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Friday, April 23, 2010

मोटर साइकिल, मोबाईल और मां-बहिनःहिन्दी आलेख (motor cycle, mobil and mother -sister:hindi article

गरमी के दिनों में शाम को पार्क जाना अच्छा लगता है। दिन भर पंखे तथा कूलर की कृत्रिम सर्दी शरीर में उमस पैदा कर देती है। फिर दिन भर चाहरदीवारी में गर्मी की उष्मा से परे देह में बैठा मन कहीं अन्यत्र ऐसी जगह जाने को करता है जहां प्रकृति की थोड़ी अधिक कृपा हो। मन को न तो गर्मी लगती है न सर्दी! उसका सामना तो देह ही करती है पर मन एक जगह खड़ा नहीं रह सकता वह उसे भगाता है।
उस दिन हमारे एक मित्र अपना किस्सा सुना रहे थे। उनके अनुसार शाम को पार्क में ऐसा कोई दिन नहीं आता जब किसी ऐसे शख्स को देखने का सौभाग्य न मिलता हो जो मोबाईल पर गालियां न बकता हो।
उनके अनुसार कई कई लड़के तो पचास शब्दों में चालीस गालियों सें भरते हैं तो अनेक के वार्तालाप में दस गालियों के बाद उनका कोई एक सार्थक शब्द आता है जिसका मतलब समझा जा सके। कभी कभी तो लगता है कि उनके ‘वार्तालाप समय के मूल्य का अधिकतर हिस्सा गालियां पर खर्च होता होगा।

उस दिन अवकाश के दिन हम अपने एक मित्र के साथ एक पार्क में गये। दरअसल वह मित्र वहां चल रहे एक धार्मिक कार्यक्रम में शामिल होने आये थे पर वह उनको वहां मजा नहीं आया। वह बाहर निकले तो हमसे सामना हो गया। जब हमने उनको बताया कि पार्क में घूमने जा रहे हैं तो वह भी साथ हो लिये। अंदर घुसते ही हमारे कानों में क्रूरतम गालियां सुनाई दीं। अरे, बाप रे! लोग दूसरे की मां बहिनों को क्या समझते हैं!
संभवत लड़का लाईन पर मौजूद व्यक्ति की बजाय किसी तीसरे पक्ष को गााली दे रहा था। ‘हारे हुए पैसे’ शब्द भी सुनाई दिये। मित्र ने कहा-‘कहीं, यह क्रिकेट पर सट्टा लगाने वाला आदमी तो नहीं है।’
उसकी बात पूरी भी नहंी हो पायी कि एक सज्जन वहां से निकले और हमारी तरफ देखते हुए बोले-‘देखिए, अपने देश का आदमी कितना पागल हो जाता है। वह लड़का कैसे जोर जोर से गालियां बक रहा है। उसे लग रहा है कि पार्क उसके पिताजी ने अकेले उसके लिये बनाकर दिया है।’
हम दोनों मुस्करा दिये। हमारे मित्र ने कहा-‘लगता है कि तुम्हारा ब्लाग पढ़ता है! इसलिये मोटर साइकिल वाला शब्द मोबाईल पर चिपका कर गया है।’
दरअसल हमारा वह मित्र ब्लाग नहीं पढ़ता पर उसका अनुमान रहा था कि ऐसा वाक्य हमने कहीं लिखा जरूर लिखा होगा। इस लेखक के एक व्यंग्य में पिता अपने पुत्र से कहता है कि ‘बेटा, याद रखना मैंने तुम्हें मोटर साइकिल खरीद कर दी है, पर यह सड़क मेरी नहीं है।’
हमारा यह व्यंग्य उसने पढ़ा था। इसका आशय यही था कि लड़के मोटर साइकिलों पर ऐसे चलते हैं जैसे कि उनके पालकों ने गाड़ी के साथ सड़क भी खरीद कर दी हो जिस पर उनको अकेले चलने का अधिकार प्राप्त है।
उसी मित्र के साथ हम पार्क के दूसरे हिस्से में गये। वहां एक अन्य युवक भी दनादन गालियां बके जा रहा था। हमने देखा उसके पास भी मोबाइल है। मां बहिन कितना अच्छा शब्द है पर उनके साथ गालियां जोड़ना बड़ा भयानक है। शायद लोगों को मोबाइल और मोटर साइकिल की तरह यही लगता है कि हमारी मां बहिन ही मां बहिन हैं बाकी के लिये चाहे जो बक दो। उस लड़के के गालियां बकने के दौरान ही उसके पास से दो युवतियों के साथ एक महिला भी निकल रही थी। उसके कटु स्वर उन्होंने भी सुने।
थोड़ी दूर जाकर एक युवती ने अपनी संगिनियों से कहा-‘यहां भी गंदे लोग पहुंच ही जाते हैं।
महिला ने कहा-‘क्या करें, घर पर अपनी मां बहिन के सामने गालियां बक नहीं सकता। रास्ते में कोई दूसरा सुन लेगा तो टोक देगा। इसलिये पार्क में आया है गालियां देने।’
उन तीनों नारियों की आंखों में नफरत झलक रही थी जो वहां मौजूद ठंडक में भी झुलसा देने वाली लगी। ऐसा लगा कि जेठ की गरम दोपहर की तपिश भी इससे कम होगी। सच कहते हैं कि कटु वाणी तकलीफदेह होती है चाहे भले ही वह आपसे न बोली गयी हो। प्रसंगवश वह लड़का भी किसी तीसरे पक्ष को गालियां दे रहा था। मतलब सामने किसी की हिम्मत नहीं होती गाली देने की। हर कोई एक दूसरे के लिये पीछे ही बकता है।
कहीं सुनने में आता है कि ‘मैंने उससे ढेर सारी गालियां सुनाई।’ भले ही प्रत्यक्ष उसने गाली न सुनाई हो।
इन सबका फायदा किसे है! टेलीफोन कंपनियों को चिंता नहीं करना चाहिए। भारत में मां बहिन की गालियां देने वाले बहुत हैं इसलिये उनका धंधा कभी मंदा नहीं हो सकता। अब यह आंकलन कौन कर सकता है कि टेलीफोन कंपनियों की आय में इन गालियों का योगदान कितना है?
एक किस्सा आज मोटर साइकिल का भी नज़र आया। एक लड़की पास से दुपहिया पर निकली थी। हमारा ध्यान नहीं जाता अगर उसी समय पास से ही मोटर साइकिल पर गुज़र रहे दो लड़कों ने उस पर फिकरा कसा नहीं होता।
लड़के आगे निकले क्योंकि उनकी मोटर साइकिल तो उड़ रही थी। फिर उन्होंने गति कम की। लड़की फिर आगे निकली तो फिर उसके पास से तेजी से निकले। सड़क पर दूसरे भी वाहन चल रहे थे। कहीं मोटर साइकिल फंसी या फिर लड़कों ने खुद गति कम की। शायद दो किलोमीटर तक ऐसा हुआ होगा। आखिर लड़की सड़क के दायीं गली में मुड़ी जहां शायद उसे पहले नंबर के मकान में जाना था। वहां रुककर उसने लड़कों को घूर कर देखा तो वह बहुत तेजी से वहां से भाग गये।
पूरे प्रसंग में लड़कों की मनस्थिति आश्चर्यजनक लग रही थी। वह क्या किसी फिल्म का काल्पनिक अभिनय कर रहे थे जिसमें नायक ही ऐसी हरकतें कर सकते हैं। उनको दूसरे लोग दिख ही नहीं रहे थे। सच है सुविधायें आदमी को अक्ल ही अंधा बना देती हैं अलबत्ता गूंगा और बहरा भी बनाती।
आंखों से मतलब के अलावा कुछ दिखता नहीं। बोलता ऐसी बात है जो समझ में नहीं आती और सुनता कुछ दूसरा है समझता दूसरा है। अपने भारत में अधिकतर लोग सुंविधाओं को भोगना नहंी बल्कि लूटना चाहते हैं-यह अलग बात है कि दूसरे को ऐसा करते हुए देखकर मन वितृष्णा से भर जाता है-‘उसकी शर्ट मेरी शर्ट से सफेद कैसे’ की तर्ज पर।
सच है खाना पचने की दवाईयां हैं, पर सुविधाएं पचा सके ऐसा कोई दवा नहीं बनी। सबसे बड़ी बात यह है कि नैतिकता और मधुर वाणी सिखा सके ऐसी कोई किताब ही न बनी। दूसरी बात यह कि इस संस्कारहीनता के लिये जिम्मेदारी किस पर डाली जानी चाहिये।
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कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Monday, July 28, 2008

वेदना बेचने और संवेदना खरीदने का व्यापार-हिंदी शायरी

कुछ लोग होते हैं पर
कुछ दिखाने के लिये बन जाते लाचार
अपनी वेदना का प्रदर्शन करते हैं सरेआम
लुटते हैं लोगों की संवेदना और प्प्यार
छद्म आंसू बहाते
कभी कभी दर्द से दिखते मुस्कराते
डाल दे झोली में कोई तोहफा
तो पलट कर फिर नहीं देखते
उनके लिये जज्बात ही होते व्यापार

घर हो या बाहर
अपनी ताकत और पराक्रम पर
इस जहां में जीने से कतराते
सजा लेते हैं आंखों में आंसु
और चेहरे पर झूठी उदासी
जैसे अपनी जिंदगी से आती हो उबासी
खाली झोला लेकर आते हैं बाजार
लौटते लेकर घर दानों भरा अनार

गम तो यहां सभी को होते हैं
पर बाजार में बेचकर खुशी खरीद लें
इस फन में होता नहीं हर कोई माहिर
कामयाबी आती है उनके चेहरे पर
जो दिल में गम न हो फिर भी कर लेते हैं
सबके सामने खुद को गमगीन जाहिर
कदम पर झेलते हैं लोग वेदना
पर बाहर कहने की सोच नहीं पाते
जिनको चाहिए लोगों से संवेदना
वह नाम की ही वेदना पैदा कर जाते
कोई वास्ता नहीं किसी के दर्द से जिनका
वही बाजार में करते वेदना बेचने और
संवेदना खरीदने का व्यापार
.........................................................
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Saturday, July 26, 2008

जब तक बाजार में बिकेगी सनसनी-हिंदी शायरी

खबर केवल खबर हो तो
कौन लिखता और कौन पढ़ता है
देखते और पढ़ते हैं सभी खबर वही
जिससे फैलती हो सनसनी
लिखने से खबर नहीं बनती
बेअसर रहते हैं शब्द तब
नहीं फैलती जब सनसनी

खबरफरोश ढूंढते खबर ऐसी
जो हिला दे पढ़ने वालों को
तोड़ दे जज्बातों के तालों को
भूखे का भूखा रहना
प्यासे का पानी के लिये तरसना
कोई खबर नहीं होती
मिलती है उनको भी जगह
जब कहीं नहीं फैली हो सनसनी

घायल आदमी अस्पताल में चिल्लाता
पर कोई उसका हमदर्द नहीं आता
भीड़ लग जाती है दर्द सहलाने वालों की
अगर उसके जख्मों में से
बहती हो खून के साथ सनसनी
लोगों के दिल और दिमाग में
भर गया है शोर चारों तरफ
पर कोई नहीं देता उसकी तरफ कान
उसमें नहीं होता किसी को सनसनी का भान
जब तक तड़प कर मर न जाये आदमी
नहीं फैलती जमाने में सनसनी

ढूंढते हुए खबर जब
पहुंचते हैं अपने मुकान पर खबरफरोश
तब उसमें न भी हो तो
पैदा कर देते सनसनी
कभी कभी उनको बैठे बिठाये
दहशत के सौदागर
जो फैले हैं चारों तरफ
कभी-कभी भिजवा देते उनके पास
बमों के धमाके कर सनसनी
सड़कों पर जलती बस
बिखरा हुआ निर्दोषों का खून
कांपते हुए चेहरों का देखकर
फैलती है दहशत
बिकती है तब सनसनी
तब तक जारी रहेगा यह सिलसिला
जब तक बाजार में बिकेगी सनसनी
.......................................................................
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Monday, July 21, 2008

अपने अहसास अपने से छिपाते हो-हिंदी शायरी

इस भीड़ में तुम क्यों

अपनी आवाज जोड़ कर

शोर मचाते हो

लोगों के कान खुले लगते हैं

पर बंद पर्दे उनके तुम

अपनी आंखों से भला कहां देख पाते हो

कौन सुनेगा तुम्हारी कहानी

किसे तुम अपना दर्द सुनाते हो

सड़क पर जमा हों या महफिल में

लोग बोलने पर हैं आमादा

अपनी असलियत सब छिपा रहे हैं

भल तुम क्यों छिपाते हो

तुम्हें लगता है कोई देख रहा है

कोई तुम्हारी सुन रहा है

पर क्या तुम वही कर रहे हो

जिसकी उम्मीद दूसरों से कर रहे हो

भला क्यों अपने अहसास अपने से छिपाते हो
.........................................

दीपक भारतदीप लेखक संपादक

Wednesday, July 16, 2008

प्यार में भी भला कभी वादे किये जाते हैं-हिंदी शायरी

जन्नत में बिताने के लिये सुहानी रात
आसमान से चांद सितारे तोड़कर लाने की बात
प्यार के संदेश देने वाले ऐसे ही
किये जाते हैं
बातों पर कर ले भरोसा
शिकार यूं ही फंसाये जाते हैं
प्यार किस चिडिया का नाम
कोई नहीं जान पाया
रोया वह भी जिसने प्यार का फल चखा
तरसा वह भी जिसने नहीं खाया
प्यार का जो गीत गाते
कोई ऊपर वाले का तो
कोई जमीन पर बसी सूरतों के नाम
अपनी जुबान पर लाते
कोई नाम को योगी
तो कोई दिल का रोगी
धोखे को प्यार की तरह तोहफे में देते सभी
जो भला दिल में बसता है
किसी को कैसे दिया जा सकता है
सर्वशक्तिमान से ही किया जा सकता है
उस प्यार के में भी भला
कभी वादे किये जाते हैं
....................................
दीपक भारतदीप

Sunday, July 13, 2008

जिंदगी में असहज हो जाओगे-हिन्दी शायरी



जितना चाहोगे

उतना असहज हो जाओगे

दौड़ते हुए बहुत कुछ जुटा लोगे

अपने जीने का सामान

पर फिर उसका बोझ नहीं

उठा पाओगे

जिंदगी की गति चलती है

अपनी गति से

उसे ज्यादा तेज दौड़ने की कोशिश न करो

असहजता में जो पाया है

उसको भी नहीं भोग पाओगे
........................
दीपक भारतदीप

Monday, July 7, 2008

दूसरे के दर्द में ढूंढते सुगंध-हिंदी शायरी

शहर-दर-शहर घूमता रहा

इंसानों में इंसान का रूप ढूंढता रहा

चेहरे और पहनावे एक जैसे

पर करते हैं फर्क करते दिखते

आपस में ही एक दूसरे से

अपने बदन को रबड़ की तरह खींचते

हर पल अपनी मुट्ठियां भींचते

अपने फायदे के लिये सब जागते मिले

नहीं तो हर शख्स ऊंघता रहा

अपनी दौलत और शौहरत का

नशा है

इतराते भी उस बहुत

पर भी अपने चैन और अमने के लिये

दूसरे के दर्द से मिले सुगंध

हर इंसान इसलिये अपनी

नाक इधर उधर घुमाकर सूंघता रहा
.................................
दीपक भारतदीप

Wednesday, July 2, 2008

अपने अंदर ढूंढे, मिलता तभी चैन है-हिंदी शायरी

घर भरा है समंदर की तरह
दुनियां भर की चीजों से
नहीं है घर मे पांव रखने की जगह
फिर भी इंसान बेचैन है

चारों तरफ नाम फैला है
जिस सम्मान को भूखा है हर कोई
उनके कदमों मे पड़ा है
फिर भी इंसान बेचैन है

लोग तरसते हैं पर
उनको तो हजारों सलाम करने वाले
रोज मिल जाते हैं
फिर भी इंसान बेचैन है

दरअसल बाजार में कभी मिलता नहीं
कभी कोई तोहफे में दे सकता नहीं
अपने अंदर ढूंढे तभी मिलता चैन है
---------------------

Monday, June 30, 2008

बांट लेते हैं रौशनी भी-हिंदी शायरी


कभी तृष्णा तो कभी वितृष्णा
मन चला जाता है वहीं इंसान जाता
जब सिमटता है दायरों में ख्याल
अपनों पर ही होता है मन निहाल
इतनी बड़ी दुनिया के होने बोध नहीं रह जाता
किसी नये की तरह नजर नहीं जाती
पुरानों के आसपास घूमते ही
छोटी कैद में ही रह जाता

अपने पास आते लोगों में
प्यार पाने के ख्वाब देखता
वक्त और काम निकलते ही
सब छोड़ जाते हैं
उम्मीदों का चिराग ऐसे ही बुझ जाता

कई बार जुड़कर फिर टूटकर
अपने अरमानों को यूं हमने बिखरते देखा
चलते है रास्ते पर
मिल जाता है जो
उसे सलाम कहे जाते
बन पड़ता है तो काम करे जाते
अपनी उम्मीदों का चिराग
अपने ही आसरे जलाते हैं जब से
तब से जिंदगी में रौशनी देखी है
बांट लेते हैं उसे भी
कोई अंधेरे से भटकते अगर पास आ जाता
....................................

दीपक भारतदीप

Saturday, June 28, 2008

दर्द की खबर देते, अपने वास्ते बेदर्द होते-हिन्दी शायरी



खबरों की खबर वह रखते हैं
अपनी खबर हमेशा ढंकते हैं
दुनियां भर के दर्द को अपनी
खबर बनाने वाले
अपने वास्ते बेदर्द होते हैं

आखों पर चख्मा चढ़ाये
कमीज की जेब पर पेन लटकाये
कभी कभी हाथों में माइक थमाये
चहूं ओर देखते हैं अपने लिये खबर
स्वयं से होते बेखबर
कभी खाने को तो कभी पानी को तरसे
कभी जलाती धूप तो कभी पानी बरसे
दूसरों की खबर पर फिर लपक जाते हैं
मुश्किल से अपना छिपाते दर्द होते हैं

लाख चाहे कहो
आदमी से जमाना होता है
खबरची भी होता है आदमी
जिसे पेट के लिये कमाना होता है
दूसरों के दर्द की खबर देने के लिये
खुद का पी जाना होता है
भले ही वह एक क्यों न हो
उसका पिया दर्द भी
जमाने के लिए गरल होता
खबरों से अपने महल सजाने वाले
बादशाह चाहे
अपनी खबरों से जमाने को
जगाने की बात भले ही करते हों
पर बेखबर अपने मातहतों के दर्द से होते हैं

कभी कभी अपना खून पसीना बहाने वाले खबरची
खोलते हैं धीमी आवाज में अपने बादशाहों की पोल
पर फिर भी नहीं देते खबर
अपने प्रति वह बेदर्द होते हैं
----------------------------
दीपक भारतदीप

Thursday, June 26, 2008

वह तुम ही होते-हिंदी शायरी

बेजान पत्थरों में ढूंढते हैं आसरा
फिर भी नहीं जिंदगी में मसले हल नहीं होते
कोई हमसफर नहीं होता इस जिंदगी में
अपने दिल की तसल्ली के लिये
हमदर्दों की टोली होने का भ्रम ढोते
सभी जानते हैं यह सच कि
अकेले ही चलना है सभी जगह
पर रिश्तों के साथ होने का
जबरन दिल को अहसास करा रहे होते
कहें महाकवि दीपक बापू
क्यों नहीं कर लेते अपने अंदर बैठे
शख्स से दोस्ती
जिससे हमेशा दूर होते
वह तुम ही होते
........................................

दीपक भारतदीप

Monday, June 23, 2008

इश्क में भी अब आ गया है इंकलाब-हिन्दी शायरी

इश्क में भी अब आ गया है इंकलाब
हसीनाएं ढूंढती है अपने लिए कोई
बड़ी नौकरी वाला साहब
छोटे काम वाले देखते रहते हैं
बस माशुका पाने का ख्वाब

वह दिन गये जब
बगीचों में आशिक और हसीना
चले जाते थे
अपने घर की छत पर ही
इशारों ही इशारों में प्यार जताते थे
अब तो मोबाइल और इंटरनेट चाट
पर ही चलता है इश्क का काम
कौन कहता है
इश्क और मुश्क छिपाये नहीं छिपते
मुश्क वाले तो वैसे हुए लापता
इश्क हवा में उडता है अदृश्य जनाब
जाकर कौन देख सकता है
जब करने वाले ही नहीं देख पाते
चालीस का छोकरा अटठारह की छोकरी को
फंसा लेता है अपने जाल में
किसी दूसरे की फोटो दिखाकर
सुनाता है माशुका को दूसरे से गीत लिखाकर
मोहब्बत तो बस नाम है
नाम दिल का है
सवाल तो बाजार से खरीदे उपहार और
होटल में खाने के बिल का है
बेमेल रिश्ते पर पहले माता पिता
होते थे बदनाम
अब तो लडकियां खुद ही फंस रही सरेआम
लड़कों को तो कुछ नहीं बिगड़ता
कई लड़कियों की हो गयी है जिंदगी खराब
------------------------------
दीपक भारतदीप

Sunday, June 22, 2008

हमारी जिन्दगी में आये वह हवा बनकर-हिन्दी शायरी



हमारी जिंदगी में आये वह हवा बनकर
इसलिये छोड़ जायेंगे कभी
इसका तो अनुमान था
पर छोड़ जायेंगे अपने पीछे
एक बहुत बड़ा तूफान
हमारे लड़ने के लिये
इसका गुमान न था

आये थे तो वह आहिस्ता आहिस्ता
कदम अपने बढ़ाते हुए
अपनी कमर मटकाते हुए
हमें देख रहे थे आंखें नचाते हुए
कुछ पल के साथ में लगा कि
कि वह उम्र भर नहीं जायेंगे
सदा पास रह जायेंगे
पर अपना काम निकलते ही
जो उन्होंने अपना मूंह फेरा
जिंदगी घिर गयी झंझावतों में
जिसका कभी पूर्वानुमान न था
..................................................
दीपक भारतदीप

Saturday, June 21, 2008

आता कहर भी टल जाता है-हिन्दी शायरी


यूं तो हम भी दोस्तों के लिये
अपनी जान देने के लिये खड़े थे
पर दोस्त भी हमें बचाने के लिये
कुर्बान होने पर अड़े थे

‘पहले मै’ ‘पहले मैं’ के झगड़े में
मुसीबत का काफिला गुजर गया
पता ही नहीं चला
एक दूसरे को कृतार्थ करने का वक्त यूं ही टला
जज्बात हों कुर्बानी के लिये दिल में तो
आता कहर भी टल जाता है
जिंदगी बहती है हवा में
झौंका भी आ जाये दिल में
दोस्त का साथ निभाने का
तो दुश्मन हो शहर तब भी डर जाता है
बुरे वक्त में तकलीफ का दर्द भी कम जाता है
इसी सोच के साथ दोस्त और हम वहां खड़े थे
...............................


एक सपना लेकर
सभी लोग आते हैं सामने
दूर कहीं दिखाते हैं सोने-चांदी से बना सिंहासन

कहते हैं
‘तुम उस पर बैठ सकते हो
और कर सकते हो दुनियां पर शासन

उठाकर देखता हूं दृष्टि
दिखती है सुनसान सारी सृष्टि
न कहीं सिंहासन दिखता है
न शासन होने के आसार
कहने वाले का कहना ही है व्यापार
वह दिखाते हैंे एक सपना
‘तुम हमारी बात मान लो
हमार उद्देश्य पूरा करने का ठान लो
देखो वह जगह जहां हम तुम्हें बिठायेंगे
वह बना है सोने चांदी का सिंहासन’

उनको देता हूं अपने पसीने का दान
उनके दिखाये भ्रमों का नहीं
रहने देता अपने मन में निशान
मतलब निकल जाने के बाद
वह मुझसे नजरें फेरें
मैं पहले ही पीठ दिखा देता हूं
मुझे पता है
अब नहीं दिखाई देगा भ्रम का सिंहासन
जिस पर बैठा हूं वही रहेगा मेरा आसन
..........................
दीपक भारतदीप

Friday, June 20, 2008

सनसनी गद्दारी से फैलती है वफादारी से नहीं-व्यंग्य

जब शाम को घर पहुंचने के बाद आराम कर रहा था तो पत्नी ने कहा-‘आज इंटरनेट का बिल भर आये कि नहीं!
मैंने कहा-‘तुम बाजार चली जाती तो वहीं भर जाता। मेरे को काम की वजह से ध्यान नहीं रहता।’
पत्नी ने कहा-‘घर पर क्या कम काम है? बाजार जाने का समय ही कहां मिलता है? अब यह बिल भरने का जिम्मा मुझ पर मत डालो।’
मैंने कहा-‘तुम घर के काम के लिये कोई नौकर या बाई क्यों नहीें रख लेती।’
मेरी पत्नी ने कहा-‘क्या कत्ल होने या करने का इरादा है। वैसे भी तुम जिस तरह कंप्यूटर से रात के 11 बजे चिपकने के बाद सोते हो तो तुम्हें होश नहीं रहता। कहीं मेरा कत्ल हो जाये तो सफाई देते परेशान हो जाओगे। अभी मीडिया वाले पूछते फिर रहे हैं कि आठ फुट की दूरी से किसी को अपने बेटी की हत्या पर कोई चिल्लाने की आवाज कैसे नहीं आ सकती। अगर मेरा कत्ल हो जाये तो तुम तो आठ इंच की दूरी पर आवाज न सुन पाने की सफाई कैसे दोगे? मीडिया वाले कैसे तुम पर यकीन करेंगे? यही सोचकर चिंतित हो जाती हूं। ऐसे में तुम नौकर या बाई रखने की बात सोचना भी नहीं। वैसे अगर स्वयं काम करने की आदत छोड़ दी तो फिर हाथ नहीं आयेगा। समय से पहले बुढ़ापा बुलाना भी ठीक नहीं है।
मैंने कहा-‘इतने सारे नौकर काम कर रहे हैं सभी के घर कत्ल थोड़े ही होते हैं। तुम कोई देख लो। मैं फिर उसकी जांच कर लूंगा।’
मेरी पत्नी ने हंसते हुए कहा-‘कहां जांच कर लोगे? अपनी जिंदगी में कभी कोई नौकर रखा है जो इसका अभ्यास हो।’

मैंने कहा-‘तुम तो रख लो। हम तो बड़े न सही छोटे सेठ के परिवार में पैदा हुए इसलिये जानते हैं कि नौकर को किस तरह रखा जाता है।’

मेरी पत्नी ने कहा-‘दुकान पर नौकर रखना अलग बात है और घर में अलग। टीवी पर समाचार देखो ऐसे नौकरों के कारनामे आते हैं जिनको घर के परिवार के सदस्य की तरह रखा गया और वह मालिक का कत्ल कर चले गये।’
मैंने कहा-‘क्या आज कोई इस बारे में टीवी पर कोई कार्यक्रम देखा है?’
उसने कहा-‘हां, तभी तो कह रही हूं।’
मैंने कहा-‘तब तो तुम्हें समझाना कठिन है। अगर तुम कोई टीवी पर बात देख लेती हो तो उसका तुम पर असर ऐसा होता है कि फिर उसे मिटा पाना मेरे लिये संभव नहीं है।’

बहरहाल हम खामोश हो गये। वैसे घर में काम के लिये किसी को न रखने का यही कारण रहा है कि हमने जितने भी अपराध देखे हैं ऐसे लोगों द्वारा करते हुए देखे हैं जिनको घर में घुस कर काम करने की इजाजत दी गयी । सात वर्ष पहले एक बार हमारे बराबर वाले मकान में लूट हो गयी। उस समय मैं घर से दूर था पर जिन सज्जन के घर लूट हुई वह मेरे से अधिक दूरी पर नहीं थी। कोई बिजली के बिल के बहाने पड़ौसी के घर में गया और उनकी पत्नी चाकू की नौक पर धमका कर हाथ बांध लिये और सामान लूट कर अपराधी चले गये। मेरी पत्नी अपनी छत पर गयी तो उसे कहीं से घुटी हुई आवाज में चीखने की आवाज आई। वह पड़ौसी की छत पर गयी और लोहे के टट्र से झांक कर देख तो दंग रह गयी। वह ऊपर से चिल्लाती हुई नीचे आयी। उसकी आवाज कर हमारे पड़ौस में रहने वाली एक अन्य औरत भी आ गयी। दोनो पड़ौसी के घर गयी और उस महिला को मुक्त किया। उनके टेलीफोन का कनेक्शन काट दिया गया था सो मेरी पत्नी ने मुझे फोन कर उस पड़ौसी को भी साथ लाने को कहा।
मैं एक अन्य मित्र को लेकर उन पड़ौसी के कार्यालय में उनके पास गया। सबसे पहले उन्होंने अपनी पत्नी का हाल पूछा तो मैने अपनी पत्नी से बात करायी। तब वह बोले-‘यार, अगर पत्नी ठीक है तो मैं तो पुलिस में रपट नहीं करवाऊंगा।’
वह अपने एक मित्र को लेकर स्कूटर पर घर की तरफ रवाना हुए और मैं अपनी साइकिल से घर रवाना हुआ। चलते समय मेरे मित्र ने कहा-‘ अगर यह पुलिस में रिपोर्ट नहीं लिखवाते तो ठीक ही है वरना तुम्हारी पत्नी से भी पूछताछ होगी।’
हम भी घर रवाना हुए। वहां पहुंचे तो पुलिस वहां आ चुकी थी। मेरी पत्नी ने पड़ौसी के भाई को भी फोन किया था और उन्होंने वहीं से पुलिस का सूचना दी। अधिक सामान की लूट नहीं हुई पर सब दहशत में तो आ ही गये थे।

एक दो माह बीता होगा। उस समय घर में किसी को काम पर रखने का विचार कर रहे थे तो पता लगा कि पड़ौसी के यहां लूट के आरोपी पकड़े गये और उनमें एक ऐसा व्यक्ति शामिल था जो उनके यहां मकान बनते समय ही फर्नीचर का काम कर गया था। इससे हमारी पत्नी डर गयी और कहने लगी तब तो हम कभी भी किसी ऐसे व्यक्ति को घुसने ही न दें जिसे हम नहीं जानते। यही हमारे लिये अच्छा रहेगा।’
यह घटना हमारे निकट हुई थी उसका प्रभाव मेरी पत्नी पर ऐसा पड़ा कि फिर घर में किसी बाई या नौकर को घुसने देने की बात सोचने से ही उसका रक्तचाप बढ़ जाता है। फिर उसके बाद जब भी कभी वह काम अधिक होने की बात करती हैं मैं किसी को काम पर रखने के लिये कहता हूं पर टीवी पर अक्सर ऐसी खबरें आती हैं कि अपना विचार स्थगित कर देती हैं।’

उस दिन कहने लगी-‘पता नहीं लोग अपना काम स्वयं क्यों नहीं करते। नौकर रख लेते हैं।
मैंने कहा-‘तुम भी रख सकती हो। अगर यह टीवी चैनल देखना बंद कर दो। कभी सोचती हो कि ग्यारह सौ वर्ग फुट के भूखंड पर बने मकान की सफाई में ही जब तुम्हारा यह हाल है तो पांच-पांच हजार वर्ग फुट पर बने मकान वाले कैसे उसकी सफाई कर सकते हैं? मुझसे बार बार कहती हो कि छोटा प्लाट लेते। क्या जरूरी था कि इतना बड़ा पोर्च और आंगन भी होता। तब उन बड़े लोगों की क्या हालत होगी जो जमाने को दिखाने के लिये इतने बड़े मकान बनाते हैं। वह अपनी पत्नियों के तानों का कैसे सामना कर सकते हैं जब मेरे लिये ही मुश्किल हो जाता है।’
हमारी पत्नी सोच में पड़ गयी। इधर सास-बहू के धारावाहिकों का समय भी हो रहा था। वह टीवी खोलते हुए बोली-‘इन धारावाहिकों में तो नौकर वफादार दिखाते हैं।
मैंने हंसते हुुए कहा-‘तो रख लो।’
फिर वह बोली-‘पर वह न्यूज चैनल तो कुछ और दिखा रहे है।
मैंने कहा-‘तो फिर इंतजार करो। जब दोनों में एक जैसा ‘नौकर पुराण दिखाने लगें तब रखना। वैसे समाचार हमेशा सनसनी से ही बनते हैं और गद्दारी से ही वह बनती है वफदारी से नहीं। इसलिये दोनों ही जगह एक जैसा ‘नौकर पुराण’ दिखे यह संभव नहीं है। इसलिये मुझे नहीं लगता कि तुम किसी को घर पर काम पर रख पाओगी।’
मेरी पत्नी ने मुस्कराते हुए पूछा-‘तुम्हारे ब्लाग पर क्या दिखाते हैं?’

मैंने कहा-‘अब यह तो देखना पड़ेगा कि किसने टीवी पर क्या देखा है? बहरहाल मैंने तो कुछ नहीं देखा सो कुछ भी नहीं लिख सकता। सिवाय इसके कि वफदारी से नहीं गद्दारी से फैलती है सनसनी।’
मेरी पत्नी ने पूछा-‘इसका क्या मतलब?’
मैंने कहा-‘मुझे स्वयं ही नहीं मालुम

दीपक भारतदीप

Thursday, June 19, 2008

अपनी ही कहानियां मस्तिष्क से निकल जातीं-हिन्दी शायरी

यूं तो वक्त गुजरता चला जाता
पर आदमी साथ चलते पलों को ही
अपना जीवन समझ पाता
गुजरे पल हो जाते विस्मृत
नहीं हिसाब वह रख पाता

कभी दुःख तो कभी होता सुख
कभी कमाना तो कभी लुट जाना
अपनी ही कहानियां मस्तिष्क से
निकल जातीं
जिसमें जी रहा है
वही केवल सत्य नजर आती
जो गुजरा आदमी को याद नहीं रहता
अपनी वर्तमान हकीकतों से ही
अपने को लड़ता पाता

हमेशा हानि-लाभ का भय साथ लिये
अपनों के पराये हो जाने के दर्द के साथ जिये
प्रकाश में रहते हुए अंधेरे के हो जाने की आशंका
मिल जाता है कहीं चांदी का ढेर
तो मन में आती पाने की ख्वाहिश सोने की लंका
कभी आदमी का मन अपने ही बोझ से टूटता
तो कभी कुछ पाकर बहकता
कभी स्वतंत्र होकर चल नहीं पाता

तन से आजाद तो सभी दिखाई देते हैं
पर मन की गुलामी से कोई कोई ही
मुक्त नजर आता
सत्य से परे पकड़े हुए है गर्दन भौतिक माया
चलाती है वह चारों तरफ
आदमी स्वयं के चलने के भ्रम में फंसा नजर आता
.....................................

दीपक भारतदीप

Thursday, May 22, 2008

मशहूर होकर क्या खाक लिख पायेंगे-व्यंग्य

लिखना मैंने इसलिये नहीं शुरू किया कि मुझे मशहूर होना है। मुझे अपने मशहूर होने की चिंता कभी नहीं सताती क्योंकि मुझे लगता है कि लोग अपनी पूरी ऊर्जा इसी प्रयास में नष्ट करते हैं कि वह प्रसिद्ध व्यक्ति बने और समाज में उनकी चर्चा चारों और लोग करें। मैं उनके करतबों पर ही लिखता रहता हूं पर किसी का नाम लिये बगैर अपनी बात कह जाता हूं कि अगर वह पढ़े भी तो उसे लगे कि किसी अन्य व्यक्ति के लिये लिखा होगा।

उस दिन पांच लोग कहीं आपस में मिले। इसमें मैं और मेरे ब्लाग@पत्रिका पढ़ने वाला एक मित्र भी था। तीन अन्य भी उसके परिचित थे। तीनों अपनी अपनी डींगे हांक रहे थे।
‘अरे, मैं किसी से नहीं डरता मेरी पहुंच दूर तक है।’
‘अरे, इस इलाके में मुझे सब जानते हैं। अपना ही राज्य है।’
‘मैं जहां रहता हूं, वहां सब लोग मेरी इज्जत करते हैं। एक मैं ही वहां इज्जतदार हूं।’
वैसे मेरा मित्र भी कम नहीं है, पर उसे मालुम है कि मैं हाल ही उसकी बात को पकड़ कर लिख कर व्यंग्य लिखने का काम कर सकता हूं। इसलिए कुछ देर तो चुप रहा फिर उसने मुझे ही वहां उलझाने के लिये अपना पासा फैंका और बोला-‘तुम मेरे इस मित्र को जानते हो। कई पत्र-पत्रिकाओं में इसके लेख और व्यंग्य छप चुके हैं। आजकल इंटरनेट पर लिखते हुए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नाम कमा रहा है पर देखों अपनी प्रशंसा स्वयं नहीं करता।’
मैंने मित्र की तरफ देखा और फिर कहा-‘‘अरे, यार तुम भी क्या बात लेकर बैठ गये। हमें भला कौन जानता है? लिखते हम भी हैं और फिल्मों के हीरो भी लिख रहे हैं पर भला कोई उनके मुकाबले हमें कौन पढ़ता है। तुम्हें और कोई नहीं मिला कि हमारा मजाक उड़ाने लगे।’
उनमें से एक सज्जन बोले-‘‘आप कौनसे अखबार में लिखते हैं?‘
मैने कहा-‘अरे, यह तो ऐसे ही बना रहा है। पहले कुछ कम प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं के लिखा था। अंतर्जाल पर ब्लाग लिख रहे हैं पर कौन पढ़ता है वहां पर। अब तो फिल्मी हीरो हीरोइन के ब्लाग बनते जायेंगे। लोग उनको पढेंगें कि हमें। यह मुझे मित्र कह रहा है इससे पूछो कितनी बार इसने मेरा ब्लाग खोला है?’

दूसरे सज्जन ने कहा-‘अगर आप लिखते हैं तो जरूर मशहूर हो जायेंगे। फिल्मी हीरो हीरोइन गासिपों के अलावा क्या लिखेंगे। वैसे भी उनका लिखा अखबार में आ जाता है। आप लिखते रहें तो एक दिन मशहूर हो जायेंेगें।
बहरहाल मैंने अपनी बौद्धिक शक्ति का उपयोग करते हुए वहां बातचीत का विषय बदल दिया। वहां से निकलते ही मैंने मित्र से कहा-‘दिलवा दिया शाप! उसने क्या कह दिया कि मशहूर हो जाओगे।

मेरा मित्र बोला-‘यार, फिर तो वाकई चिंता की बात है तुम्हारे ब्लाग पर मैंने अभी तक तीन टिप्पणियां लिखीं हैं तो हमें भी तो मशहूर हो जायेंगे। वैसे मशहूर होना तो अच्छी बात है।’
मैंने उससे कहा-‘मशहूर होकर लिखा नहीं जाता। आदमी इसी फिक्र में कई बातें इसलिए नहीं लिख पाता कि अब तो मशहूर हो गया हूं कहीं ऐसा न हो कि लोग इससे नाराज न हो जायें। मशहूर होने का बोझ ढोना कई लोगों के लिए मुश्किल काम है और उनमें हम एक है।
मित्र ने कहा-‘फिर तुम लिखते क्यों हो? मशहूर होने के लिए ही न!
मैंने कहा-‘‘मशहूर नहीं हूं इसलिये लिख रहा हूं। जमकर लिख रहा हूं। मशहूर होने के बाद तो यही सोचकर बैठा रहूंगा कि लिखूं क्या?’
मित्र ने आखिर मुझसे पूछा-‘आखिर मशहूर होना होता कैसे है?’
मैंने भी प्रति प्रश्न किया-‘कैसे होता है?’
मित्र ने कहा-‘‘मैं क्या जानूं? तुम लेखक हो तुम्हीं बताओ।’
मैने कहा-‘मशहूर होने की बात तो तुमने उठाई थी। मुझे लगा कि होगी कोई अच्छी बात है।’
मित्र बोला-‘अच्छा तुम अब मुझ पर ही व्यंग्य करने लगे। मैं इसलिये वहां चुप था कि कहीं तुम मेरी बातों से व्यंग्य सामग्री न ढूंढ लो और अब यही कारिस्तानी यहीं करने लगे। मेरी टिप्पणियां वहां से हटा देना। मुझे ऐसे व्यक्ति के साथ मशहूर नहीं होना जिसे मालुम ही न हो कि वह होता क्या है?’

मशहूर होने के लिये लोग जाने क्या क्या पापड़ बेलते हैं? तमाम तरह की उल्टी सीधी हरकतें करते हैं। उलूलजुलूल लिखते है। लिखने में सबसे बड़ा मजा यह है कि आप किसी आदमी के सामने नहीं होते और इसलिये कोई आपको पहचान नहीं पाता। पिछली राखी की बात है मैं एक रेस्टरां में चाय पी रहा था। उसी दिन एक अखबार में मोबाइल पर लिख मेरा एक व्यंग्य छपा था और दो आदमी उसे पढ़कर हंस रहे थे। एक ने कहा-‘‘देखो यार, मोबाइल पर उसने क्या लिखा है?
दूसरा उसे पढ़ते हुए हंस रहा था। उसे नहीं मालुम कि उसको लिखने वाला लेखक उसे मात्र पांच फुट की दूरी पर बैठा है। बाद में मैंने जब अपने मित्र को जब यह घटना बताई तो वह कहने लगा कि-‘तुमने उनको बताया क्यों नहीं कि तुम उसके लेखक हो।
‘अगर वह कह देते कि क्या बकवाद लिखी है तो मैं क्या करता?‘मैने कहा-‘‘इतना ही ठीक है कि मुझे पढ़ रहे थे। अपने आपको मशहूर करने के प्रयास में कभी कभी उल्टा सीधा भी सुनना पड़ता है। इससे बेहतर है अपने लेख भले ही मशहूर हों, थोड़ा बहुत नाम भी हो जाये पर हमें अपना यह चेहरा मशहूर नहीं कराना।’

मशहूर होने को मतलब है कि अपने ऐसे विरोधी पैदा करना जो छींटाकशी के लिये तैयार बैठे रहते हैं और आप अपने मित्रों से हमेशा सतर्कता की आशा नहीं कर सकते जो सोचते हैं कि यह तो मशहूर आदमी है अपना बचाव स्वयं कर लेगा। वैसे चुपचाप लिखते रहने से ही इतनी आनंद की अनुभूति होती है कि लगता है कि मशहूर हुए तो मिलने वाले बहुत आयेंगे। कई तरह के फोन सुनने पड़ेंगे। तब भला क्या खाक लिख पायेंगे। ऐसे ही ठीक है कि कोई हमें चेहरे से जानता नहीं है। अधिक मशहूर होनेा मतलब अपनी शांति भंग करना भी होता है।

Saturday, May 10, 2008

वही बनते महान-कविता




शब्दों के तीर चलाने के लिये
कलम को धनुष
स्याही को बनाओ कमान
यूं तो आत्ममुग्ध लोग जगह जगह
करते हैं अपने गुणों का स्वयं बखान
स्वार्थ के लिये देते सभी एक दूसरे को मान
जो खामोशी से चलते अपने जीवन पथ पर
करते हैं जो दूसरों के लिए संघर्ष
वही बनते महान
........................................
यूं तो आकाश में उड़ने की चाह में
सभी भ्रमित हो जाते हैं
ऊंचाई का पैमाना किसी के पास नहीं
फिर भी उड़े जाते हैं
कोई अटके बीच में
कोई फिर जमीन पर गिर जाते है
---------------------

दीपक भारतदीप

Sunday, April 27, 2008

अमन कहाँ से आयेगा यहाँ-हिन्दी शायरी

लुट जाने का खतरा अब
गैरो से नहीं सताता
अपनों को ही यह काम
अच्छी तरह करना आता

पहरेदारी अपने घर की किसे सौेपे
यकीन किसी पर नहीं आता
जहां भी देखा है लुटते हुए लोगों को
अपनों का हाथ नजर आता
कई बाग उजड़ गये हैं
माली अब फूल नहीं लगाता
इंतजार रहता है उसे
कोई आकर लगा जाये पेड़ तो
वह उसे बेच आये बाजार में
इस तरह अपना घर सजाता
नाम के लिये करते हैं मोहब्बत
बेईमानी से उनकी है सोहबत
जमाने के भलाई का लगाते जो लोग नारा
लूट में उनको ही मजा आता
कहें भारतदीप
मन में है उथलपुथल तो
अमन कहां से आयेगा यहां
जिनके हाथ में बागडोर होती चमन की
किसी और से क्या खतरा होगा
वही उसका दुश्मन हो जाता
..................................

Friday, April 25, 2008

‘सिवाय रोटी के इंतजार के और क्या कर सकता हूं’-व्यंग्य कविता

कुर्ते और पैंट में लगे पैबंद
पुराना और मैला कुचला थैला लटकाये
अपनी दाढ़ी बढ़ाये लेखक
पहुंचा प्रकाशक के पास और बोला
‘‘आपके यहां कोई लेखक की
जगह खाली है
इधर मेरा पेट खाली है
बेटा रहता है बीमार और
परेशान और रोटी को तरसी घरवाली है
आप मुझे अपने यहां कम देंगे
तो आपका आभार मानूंगा
मैं बहुत अच्छा लिख सकता हूं’’

प्रकाशक ने कहा
‘‘बताने की जरूरत नहीं है
हाल तुम्हारे बता देते हैं कि
तुम्हें हिंदी में लिखना होगा
नाम तो होगा हमारे घर के ही सदस्य का
तुम्हें अपना नाम भूलना होगा
हां तुम लिख सकते हो अच्छा
यह भी समझ में आता है
तुम्हारा फटेहाल होना यह दर्शाता है
पर एक महीने तक और भी
तुम्हें भूखा रहना होगा
रोटी को भूलना होगा
कोई एडवांस नहीं मिलेगा
शर्त मंजूर हो तो तुम्हें काम पर रख सकता हूं

लेखक ने कहा
‘आप मुझे एक सप्ताह बाद
कुछ पैसे देना
फिर चाहे वेतन में से काट लेना
लिखने के साथ रोटी भी जरूरी है
पेट भरने पर मैं और भी अच्छा लिख सकता हूं’

प्रकाशक ने कहा
‘मुझे इतना भी अच्छा नहीं लिखवाना
इसीलिये पेट तुम्हारा नहीं भरवाना
अंग्रेजी के होते तो सोचता
हिंदी के हो इसलिये
नहीं दे सकता तुम्हें कोई बहाना
भूखे रहोगे तो भूख पर लिखोगे
बीमारी पर तभी लिख सकते हो
जब उस जैसे अपने को दिखोगे
मैं कोई किसी का दर्द हरने वाला नहीं
बल्कि उसका व्यापार करता हूं
लिखवाता हूं भूखे से उसकी रोटी
बहुंत समय तक उधार रखता हूं
अपनी शर्तों पर ही मैं चल सकता हूं’

इस तरह भूखा लेखक लिखने बैठ गया
सोचने लगा
‘सिवाय रोटी के इंतजार के और क्या कर सकता हूं’

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