-hindi shayriyan or poem's)

अपने अपने सभी के इलाके हैं
कोई न कोई कहीं का सरदार है,
डूब हैं सभी अपने घर बचाने के लिये
गलतफहमी में रहे हम कि वह असरदार हैं।
कहें दीपक बापू दोगलापन खून में है इंसानों के
मतलब निकलने तक सभी हमारे तरफदार हैं,
बाज़ार में बिकते मुद्दे पर चर्चा करना बकवास है
खुश वही है जो खुद के दिल का झंडाबरदार है।
---------
अपने जिस्म का पसीना
हमने उनके लिये बहाया
जो केवल दौलत के अहंसानमंद है,
उनसे तारीफ की क्या उम्मीद करना
जिनके ख्याल अपने ही मतलब में बंद हैं
---------------
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

Monday, September 12, 2011

हिन्दी दिवस पर कविता और लघु व्यंग्य (hindi diwas or hindi divas par kavita aur laghukatha)

        एक आयोजक ने अपने कवि मित्र को अपनी संस्था में हिन्दी दिवस पर आयोजित कार्यक्रम का आमंत्रण देते हुए कहा-‘यार, तुम कल 12 बजे आना। बढ़िया कार्यकम हैं। कार्यक्रम के बाद नाश्ते वगैरह का आयोजन किया गया है। कार्यक्रम में काव्य पाठ भी होगा तुम उसे सुन सकते हों!
     कवि मित्र ने कहा-‘‘तुम कहो तो हम कविता भी कर देंगे।’
      आयोजक ने कहा-‘‘देखो, यह कार्यक्रम मेरे पैसे से नहीं हो रहा है। जिन लोगों ने पैसे दिये हैं वह कविता करेंगे। सभी बड़े लोग हैं और उनको इसी दिन अपनी हिन्दी में भड़ास निकालने का अवसर मिलता है। तुम तो बस, उपस्थिति देने आना जिससे मेरी भी इज्जत बढ़ेगी।’’
        कवि मित्र ने कहा-‘‘इससे क्या? तुम एक दो कविता सुनाने का अवसर हमें भी दो।’
मित्र ने कहा-‘‘तुम तो मेरी उन बड़े लोगों से दुश्मनी कराओगे। तुम मंच पर आकर शुद्ध हिन्दी में काव्य पाठ करोगे, उसमें जोरदार सुर भरोगे। वह बड़े लोग जो अपनी भड़ास हिन्दी में निकालने के लिये यही दिन पाते हैं, अपनी हंग्रेजी यानि आधी हिन्दी और अंग्रेजी में अपनी बात कहेंगे और बीच में तुम्हारी कविता सुन ली तो कुंठित हो जायेंगे। इसलिये तुम्हें मंच पर लाने का खतरा मैं नहीं उठा सकता।’’
      कवि मित्र ने कहा-‘‘मैं वहां नहीं आऊंगा। तुम फुरसत पा लो तो रात को मेरे घर आ जाना। मैं भी हिन्दी दिवस पर कवितायें सुनाने के लिये आदमी ढूंढ रहा हूं पर कोई मिल नहीं रहा सभी हिन्दी दिवस में जा रहे हैं। अनेक लोग तो ऐसे हैं जिनको चार चार जगह से निमंत्रण मिले हैं। वह जाने से पहले हर जगह मिलने वाले नाश्ते की सामग्री पता कर रहे हैं। जहां अच्छा होगा वहंी जायेंगे। अलबत्ता तुम अपने यहां मिलने वाले नाश्ते की चीजें बता दो मैं उन हिन्दी प्रेमियों को बता दूंगा जो इस दिन ऐसे कार्यक्रम ढूंढते हैं।
मित्र खिसियाकर रह गया।
हिन्दी दिवस पर प्रस्तुत एक क्षणिका
----------------
उन्होंने अपने संस्थान में
हिन्दी धूमधाम से मनाया,
सभी वक्ताओं के भाषणों में
कहीं अंग्रेजी शब्द ठसे थे
तो किसी ने अंग्रेजी में ही
हिन्दी का महत्व बताया।
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Sunday, August 21, 2011

ईमानदारी की बही-हिन्दी हास्य कविता (imandari ki bahi or dayri of honesty-hindi hasya kavita or comic poem)

भ्रष्टाचारी ने ईमानदार को फटकारा
‘‘क्या पुराने जन्म के पापों का फल पा रहे हो,
बिना ऊपरी कमाई के जीवन गंवा रहे हो,
अरे
इसी जन्म में ही कोई अच्छा काम करते,
दान दक्षिणा  दूसरों को देकर
अपनी जेब भरने का काम भी करते,
लोग मुझे तुम्हारा दोस्त कहकर शरमाते हैं,
तुम्हारे बुरे हालात सभी जगह बताते हैं,
सच कहता हूं
तुम पर बहुत तरस आता है।’’
ईमानदार ने कहा
‘‘सच कहता हूं इसमें मेरा कोई दोष नहीं है,
घर में भी कोई इस बात पर कम रोष नहीं है,
जगह ऐसी मिली है
जहां कोई पैसा देने नहीं आता,
बस फाईलों का ढेर सामने बैठकर सताता,
ठोकपीटकर बनाया किस्मत ने ईमानदार,
वरना दौलत का बन जाता इजारेदार,
एक बात तुम्हारी बात सही है,
पुराने जन्म के पापों का फल है
अपनी ईमानदारी की बनी बही है,
यही तर्क अपनी दुर्भाग्य का समझ में आता है।
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Tuesday, July 5, 2011

लोग अदायें बदल देते हैं-हिन्दी शायरी (log adaen badal dete hain-hindi shayari)

खौफ आसमान से बिजली गिरने का नहीं है,
डर जमीन के धसकने का भी नहीं है,
नहीं घबड़ाते सांप के जहर से
फिर भी दिल घबड़ाता है
इस बात से
रोज मिलने वाले इंसानों में
कोई शैतान तो नहीं है।
------------
लोग नहीं बदलते चेहरा
बस, बयान बदल देते हैं,
बेशर्मी अब बुरी आदत नहीं कहलाती
कुछ मजबूरी
कुछ व्यापार बन गयी हैं बेदर्दी
लोग हालत बदलने के बहाने
अपनी अदायें बदल देते हैं।
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Monday, June 27, 2011

चोर और ज्योतिषी-हिन्दी हास्य कविता (chor aur jyotishi-hindi hasya kavita)

चोर पहुंचा और एक हजार का नोट
हाथ में देते हुए बोला
‘‘महाराज,
मेरा हाथ देकर बताओ
कौनसा धंधा करूं, यह समझाओ,
चोरी या जेब काटने का,
दिन बुरे चल रहे हैं
कब आ जाये दिन धूल चाटने का,
अनेक जगह सोने की चोरी की
पता चला सभी जगह नकली मिला माल,
खाली जा रहा है पूरा साल,
आपको देखा तो
भविष्य पूछने के लिये
एक हजार का नोट किसी की जेब काटकर आया,
किसी का धन चुरा सकते हैं
पर अक्ल नहीं
अब यह आपका काम देखकर समझ पाया।’’

ज्योतिषी ने नोट को घुमा फिराकर देखा
फिर उसे वापस थमाते हुए कहा
‘‘बेटा,
तुम्हारा हाथ देखने की जरूरत नहीं,
जन्मपत्री भी मत दिखाना कहीं,
तुम्हारी किस्मत अब साथ छोड़ रही है
असलियत की तरफ मोड़ रही है,
यह नोट भी नकली है,
पर जिंदगी तुम्हारी असली है,
इससे अच्छा है तुम कहीं
ठेला चलाने का धंधा प्रारंभ करो,
न अब बुरे कर्म का दंभ भरो,
रकम छोटी आयेगी,
पर सच को साथ लायेगी,
अब तुम जाओ,
अभी तक लोगों से लिया पैसा
पर तुम्हें मुफ्त में भविष्य बताया।
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Tuesday, June 21, 2011

तख्त के लिये मची जंग-हिन्दी कविता(takhta ke liye jung-hindi kavita

तख्त के लिये मची है चारों तरफ जंग,
इंसानों के मुंह खुले पर दिमाग हैं तंग।
सजे हुए सब चेहरे, ओढ़े चमकीले कपड़े
मगर सभी की नीयत का काला है रंग।
भरोसा के नाम, मिलता तोहफा धोखे का
सच की लय को भ्रम ने किया है भंग।
कहें दीपक बापू अंधों के आगे क्या रोना
समाज बड़ा है, पर बंधे है उसके सारे अंग।
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Friday, April 22, 2011

हास्य कविता-भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन (bhrashtachar virodhi andolan or anti corruption movement-hasya kavita)

समाज सेवक की पत्नी ने कहा
‘तुम भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में
शामिल मत हो जाना,
वरना पड़ेगा पछताना।
बंद हो जायेगा मिलना कमीशन,
रद्द हो जायेगा बालक का
स्कूल में हुआ नया एडमीशन,
हमारे घर का काम
ऐसे ही लोगों से चलता है,
जिनका कुनबा दो नंबर के धन पर पलता है,
काले धन की बात भी
तुम नहीं उठाना,
मुश्किल हो जायेगा अपना ही खर्च जुटाना,
यह सच है जो मैंने तुम्हें बताया,
फिर न कहना पहले क्यों नहीं समझाया।’
सुनकर समाज सेवक हंसे
और बोले
‘‘मुझे समाज में अनुभवी कहा जाता है,
इसलिये हर कोई आंदोलन में बुलाता है,
अरे,
तुम्हें मालुम नहीं है
आजकल क्रिकेट हो या समाज सेवा
हर कोई अनुभवी आदमी से जोड़ता नाता है,
क्योंकि आंदोलन हो या खेल
परिणाम फिक्स करना उसी को आता है,
भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में
मेरा जाना जरूरी है,
जिसकी ईमानदारी से बहुत दूरी है,
इसमें जाकर भाषण करूंगा,
अपने ही समर्थकों में नया जोशा भरूंगा,
अपने किसी दानदाता का नाम
कोई थोडे ही वहां लूंगा,
बस, हवा में ही खींचकर शब्द बम दूंगा,
इस आधुनिक लोकतंत्र में
मेरे जैसे ही लोग पलते हैं,
जो आंदोलन के पेशे में ढलते हैं,
भ्रष्टाचार का विरोध सुनकर
तुम क्यों घबड़ाती हो,
इस बार मॉल में शापिंग के समय
तुम्हारे पर्स मे ज्यादा रकम होगी
जो तुम साथ ले जाती हो,
इस देश में भ्रष्टाचार
बन गया है शिष्टाचार,
जैसे वह बढ़ेगा,
उसके विरोध के साथ ही
अपना कमीशन भी चढ़ेगा,
आधुनिक लोकतंत्र में
आंदोलन होते मैच की तरह
एक दूसरे को गिरायेगा,
दूसरा उसको हिलायेगा,
अपनी समाज सेवा का धंधा ऐसा है
जिस पर रहेगी हमेशा दौलत की छाया।’’
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Saturday, March 19, 2011

होली और ध्यान-हिन्दी कविता (holi aur dhyan-hindi kavita)

आओ ध्यान लगायें,
नकली गुलाल और रंग में
खेलने से जलेंगी आंखें और बदन
इसलिये अपने अंतर्मन में
स्थापित कर लें एक सुंदर स्वरूप

उसके आगे   अपनी हृदय का दीपक जलायें।
------------
किस पर रंग फैंककर
किसका व्यक्तित्व अपने हाथ से चमकायें,
अपने हृदय को कर दें ध्यान में मग्न,
हो जायेंगे कीचड़ की समाधियां भग्न,
बरस भर जमा किया है कीचड़ मन में
वहां ज्ञान का कमल लगायें।
------------

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Friday, December 3, 2010

नाम में वाकई कुछ नहीं रखा है-हिन्दी कवितायें (naam men khuchh nahin rakha hai-hindi kavitaen)

आदर्श होने का दावा
बाहर से लगता है
मगर उसके अंदर छिपे ढेर सारे दाग हैं,
रावण और कंस जैसे
नाम रखकर कोई कातिल बने
यह जरूरी नहीं है
देवताओं का मुखौटा लगाकर
उजाड़े कई लोगों ने बहुत सारे बाग हैं।
------------
नाम में वाकई कुछ नहीं रखा है,
दैत्यों ने भी कलियुग का अमृत चखा है,
अब उनको मरने का डर नहीं लगता
देवताओं के मुखौटे पहने लोग अब उनके सखा है।
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Monday, August 30, 2010

अपराधियों की छबि समाज सेवकों जैसी-हास्य कविताएँ (image of criminal-hindi comic poem)

फर्जी मुठभेड़ों की चर्चा कुछ
इस तरह सरेआम हो जाती कि
अपराधियों की छबि भी
समाज सेवकों जैसी बन जाती है।
कई कत्ल करने पर भी
पहरेदारों की गोली से मरे हुए
पाते शहीदों जैसा मान,
बचकर निकल गये
जाकर परदेस में बनाते अपनी शान
उनकी कहानियां चलती हैं नायकों की तरह
जिससे गर्दन उनकी तन जाती है।
--------
टीवी चैनल के बॉस ने
अपने संवाददाता से कहा
‘आजकल फर्जी मुठभेड़ों की चल रही चर्चा,
तुम भी कोई ढूंढ लो, इसमें नहीं होगा खर्चा।
एक बात ध्यान रखना
पहरेदारों की गोली से मरे इंसान ने
चाहे कितने भी अपराध किये हों
उनको मत दिखाना,
शहीद के रूप में उसका नाम लिखाना,
जनता में जज़्बात उठाना है,
हमदर्दी का करना है व्यापार
इसलिये उसकी हर बात को भुलाना है,
मत करना उनके संगीन कारनामों की चर्चा।
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Thursday, August 26, 2010

नई उम्मीद के चिराग-हिन्दी शायरी (nai ummeed ki chirag-hindi shayari)

वादे जुबान पर हैं उनके
नीयत में नहीं
यह समझ नहीं पाये,
धोखा होने का शक था
इसलिये मिलने पर भी नहीं पछताये।
------
खतरे कम रहें
इसलिये दोस्त कम ही बनाये,
दुनियां का इतिहास पढ़ा है हमने भी,
अपनों ने सबसे ज्यादा दगा के दाव लगाये।
--------
उनके मुंह फेर जाने पर
पल भर रो भी लिये,
मगर पहले से ही अंदेशा था कि
मतलब निकलते ही
वह साथ छोड़े देंगे
इसलिये जल्द ही संभलकर
नई उम्मीद के चिराग जलाये।
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Sunday, August 22, 2010

चेतना-हिन्दी शायरी(chetana-hindi shayari)

मर गयी है लोगों की चेतना इस कदर कि
सपने देखने के लिये भी
सोच उधार लेते हैं,
अपनी मंज़िल क्या पायेंगे वह लोग
जो हमराह के रूप में कच्चे यार लेते हैं,
अपने ख्वाबों में चाहे कितने भी देखे सपने
आकाश में उड़ने के
पर इंसान को पंख नहीं मिले
फिर भी कुछ लोग उड़ने के अरमान पाल लेते हैं।
----------
लोगों में चेतना लाने का काम
भी अब ठेके पर होने लगा है,
जिसने लिया वह सोने लगा है,
मर गये लोगों के जज़्बात
मुर्दा दिलों में हवस के कीड़ों का निवास होने लगा है।
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Tuesday, August 10, 2010

कमीशन की बरसात-हास्य कविताएँ (commision ki barsat-hasya kavitaen)

बच्चे को मैदान पर हॉकी खेलते देख
पुराने एक खिलाड़ी ने उससे कहा
‘‘बेटा, बॉल से हॉकी कुछ समय तक
तक खेलना ठीक है,
फिर कुछ समय बाद पैसे का खेल भी सीख,
अगर केवल हॉकी खेलेगा  तो
बाद में मांगेगा भीख।’’
----------
बरसात के पानी से मैदान भर गया
खिलाड़ी दुःखी हो गये
पर प्रबंधक खुश होकर कार्यकर्ताओं में मिठाई बांटने लगा
जब उससे पूछा गया तो वह बोला
‘‘अरे, यह सब बरसात की मेहरबानी है,
मैदान बनाने के लिये फिर मदद आनी है।
वैसे ही मैदान ऊबड़ खाबड़ हो गया था,
पैसा तो आया
पर कैसे खर्च करूं समझ नहीं पाया,
इधर उधर सब बरबाद हो गये,
इधर जांच करने वाले भी आये थे
तो जैसे मेरे होश खो गये,
अब तो दिखाऊंगा सारी बरसात की कारिस्तानी,
हो जायेगा फिर दौलत की देवी की मेहरबानी,
धूप फिर पानी सुखा देगी
अगर फिर बरसात हुई तो समझ लो
अगली किश्त भी अपने नाम पर आनी है,
तुम खाओ मिठाई
मुझे तो बस किसी तरह कमीशन खानी है।
---------

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Saturday, August 7, 2010

वफ़ादार-हिन्दी हास्य कविता (vafadaar-hindi hasya kavita)

अपने तबादले से वह खुश नहीं थे,
क्योंकि नयी जगह पर
ऊपरी कमाई के अवसर कुछ नहीं थे,
इसलिये अपने बॉस के जाकर बोले,
‘‘मैंने तो आपकी आज्ञा का पालन
हमेशा वफादार की तरह किया,
मेरी टेबल पर जो भी तोहफा आया
बाद में डाला अपनी जेब में
आपका हिस्सा पहले आपके हवाले किया,
यह आप मेरे पेट पर क्यों मार रहे लात,
जो तबादले की कर दी घात।’’

बॉस ने रुंआसे होकर कहा
‘‘शायद तुम्हें पता नहीं
तुम्हारी वज़ह से मेरे ऊपर भी
संभावित जांच की तलवार लटकी है,
प्रचार वालों की नज़र अब तुम पर भी अटकी है,
जब आता है अपने पर संकट
तब शिकार के रूप में पेश
अपना वफ़ादार ही किया जाता है,
दाना दुश्मन से निपटते हैं बाद में
पहले नांदा दोस्त मिटाया जाता है,
तुम्हारे सभी जगह चर्चे हैं,
कि जितनी आमदनी है
उससे कई गुना घर के खर्चे हैं,
भला कौन बॉस सहन कर सकता है
अपने मातहत से अपनी तुलना,
बता रहे हैं लोग तुमको मेरे बराबर अमीर
तुम भी अब जाकर सुनना,
अधिकारी के अगाड़ी तुम चल रहे थे,
जैसे हम तुम्हारे हिस्से पर ही पल रहे थे,
एक तो छोटे के पिछाड़ी चलना मुझे मंजूर न था,
फिर तुम्हारी वज़ह से
हमारी मुसीबत का दिन भी दूर न था,
इसलिये तुम्हारा तबादला कर दिया,
अपने वफादार भी हम नहीं कृपालु
यह साबित कर
बदनामी से बचने के लिये रफादफा मामला कर दिया,
तुम्हारी वफदारी का यह है इनाम,
बर्खास्तगी का नहीं किया काम,
तबादले पर ही खत्म कर दी बात।
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Friday, July 23, 2010

खुश करने वाली सूरतें कम नज़र आती-हिन्दी शायरी (khush karne vali suhten-hindi shayri)

ख्वाहिशों का यह हाल है
कि एक पूरी होती
दूसरी चली आती है,
यह जिंदगी यूं ही उनको पूरा करते हुए की
जंग में बीत जाती है।
हंसी जो दिल से आये,
खुशी वह जो दूर तक भाये,
ग़मों में भी हैरान हो इंसान
सभी को खुश कर दे
ऐसी सूरतें कम हीं नज़र आती है।
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कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Friday, July 16, 2010

हास्य कविताएँ -जैसे मस्ती ही उनका ईमान हो(jaise masti hee unka iman ho-hasya vyanyga kavitaen)

मतलब निकल जाये तो
दोस्त भी आंख फेर लेते हैं,
बात अगर पैसे की हो तो
वफादारी दांव पर धर देते हैं।
खुशफहमी है उनकी कि
हमने उन पर कभी भरोसा किया,
हालातों से मजबूर इंसान
कुछ भी कर सकता है
यह सच हमने भी जान लिया,
इसलिये गद्दारी को भी
हंस कर अपने पर लेते हैं।
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खूब वफा के उन्होंने वादे किये
मौका आया तो अपनी
बिचारगी जता दी
जैसे कोई बेबस इंसान हो।
हमने जो मुंह फेरा वहां से
मस्त हो गये वह अपनी महफिल में
जैसे मस्ती ही उनका ईमान हो।
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Thursday, July 15, 2010

सोचो जरा-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (socho jara-hindi vyangya kavitaen)

अपने हाथों ही अपने भविष्य का ठेका
अंधों को दे दिया
अब रोते क्यों हो,
रौशनी बेचकर
अपनी आंखों से
अपनी तिजोरी में बढ़ती हरियाली देखकर
वह खुश हो रहे हैं,
आंसु बहाने से अच्छा है
तुम सोचो जरा
दंड मिले खुद को
ऐसे अपराध इस धरती पर बोते क्यों हो।
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उनके काम पर उंगली न उठाओ,
अपने हाथ से
सारे हक तुमने उनको दिये हैं,
कुदरत ने दिये थे जो तोहफे तुमको
उनका इस्तेमाल तुमने बेजा किया
जैसे मुफ्त में लिये हैं।
कुछ वादों को झूठ में देकर
दूसरों से हक लेकर
वह लोग अपने पेट भरते नहीं थकते
क्योंकि उसे भरने के लिये ही
वह दूसरों के लिये जिए हैं।
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Sunday, July 11, 2010

व्यापार को खेल बनाने की कोशिश-हास्य व्यंग्य (vyapar aur khel-hindi hasya vyangya)

कल एक ब्लाग पर अपने एक आलेख में इस लेखक ने विश्व कप 2010 फुटबाल विश्व कप में स्पेन के विरुद्ध हालैंड के जीतने की भविष्यवाणी कर दी। क्यों की? न अब फुटबाल से वास्ता न ज्योतिष से। ज्योतिष गणना को तो सवाल ही अलबत्ता एक समय हॉकी और फुटबाल खेलने से वास्ता रहा जो समय के साथ छूट गया।
जब सवाल अपने से करें तो जवाब भी अपने को ही देना पड़ता है? अब अगर भविष्यवाणी गलत निकली तो अपने आप से मुंह छिपाना भी कठिन होगा। गनीमत है कि ब्लाग कम लोग पढ़ते हैं। पहला लेख कुछ बड़ा था इसलिये यह संभव नहीं है कि पढ़ने वालो को वह भविष्यवाणी याद रहे पर अपने को भूलना कठिन लगता है। गनीमत है कि यह पाठ लिखने जाने इस लेखक सहित अन्य पांच लोगों ने पढ़ा।
कल अपना लिखा पाठ आज स्वयं ही पढ़ा-ऐसी गलती शायद पहली बार की होगी। दरअसल कल जर्मनी के बारे में लिखते हुए उसकी जीत की भविष्यवाणी की पॉल बाबा से सहमति जताना था पर उसका आधार ज्योतिष नहीं बल्कि पिछले विश्व कप ं तक जर्मनी के खिलाड़ियों का प्रदर्शन देखकर था। यह बात लेख लिखते समय थी पर बाद में याद न रहा। यहां इस लेखक से चूक हो गयी क्योकि अगर वह भविष्यवाणी सही निकलती तो आज हालैंड के जीतने की भविष्यवाणी का तनाव नहीं रहता। पचास पचास फीसदी अवसर का लाभ मिल जाता।
दरअसल ऑक्टोपस यानि पॉल बाबा की अब तक सात भविष्यवाणियां सही निकल चुकी हैं। विश्व कप के खेल के साथ ऑक्टोपस का भी खेल चल रहा है। कुछ लोगों को आश्चर्य हो रहा है कि ऑक्टोपस की भविष्यवाणी सही कैसे निकल रही है।
दरअसल यह एक प्रायोजित खेल है। खेलों पर सट्टा लगाने में वैसे तो पूरे विश्व के लोग माहिर हैं पर आजकल पैसे के मामले में एशियाई देश आगे चल रहे हैं। इसक अलावा एशियाई लोग भूत, बाबा, प्रेत और सिद्धों के चक्कर में पड़े रहते हैं। भविष्य के चक्कर में अपना वर्तमान तबाह कर लेते हैं और तिस पर दो के चार होने की बात हो तो एक नहीं हजारों मूर्ख मिल जायेंगे।
जिस तरह अपने यहां क्रिकेट खिलाड़ी धन, प्रतिष्ठा और शक्ति अर्जित कर रहे हैं उसे देखते हुए फुटबाल गरीबों का खेल हो गया है और उसे एशियाई समर्थन की आवश्यकता है, शायद पॉल बाबा का प्रयोग इसलिये किया गया ताकि सेमीफायनल आते आते उसका लाभ एशियाई देशों में लिया जा सके।
अभी तक फुटबाल में सट्टबाजी की चर्चा नहीं हुई पर अब हो रही है। प्रचार माध्यम बता रहे हैं कि इस फायनल मैच में दो हजार करोड़ का सट्टा लग रहा है। तब खोपड़ी में बात आयी कि कहंीं केवल इस फायनल मैच में बड़ी रकम लगवाने के लिये प्रारंभ से ही इसकी कड़ी से कड़ी तो नहीं जोड़ी गयी। ऑक्टोपस-यह एक समुद्री जीव है-दिन में एक बार भविष्यवाणी करता था जबकि विश्व कप में अधिकतर दो मैच प्रतिदिन होते थे। इसका मतलब यह कि एक मैच में उसकी भविष्यवाणी नहीं होती। फिर इतने मैच हुए पर भविष्यवाणी छह या सात ही क्यों हुई? सीधी सी बात है कि फुटबाल के सट्टे में एशियाई देशों की सक्रियता कम रही होगी। इसलिये धीरे धीरे ऑक्टोपस बाबा को नायक के रूप में विकसित किया गया होगा। अपने यहां के प्रचार माध्यमों ने तीन बाबा और खड़े किये हैं-एक मगरमच्छ, एक तोता और बैल इन बाबाओं के प्रतिरूप हैं। दो हालैंड के तो दो स्पेन को संभावित विजेता बता रहे हैं।
इस विश्व कप फुटबाल के न हमने पहले मैच देखे न फायनल देखने का इरादा है। परिणाम भी हमें अगले दिन सुबह आठ बजे ही पता चलेगा जब अपने पोर्च में रखा अखबार उठायेंगे। वैसे प्रयास तो यही होगा कि प्रातः छह बजे उठकर योग साधना से पहले ही अखबार उठायें पर यह तभी संभव है कि हमें याद रहे कि कल रात कोई विश्व कप फुटबाल फायनल मैच हुआ है जिसके परिणाम की भविष्यवाणी हमने भी की है। वैसे हमारी दिलचस्पी फुटबाल मैच में कम ऑक्टोपस नामक उस जीव में ज्यादा है जो इस विषय में कुछ नहीं जानता पर उसके नाम पर करोड़ों के वारे न्यारे हो रहे हैं। शायद इसलिये कहते हैं कि भगवान जिन पर कृपालु है उनको ही मनुष्य यौनि मिलती है। मनुष्य यौनि में अपने लोक नायक या नायिका हो जाने पर सुखद आनंद की अनुभूति की जा सकती है जबकि अन्य जीवों के लिये यह संभव नहीं है। चाहे वह बंदर हो या कुत्ता, तोता हो या ऑक्टोपस या बैल को यह पता नहीं होता कि वह लोक नायक बन रहे हैं।
अब तो यह कहना कठिन है कि कौन जीतेगा। जब सारी दुनियां में ऑक्टोपस की भविष्यवाणी और फुटबाल की चर्चा हो रही है तब सट्टे वाले अपने मोबाइल, इंटरनेट तथा अन्य साधनों के द्वारा सक्रिय रहकर इस बात का हिसाब लगा रहे होंगे कि किसकी जीत में उनको फायदा है। फिर अपने आंकड़े बिठाने के प्रयास करेंगे। यकीन करिये अगर स्पेन की हार में उनका फायदा है तो ऑक्टोपस को भी खलनायक बना देंगे और हालैंड की जीत में लाभ है तो बैल को नंदी को भगवान शिव की सवारी कहकर सम्मानित करेंगे-उस बैल का भी यही नाम बताया गया है जिसने हालैंड के जीतने की भविष्यवाणी की है।
वैसे आशंका यही है कि ऑक्टोपस की भविष्यवाणी अधिक लोकप्रिय हुई है इसलिये लगाने वाले दाव स्पेन पर ही अधिक होंगे-इसका आधार यह है कि सट्टे पर पैसा लगाने वालों में अक्ल कम होती है और उनका पैसा बिना मेहनत का होता है इसलिये उसका महत्व नहीं जानते-ऐसे में हालैंड की जीत हो सकती है।
दो हजार करोड़ रुपये कम रकम नहीं होती। इसमें बड़े बड़े लोगों का ईमान डोल सकता है। दूसरों की बात तो छोड़िये कोई हमें दो हजार रुपये ही दे तो हम अभी हाल स्पेन के जीतने की भविष्यवाणी कर देते हैं-अधिक रकम इसलिये नहीं लिखी क्योंकि एटीएम से हम इससे अधिक रकम नही निकालते।
यह लेख कंप्यूटर पर दिख रहे टाईम कें अनुसार 10.49 पर लिखना प्रारंभ किया था और 10.25 मिनट पर समाप्त कर रहे हैं। हमारे यहां सुबह बिजली पांच घंटे चली जाती है इसलिये अब कंप्यूटर पर शाम आठ बजे से पहले आना संभव नहीं है। ऐसे में अब इस लेख को जब दोबारा पढेंगे तब तक यह विषय ही बासी हो चुका होगा। बस इतना देखना है कि बाज़ार के इस महानायक ऑक्टोपस का क्या होता है और सट्टेबाज खेल को प्रभावित कितना कर पाते हैं? अलबत्ता रकम देखकर लगता है कि यह खेल भी अब पैसे को हो गया है। इतनी बड़ी रकम से व्यापार करने वाले सौदे में अपनी पकड़ आखिरी तक नहीं छोड़ते-चाहे वह फुटबाल हो या क्रिकेट! वह हर जगह अपने मोहरे इस तरह फिट रखते हैं कि जनता को खेल तो खेल की तरह लगे पर भले ही वह उनका व्यापार हो।
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Friday, July 9, 2010

मूली सभी के लिये विषैली नहीं होती- व्यंग्य (mooli sabhi ke liye vishaili nahin hoti-hindi vyngya)

यही है बाज़ार और उससे प्रायोजित प्रचार माध्यमों को खेल कि लौकी भी अब विषैले पदार्थों में शामिल हो सकती है।
हमें याद है जब सात वर्ष पूर्व जब उच्च रक्तचाप की शिकायत होने पर आधुनिक चिकित्सकों के शरण लेनी पड़ी थी।
एक मित्र होम्योपैथी चिकित्सक ने रक्तचाप की नाप ली और कहा कि ‘तुम्हें उच्च रक्तचाप है।’
हमने कहा-‘ज्यादा झाड़ो नहीं! हम अपनी बीमारी स्वयं ही बता देते हैं। हमें शराब की बहुत खराब आदत है। फिर कल मंगलवार होने के कारण व्रत था इसलिये शाम को शादी में खाना देर से खाया। उससे पहले शराब का पैग लिया पर एक घूंट के बाद ही हमारी हालत बिगड़ गयी। बाद में खाना गया तो चैन आया पर रात को नींद आराम से आयी और अब चाय के बाद हालत बिगड़ी है। ऐसा लगता है कि गैस की समस्या है।’
चिकित्सक ने कहा‘-तुम अपनी बीमारी जानते हो तो मेरे पास क्यों आये।’
हमने कहा-‘कोई वायु विकार दूर करने वाली गोली बता दो।’
चिकित्सक ने कहा-‘ मित्र हो इसलिये अभी उच्च रक्तचाप की गोली देता हूं। वह भी आधी लेना और हां शराब और तंबाकू से पीछा छुड़ाओ। साथ ही यह चेकअप की कराओ।’
हमने गोली ली और घर आये। बीमारी की वजह स्वयं को पता थी। शराब से पीछा छुड़ाया। तंबाकू भी एकदम छोड़ दी-हालांकि वह अब भी है और योग साधना के कारण उसके दुष्परिणाम से बचे रहते हैं। उस समय इससे परहेज करने से शरीर के व्यसनों की वजह से सक्रिय अंग ढीले पड़ गये।
उसके बाद शुरु हुआ लोगों से चर्चा का सिलसिला। मधुमेह की समस्या थी पर अधिक नहीं। अब स्थिति यह थी कि हमें लगने लगा कि जीवन ऐसे ही संकट के साथ चलेगा। लोगों की सलाहें ली। एक ने कहा खाने के साथ सलाद लिया करो। हमने मूली खाना प्रारंभ किया। नियमित रूप से लेते और शाम को स्थिति बिगड़ती। मूली हम खाते थे खाना पचाने के लिये पर वह संकट की वजह बन रही है इसका पता चला तब जब किसी ने बताया कि मूली हर किसी को नहीं पचती। हमने दो दिन मूली छोड़ी तो समस्या से निजात मिली।
लोगों ने करेले और लौकी का जूस पीने की सलाह दी। हमने उसे अनसुना किया और अपना इलाज स्वयं ही शुरु किया। हमें पता था कि घरेलू समस्याओं की वजह से चार महीने तक साइकिल चलाना छोड़ने से शरीर में संकट पैदा हुआ है। साइकिल चलाना शुरु की। शराब एकदम कम कर दी पर तंबाकू छूटने नहीं छूटी।
सबकुछ सामान्य था पर मन में यह बात आ गयी कि हम उच्च रक्तचाप के शिकार है। उसी समय अखबार में पढ़ा कि देश के साठ प्रतिशत लोगों को पता ही नहीं कि वह मनोरोग का शिकार है और हमें लगने लगा कि हम उनमें से एक ही हैं। जिस चिकित्सक ने उच्च रक्तचाप के बाद तमाम तरह के चेकअप लिख कर दिये थे उसी ने ही एक अपने से बड़े होम्यापैथिक चिकित्सक के पास भेजा। उसने ही तमाम तरह के चेकअप किये और पर्चे पर लिखा हाईपर ऐसिडिटी। बात हमारी समझ में आ गयी क्योंकि वह हमारे पूर्वानुमान से मेल खाती थी। सब कुछ सामान्य होने के बावजूद मानसिक स्थिति खराब हो चली थी। इसी बीच एक योग शिविर कालोनी में लगा।
हम उन दिनों सुबह घूमने जाते थे। एक सज्जन ने हमसे कहा-‘अरे आप उस योग शिविर में आईये। इस तरह सैर करने से कोई अधिक लाभ नहीं होता।’
हमने शिविर में जाना किया। शिविर में जो शिक्षक आते थे। वह भले आदमी थे। पांचवें दिन योग साधना कर हम घर लौटे तो हालत बिगड़ गयी। तब हमने अपने ही फ्रिज में रखी बर्फी खाकर अपने पर नियंत्रण किया क्योंकि हमें पता था कि वायुविकार के हमले का प्रतिकार करने का यही एक उपाय है।
अगले दिन हमने योग शिक्षक को बताया तो उन्होंने अच्छी बात कहीं। वह बोले-‘एक बात बताईये कि अगर हमारे घर में अनेक किरायेदार हों और हम सबसे मकान खाली करने को कहें तो क्या वह प्रसन्न होंगे? कोई चुपचाप बद्दुआऐं देता जायेगा। कोई लड़ेगा, कोई केस भी कर सकता है। यह आपके अंदर वायु विकार है जो कर आपसे लड़ रहा था क्योंकि योग साधना उसको निकालने आयी थी।’
हमें उसके जवाब ने हतप्रभ कर दिया। सात वर्ष हो गये योग साधना करते हुए।  सच तो यह है कि ज़िन्दगी कि दूसरी पारी है जो योगढ़ना खेल रही है, न कि हम स्वयं!अब किसी चीज पर भरोसा नहीं। न लौकी न करेला। पपीता खाना पड़ता है क्योंकि तंबाकू की वजह से कब्जी का मुकाबला करने के वही काम आता है। तंबाकू न खायें तो खाना तरस जाये कि यह हमें खाता क्यों नहीं और पानी देखता रहे कि यह पीता क्यों नहीं!
जब तनाव के क्षण आते हैं तो हम तंबाकू का त्याग कर देते हैं क्योंकि हमें पता है कि वह मानसिक संतुलन बिगाड़ता है। साइकिल चलाकर दूर तक चले जाते हैं। घर लौटते हैं तो लगता ही नहीं कि साइकिल चलाकर आये हैं। तब सोचते हैं कि काश! यह योग साधना बचपन में किसी ने सिखाई होती।
इसी योग साधना को लेकर भी तमाम तरह के दुष्प्रचार होते रहते हैं जिसके बारे में हमारा दावा है कि खुश रहने के लिये इससे बेहतर कोई उपाय नहीं है। योग साधना से अमरत्व नहीं मिलता पर इंसानों की तरह जिंदा रहने की ताकत मिलती है। जहां तक पेट पालने का सवाल है तो पशु भी पल जाते हैं और इंसान ही केवल इस भ्रम में रहता है कि वह स्वयं को पाल रहा है।
टीवी चैनलों पर लौकी का जूस पीकर मरने वाले एक दंपत्ति की मौत होने के साथ ही एक अधेड़ के बीमार पड़ने की खबर जोरशोर से चल रही थी। इधर इंटरनेट पर पता चला कि जिन दंपत्ति की मौत हुई वह डिब्बा बंद था यानि किसी कंपनी के द्वारा पैक किया गया पर उसका नाम नहीं पता लगा। चैनल शायद इस बात को छिपा रहे हैं ताकि लोग स्वयं लोकी का रस बनाने से बचें और कंपनियों का खरीदें।
अनेक बार नकली दूध की खबरें आती हैं तब लगता है कि सारे देश में वही दूध बिक रहा है। तब मन खराब होता है। एक ब्लाग लेखक ने तो आरोप लगाया था कि कंपनियों के लिये दूध बेचने का मार्ग बनाने के लिये निजी असंगठित ंक्षेत्र को बदनाम करने के लिये ऐसा प्रचार किया जा रहा है। लौकी के बाद करेले पर निशाना लगेगा। योग साधना पर तो लगता ही रहता है। ऐसा क्यों?
कभी कभी सुबह योग साधना के पहले या बाद में पार्क जाना होता है। कभी कभी शाम को भी जाते हैं। वहां योग साधना, व्यायाम तथा सैर करने वालों की संख्या देखकर लगता है कि लोग अब अपने स्वास्थ्य को लेकर सजग हैं। हालांकि सुप्तावस्था में रहने वाले लोगों की संख्या कहंी अधिक है पर सजगता का बढ़ता दायरा दवा कंपनियों के लिये चिंता का विषय हो सकता है। अनेक जगह चिकित्सा शिविर लगते हैं जहां चिकित्सक अपने यहां चेकअप की सलाह लिखकर देते हैं।
प्रसंगवश कहते हैं कि देश में भुखमरी अधिक है पर आंकड़े बताते हैं कि खाकर मरने वालों की संख्या अधिक है भूख से मरने वालों की कम! सीधा मतलब है कि खाने पीने में सावधानी से बीमारी से बचा जा सकता है। कम से कम खाद्य पदार्थ अपने घर पर ही निर्माण किये जायें उतना ही अच्छा! प्रतिदिन योग साधना की जाये तो कहना ही क्या? बाज़ार और उसके प्रचार माध्यमों पर एकदम निष्कर्ष निकालना ठीक नहीं। हमने मूली से तौबा की पर इसका मतलब यह नहीं कि वह सभी के लिये विषैली है। वैसे अगर कोई प्रायोजित लेख लिखने के लिये कहे तो हम उस पर बहुत कुछ नकारात्मक लिख सकते हैं।
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