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Monday, September 9, 2013

हिन्दी दिवस पर व्यंग्य कविता-एक दिन की रौशनी (hindi diwas par vyangya kavita-ek din ki roshni



14 सितंबर हिन्दी दिवस के बहाने,
राष्ट्रभाषा का महत्व मंचों पर चढ़कर
बयान करेंगे
अंग्रेजी के सयानो।
कहें दीपक बापू
अंग्रेजी में रंगी जिनकी जबान,
अंग्रेजियत की बनाई जिन्होंने पहचान,
हर बार की तरह
साल में एक बार
हिन्दी का नाम जपते नज़र आयेंगे।
लिखें और बोलें जो लोग हिन्दी में
श्रोताओं और दर्शकों की भीड़ में
भेड़ों की तरह खड़े नज़र आयेंगे,
विद्वता का खिताब होने के लिये
अंग्रेजी का ज्ञान जरूरी है
वरना सभी गंवार समझे जायेंगे,
गुलामी का खून जिनकी रगों में दौड़ रहा है
वही आजादी की मशाल जलाते हैं
वही लोग हमेशा की तरह हिन्दी भाषा के  महत्व पर
एक दिन रौशनी डालने आयेंगे।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com
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Sunday, July 13, 2008

जिंदगी में असहज हो जाओगे-हिन्दी शायरी



जितना चाहोगे

उतना असहज हो जाओगे

दौड़ते हुए बहुत कुछ जुटा लोगे

अपने जीने का सामान

पर फिर उसका बोझ नहीं

उठा पाओगे

जिंदगी की गति चलती है

अपनी गति से

उसे ज्यादा तेज दौड़ने की कोशिश न करो

असहजता में जो पाया है

उसको भी नहीं भोग पाओगे
........................
दीपक भारतदीप

Friday, July 4, 2008

चिराग की रौशनी और उम्मीद-हिंदी शायरी

शाम होते ही
सूरज के डूबने के बाद
काली घटा घिर आयी
चारों तरफ अंधेरे की चादर फैलने लगी थी
मन उदास था बहुत
घर पहुंचते हुए
छोटे चिराग ने दिया
थोड़ी रौशनी देकर दिल को तसल्ली का अहसास
जिंदगी से लड़ने की उम्मीद अब जगने लगी थी
.........................................
दीपक भारतदीप

Thursday, June 26, 2008

वह तुम ही होते-हिंदी शायरी

बेजान पत्थरों में ढूंढते हैं आसरा
फिर भी नहीं जिंदगी में मसले हल नहीं होते
कोई हमसफर नहीं होता इस जिंदगी में
अपने दिल की तसल्ली के लिये
हमदर्दों की टोली होने का भ्रम ढोते
सभी जानते हैं यह सच कि
अकेले ही चलना है सभी जगह
पर रिश्तों के साथ होने का
जबरन दिल को अहसास करा रहे होते
कहें महाकवि दीपक बापू
क्यों नहीं कर लेते अपने अंदर बैठे
शख्स से दोस्ती
जिससे हमेशा दूर होते
वह तुम ही होते
........................................

दीपक भारतदीप

Sunday, April 27, 2008

अमन कहाँ से आयेगा यहाँ-हिन्दी शायरी

लुट जाने का खतरा अब
गैरो से नहीं सताता
अपनों को ही यह काम
अच्छी तरह करना आता

पहरेदारी अपने घर की किसे सौेपे
यकीन किसी पर नहीं आता
जहां भी देखा है लुटते हुए लोगों को
अपनों का हाथ नजर आता
कई बाग उजड़ गये हैं
माली अब फूल नहीं लगाता
इंतजार रहता है उसे
कोई आकर लगा जाये पेड़ तो
वह उसे बेच आये बाजार में
इस तरह अपना घर सजाता
नाम के लिये करते हैं मोहब्बत
बेईमानी से उनकी है सोहबत
जमाने के भलाई का लगाते जो लोग नारा
लूट में उनको ही मजा आता
कहें भारतदीप
मन में है उथलपुथल तो
अमन कहां से आयेगा यहां
जिनके हाथ में बागडोर होती चमन की
किसी और से क्या खतरा होगा
वही उसका दुश्मन हो जाता
..................................

Sunday, April 6, 2008

कोई दूसरा लगता हैं शख्स-हिन्दी क्षणिकाएँ

कभी किसी की बरात में
तो कभी किसी की शवयात्रा में
और कभी किसी की तबीयत का
हाल जानने अस्पताल में
जहां कदम ले जायें
वहीं हम भी चले जाते हैं
पर जानते हैं कि
जहां खुशियां करती बसेरा
वहीं गम भी आशियाना बनाते है
किसी की खुशी में पागल न हो
किसी का गम देख बदहाल न हो
इसलिये कहीं दिल साथ नहीं ले जाते हैं
...............................................................

कभी-कभी वह दिन
हमें याद आते हैं
जब ढलने को होता सूरज
लहराती थी शाम
हमारे हाथ में होता था जाम
हम थे नशे के गुलाम
अब भी तन्हाई में आती है याद
अपना ही देखते अक्स
कोई दूसरा लगता है शख्स
जिसके हाथ में होता था जाम
जो होता पियक्कड़ और बदनाम
फिर सोचते उससे हमें क्या काम

Wednesday, April 2, 2008

मयखाने से जब निकले थे-हिन्दी शायरी

मयखाने से जब निकले थे
आखिरी बार
तब सोचा न था कि अब
यहां फिर कभी नहीं हम नहीं आयेंगे
अब भी देखते हैं राह पर चलते हुए
मयखानों की तरफ
पर अस्पताल जाने के डर से
मूंह फेर जाते हैं
घर में रखी आधी बोतल देखकर भी
डर जाते हैं
मन में आते ही कब पी जायेंगे
पता नहीं कब मय के डर के मुक्त हो पायेंगे

Sunday, February 10, 2008

भला कौन खुश रहा है इस भीड़ में-कविता साहित्य

अपने कुछ लोग खो गए
इस शहर की भीड़ में
उनके पते लिखे हैं
बहुत से कागजों पर
जो पड़े हैं फाईलों की भीड़ में

किसे ढूंढें और क्यों
ढेर सारे सवाल आते हैं सामने
किसी से मिलने की वजह
चाहिए हमको
जाएं मिलने तो वह भी
उठाते आने की वजह के प्रश्न सामने
समय निकला जाता है
जूझते हुए प्रश्नों की भीड़ में

अपने ही जाल में उलझे लोग
फुरसत नहीं पाते
जीवन की इस भागमभाग से
ओढ़ लिया है दिमाग में तनाव
कब ले सकते हैं दिल से काम
नहीं आता समझ में
खोये हुए है लोग
अपनी समस्याओं की भीड़ में

हम भीड़ में कहाँ तलाशें उनको
जो छोड़ नहीं पाते उसको
डरते हैं अपनी तन्हाई से
जीतने की क्या सोचेंगे वह
हारे हैं हर पल जिन्दगी के लड़ाई से
अकेले में अपने पहचाने का डर
उनके मन में रहता है
खोए रहना चाहते हैं भीड़ में

अकेले ही खडे देख रहे हैं उनको
वहाँ हाँफते और कांपते
जबरन हंसने की कोशिश करते हुए
कभी हमारे तन्हाई पर भी
हँसते हैं दूसरों के साथ
दूर रखते हैं हमारे से अपना हाथ
पर हम भी हँसते हैं
साथी है हमारी यह तन्हाई
भला कौन खुश रहा है इस भीड़ में
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Sunday, December 30, 2007

बाजार के बजते ढोल

कहते हैं कि तौल-मोल के बोल
पर जमाने को लग गई है
ऐसी नजर कि
अब बिना भाव-ताव किये कोई
नहीं रहा अपनी जुबान से बोल
जहाँ तक कान जाते हैं
सुनाई देते हैं
बाजार के बजते हैं ढोल
कोई कहता यह खरीदो
कोई कहता यह पुराना बेच दो
सौदे किये जाते हुए और बेचने वाले मचाते शोर
ताकि खुल न जाये पोल
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अपने मन में है बस व्यापार
बाहर ढूंढते हैं प्यार
मन में ख्वाहिश
सोने, चांदी और धन
के हों भण्डार
पर दूसरा करे प्यार
मन की भाषा में हैं लाखों शब्द
पर बोलते हुए जुबान कांपती है
कोई सुनकर खुश हो जाये
अपनी नीयत पहले यह भांपती है
हम पर हो न्यौछावर
पर खुद किसी को न दें सहारा
बस यही होता है विचार
इसलिए वक्त ठहरा लगता है
छोटी मुसीबत बहुत बड़ा कहर लगता है
पहल करना सीख लें
प्यार का पहला शब्द
पहले कहना सीख लें
तो जिन्दगी में आ जाये बहार
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Friday, December 28, 2007

सिक्स सिक्सर जैसा आईडियल

लड़के ने दिया लडकी को
'आई लव यू' का प्रपोजल
लडकी ने 'सोचूँगी पर मेरी पसंद है
कि इंडियन आइडियल जैसा कोई'
कहकर लगा दिया डिस्पोजल
वह खुश हो गया
और हर रोज उसकी राह में खडा होकर
नित नए रचता स्वांग
जब वह निकलती वहाँ से
फिल्मी गाने ऐसे गाता
जैसे पी रखी हो भांग
वह उसे मुस्कराकर देखती और निकल जाती
वह खुश होता हर पल
कई दिन तक चला यह नाटक
पर अभी तक मंजूर
नहीं हुआ था उसका प्रपोजल

उस दिन लडकी उसके पास से गुजरी
और जोर से बोली
'बंद करो यह फिल्मी गाने
अब नहीं रह गए मेरे लिए इसके मायने
अब मेरी पसंद है
ट्वंटी ओवर में सिक्स सिक्सर
लगाने वाले जैसा आइडियल'
लड़का हक्का बक्का खडा रहा
ओपनिंग होने से पहले ही
उसके प्यार का डिस्पोजल
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Thursday, December 27, 2007

हिट ब्लोगर ने प्रेम में नो कमेन्ट पाया

कमेन्ट पाने का उसने कीर्तिमान बनाया
जोश में आकर उसने लिखा
अपनी प्रेयसी को प्रेम पत्र
इकतरफा प्रेम ने उसे बनाया शायर
बहुत दिन तक सड़क किनारे खडे होकर
वह अपनी प्रियतमा को देखता
उसका दिल फिर भी नहीं आया
शायर बन गया ब्लोगर
उसकी कविताओं ने जमकर हिट पाया
'प्रियतमा तुम मेरा ब्लोग पढ़ लो
देखो तुम पर कवितायेँ लिखते
कितना हिट हो गया हूँ
कमेन्ट में मैंने कीर्तिमान बनाया
तुम अब पसीज जाओ
मेरे इस प्रेम पत्र पर
प्रेम भरी कमेन्ट लगाओ
बस यही कमी रह गई है
वैसे मैंने खूब नाम कमाया'

लौटती डाक से जवाब आया
उसने लिफाफा खोला
और अपने ही पत्र के नीचे
'नो कमेंट' लिखा पाया
हतप्रभ ब्लोगर चिल्लाने लगा
"कैसा है यह ऊपर वाले का खेल
जिसके लिए इम्तहान देकर पास किया
वही कर गई फेल
उसके प्रेम में कितनी कवितायेँ लिखीं
कमेन्ट का अंबार लगाया
उसी ने 'नो कमेन्ट' का बोर्ड दिखाया"

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