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Friday, February 4, 2011

भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनयुद्ध में व्यवस्था में बदलाव बिना विजय संभव नहीं-हिन्दी लेख (bhrashtachar aur januddh-hindi lekh)

सुनने में आया है कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध कहीं जनयुद्ध शुरु हो गया है। बड़े बड़े नाम हैं जो इस युद्ध की अगुआई कर रहे हैं। ऐसे नामों की छबि को लेकर कोई संदेह है क्योंकि वह स्वच्छ है। कुछ विद्वान हैं तो कुछ कानूनविद! हम यहां कि इस जनयुद्ध के सकारात्मक होने पर संदेह नहीं कर रहे पर एक सवाल तो उठायेंगे कि कहीं यह अभियान भी तो केवल नारों तक ही तो नहीं सिमट जायेगा?
विश्व प्रसिद्ध योग शिक्षक बाबा रामदेव के व्यक्त्तिव को कोई चुनौती नहीं दे सकता पर उनके चिंतन की सीमाओं की चर्चा हो सकती है। श्रीमती किरण बेदी की सक्रियता प्रसन्नता देने वाली है पर सवाल यह है कि वह भ्रष्टाचार का बाह्य रूप देख रही हैं यह उसका गहराई से भी उन्होंने अध्ययन किया है। बाबा रामदेव योग के आसन सिखाते हैं मगर उनके परिणामों के बारे में वह आधुनिक चिकित्सकीय साधनों का सहारा लेते हैं। सच बात तो यह है कि बाबा रामदेव योग आसन और प्राणायाम जरूर सिद्धहस्त हैं पर उसके आठों अंगों के बारे में में पूर्ण विद्वता प्रमाणिक नहीं है। फिर भी भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनयुद्ध प्रारंभ करने वाले महानुभावों को साधुवाद! उनकी प्रशंसा हम इस बात के लिये तो अवश्य करेंगे कि वह इस देश में व्याप्त इस निराशावाद से मुक्ति दिलाने में सहायक हो रहे हैं कि भ्रष्टाचार को मिटाना अब संभव नहीं है।
सवाल यह है कि भ्रष्टाचार समस्या है या समस्याओं का परिणाम! इस पर शायद बहस लंबी खिंच जायेगी पर इतना तय है कि वर्तमान व्यवस्था में भ्रष्टाचार अपनी जगह बनाये रखेगा चाहे जितने अभियान उसके खिलाफ चलाये जायें। मुख्य समस्या व्यवस्था में है कि उससे जुड़े लोगों में, इस बात का पता तभी लग सकता है जब एक आम आदमी के चिंतक के रूप में विचार किया जाये।
जो विद्वान भ्रष्टाचार को मिटाने की बात करते हैं तो वह भ्रष्ट तत्वों को पकड़ने या उनकी पोल खोलने के लिये तैयार हैं मगर यह हल नहीं है। सबसे बड़ी बात यह है कि हम अपने राज्य, समाज, परिवार तथा समाजसेवी संस्थाओं की संचालन व्यवस्था को देखें जो अब पूरी तरह पश्चिम की नकल पर चल रही है। ऐसा नहीं है कि कभी कोई राज्य भ्रष्टाचार से मुक्त रहा हो। अगर ऐसा न होता तो हम अपने यहां राम राज्य के ही सर्वोत्तम होने की बात स्वयं मानते हैं। इसका आशय यह है कि उससे पहले और बाद की राज्य व्यवस्थायें दोषपूर्ण रही हैं। इसके बावजूद भारतीय राज्य व्यवस्थाओं में राजाओं की जनता के प्रति निजी सहानुभूति एक महत्वपूर्ण पक्ष रहा है। इसमें राजा भले ही कोई कैसे भी बना हो वह प्रजा के प्रति निजी रूप से संवेदनशील रहता था-कुछ अपवादों को छोड़ना ही ठीक रहेगा। आधुनिक लोकतंत्र में भले ही राजा का चुनाव जनता करती हो पर वह निजी रूप से संवेदनशील हो यह जरूरी नहीं है। राज्य कर्म से जुड़ने वाले जनता का मत लेने के लिये प्रयास करते हैं। इस दौरान उनका अनाप शनाप पैसा खर्च होता है जो अंततः धनवानों से ही लिया जाता है जिनको राजकीय रूप से फिर उपकृत करना पड़ता है। उनको अपनी कुर्सी जनता की नहीं धन की देन लगती है। बस, यहीं से भ्रष्टाचार का खेल प्रारंभ हो जाता है।
अब जो देश की स्थिति है उसमें हम आधुनिक लोकतंत्र से पीछे नहीं हट सकते पर व्यवस्था में बदलाव के लिये यह जरूरी है कि राज्य पर समाज का दबाव कम हो। यह तभी संभव है जब समाज की सामान्य व्यवस्था में राजकीय हस्तक्षेप कर हो। सबसे बड़ी बात यह है कि हमें अपना पूरा संविधान फिर से लिखना होगा। पहले तो यह निश्चय करना होगा कि जो अंग्रेजों ने कानून बनाये उनको पूरी तरह से खत्म करें। अंग्रेजों ने हमारे संविधान के कई कानून इसलिये बनाये थे जिससे कि वह यहां के लोगों को नियंत्रण में रख सकें। वह यहां के समाज में दमघोंटू वातावरण बनाये रखना चाहते थे जबकि उनका समाज खुले विचारों में सांस लेता है। उनके जाने के बाद भारत का संविधान बना पर उसमें अंग्रेजों के बनाये अनेक कानून आज भी शामिल हैं। सीधी बात कहें तो यह कि समाज में राज्य का हस्तक्षेप कम होना चाहिये। भारतीय संविधान की व्यवस्था ऐसी है कि उसकी किताबों की पूरी जानकारी बड़े बड़े से वकील को भी तब होती है जब संबंधित विषय पर पढ़ता है। उसी संविधान की हर धारा की जानकारी आम आदमी होना अनिवार्य माना गया है। अनेक प्रकार के कर जनता पर लगाये गये हैं पर राजकीय संस्थाओं के लिये आम जनता के प्रति कोई दायित्व अनिवार्य और नियमित नहीं है। केंद्रीय सरकार को जनता के प्रति सीधे जवाबदेह नहंी बनाया जा सकता। कुछ हद तक राज्य की संस्थाओं को भी मुक्ति दी जा सकती है पर स्थानीय संस्थाओं के दायित्वों को कर वसूली से जोड़ा जाना चाहिये। इतना ही स्थानीय संस्थाओं में कार्यरत अधिकारियों और कर्मचारियों की जनता के प्रति सीधी जवाबदेही तय होना चाहिये। प्रशासनिक व्यवस्थाओं से अलग जनसुविधाओं वाले विभागों को-स्वास्थ्य, शिक्षा तथा परिवहन-जनोन्मुखी बनाया जाना न कि धनोन्मुखी।
सबसे बड़ी बात यह है कि सभी प्रकार के करों की समीक्षा कर उनकी दरों का मानकीकरण होना चाहिये। जनता से सीधे जुड़े काम होने की निर्धारित अवधि तय की जाना चाहिये-इस मामले में हाल ही में मध्यप्रदेश सरकार के उठाये गये कदम प्रशंसनीय है। कहने का अभिप्राय यह है कि जब लोकतंत्र है तो सरकार की शक्ति को लोगों से अधिक नहीं होना चाहिये। आखिरी बात यह कि भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिये वर्तमान व्यवस्था में बदलाव की बात सोची जानी चाहिये। यह भारी चिंतन का काम है पर इसके बिना काम भी नहीं चलने वाला। खाली नारे लगाने से कुंछ नहीं होगा।
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Tuesday, November 30, 2010

कौन मानेगा कि भूख इंसान को गद्दार बनाती है-हिन्दी लघु व्यंग्य (bhookh aur gaddari-hindi laghu vyangya)

प्रगतिशील और जनवादी कवियों की सामाजिक तथा राजनीतिक कविताओं पर वाहवाही कितनी भी मिलती हो पर तार्किक रूप से उनका कोई आधार नहीं होता। खासतौर से जब वह भूख, गरीबी और लाचारी से त्रस्त लोगों से क्रांति की आशा करते हैं। इतिहास के उद्धरण देकर सोये समाज को जगाने के लिये मज़दूर और गरीब को नायक बनने के लिये प्रेरित करते हैं। संभव है कुछ लोग इस बात पर नाराज हो जायें पर हमारे देश के बुद्धिजीवियों, लेखकों और अंग्रेजी शिक्षा से पढ़े लोगों ने आधुनिक युग के कुछ महानायक गढ़ लिये हैं उनके रास्ते पर चलने का दावा करते हैं। उनकी कवितायें खोखली तो निबंध कबाड़ हैं। यह बात गुस्से या निराशा में लिखी गयी हैं पर इस भय से मुक्त होकर कि जब बेईमानी और भ्रष्टाचार इस तरह खुलेआम हो रहा है और यह बुद्धिजीवी अभी भी अपनी लकीर पीट रहे हैं तब हमारा क्या कर लेंगे? इतिहास खोद रहे हैं जबकि वह एक भूलभुलैया है। दरअसल यह बात लिखने से पहले कवि नीरज की काव्यात्मक पंक्तियां दिमाग में आयी थीं जिसे शैक्षणिक पाठ में एक निबंध में पढ़ा और जिसे परीक्षा में उत्तरपुस्तिका में भी लिखा था। जहां तक हमारी स्मरण शक्ति जाती है उस पंक्ति के बाद ही लिखने के लिये कलम उठाई थी। आज उस कविता का आधा हिस्सा झूठ लगता है और लिखने के लिये ऐसी उत्तेजना पैदा हो रही है कि लगता है कि हिन्दी का आधुनिक और उत्तर आधुनिक काल केवल भ्रमवश ही चलता रहा है। याद्दाश्त के आधार पंक्तियां यह हैं।
तन की हवस मन को गुनाहगार बना देती है,
बाग को उजाड़ बना देती है,
ओ भूखे को देशभक्ति का उपदेश देने वालों
भूख इंसान को गद्दार बना देती है।
कवि नीरज की यह कविता उस समय बहुत अच्छी लगी थी।
एक अन्य कविता की पंक्तियां है जो शायद रघुवीर सहाय या राजेन्द्र यादव की हो सकती है जिसने हम पर बहुत प्रभाव डाला था।
हमसे तो यह धूल ही अच्छी
जो कुचले जाने पर प्रतिरोध तो करती है।
यहां बात कवि नीरज जी काव्यात्मक पंक्तियों की करें। तन की हवस मन को गुनाहगार बना देती है। यह सच लगता है मगर भूख इंसान को गद्दार बना देती है, इन पर एतराज है।
हम पिछले कई दिनों से देश के साथ गद्दारी करने के आरोप में पकड़े गये लोगों की बात करते हैं। इनमें से कोई भूखा नहीं है। एक तो पाकिस्तान में ही विदेश सेवा में कार्यरत एक महिला पकड़ी गयी जो वहां के सैन्य अधिकारी से प्रेम की पीगें बढ़ा रही थी। संभव है तन की हवस ने गुनाहगार बनाया हो पर उसने भी वहां पैसा कमाया जो शायद उसका मुख्य उद्देश्य था। हालांकि अब भी यह कहना कठिन है कि तन की हवस ने ऐसा किया या पैसे की लालच ने। मगर वह रोटी की भूखी नहीं थी। कम से नीरज जी की यह पंक्तियां वहां ठीक नहीं बैठती। अभी एक भारतीय प्रशासनिक सेवा का अधिकारी (आई. ए. एस.) भी एक अधिकारी पकड़ा गया। वह भी कौन? जिस पर देश की आंतरिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण दायित्व था। वह भी लड़कियों की मांग करता था। लगता है जैसे कि तन की हवस ने गुनाहगार बनाया मगर उसने पैसा भी कमाया और यही उसका ध्येय था। शारीरिक भूख से अधिक पैसे की लालच ने ही उसे देश की गद्दारी करने के लिये प्रेरित किया। पैसा हो तो शारीरिक हवस मिट ही जाती है इसलिये यह कहना बेकार है कि उन्होंने केवल यौन लाभ के लिये यह सब किया। इससे पहले भी एक अधिकारी पकड़ा गया जिस पर गोपनीय दस्तावेज लीक करने का आरोप लगा।
कोई बतायेगा कि किसी रोटी के भूखे ने देश से गद्दारी की हो। जरा, कोई बतायेगा कि किसी ने रोटी के लिये किसी का कत्ल किया हो! माओवाद के नाम पर चल रही हिंसा का समर्थन करने वाले वहां के क्षेत्रों की भूख और बेकारी की समस्याओं की बहुत आड़ लेते हैं। वह बताते हैं कि भूख की वजह से पूर्व में लोग हथियार उठा रहे हैं। जब उनसे कहा जाता है कि हथियार उठाने वाले तो भूखे नहीं है तो जवाब मिलता है कि वह भूखे नंगों को बचाने के लिये प्रेरित हुए हैं इसलिये हथियार उठाये हैं।
कौन बताये कि हमारे धर्मग्रंथों में एक सीता जी भी हुईं हैं जिन्होंने अपने पति भगवान श्रीराम को बताया था कि हथियार रखने से मन में हिंसा का भाव स्वतः आता है।
उन्होंने भगवान श्री राम को एक किस्सा सुनाया। एक तपस्वी की तपस्या से देवराज इंद्र विचलित हो गये तब उन्होंने उसके पास जाकर उससे कहा कि ‘मेरा यह खड्ग अपने पास धरोहर में रूप में रख लो कुछ दिन बाद ले जाऊंगा।’
तपस्वी ने रख लिया। चूंकि देवराज इंद्र बहुत प्रतिष्ठित थे इसलिये वह तपस्वी उस खड्ग की रक्षा मनोयोग से करने लगा। धीरे धीरे उसका मन तपस्या से अधिक उस खड्ग में लग गया और अंततः वह तपस्वी से हिंसक जीव बन गया। इससे तो यही आशय निकलता है कि जब हथियार रखने भर से ही तपस्वी का हृदय बदल गया तो जो यह आम माओवादी बंदूकें या बम होने पर देवता बने रह सकते हैं। तय बात है कि इससे वह वहीं अपने ही लोगों को आतंकित करते होंगे।
प्रगतिशील और जनवादियों ने भूख पर बहुत लिखा है। भूख में क्रांति की तलाश करते हुए इन लोगों पर अब तरस आने लगा है। उन पर ही नहीं अपने पर भी अब नाराजगी होने लगी है कि क्यों उनसे प्रभावित हुए। भूखा आदमी तो धीरे धीरे शारीरिक रूप से कमजोर हो जाता है और मानसिक रूप से उसकी स्थिति यह हो जाती है कि पत्थर भी उसको रोटी लगती है। इतना ही नहीं वह घास भी खाने लगता है। वह इतना अशक्त हो जाता है कि चोरी करना और कत्ल करने की सोचना भी उसके लिये मुश्किल हो जाता है। हालांकि हमारे बुजुर्ग कहते थे कि भूख आदमी शेर से भी लड़ जाता है पर अब उस पर यकीन नहीं होता।
देश में बरसों से भूख, गरीबी, बेरोजगारी और शोषण दूर करने का अभियान चल रहा है मगर उसका प्रभाव नहीं दिखता और अनेक बुद्धिजीवी इस पर रोते गाते हैं। यह अलग बात है कि इस पर इनाम के लिये वह राज्य और पूंजीपतियों से उनको सम्मान मिलता है-वह पूंजीपति जिन पर देश के गरीब रहने का आरोप लगाते हैं। ऐसे लोग केवल झूठ बेचते हैं। भूख से गद्दारी पैदा होने का भ्रम अब दिखने लगा है। जिनके पेट भरे हैं, जिनके पास सारे सुविधायें पहले से ही हैं। रोजगार की दृष्टि से ऐसे पद कि बेरोजगार ही नहीं बल्कि बारोजगारों के लिये भी एक क सपना हो। ऐसे में वह गद्दारी कर रहे हैं। तब कौन कहता है कि भूख इंसान को गद्दार बनाती है और कौन इसे मानेगा?
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Friday, April 23, 2010

मोटर साइकिल, मोबाईल और मां-बहिनःहिन्दी आलेख (motor cycle, mobil and mother -sister:hindi article

गरमी के दिनों में शाम को पार्क जाना अच्छा लगता है। दिन भर पंखे तथा कूलर की कृत्रिम सर्दी शरीर में उमस पैदा कर देती है। फिर दिन भर चाहरदीवारी में गर्मी की उष्मा से परे देह में बैठा मन कहीं अन्यत्र ऐसी जगह जाने को करता है जहां प्रकृति की थोड़ी अधिक कृपा हो। मन को न तो गर्मी लगती है न सर्दी! उसका सामना तो देह ही करती है पर मन एक जगह खड़ा नहीं रह सकता वह उसे भगाता है।
उस दिन हमारे एक मित्र अपना किस्सा सुना रहे थे। उनके अनुसार शाम को पार्क में ऐसा कोई दिन नहीं आता जब किसी ऐसे शख्स को देखने का सौभाग्य न मिलता हो जो मोबाईल पर गालियां न बकता हो।
उनके अनुसार कई कई लड़के तो पचास शब्दों में चालीस गालियों सें भरते हैं तो अनेक के वार्तालाप में दस गालियों के बाद उनका कोई एक सार्थक शब्द आता है जिसका मतलब समझा जा सके। कभी कभी तो लगता है कि उनके ‘वार्तालाप समय के मूल्य का अधिकतर हिस्सा गालियां पर खर्च होता होगा।

उस दिन अवकाश के दिन हम अपने एक मित्र के साथ एक पार्क में गये। दरअसल वह मित्र वहां चल रहे एक धार्मिक कार्यक्रम में शामिल होने आये थे पर वह उनको वहां मजा नहीं आया। वह बाहर निकले तो हमसे सामना हो गया। जब हमने उनको बताया कि पार्क में घूमने जा रहे हैं तो वह भी साथ हो लिये। अंदर घुसते ही हमारे कानों में क्रूरतम गालियां सुनाई दीं। अरे, बाप रे! लोग दूसरे की मां बहिनों को क्या समझते हैं!
संभवत लड़का लाईन पर मौजूद व्यक्ति की बजाय किसी तीसरे पक्ष को गााली दे रहा था। ‘हारे हुए पैसे’ शब्द भी सुनाई दिये। मित्र ने कहा-‘कहीं, यह क्रिकेट पर सट्टा लगाने वाला आदमी तो नहीं है।’
उसकी बात पूरी भी नहंी हो पायी कि एक सज्जन वहां से निकले और हमारी तरफ देखते हुए बोले-‘देखिए, अपने देश का आदमी कितना पागल हो जाता है। वह लड़का कैसे जोर जोर से गालियां बक रहा है। उसे लग रहा है कि पार्क उसके पिताजी ने अकेले उसके लिये बनाकर दिया है।’
हम दोनों मुस्करा दिये। हमारे मित्र ने कहा-‘लगता है कि तुम्हारा ब्लाग पढ़ता है! इसलिये मोटर साइकिल वाला शब्द मोबाईल पर चिपका कर गया है।’
दरअसल हमारा वह मित्र ब्लाग नहीं पढ़ता पर उसका अनुमान रहा था कि ऐसा वाक्य हमने कहीं लिखा जरूर लिखा होगा। इस लेखक के एक व्यंग्य में पिता अपने पुत्र से कहता है कि ‘बेटा, याद रखना मैंने तुम्हें मोटर साइकिल खरीद कर दी है, पर यह सड़क मेरी नहीं है।’
हमारा यह व्यंग्य उसने पढ़ा था। इसका आशय यही था कि लड़के मोटर साइकिलों पर ऐसे चलते हैं जैसे कि उनके पालकों ने गाड़ी के साथ सड़क भी खरीद कर दी हो जिस पर उनको अकेले चलने का अधिकार प्राप्त है।
उसी मित्र के साथ हम पार्क के दूसरे हिस्से में गये। वहां एक अन्य युवक भी दनादन गालियां बके जा रहा था। हमने देखा उसके पास भी मोबाइल है। मां बहिन कितना अच्छा शब्द है पर उनके साथ गालियां जोड़ना बड़ा भयानक है। शायद लोगों को मोबाइल और मोटर साइकिल की तरह यही लगता है कि हमारी मां बहिन ही मां बहिन हैं बाकी के लिये चाहे जो बक दो। उस लड़के के गालियां बकने के दौरान ही उसके पास से दो युवतियों के साथ एक महिला भी निकल रही थी। उसके कटु स्वर उन्होंने भी सुने।
थोड़ी दूर जाकर एक युवती ने अपनी संगिनियों से कहा-‘यहां भी गंदे लोग पहुंच ही जाते हैं।
महिला ने कहा-‘क्या करें, घर पर अपनी मां बहिन के सामने गालियां बक नहीं सकता। रास्ते में कोई दूसरा सुन लेगा तो टोक देगा। इसलिये पार्क में आया है गालियां देने।’
उन तीनों नारियों की आंखों में नफरत झलक रही थी जो वहां मौजूद ठंडक में भी झुलसा देने वाली लगी। ऐसा लगा कि जेठ की गरम दोपहर की तपिश भी इससे कम होगी। सच कहते हैं कि कटु वाणी तकलीफदेह होती है चाहे भले ही वह आपसे न बोली गयी हो। प्रसंगवश वह लड़का भी किसी तीसरे पक्ष को गालियां दे रहा था। मतलब सामने किसी की हिम्मत नहीं होती गाली देने की। हर कोई एक दूसरे के लिये पीछे ही बकता है।
कहीं सुनने में आता है कि ‘मैंने उससे ढेर सारी गालियां सुनाई।’ भले ही प्रत्यक्ष उसने गाली न सुनाई हो।
इन सबका फायदा किसे है! टेलीफोन कंपनियों को चिंता नहीं करना चाहिए। भारत में मां बहिन की गालियां देने वाले बहुत हैं इसलिये उनका धंधा कभी मंदा नहीं हो सकता। अब यह आंकलन कौन कर सकता है कि टेलीफोन कंपनियों की आय में इन गालियों का योगदान कितना है?
एक किस्सा आज मोटर साइकिल का भी नज़र आया। एक लड़की पास से दुपहिया पर निकली थी। हमारा ध्यान नहीं जाता अगर उसी समय पास से ही मोटर साइकिल पर गुज़र रहे दो लड़कों ने उस पर फिकरा कसा नहीं होता।
लड़के आगे निकले क्योंकि उनकी मोटर साइकिल तो उड़ रही थी। फिर उन्होंने गति कम की। लड़की फिर आगे निकली तो फिर उसके पास से तेजी से निकले। सड़क पर दूसरे भी वाहन चल रहे थे। कहीं मोटर साइकिल फंसी या फिर लड़कों ने खुद गति कम की। शायद दो किलोमीटर तक ऐसा हुआ होगा। आखिर लड़की सड़क के दायीं गली में मुड़ी जहां शायद उसे पहले नंबर के मकान में जाना था। वहां रुककर उसने लड़कों को घूर कर देखा तो वह बहुत तेजी से वहां से भाग गये।
पूरे प्रसंग में लड़कों की मनस्थिति आश्चर्यजनक लग रही थी। वह क्या किसी फिल्म का काल्पनिक अभिनय कर रहे थे जिसमें नायक ही ऐसी हरकतें कर सकते हैं। उनको दूसरे लोग दिख ही नहीं रहे थे। सच है सुविधायें आदमी को अक्ल ही अंधा बना देती हैं अलबत्ता गूंगा और बहरा भी बनाती।
आंखों से मतलब के अलावा कुछ दिखता नहीं। बोलता ऐसी बात है जो समझ में नहीं आती और सुनता कुछ दूसरा है समझता दूसरा है। अपने भारत में अधिकतर लोग सुंविधाओं को भोगना नहंी बल्कि लूटना चाहते हैं-यह अलग बात है कि दूसरे को ऐसा करते हुए देखकर मन वितृष्णा से भर जाता है-‘उसकी शर्ट मेरी शर्ट से सफेद कैसे’ की तर्ज पर।
सच है खाना पचने की दवाईयां हैं, पर सुविधाएं पचा सके ऐसा कोई दवा नहीं बनी। सबसे बड़ी बात यह है कि नैतिकता और मधुर वाणी सिखा सके ऐसी कोई किताब ही न बनी। दूसरी बात यह कि इस संस्कारहीनता के लिये जिम्मेदारी किस पर डाली जानी चाहिये।
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Wednesday, December 10, 2008

मोहब्बत है विज्ञापन के लिए-व्यंग्य कविता

जगह-जगह नारे लगेंगे
आज प्यार के नारे
बाहर ढूंढेंगे प्यार घर के दुलारे
प्यार का दिवस वही मनाते
जो प्यार का अर्थ संक्षिप्त ही समझ पाते
एक कोई साथी मिल जाये जो
बस हमारा दिल बहलाए
इसी तलाश में वह चले जाते

बदहवास से दौड़ रहे हैं
पार्क, होटल और सड़क पर
चीख रहे हैं
बधाई हो प्रेम दिवस की
पर लगता नहीं शब्दों का
दिल की जुबान से कोई हो वास्ता
बसता है जो खून में प्यार
भला क्या वह सड़क पर नाचता
अगर करे भी कोई प्यार तो
भला होश खो चुके लोग
क्या उसे समझ पाते
प्यार चाहिऐ और दिलदार चाहिए के
नारे लगा रहे
पर अक्ल हो गयी है भीड़ की साथी
कैसे होगी दोस्त और दुश्मन की पहचान
जब बंद है दिमाग से दिल की तरफ
जाने का रास्ता
अँधेरे में वासना का नृत्य करने के लिए
प्यार का ढोंग रचाते
यह प्यार है बाजार का खेल
शाश्वत प्रेम का मतलब
क्या वाह जानेंगे जो
विज्ञापनों के खेल में बहक जाते

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Monday, November 24, 2008

धड़कनों और जज्बातों का अहसास न था-हिंदी शायरी

चले थे हम अपने इस अनजान पथ पर
न मंजिल का पता था
न मकसद का
लोगों ने किये कई सवाल
जिनका जवाब नहीं था

क्योंकि जहां जिंदगी चलती है
दौलत कमाने के वास्ते
वहां बिकते है सभी रास्ते
जहां चाहता है इंसान शौहरत अपने लिये
वहां तैयार हो जाता है समझौतों के लिये
जहां ख्वाहिश है महल पाने की
वहां भला कौन करता है फिक्र करता जमाने की
जिसके दिल में ख्याल है
खुली आंखों से देखना जिंदगी को
वह जमाने से अलग हो जाते
चलते लगते हैं सबके साथ रास्ते पर
पर जमीन की हर चीज में अपन ख्याल नहीं लगाते
पत्थर और पैसों में जज्बात ढूंढने वाले
भला कब खुश रह पाते
हमने भी देख लिया
छूकर हर शय को
जिन पर मर मिटता है जमाना
कोशिश करता है हर चीज में खुद ही समाना
चमकती लगी हर शय
जिसमें दिल लगा लिया लोगों ने
हम दूर होकर चलते रहे अपने रास्ते पर
क्योंकि उनमें धड़कनों और जज्बातों का अहसास न था

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