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Saturday, January 28, 2012

किकेट मैच के लिये पांच गुना शक्ति वाला च्यवनप्राश लायें-लघु हिन्दी व्यंग्य (cricket match and chyavanprash-hindi vyangya or satire)

           च्यवनप्राश में तीन गुना शक्ति होती है-ऐसा कहना है बीसीसीआई क्रिकेट टीम के कप्तान का! अब इस तीन गुना शक्ति का पैमाना नापा जाये तो उसके सेवन से तीन दिन तक ही क्रिकेट खेलने लायक ही हो सकती है। गनीमत है कप्तान ने च्यवनप्राश के विज्ञापन में यह नहीं कहा कि इस च्यवनप्राश के सेवन से पांच गुना शक्ति मिलती है। वरना कंपनी पर उपभोक्ता फोरम में मुकदमा भी हो सकता था। फर्जी प्रचार से वस्तुऐं बेचना व्यापार की दृष्टि से अनुचित माना जाता है।
           बीसीसीआई की क्रिकेट टीम (indian cricket team and his australia tour)विदेश में पांच दिन के मैच खेलने  के लिये मैदान पर उतरती है पर तीन दिन में निपट जाती है। देश के शेर बाहर ढेर हो जाते हैं। सामने वाली टीम के तीन दिन में पांच विकेट जाते हैं और इनके बीस विकेट ढह जाते हैं। क्या करें? एक दिन खेलने की क्षमता है, च्यवनप्राश खाने पर तीन गुना ही शक्ति तो बढ़ती है। बाकी दो दिन कहां से दम दिखायें? इससे अच्छा है तो दो दिन मिलने पर तैराकी करें! क्लब में जायें। जश्न मनायें कि तीन दिन खेल लिये।
         च्यवनप्राश के नायक कप्तान ने तो यहां तक कह दिया है कि टेस्ट अब बंद होना चाहिये। उसकी खूब आलोचना हो रही है। हमारे समझ में नहीं आया कि उसका दोष क्या है? सब जानते हैं कि हमारे देश में शक्तिवर्द्धक के नाम पर च्यवनप्राश ही एक चीज है। अगर उसमें तीन गुना शक्ति आती है तो खिलाड़ी से अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि पांच गुना शक्ति अर्जित करे। इधर बीसीसीआई की क्रिकेट टीम की पांच दिन नहीं चली तो देश में हायतौबा मच गया है। यह हायतौबा मचाने वाले वह पुराने क्रिकेटर हैं जो विज्ञापनों के बोझ तले नहीं दबे। उनको नहीं मालुम कि अधिक धन का बोझ उठाना भी हरेक आदमी के बूते का काम नहीं है। शुद्ध रूप से क्रिकेट एक व्यवसाय है। टीम में वही खिलाड़ी होते हैं जिनके पास कंपनियों के विज्ञापन है। कंपनियां ही इस खेल की असली स्वामी है सामने भले ही कोई भी चेहरा दिखता हो। यही कारण है कि कंपनियों के चहेते खिलाड़ियों को टीम से हटाना आसान नहीं है। पुराने हैं तो फिर सवाल ही नहीं है क्योंकि एक नहीं दस दस कंपनियों के विज्ञापनों के नायक होते हैं। मैच के दौरान वही विज्ञापन आते हैं। इन्हीं कपंनियों के बोर्ड मैदान पर दिखते हैं। क्रिकेट सभ्य लोगों का खेल है और सभ्य लोगों के व्यवसाय और खेल कंपनी के बोर्ड तले ही होते हैं।
          बीसीसीआई की क्रिकेट टीम के विदेश में लगातार आठ बार हारने पर देश भर में रोना रहा है पर वहां क्रिकेट खिलाड़ियों को इसकी परवाह नहीं होगी। उनके पास तो इतना समय भी नहीं होगा कि वह हार के बारे में सोचें। मैच के बचे दो दिन वह अपने व्यवसाय की कमाई का हिसाब किताब जांच रहे होंगे। नये विज्ञापनों का इंतजार कर रहे होंगे। कंपनियां भी आश्वस्त होंगी यह सोचकर कि कोई बात नहीं देश के शेर है फिर यहां करिश्मा दिखाकर लोगों का गम मिटा देंगे। वैसे ही कहा जाता है कि जनता की याद्दाश्त कमजोर होती है।
        बहरहाल कुछ लोग बीसीसीआई की क्रिकेट टीम की दुर्दशा के लिये पूरे संगठन को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। हम इस राय के खिलाफ हैं। इससे अच्छा है तो यह है कि ऐसा च्यवनप्राश बनवाना चाहिए जो पांच गुना शक्ति दे सके। इसके लिये अपने यहां अनेक योग भोग चिकित्सक हैं उनकी सहायता ली जा सकती है। क्या इसकी दुगुनी खुराक लेकर छह गुना शक्ति पाई जा सकती है, इस विषय पर भी अनुंसधान करना चाहिए। बीसीसीआई की क्रिकेट टीम के कप्तान ने तो पूरी तरह से ईमानदारी से अपना काम किया है। उसने एक दिवसीय क्रिकेट में जमकर खेला है और च्यवनप्राश के सेवन से तीन गुना शक्ति प्राप्त कर तीन दिन तक पांच दिवसीय क्रिकेट में अपना किला लड़ाया है। अब यह अपने देश के आयुर्वेद विशेषज्ञों की गलती है कि उन्होंने पांच या छह गुना शक्ति वाला च्यवनप्राश नहीं बनाया जिसका विज्ञापन उसे दिया जाता। उससे आय पांच गुना होती तो खेलने का उत्साह भी उतना ही बढ़ता। जब नये संदर्भों में भारतीय अध्यात्म का नये तरह से विश्लेषण हो रहे हैं तो आयुर्वेद को भी इससे पीछे नहीं रहना चाहिए। बिचारे खिलाड़ियों को पांच या छह गुना शक्ति बढ़ाने वाला च्यवनप्राश नहीं दिया गया तो वह क्या करते? सो इस हार को भी व्यंग्य का हाजमोला खाकर हज़म कर लो।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

Sunday, September 12, 2010

हिन्दी में चिंदी लेखन-हिन्दी व्यंग्य (hindi men chindi lekhan-hindi vyangya)

वह नब्बे साल के अंग्रेजी लेखक हैं मगर उनको हिन्दी आती होगी इसमें संदेह है पर हिन्दी के समाचार पत्र पत्रिकाऐं उनके लेख अपने यहां छापते हैं-यकीनन ऐसा अनुवाद के द्वारा ही होता होगा। वह क्या लिखते हैं? इसका सीधा जवाब यह है कि विवादों को अधिक विवादास्पद बनाना, संवेदनाओं को अधिक उभारना और कल्पित संस्मरणों से अपने अपने आप को श्रेष्ठ साबित करना। अगर हिन्दी के सामान्य लेखक से भी उनकी तुलना की जाये तो उनका स्तर कोई अधिक ऊंचा नहीं है मगर चूंकि हमारे प्रकाशन जगत का नियम बन गया है कि वह केवल एक लेखक के रूप में किसी व्यक्ति को तभी स्वीकार करेंगे जब उसके साथ दौलत, शौहरत तथा ऊंचे पद का बिल्ला लगा होना चाहिये। यह तभी संभव है जब कोई लेखक आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक तथा धार्मिक शिखर पुरुषों का सानिध्य प्राप्त करे और दुर्भाग्य कि वह उनको ही मिलता है जिनको अंग्रेजी आती है और तय बात है कि देश के अनेक हिन्दी संपादक उनके प्रशंसक बन जाते हैं।
उन वृद्ध लेखक ने अपने एक लेख में भिंडरवाले और ओसामा बिन लादेन से वीर सावरकर की तुलना कर डाली। यकीनन यह चिढ़ाने वाली बात है। अगर अंग्रेजी अखबार में ही यह सब छप जाता तो कोई बात नहीं मगर उसे हिन्दी अखबार में भी जगह मिली। यह हिन्दी की महिमा है कि जब तक उसमें कोई लेखक न छपे तब तक वह अपने को पूर्ण नहीं मान सकता और जितने भी इस समय प्रतिष्ठित लेखक हैं वह अंग्रेजी के ही हैं इसलिये ही अपने अनुवाद अखबारों में छपवाते हैं। इससे प्रकाशन जगत और लेखक दोनों का काम सिद्ध होता है। अंग्रेजी का लेखक पूर्णता पाता है तो हिन्दी प्रकाशन जगत के कर्णधार भी यह सोचकर चैन की संास लेते हैं कि किसी आम हिन्दी लेखक की सहायता लिये बगैर ही हिन्दी में अपना काम चला लिया।
वह लेखक क्या लिखते हैं? उनका लिखा याद नहीं आ रहा है। चलिये उनकी शैली में कुछ अपनी शैली मिलाकर एक कल्पित संस्मरण लिख लेते हैं।
मैं ताजमहल पहुंच गया। उस समय आसमान में बादल थे पर उमस के कारण पसीना भी बहुत आ रहा था। कभी कभी ठंडी हवा चल रही थी तब थोड़ा अच्छा लगता था। बीच बीच में धूप भी निकल आती थी। ताजमहल के प्रवेश द्वार पर खड़ा होकर मैं उसे निहार रहा था। तभी वहां दो विदेशी लड़किया आयीं। बाद में पता लगा कि एक फ्रांस की तो दूसरी ब्रिटेन की है।
फ्रांसीसी  लड़की मुझे एकटक निहारते हुए देखकर बोली-‘‘आप ताजमहल को इस तरह घूर कर देख रहे हैं लगता है आप यहां पहली बार आये हैं। आप तो इसी देश के ही हैं शायद....आप इस ताजमहल के बारे में क्या सोचते हैं।’
मैं अवाक होकर उसे देख रहा था। वह बहुत सुंदर थी। उसने जींस पहन रखी थी। उसके ऊपर लंबा  पीले रंग का कुर्ता  उसके घुटनों तक लटक रहा था। मैने उससे कहा-‘‘ मैं ताजमहल देखने आज नहीं आया बल्कि एक प्रसिद्ध लेखक की किताब यहां ढूंढने आया हूं। उस किताब को अनेक शहरों में ढूंढा पर नहीं मिली। सोच रहा हूं कि यहां कोई हॉकर शायद उसे बेचता हुए मिल जाये। वह किताब मिल जाये तो उसे पढ़कर कल तसल्ली से ताज़महल देखूंगा और सोचूंगा।’
वह फ्रांसीसी  लड़की पहले तो मेरी शक्ल हैरानी से देखने लगी फिर बोली-‘पर आप तो एकटक इसे देखे जा रहे हैं और कहते हैं कि कल देखूंगा।’’
मैंने कहा-‘‘मेरी आंखें वहां जरूर हैं पर ताजमहल को नहीं  देख रहा और न सोच रहा  क्योंकि उसके लिये मुझे उस प्रसिद्ध लेखक की एक अदद किताब की तलाश है जिसमें यह दावा किया गया है कि ताजमहल किसी समय तेजोमहालय नाम का एक शिव मंदिर था।’’
उसके पास खड़ी अंग्रेज लड़की ने कहा-‘हमारा मतलब यह था कि आप इस समय ताजमहल के बारे में क्या सोच रहे हैं? वह किताब पढ़ने के बाद आप जो भी सोचें, हमारी बला से! आप किताब पढ़ने की बात बताकर अपने आपको विद्वान क्यों साबित करना चाहते हैं?’
मैंने कहा-‘नहीं, बिना किताब पढ़े हम आधुनिक हिन्दी लोगों की सोच नहीं चलती। मैं आपसे क्षमाप्रार्थी हूं, बस मुझे वह किताब मिल जाये तो....अपना विचार आपको बता दूंगा।’
अंग्रेज लड़की ने कहा-‘कमाल है! एक तो हम यहां ताज़महल देख रहे है दूसरा आपको! जो किताब पढ़े बिना अपनी सोच बताने को तैयार नहीं है।’
मैंने कहा-‘क्या करें? आपके देश की डेढ़ सौ साल की गुलामी हमारी सोचने की ताकत को भी गुलाम बनाकर रख गयी। इसलिये बिना किताब के चलती नहीं।’
बात आयी गयी खत्म हो गयी थी। मैं शाम को बार में बैठा अपने एक साथी के साथ शराब पी रहा था। मेरा साथी उस समय मेरे सामने बैठा सिगरेट के कश लेता हुआ मेरी समस्या का समाधान सोच रहा था।’
नशे के सरूर में मेरी आंखें भी अब कुछ सोच रही थीं। अचानक मेरे पास दो कदम आकर रुके और सुरीली आवाज मेरी कानों गूंजी-‘हलौ, आप यहां क्या ताज़महल पर लिखी वह किताब ढूंढने आये हैं।’
मैने अचकचा कर दायें तरफ ऊपर मुंह कर देखा तो वह फ्रांसिसी लड़की खड़ी थी। उसके साथ ही वह अंग्रेज लड़की कुछ दूर थी जो अब पास आ गयी। वह फ्रांसिसी लड़की मुस्करा रही थी और यकीनन उसका प्रश्न मजाक उड़ाने जैसा ही था।
मैंने हंसकर कहा-‘हां, इस कबाड़ी को इसलिये ही यहां लाया हूं क्योकि इसने वादा किया है कि एक पैग पीने का बाद याद करेगा कि इसने वह किताब कहां देखी थी। वह किताब उसके कबाड़ की दुकान पर भी हो सकती है, ऐसा इसने बताया।’’
अंग्रेज लड़की बोली-‘अच्छा! आप अगर किताब पा लें तो पढ़कर कल हमें जरूर बताईयेगा कि ताजमहल के बारे में क्या सोचते हैं? कल हम वहां फिर आयेंगीं।’
मैंने कहा-‘ताजमहल एक बहुत अच्छी देखने लायक जगह है। उसे देखकर ऐसा अद्भुत अहसास होता है जिसका शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता।’
दोनों लड़कियां चौंक गयी। अंग्रेज लड़की बुझे घूरते हुए बोली-‘पर आपने तो वह किताब पढ़ी भी नहीं। फिर यह टिप्पणी कैसे कर दी। आप तो बिना किताब पढ़े कुछ सोचते ही नहीं’।
मैंने कहा-‘हां यह एक सच बात है पर दूसरा सच यह भी है कि शराब सब बुलवा लेती है जो आप सामान्य तौर से नहीं बोल पाते।’’
यह था एक कल्पित संस्मरण! यह कुछ बड़ा हो गया और इसे ताज़महल से बार तक इसे खींचकर नहीं लाते तो भी चल जाता पर लिखते लिखते अपनी शैली हावी हो ही जाती है क्योकि ताज़महल तक यह संस्मरण ठीक ठाक था पर उससे आगे इसमें कुछ अधिक प्रभाव लग रहा है।
मगर हम जिस लेखक की चर्चा कर रहे हैं वह इसी तरह ही दो तीन संस्मरण लिखकर और साथ में विवादास्पद मुद्दों पर आधी अधूरी होने के साथ ही बेतुकी राय रखकर लेख बना लेते हैं।
वैसे भी अंग्रेजी में लिखने पर हिन्दी में प्रसिद्धि पाने वाले लेखक को शायद ही हिन्दी लिखना आती हो पर अपने यहां एक कहावत हैं न कि ‘घर का ब्राह्म्ण बैल बराबर, आन गांव का सिद्ध’। अंग्रेजी लेखक को ही सिद्ध माना जाता है और हिन्दी को बेचारा। अंग्रेजी के अनेक लेखक बेतुकी, और स्तरहीन लिखकर भी हिन्दी में छाये रहते हैं। इनमें से अधिकतर राजनीतिक घटनाओं पर संबंधित पात्रों का नाम लिखकर ही उनका प्रसिद्ध बनाते हैं-अब यह उस पात्र की प्रशंसा करें या आलोचना दोनों में उसका नाम तो होता ही है। इनमें इतनी तमीज़ नहीं है कि जो व्यक्ति देह के साथ जीवित नहीं हो उस पर आक्षेपात्मक तो कभी नहीं लिखना चाहिये। कम से कम उनकी मूल छबि से तो छेड़छाड़ नहीं करना चाहिये। भिंडरवाले और ओसामा बिन लादेन की छबि अच्छी नहीं है पर सावरकर को एक योद्ध माना जाता है। उनके विचारों से किसी को असहमति हो सकती है पर इसको लेकर उनकी छबि पर प्रहार करना एक अनुचित कृत्य हैं। बहरहाल हिन्दी में ऐसे ही चिंदी लेखक प्रसिद्ध होते रहे हैं और यही शिकायत भी करते हैं कि हिन्दी में अच्छा लिखा नहीं जा रहा। चिंदी लेखक यानि अंग्रेजी में टुकड़े टुकड़े लिखकर उसके हिन्दी में बेचने वाले
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कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Sunday, October 18, 2009

‘पुराने माल' का नया स्वयंवर-व्यंग्य आलेख (purane mal ka naya svyanvar-hindi vyangya)

जहां तक भारत की स्वयंवर परंपराओं से जुड़ी कथाओं की हमें जानकारी है तो उसके नायक नायिका तो नयी उम्र के एकदम ताजा पात्र होते थे पर इधर दूरदृश्य प्रसारणों (टीवी कार्यक्रम) में देख रहे हैं उस परंपरा के नाम पर एक तरह से पुराना कबाड़ सजाया जा रहा है।
उच्च शिक्षा-अजी, यही वाणिज्य स्नातक की-के दौरान महाविद्यालयों के आचार्य अपने अपने विषयों के पाठ्य पुस्तकें लाने के निर्देश साथ उनके लेखकों का नाम भी लिखाते थे। चूंकि अपने यहां शिक्षा के दौरान उस समय तक-अब पता नहीं क्या स्थिति है- आचार्य का वाक्य ब्रह्म वाक्य समझा जाता था इसलिये हम उन पुस्तकों ढूंढने निकलते थे। पुराने साथी छात्रों ने बता दिया कि इसके लिये ‘द्वितीय हस्त पुस्तकें (सैकिण्ड हैण्ड बुक्स) लेना बेहतर रहेगा। वह यह राय इसलिये देते थे कि वह अपनी पुस्तकें बेचकर आगे की पुस्तकें इसी तरह लाते थे। उनके मार्गदर्शन का विचार कर हम भी ‘द्वितीय हस्त पुस्तकें’ हम खरीद लाते थे अलबत्ता उनको बेचने कभी नहीं गये।
उस समय शहर में एक दुकान तो ऐसी थी जो उच्च और तकनीकी शिक्षा की द्वितीय हस्त पुस्तकों का ही व्यापार करती थी। पहले से दूसरे हाथ में जाती पुस्तकें उनके लिये कमीशन जुटाने का काम करती थी। हम सोचते थे कि ‘द्वितीय हस्त पुस्तकें’ खरीद रहे हैं पर बाद में जब थोड़ा भाषा ज्ञान हुआ तो पता लगा कि पुस्तकें तो पुस्तकें हैं उनके लिये द्वितीय हस्त -हो सकता है तृतीय और चतुर्थ भी हो- हम ही उनके लिये होते थे।
बहरहाल इतना तय रहा कि हमने अपनी उच्च शिक्षा ऐसी ‘द्वितीय हस्त पुस्तकों’ के सहारे ही प्राप्त की। इसलिये जब कहीं नयी पुरानी चीज की चर्चा होती है तब हमें उस द्वितीय हस्त पुस्तकों का ध्यान आता है।

देखा जाये तो हम जीवन में कभी न कभी द्वितीय हस्त या कहें पुराना माल बन ही जाते हैं। कम से कम शादी के मामले में तो यही होता है। पहली शादी का महत्व हमेशा ही रहता है दूसरी शादी का मतलब ही यही है कि आप सैकिण्ड हैंड हैं या आपकी साथी? इस पर विवाद हो सकता है।
इधर एक दूरदृश्य (टीवी कार्यक्रम) धारावाहिक में हमने देखा कि एक तलाकशुदा आदमी अपना स्वयंवर रचा रहा है। तब हमें भी सैकिण्ड पुस्तक का ध्यान आया। हम आज तक तय नहीं कर पाये कि उन पुस्तकों के लिये हम द्वितीय हस्त थे या वही हमारे लिये पुरानी थी। अलबत्ता उन पुस्तकों को पाठक मिला और हमें ज्ञान-इसका प्रमाण यह है कि हम इतना लिख लेते हैं कि लोगों की हाय निकल जाती है। फिर हम स्वयंवर प्रथा पर विचार करते हैं जिनका अध्यात्म पुस्तकों में-जी, वह बिल्कुल नयी खरीद कर लाते थे क्योंकि पाठ्य पुस्तकों के मुकाबले वह कुछ सस्ती मिलती थी-इस प्रथा का जिक्र पढ़ते रहे हैं। जहां तक हमारी जानकारी है स्वयंवर ताजा चेहरों के लिये आयोजित किया जाता था। तलाक शुदा या जीवन साथी खो चुके लोगों के लिये कभी कोई स्वयंवर आयोजित हुआ हो इसका प्रमाण नहीं मिलता। हम यह जरूर कहते हैं कि स्त्री के प्रति समाज के मानदण्ड अलग हैं पर जहां तक पहली शादी की बात है तो उसका ताजगी का पैमाना दोनों पर एक जैसा लागू होता है। वैसे हमारे यहां प्रचलित विदेशी विचार के अनुसार पहला प्यार ही आखिरी प्यार होता है पर देसी भाषा में ‘पहली शादी’ को ही आखिरी शादी माना गया है। उसके बाद आदमी हो या औरत- जहां तक सामाजिक रूप से शादी का प्रश्न है-बासी चेहरे की श्रेणी में आ जाते हैं। अगर स्त्री का दूसरा विवाह हो तो एकदम सादगी से होता है और पुरुष का कुछ धूमधाम से होने के बावजूद बारातियों का चेहरा बासी लगता है क्योंकि वह इतने खुश नहीं दिखते जितना पहली शादी में थे-यह अनुभव की हुई बात बता रहे हैं। तात्पर्य यह है कि यह स्वयंवर केवल ताजा चैहरे वाले नवयुवा वर्ग-जी, युवा वर्ग से पहले का वर्ग- के सदस्यों के लिये रहा है। इसमें लड़का लड़की आपस में दूर किसी दूसरे से भी नहीं मिले होते थे। इसलिये उनके विवाहों का वर्णन आज भी ताजगी से भरा लगता है।
अभी एक अभिनेत्री का स्वयंवर हुआ था। वह वर चुनने नहीं आई बल्कि मंगेतर चुनने आयी थी और फिर उसे प्रेमी बताने लगी। उसी अभिनेत्री का एक अभिनेत्रा से प्रेम संबंध कुछ दिन पहले ही विच्छेद हुआ था। देखा जाये तो उसे एकदम ताजा चेहरा नहीं माना जा सकता था क्योंकि अंततः उसने प्रचार माध्यमों में अनेक बार उस अभिनेता से प्रेम संबंध होने की बात स्वीकारी थी। मगर बाजार ने उसका स्वयंवर बेचा और कमाया भी।

इधर एक बड़े आदमी का बेटे ने भी दूरदृश्य धारावाहिकों में अपने को अभिनेता के रूप में स्थापित कर लिया है। उस पर मादक द्रव्यों के सेवन का आरोप तो एक बार लग ही चुका है साथ ही उसने एक विवाह भी किया जिसकी परिणति तलाक के रूप में हुई। अब उसके स्वयंवर का कार्यक्रम हो रहा है। देश में जो बौद्धिक जड़ता है उसे देखकर उसके कार्यक्रम की सफलता में कोई संदेह नहीं है। कहने को तो लोग कहते हैं कि भारतीय अध्यात्म ग्रंथों को पढ़ने से कुछ नहीं होता पर बाजार उसमें से बेचने योग्य परंपराओं क्यों ला रहा है? सच बात तो यह है कि हमारे धर्म ग्रंथों में शिक्षा, तत्व ज्ञान के साथ मनोरंजन भी है इसलिये उनका आकर्षण सदाबहार रहता है। दूसरा सच यह भी है कि रामायण, श्रीमद्भागवत, महाभारत, वेद, पुरान, उपनिषद जिस तरह लिखे गये हैं उसकी बराबरी अब कोई लिखने वाला कर ही नहीं सकता। शायद यही कारण है कि आधुनिक विद्वानों ने जहां तक हो सके समाज से उनको बहिष्कृत करने के लिये हर संभव प्रयास किया है क्योंकि उनके प्रचलन में रहते उनकी रचनायें प्रतिष्ठित नहीं हो पाती। आधुनिक भारत में विवेकानंद जैसे जो दिग्गज हुए हैं वह भी इन्हीं महाग्रंथों के अध्ययन के कारण हुए हैं। इसलिये बकायदा इन महाग्रंथों से समाज को दूर रखने का प्रयास किया गया। उसका परिणाम यह हुआ कि आजकल की नयी पीढ़ी के वही सदस्य अपने देश को समझ सकते हैं जिन्होंने घर पर इनका अध्ययन किया है, बाकी के लिये यह संभव नहीं है क्योंकि इनके अध्ययन के लिये कोई औपचारिक शिक्षा केंद्र नहीं है। अगर भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों के लिये कोई शैक्षणिक केंद्र खुले तो आज भी लोग उसमें अपने बच्चों को ही नहीं पढ़ायेंगे बल्कि स्वयं भी जायेंगे। यह कमी पेशेवर संतों से नहीं पूरी हो सकती। ऐसे मे स्वयंवर जैसी व्यवस्था के बारे में किसी को अधिक पता नहीं है या फिर लोग ध्यान में नहीं ला रहे।
बाजार के प्रभाव में तो प्रचार माध्यम खलनायकों को नायक बनाये जा रहे हैं। पता नहीं वह कैसे वह इन सितारों को चमका रहे हैं जिनके चरित्र पर खुद इन्हीं प्रचार माध्यमों ने कभी दाग दिखाये हैं। देखा जाये तो यह स्वयंवर कार्यक्रम देश का मजाक उड़ाने जैसा ही है। अगर विदेशी लोग इनको देखेंगे तो यही सोचेंगे कि-‘अरे, यह कैसी इस देश की घटिया प्रथा है? जिसमें चाहे कभी भी किसी का स्वयंवर रचाया जा सकता है
वैसे बाजार जो कर रहा है उस पर किसी का नियंत्रण नहीं है। होना भी नहीं चाहिए पर लोगों में जागरुकता आ जाये तो हो सकता है ऐसे कार्यक्रम ऊंची वरीयता प्राप्त नहीं कर सकते। कम से कम सैकिण्ड हैण्ड पुस्तक को नया बेचने का काम तो करने से उन्हें रोका जा सकता है।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप
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Wednesday, July 8, 2009

मिलावट और नकल का आतंक-हास्य व्यंग्य(nakal aur milavat par vyangya)

आतंक कोई बाहर विचरने वाला पशु नहीं बल्कि मानव के मन में रहने वाला भाव है जो उसके सामने तब उपस्थित होता है जब वह अपने लिये कठिन हालत पाता है। पूरे विश्व के साथ भारत में भी आंतक फैले होने की बात की जाती है पर अन्य से हमारी स्थिति थोड़ी अलग है। दूसरे देश कुछ लोगों द्वारा उठायी गयी बंदूकों के कारण आतंक से ग्रसित हैं पर भारत में तो यह आतंक का एक हिस्सा भर है। यह अलग बात है कि हमारे देश के बुद्धिमान बस उसी बंदूक वाले आतंक पर ही लिखते हैं।
बहुत दिन से हम देख रहे हैं कि हम सारे जमाने के आतंक पर लिख रहे हैं पर अपने मन में जिनका आंतक है उसकी भी चर्चा कर लें। सच बात तो यह है हम नकली नोटों और मिलावटी सामान से बहुत आतंकित हैं।
बाजार में जब किसी को पांच सौ का नोट देते हैं तो वह ऐसे देखता है कि जैसे कि किसी अपराधी ने उसे अपने चरित्र का प्रमाणपत्र देखने के लिये दिया हो। जब तक वह दुकानदार लेकर अपनी पेटी में वह नोट डालकर सौदा और बचे हुए पैसे वापस नहीं करता तब तक मन में जो उथल पुथल होती है उसमें हम कितनी बार घायल होते हैं यह पता ही नहीं-याद रहे पश्चिमी चिकित्सा शास्त्र यह कहता है कि तनाव से जो मनुष्य के दिमाग को क्षति पहुंचती है उसका पता उसे तत्काल नही चलता।
हमने अनेक दुकानदारों के सामने ताल ठौंकी-अरे, भईया हम यह नोट ए.टी.एम से ताजा ताजा निकाल कर लाये हैं।’
वह कहते हैं कि ‘साहब, आजकल तो ए़.टी.एम. से भी नकली नोट निकल आते हैं और वह सभी ताजा ही होते हैं।’
उस समय सारा आत्मविश्वास ध्वस्त नजर आता है। ऐसा लगता है कि जैसे बम फटा हो और हम अपनी किस्मत से साबित निकल गये।
यही मिलावटी सामान का हाल है। बाजार में खाने के नाम पर दिन-ब-दिन डरपोक होते जा रहे हैं। इधर टीवी पर सुना कि मिलावटी दूध में ऐसा सामान मिलाया जा रहा है जिसमें एक फीसदी भी शरीर के लिये पाचक नहीं हैं। मतलब यह कि पूरा का पूरा कचड़ा है जो पेट में जमा होता है और समय आने पर अपना दुष्प्रभाव दिखाता है। अभी उस दिन समाचार सुना कि एक तेरहवीं में विषाक्त खोये की मिठाई खाकर 1200 लोग एक साथ बीमार पड़ गये। उस समय हमारी सांसें उखड़ रही थी। उसी दौरान एक मित्र का फोन आया और उसने पूछा-‘क्या हालचाल हैं? तुम्हारे ब्लाग हिट हुए कि नहीं। अगर हो गये हों तो मिठाई खिला देना। हम अंधेरे में बैठे हैं और आज तुम्हारा ब्लाग नहीं देख पा रहे।’
हमने कहा-‘अच्छा है बैठे रहो। अगर लाईट आ गयी तो तुम टीवी समाचार भी जरूर देखोगे। वहां जब मिठाई खाकर बीमार पड़ने वालों की खबर सुनोगे तो फिर मिठाई नहीं मांगोगे बल्कि मिठाई खाना ही भूल जाओगे।’
मित्र ने कहा-‘’तुम चिंता मत करो। न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी। तुम कभी हिट नहीं बनोगे इसलिये मिठाई भी नहीं मिलेगी सो खतरा कम है। पर यार, वाकई बाहर खाने में हम दिमाग तनाव मे आ जाता है कि कहीं गलत चीज तो नहीं खा ली। उस दिन एक जगह चाय पी और बीच में छोड़ कर दुकानदार को पैसे दिये और उससे कहा‘यह हमारी इंसानियत ही समझना कि हमने पैसे दिये वरना तुम्हारा दूध खराब है उसमें बदबू आ रही है।’ उसने भी हमसे पैसे ले लिये। हैरानी की बात यह है कि लोग उसी चाय को पी रहे थे किसी ने उससे कुछ कहा नहीं।’’
पिछली दो दीवाली हमने बिना खोये की मिठाई खाये बिना ही मनाई हैं। कहां हमें उस दिन मिठाई खाने का शौक रहता था पर मिलावट के आतंक ने उसे छीन लिया। वजह यह है कि इधर दीवाली के दिन शुरु हुए उधर टीवी पर मिलावटी दूध के समाचार शुरु हो जाते हैं कहते हैं कि
1-शहरों में खोवा आ कहां से रहा है जबकि उस क्षेत्र में इतनी भैंसे ही नहीं्र है।
2-खोये में तमाम ऐसे रसायन मिले होते हैं जो पेट की आंतों में भारी हानि पहुंचाते हैं।
3-घी भी पूरी तरह से नकली बन रहा है।’
ऐसे समाचार जो दिमाग में आंतक फैलाते हैं वह बारूद के आतंक से कहीं कम नहीं होते। आप ही बताईये खोय की विषाक्त मिठाई खाकर 1200 लोग एक साथ बीमार हों तो उसे भला छोटी घटना माना जा सकता है? क्या जरूरी है कि दुनियां के किसी हिस्से में बारूद से लोग मरे उसे ही आतंकवादी घटना माना जायेगा?
समस्या यह नहीं है कि दूध, घी या खोवा मिलावटी सामान बन रहा है बल्कि हल्दी, मिर्ची और शक्कर में मिलावट की बात भी सामने आती है। इतना ही नहीं अब तो यह भी कहने लगे है कि सब्जियों और फलों में भी दवाईयां मिलाकर उन्हें प्रस्तुत किया जा रहा है और वह भी कम मनुष्य देह के लिये कम खतरनाक नहीं है।

जब बारूदी आतंक का समाचार चारों तरफ गूंज रहा होता है तब कुछ देर उस पर ध्यान अधिक रहता है पर जब अपने जीवन में कदम कदम पर नकली और खतरनाक सामान से सरोकार होने की आशंका है तो वह भी अब कम आतंकित नहीं करती। मतलब यह है कि चारों तरफ आंतक है पर हमारे देश के बुद्धिमान लोगों की आदत है कि विदेश के बताये रास्ते पर ही अपने विषय चुंनते हैं। हम इससे थोड़ा अलग हैं और हर विषय को एक आईना बनाकर अपने आसपास देखते हैं तब लगता है कि इस विश्व में बारूदी आतंक खत्म वैसे ही न होने वाला पर जो यह नकल और मिलावट का यह अप्रत्यक्ष आतंक है उसके परिणाम उससे कहीं अधिक गंभीर हैं। सोचने का अपना अपना तरीका है कोई सहमत न हो यह अलग बात है।
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Saturday, July 4, 2009

‘सविता भाभी’ ने 'मस्त राम' को पीटा-व्यंग्य आलेख (savita bhabhi and mastram in hindi)

कुछ दिन पहले तक शायद बहुत कम लोग जानते होंगे कि ‘सविता भाभी’ नाम की कोई वेबसाइट होगी जिस पर ‘लोकप्रिय’ सामग्री भी हो सकती है। इस पर प्रतिबंध लगने के बाद उसकी खोज खबर बढ़ गयी है। सच कहें तो इस ‘सविता भाभी’ अपने पाठों को हिट कराने का जोरदार नुस्खा बनता नजर आ रहा है-यह लेख भी इसी उद्देश्य से हम लिख रहे हैं कि चलो कुछ और हिट बटोर लो क्योंकि हम कथित रूप से उस तरह का लोकप्रिय साहित्य लिखने में अपने को असमर्थ पाते हैं-हां, अगर कहीं से जोरदार पैसे की आफर आ जाये तो जोरदार कहानियां हैं पर मु्फ्त में तो यही लिखेंगे। नामा आ जाये तो नाम वैसे ही होता है भले बदनाम हो जाये।
किस्से पर किस्सा याद आ ही जाता है। हमने अपने ब्लाग में अपने नाम के साथ मस्तराम शब्द जोड़ा तो पाया कि वह हिट ले रहा है। उसी तरह हमने अंग्रेजी और हिंदी में मस्तराम के लेबल जोड़े। उससे कुछ पाठ हिट होने लगे। एक बार एक ब्लाग लेखक ने इस पर आपत्ति की तो हमने पता किया कि मस्तराम साहित्य में लोकप्रिय सामग्री लिखी जाता है अलबत्ता उसकी लोकप्रियता का दायदा उत्तरप्रदेश तक ही सीमित है। इधर मध्यप्रदेश में लोगों को अधिक जानकारी नहीं है। बहरहाल हमारी नानी हमसे मस्तराम कहती थी जो किसी भी आपत्ति को स्वीकार न कर हम उसका उपयोग करते हैं-उसमें सामग्री यही होती है।
इधर सविता भाभी ने मस्तराम को पीछे छोड़ दिया है। अब क्या करें? उसके उपयोग के लिये हमारे पास कोई तर्क नहीं है। हमारे पूरे खानदान में किसी महिला का नाम सविता नहीं है जिसे झूठमूठ ही आदर्श के रूप में प्रस्तुत कर ब्लाग का नाम लिखे या पाठों पर लेबल लगायें। ‘सविता भाभी’ प्रतिबंध से पहले कितनी लोकप्रिय थी यह तो पता नहीं पर इस समय सर्च इंजिनों यह शब्द सबसे अधिक खोजा गया है। कहते हैं कि किसी भी चीज या आदमी को दबाओ उतनी ही शिद्दत से ऊपर उठ कर आती है। यही हाल ‘सविता भाभी’ का है। एक काल्पनिक स्त्री पात्र और उसका नाम इस समय इंटरनेट प्रयोक्ताओं के लिये खोजबीन का विषय हो गया है।
इंटरनेट पर पोर्न वेबसाईटों का जाल कभी खत्म नहीं हो सकता। देश के अधिकतर प्रयोक्ता ऐसा वैसा देखने के लिये ही अधिक उत्सुक हैं और उनकी यही इच्छा संचार बाजार का यह एक बहुत बड़ा आधार बनी हुई हैं।
एक मजे की बात है कि हमेशा ही नारी स्वतंत्रता और और विकास के पक्षधर सार्वजनिक रूप से अश्लीलता रोकने का स्वतंत्रता के नाम पर तो विरोध करते हैं पर अंतर्जाल पर ‘सविता भाभी’ की रोक पर कोई सामने नहीं आया। लगभग यही स्थिति उनकी है जो परंपरावादी हैं और अश्लीलता रोकने का समर्थन करते हैं वह भी इसके समर्थन में आगे नहीं आये।
इधर अनेक अंतर्जाल लेखकों ने यह बता दिया है कि ‘सविता भाभी’ पर कैसे पहुंचा जा सकता है। हमने यह वेबसाईट देखने का प्रयास नहीं किया मगर इस पर लगा प्रतिबंध हमारे लिये कौतुक और जिज्ञासा का विषय है। इधर हमारे एक पाठ ने जमकर हिट पाये तो वह जिज्ञासा बढ़ गयी।
हम भी लगे गुणा भाग करने। पाया कि मस्तराम उसके मुकाबले एकदम फ्लाप है।
उस दिन इस लेखक ने सविता भाभी वेबसाईट पर लगे प्रतिबंध पर एक आलेख लिखा। उसका नाम भी पहली बार अखबार में देखा था। वह पाठ ब्लाग स्पाट के ब्लाग पर लिखा गया। हिंदी के सभी ब्लाग एक जगह दिखाने वाले एक फोरम ब्लाग वाणी पर इस लेखक के केवल ब्लाग स्पाट के ही ब्लाग दिखते हैं। वहां ब्लाग लेखक मित्रों की आवाजाही होती है और आम पाठक तो हमारे पाठों को सर्च इंजिनों में सीधे ही पढ़ते हैं। वहां सविता भाभी पर लिखा गया पाठ फ्लाप हो गया। उसे हमने शाम को डालाा था और अगली सुबह वही पाठ हमें सुस्त पड़ा दिखा। जैसे कह रहा हो कि तुमने शीर्षक में ही अगर ‘सविता भाभी’ लिखा होता तो मेरा यह हाल न होता।’
हमने उसे पुचकारा और शाम तक इंतजार करने के लिये कहा। शाम को आते ही उस पाठ को वर्डप्रेस के प्लेट फार्म ‘हिंदी पत्रिका’ पर ढकेल दिया। उस पर शीर्षक हिंदी और अंग्रेजी में लिखा-यह अलग बात है कि हिंदी में ‘सविता भाभी’ छूट गया पर अंग्रेजी में डालना नहीं भूले।
अपने दायित्व की इति श्री करने के बाद हमने उससे मूंह फेर लिया। डेढ़ दिन बाद जब वर्डप्रेस के डेशबोर्ड को खोला तो वह पाठों के शीर्ष पर मौजूद होकर वह हमें चिढ़ा रहा था-देखो हिंदी में लिखना था ‘सविता भाभी पर प्रतिबंध’ और लिख दिया केवल ‘पर प्रतिबंध’। हमने अंदर घुसकर देखा तो आंखें फटी रह गयी। कहां वह पाठ छह पाठकों की संख्या लेकर ब्लागवाणी में सुपर फ्लाप था और कहां वह डेढ़ सौ के पास पहुंच गया। हिंदी में शब्द डालने का अफसोस इसलिये नहीं रहा क्योंकि उसे अंग्रेजी के शब्द से ही खोजा गया था।
फिर हमने मस्तराम की खोजबीन की तो देखा कि उसके आंकड़े नगण्य थे। मस्तराम नाम की अंतर्जाल पर लोकप्रियता ठीक ठाक है। हम तो हैरान होते हैं जब मस्तरामी ब्लाग के आंकड़े देखते हैं। कुछ मत लिखो पर उस पाठकों का आगमन यथावत है। हमें याद है जब पत्रकार थे तब हमारे साथ एक बाजार संपादक हुआ करते थे। उनके शीर्ष ऐसे ही होते थे। ‘मिर्ची भड़की’, ‘सोना लुढ़का’, ‘चांदी उछली’ और ‘तेल पिछड़ा’। उनकी अनुपस्थिति में हम उनका काम देखते थे। तब ऐसे ही शीर्षक लगाते थे। उनकी देखा देखी हम अपने खेल समाचारों पर कभी कभी खेल संपादक के रूप में हम भी लिख देते थे कि‘अमुक टीम ने अमुक को पीटा’। इस बात को अनेक बरस हो गये हैं पर याद तो आती है। इस घटनाक्रम पर हमारे दिमाग में एक ही शीर्षक आ रहा था कि ‘सविता भाभी’ ने ‘मस्तराम’को पीटा।
आगे क्या होगा पता नहीं पर इस देश में अंतर्जाल पर व्यवसाय ढूंढ रहे लोग इसे नुस्खे के रूप में अपना सकते हैं। आप देखना कि ‘सविता भाभी’ नाम के अनेक उत्पाद और पाठ यहां दिख सकते हैं। प्रतिबंध लगा यह एक अलग विषय है पर जिस तरह अखबार में पढ़कर लोग इस पर आ रहे हैं उस पर विचार करना चाहिये कि कहीं इस तरह के प्रयास तो नहीं हो रहे कि इसके नाम के सहारे अंतर्जाल पर बाजार की नैया पर लगायी जाये क्योंकि अंतर्जाल का बाजर नियमित रूप से बना रहे इसके लिये टेलीफोन कंपनियों से विज्ञापन पाने वाले व्यवसायिक इस तरह के प्रयास करेंगे। मस्तराम से अधिक आशा नहीं की जा सकती।
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Wednesday, July 1, 2009

अमर प्यार-हास्य कविता (hasya kavita)

प्यार में जो मर गये
उनके गीत क्यों गाते हो
जो जिंदगी न दे सके
उस प्यार की पहचान क्यों बनाते हो।
किसी शरीर की चाहत
हवस ही होती है
रूह की रूह से हो जाये मुलाकात
उस प्यार के रास्ते क्यों नहीं जाते हो।
जो प्यार इबादत है सर्वशक्तिमान की
हर उम्र और समय जिंदा रहता है
तुम जवानी की दहलीज पर खड़े
जिस्मानी प्यार से आगे क्यों नहीं बढ़ पाते हो।
कहानी खत्म हो जाये जिस्म के साथ
उस प्यार को अमर क्यों बताते हो।

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Saturday, June 27, 2009

विज्ञान का आपरेशन-हास्य व्यंग्य (opretion of scince-hindi hasya vyangya)

सरकारी अस्पताल में एक सफाई कर्मचारी ने एक तीन साल के बच्चे के गले का आपरेशन कर दिया। उस बच्चे के गले में फोड़ा था और उसके परिवारजन डाक्टर के पास गये। वहां खड़े सफाई कर्मचारी ने उसका आपरेशन कर दिया। टीवी पर दिखी इस खबर पर यकीन करें तो समस्या यह नहीं है कि आपरेशन असफल हुआ बल्कि परिवारजन चिंतित इस बात से हैं कि कहीं बच्चे को कोई दूसरी बीमारी न हो जाये।
स्पष्टतः यह नियम विरोधी कार्य है। बावेला इसी बात पर मचा है। अधिकृत चिकित्सक का कहना है कि ‘मैंने तो सफाई कर्मचारी से कहा था कि बच्चा आपरेशन थियेटर में ले जाओ। उसने तो आपरेशन ही कर दिया।’
सफाई कर्मचारी ने कहा कि ‘डाक्टर साहब ने कहा तो मैंने आपरेशन कर दिया।’
संवाददाता ने पूछा कि ‘क्या ऐसे आपरेशन पहले भी किये हैं?’
सफाई कर्मचारी खामोश रहा। उसकी आंखें और उसका काम इस बात का बयान कर रहे थे कि उसने जो काम किया उसमें संभवतः वह सिद्ध हस्त हो गया होगा। यकीनन वह बहुत समय तक चिकित्सकों की ंसंगत में यह काम करते हुए इतना सक्षम हो गया होगा कि वह स्वयं आपरेशन कर सके। वरना क्या किसी में हिम्मत है कि कोई वेतनभोगी कर्मचारी अपने हाथ से बच्चे की गर्दन पर कैंची चलाये। बच्चे के परिवारजन काफी नाराज थे पर उन्होंने ऐसी चर्चा नहीं कि उस आपरेशन से उनका बच्चा कोई अस्वस्थ हुआ हो या उसे आराम नहीं है। बावेला इस बात पर मचा है कि आखिर एक सफाई कर्मचारी ने ऐसा क्यों किया?
इसका कानूनी या नैतिक पहलू जो भी हो उससे परे हटकर हम तो इसमें कुछ अन्य ही विचार उठता देख रहे हैं। क्या पश्चिमी चिकित्सा पद्धति इतनी आसान है कि कोई भी सीख सकता है? फिर यह इतने सारे विश्वविद्यालय और चिकित्सालय के बड़े बड़े प्रोफेसर विशेषज्ञ सीना तानकर दिखाते हैं वह सब छलावा है?
अपने यहां कहते हैं कि ‘करत करत अभ्यास, मूरख भये सुजान’। जहां तक काम करने और सीखने का सवाल है अपने लोग हमेशा ही सुजान रहे हैं। सच कहें तो उस सफाई कर्मचारी ने पूरी पश्चिमी चिकित्सा पद्धति की सफाई कर रखी दी हो ऐसा लग रहा है। इतनी ढेर सारी किताबों में सिर खपाते हुए और व्यवहारिक प्रयोगों में जान लगाने वाले आधुनिक चिकित्सक कठिनाई से बनते हैं पर उनको अगर सीधे ही अभ्यास कराया जाये तो शायद वह अधिक अच्छे बन जायें। इससे एक लाभ हो सकता है कि बहुत पैसा खर्च बने चिकित्सक और सर्जन अपनी पूंजी वसूल करने के लिये निर्मम हो जाते हैं। इस तरह जो अभ्यास से चिकित्सक बनेंगे वह निश्चित रूप से अधिक मानवीय व्यवहार करेंगे-हमारा यह आशय नहीं है कि किताबों से ऊंची पदवियां प्राप्त सभी चिकित्सक या सर्जन बुरा व्यवहार करते हैं पर कुछ लोग ऐसे हैं जिन्होंने इसे बदनाम किया है।
पश्चिम विज्ञान से परिपूर्ण कुछ लोग ऐसे व्यवहार करते हैं गोया कि वह कोई भारी विद्वान हों। हमारे देश में लगभग आधी से अधिक जनसंख्या तो स्वयं ही अपना देशी इलाज करती है इसलिये इस मामले में बहस तो हो ही नहीं सकती कि यहां सुजान नहीं है। कहते हैं कि सारा विज्ञान अंग्रेजी में है इसलिये उसका ज्ञान होना जरूरी है। क्या खाक विज्ञान है?
अरे भई, किसी को को जुकाम हो गया तो उससे कहते हैं कि तुलसी का पत्ते चाय में डालकर पी लो ठीक हो जायेगा। ठीक हो भी जाता है। अब इससे क्या मतलब कि तुंलसी में कौनसा विटामिन होता है और चाय में कौनसा? अगर हम जुकाम से मुक्ति पा सकते हैं तो फिर हमें उसमें शामिल तत्वों के ज्ञान से क्या मतलब? अंग्रेजी की किताबों में क्या होता होगा? बीमारियां ऐसी होती है या इस कारण होती हैं। उनके अंग्रेजी नाम बता दिये जाते होंगे। फिर दवाईयों में कौनसा तत्व ऐसा होता है जो उनको ठीक कर देता है-इसकी जानकारी होगी। इस अभ्यास में पढ़ने वाले का वक्त कितना खराब होता होगा। फिर सर्जन बनने के लिये तो पता नहीं चिकित्सा छात्र कितनी मेहनत करते होंगे? उस सफाई कर्मचारी ने अपना काम जिस तरह किया है उससे तो लगता है कि देखकर कोई भी प्रतिभाशाली आदमी ध्यानपूर्वक काम करते हुए ही चिकित्सक या सर्जन बन सकता है।
चिकित्सा शिक्षा का पता नहीं पर इस कंप्यूटर विधा में हम कुछ पांरगत हो गये हैं उतना तो वह छात्र भी नहीं लगते जो विधिवत सीखे हैं। वजह यह है कि हमें कंप्यूटर और इंटरनेट पर काम करने का जितना अभ्यास है वह केवल अपने समकक्ष ब्लाग लेखकों में ही दिखाई देता है। संभव है कि हम कभी उन धुरंधर ब्लाग लेखकों से मिलें तो वह चक्करघिन्नी हो जायेें और सोचें कि इसने कहीं विधिवत शिक्षा पाई होगी। अनेक छात्र कंप्यूटर सीखते हैं। उनको एक साल से अधिक लग जाता है। कंप्यूटर वह ऐसे सीखते हैं जैसे कि भारी काम कर रहे हों। हां, यह सही है कि उनकी कंप्यूटर की भाषा में कई ऐसे शब्द हैं जिनका उच्चारण भी हमसे कठिन होता है पर जब वह हमें काम करते देखते हैं तो वह हतप्रभ रह जाते हैं।
हमने आज तक कंप्यूटर की कोई किताब नहीं पढ़ी। हम तो कंप्यूटर पर आते ही नहीं पर यह शुरु से चिपका तो फिर खींचता ही रहा। सबसे पहले एक अखबार में फोटो कंपोजिंग में रूप में काम किया। उस समय पता नहीं था कि यह अभ्यास आगे क्या गुल खिलायेगा।
चिकित्सा विज्ञान की बात हम नहीं कह सकते पर जिस तरह कंप्यूटर लोग सीखते हुए या उसके बाद जिस तरह सीना तानते हैं उससे तो यही लगता है कि उनका ज्ञान भी एक छलावा है। अधिकतर कंप्यूटर सीखने वालों से मैं पूछता हूं कि तुम्हें हिंदी या अंग्रेजी टाईप करना आता है।
सभी ना में सिर हिला देते हैं। मैं उनसे कहता हूं कि ‘कंप्यूटर का ज्ञान तुम्हारे लिये तभी आसान होगा जब तुम्हें दोनों प्रकार की टाईप आती होगी। कंप्यूटर पर तुम तभी आत्मविश्वास से कर पाओगे जब की बोर्ड से आंखें हटा लोगे।’
वह सुनते हैं पर उन पर प्रभाव नहीं नजर आता। वह कंप्यूटर का कितना ज्ञान रखते हैं पता नहीं? शायद लोग माउस से अधिक काम करते हैं इसलिये उन्हें पता ही नहीं कि इसका कोई रचनात्मक कार्य भी हो सकता है। यह आत्मप्रवंचना करना इसलिये भी जरूरी था कि आपरेशन करने वाले उस सफाई कर्मचारी के चेहरे में हमें अपना अक्स दिखाई देगा।
हमें याद उस अखबार में काम करना। वहां दिल्ली से आये कर्मचारियों ने तय किया कि हमें कंप्यूटर नहीं सिखायेंगे। मगर हमने तय किया सीखेंगे। दोनों प्रकार की टाईप हमें आती थी। हम उनको काम करते देखते थे। उनकी उंगलियों की गतिविधियां देखते थे। जब वह भोजनावकाश को जाते हम कंप्यूटर पर काम करते थे क्योंकि प्रबंधकों अपनी सक्रियता दिखाना जरूरी था। एक दिन हमने अपनी एक कविता टाईप कर दी। वह छप भी गयी। हमारे गुरु को हैरानी हुई। उसने कहा-‘तुम बहुत आत्मविश्वासी हो। कंप्यूटर में बहुत तरक्की करोगे।’
उस समय कंप्यूटर पर बड़े शहरों में ही काम मिलता था और छोटे शहरों में इसकी संभावना नगण्य थी। कुछ दिन बाद कंप्यूटर से हाथ छूट गया। जब दोबारा आये तो विंडो आ चुका था। दोबारा सीखना पड़ा। सिखाने वाला अपने से आयु में बहुत छोटा था। उसने जब देखा कि हम इसका उपयोग बड़े आत्मविश्वास से कर रहे हैं तब उसने पूछा कि ‘आपने पहले भी काम किया है।’
हमने कहा-‘तब विंडो नहीं था।’
कंप्यूटर एक पश्चिम में सृजित विज्ञान है। जब उसका साहित्य पढ़े बिना ही हम इतना सीख गये तो फिर क्या चिकित्सा विज्ञान में यह संभव नहीं है। पश्चिम का विज्ञान जरूरी है पर जरूरी नहीं है कि सीखने का वह तरीका अपनायें जो वह बताते हैं। खाली पीली डिग्रियां बनाने की बजाय तो छोटी आयु के बच्चों को चिकित्सा, विज्ञान, इंजीनियरिंग तथा कंप्यूटर सिखाने और बताने वाले छोटे केंद्र बनाये जाना चाहिये। अधिक से अधिक व्यवहारिक शिक्षा पर जोर देना चाहिये। हमारे देश में ‘आर्यभट्ट’ जैसे विद्वान हुए हैं पर यह पता नहीं कि उन्होंने कौनसे कालिज में शिक्षा प्राप्त की थी। इतने सारे ऋषि, मुनि और तपस्वियों ने वनों में तपस्या करते हुए अंतरिक्ष, विज्ञान और चिकित्सा शास्त्र में सिद्धि प्राप्त की। पहले यकीन नहीं होता था पर अब लगता है कि इस देश में उड़ने वाले पुष्पक जैसे विमान, दूर तक मार करने वाले आग्नेयास्त्र और चक्र रहे होंगे। बहरहाल उस घटना के बारे में अधिक नहीं पता पर इससे हमें एक बात तो लगी कि पश्चिम विज्ञान हो या देशी सच बात तो यह है कि उनका सैद्धांतिक पक्ष से अधिक व्यवहारिक पक्ष है। कोई भी रचनाकर्म अंततः अपने हाथों से ही पूर्ण करना होता है। अतः अगर दूसरे को काम करते कोई प्रतिभाशाली अपने सामने देखे तो वह भी सीख सकता है जरूरी नहीं है कि उसके पास कोई उपाधि हो। वैसे भी हम देख चुके हैं कि उपाधियों से अधिक आदमी की कार्यदक्षता ही उसे सम्मान दिलाती है।
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नोट-यह व्यंग्य काल्पनिक तथा इसका किसी व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है और किसी से इसका विषय मेल खा जाये तो वही उसके लिये जिम्मेदार होगा।
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Friday, June 12, 2009

फोटो स्वयंबर-हास्य व्यंग्य (foto svyanbar-hindi hasya vyangya)

उस सुंदरी ने तय किया कि वह उसी लड़के से पहले प्रेम लीला कर बाद में विवाह करेगी जो इंटरनेट पर व्यवसाय करते हुए अच्छा कमा रहा होगा। एक सहेली ने मना किया और कहा-‘अरे, भई हमें नहीं लगता है कि कोई लड़का इंटरनेट पर काम करते हुए अच्छा कमा लेता होगा अलबत्ता जो कमाते होंगे वह शायद ही अविवाहित हों।’
सुंदरी ने कहा-‘तुम जानती नहीं क्योंकि तुम्हारे पास इंटरनेट की समझ है ही क्हां? अरे, जिनको कंप्यूटर की कला आती है उनके लिये इंटरनेट पर ढेर सारी कमाई के जरिये हैं। मैं कंप्यूटर पर काम नहीं कर पाती इसलिये सोचती हूं कि कोई इंटरनेट पर कमाई करने वाला लड़का मिल जाये तो कुछ शादी से पहले दहेज का और बाद में खर्च का जुगाड़ कर लूं।’

उसकी वह सहेली तेजतर्रार थी-सुंदरी को यह पता ही नहीं था कि उसका चचेरा भाई इंटरनेट पर उसे बहुत कुछ सिखा चुका था। वह कुछ फोटो उसके घर ले आई और उस सुंदरी को दिखाने लगी। उस समय उसके पास दूसरी सहेली भी बैठी थी जो इंटरनेट के बारे में थोड़ा बहुत जानती थी और उसके बारे में बताने ही उसके घर आयी थी। पहली सहेली ने एक फोटो दिखाया और बोली-‘यह हिंदी में कवितायें लिखता हैं। इसका ब्लाग अच्छा है। ब्लाग पर बहुत सारे विज्ञापन भी दिखते हैं। तुमने तो अखबारों में पढ़ा होगा कि हिंदी में ब्लाग लेखक बहुत अच्छा कमा लेते हैं।’
दूसरी सहेली तपाक से बोली उठी-‘अखबारों में बहुत छपता है तो हिंदी के ब्लाग लेखक भी रोज अब भी हिंदी ब्लाग से कमाने के नये नुस्खे छापते हैं पर उन पर उनके साथी ही टिपियाते हैं कि ‘पहला हिंदी ब्लाग लेखक दिखना बाकी है जो लिखने के दम पर कमा रहा हो’, फिर इस कवि का क्या दम है कि कमा ले। गप मार रहा होगा।’
पहली सहेली ने कहा-‘पर यह स्कूल में शिक्षक है कमाता तो है।’
सुंदरी उछल पड़ी-‘मतलब यह शिक्षक है न! इसका मतलब है कि इंटरनेट पर तो शौकिया कवितायें लिखता होगा। नहीं, मेरे लिये उसके साथ प्रेम और शादी का प्रस्ताव स्वीकार करना संभव नहीं होगा।’
सहेली ने फिर दूसरा फोटो दिखाया और कहा-‘यह ब्लाग पर कहानियां लिखता हैं!’
सुंदरी इससे पहले कुछ कहती उसकी दूसरी सहेली ने पूछ लिया-‘हिंदी में कि अंग्रेजी में!’
पहली ने जवाब दिया-‘हिंदी में।’
अब तक सुंदरी को पूरा ज्ञान मिल गया था और वह बोली-‘हिंदी में कोई कमाता है इस पर यकीन करना कठिन है। छोड़ो! कोई दूसरा फोटो दिखाओ।’
पहली सहेली ने सारे फोटो अपने पर्स में रखते हुए कहा-‘यह सब हिंदी में ब्लाग लिखते हैं इसलिये तुम्हें दिखाना फिजूल है। यह फोटो स्वयंबर अब मेरी तरफ से रद्द ही समझो।’
वह जब अपने पर्स में फोटो रख रही थी तो उसमें रखे एक दूसरे फोटो पर उसका हाथ चला गया जिसे उसने अनावश्यक समझकर निकाला नहीं था। उसने सभी फोटो सही ढंग से रखने के लिये उसे बाहर निकाला। दूसरी सहेली ने उसके हाथ से वह फोटो ले लिया और कहा-‘यह फोटो पर्स में क्यों रखे हुए थी।’
पहली ने कहा-‘यह एक अंग्रेजी के ब्लाग लेखक का है।’
सुंदरी और दूसरी सहेली दोनों ही उस फोटो पर झपट पड़ी तो वह दो टुकड़े हो गया पर इसका दोनों को अफसोस नहीं था। सुंदरी ने कहा-‘अरे, वाह तू तो बिल्कुल शादियां कराने वाले मध्यस्थों की तरह सिद्धहस्त हो गयी है। बेकार का माल दिखाती है और असली माल छिपाती है। अब जरा इसके बारे में बताओ। क्या यह अपने लिये बचा रखा है?’
पहली सहेली ने कहा-‘नहीं, जब मैं इंटरनेट से तुम्हारे लिये फोटो छांट रही थी तब इसके ब्लाग पर नजर पड़ गयी और पता नहीं मैंने कैसे और क्यों इसका फोटो अपने एल्बम मेें ले लिया? इसलिये इसको बाहर नहीं निकाला।’
सुंदरी ने पूछा-‘पर यह है कौन? यह तो बहुत सुंदर लग रहा है। आह.... अंग्रेजी का लेखक है तो यकीनन बहुत कमाता होगा।’
पहली ने कहा-‘मेरे जान पहचान के हिंदी के ब्लाग लेखक हैं जो व्यंग्य वगैरह लिखते हैं पर फ्लाप हैं वह कहते हैं कि ‘सभी अंग्रेजी ब्लाग लेखक नहीं कमाते।’
दूसरी सहेली ने कहा-‘हिंदी का ब्लाग लेखक क्या जाने? अपनी खुन्नस छिपाने के लिये कहता होगा। मैंने बहुत सारे हिंदी ब्लाग लेखकों की कवितायें और कहानियां पढ़ी हैं। बहुत बोरियत वाली लिखते हंै। तुम्हारा वह हिंदी ब्लाग लेखक अपने को आपको तसल्ली देता होगा यह सोचकर कि अंग्रेजी वाले भी तो नहीं कमा रहे। पर तुम यह बताओ कि यह फोटो किस अंग्रेजी ब्लाग लेखक का है और वह कहां का है।’
दूसरी सहेली ने कहा-‘इसका पता ही नहीं चल पाया, पर यह शायद विदेशी है। इसकी शादी हो चुकी है।’
सुंदरी चिल्ला पड़ी-‘इतना बड़ा पर्स तो ऐसे लायी थी जैसे कि उसमें इंटरनेट पर लिखने वाले अंग्रेजी के ढेर सारे लेखकों के फोटो हों पर निकले क्या हिंदी के ब्लाग लेखक। उंह....यह तुम्हारा बूता नहीं है। बेहतर है तुम मेरे लिये कोई प्रयास न करो।’
दूसरी सहेली ने कहा-‘तुम्हारे फोटो में मैंने एक देखा था जो तुमने नहीं दिखाया। वह शायद चैथे नंबर वाला फोटो था। जरा दिखाना।’
पहली सहेली ने कहा-‘वह सभी हिंदी के ब्लाग लेखकों के हैं।’
‘जरा दिखाना’-दूसरी सहेली ने कहा।
पहली सहेली ने फिर सारे फोटो निकाले और उनके हाथ में दे दिये। दूसरी सहेली ने एक फोटो देखकर कहा-‘तुम इसे जानती हो।’
दूसरी सहेली ने कहा-‘हां, यह मेरे चचेरे भाई का फोटो है। भला लड़का है यह एक कंपनी में लिपिक है। फुरसत में ब्लाग पर लिखता है। ’
दूसरी सहेली ने कहा-‘यह लिखता क्या है?’
पहली सहेली ने कहा-‘यह कभी कभार ही लिखता है वह भी कभी हिंदी ब्लाग से कमाने के एक हजार नुस्खे तो कभी रुपये बनाने के सौ नुस्खे।’
सुंदरी ने पूछा-‘खुद कितने कमाता है।’
पहली ने कहा-‘यह तो मालुम नहीं पर कभी कभार इसकी तन्ख्वाह के पैसे खत्म हो जाते हैं तो इंटरनेट का बिल भरने के लिये यह मुझसे पैसे उधार ले जाता है।’
सुंदरी ने कहा-‘वैसे तुम अगर स्वयं प्रयास न कर सको तो अपने इस चचेरे भाई से पूछ लेना कि क्या कोई इंटरनेट पर अंग्रेजी में काम करने वाला कोई लड़का हो तो मुझे बताये। हां, तुम हिंदी वाले का फोटो तो क्या उसका नाम तक मेरे सामने मत लेना।’
पहली सहेली ने ने स्वीकृति में गर्दन हिलायी और वहां से चली गयी। इस तरह ब्लाग लेखकों का फोटो स्वयंबर समाप्त हो गया।
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नोट-यह व्यंग्य काल्पनिक तथा इसका किसी व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है और किसी से इसका विषय मेल खा जाये तो वही उसके लिये जिम्मेदार होगा।
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Friday, May 8, 2009

इंसान को कैसे छोड़ देंगे बिना छल-व्यंग्य कविता

जिंदगी से लड़ते रहना है हर पल।
रिवाजों की अग्नि में नहीं जाना है जल।
इंसान बन गये हैं बुत
उनकी क्या परवाह करना
खुद भटके हुए लोगो के बताये रास्ते पर
चलकर नहीं है मरना
लोगों को अपनी बात कहनी है
अनसुना कर कर दो
वरना बेकार में ही सहनी है
रिश्तों में हक और फर्ज़ के
हिसाब अपने अपने ढंग से बने हैं
हर घर में झगड़े के लिये लोग तने हैं
देख रहे हैं सभी दूसरों के घरों में छेद
बंटा रहे हैं सब ध्यान लोगों को
ताकि नहीं देख सके कोई उनके भेद
बताते हैं लोग अपने अपने रास्ते
पुराने हवालों के देते हैं वास्ते
झूठ और फरेब की चादर ओढ़कर
कर रहे हैं इबादत
सर्वशक्तिमान को नहीं छोड़ा
वह कैसे इंसान को छोड़ देंगे बिना छल।।

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Monday, May 4, 2009

ब्लाग पत्रिका का लोकार्पण (हास्य व्यंग्य) (blog ka lokarpan-hasya vyangya in hindi)

कविराज जल्दी जल्दी घर जा रहे थे और अपनी धुन में सामने आये आलोचक महाराज को देख नहीं सके और उनसे रास्ता काटकर आगे जाने लगे। आलोचक महाराज ने तुरंत हाथ पकड़ लिया और कहा-‘क्या बात है? कवितायें लिखना बंद कर दिया है! इधर आजकल न तो अखबार में छप रहे हो और न हमारे पास दिखाने के लिये कवितायें ला रहे हो। अच्छा है! कवितायें लिखना बंद कर दिया।’
कविराज बोले-‘महाराज कैसी बात करते हो? भला कोई कवि लिखने के बाद कवितायें लिखना बंद कर सकता है। आपने मेरी कविताओं पर कभी आलोचना नहीं लिखी। कितनी बार कहा कि आप मेरी कविता पर हस्ताक्षर कर दीजिये तो कहीं बड़ी जगह छपने का अवसर मिल जाये पर आपने नहीं किया। सोचा चलो कुछ स्वयं ही प्रयास कर लें।’
आलोचक महाराज ने अपनी बीड़ी नीचे फैंकी और उसे पांव से रगड़ा और गंभीरता से शुष्क आवाज में पूछा-‘क्या प्रयास कर रहे हो? और यह हाथ में क्या प्लास्टिक का चूहा पकड़ रखा है?’
कविराज झैंपे और बोले-‘कौनसा चूहा? महाराज यह तो माउस है। अरे, हमने कंप्यूटर खरीदा है। उसका माउस खराब था तो यह बदलवा कर ले जा रहे हैं। पंद्रह दिन पहले ही इंटरनेट कनेक्शन लगवाया है। अब सोचा है कि इंटरनेट पर ब्लाग लिखकर थोड़ी किस्मत आजमा लें।’
आलोचक महाराज ने कहा-‘तुम्हें रहे ढेर के ढेर। हमने चूहा क्या गलत कहा? तुम्हें मालुम है कि हमारे देश के एक अंग्रजीदां विद्वान को इस बात पर अफसोस था कि हिंदी में रैट और माउस के लिये अलग अलग शब्द नहीं है-बस एक ही है चूहा। हिंदी में इसे चूहा ही कहेंगे। दूसरी बात यह है कि तुम कौनसी फिल्म में काम कर चुके हो कि यह ब्लाग बना रहे हो। इसे पढ़ेगा कौन?’
कविराज ने कहा-‘अब यह तो हमें पता नहीं। हां, यह जरूर है कि न छपने के दुःख से तो बच जायेंगे। कितने रुपये का डाक टिकट हमने बरबाद कर दिया। अब जाकर इंटरनेट पर अपनी पत्रिका बनायेंगे और जमकर लिखेंगे। हम जैसे आत्ममुग्ध कवियों और स्वयंभू संपादकों के लिये अब यही एक चारा बचा है।’
‘हुं’-आलोचक महाराज ने कहा-‘अच्छा बताओ तुम्हारे उस ब्लाग या पत्रिका का लोकार्पण कौन करेगा? भई, कोई न मिले तो हमसे कहना तो विचार कर लेंगे। तुम्हारी कविता पर कभी आलोचना नहीं लिखी इस अपराध का प्रायश्चित इंटरनेट पर तुम्हारा ब्लाग या पत्रिका जो भी हो उसका लोकार्पण कर लेंगे। हां, पर पहली कविता में हमारे नाम का जिक्र अच्छी तरह कर देना। इससे तुम्हारी भी इज्जत बढ़ेगी।’
कविराज जल्दी में थे इसलिये बिना सोचे समझे बोल पड़े कि -‘ठीक है! आज शाम को आप पांच बजे मेरे घर आ जायें। पंडित जी ने यही मूहूर्त निकाला है। पांच से साढ़े पांच तक पूजा होगी और फिर पांच बजकर बत्तीस मिनट पर ब्लाग पत्रिका का लोकार्पण होगा।’
‘ऊंह’-आलोचक महाराज ने आंखें बंद की और फिर कुछ सोचते हुए कहा-‘उस समय तो मुझे एक संपादक से मिलने जाना था पर उससे बाद में मिल लूंगा। तुम्हारी उपेक्षा का प्रायश्चित करना जरूरी है। वैसे इस चक्कर में क्यों पड़े हो? अरे, वहां तुम्हें कौन जानता है। खाली पीली मेहनत बेकार जायेगी।’
कविराज ने कहा-‘पर बुराई क्या है? क्या पता हिट हो जायें।’
कविराज वहां से चल दिये। रास्ते में उनके एक मित्र कवि मिल गये। उन्होंने पूरा वाक्या उनको सुनाया तो वह बोले-‘अरे, आलोचक महाराज के चक्कर में मत पड़ो। आज तक उन्होंने जितने भी लोगो की किताबों का विमोचन या लोकर्पण किया है सभी फ्लाप हो गये।’
कविराज ने अपने मित्र से आंखे नचाते हुए कहा-‘हमें पता है। तुम भी उनके एक शिकार हो। अपनी किताब के विमोचन के समय हमको नहीं बुलाया और आलोचक महाराज की खूब सेवा की। हाथ में कुछ नहीं आया तो अब उनको कोस रहे हो। वैसे हमारे ब्लाग पत्रिका का लोकार्पण तो इस माउस के पहुंचते ही हो जायेगा। इन आलोचक महाराज ने भला कभी हमें मदद की जो हम इनसे अपने ब्लाग पत्रिका का लोकार्पण करायेंगे?’
मित्र ने पूछा-‘अगर वह आ गये तो क्या करोगे?’
कविराज ने कहा-‘उस समय हमारे घर की लाईट नहीं होती। कह देंगे महाराज अब कभी फिर आ जाना।’
कविराज यह कहकर आगे बढ़े पर फिर पीछे से उस मित्र को आवाज दी और बोले-‘तुम कहां जा रहे हो?’
मित्र ने कहा-‘आलोचक महाराज ने मेरी पत्रिका छपने से लेकर लोकार्पण तक का काम संभाला था। उस पर खर्च बहुत करवाया और फिर पांच हजार रुपये अपना मेहनताना यह कहकर लिया कि अगर मेरी किताब नहीं बिकी तो वापस कर देंगे। उन्होंने कहा था कि किताब जोरदार है जरूर बिक जायेगी। एक भी किताब नहीं बिकी। अपनी जमापूंजी खत्म कर दी। अब हालत यह है कि फटी चपलें पहनकर घूम रहा हूं। उनसे कई बार तगादा किया। बस आजकल करते रहते हैं। अभी उनके पास ही जा रहा हूं। उनके घर के चक्कर लगाते हुए कितनी चप्पलें घिस गयी हैं?’

कविराज ने कहा-‘किसी अच्छी कंपनी की चपलें पहना करो।’
मित्र ने कहा-‘डायलाग मार रहे हो। कोई किताब छपवा कर देखो। फिर पता लग जायेगा कि कैसे बड़ी कंपनी की चप्पल पहनी जाती है।’
कविराज ने कहा-‘ठीक है। अगर उनके घर जा रहे हो तो बोल देना कि हमारे एक ज्ञानी आदमी ने कहा कि उनकी राशि के आदमी से ब्लाग पत्रिका का लोकार्पण करवाना ठीक नहीं होगा!’
मित्र ने घूर कर पूछा-‘कौनसी राशि?’
कविराज ने कहा-‘कोई भी बोल देना या पहले पूछ लेना!’
मित्र ने कहा-‘एक बात सोच लो! झूठ बोलने में तुम दोनों ही उस्ताद हो। उनसे पूछा तो पहले कुछ और बतायेंगे और जब तुम्हारा संदेश दिया तो दूसरी बताकर चले आयेंगे। वह लोकार्पण किये बिना टलेंगे नहीं।’
कविराज बोले-‘ठीक है बोल देना कि लोकार्पण का कार्यक्रम आज नहीं कल है।’
मित्र ने फिर आंखों में आंखें डालकर पूछा-‘अगर वह कल आये तो?’
कविराज ने कहा-‘कल मैं घर पर मिलूंगा नहीं। कह दूंगा कि हमारे ज्ञानी ने स्थान बदलकर ब्लाग पत्रिका का लोकार्पण करने को कहा था आपको सूचना नहीं दे पाये।’
मित्र ने कहा-‘अगर तुम मुझसे लोकर्पण कराओ तो एक आइडिया देता हूं जिससे वह आने से इंकार कर देंगे। वैसे तुम उस ब्लाग पर क्या लिखने वाले हो? कविता या कुछ और?’
कविराज ने कहा-‘सच बात तो यह है कि आलोचक महाराज पर ही व्यंग्य लिखकर रखा था कि यह माउस खराब हो गया। मैंने इंजीनियर से फोन पर बात की। उसने ही ब्लाग बनवाया है। उसी के कहने से यह माउस बदलवाकर वापस जा रहा हूं।’
मित्र ने कहा-‘यही तो मैं कहने वाला था! आलोचक महाराज व्यंग्य से बहुत कतराते हैं। इसलिये जब वह सुनेंगे कि तुम पहले ही पहल व्यंग्य लिख रहे हो तो परास्त योद्धा की तरह हथियार डाल देंगे। खैर अब तुम मुझसे ही ब्लाग पत्रिका का विमोचन करवाने का आश्वासन दोे। मैं जाकर उनसे यही बात कह देता हूं।’
वह दोनों बातें कर रह रहे थे कि वह कंप्यूटर इंजीनियर उनके पास मोटर साइकिल पर सवार होकर आया और खड़ा हो गया और बोला-‘आपने इतनी देर लगा दी! मैं कितनी देर से आपके घर पर बैठा था। आप वहां कंप्यूटर खोलकर चले आये और उधर मैं आपके घर पहुंचा। बहुत देर इंतजार किया और फिर मैं अपने साथ जो माउस लाया था वह लगाकर प्रकाशित करने वाला बटन दबा दिया। बस हो गयी शुरुआत! अब चलिये मिठाई खिलाईये। इतनी देर आपने लगाई। गनीमत कि कंप्यूटर की दुकान इतने पास है कहीं दूर होती तो आपका पता नहीं कब पास लौटते।’

कविराज ने अपने मित्र से कहा कि-’अब तो तुम्हारा और आलोचक महाराज दोनों का दावा खत्म हो गया। बोल देना कि इंजीनियर ने बिना पूछे ही लोकार्पण कर डाला।’
मित्र चला गया तो इंजीनियर चैंकते हुए पूछा-‘यह लोकार्पण यानि क्या? जरा समझाईये तो। फिर तो मिठाई के पूरे डिब्बे का हक बनता है।’
कविराज ने कहा-‘तुम नहीं समझोगे। जाओ! कल घर आना और अपना माउस लेकर यह वापस लगा जाना। तब मिठाई खिला दूंगा।’
इंजीनियर ने कहा-‘वह तो ठीक है पर यह लोकार्पण यानि क्या?’
कविराज ने कुछ नहीं कहा और वहां से एकदम अपने ब्लाग देखने के लिये तेजी से निकल पड़े। इस अफसोस के साथ कि अपने ब्लाग पत्रिका का लोकार्पण वह स्वयं नहीं कर सके।
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दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप
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Wednesday, January 28, 2009

कहीं प्रचार के लिये पहले से तय झगड़े होंगे-हास्य व्यंग्य कविताएँ

पहले तो क्रिकेट मैचों पर
फिक्सिंग की छाया नजर आती थी
अब खबरों में भी होने लगा है उसका अहसास।
शराबखानों पर करते हैं लोग
सर्वशक्तिमान का नाम लेकर हमला
कहीं टूटे कांच तो कहीं गमला
बहस छिड़ जाती है इस बात पर कि
सर्वशक्तिमान के बंदे ऐसे क्यों होना चाहिये
लंबे चैड़े नारों का दौर शुरु
हर वाद के आते हैं भाषण देने गुरु
ढेर सारे जुमले बोले जाते हैं
टूटे कांच और गमलों के साथ
जताई जाती है सहानुभूति
पर ‘शराब पीना बुरी बात है’
इस पर नहीं होता कोई प्रस्ताव पास।
खबरफरोश भूल जाते हैं शराब को
सर्वशक्तिमान के नाम पर ही
होती है उनको सनसनी की आस।
किसे झूठा समझें, किस पर करें विश्वास।
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शराब चीज बहुत खराब है
पीने वाला भी कर सकता है
न पीने भी कर सकता है
भले झगड़ा खराब है।
शराब खानों पर हुए झगड़ो पर
अब रोना बंद कर दो
क्योंकि सदियों से
करवाती आयी है जंग यह शराब
जैसे जैसे बढ़ते जायेंगे शराब खाने
वैसे ही नये नये रूपों में झगड़े
सामने आयेंगे
कहीं पीने वाले पिटेंगे तो
कहीं किसी को पिटवायेंगे
कहीं जाति तो कहीं भाषा के
नाम पर होंगे
कहीं प्रचार के लिये
पहले से ही तय झगड़े होंगे
इन पर उठाये सवालों का
कभी कोई होता नहीं जवाब है।

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दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप

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Thursday, January 15, 2009

महानतम दिखाने के लिये-व्यंग्य

फिल्म,खेल,कला और साहित्य का कोई देश नहीं होता-ऐसा जुमला हमारे देश के मूर्धन्य बुद्धिजीवी और लेखक मानते हैं पर अवसर पाते ही वह इनसे देशभक्ति के जज्बात जोड़ने से बाज नहीं आते। यह अवसर होता है जब कोई पश्चिम से किसी को पुरस्कार या सम्मान मिलता है या नहीं मिलता है। मिल जाये तो वाह वाह हो जाती है। देश का गौरव और सम्मान बढ़ने पर प्रसन्नता व्यक्त की जाती है और न मिले तो पश्चिमी देशों की उन संस्थाओं को कोसा जाता है जो इनको प्रदान करती है।
असल में बात यह हुई कि अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद ने अब तक दुनियां के महानतम बल्लेबाजों की सूची जारी की उसमें पहले दस में कोई भारतीय खिलाड़ी शामिल नहीं है। अपने प्रचार माध्यम उस सूची को पहले बीस तक ले गये क्योंकि बीसवें नंबर पर भारत के महानतम बल्लेबाज सुनील गावस्कर का नाम है-1983 में जीते गये इकलौते विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता में वह भारतीय टीम के वह भी सदस्य था इसलिये उनकी महानता पर कोई संदेह नहीं है। बीस के बाद उनकी नजर 26 वें नंबर पर गयी जहां उस बल्लेबाज का नाम था जिसे भारतीय प्रचार माध्यम दुनियां के क्रिकेट का भगवान घोषित कर चुके हैं। हाय! यह क्या गजब हो गया। भारतीय प्रचार माध्यमों की हवा खराब हो गयी। इस देश की जनता का भ्रम टूट न जाये इसलिये उसे बनाये रखने के लिये उन्होंने बहस शुरु कर दी है और उस सूची को नकार ही दिया।

यह होना ही था। ईमानदारी की बात यह है कि ज्ञानी लोग खेल वगैरह में देशप्रेम जैसी बात जोड़ने का समर्थन नहीं करते। दूसरी बात यह है कि जिस भगवान के किकेट अवतार को भारतीय प्रचार माध्यम जिस तरह अपने व्यवसायिक मजबूरियों के चलते अभी तक ढो रहे हैं उसके खेल पर अपने देश में ही लोग सवाल उठाते हैं। इसमें भी एक मजेदार बात यह है कि जिन बीस भारतीय बल्लेबाजों के नाम है उनमें एक ही भारतीय है बाकी विदेशी है। इसलिये भारतीय लोग उस सूची को नकारने से तो रहे। वजह यह है कि इस देश के लोग यह जानते हुए भी कि ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ दूर के ढोलों पर ही अधिक यकीन करते हैं और यह प्रवृति प्रचार माध्यमों ने बढ़ाई हैं कमी नहीं की।

पहले 19 खिलाड़ी विदेशी महान होंगे इस बात पर इस देश के लोग यकीन कर लेंगे क्योंंकि वह देख रहे हैं कि जिस तरह इस देश के कथित कलाकार, खिलाड़ी, लेखक, पत्रकार तथा अन्य विशेषज्ञ विदेशी पुरस्कारों और सम्मानों के लिये मरे जाते हैं उस हिसाब से वहां योग्यता और तकनीकी के ऊंचे मानदंड होंगे। तय बात है कि 19 खिलाड़ी महान ही होंगे तभी तो उनको घोषित किया गया है। भारतीय प्रचार माध्यम क्रिकेट का गुणगान तो खूब करते हैं पर यह सच छिपा जाते हैं कि 1983 के बाद विश्व क्रिकेट के नाम यहां कुछ नहीं आया। फिर उनके ,द्वारा सुझाये गये महानतम बल्लेबाज की महानता का हाल यह है कि आजकल कई लोग चाहते हैं कि वह क्रिकेट से हट जाये मगर नहीं जनाब!

वह हर बार विश्व कप क्रिकेट कप का सपना दिखाता है पर वह पूरा नहीं होता। दावा यह है कि 19 साल से क्रिकेट खेल रहा है पर भई उसने कितने विश्व क्रिकेट जिताये मालुम नहीं। यह सही है कि महानतम की सूची में उस महानतम बल्लेबाज से पहले भी कई ऐसे बल्लेबाज हैं जिन्होंने अपने देश को विश्व कप नहीं जितवाया पर इसका दूसरा पक्ष यह भी कि उनमें अधिकतर के समय में विश्व कप होता भी नहीं था पर उन्होंने किकेट के विकास में वाकई उस समय योगदान दिया जब उसमें पैसा नहीं था। वैसे प्रचार माध्यम एक नहीं अपने तीन बल्लेबाजों के महानतम न होने पर नाराज है पर 26वें नंबर पर अपने अवतारी बल्लेबाज के होने पर अधिक बवाल मचा रहे हैं जिसका क्रिकेट के विकास में नहीं बल्कि उसके दोहन में अधिक योगदान रहा है।
यार, यहां भी इतने पुरस्कार मिलते हैं पर अपने देश के गुणी लोगों को पता नहीं वह हमेशा छोटे नजर आते हैं। हमारे यहां हर साल ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया जाता है पर प्रचार माध्यम उसका समाचार देकर फिर मूंह फेर लेते हैं पर अगर अमेरिका की कोई संस्था- जिसका नाम तक हम लोग नहीं जानते-अगर किसी को मिल जाये तो बस वह यहां भगवान बना दिया जाता है।

इसका परिणाम यह हुआ है कि जिन संस्थाओं को अपना नाम इस देश में नाम करना होता है वह यहां के किसी ऐसे अज्ञात आदमी को पुरस्कार देती है जिसने अपने जीवन में एकाध कोई किताब लिखी हो। हमारे यहां जिन लोगों को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलता है उन्होंनें कई किताबें लिखी होती हैं पर उनको प्रचार माध्यम पहचानते तक नहीं पर कोई एक पुस्तक लिखकर विदेश से पुरस्कार प्राप्त कर ले तो उसे बरसों तक ढोते हैं। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि जोकरों को पुरस्कार मिला हो। विदेशों से पुरस्कार विजेता तो ऐसे व्यवहार करते हैं जैसे कि वह हर विषय में जानते हों। कई बार तो वह अपने देश के संवदेनशीन मामलों में ऐसे बोलते हैं जैसे कि देश के विरोधी बोल रहे हों। तब यह भी संदेह होता है कि कहीं ऐसे लोगों को बकवास करने के लिये ही तो कहीं इस आश्वासन पर तो विदेशों में सम्मान या पुरस्कार नहीं दिये जाते कि अपने देश के लोगों को भावनात्मक रूप से आहत करते रहना।

हिंदी फिल्मों का हाल देखिये। विदेशी पुरस्कारों के लिये सभी दौड़ते फिरते हैं। हालत यह है कि अगर कहीं फिल्म पुरस्कार के नामांकित हो जाये तो उसका जीभर के प्रचार कर लिया जाता है जैसे कि वह मिल ही गया हो-हालांकि यह उनको पता होता है कि वह नहीं मिलेगा शायद इसलिये प्रचार की सारी कसर नामांकन से इनाम बंटने की बची की अवधि में ही कर लेते हैं। इन हिंदी फिल्म वालों से पूछिये कि जब हिंदी फिल्मों या टीवी सीरियलों के लिये इनाम वितरण होता है तब क्या देश की गैर हिंदी फिल्मों को कभी वह इनाम देते हैं जैसा कि वह अमेरिका में अंग्रेजी फिल्मकारों के बीच सम्मान चाहते हैं। सच तो यह है कि हमारे देश के दक्षिण भाषी फिल्मकारों की बनी अनेक फिल्मों का हिंदी में पुर्नफिल्मांकन प्रस्तुत किया जाता है जो बहुत सफल रहती हैं। दक्षिण का फिल्म उद्योग हिंदी से तकनीकी,कला,कहानी,संगीत और पटकथा में अधिक सक्षम माना जाता है। फिर भी कभी आपने सुना है कि किसी दक्षिण भारतीय फिल्म को हिंदी फिल्म समारोह में कभी देश सर्वश्रेष्ठ फिल्म घोषित किया गया हो। अपनों को सम्मान देने की बजाय दूसरों से इनाम पाने की चाहत ने गुणीजनों को पतन की गर्त में पहुंचा दिया है। सच तो यह है कि दक्ष हिंदी के लेखकों से तारतम्य के अभाव में हिंदी फिल्म उद्योग पैसा होते हुए भी लाचारगी की की स्थिति में हैं और उसकी अधिकांश फिल्में हालीवुड या दक्षिण भारतीय फिल्मों की नकल होती है। अपने ही हिंदी भाषी लेखकों,कलाकारों,गायकों, और संगीतकारों को कभी प्रोत्साहित न करने वाले हिंदी फिल्म उद्योग को विदेशों में सम्मान की आशा करना ही हास्यास्पद लगता है।

जी हां, सच यही है कि महानतम उस आदमी को कहा जाता है जो न केवल अपने जीवन में सफलता प्राप्त करे बल्कि दूसरों को भी ऐसी सफलता पाने में योगदान दे। भारत में एक ही महानतम क्रिकेट खिलाड़ी हुआ है वह कपिल देव क्योंकि उसके नाम पर एक विश्व कप हैं। हमारे महानतम हाकी खिलाड़ी स्व. ध्यानचंद के बाद वही एक लगते हैं महान जैसे। स्व. ध्यानचंद जी इसलिये महान नहीं थे कि हिटलर उनसे प्रभावित हुआ था बल्कि उन्होंने भारत को ओलंपिक में स्वर्ण पदक जितवाया था इसलिये महान कहे गये। इतना ही नहीं वह अपने खेल से अपनी टीम को प्रेरणा देते थे। सो प्रचार माध्यम यह समझ लें कि वह जिन खिलाडि़यों के महानतम न होने पर विलाप कर रहे हैं उस पर देश के लोगों की हमदर्दी उनके साथ नहीं है बल्कि उनके कार्यक्रम एक लाफ्टर शो की तरह दिख रहे हैं। वह अपने बताये माडलों को विश्व का महानतम बताने के लिये जूझ रहे हैं और यह पश्चिम वाले हैं गाहे बगाहे उन पर आघात कर जाते हैं।
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Tuesday, January 6, 2009

हंसी की फुहार-हास्य कविता

फंदेबाज लेकर अपने भतीजे को
पहुंचा और बोला
‘‘दीपक बापू, मेरा यह भतीजा
खूब लिखता है श्रृंगार रस से सराबोर कवितायें
पर नहीं सुनते पुरुष और महिलायें
आप तो इसे अब
हंसी का कार्यक्रम बतायें
ताकि हम लोग भी कुछ जमाने में इज्जत बनायें’’

उसके भतीजे को ऊपर से नीचे देखा
फिर गला खंखार कर
अपनी टोपी घुमाते बोले दीपक बापू
’’कमबख्त जब भी घर आते हो
साथ में होती बेहूदी समस्यायें
जिनके बारे में हम नहीं जानते
तुम्हें क्या बतायें
रसहीन शब्द पहले सजाओ
लोगों को सुनाते हुए कभी हाथ
तो कभी अपनी कमर मटकाओ
कर सको अभिनय तो मूंह भी बनाओ
चुटकुला हो या कविता सब चलेगा
जीवन के आचरण और चरित्र पर
कहने से अच्छा होगा
अपनी देह के विसर्जन करने वाले अंगों का
इशारे में प्रदर्शन करना
तभी हंसी का माहौन बनेगा
कामेडी बनकर चमकेगा
अपने साथ स्त्री रूप के मेकअप में
कोई पुरुष भी साथ ले जाना
उसकी सुंदरता के पर
अश्लील टिप्पणी शालीनता से करना
जिससे दर्शक बहक जायें
वाह वाह करने के अलावा
कुछ न बोल पायें
किसी के समझ में आये या नहीं
तुम तो अपनी बात कहते जाना
यौवन से अधिक यौन का विषय रखना
चुंबन का स्वाद न मीठा होता है न नमकीन
पर लोगों को फिर भी पंसद है देखना
हंसी की फुहार में भीगने का मन तो
हमारा भी होता है
दिल को नहला सकें हंसी से
पर सूखे शब्द और निरर्थक अदाओं से
कभी दिल खुश नहीं होता
फ़िर भी खुश दिखता है पता नहीं कैसे जमाना
इससे अधिक तुम्हें हम और क्या बताये"

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Sunday, January 4, 2009

‘एक स्कूटर ब्लागर के ऊपर'-हास्य व्यंग्य

ब्लागर सड़क पर अपने स्कूटर से जा रहा था। सड़क ऊबड़ खाबड़ थी और ब्लागर और स्कूटर दोनों ही हांफते हुए बढ़ रहे थे कि अचानक एक गड्ढा आया और स्कूटर ने झटका खाया और अब वह आधा जमीन पर आधा अपने सवार ब्लागर के ऊपर था।

वह सड़क मुख्य सड़क से दूर थी इसलिये वहां अधिक भीड़ भाड़ नहीं थी। जमीन पर गिरे ब्लागर ने अपने ऊपर से स्कूटर उठाने का प्रयास करने से पहले अपने अंगों का अध्ययन किया तो पाया कि कहीं कोई चोट नहीं थी। अब वह जल्दी जल्दी अपने ऊपर से स्कूटर उठाने का प्रयास करने लगा कि कहीं कोई आदमी उसे गिरा हुआ देख न ले। अपने गिरने के दर्द से अधिक आदमी को इस बात की चिंता सताती है कि कोई उसे संकट में पड़ा देखकर हंसे नहीं।

ब्लागर ने अपने ऊपर से स्कूटर का कुछ भाग हटाया ही था कि उसके कानों में आवाज गूजी-‘क्या यहां रास्तें बैठकर स्कूटर पर कोई कविता या चिंतन लिख रहे हो?’
ब्लागर ने पलटकर देखा तो उसके होश हवास उड़ गये। एक तरह से उसके लिये यह दूसरी दुर्घटना थी। दूसरा ब्लागर खड़ा था। गिरे हुए पहले ब्लागर ने कहा-‘यार, यह गड्ढा सामने आ गया था तो मेरे स्कूटर का संतुलन बिगड़ गया।

दूसरे ब्लागर ने हाथ नचाते हुए कहा-‘स्कूटर का संतुलन बिगड़ा कि तुम्हारा? स्कूटर के पास दिमाग नहीं होता जो उसका संतुलन बिगड़े। तुम्हारे दिमाग का संतुलन बिगड़ा तो ही तुम यहां गिरे। अपना दोष स्कूटर पर मत डालो

पहले ब्लागर ने कहा-‘यार, तुम्हें शर्म नहीं आती। इस हालत में स्कूटर मेरे ऊपर से हटाने की बजाय अपनी कमेंट लगाये जा रहे हो।’

दूसरे ब्लागर ने कहा-‘वैसे तो मेरा काम कमेंट लगाना है तुम्हारे ऊपर से स्कूटर हटाने का नहीं। अब हटा ही देता हूं पर इस बारे में तुम अपने ब्लाग पर लिखना जरूर कि मैंने तुम्हारी मदद की! हां पर कमेंट का आग्रह नहीं करना।’
इस बात पर पहले ब्लागर को गुस्सा आ गया और उसने उसकी सहायता के बिना ही स्कूटर अपने ऊपर से हटा लिया और खड़ा हो गया और बोला-‘तुम्हें तो मजाक ही सूझता है।’
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘देखो मुझे कभी मजाक करना तो आता ही नहीं वरना मैं तुम्हारी तरह फूहड़ हास्य कवितायें लिखता। बहुत गंभीरता से कह रहा हूं कि तुम स्कूटर चलाना पहले सीख लो।’
पहले ब्लागर ने कहा-‘तुम मुझे स्कूटर सीखने के लिये कह रहे हो। दस वर्ष से यह स्कूटर चला रहा हूं। यह गड्ढा ऐसी जगह हो गया है कि इससे दूर निकलना कठिन था। इसलिये गिर गया, समझे।
दूसरा ब्लागर ने कहा-‘पर यह गड़ढा तो कई दिनों से है और तुम और हम कितनी बार यहां से निकल जाते हैं। वैसे तुम्हारा स्कूटर पुराना है इसलिये गिर गया उसे भी सड़क पर चलते हुए शर्म आती होगी। इतनी नयी और प्यारी गाडि़यां सड़क पर चलती हैं तो इस बूढ़े स्कूटर को शर्म आती ही होगी। कोई नया स्कूटर खरीद लो! क्यों पैसे की बचत कर अपने को कष्ट पहुंचा रहे हो।’
पहले ब्लागर ने कहा-‘नया स्कूटर क्या गड्ढे में नहीं गिरेग?’
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘तो कोई कार खरीद लो। अरे ,भई अपने आपको दुर्घटना से बचाओ। कहीं अधिक चोट लग गयी तो परेशान हो जाओगे। अच्छा अब मैं चलता हूं। ध्यान से जाना आगे और भी गड्ढे हैं। अभी तो तुम्हारी किस्मत अच्छी थी जो मैं आ गया। और हां इस दुर्घटना पर अगर लिखो तो यह जरूर लिखना कि मैंने आकर तुम्हें बचाया।’
पहले ब्लागर ने गुस्से में पूछा-‘तुमने आकर मुझे बचाया। क्या बकवाद करते हो?’
दूसरे ब्लागर ने कहा-’अगर मैं आकर तुम्हें गुस्सा नहीं दिलवाता तो शायद तुम पूरी ताकत से स्कूटर को नहीं हटा पाते।‘
दूसरा ब्लागर चला गया। पहले ब्लागर ने स्कूटर पर किक लगायी पर वह शुरू नहीं हुआ। तब वह उसे घसीटता हुआ मरम्मत की दुकान तक लाया। वहां उसका परिचित एक डाक्टर भी अपनी मोटर साइकिल की मरम्मत करवा रहा था। ब्लागर को देखते हुए बोला-‘क्या बात है? ऐसे स्कूटर खींचे चले आ रहे हो?’
ब्लागर ने कहा-‘खराब हो गया है।’
डाक्टर ने कहा-’स्कूटर पुराना हो गया। कोई नया खरीद लो।’
ब्लागर ने कहा-‘नया स्कूटर क्या खराब नहीं होगा? तुम्हारी यह दो साल पुरानी मोटर साइकिल भी तो आज खराब हुई। वैसे मैं इसे तुम्हें दूसरी या तीसरी बार बनवाते हुए देख रहा हूं।’
डाक्टर से बातचीत हो ही रही थी कि दूसरा ब्लागर किसी दूसरे के साथ उसके स्कूटर पर बैठ कर वहां से निकल रहा था। उसने जब पहले ब्लागर को वहां देखा तो उसने अपने साथी को वही रुकने के लिये कहा और उसे दूर खड़ाकर वहां आया जहां डाक्टर और पहला ब्लागर खड़े थे। डाक्टर भी उसे जानता था। उसने डाक्टर को देखकर कहा-’सर, आप अपनी गाड़ी बनवा रहे हैं उसमें समय लगेगा। यह मेरा मित्र है स्कूटर समेत एक गड्ढे में गिर गया था। यह घसीटता हुआ स्कूटर यहां तक लाया है। आप जरा इसके अंगों का निरीक्षण करें और देखें कि कहीं कोई गंभीर चोट तो नहीं आयी। यह सड़क पर गिरा हुआ था। स्कूटर इसके ऊपर था। मैंने उसे हटाया और फिर इसे उठाया। वहां से चला गया पर मेरा मन नहीं माना। अपने इस पड़ौसी से अनुरोध कर उसे स्कूटर पर ले आया कि देखूं कहीं कोई बड़ी अंदरूनी चोट तो नहीं है। आप थोड़ा इस दुकान के अंदर जाकर देख लेंे तो मुझे तसल्ली हो जाये।’
डाक्टर हंस पड़ा और बोला-‘तुम अपनी हरकत से बाज नहीं आओगे। यह तुम्हारा नहीं मेरा भी दोस्त है। यहां तुम इसका हालचाल पूछने नहीं आये बल्कि मुझे बताने आये हो कि यह कहीं गिर गये हो। अब तुम जाओ। तुम्हें अब इसकी दुर्घटना की बात हजम हो जायेगी। मुझे पता है कि तुम्हारा हाजमा बहुत खराब है जब तक कोई आंखों देखी घटना या दुर्घटना पांच दस लोग को बताते नहीं हो तब तक पेट में दर्द होता है।’

इतने में दूसरे ब्लागर का स्कूटर वाला साथी वहां आया और उससे बोला-‘भाई साहब, जल्दी चलो। बातें तो होती रहेंगी। मुझे अस्पताल अपनी मां के पास नाश्ता जल्दी लेकर पहुंचारा है। अगर मेरी मां को देखने चलना है तो जल्दी चलो। नहीं तो पीछे से आते रहना।’

दूसरे ब्लागर ने कहा-‘चलो चलते हैं।’फिर वह पहले ब्लागर को दूर लेजाकर बोला-‘डाक्टर साहब को दिखा देना कि कहीं अंदरूनी चोट तो नहीं है। हां, इस घटना पर रिपोर्ट जरूर लिखना ‘एक स्कूटर ब्लागर के ऊपर’।
वह चला गया तो ब्लागर अपने स्कूटर के पास लौटा तो डाक्टर ने उससे पूछा-‘यह तुम्हारा दोस्त कब से बन गया? मैं तो तुम्हें बचपन से जानता हूं इससे कैसे परिचय हुआ?’
ब्लागर ने कहा-‘बस ऐसे ही। मुझे भी याद नहीं कब इससे मुलाकात हुई। आप तो जानते हैं कि मैं एक लेखक हूं लोगों से मिलना होता है। सभी के साथ मिलने का सिलसिला चलता है। यह याद कहां रहता है कि किससे कब मुलाकात हुई?‘
डाक्टर ने कहां-‘ यह तुम्हें जाते जाते क्या कहा रहा था? एक स्कूटर! किसके ऊपर कह रहा था? यह मैं सुन नहीं पाया!’
इसी बीच में मैकनिक ने आकर डाक्टर से कहा-’लीजिये साहब, आपकी मोटर साइकिल बन गयी।’
पहले ब्लागर से विदा ले डाक्टर चला गया। दूसरे मैकनिक ने स्कूटर भी बना दिया था। पहले मैकनिक ने ब्लागर से पूछा‘-स्कूटर किसके ऊपर था? डाक्टर साहब क्या पूछ रहे थे? वह आपके दूसरे साथी क्या कह गये थे?’
ब्लागर आसमान में देखते धीरे धीरे बुदबुदाया-‘एक स्कूटर, ब्लागर के ऊपर!
मैकनिक ने कहा-‘यह ब्लागर कौन?’
पहले ब्लागर ने कहा-‘जो ब्लाग पर लिखता है?’
मैकनिक ने पूछा-‘यह ब्लाग क्या होता है?’
पहले ब्लागर ने कंधा उचकाते हुए कहा-‘मुझे नहीं मालुम?’
इधर दूसरा मैकनिक स्कूटर बनाकर पहले ब्लागर के पास लाया और पहले मैकनिक से बोला-‘तुम्हें नहीं मालुम ब्लाग क्या होता है? अरे, बड़े बड़े हीरो ब्लाग लिख रहे हैं। तू मुझसे कहता है न कि अखबार क्यों पढ़ता है? मैंने अखबार में पढ़ा है अरे, अखबार पढ़ने से नालेज मिलता है। देख तुझे और साहब दोनों का पता नहीं कि ब्लाग क्या होता है? वह जो डाक्टर साहब के पास जो दूसरे सज्जन आये थे और साहब की चैकिंग करने को कह रहे थे वह भी बहुत बड़े ब्लागर हैं। कितनी बार कहता हूं कि तुम भी अखबार पढ़ा करो।’

पहले ब्लागर ने मैकनिक को पैसे दिये और स्कूटर शुरू किया तो पहने मैकनिक ने पूछा-‘यह स्कूटर क्या उन सज्जन के ऊपर था।’
पहले ब्लागर ने कहा-‘नहींं।
वह वहां से चला गया तो पहले मैकनिक ने दूसरे से पूछा-‘अगर यह दूसरे सज्जन ब्लागर थे और स्कूटर उनके ऊपर नहीं था तो फिर यह स्कूटर किसके ऊपर था? घसीटते हुए तो यह सज्जन ले लाये थे तो वह ब्लागर कौन था।’
दूसरे मैकनिक-‘इसका ब्लाग से क्या संबंध?’
दूसरे ने अपना सिर पकड़ लिया और कहा-‘चलो यार, अब अपना काम करें।
...............................
दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप

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Wednesday, December 31, 2008

नहीं जानते कौन देवता कहां से आया-हास्य कविता

नववर्ष की पूर्व संध्या पर
फंदेबाज अग्रिम बधाई देने
घर आया और बोला
‘‘दीपक बापू, इधर कई बरसों से
सांताक्लाज का नाम बहुत सुनने में आया
हालत यह हो गयी सभी
हिंदी के सारे टीवी चैनल और
पत्र-पत्रिकाओं में यह नाम छाया
सुना है बच्चों को तोहफे देता है
हम बच्चे थे तो कभी वह नहीं आया
यह कहां का देवता है
जिसकी कृपा दृष्टि में यह देश अभी आया’

सुनकर पहले चौंके फिर
अपनी टोपी घुमाकर
कंप्यूटर पर उंगलियां नचाते हुए
बोले दीपक बापू
‘हम भी ज्यादा नहीं जानते
पहले अपने देवताओं के बारे में
पूरा जान लें, जिनको खुद मानते
मगर यह बाजार के विज्ञापन का खेल है
जो कहीं से लेता डालर
कहीं से खरीदता तेल है
इस देश के सौदागर जिससे माल कमाते हैं
उसके आगे सिर नवाते हैं
साथ में वहां के देवता की भी
जय जयकार गाते हैं
अपने देश के पुराने देवताओं की
कथायें सुना सुनाकर
ढोंगी संत अपना माल बनाते हैं
बाजार भी मौका नहीं चूकता पर
सभी दिन तो देश के देवताओं के
नाम पर नहीं लिखे जाते हैं
पर सौदागरों को चाहिऐ रोज नया देवता
इसलिये विदेश से उनका नाम ले आते हैं
अपने देश का उपभोक्ता और
विदेशी सेठ दोनों को करते खुश
एक तीर से दो शिकार कर जाते है
वैसे देवता भला कहां आते जाते
हृदय से याद करो देवता को
तो उनकी कृपा के फूल ऐसे ही बरस जाते
हम तो हैं संवेदनशील
जीते हैं अपने विश्वास के साथ
नहीं जानना कि कौन देवता कहां से आया
...............................................
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Sunday, November 2, 2008

देवताओं की कृपा है इसलिये अमीरी भी बसती है-आलेख

भारत की गरीबी पूरे विश्व में हमेशा चर्चित रही है। यही कारण है कि भारत के जब आर्थिक विकास की चर्चा होती है तो यहां की गरीबी पर भी दृष्टिपात किया जाता है। अभी तक विश्व के अनेक लोग यह तय नहीं कर पा रहे कि भारत एक गरीब देश है या अमीर।
स्विस बैंक एसोसिएशन में विभिन्न देशों के लोगों द्वारा जमा के आंकड़े देकर यह सवाल पूछा गया है कि ‘कौन कहता है कि भारत एक गरीब देश है’। इसमें क्रमवार पहले पांच देशों का नाम दिया गया है। ताज्जुब की बात है कि भारत का पहला नंबर है और शायद इसी कारण यह प्रश्न किया गया है।
कुछ लोग हैरान है! हर कोई अपने दृष्टिकोण से टिप्पणी कर रहा है। इस लेखक ने भी इसे पढ़ा पर उसकी दिलचस्पी केवल स्विस बैंक द्वारा दिये गये आंकड़े और ऊपर ब्लाग में लिखे गये शीर्षक में थी।
पहले तो यह बात है कि हम कतई नहीं कहते कि भारत एक गरीब देश है। हां, दुनियां के सबसे अधिक गरीब यहां रहते हैं और औसत आंकड़े भी अन्य देशों से अधिक है इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता। यही गरीब एक शोपीस बन गया है। उसके नाम पर जितनी सहायता देश और विदेशों से आती है वह अगर उसके पास पहुंच जाये तो शायद वह अपनी गरीबी भूल जाये। ऐसा होना नहीं है क्योंकि फिर दुनियां भर के अमीर क्या करेंगे? यहां की गरीबी मिटती नहीं तो केवल इसलिये कि वह विश्व की दर्शनीय वस्तु बनकर रह गयी है जिसके आधार पर अनेक फिल्में और उपन्यास बिक जाते हैं। कुछ लोग यहां भी उनके नाम पर नारे और वाद चलाकर अपना काम चला लेते हैं इस आशा में शायद उनको विदेश में कोई पुरस्कार मिल जाये। अनेक फिल्में बनीं और उपन्यास लिखे गये और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उनको पुरस्कार मिला। कथित रूप से सम्मानित फिल्मकार और उपन्यासकार उसके परिणाम स्वरूप यहां अपने जलवे पेलते रहे। कई लोग मूंह बनाकर गरीबों को दर्द का बयां करते हैं तो कुछ विदेश से सम्मानित होकर यहां अनर्गल बातें करते हैं और उनको अखबार में जगह मिल जाती है।

एक उपन्यासकारा हैं जिनका उपन्यास विदेश में सम्मानित हो गया उसके बाद ही उनको इस देश में पहचाना गया। आजकल उनके अनेक विषयों पर विचार प्रकाशित होते हैं और यकीन मानिये वह एकदक अनर्गल प्रलाप लगते हैं। अंतर्जाल पर मित्र लोग उसके विचार प्रकाशित कर अपने आपको धन्य समझते हैं। कई बार विचार आता है कि यहां जवाब दें पर एक तो यहां पाठक कम है दूसरे यह लेखक कोई प्रसिद्ध नहीं कि कोई उसकी सुनेगा। इसलिये ऊर्जा बेकार करना ठीक नहीं लगता है । बहरहाल भारत की गरीबी और कथित सामाजिक दुर्दशा पर अंग्रेजी में लिखने वाले बहुत लोकप्रिय होते हैं पर हिंदी में उनका कोई सम्मान नहीं होता। हिंदी वाले वैसे ही गरीब हैं भला वह क्यों ऐसी बोरिंग रचनाऐं पढ़ेंगे। वैसे भी कहा जाता है कि आदमी के मन को अपनी विपरीत परिस्थितियों का देख और पढ़कर ही मनोरंजन प्राप्त होता है और अंग्रेजी वालों के पास धन और वैभव इसलिये उनको ही ऐसी रचनायें पसंद आती हैं।

बहरहाल हम देश की अमीरी और यहां गरीबों की स्थिति पर नजर डालें। यह देश अमीर है क्योंकि यहां देवताओं का वास है। इंद्र,वायु और अग्नि देवता यहां वास करते हैं और उनकी कृपा से अमीर और गरीब दोनों ही पल जाते हैं। यह कोई अंधविश्वास की स्थापना का प्रयास नहीं है। यह तो पश्चिम के भूवैज्ञानिक द्वारा दी गयी यह जानकारी है कि जितना भूजल भारत में उपलब्ध है उतना अन्य किसी देश में नहीं है। इस मामले में वह भारत को भाग्यशाली मानते हैं। अब यह तो सभी जानते हैं कि इस प्रथ्वी पर जीवन का आधार तो जल ही है। जल की वजह से यहां वायु और अग्नि देवता की भी कृपा है। यही कारण लोग उनको पूजते हैं और वह उनकी रक्षा करते हैं। ब्रह्मा जी ने देवताओं की उत्पति कर यही कहा था कि देवता प्रथ्वी पर जीवन का सृजन कर उसका पालन करें और मनुष्य उनकी पूजा करें। यही तो सब सदियों से चल रहा है। ब्रह्मा जी ने धन धान्य से इस देश को संपन्न किया और फिर लोगों को मानसिक शांति दिलाने के लिये भक्ति अध्यात्म ज्ञान के लिये भी यहां अपने विचार भी रखे। याद रखिये भारत को विश्व में अध्यात्म गुरु भी माना जाता है और सोने की चिडि़या तो पहले भी कहा जाता था पर बीच में छोड़ दिया था अब फिर सवाल उठा है तो जवाब देना पड़ता है कि हां भई यहां लक्ष्मीजी का भी वास है।

इस देश का आकर्षण सदियों से विश्व की दृष्टि में रहा है क्योंकि यहां का अध्यात्मिक ज्ञान और धन धान्य से संपन्नता सभी को लुभाती है। यही कारण है कि इस पर आक्रमण होते रहे। लोग यहां से लूटकर सामान अपने देश में पहुंचाते रहे, मगर फिर भी यह देश गरीब नहीं हुआ क्योकि यहां प्राकृतिक साधनों में की स्थिति यथावत रही। अन्य हमलावार तो यहां की संस्कृति नहीं मिटा सके पर अंग्रेजों ने यह काम भी कर दिया। देश के विभिन्न राजाओं और अन्य शीर्षस्थ लोगों में व्याप्त अहंकार का लाभ उठाकर उनको ही आपस में लड़ाया। आये थे ईस्ट इंडिया कंपनी के नाम से व्यापार करने और देश के शासक बन गये। इस देश में हमेशा शासन रहे इसलिये ऐसी शिक्षा पद्धति का निर्माण किया जो केवल गुलाम पैदा करती है। वह चले गये पर अपना तंत्र ऐसा बना गये कि आज भी देश का छोटा बड़ा आदमी उनको ही पदचिन्हों पर चल रहा है। आपस में ही एक दूसरे पर विश्वास नहीं है।

पैसा तो गरीब का ही है क्योंकि उसके पसीने से ही बनता है आर्थिक सम्राज्य। किसान जमीन में जो फसल उगाते हैं उसी से ही सारे देश का काम चलता है। मजदूर और किसान को अपने श्रम का जो प्रतिफल मिलना चाहिये वह पूरा नहीं मिलता। उसको प्रतिफल में हुई कमी बनाते हैं किसी को अमीर और वहीं पैसा आज स्विस बैंक में जमा है।
भारतीय अध्यात्म में दान की महिमा बहुत है पर गरीबों के मसीहाओं को वह रास नहीं आता क्योंकि उसमें हक जैसा आभास नहीं आता। गरीबों को हक दिलाने का नारा यहां के लोगों को आज भी प्रिय लगता है और जो जितनी जोर से यह नारा लगाता है वह उनका दिल जीत लेता है। यही कारण है कि जन कल्याण एक फैशन और व्यापार की तरह हो गया है। जो जन कल्याण समाज के शक्तिशाली लोग स्वेच्छा करते थे वह भी इस कारण पीछे हट गये। अब जल कल्याण केवल राज्य के अधीन है और सभी समाजों और समुदायों के शीर्षस्थ लोग केवल उन पर नियंत्रण करने के लिये कल्याण का दिखावा करते हैं।

इस देश से पैसा ले जायेंगे फिर भी यह देश हारेगा नहीं-यह बात अंग्रेजों ने देख ली थी। वह यहां के लोगों के मन मस्तिष्क से भारतीय अध्यात्म और दर्शन की स्मृतियां मिटाना चाहते थे। इसलिये उन्होंने ऐसी विचारधाराओं को आगे बढ़ाया जो उसे नष्ट कर सकते है।
मूर्तिपूजा अंध विश्वास है। सभी भगवान के स्वरूप मिथक हैं। सभी साधु सन्यासी भ्रष्ट हैं। यज्ञ हवन से कुछ नहीं होता। आदि आदि ऐसी बातें कही गयीं। आज भारत में उनके अग्रज भी यही कहते हैं। वैसे कहने वाले कुछ भी कहते रहें पर यह वास्तविकता यह है कि अनेक लोग उनकी परवाह नहीं करते। मंदिर जाकर पत्थर की प्रतिमा पर माला या जल चढ़ाने वाले सुखी नहीं है तो वह भी कौन सुखी हैं जो नहंी जाते। आस्तिक दुखी है तो नास्तिक कौन यहां स्वर्ग भोग रहे हैं। इसके विपरीत जो मंदिरों पर जाकर माला या जल चढ़ाकर अपने आस्तिक भाव से जुड़े है उनके चेहरे पर फिर भी रौनक लगती है और अवसर पर पड़े तो वही किसी गरीब की सहायता कर देते हैं। जो अपने नास्तिक होने के अहंकार में हैं वह तो बस गरीबों की तरफ देखकर अपनी बातें बोल और लिखकर प्रसिद्ध जरूर पा लेते हैं पर किसी गरीब के लिये व्यक्तिगत रूप से कुछ नहीं करते। इसके लिये वह राज्य की तरफ देखते हैं और उसे ही कोसते है।

पहले अनेक लोग ऐेसे होते थे जो थोड़ा पैसा होने पर कहीं तीर्थ वगैरह करने चले जाते थे। वहां अनेक सेठ साहुकारों द्वारा बनी गयी धर्मशालायें होती थीं पर अब तो सभी जगह फाइव स्टार होटल हो गये हैं और यकीनन उनको उनमे सामान्य आदमी के रहने की शक्ति नहीं होती। इसके बावजूद लोग जाते हैं क्योंकि देवताओं की कृपा से खाना और पानी तो मिल ही जाता है। अमीर और गरीब आज भी अपने देवताओं को पूजते है और अभी भी यह पश्चिम के लिये यह असहनीय है। इसलिये वह ऐसा सवाल उठाते हैं कि ‘कौन कहता है कि भारत गरीब है‘। मगर उनसे यह कहा किसने था? कार्ल माक्र्स ने अपनी विचारधारा को पश्चिम में बैठकर लिखा था। उनका मित्र भी एक पूंजीपति था। मजे की बात यह है कि पश्चिम और पूंजीपति ही उनकी विचारधारा के विरोधी रहे पर पूर्व के लोगों ने उसे हाथों हाथ लिया क्योंकि उसमें थे केवल गरीबों के नारे जिसमें गरीब आसानी से बहल जाये।

पूर्व में समाज स्वसंचालित थे पर धीरे धीरे समाज को सरकार से नियंत्रित बना कर उनको समाप्त कर दिया गया । अब अमीर लोग समाज के गरीब लोगों के लिये स्वयं कल्याण करने का काम नहीं करते बल्कि यह राज्य की जिम्मेदारी मानते हैं। धन तो धन है वह उनके पास बढ़ता ही जाता है और वह उनको पश्चिम में भेज देते हैं। पश्चिम की मौज है और यहां चलती रहते हैं बस खालीपीली बहसें। समाज,भाषा और क्षेत्रों को लेकर लोग आपस में झगडे करते है। चीन अपने समाज को मिटा चुका है अब वह दूसरी जगह यही करने का काम कर रहा है। वह अपनी प्रगति का प्रचार कर रहा है पर उसकी वास्तविकता बताने के लिये वहां कोई स्वतंत्र माध्यम नहीं है। भारत में कम से कम यह तो है कि सब सामने आ जाता है। जैसे यह बात आ गयी कि स्विस बैंकों में सबसे अधिक भारतीयों का पैसा जमा है। बहरहाल यह बात तो है कि भारत में देवताओं की कृपा के कारण प्राकृतिक साधनों का बाहुल्य है इसलिये यहां गरीबी के साथ अमीरों की भी बस्ती है। यह अलग बात है कि अमीर अपना अतिरिक्त धन गरीबों के साथ नहीं बांटते बल्कि पश्चिम वालों पर भरोसा कर उनको सौंप देते हैं।
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Wednesday, October 29, 2008

आम और खास आदमी-व्यंग्य कविता

समाज को केक की तरह बांट कर
वह खा जाते
मतलब निकाल गया
कुछ इसने खाया तो कुछ उसने
खास आदमी के दरबारी खेल को
आम आदमी भला कहां समझ पाते
हर बार उनकी दरबार में
समूह में केक की तरह सज जाते
इशारा मिलते ही खुद ही
छूरी बनकर अपने टुकड़े किये जाते
.........................

खास आदमी के
पद,पैसे और वैभव को देखकर
आम आदमी उनकी
अक्ल की तारीफ के पुल बांधे जाते
न हो जिनके पास वह
अक्ल होते हुए भी
अपने घर में ही बैल माने जाते
इसलिये अक्लमंद आम आदमी
खामोशी में अपने लिये अमन और चैन पाते

.............................................
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Tuesday, October 21, 2008

अपने शहर पर इतना न इतराओ-व्यंग्य कविता

अपने शहर पर इतना नहीं इतराओ
कि फिर पराये लगने लगें लोग सभी
कभी यह गांव जितना छोटा था
तब न तुम थे यहां
न कोई बाजार था वहां
बाजार बनते बड़ा हुआ
सौदागर आये तो खरीददार भी
गांव से शहर बना तभी

आज शहर की चमकती सड़कों
पर तुम इतना मत इतराओ
बनी हैं यह मजदूरों के पसीने से
लगा है पैसा उन लोगों का
जो लगते हैं तुमको अजनबी
‘मेरा शहर सिर्फ मेरा है’
यह नारा तुम न लगाओ
तुम्हारे यहां होने के प्रमाण भी
मांगे गये तो
अपने पूर्वजों को इतिहास देखकर
अपने बाहरी होने का अहसास करने लगोगे अभी

अपने शहर की इमारतों और चौराहों पर
लगी रौशनी पर इतना मत इतराओ
इसमें जल रहा है पसीना
गांवों से आये किसानों का तेल बनकर
घूमने आये लोगों की जेब से
पैसा निकालकर खरीदे गये बल्ब
मांगा गया इस रौशनी का हिसाब तो
कमजोर पड़ जायेंगे तर्क तुम्हारे सभी

यह शहर धरती का एक टुकड़ा है
जो घूमती है अपनी धुरी पर
घूम रहे हैं सभी
कोई यहां तो कोई वहां
घुमा रहा है मन इंसान का
अपने चलने का अहसास भ्रम में करते बस सभी
जिस आग को तुम जला रहे हो
कुछ इंसानों को खदेड़ने के लिये
जब प्रज्जवलित हो उठेगी दंड देने के लिये
तो पूरा शहर जलेगा
तुम कैसे बचोगे जब जल जायेगा सभी

अपने शहर की ऊंची इमारतों और
होटलों पर इतना न इतराओ
दूसरों को बैचेन कर
अपने लोगों को अमन और रोटी दिलाने का
वादा करने वालों
बरसों से पका रहे हो धोखे की रोटी
दूसरों की देह से काटकर बोटी
अधिक दूर तक नहीं चलेगा यह सभी
दूसरों की भूख पर अपने घर चलाने का रास्ता
बहुत दूर तक नहीं जाता
क्योंकि तुम हो छीनने की कला में माहिर
रोटी पकाना तुमको नहीं आता
जान जायेगें लोग कुछ दिनों में सभी

...................................................


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Friday, October 10, 2008

जैसा ज्ञान, वैसा बखान-हास्य व्यंग्य

सिनेमा या टीवी के पर्दे पर चुंबन का दृश्य देखकर लोगों के मन में हलचल पैदा होती है। अगर ऐसे में कहीं किसी प्रसिद्ध हस्ती ने किसी दूसरी हस्ती का सार्वजनिक रूप से चंुबन लिया और उसकी खबर उड़ी तो हाहाकार भी मच जाता है। कुछ लोग मनमसोस कर रह जाते हैं कि उनको ऐसा अवसर नहंी मिला पर कुछ लोग समाज और संस्कार विरोधी बताते हुए सड़क पर कूद पड़ते हैं। चुंबन विरोधी चीखते हैं कि‘यह समाज और संस्कार विरोधी कृत्य है और इसके लिये चुंबन लेने और देने वाले को माफी मांगनी चाहिये।’

अब यह समझ में नहीं आता कि सार्वजनिक रूप से चुंबन लेना समाज और संस्कारों के खिलाफ है या अकेले में भी। अगर ऐसा है तो फिर यह कहना कठिन है कि कौन ऐसा व्यक्ति है जो कभी किसी का चुंबन नहीं लेता। अरे, मां बाप बच्चे का माथा चूमते हैं कि नहीं। फिर अकेले में कौन किसका कैसे चुंबन लेता है यह कौन देखता है और कौन बताता है?

सार्वजनिक रूप से चुंबन लेने पर लोग ऐसे ही हाहाकार मचा देते हैं भले ही लेने और देने वाले आपस में सहमत हों। अगर किसी विदेशी होंठ ने किसी देशी गाल को चुम लिया तो बस राष्ट्र की प्रतिष्ठा के लिए खतरा और समाज और संस्कार विरोधी और भी न जाने कितनी नकारात्मक संज्ञाओं से उसे नवाजा जाता है। कहीं कहीं तो जाति,धर्म और भाषा का लफड़ा भी खड़ा हो जाता है। पश्चिमी देशों में सार्वजनिक रूप से चुंबन लेना शिष्टाचार माना जाता है जबकि भारत में इसे अभी तक अशिष्टता की परिधि में रखा जाता है। यह किसने रखा पता नहीं पर जो रखते हैं उनसे बहस करने का साहस किसी में नहीं होता क्योंकि वह सारे फैसले ताकत से करते हैं और फिर समूह में होते हैं।

इतना तय है कि विरोध करने वाले भी केवल चुंबन का विरोध इसलिये करते हैं कि वह जिस सुंदर चेहरे का चुंबन लेता हुआ देखते हैं वह उनके ख्वाबों में ही बसा होता है और उनका मन आहत होता है कि हमें इसका अवसर क्यों नहीं मिला? वरना एक चुंबन से समाज,संस्कृति और संस्कार खतरे में पड़ने का नारा क्यों लगाया जाता है।
दूसरे संदर्भ में इन विरोधियों को यह यकीन है कि समाज में कच्चे दिमाग के लोग रहते हैं और अगर इस तरह सार्वजनिक रूप से चुंबन लिया जाता रहा तो सभी यही करने लगेंगे। ऐसे लोगों की बुद्धि पर तरस आता है जो पूरे समाज को कच्ची बुद्धि का समझते हैं।

फिल्मों में भी नायिका के आधे अधूरे चुंबन दृश्य दिखाये जाते हैं। नायक अपना होंठ नायिका के गाल के पास लेकर जाता है और लगता कि अब उसने चुुंबन लिया पर अचानक दोनों में से कोई एक या दोनों ही पीछे हट जाते हैं। इसके साथ ही सिनेमाहाल में बैठे लड़के -जो इस आस में हो हो मचा रहे होते हैं कि अब नायक ने नायिका का चुंबन लिया-हताश होकर बैठ जाते हैं। चुम्मा चुम्मा ले ले और देदे के गाने जरूर बनते हैं नायक और नायिक एक दूसरे के पास मूंह भी ले जाते हैं पर चुंबन का दृश्य फिर भी नहीं दिखाई देता।

आखिर ऐसा क्यों? क्या वाकई ऐसा समाज और संस्कार के ढहने की वजह से है। नहीं! अगर ऐसा होता तो फिल्म वाले कई ऐसे दृश्य दिखाते हैं जो तब तक समाज में नहीं हुए होते पर जब फिल्म में आ जाते हैं तो फिर लोग भी वैसा ही करने लगते हैं। फिल्म से सीख कर अनेक अपराध हुए हैं ऐसे मेंं अपराध के नये तरीके दिखाने में फिल्म वाले गुरेज नहीं करते पर चुंबन के दृश्य दिखाने में उनके हाथ पांव फूल जाते हैंं। सच तो यह है कि चूंबन जब तक लिया न जाये तभी तक ही आकर्षण है उसके बाद तो फिर सभी खत्म है। यही कारण है कि काल्पनिक प्यार बाजार में बिकता रहे इसलिये होंठ और गाल पास तो लाये जाते हैं पर चुंबन का दृश्य अधिकतर दूर ही रखा जाता है।

यह बाजार का खेल है। अगर एक बार फिल्मों से लोगों ने चुंबन लेना शुरू किया तो फिर सभी जगह सौंदर्य सामग्री की पोल खुलना शुरू हो जायेगी। महिला हो या पुरुष सभी सुंदर चेहरे सौंदर्य सामग्री से पुते होते हैं और जब चुंबन लेंगे तो उसका स्पर्श होठों से होगा। तब आदमी चुंबन लेकर खुश क्या होगा अपने होंठ ही साफ करता फिरेगा। सौंदर्य प्रसाधनों में केाई ऐसी चीज नहीं हेाती जिससे जीभ को स्वाद मिले। कुछ लोगों को तो सौदर्य सामग्री से एलर्जी होती और उसकी खुशबू से चक्कर आने लगते हैं। अगर युवा वर्ग चुंबन लेने और देने के लिये तत्पर होगा तो उसे इस सौंदर्य सामग्री से विरक्त होना होगा ऐसे में बाजार में सौंदर्य सामग्री के प्रति पागलपन भी कम हो जायेगा। कहने का मतलब है कि गाल का मेकअप उतरा तो समझ लो कि बाजार का कचड़ा हुआ। याद रखने वाली बात यह है कि सौदर्य की सामग्री बनाने वाले ही ऐसी फिल्में के पीछे भी होते हैं और उनका पता है कि उसमें ऐसी कोई चीज नहीं है जो जीभ तक पहुंचकर उसे स्वाद दे सके।

कई बार तो सौंदर्य सामग्री से किसी खाने की वस्तु का धोखे से स्पर्श हो जाये तो जीभ पर उसके कसैले स्वाद की अनुभूति भी करनी पड़ती है। यही कारण है कि चुंबन को केवल होंठ और गाल के पास आने तक ही सीमित रखा जाता है। संभवतः इसलिये गाहे बगाहे प्रसिद्ध हस्तियों के चुंबन पर बवाल भी मचाया जाता है कि लोग इसे गलत समझें और दूर रहें। समाज और संस्कार तो केवल एक बहाना है।

एक आशिक और माशुका पार्क में बैठकर बातें कर रहे थे। आसपास के अनेक लोग उन पर दृष्टि लगाये बैठै थे। उस जोड़े को भला कब इसकी परवाह थी? अचानक आशिक अपने होंठ माशुका के गाल पर ले गया और चुंबन लिया। माशुका खुश हो गयी पर आशिक के होंठों से क्रीम या पाउडर का स्पर्श हो गया और उसे कसैलापन लगा। उसने माशुका से कहा‘यह कौनसी गंदी क्रीम लगायी है कि मूंह कसैला हो गया।’

माशुका क्रोध में आ गयी और उसने एक जोरदार थप्पड़ आशिक के गाल पर रसीद कर दिया। आशिक के गाल और माशुका के हाथ की बीचों बीच टक्कर हुई थी इसलिये आवाज भी जोरदार हुई। उधर दर्शक तो जैसे तैयार बैठे ही थे। वह आशिक पर पिल पड़े। अब माशुका उसे बचाते हुए लोगों से कह रही थी कि‘अरे, छोड़ो यह हमारा आपसी मामला है।’

एक दर्शक बोला-‘अरे, छोड़ें कैसे? समाज और संस्कृति को खतरा पैदा करता है। चुंबन लेता है। वैसे तुम्हारा चुंबन लिया और तुमने इसको थप्पड़ मारा। इसलिये तो हम भी इसको पीट रहे हैं।’

माशुका बोली‘-मैंने चुंबन लेने पर थप्पड़ थोड़े ही मारा। इसने चुंबन लेने पर जब मेरी क्रीम को खराब बताया। कहता है कि क्रीम से मेरा मूंह कसैला हो गया। इसको नहीं मालुम कि चुंबन कोई नमकीन या मीठा तो होता नहीं है। तभी इसको मारा। अरे, वह क्रीम मेरी प्यारी क्रीम है।’

तब एक दर्शक फिर आशिक पर अपने हाथ साफ करने लगा और बोला-‘मैं भी उस क्रीम कंपनी का ‘समाज और संस्कार’रक्षक विभाग का हूं। मुझे इसलिये ही रखा गया है कि ताकि सार्वजनिक स्थानों पर कोई किसी का चुंबन न ले भले ही लगाने वाला केाई भी क्रीम लगाता हो। अगर इस तरह का सिस्टम शुरु हो जायेगा तो फिर हमारी क्रीम बदनाम हो जायेगी।’

बहरहाल माशुका ने जैसे तैसे अपने आशिक को बचा लिया। आशिक ने फिर कभी सार्वजनिक रूप से ऐसा न करने की कसम खाइ्र्र।

हमारा देश ही नहीं बल्कि हमारे पड़ौसी देशों में भी कई चुंबन दृश्य हाहाकर मचा चुके हैं। पहले टीवी चैनल वाले प्रसिद्ध लोगों के चुंबन दृश्य दिखाते हैं फिर उन पर उनके विरोधियों की प्रतिक्रियायें बताना नहीं भूलते। कहीं से समाज और संस्कारों की रक्षा के ठेकेदार उनको मिल ही जाते हैं।

वैसे पश्चिम के स्वास्थ्य वैज्ञानिक चुंबन को सेहत के लिये अच्छा नहीं मानते। यह अलग बात है कि वहां चुंबन खुलेआम लेने का शिष्टाचार है। भारतीय उपमहाद्वीप में इसे बुरा समझा जाता है। चुंबन लेना स्वास्थ्य के लिये बुरा है-यह जानकर समाज और संस्कारों के रक्षकों का सीना फूल सकता है पर उनको यह जानकर निराशा होगी कि अमेरिकन आज भी आम भारतीयों से अधिक आयु जीते हैं और उनका स्वास्थ हम भारतीयों के मुकाबले कई गुना अच्छा है।

वैसे सार्वजनिक रूप से चुंबन लेना अशिष्टता या अश्लीलता कैसे होती है इसका वर्णन पुराने ग्रंथों में कही नहीं है। यह सब अंग्रेजों के समय में गढ़ा गया है। जिसे कुछ सामाजिक संगठन अश्लीलता कहकर रोकने की मांग करते हैं,कुछ लोग कहते हैं कि वह सब अंग्रेजों ने भारतीयों को दबाने के लिये रचा था। अपना दर्शन तो साफ कहता है कि जैसी तुम्हारी अंतदृष्टि है वैसे ही तुम्हारी दुनियां होती है। अपना मन साफ करो, पर भारतीय संस्कृति के रक्षकों देखिये वह कहते हैं कि नहीं दृश्य साफ रखो ताकि हमारे मन साफ रहें। अपना अपना ज्ञान है और अलग अलग बखान है।
जहां तक चंबन के स्वाद का सवाल है तो वह नमकीन या मीठा तभी हो सकता है जब सौंदर्य सामग्री में नमक या शक्कर पड़ी हो-जाहिर है या दोनों वस्तुऐं उसमें नहीं होती।
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दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप

Saturday, September 20, 2008

कदम कदम पर बिकती है भलाई यहाँ-हिन्दी शायरी

हर जगह सर्वशक्तिमान के दरबार में
बैठा कोई एक सिद्ध

आरजू लिए कोई वहां
उसे देखता है जैसे शिकार देखता गिद्द
लगाते हैं नारा
"आओ शरण में दरबार के
अपने दु:ख दर्द से मुक्ति पाओ
कुछ चढ़ावा चढ़ाओ
मत्था न टेको भले ही सर्वशक्तिमान के आगे
पर सिद्धों के गुणगान करते जाओ
जो हैं सबके भला करने के लिए प्रसिद्ध

इस किनारे से उस किनारे तक
सिद्धो के दरबार में लगते हैं मेले
भीड़ लगती है लोगों की
पर फिर भी अपना दर्द लिए होते सब अकेले
कदम कदम पर बिकती है भलाई
कहीं सिद्ध चाट जाते मलाई
तो कहीं बटोरते माल उनके चेले
फिर भी ख़त्म नहीं होते जमाने से दर्द के रेले
नाम तो रखे हैं फरिश्तों के नाम पर
फकीरी ओढे बैठे हैं गिद्द
उनके आगे मत्था टेकने से
अगर होता जमाने का दर्द दूर
तो क्यों लगते वहां मेले
ओ! अपने लिए चमत्कार ढूँढने वालों
अपने अन्दर झाँक कर
दिल में बसा लो सर्वशक्तिमान को
बन जाओ अपने लिए खुद ही सिद्ध

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