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Wednesday, January 22, 2014

तुलसी दास दर्शन-छल कपट से राज्य करने वाले का पतन जल्दी होता है(tuslidas darshan-Chal kapat se rajya karne wale ka patan jaldi hot hai)



      पूरे विश्व में आधुनिक लोकतंत्र ने राजनीति शास्त्र का अध्ययन न करने वाले लोगों को भी राजकीय कर्म में आने के अवसर दिये हैं यह अलग बात कि उससे अनेक तरह के विरोधाभासी दृश्य देखने को मिलते हैं। लोकतांत्रिक प्रणाली में राजसी कर्म के लिये पद प्राप्त करने के लिये योग्यता से अधिक चुनाव जीतने की कला का महत्व है। विभिन्न देशों में संविधान के अनुसार एक स्थाई राज्य व्यवस्था तो रहती है जिसे स्थाई तथा अस्थाई वेतनभोगी कर्मचारी स्वाभाविक रूप से चलाते हैं। उन्हें न तो चुनाव लड़ना है न जनता के प्रति जवाबदेही का भाव रखना है। वह स्थाई रूप से कार्य करते हैं यह अलग बात है कि सर या साहब बदलता रहता है। व्यवस्था की कार स्वतः चलती है पर उसमें बैठने वाला सर प्रजाजन अपने मत से तय करते हैं। यही कारण है कि अनेक ऐसे लोग जो व्यवस्था से परिचित नहीं होते वह भी तमाम तरह के वादे तथा दावे लोगों के सामने  जताकर चुनाव जीत जाते हैं। पद पर प्रतिष्ठत होने के पश्चात् राजनीति तथा प्रशासन की समझ न होने के कारण वह कोई काम नहीं कर पाते पर जनता में अपनी छवि बनाये रखने के लिये गरीबों, बीमारों, बच्चों, वृद्धों और स्त्रियों का उद्धारक बने रहने के लिये अनेक तरह के स्वांग रचते हैं।  भाषण करते हैं पर उनके दावों को कभी अमल में आते देखा नहीं जाता।  यही कारण है कि हम देख रहे हैं कि अनेक देशों में लोकतांत्रिक प्रणाली के बावजूद वहां की जनता में फैला असंतोष दिखाई देता है।
संत तुलसीदास कहते हैं कि
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सारदुल को स्वांग करि, कूकर की करतूति।
तुलसीता पर चाहिए, कीरति विजय विभूति।।
     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-लोग सिंह की खाल ओढ़कर भी श्वान जैसा स्वांग करते हैं उस पर भी प्रतिष्ठा, विजय तथा ऐश्वर्य चाहते हैं।
राज करत बिनु काजहीं, करहि कुचालि कुसाजि।
तुलसीते दसकंध ज्यों, जइहैं सहित समाजि।।
          सामान्य हिन्दी में भावार्थ-बिना किसी विशेष कार्य किये छल कपट के साथ राज्य करने वाले का अतिशीघ्र पतन हो जाता है।
      राजकीय कर्म शुद्ध रूप से राजसी प्रकृत्ति का परिचायक है। तय बात है कि उसके लिये राजसी बृद्धि से काम लेना होता है जबकि देखा यह  गया है कि एक बार पद मिलने पर उच्च पदस्थ लोग अपने को मिलने वाली सुविधाओं के भोग तथा सम्मान में के मोह में फंस जाते हैं।  बौद्धिक रूप से आलस्य करते हुए तामसी वृत्ति का शिकार हो जाते हैं।  वह अपने पद का अधिक से अधिक अपने लिये उपयोग करते हैं जिससें चुनाव के दौरान उनकी धवल छवि बाद में मलिन होने लगती है।  इससे जनता में भारी निराशा व्याप्त होती है और कभी कभी उसका उग्र रूप भी प्रकट होता है।
      विश्व में लोकतांत्रिक प्रणाली होने हमारी सभ्यता का जहां एक आभूषण है अतः उससे दूर तो हुआ नहीं जा सकता पर यह आवश्यक है कि राजकीय पद पर प्रतिष्ठत होने के लिये उत्सुक लोग चुनाव मैदान में उतरने से पहले अर्थशास्त्र तथा प्रबंध शास्त्र के साथ राजनीति शास्त्र का अध्ययन भी कर लें। जब तक उनकी समझ में राजकीय कर्म के मूलतत्व न आयें तब तक वह उससे दूर ही रहें। इससे उनका तथा जनता दोनों का भला होगा।


लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com
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Monday, January 13, 2014

नये नायक, नये गायक-हिन्दी व्यंग्य कविता(naye gayak, naye gayak-hindi satire poem)


खबर को खींचते रबड़ की तरह
उबाऊ बहसों के बीच
पर्दे पर सामानों के विज्ञापन
यूं ही चलाये जाते हैं,
शय खरीदने की सोचें
या करें हम  चिंत्तन यही भूल जाते हैं।
कहें दीपक बापू
बाज़ार के नये उत्पादों को बेचने के लिये
रोज नये नायक चाहिये,
प्रचार में उनके गीत बजवाने के लिये
नये गायक चाहिये,
सौदागर के कब्जे में है पूरा ज़माना,
जिनको आता है बस कमाना,
नित्य नये नये चेहरे रखते सामने
पैसे लेकर बुत करते उनका काम
कोई नाचकर
कोई गाकर
आम इंसानों की जेब
दिल बहलाते हुए खाली किये जाते हैं।


लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Wednesday, January 1, 2014

लोकतंत्र में बाज़ार और प्रचार समूहों की शक्ति अधिक-ईसवी संवतः 2014 पर एक संदेशपूर्ण चिंत्तन लेख (loktanta mein bazar aur prachar samoohon ki shakti adhik- a massege and thought article on new year 2014)



            ईसवी संवत् 2014 प्रारंभ हो गया है।  वैसे देखा जाये तो हमारे यहां हिन्दू संवत् अध्यात्मिक रूप से हमारे हृदय के अधिक निकट होता है पर उसका राजकीय महत्व न होने से उसे केवल सामाजिक उत्सव मनाया जाता है जिसे बाज़ार और प्रचार माध्यम अधिक समर्थन नहीं देते। आजकल समाज पर बाज़ार और प्रचार का अधिक प्रभाव है और इससे सामाजिक संस्कार और संस्कृति निश्चित रूप से प्रभावित हो रही है।  देखा जाये तो जब तक पारंपरिक पर्वों से बाज़ार का लाभ होता था तब तक प्रचार माध्यम अपने विज्ञापन स्वामियों के लिये भारतीय संस्कृति का बोझ ढोते रहे।  अब पश्चिमी संस्कृति से बाज़ार में  विदेशी प्रभाव से परिष्कृत उत्पादों का प्रभाव बढ़ा है। खान पान, रहन सहन तथा मनोरंजन के साधन अब स्वदेशी रूप का प्रभाव खो चुके हैं। इसलिये वैलंटाईन डे तथा ईसवी नव संवत् पर नये उपभोग के रूपों के निर्मित  उत्पाद बेचने के लिये प्रचार माध्यम अपनी रणनीति बनाते हैं।
            एक बात हमारे समझ में नहीं आती कि आनंद में यह उत्तेजना क्या होती है? टीवी पर बर्फीले इलाके में घूम रहे पर्यटक ने साक्षात्कार में कहा कि यहां बहुत एक्साईटमेंट हो रहा है।’’
            हमें अंग्रेजी कम आती है पर एक्साईटमेंट का आशय उत्तेजना से होता है।  आनंद की यह उत्तेजना शराब से अधिक मिलती है।  इस तरह की उत्तेजना मनुष्य के विवेक का हरण करती है। शराब के बाद दूसरा आंनद तब आता है जब उसके चरम पर होते ही आदमी  किसी से लिपट जाता है। मां अपने बच्चे की लीला से जब आनंदित होती है तब वह उसे गले से लिपटा देती हैं। पिता जब बेटी से प्रसन्न होता है तो उसके सिर पर हाथ फेरता है।  कहने का आशय यह है कि आदमी आनंद की उत्तेजना में किसी दूसरे देह का स्पर्श करता है।  इस तरह बर्फ पर पांव रखकर चलना या उसे उछालना किस तरह आनंद के चरमोत्कर्ष पर पहुंचाता है यह कहना कठिन है।  बहरहाल बाज़ार के प्रचारक आदमी को आनंद के चरमोत्कर्ष पर पहुंचाने का तीव्र प्रयास करता है जिसमें विवेक के हृास के साथ  परंपरा और संस्कारों की मूल्यहीनता प्रकट होने की संभावना अधिक रहती है।
            बाज़ार और प्रचार समूहों की शक्ति के आगे समाज किस तरह नाचता है यह हम देख ही चुके हैं।  जिसे समाज पर नियंत्रण करना हो वह बाज़ार के सौदागरों सांठगांठ कर प्रचार प्रबंधकों के दम पर ढेर सारी लोकप्रियता हासिल कर सकता है। देश में उदारीकरण के बाद मध्यमवर्गीय समाज बुरी तरह से बिखरा है। खासतौर से लड़कों को रोजगार और लड़कियों के विवाह की समस्या इस वर्ग के लिये जटिल हुई है।  सबसे बड़ी बात यह कि रोजगार में असुरक्षा का भाव पैदा हुआ है।  एक अर्थशास्त्री के नाते हम देखें तो आज से पंद्रह बीस वर्ष पूर्व तक एक स्थिर समाज था जो स्वयं को अस्थिर अनुभव कर रहा है।  बड़ी कंपनियों के आगमन से नौकरियों का सृजन हुआ है पर लघु तथा व्यवसायों में लगे मध्यम वर्ग के लिये अब अस्तित्व बचाने का संकट सामने हैं। कंपनी नामक दैत्य समाज को खाता जा रहा है। छोंटे व्यवसायी का सम्मान लगभग खत्म हो चुका है।
            अभी हाल ही में राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य पर एक नये दल का उदय हुआ है। अन्ना हजारे जी ने एक भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन प्रारंभ किया जिससे उनके कुछ भक्तों को विशेष प्रचार मिला।  उन्होंने एक राजनीतिक दल बनाया और सफल रहे। इस दल को पूरी तरह से प्रचार समूहों का सहारा मिला इसमें संशय नहीं है। अन्य स्थापित दल इससे विचलित हो गये हैं क्योंकि अब देश के युवा इस दल की तरफ आकर्षित हो रहे हैं।  इसका कारण भी वाली है। इस दल ने भले ही दंत तथा नखहीन अल्पमत वाली सरकार बनायी है पर उसके मंत्री एकदम आम आदमी रहे हैं।  पच्चीस छब्बीस साल की लड़की मंत्री बन गयी है। अनेक युवा मंत्री बने है। इससे पहले स्थापित राजनीतिक दलों में युवाओं को कभी इस तरह उभरने का अवसर नहीं मिला।  सच बात तो यह है कि आज कोई भी आम परिवार अपने युवा पुत्र तथा पुत्री को राजनीतिक क्षेत्र में जाने की सलाह नहीं देता। यह एक तरह स्थापित रजनीतिक दलों में व्याप्त जड़ता के भाव के अनेक ऐसे प्रमाण है कि युवाओं के नाम राजनीतिक दलों में परिवारवाद के आधार पर चयन को प्राथमिकता दी। नये दल ने राजनीति मे ंव्याप्त इस जड़भाव के स्थान पर आशावाद का संचार किया है।  इससे वही लोग समझते हैं जिन्होंने कभी किसी राजनीतिक दल से नाता नहीं रखा।  दूसरी बात यह कि इसके मंत्री आम आदमी के बीच जिस तरह विचर रहे हैं उससे लोगों में उत्सुकता का भाव पैदा हो रहा है। आधुनिक लोकतंत्र में प्रचार के सहारे ही चुनाव में जीत या हार मिलती है ऐसे में आम आदमी का इस नये के प्रति रुझान एक या दो नहीं वरन् समस्त राजनीतिक दलों के संकट का कारण बन सकता है, एक सामान्य निरपेक्ष लेखक के रूप में हमारा तो ऐसा ही मानना है।
            आज 1 जनवरी 2014 को इसी नये दल के हमने कुछ जगह सदस्यता अभियान के लिये स्टॉल लगे देखे।  ऐसा लगा कि किसी कंपनी का प्रचार हो या जैसे एक नयी दुकान खुल गयी है। हमें पता नहीं इस दल के पीछे कौनसे वास्तविक तत्व हैं पर जब अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन चल रहा था तब हमने कहा था कि वह प्रायोजित किया गया हो सकता है। विश्व में चल रहे असंतोष का प्रभाव भारत में परिलक्षित न हो इसलिये बाजार तथा प्रचार समूही इसे प्रायोजित कर रहे हैं। दूसरा यह भी कि बाज़ार तथा प्रचार समूहों के शिखर पुरुष विदेश में अपने समकक्ष लोगों के सामने सीना तानकर कह सकते होंगे कि उनके यहां भी इस तरह का आंदोलतन चल रहा है। इस तरह के ंसदेह का  कारण यह था कि इस अंादोलन के समाचारों तथा बहसों के बीच बाज़ार के उत्पादों का ही विज्ञापन हो रहा था। नया दल इसी आंदोलन की देन है और संभव  है कि वही आर्थिक ताकतें राजनीतिक प्रभाव बनाये रखने के लिये इस आशा के साथ मदद कर रही हों ताकि लोगों का आज की राजनीति के प्रति खत्म हो रहा रुझान बना रहे। इस तरह का अनुमान इसलिये भी किया जा सकता है कि इस दल के पर्दे पर दिख रहे कर्णधार पेशेवर समाज सेवक यानि चंदा लेकर लोगों का भला करते रहे हैं।  संभव है पर्दे के पीछे कुछ उत्साही, निष्कर्मी, तथा विद्वान इसे सहायता कर रहे हों क्योंकि उनका लक्ष्य समाज हित करना ही रहता है। कम से कम हम जैसे बौद्धिक लोग तो यह मानते हैं कि इस दल का उदय होना ही चाहिये था।  देश के निर्जीव होते जा रहे लोकतंत्र के लिये यह आवश्यक भी था।  संभव है कि हम जैसी सोच अनेक लोगों की हो बाज़ार और प्रचार समूहों ने इसे समझा हो इसलिये ही इस दल के अभ्युदय में जुटे हों।  इस दल को ढेर सारे सदस्य और चंदा मिल जायेगा इसमें संदेह नहीं है पर सवाल यह है कि देश में राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक क्षेत्र मेें जो समस्यायें उनके निराकरण में यह दल कितना सहायका होगा? दिल्ली देश नहीं है पर वहां से कोई  निकले हल्के आशावादी संदेश पर लोगों का ध्यान जाता है।  संभव है कि कि हम जैसे लोगों यह सोच भी  बाज़ार तथा प्रचार समूहों के संयुक्त समाज नियंत्रण की रणनीति के प्रभाव में फंसने के कारण बनी हो। हमारे पास अपना कोई साधन तो है नहीं इसलिये वर्तमान सक्रिय प्रचार माध्यमों के आधार पर ही अपना चिंत्तन लिखते हैं।
            हमें सबसे अधिक चिंता अस्थिर समाज को लेकर है।  जाति, भाषा, वर्ण, धर्म तथा अन्य आधारों पर बने समाज टूट चुके हैं पर नया कुछ नहीं बन रहा है।  उम्मीद है नये ईसवी संवत् में कुछ नया होगा।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Monday, December 23, 2013

आम इंसान की मजबूरी-हिन्दी व्यंग्य कविता (aam insan ki mazboori-hindi vyangya kavita)




पर्दे पर कई चेहरे रोज आते हैं,
अपनी जुबान से कुछ करते
जन कल्याण का दावा
कुछ भ्रष्टाचार का राजफाश करने आते हैं।
कहें दीपक बापू
वोट कमाने के लिये
नोटों का होना जरूरी है,
शिखर पर जो बैठ गया
इसलिये बनाता गरीब से दूरी है,
पुराने चेहरे बासी जब हो जाते,
सौदागर कोई नया चेहरा फिर सजाते,
वादे करते करते जमाना गुजर गया
मगर देश बदहाल रहा,
नाम लिया सभी ने जनसेवा का
गरीब हमेशा बेहाल रहा,
आम इंसानों की टूटती एक से आस
मजबूरी में नये चेहरे के कंधे पर
अपनी उम्मीद का आकाश टिकाते हैं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Thursday, December 5, 2013

अमन का सौदा-हिन्दी कवितायें (aman ka sauda-hindi poem's)



पर्दे के पीछे शोर का जो इंतजाम कर पाते,
शहर में अमन का पैगाम वही बेचने आते हैं,
अपने  मतलब के लिये सजाते जो बड़ी महफिलें
वही आम इंसानों की भलाई के ठेके ले  पाते हैं।
कहें दीपक बापू सभी हैं यहां दौलत के पुजारी
खून खराबा और भलाई सौदा लेकर ही किये जाते हैं।
....................
सुनते हैं विकास बहुत हुआ
मगर कहीं वह दिखता नहंी है,
कहीं चमकदार दीवारें छत के इंतजार में हैं
मगर उस पर कोई खूबसूरत इबारत लिखता नहीं है।
तस्वीरों में भूखे पेट से झांक रही पथरायी आंखें
शायद उन  पर कोई रंग टिकता नहीं है।
कहें दीपक बापू आंकड़ों  के खेल है में जादू है
अन्न का ढेर लगा पर भूख के लिये बिकता नहीं है।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Sunday, November 10, 2013

क्रिकेट खेल से शालीन विदाई के क्षण-हिन्दी लेख(cricket khel se shallen vidai ke kshan-hindi article or lekh on sachin fairwell)



            अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट से अलविदा करने के लिये तैयार कथित भगवान का अब भी बाज़ारीकरण हो रहा है।  आखिर उसे भगवान कहा किसने? यकीनन कोई सच्चा क्रिकेट खिलाड़ी या प्रेमी किसी भी खिलाड़ी के साथ भगवान की उपाधि स्वीकार नहीं कर सकता।  बाज़ार उसका कृतज्ञ है कि उसने अपने व्यक्तिगत खेल के प्रभाव से उनके उत्पादों के विज्ञापनों का संचालन कुशलता से किया।  उसका चेहरा आकर्षक है।  आंखों की मासूमियत स्त्रियों को प्रभावित करती है और उस पर फिल्माया गया कोई भी विज्ञापन अपनी वस्तु को लोकप्रियता दिलाता है।  बाज़ार के सहयोगी प्रचार माध्यम उसे भगवान कहकर लोगों को हसंने का अवसर देते रहे।  वह भगवान उन लोगों के लिये रहा जिनको इससे पैसा कमाना था।  वरना उसके निजी आंकड़े बीसीसीआई की क्रिकेट टीम की किसी एतिहासिक यात्रा के सहायक नहीं बने।  इसके पीछे सच यह है कि जब वह जब अकेले पराक्रम प्रकट कर रहा था तब उसके सहारे अनेक अक्षम खिलाड़ियों का खराब प्रदर्शन छिपता जा रहा था।  कुछ बेईमान खिलाड़ी भी उसके साथ रहे जिन्हें बाद में फिक्सिंग के कारण दंडित होना पड़ा।  देखा जाये तो जब उसका खेल चरम पर था तब फिक्ंिसग अपने पांव पूरी तरह जमा रही थी।  उसके खेल निर्विवाद श्रेष्ठ था पर बीसीसीआई की टीम का सामूहिक प्रदर्शन  उसी दौर में सबसे ज्यादा खराब रहा।  इस पर अलग से विश्लेषण करना चाहिये।
                        हैरानी की बात यह है कि पिछले कुछ दिन से अंतर्राट्रीय मैचों से सट्टे की चर्चा एकदम गायब थी पर जैसे ही वह अपने अंतिम मैच खेलने उतरा फिर सट्टे की चर्चा गरम हो गयी। वह कितने रन बनायेगा, कब आउट होगा, कितने रन बनायेगा इन बातों को लेकर सट्टा लग रहा है, ऐसा प्रचार माध्यम कह रहे हैं।  इधर प्रचार माध्यम भी अनेक सफेदपोश प्रतिष्ठित लोगों को एकत्रित कर उसकी विदाई को सम्मानजनक बनाने में लगे हैं।  क्रिकेट विशेषज्ञों में कुछ ऐसे हैं जो भले ही पैसा कमाने के लिये पर्दे पर उसकी विदाई को आकर्षक बनाने के लिये आंखों देखा हाल सुनाकर उसकी प्रशंसा कर रहे हों पर वह जानते हैं कि बीसीसीआई की वर्तमान  टेस्ट टीम में उसके लिये जगह ही नहीं बनती।  कलकत्ता में बीसीसीआई की जिस टीम ने वेस्टइंडीज की हराया उसमें शामिल खिलाड़ियों पर दृष्टिपात करें तो यही  भगवान योग्यता की दृष्टि से 11 वां होना चाहिये।  इसका मतलब यह है कि उससे ज्यादा योग्य खिलाड़ी देश में है और 11 वां नंबर इसलिये उसे मिला क्योंकि वह टीम में शामिल है। मुंबई में होने वाले अंतिम टेस्ट का महत्व केवल इसलिये है क्योंकि भगवान वहां से विदाई लेने वाला है। जहां तक परिणाम का प्रश्न है वेस्ट इंडीज की वर्तमान कमजोर टीम बीसीसीआई की टीम को हरा पाये इसकी संभावना नगण्य है।
            एक दूसरा सच भी है जैसे जैसे भगवान का पतन प्रारंभ हुआ वैसे  वैसे बीसीसीआई की टीम ने उत्कर्ष की तरफ कदम बढ़ाये।  अब तो लोगों ने यह कहना प्रारंभ कर दिया था कि पहले भगवान दूसरे खिलाड़ियों का बोझ उठा रहा था अब उसका बोझ नये खिलाड़ी उठा रहे हैं।  कुछ क्रिकेट विशेषज्ञ तो यह भी कहते रहे हैं कि भगवान को अनफिट हुए छह वर्ष हो गये हैं। इतने बरस तक वह खेला तो केवल बाज़ार और प्रचार समूहों के प्रभाव की सहायता उसे मिली। उसे टीम से हटाना सहज नहीं था। देखा जाये तो हम पर्दे पर जो अब टीमें देखते हैं उनका निष्पक्ष चयन एक दिखावा होता है क्योंकि बिना प्रायोजकों की सहमति से खिलाड़ियों का आना संभव नहीं है।  कभी आपने मैच के बाद पुरस्कारों के चयन के समय पीछे लगे कंपनियों के प्रचार वाले बोर्ड देखे होंगे।  क्या आप मान सकते हैं कि इतनी सारी कपंनियां निरपेक्ष भाव से क्रिकेट खेल को चलते देख सकती हैं। अपने उत्पाद के विज्ञापनों के माडलों की छवि बनाये रखने की चिंता नहीं करती होंगी जो खराब प्रदर्शन के बावजूद उन्हें टीम में रखने से जाहिर होती है। यह कंपनियां  खिलाड़ियों के चयन और खेल पर प्रभाव डालने का प्रयास नहीं करती होंगी, इस पर यकीन करना कठिन है।  वह खिलाड़ी भगवान इसलिये कहलाया क्योंकि उसकी वजह से कंपनियों को यह खेल एक सोने की खान की तरह हाथ आया। सट्टेयबाजों ने भी अपना काम किया।  भगवान कभी स्वयं गलत काम में शािमल न हो पर उसकी आड़ में कुछ गलत तत्व छिपते रहे।
            चलते चलते विराट कोहली के खेल की चर्चा करें।  दूसरी पारी में लक्ष्य का पीछा करते हुए जितने मैच उसने बीसीसीआई की टीम को इतनी कम अवधि में जितवायें होंगे उसके दस फीसदी का मुकाबला भी भगवान की पारियों के आंकड़े नहीं कर सकते। लोग विराट कोहली में भगवान का रूप देख रहे हैं और हम सोचते हैं कि भगवान विराट कोहली जैसा क्यों नहीं खेल सका। 1983 में भारत को विश्व कप जितवाने वाले कपिल देव और अब धोनी वास्तव में टीम के सदाबहार नायक कहे जा सकते हैं।  धोनी तो गजब का योद्धा है।  हम सोचते हैं कि भगवान के व्यक्तिगत कीर्तिमान भले ही उससे बेहतर हैं पर इतिहास उसके कुल पराक्रम को उस तरह प्रकट क्यों नहीं करता जैसा कि दावा प्रचार माध्यम करते हैं।  बहरहाल एक मामले में उसकी प्रशंसा करना चाहिये। उसका व्यवहार मैदान पर हमेशा शालीन रहा और यही देश के अन्य खिलाड़ियों को सीखना चाहिये।  क्रिकेट में ऐसी शालीन विदाई भी किसी की नहीं देखी गयी।                       


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Thursday, October 24, 2013

सौदागरों के लफड़े-हिन्दी व्यंग्य कविता(saudagaron ke lafde-hindi vyangya kavita)



शोर मचा है कहीं बाज़ार में
सौदागर काले हाथ करते हुए  पकड़े हैं,
कानून की जंजीरों में अब जकड़े  है,
हैरान है सौदागरों के कारिंदे
यह सोचकर कि अपना काफिला
कैसे आगे चलेगा,
कहंी उनके घर में घी की बजाय
तेल का चिराग तो नहीं जलेगा,
इसलिये नारे लगाते हुए
अपने मालिक की ईमानदारी पर
सीना तानकर खड़े अकड़े हैं।
कहें दीपक बापू
दौलतमंद चाहे कितने भी आगे हों
सारे जहान में
मगर ईमान के रास्ते चलने पर
उनकी नानी हमेशा मरती,
हुकुमत पर काबू रखने का
ख्वाब अच्छा है
मगर उसके आगे चलने की ख्वाहिश भी
उनकी आहें भरती,
यह अलग बात है
कानून अंधा है
कभी कभी चल पड़ता है
अपने ही दोस्तों की तरफ
अपने हाथ बढ़ाते हुए,
खरीदते हैं जो उसे अपने सिक्कों की दम पर
चल पड़ता है डंडा लेकर कभी
उनको डराते हुए,
सौदागरों के हमदर्द
ज़माने के बिखर जाने का खौफ दिखाते हैं
आवाज इतनी जोर से करते
ताकि कोई न पूछे
उनके मालिकों के दूसरे कितने लफड़े हैं।
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Monday, October 14, 2013

उनका हिसाब-हिन्दी व्यंग्य कविता (unka hisab-hindi vyangya kavita)



जिनको उम्मीद है कोई तुमसे
उन पर  अपना आसरा
कभी नहीं टिकाना,
वादे पर वादे वह करेंगे
मतलब निकलते ही
बदल लेंगे  अपना ठिकाना।
कहें दीपक बापू
अगर वह चालाक नहीं होते,
गद्देदार पलंग की बजाय जमीन पर सोते,
वफादारी निभाने की अगर उनमें तमीज होती,
तब क्यों उनकी एकदम सफेद कमीज होती,
पसीने की एक बूंद नहीं है शरीर पर जिनके,
आम इंसान होते उनके लिये तिनके,
एक हाथ उठाकर वह एक चीज मांगें
तुम दोनो हाथों से दो चीज देना
किसी के खाते में उनका हिसाब न लिखाना,
आदत नहीं है उनको
मतलब पूरा होने के बाद अपनी शक्ल दिखाना।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com
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Sunday, October 6, 2013

कुदरत की चाल और इंसान की चालाकियां-हिन्दी कविता(kudrat ki chal aur insan ki chalakiyan-hindi kavita)



कुदरत की अपनी चाल है
इंसान की अपनी चालाकियां है,
कसूर करते समय
सजा से रहते अनजान
यह अलग बात है कि
सर्वशक्तिमान की सजा की भी बारीकियां हैं,
दौलत शौहरत और ओहदे की ऊंचाई पर
बैठकर इंसान घमंड में आ ही जाता है,
सर्वशक्तिमान के दरबार में हाजिरी देकर
बंदों में खबर बनकर इतराता है,
आकाश में बैठा सर्वशक्तिमान भी
गुब्बारे की तरह हवा भरता
इंसान के बढ़ते कसूरों पर
बस, मुस्कराता है
फोड़ता है जब पाप का घड़ा
तब आवाज भी नहीं लगाता है।
कहें दीपक बापू
अहंकार ज्ञान को खा जाता है,
मद बुद्धि को चबा जाता है,
अपने दुष्कर्म पर कितनी खुशफहमी होती लोगों को
किसी को कुछ दिख नहंी रहा है,
पता नहीं उनको कोई हिसाब लिख रहा है,
गिरते हैं झूठ की ऊंचाई से लोग,
किसी को होती कैद
किसी को घेर लेता रोग
उनकी हालत पर
जमीन पर खड़े इंसानों को तरस ही जाता है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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Thursday, September 26, 2013

नाटकीय अंदाज-हिन्दी व्यंग्य कविता(natkiy andaz-hindi vyangya kavita)



दूसरे को विष देने के लिये सभी तैयार
पर  हर कोई खुद अमृत चखता है,
घर से निकलता है  अपनी  खुशियां ढूंढने
पूरा ज़माना बड़े जोश के साथ
दूसरों को सताने के लिये
दर्द की पुड़िया भी साथ रखता है।
कहें दीपक बापू
बातें बहुत लोग करते हैं
सभी का भला करने की
मगर आमादा रहते
अपना मतलब निकालने के वास्ते,
जुबां से करते गरीबों की मदद की बात
आंखें उनकी ढूंढती अपनी कमीशने के रास्ते,
बेबसों की मदद का नारा लोग  देते,
पहले अपने लिये दान का चारा लेते,
नाटकीय अंदाज में सभी को रोटी
दिलाने के लिये आते वही सड़कों पर
जिनके घर में चंदे से भोजन पकता है।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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Tuesday, September 17, 2013

हादसे होते रहेंगे-हिन्दी व्यंग्य कविता



देश में तरक्की बहुत हो गयी है
यह सभी कहेंगे,
मगर सड़कें संकरी है
कारें बहुत हैं
इसलिये हादसे होते रहेंगे,
रुपया बहुत फैला है बाज़ार में
मगर दौलत वाले कम हैं,
इसलिये लूटने वाले भी
उनका बोझ हल्का कर
स्वयं ढोते रहेंगे।
कहें दीपक बापू
टूटता नहीं तिलस्म कभी माया का,
पत्थर पर पांव रखकर
उस सोने का पीछा करते हैं लोग
जो न कभी दिल भरता
न काम करता कोई काया का,
फरिश्ते पी गये सारा अमृत
इंसानों ने शराब को संस्कार  बना लिया,
अपनी जिदगी से बेजार हो गये लोगों ने
मनोरंजन के लिये
सर्वशक्तिमान की आराधना को
खाली समय
पढ़ने का किस्सा बना लिया,
बदहवास और मदहोश लोग
आकाश में उड़ने की चाहत लिये
जमीन पर यूं ही गिरते रहेंगे।
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Monday, September 9, 2013

हिन्दी दिवस पर व्यंग्य कविता-एक दिन की रौशनी (hindi diwas par vyangya kavita-ek din ki roshni



14 सितंबर हिन्दी दिवस के बहाने,
राष्ट्रभाषा का महत्व मंचों पर चढ़कर
बयान करेंगे
अंग्रेजी के सयानो।
कहें दीपक बापू
अंग्रेजी में रंगी जिनकी जबान,
अंग्रेजियत की बनाई जिन्होंने पहचान,
हर बार की तरह
साल में एक बार
हिन्दी का नाम जपते नज़र आयेंगे।
लिखें और बोलें जो लोग हिन्दी में
श्रोताओं और दर्शकों की भीड़ में
भेड़ों की तरह खड़े नज़र आयेंगे,
विद्वता का खिताब होने के लिये
अंग्रेजी का ज्ञान जरूरी है
वरना सभी गंवार समझे जायेंगे,
गुलामी का खून जिनकी रगों में दौड़ रहा है
वही आजादी की मशाल जलाते हैं
वही लोग हमेशा की तरह हिन्दी भाषा के  महत्व पर
एक दिन रौशनी डालने आयेंगे।

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