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Saturday, July 4, 2009

‘सविता भाभी’ ने 'मस्त राम' को पीटा-व्यंग्य आलेख (savita bhabhi and mastram in hindi)

कुछ दिन पहले तक शायद बहुत कम लोग जानते होंगे कि ‘सविता भाभी’ नाम की कोई वेबसाइट होगी जिस पर ‘लोकप्रिय’ सामग्री भी हो सकती है। इस पर प्रतिबंध लगने के बाद उसकी खोज खबर बढ़ गयी है। सच कहें तो इस ‘सविता भाभी’ अपने पाठों को हिट कराने का जोरदार नुस्खा बनता नजर आ रहा है-यह लेख भी इसी उद्देश्य से हम लिख रहे हैं कि चलो कुछ और हिट बटोर लो क्योंकि हम कथित रूप से उस तरह का लोकप्रिय साहित्य लिखने में अपने को असमर्थ पाते हैं-हां, अगर कहीं से जोरदार पैसे की आफर आ जाये तो जोरदार कहानियां हैं पर मु्फ्त में तो यही लिखेंगे। नामा आ जाये तो नाम वैसे ही होता है भले बदनाम हो जाये।
किस्से पर किस्सा याद आ ही जाता है। हमने अपने ब्लाग में अपने नाम के साथ मस्तराम शब्द जोड़ा तो पाया कि वह हिट ले रहा है। उसी तरह हमने अंग्रेजी और हिंदी में मस्तराम के लेबल जोड़े। उससे कुछ पाठ हिट होने लगे। एक बार एक ब्लाग लेखक ने इस पर आपत्ति की तो हमने पता किया कि मस्तराम साहित्य में लोकप्रिय सामग्री लिखी जाता है अलबत्ता उसकी लोकप्रियता का दायदा उत्तरप्रदेश तक ही सीमित है। इधर मध्यप्रदेश में लोगों को अधिक जानकारी नहीं है। बहरहाल हमारी नानी हमसे मस्तराम कहती थी जो किसी भी आपत्ति को स्वीकार न कर हम उसका उपयोग करते हैं-उसमें सामग्री यही होती है।
इधर सविता भाभी ने मस्तराम को पीछे छोड़ दिया है। अब क्या करें? उसके उपयोग के लिये हमारे पास कोई तर्क नहीं है। हमारे पूरे खानदान में किसी महिला का नाम सविता नहीं है जिसे झूठमूठ ही आदर्श के रूप में प्रस्तुत कर ब्लाग का नाम लिखे या पाठों पर लेबल लगायें। ‘सविता भाभी’ प्रतिबंध से पहले कितनी लोकप्रिय थी यह तो पता नहीं पर इस समय सर्च इंजिनों यह शब्द सबसे अधिक खोजा गया है। कहते हैं कि किसी भी चीज या आदमी को दबाओ उतनी ही शिद्दत से ऊपर उठ कर आती है। यही हाल ‘सविता भाभी’ का है। एक काल्पनिक स्त्री पात्र और उसका नाम इस समय इंटरनेट प्रयोक्ताओं के लिये खोजबीन का विषय हो गया है।
इंटरनेट पर पोर्न वेबसाईटों का जाल कभी खत्म नहीं हो सकता। देश के अधिकतर प्रयोक्ता ऐसा वैसा देखने के लिये ही अधिक उत्सुक हैं और उनकी यही इच्छा संचार बाजार का यह एक बहुत बड़ा आधार बनी हुई हैं।
एक मजे की बात है कि हमेशा ही नारी स्वतंत्रता और और विकास के पक्षधर सार्वजनिक रूप से अश्लीलता रोकने का स्वतंत्रता के नाम पर तो विरोध करते हैं पर अंतर्जाल पर ‘सविता भाभी’ की रोक पर कोई सामने नहीं आया। लगभग यही स्थिति उनकी है जो परंपरावादी हैं और अश्लीलता रोकने का समर्थन करते हैं वह भी इसके समर्थन में आगे नहीं आये।
इधर अनेक अंतर्जाल लेखकों ने यह बता दिया है कि ‘सविता भाभी’ पर कैसे पहुंचा जा सकता है। हमने यह वेबसाईट देखने का प्रयास नहीं किया मगर इस पर लगा प्रतिबंध हमारे लिये कौतुक और जिज्ञासा का विषय है। इधर हमारे एक पाठ ने जमकर हिट पाये तो वह जिज्ञासा बढ़ गयी।
हम भी लगे गुणा भाग करने। पाया कि मस्तराम उसके मुकाबले एकदम फ्लाप है।
उस दिन इस लेखक ने सविता भाभी वेबसाईट पर लगे प्रतिबंध पर एक आलेख लिखा। उसका नाम भी पहली बार अखबार में देखा था। वह पाठ ब्लाग स्पाट के ब्लाग पर लिखा गया। हिंदी के सभी ब्लाग एक जगह दिखाने वाले एक फोरम ब्लाग वाणी पर इस लेखक के केवल ब्लाग स्पाट के ही ब्लाग दिखते हैं। वहां ब्लाग लेखक मित्रों की आवाजाही होती है और आम पाठक तो हमारे पाठों को सर्च इंजिनों में सीधे ही पढ़ते हैं। वहां सविता भाभी पर लिखा गया पाठ फ्लाप हो गया। उसे हमने शाम को डालाा था और अगली सुबह वही पाठ हमें सुस्त पड़ा दिखा। जैसे कह रहा हो कि तुमने शीर्षक में ही अगर ‘सविता भाभी’ लिखा होता तो मेरा यह हाल न होता।’
हमने उसे पुचकारा और शाम तक इंतजार करने के लिये कहा। शाम को आते ही उस पाठ को वर्डप्रेस के प्लेट फार्म ‘हिंदी पत्रिका’ पर ढकेल दिया। उस पर शीर्षक हिंदी और अंग्रेजी में लिखा-यह अलग बात है कि हिंदी में ‘सविता भाभी’ छूट गया पर अंग्रेजी में डालना नहीं भूले।
अपने दायित्व की इति श्री करने के बाद हमने उससे मूंह फेर लिया। डेढ़ दिन बाद जब वर्डप्रेस के डेशबोर्ड को खोला तो वह पाठों के शीर्ष पर मौजूद होकर वह हमें चिढ़ा रहा था-देखो हिंदी में लिखना था ‘सविता भाभी पर प्रतिबंध’ और लिख दिया केवल ‘पर प्रतिबंध’। हमने अंदर घुसकर देखा तो आंखें फटी रह गयी। कहां वह पाठ छह पाठकों की संख्या लेकर ब्लागवाणी में सुपर फ्लाप था और कहां वह डेढ़ सौ के पास पहुंच गया। हिंदी में शब्द डालने का अफसोस इसलिये नहीं रहा क्योंकि उसे अंग्रेजी के शब्द से ही खोजा गया था।
फिर हमने मस्तराम की खोजबीन की तो देखा कि उसके आंकड़े नगण्य थे। मस्तराम नाम की अंतर्जाल पर लोकप्रियता ठीक ठाक है। हम तो हैरान होते हैं जब मस्तरामी ब्लाग के आंकड़े देखते हैं। कुछ मत लिखो पर उस पाठकों का आगमन यथावत है। हमें याद है जब पत्रकार थे तब हमारे साथ एक बाजार संपादक हुआ करते थे। उनके शीर्ष ऐसे ही होते थे। ‘मिर्ची भड़की’, ‘सोना लुढ़का’, ‘चांदी उछली’ और ‘तेल पिछड़ा’। उनकी अनुपस्थिति में हम उनका काम देखते थे। तब ऐसे ही शीर्षक लगाते थे। उनकी देखा देखी हम अपने खेल समाचारों पर कभी कभी खेल संपादक के रूप में हम भी लिख देते थे कि‘अमुक टीम ने अमुक को पीटा’। इस बात को अनेक बरस हो गये हैं पर याद तो आती है। इस घटनाक्रम पर हमारे दिमाग में एक ही शीर्षक आ रहा था कि ‘सविता भाभी’ ने ‘मस्तराम’को पीटा।
आगे क्या होगा पता नहीं पर इस देश में अंतर्जाल पर व्यवसाय ढूंढ रहे लोग इसे नुस्खे के रूप में अपना सकते हैं। आप देखना कि ‘सविता भाभी’ नाम के अनेक उत्पाद और पाठ यहां दिख सकते हैं। प्रतिबंध लगा यह एक अलग विषय है पर जिस तरह अखबार में पढ़कर लोग इस पर आ रहे हैं उस पर विचार करना चाहिये कि कहीं इस तरह के प्रयास तो नहीं हो रहे कि इसके नाम के सहारे अंतर्जाल पर बाजार की नैया पर लगायी जाये क्योंकि अंतर्जाल का बाजर नियमित रूप से बना रहे इसके लिये टेलीफोन कंपनियों से विज्ञापन पाने वाले व्यवसायिक इस तरह के प्रयास करेंगे। मस्तराम से अधिक आशा नहीं की जा सकती।
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Wednesday, March 11, 2009

दर्द चाहे जितना खरीदो-व्यंग्य कविता

वह दिखाते अपनी तस्वीरों और शब्दों में लोगों के घाव।
प्रचार में चलता है इसलिये हमेशा चलता है उनका दाव।।
अपने दर्द से छिपते हैं दुनियां के सभी लोग
दूसरे के आंसू के दरिया में चलाते दिल की नाव।।
जज्बातों के सौदागर इसलिये कोई दवा नहीं बेचते
दर्द चाहे जब जितना खरीदो, एक किलो या पाव।।

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Wednesday, March 4, 2009

फासले पर रखो अपना विश्वास-हिंदी शायरी

जिसके लिये प्रेम होता दिल में पैदा
उसके पास जाने की
इच्छा मन में बढ़ जाती है
आंखें देखती हैं पर
बुद्धि अंधेरे में फंस जाती है
कुंद पड़ा दिमाग नहीं देख पाता सच
कहते हैं दूर के ढोल सुहावने
पर दूरी होने पर ही
किसी इंसान की असलियत समझ में आती है
इसलिये फासले पर रखो अपना विश्वास
किसी से टकराने पर
हादसों से जिंदगी घिर जाती है

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Wednesday, September 24, 2008

हादसे के बाद ही क्यों आते हैं मोहब्बत के पैगाम-व्यंग्य कविता

हादसों के बाद ही क्यों आते हैं
मोहब्बत के सभी जगह पैगाम
दिल में बसे अल्फाजों को
चाहे जब भेज दो
इंतजार का क्या काम

कहीं शैतानों की वारदात होते ही
फरिश्ते करने लगते हैं
अमन लाने का काम
एक हादसें का असर खत्म होते ही
फिर नजर नहीं आते
शायद दूसरे के इंतजार में सो जाते
और शैतान कर जाते अपना काम
वारदात से दे जाते फरिश्तों को
अपने करने का नाम

ढेर सारे मोहब्बत और अमन के संदेश और कहानियां
चलकर आ जाती हैं सामने
पढ़ने और देखने के लिये
वह वह पहले क्यों नहीं आती
जब होता है जहां में आम इंसान मोहब्बत और अमन लिये
हादसे से हैरान लोग
शैतानों के सुनते हैं नाम
शायद आम इंसानों के कान खुले देखकर
फरिश्ते लेकर पहुंचते हैं अपना मोहब्बत और अमन का पैगाम
वारदात की कटु ध्वनि का असर अभी खत्म नहीं होता
कि शोर के साथ आ जाता अमन का पैगाम

कहें महाकवि दीपक बापू
दायें तरफ दिखती शैतान की प्रेम दास्तान
बायें छपते फरिश्तों के अमन के बयान
दोनों के बीच कैसा है रिश्ता
फूल और कांटे जैसा दिखता
दुनियां बनाने वाले ने
फरिश्तों की परीक्षा के लिये
शैतान बनाया
या शैतान को कभी कभार फुरसत
देने के लिये
फरिश्तों को बनाया
हम तो ठहरे आम इंसान
यह कभी समझ में नहीं आया
एक तरफ हादसों का किनारा है
दूसरी तरफ अमन का नारा
बीच में खड़े सभी लोग
इधर देखते तो
उधर से आवाज आती
उधर देखते तो
इधर से हादसे की खबर आती
कहीं धमाकों की जोरदार आवाज
तो कही अमन की कहानियां
ऐसी जंग चलती दिख रही है
जिसका कब होगा अंजाम
जुबान होते हुए भी गूंगे
कान होते हुए भी बहरे
आंख होते हुए ही प्रकाश विहीन
हो गये है हम इंसान आम
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Thursday, August 28, 2008

असली शैतानों को नकली देवता नहीं हरा सकते-हिंदी शायरी

प्रचार माध्यमों में अपराधियों की
चर्चा कुछ इस तरह ऐसे आती है
कि उनके चेहरे पर चमक छा जाती है
कौन कहां गया
और क्या किया
इसका जिक्र होता है इस तरह कि
असली शैतान का दर्जा पाकर भी
अपराधी खुश हो जाता है

पर्दे के नकली हीरो का नाम
देवताओं की तरह सुनाया जाता है
उसकी अप्सरा है कौन नायिका
भक्त है कौन गायिका
इस पर ही हो जाता है टाइम पास
असली देवताओं को देखने की किसे है आस
दहाड़ के स्वर सुनने
और धमाकों दृश्य देखने के आदी होते लोग
क्यों नहीं फैलेगा आतंक का रोग
पर्दे पर भले ही हरा लें
असली शैतानों को नकली देवता नहीं हरा सकते
रोने का स्वर गूंजता है
पर दर्द किसे आता है

कविता हंसने की हो या रोने की
बस वाह-वाह किया जाता है
दर्द का व्यापार जब तक चलता रहेगा
तब तक जमाना यही सहेगा
ओ! अमन चाहने वाले
मत कर अपनी शिकायतें
न दे शांति का संदेश
यहां उसका केवल मजाक उड़ाया जाता है

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Sunday, August 24, 2008

कविता का भ्रुण तो भूख और प्यास की कोख में पलता है-व्यंग्य हिंदी शायरी

एक कवि पहुंचा हलवाई की दुकान
पर और बोला
‘‘जल्दी जलेबी बना दो
कुछ कचौड़ी या पकौड़ी भी खिला दो
भूख लगी है
पानी भी पिला देना
पेट भर लूं तो दिमाग शांत हो जायेगा
उसके बाद ही लिखूंगा कविता
भूखे पेट और प्यासे दिल से
मैं कुछ भी नहीं लिख पाता’’

हलवाई बोला
‘‘कमाल है
अभी यहां एक कवि बैठा लिख रहा था
भूखा प्यासा दिख रहा था
मेरी पुरानी जान पहचान वाला था
इसलिये दया आयी
मैंने उसके पास कचैड़ी और जलेबी भिजवाई
उसने मुझे वापस लौटाई
और बोला
‘चाचा, भरे पेट और खुश दिल से भला
कभी कविता लिखी जाती है
वह तो भावविहीन शब्दों की
गठरी बनकर रह जाती है
कविता का भ्रुण तो भूख प्यास की कोख में पलता है
तभी दिल कहने के लिये मचलता है
अगर पेट भर जायेगा
तो काव्य एक अर्थहीन शब्दों का
पिटारा नजर आयेगा
आज तो सारा दिन भूख रहना है
लिखने की प्यास बुझाने के लिये यह सहना है
कविता में दर्द तभी आता’
वह तो चला गया कहकर
मुझे उसका एक एक शब्द याद आता
देर इसलिये हो रही यह सब बनाने में
क्योंकि मेरा हाथ इधर से उधर चला जाता’’

उसकी बात सुनकर घबड़ा गया कवि
‘भूल जाओ यह सब बातें
घबड़ाओगे दिन में तो डरायेंगी रातें
बिना दर्द की कविताओं का ही जमाना है
भूख से भला किसे रिश्ता निभाना है
यह सही है कि
भूख और प्यास की कोख में जो भ्रुण पलता है
वही कविता के रूप में चलता है
अगर रह सकते हो ऐसे तो
तुम भी कर लो कविताई
फिर नहीं रहोगे हलवाई
पर पहले मेरा पेट भर दो
कैसी भी बनती है लिखूंगा कविता
मुझसे ऐसे नहीं लिखा जाता

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Thursday, August 14, 2008

शैतान खड़ा करना भी जरूरी है-हास्य व्यंग्य

शैतान कभी इस जहां में मर ही नहीं सकता। वजह! उसके मरने से फरिश्तों की कदर कम हो जायेगी। इसलिये जिसे अपने के फरिश्ता साबित करना होता है वह अपने लिये पहले एक शैतान जुटाता है। अगर कोई कालोनी का फरिश्ता बनना चाहता है तो पहले वह दूसरी कालोनी की जांच करेगा। वहां किसी व्यक्ति का-जिससे लोग डरते हैं- उसका भय अपनी कालोनी में पैदा करेगा। साथ ही बतायेगा कि वह उस पर नियंत्रण रख सकता है। शहर का फरिश्ता बनने वाला दूसरे शहर का और प्रदेश का है तो दूसरे प्रदेश का शैतान अपने लिये चुनता है। यह मजाक नहीं है। आप और हम सब यही करते हैं।

घर में किसी चीज की कमी है और अपने पास उसके लिये लाने का कोई उपाय नहीं है तो परिवार के सदस्यों को समझाने के लिये यह भी एक रास्ता है कि किसी ऐसे शैतान को खड़ा कर दो जिससे वह डर जायें। सबसे बड़ा शैतान हो सकता है वह जो हमारा रोजगार छीन सकता है। परिवार के लोग अधिक कमाने का दबाव डालें तो उनको बताओं कि उधर एक एसा आदमी है जिससे मूंह फेरा तो वह वर्तमान रोजगार भी तबाह कर देगा। नौकरी कर रहे हो तो बास का और निजी व्यवसाय कर रहे हों तो पड़ौसी व्यवसायी का भय पैदा करो। उनको समझाओं कि ‘अगर अधिक कमाने के चक्कर में पड़े तो इधर उधर दौड़ना पड़ा तो इस रोजी से भी जायेंगे। यह काल्पनिक शैतान हमको बचाता है।
नौकरी करने वालों के लिये तो आजकल वैसे भी बहुत तनाव हैं। एक तो लोग अब अपने काम के लिये झगड़ने लगे हैं दूसरी तरफ मीडिया स्टिंग आपरेशन करता है ऐसे में उपरी कमाई सोच समझ कर करनी पड़ती है। फिर सभी जगह उपरी कमाई नहीं होती। ऐसे में परिवार के लोग कहते हैं‘देखो वह भी नौकरी कर रहा है और तुम भी! उसके पास घर में सारा सामान है। तुम हो कि पूरा घर ही फटीचर घूम रहा है।
ऐसे में जबरदस्ती ईमानदारी का जीवन गुजार रहे नौकरपेशा आदमी को अपनी सफाई में यह बताना पड़ता है कि उससे कोई शैतान नाराज चल रहा है जो उसको ईमानदारी वाली जगह पर काम करना पड़ रहा है। जब कोई फरिश्ता आयेगा तब हो सकता है कि कमाई वाली जगह पर उसकी पोस्टिंग हो जायेगी।’
खिलाड़ी हारते हैं तो कभी मैदान को तो कभी मौसम को शैतान बताते हैं। किसी की फिल्म पिटती है तो वह दर्शकों की कम बुद्धि को शैताना मानता है जिसकी वजह से फिल्म उनको समझ में नहीं आयी। टीवी वालों को तो आजकल हर दिन किसी शैतान की जरूरत पड़ती है। पहले बाप को बेटी का कत्ल करने वाला शैतान बताते हैं। महीने भर बाद वह जब निर्दोष बाहर आता है तब उसे फरिश्ता बताते हैं। यानि अगर उसे पहले शैतान नहीं बनाते तो फिर दिखाने के लिये फरिश्ता आता कहां से? जादू, तंत्र और मंत्र वाले तो शैतान का रूप दिखाकर ही अपना धंध चलाते हैं। ‘अरे, अमुक व्यक्ति बीमारी में मर गया उस पर किसी शैतान का साया पड़ा था। किसी ने उस पर जादू कर दिया था।’‘उसका कोई काम नहीं बनता उस पर किसी ने जादू कर दिया है!’यही हाल सभी का है। अगर आपको कहीं अपने समूह में इमेज बनानी है तो किसी दूसरे समूह का भय पैदा कर दो और ऐसी हालत पैदा कर दो कि आपकी अनुपस्थिति बहुत खले और लोग भयभीत हो कि दूसरा समूह पूरा का पूरा या उसके लोग उन पर हमला न कर दें।’
अगर कहीं पेड़ लगाने के लिये चार लोग एकत्रित करना चाहो तो नहीं आयेंगे पर उनको सूचना दो कि अमुक संकट है और अगर नहीं मिले भविष्य में विकट हो जायेगता तो चार क्या चालीस चले आयेंगे। अपनी नाकामी और नकारापन छिपाने के लिये शैतान एक चादर का काम करता है। आप भले ही किसी व्यक्ति को प्यार करते हैं। उसके साथ उठते बैैठते हैं। पेैसे का लेनदेन करते हैं पर अगर वह आपके परिवार में आता जाता नहीं है मगर समय आने पर आप उसे अपने परिवार में शैतान बना सकते हैं कि उसने मेरा काम बिगाड़ दिया। इतिहास उठाकर देख लीजिये जितने भी पूज्यनीय लोग हुए हैं सबके सामने कोई शैतान था। अगर वह शैतान नहीं होता तो क्या वह पूज्यनीय बनते। वैसे इतिहास में सब सच है इस पर यकीन नहीं होता क्योंकि आज के आधुनिक युग में जब सब कुछ पास ही दिखता है तब भी लिखने वाले कुछ का कुछ लिख जाते हैं और उनकी समझ पर तरस आता है तब लगता है कि पहले भी लिखने वाले तो ऐसे ही रहे होंगे।
एक कवि लगातार फ्लाप हो रहा था। जब वह कविता करता तो कोई ताली नहीं बजाता। कई बार तो उसे कवि सम्मेलनों में बुलाया तक नहीं जाता। तब उसने चार चेले तैयार किये और एक कवि सम्मेलन में अपने काव्य पाठ के दौरान उसने अपने ऊपर ही सड़े अंडे और टमाटर फिंकवा दिये। बाद में उसने यह खबर अखबार में छपवाई जिसमें उसके द्वारा शरीर में खून का आखिरी कतरा होने तक कविता लिखने की शपथ भी शामिल थी । हो गया वह हिट। उसके वही चेले चपाटे भी उससे पुरस्कृत होते रहे।
जिन लड़कों को जुआ आदि खेलने की आदत होती है वह इस मामले में बहुत उस्ताद होते हैं। पैसे घर से चोरी कर सट्टा और जुआ में बरबाद करते हैं पर जब उसका अवसर नहीं मिलता या घर वाले चैकस हो जाते हैं तब वह घर पर आकर वह बताते हैं कि अमुक आदमी से कर्ज लिया है अगर नहीं चुकाया तो वह मार डालेंगे। उससे भी काम न बने तो चार मित्र ही कर्जदार बनाकर घर बुलवा लेंगे जो जान से मारने की धमकी दे जायेंगे। ऐसे में मां तो एक लाचार औरत होती है जो अपने लाल को पैसे निकाल कर देती है। जुआरी लोग तो एक तरह से हमेशा ही भले बने रहते हैं। उनका व्यवहार भी इतना अच्छा होता है कि लोग कहते हैं‘आदमी ठीक है एक तरह से फरिश्ता है, बस जुआ की आदत है।’
जुआरी हमेशा अपने लिये पैसे जुटाने के लिये शैतान का इंतजाम किये रहते हैं पर दिखाई देते हैं। उनका शैतान भी दिखाई देता है पर वह होता नहीं उनके अपने ही फरिश्ते मित्र होते हैं। वह अपने परिवार के लोगों से यह कहकर पैसा एंठते हैं कि उन पर ऐसे लोगों का कर्जा है जिनको वापस नहीं लौटाया तो मार डालेंगे। परिवार के लोगो को यकीन नहीं हो तो अपने मित्रों को ही वह शैतान बनाकर प्रस्तुत कर दिया जाता है। आशय यह है कि शैतान अस्तित्व में होता नहीं है पर दिखाना पड़ता है। अगर आपको परिवार, समाज या अपने समूह में शासन करना है तो हमेशा कोई शैतान उसके सामने खड़ा करो। यह समस्या के रूप में भी हो सकता है और व्यक्ति के रूप में भी। समस्या न हो तो खड़ी करो और उसे ही शैतान जैसा ताकतवर बना दो। शैतान तो बिना देह का जीव है कहीं भी प्रकट कर लो। किसी भी भेष में शैतान हो वह आपके काम का है पर याद रखो कोई और खड़ा करे तो उसकी बातों में न आओ। यकीन करो इस दुनियां में शैतान है ही नहीं बल्कि वह आदमी के अंदर ही है जिसे शातिर लोग समय के हिसाब से बनाते और बिगाड़ते रहते हैं।
एक आदमी ने अपने सोफे के किनारे ही चाय का कप पीकर रखा और वह उसके हाथ से गिर गया। वह उठ कर दूसरी जगह बैठ गया पत्नी आयी तो उसने पूछा-‘यह कप कैसे टूटा?’उसी समय उस आदमी को एक चूहा दिखाई दिया।
उसने उसकी तरफ इशारा करते हुए कहा-‘उसने तोड़ा!
’पत्नी ने कहा-‘आजकल चूहे भी बहुत परेशान करने लगे हैं। देखो कितना ताकतवर है उसकी टक्कर से इतना बड़ा कप गिर गया। चूहा है कि उसके रूप में शेतान?"
वह चूहा बहुत मोटा था इसलिये उसकी पत्नी को लगा कि हो सकता है कि उसने गिराया हो और आदमी अपने मन में सर्वशक्तिमान का शुक्रिया अदा कर रहा कि उसने समय पर एक शैतान-भले ही चूहे के रूप में-भेज दिया।
’याद रखो कोई दूसरा व्यक्ति भी आपको शैतान बना सकता है। इसलिये सतर्क रहो। किसी प्रकार के वाद-विवाद में मत पड़ो। कम से कम ऐसी हरकत मत करो जिससे दूसरा आपको शैतान साबित करे। वैसे जीवन में दृढ़निश्चयी और स्पष्टवादी लोगों को कोई शैतान नहीं गढ़ना चाहिए, पर कोई अवसर दे तो उसे छोड़ना भी नहीं चाहिए। जैसे कोई आपको अनावश्यक रूप से अपमानित करे या काम बिगाड़े और आपको व्यापक जनसमर्थन मिल रहा हो तो उस आदमी के विरुद्ध अभियान छेड़ दो ताकि लोगों की दृष्टि में आपकी फरिश्ते की छबि बन जाये। सर्वतशक्तिमान की कृपा से फरिश्ते तो यहां कई मनुष्य बन ही जाते हैं पर शैतान इंसान का ही ईजाद किया हुआ है इसलिये वह बहुत चमकदार या भयावह हो सकता है पर ताकतवर नहीं। जो लोग नकारा, मतलबी और धोखेबाज हैं वही शैतान को खड़ा करते हैं क्योंकि अच्छे काम कर लोगों के दिल जीतने की उनकी औकात नहीं होती।
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Wednesday, July 16, 2008

प्यार में भी भला कभी वादे किये जाते हैं-हिंदी शायरी

जन्नत में बिताने के लिये सुहानी रात
आसमान से चांद सितारे तोड़कर लाने की बात
प्यार के संदेश देने वाले ऐसे ही
किये जाते हैं
बातों पर कर ले भरोसा
शिकार यूं ही फंसाये जाते हैं
प्यार किस चिडिया का नाम
कोई नहीं जान पाया
रोया वह भी जिसने प्यार का फल चखा
तरसा वह भी जिसने नहीं खाया
प्यार का जो गीत गाते
कोई ऊपर वाले का तो
कोई जमीन पर बसी सूरतों के नाम
अपनी जुबान पर लाते
कोई नाम को योगी
तो कोई दिल का रोगी
धोखे को प्यार की तरह तोहफे में देते सभी
जो भला दिल में बसता है
किसी को कैसे दिया जा सकता है
सर्वशक्तिमान से ही किया जा सकता है
उस प्यार के में भी भला
कभी वादे किये जाते हैं
....................................
दीपक भारतदीप

Friday, June 6, 2008

यौन साहित्य में कोई मलाई नहीं होती-व्यंग्य



किसी भी भाषा में यौन शिक्षा इतनी लोकप्रियता नहीं पाता जितनी चर्चा उसकी की जाती है। दरअसल इस साहित्य का प्रचार प्रसार बढ़ा केवल इसलिये कि अब शादी बड़ी आयु में होने लगी है और जब तक शादी नहीं हो युवा वर्ग इसके प्रति आकर्षक रहता है। इसी वर्ग में पाठक और दर्शक अधिक होते है इसलिये फिल्म, टीवी कार्यक्रम और समाचार पत्र अपने ग्राहक ढूंढते हैं और कुछ लेखक-जिनको यौन और यौवन की जानकारी सामान्य आदमी से अधिक नहीं होती- अपनी रचनाओं के पाठक बनाते हैं।

पिछली बार मेरे एक लेख पर एक ब्लाग लेखक ने बड़ी जोरदार टिप्पणी की थी हालांकि उसने वह लेख पूरा पढ़ा नहीं था। मैंने एक आलेख में लिखा था कि ‘पशु-पक्षियों और अन्य जीवों में यौन संबंध बनाये जाते हैं पर उनको किसी यौन शिक्षा की आवश्यकता नहीं होती।‘ टिप्पणी करने वाले ने लिखा कि ‘कुत्ते बिल्ली भी खाना खाते हैं पर उनको पाक कला की शिक्षा नहीं दी जाती।’
यह टिप्पणी व्यंग्यात्मक थी और उसका जवाब देने का मन होने के बावजूद मैंने नहीं दिया। मेरा वह आलेख मनुष्य की समस्त इंद्रियों के बारे में था। जहां तक आदमी के पाक कला में प्रवीण होने का सवाल है तो यह जरूरी नहीं है कि वह कहीं इसके लिये प्रशिक्षण लेने जाये। लड़कियां अपनी मां को देखते हुए ही सीख लेतीं हैं। अगर पाक कला सिखाने वाले केंद्र न भी हों तो चल जायेगा। कुत्ते बिल्ली इसलिये नहीं बनाते क्योंकि वह अपने मां बाप को ऐसा करते हुए नहीं देखते। मतलब साफ है कि देह में स्थित इंद्रियों के लिऐ किसी प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं है। फिर भी अगर पाक कला सीखने कोई जाता है तो उसमें मूर्खता की गुंजायश कम है। वहां लड़के लड़कियां साथ भी पाक कला सीखें तो कोई बात नहीं है। फिर पाक कला में भोजन और अन्य खाद्य सामग्रियां-जहां तक मेरी जानकारी है-सिखाईं जाती हैं। कम अधिक भोजन बन जाये तो चल जायेगा। नमक मिर्ची कम है तो भी पाक कला केंद्र में चल जायेगा। फिर भोजन तो चाहे जब खाया जा सकता है मगर यौन के लिए रात्रि का समय तय है। भोजन तो आदमी बचपन से लेकर पचपन तक करता है पर यौन संबंध की सीमायें हैं। अगर लोगों के लिए यौन शिक्षा केंद्र खोल दिये जायें और वहां भी भोजन की तरह शिक्षा दी जाये तो क्या हाल होगा? यह बताने की आवश्यकता नहीं है।
यह तो था उनकी बात का जवाब। यौन साहित्य लिखने वाले मानसिक रूप से बीमार होते हैं। यह इसलिये मै कह रहा हूं कि एक बार मैं खुद लोकप्रियता और पैसा प्राप्त करने के लिऐ यौन साहित्य लिखने का प्रयास कर रहा था। वह तो मेरे अध्यात्मिक संस्कार इतने प्रबल है कि चाहे जिस दुव्र्यसन में पड़ जाऊं निकल आता हूं-हां, आजकल तंबाकू से निकलने का प्रयास कर रहा हूं। उस समय की मुझे याद है कि मेरे मन की क्या हालत हो जाती थी? कुछ लोगों ने भ्रम फैला रखा है कि भारत में यौन शिक्षा का अभाव अनेक तरह की व्याधियों का जन्म दे रहा है। सिवाय मूर्खता के यह बातें और कुछ नहीं है। मैं पहले भी कह चुका हूं कि दक्षिण एशिया को उष्णकटिबंधीय क्षेत्र माना जाता है-तेज गर्मी से यहां लोगों में आलस अधिक रहता है और इसलिये उनके आर्थिक विकास पर भी इसका प्रभाव पड़ता है। गरीबी से जूझते लोगो के लिये लंबे समय तक यौन संबंध ही एक मनोरंजन का साधन रहा है। वैसे पश्चिम में कोई कामदेव नहीं हुआ है इसलिये यौन शिक्षा की आवश्यकता पड़ती है पर अपने देश में तो कामदेव पूजे जाते हैं और उनकी कृपा से लोगों की शक्ति अधिक होती है। इसके बावजूद यहां यौन साहित्य इसलिये अधिक प्रचलित हो गया है क्योंकि हमारा सभ्य समाज पश्चिमी शैली अपनाने लगा है। पहले छोटी ही आयु में शादी हो जाती थी और परिवार के लोग ही यौन शिक्षक की भूमिका बखूबी निभा लेते थे। अब बढ़ती शिक्षा के साथ बड़ी आयु में विवाह हो रहा है। फिर उस पर पश्चिम में अविष्कार की गयी चीजें यहां लोगों के लिये दहेज का सामान बन गयी हैं इसलिये चालीस तक की आयु के लड़के-विवाह न होने के कारण वह लड़के ही कहलाते है- उचित मूल्य न मिलने के कारण कुंवारे बैठे रहते हैं तो लड़कियों के पालक भी किसी राजकुमार की तलाश में रहते है और उनकी उमर भी बढ़ती जाती है। अपनी इंद्रियों पर जब बड़े-बड़े ऋषि मुनि नियंत्रण नहीं रख पाते तो आम आदमी की स्थिति ही क्या कही जा सकती है।

ऐसे मे यौन साहित्य वालों की बन आती है। मैंने एक ऐसे नाम को अपने सभी ब्लाग/पत्रिकाओं पर पाठों का पुंछल्ला बनाया जहां लोग यौन साहित्य की तलाश में जाते हैं और एक दो ब्लाग@पत्रिका का मुख ही बना दिया-बाद में नारद और चिट्ठाजगत की वजह से दो जगह से हटा लिया। आजकल मै देख रहा हूं वहां से पाठक आते हैं। उन ब्लाग/पत्रिकाओं पर भी आते हैं जो ब्लागवाणी पर नहीं है। मुझे प्रयोग करने होते हैं तो मैं अपने ब्लाग पर ही करता हूं इसलिये मैंने अनुभव किया कि लोगों की यौन साहित्य की भूख कम नहीं है। शरीर के अंगों के नाम पढ़कर कितने खुश होते है जैसे कोई मलाई खा रहे हों। वह अंग जो चोबीस घंटे उनके साथ हैं फिर भी उनको पढ़कर अपना विवेक खोते हुए भ्रमित होकर ऐसे साहित्य की तरफ जाते हैं। इसका कारण यह है कि बड़ी आयु के युवा वर्ग के लिऐ यौन क्रीड़ा एक रहस्यमय चीज होती है-केवल उन लोगों के लिए जो अनैतिक कामों में नही लगे रहते-और मनोरंजन के नाम पर उसे उनको पढ़ना अच्छा लगता है।

यौन साहित्य भी नंबर एक का कचड़ा है। अकल है नहीं और अंगों के नाम लिखकर अपने आपको श्रेष्ठ समझते हैं। एक दिलचस्प बात यह है कि सभी छद्म नाम से लिख रहे हैं। जो असली नाम से लिख रहे हैं उसमें ऐसा कुछ नहीं होता जिसे यौन साहित्य कहा जाये? ब्लागस्पाट के ब्लाग पर गलती से व्यस्क सामग्री दिखाने की सूचना पर हां लिख देते हैं फिर कहते हैं कि किसी ने चेतावनी लगा दी है। उस दिन एक चर्चा पढ़ी थी। सारे ब्लागर लगे थे उसे सहानुभूति जताने के लिये कि उसके ब्लाग पर तो कोई ऐसी सामग्री नहीं है जो आपत्तिजनक है। सैक्स शब्द ही ऐसा है कि आदमी की अकल पर ताला लगा देता है। जब मैंने पढ़ा तो लिख कर आया कि भाई जरा अपना ब्लाग चेक करो। सैटिंग में जाओ और व्यस्क सामगी पर नहीं लिखो। एक दिन लिख कर आया फिर दूसरे दिल वही चर्चा । भगवान ही जानता है कि इस बहाने प्रचार कर रहे है या भ्रमित है। किसी ने कहा डोमेन ले लो। वह ब्लाग लेखक डोमेन भी ले आया मगर चेतावनी नहीं हटी। अब बताओं जब ब्लाग स्पाट के ब्लाग पर ही डोमेन है तो वह काम तो अपने नियम से करेगा। हो सकता है कि यह डोमेन और ब्लाग का प्रचार हो क्योंकि यह चर्चा केवल ब्लाग लेखकों के पास ही जाती है और वहीं डोमेन के ग्राहक हो सकते हैं। मुझे तो लगा कि सैक्स के नाम से ऐसे ही प्रचार हो रहा है जैसे कभी ब्लाग लिखवाने के लिये ऐसे कथित सैक्स संबंधी ब्लाग लिखे गये। सच क्या है यह मैं नहीं जानता। सैक्स शब्द ही ऐसा है कि अच्छे भले आदमी का दिमाग काम करना बंद कर देता है।

आशय यह है कि जिनके लिये वास्तविक यौन संबंध कठिन है वही ऐसे यौन साहित्य के चक्कर में पड़कर अपना समय और बुद्धि नष्ट करते हैं। मगर किया क्या जाये? लोगों ने स्वयं अपनी यूवावस्था में जो आनंद उठाया पर एक उमर के बाद भूल गये और अपने बच्चों की मन की स्थिति पर दृष्टिपात नहीं करते। अपनी सामाजिक स्थिति बनाये रखने के लिए दहेज की रकम कम करने के लिए तैयार नहीं होता। सो समाज में ऐसे युवाओं का प्रतिशत बढ़ रहा है जो भ्रामक साहित्य का शिकार हो जाता है। हैरान तो तब होती है जहां यौन साहित्य की भनक हो वहां लोग ऐसे दौड़े जाते है जैसे कि मलाई मिल रही हो। वही हाल लेखकों और प्रकाशकों का भी है। वह सामग्री प्रचार भी ऐसे धीमे और प्रभावी स्वर में करते है जैसे मलाई बेच रहे हों। यौन साहित्य हो यौवन साहित्य इसकी आवश्यकता इतनी नहीं है जितनी बताई जाती है। फिर अंतर्जाल पर लिखने से क्या फायदा यहां तो ऐसी तस्वीरें वैसे ही खुलेआम उपलब्ध हैं जिनको कोई हिंदी ब्लाग लेखक शायद अपने ब्लाग पर दिखाना चाहे। मैंने जब से अपने ब्लाग/पत्रिकाओं के लिए फोटो छांटने का काम शुरू किया है तब से ऐसी तस्वीरे देखकर मेरा मन भी विचलित हो जाता है कि आंखें बंद कर अगले पृष्ठ के लिए क्लिक कर देता हूं। वह लोग अगर सोचते हैं कि अगर इस तरह गंदी गालियां लिखकर हिट हो रहे हैं तो सोचते रहें। वैसे हिट होने या धन कमाने का अर्थ यह कदापि नहीं है कि उनके पाठक अधिक है क्योंकि यहां दस पाठक भी इतने ताकतवार है कि वह हजार का आंकड़ा पार लगा सकते है-ऐसा अनेक ब्लाग लेखक अपने पाठों में लिख चुके हैं। बहरहाल जिस नाम के सहारे यहा यौन साहित्य अंतर्जाल चल रहा है वहां अपना बोर्ड भी लगा रखा है और वहां मेरे सारे ब्लाग सत्साहित्य के साथ मौजूद हैं। इसमें संदेह नहीं है कि वहां पाठक् अधिक आते हैं पर संभव है कि जब उनको उत्कृष्ट साहित्य-मेरे कुछ ब्लाग लेखक मेरे साहित्य को भी इसी श्रेणी में रखते हैं इसलिये लिख रहा हूं-पढ़ने को मिल जाये तो वह उसकी तरफ मुड़ जायें। मेरा मानना है कि यौन साहित्य से अधिक सत्साहित्य पढ़ने वालों की संख्या अधिक है।

Thursday, May 22, 2008

मशहूर होकर क्या खाक लिख पायेंगे-व्यंग्य

लिखना मैंने इसलिये नहीं शुरू किया कि मुझे मशहूर होना है। मुझे अपने मशहूर होने की चिंता कभी नहीं सताती क्योंकि मुझे लगता है कि लोग अपनी पूरी ऊर्जा इसी प्रयास में नष्ट करते हैं कि वह प्रसिद्ध व्यक्ति बने और समाज में उनकी चर्चा चारों और लोग करें। मैं उनके करतबों पर ही लिखता रहता हूं पर किसी का नाम लिये बगैर अपनी बात कह जाता हूं कि अगर वह पढ़े भी तो उसे लगे कि किसी अन्य व्यक्ति के लिये लिखा होगा।

उस दिन पांच लोग कहीं आपस में मिले। इसमें मैं और मेरे ब्लाग@पत्रिका पढ़ने वाला एक मित्र भी था। तीन अन्य भी उसके परिचित थे। तीनों अपनी अपनी डींगे हांक रहे थे।
‘अरे, मैं किसी से नहीं डरता मेरी पहुंच दूर तक है।’
‘अरे, इस इलाके में मुझे सब जानते हैं। अपना ही राज्य है।’
‘मैं जहां रहता हूं, वहां सब लोग मेरी इज्जत करते हैं। एक मैं ही वहां इज्जतदार हूं।’
वैसे मेरा मित्र भी कम नहीं है, पर उसे मालुम है कि मैं हाल ही उसकी बात को पकड़ कर लिख कर व्यंग्य लिखने का काम कर सकता हूं। इसलिए कुछ देर तो चुप रहा फिर उसने मुझे ही वहां उलझाने के लिये अपना पासा फैंका और बोला-‘तुम मेरे इस मित्र को जानते हो। कई पत्र-पत्रिकाओं में इसके लेख और व्यंग्य छप चुके हैं। आजकल इंटरनेट पर लिखते हुए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नाम कमा रहा है पर देखों अपनी प्रशंसा स्वयं नहीं करता।’
मैंने मित्र की तरफ देखा और फिर कहा-‘‘अरे, यार तुम भी क्या बात लेकर बैठ गये। हमें भला कौन जानता है? लिखते हम भी हैं और फिल्मों के हीरो भी लिख रहे हैं पर भला कोई उनके मुकाबले हमें कौन पढ़ता है। तुम्हें और कोई नहीं मिला कि हमारा मजाक उड़ाने लगे।’
उनमें से एक सज्जन बोले-‘‘आप कौनसे अखबार में लिखते हैं?‘
मैने कहा-‘अरे, यह तो ऐसे ही बना रहा है। पहले कुछ कम प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं के लिखा था। अंतर्जाल पर ब्लाग लिख रहे हैं पर कौन पढ़ता है वहां पर। अब तो फिल्मी हीरो हीरोइन के ब्लाग बनते जायेंगे। लोग उनको पढेंगें कि हमें। यह मुझे मित्र कह रहा है इससे पूछो कितनी बार इसने मेरा ब्लाग खोला है?’

दूसरे सज्जन ने कहा-‘अगर आप लिखते हैं तो जरूर मशहूर हो जायेंगे। फिल्मी हीरो हीरोइन गासिपों के अलावा क्या लिखेंगे। वैसे भी उनका लिखा अखबार में आ जाता है। आप लिखते रहें तो एक दिन मशहूर हो जायेंेगें।
बहरहाल मैंने अपनी बौद्धिक शक्ति का उपयोग करते हुए वहां बातचीत का विषय बदल दिया। वहां से निकलते ही मैंने मित्र से कहा-‘दिलवा दिया शाप! उसने क्या कह दिया कि मशहूर हो जाओगे।

मेरा मित्र बोला-‘यार, फिर तो वाकई चिंता की बात है तुम्हारे ब्लाग पर मैंने अभी तक तीन टिप्पणियां लिखीं हैं तो हमें भी तो मशहूर हो जायेंगे। वैसे मशहूर होना तो अच्छी बात है।’
मैंने उससे कहा-‘मशहूर होकर लिखा नहीं जाता। आदमी इसी फिक्र में कई बातें इसलिए नहीं लिख पाता कि अब तो मशहूर हो गया हूं कहीं ऐसा न हो कि लोग इससे नाराज न हो जायें। मशहूर होने का बोझ ढोना कई लोगों के लिए मुश्किल काम है और उनमें हम एक है।
मित्र ने कहा-‘फिर तुम लिखते क्यों हो? मशहूर होने के लिए ही न!
मैंने कहा-‘‘मशहूर नहीं हूं इसलिये लिख रहा हूं। जमकर लिख रहा हूं। मशहूर होने के बाद तो यही सोचकर बैठा रहूंगा कि लिखूं क्या?’
मित्र ने आखिर मुझसे पूछा-‘आखिर मशहूर होना होता कैसे है?’
मैंने भी प्रति प्रश्न किया-‘कैसे होता है?’
मित्र ने कहा-‘‘मैं क्या जानूं? तुम लेखक हो तुम्हीं बताओ।’
मैने कहा-‘मशहूर होने की बात तो तुमने उठाई थी। मुझे लगा कि होगी कोई अच्छी बात है।’
मित्र बोला-‘अच्छा तुम अब मुझ पर ही व्यंग्य करने लगे। मैं इसलिये वहां चुप था कि कहीं तुम मेरी बातों से व्यंग्य सामग्री न ढूंढ लो और अब यही कारिस्तानी यहीं करने लगे। मेरी टिप्पणियां वहां से हटा देना। मुझे ऐसे व्यक्ति के साथ मशहूर नहीं होना जिसे मालुम ही न हो कि वह होता क्या है?’

मशहूर होने के लिये लोग जाने क्या क्या पापड़ बेलते हैं? तमाम तरह की उल्टी सीधी हरकतें करते हैं। उलूलजुलूल लिखते है। लिखने में सबसे बड़ा मजा यह है कि आप किसी आदमी के सामने नहीं होते और इसलिये कोई आपको पहचान नहीं पाता। पिछली राखी की बात है मैं एक रेस्टरां में चाय पी रहा था। उसी दिन एक अखबार में मोबाइल पर लिख मेरा एक व्यंग्य छपा था और दो आदमी उसे पढ़कर हंस रहे थे। एक ने कहा-‘‘देखो यार, मोबाइल पर उसने क्या लिखा है?
दूसरा उसे पढ़ते हुए हंस रहा था। उसे नहीं मालुम कि उसको लिखने वाला लेखक उसे मात्र पांच फुट की दूरी पर बैठा है। बाद में मैंने जब अपने मित्र को जब यह घटना बताई तो वह कहने लगा कि-‘तुमने उनको बताया क्यों नहीं कि तुम उसके लेखक हो।
‘अगर वह कह देते कि क्या बकवाद लिखी है तो मैं क्या करता?‘मैने कहा-‘‘इतना ही ठीक है कि मुझे पढ़ रहे थे। अपने आपको मशहूर करने के प्रयास में कभी कभी उल्टा सीधा भी सुनना पड़ता है। इससे बेहतर है अपने लेख भले ही मशहूर हों, थोड़ा बहुत नाम भी हो जाये पर हमें अपना यह चेहरा मशहूर नहीं कराना।’

मशहूर होने को मतलब है कि अपने ऐसे विरोधी पैदा करना जो छींटाकशी के लिये तैयार बैठे रहते हैं और आप अपने मित्रों से हमेशा सतर्कता की आशा नहीं कर सकते जो सोचते हैं कि यह तो मशहूर आदमी है अपना बचाव स्वयं कर लेगा। वैसे चुपचाप लिखते रहने से ही इतनी आनंद की अनुभूति होती है कि लगता है कि मशहूर हुए तो मिलने वाले बहुत आयेंगे। कई तरह के फोन सुनने पड़ेंगे। तब भला क्या खाक लिख पायेंगे। ऐसे ही ठीक है कि कोई हमें चेहरे से जानता नहीं है। अधिक मशहूर होनेा मतलब अपनी शांति भंग करना भी होता है।

Thursday, April 17, 2008

यह कौनसी क्रिकेट-हास्य व्यंग्य

कल से क्रिकेट का कोई टूर्नामेंट शुरू हो रहा है अखबारों और टीवी पर उसका धूंआधार प्रचार होते देख एसा लगा कि क्रिकेट अब मुझसे अलविदा कह रही है।

पिछली बार इन्हीं दिनों ं मैने विश्व कप में भारत के हारने पर एक कविता लिखी थी अलविदा किकेट। उस समय सादा हिंदी फोंट में होने के कारण कोई उसे पढ़ नहीं पाया बाद में मैने इसे स्कैन कर एक ब्लाग रखा तो एक साथी ब्लागर ने लिखा कि ‘‘क्रिकेट तो मजे के लिये देखना चाहिए। कोई भी टीम हो हमें तो खेल का आनंद उठाना चाहिए। उन्होंने सभी टीमों के नाम भी गिनाए और उनमें एक भी टीम इसमें नहीं है। अगर मेरा वह यह लेख पढ़ें और उन्हें याद आये तो वह भी मानेंगे कि इस खेल से वह अब अपने को जोड़ नहीं पायेंगे।

एक अरब से अधिक आबादी वाले इस देश में बच्चा-बूढ़ा-जवान, स्त्री-पुरुष, डाक्टर-मरीज, प्रेमी-प्रेमिका, अमीर-गरीब, और सज्जन-दुर्जन सबके लिये यह खेल एक जुनून था तो केवल इसलिये कि कहीं न कहीं इसके साथ खेलने वाली टीमों के साथ उनका भावनात्मक लगाव था पर लगता है कि वह खत्म हो गया है। ऐसा लगता है कि क्रिकेट की यह प्रतियोगिता मेरी हास्य कविता का जवाब हो जैस कह रही हो ‘अलविदा प्यारे अब नहीं हम तुम्हारे’।

कोई आठ टीमें हैं जिनके नाम मैंने पढ़ें। उनमें से किसी के साथ मेरा तो क्या उन शहरों या प्रदेशें लोगों के जज्वात भी नही जुड़ सकते जिनके नाम पर यह टीमें हैं। क्या वहां लोग संवेदनहीन है जो उनको यह आभास नहीं होगा कि देश के क्रिकेट प्रेमियों का एक बहुत बड़ा हिस्सा इससे अलग हो गया है। कहते हैं कि क्रिकेट ने इस देश को एक किया और विभाजित क्रिकेट को देखकर क्या कहें?

लोगों के पास बहुत सारे संचार और प्रचार माध्यम हैं और सब जानने लगे हैं। लोगों को एक रखने के लिये वैसे भी क्रिकेट की जरूरत नहीं थी पर जिस तरह यह प्रतियोगिता शुरू हो रही है और उसमें जबरन लोगों की दिलचस्पी पैदा करने की जो कोशिश हो रही है वह विचारणीय है। अखबारों ने लिखा है कि इस पर करोड़ों रुपये को खेल होगा। कहने की जरूरत नहीं है कि इसमें वह सब कुछ खुलेआम होगा जो पहले पर्दे के पीछे होता था। अब आम क्रिकेट प्रेमी को किसी प्रकार की शिकायत का अधिकार नहीं है क्योंकि कौन देश के नाम उपयोग कर रहा है? पहले जिसे देखो वही टीम इंडिया की हार को भी शक से देख रहा है तो जीत को भी। तमाम चेहरे जो चमके उन पर लोग कालिख के निशान देखने लगते। अब उनका यह अधिकार नहीं है। शुद्ध रूप से मनोरंजन के लिये यह सब हो रहा है। अब यह फिल्म है या क्रिकेट हमारे पूछने या जानने का हक नहीं है।

इसके बावजूद कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिनकी तरफ ध्यान देना जरूरी है। इसके सामान्य क्रिकेट पर क्या प्रभाव होंगे? चाहे कितना भी किया जाये अगर राष्ट्रीय भावनायें नहीं जुड़ने से आम क्रिकेट प्रेमी तो इससे दूर ही होगा तो फिर इसके साथ कौन जुड़ेगा? इसका अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेले जाने वाले मैचों पर क्या अच्छा या बुरा प्रभाव होगा? कहने को कहते हैं कि निजी क्षेत्र तो जनता की मांग के अनुसार काम करता है पर अब सारी शक्तियां निजी क्षेत्र के हाथ में है तो वह अपने अनुसार लोगों की मांग निर्मित करना चाहता है। देखा जाये तो टीवी चैनलो और अखबारों में इसके प्रचार का लोगों पर कोई अधिक प्रभाव परिलक्षित नहीं हो रहा तो क्या वह इसकी खबरों को प्रमुखता देकर इसके लिये लोग जुटाने के प्रयास में लगे रहेंगे? हर क्रिकेट प्रेमी के दिमाग में एक शब्द था ‘भारत’ जिससे क्रिकेट को भाव का विस्तार होता था तो क्या नयी क्रिकेट के पास ऐसा कोई अन्य शब्द है जो फिर उसे विस्तार दे।

बीस ओवर की प्रतियोगिता में भारत की जीत के बाद मेरा मन कुछ देर के लिये क्रिकेट की तरफ गया था पर अब फिर वही हालत हो गयी। कल शुरू होने वाली प्रतियोगिता के लिये जो टीमों की सूची देखी तो मैं अपने आपसे पूछ रहा था ‘‘यह कौनसी क्रिकेट’’। आखिर कौन लोग इसे देखकर आनंद उठायेंगे। इस देश में आमतौर से लोग कहते है कि‘‘हमारे पास टाईम नहीं है’’पर क्रिकेट के लिए उनके पास टाईम और पैसे आ जाते हैं। मतलब यह कि कुछ लोगों के पास पैसे हैं पर उसके खर्च करने और टाईम पास करने के लिए कोई बहाना नहीं है और उनके लिए यह एक स्वर्णिम अवसर होगा।
जो मैच टीवी पर दिखता है उसको देखने के लिये भूखे प्यासे मैदान पर पहुंच जाते है ऐसे लोगों की इस देश में कमी नहीं है। जहां तक उनकी क्रिकेट में समझ का सवाल है तो अधिकतर टीवी पर अपनी शक्ल दिखाते हुए यह कहते हैं कि हम अपने हीरो को देखने आये थे। अब वहां जाकर कोई पूछ नहीं सकते कि क्या वह तुम को टीवी पर नहीं दिखाई देता।
खैर, कुल मिलाकर क्रिकेट अब खेल नहीं मनोरंजन बन गया है यह अलग बात है कि हम जैसे ब्लागर के लिये तो ऐसे मैचों से अच्छा यही होगा कि कोई फालतू कविता लिखकर मजा ले लें आखिर छहः सो रुपया हम इस पर खर्च कर रहे है।

Tuesday, February 26, 2008

रहीम के दोहे:भविष्य बलवान होता है

भावी काहू ना दही, भावी दह भगवान
भावी ऐसी प्रबल है, कहि रहीम यह जान

कविवर रहीम कहते हैं की भविष्य को कोई नष्ट नहीं कर सकता। केवल प्रभु ही भविष्य के प्रभाव को ख़त्म कर सकते हैं। यह समझ लोग को भविष्य बहुत बलवान है।

भावी या उनमान को पांडव बनहिं रहीम
जदपि गौरि सुनी बाँझ है, बरु हैं संभु अजीम


कविवर रहीम कहते हैं की उसने भविष्य के लिए पांडवों को कृपालु बनाया। यद्यपि पार्वती को बाँझ कहा जाता है पर किन्तु भगवान शंकर की कृपा से वह दो पुत्रों की माता कहलायीं।

Thursday, February 21, 2008

संत कबीर वाणी:सत्संग का सुख वैकुण्ठ में कहाँ

राम बुलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय
जो सुख साधू संग में, सो वैकुण्ठ में न होय


संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं की जब मेरे को लेन हेतु रामजी ने बुलावा भेजा तो रोना आ गया क्योंकि जो सुख साधू और संतों की संगत से जो सुख मिलता है वह भला वैकुण्ठ में कहाँ मिलता है।

लुट सके तो लूट ले, संत नाम की लूट
पीछे फिर पछताओगे, प्राण जाहिं जब छूट


संत कबीरदास जी कहते हैं की भगवान के नाम का स्मरण कर ले नहीं तो समय व्यतीत हो जाने पर पश्चाताप करने से कुछ लाभ नहीं है।

Wednesday, February 20, 2008

रहीम के दोहे: बुरे दिनों में चुप रहना बेहतर

अब रहीम चुप करि रहउ समुझि दिननकर फेर
जब दिन नीके आई हैं बनत न लगि हैं देर


कविवर रहीम कहते हैं की बुरे दिनों के चक्र को समझकर अब मैं मौन धारण करके रहूँगा. जब जीवन में अच्छे दिन आएँगे तो कार्य बनते देर नहीं लगेगी।

अब रहीम मुश्किल पडी, गाढ़ै दोउ काम
सांचे से तो जग नहीं, झूठे मिलैं न राम



कविवर रहीम कहते हैं कि अब तो जीवन में ऐसी कठिनाई आ गयी है कि सब तरह के कार्य मुश्किल हो गए हैं. सत्य बोलने से संसार में चलना कठिन है तो तो झूठ बोलने से भगवान् का मिलना संभव नहीं है.

Friday, February 15, 2008

अपने अस्तित्व के निशान-कविता साहित्य

पूरी जिन्दगी जुटाते सामान
पर कितना ले पाते उससे काम
फ़िर भी रुकते नहीं
चले जा रहे अंधेरे रास्ते पर
रौशनी की तलाश में
शायद मिल जाए खुशी का निशान

एक सामान जुटाते
दूसरों के नाम सामने आ जाते
कल जो लिया था उसे आज पुराना पाते
बाजार से लाने की करते कवायद
कुछ फ़िर नया
लोग भी नए नाम सुझाते
चलता जाता है अनवरत यह क्रम
अपने चलने का होता हमें भ्रम
जमीन पर चलते तो कार की चाहत होती
कार में होते, चाहते हवा में उड़ने वाला विमान

समान टूटते और बिखरते जाते
हम उन्हें कबाड़ में भेजते जाते
हर बार नया पाने की चाहत में चले जाते
चलाता है जो मन
नहीं समझते इशारे
कभी-कभी उससे बात करते तो
यह पाते जान
वह चाहता है खामोशी से दुनिया को
एक दृष्टा बनकर देखना
जब जुटाते हम उसके चैन के लिए समान
हम अपने होने के प्रमाण इस
दुनिया में छोड़ना चाहते और
वह चाहता देखना
अपने अस्तित्व के निशान

Sunday, February 10, 2008

भला कौन खुश रहा है इस भीड़ में-कविता साहित्य

अपने कुछ लोग खो गए
इस शहर की भीड़ में
उनके पते लिखे हैं
बहुत से कागजों पर
जो पड़े हैं फाईलों की भीड़ में

किसे ढूंढें और क्यों
ढेर सारे सवाल आते हैं सामने
किसी से मिलने की वजह
चाहिए हमको
जाएं मिलने तो वह भी
उठाते आने की वजह के प्रश्न सामने
समय निकला जाता है
जूझते हुए प्रश्नों की भीड़ में

अपने ही जाल में उलझे लोग
फुरसत नहीं पाते
जीवन की इस भागमभाग से
ओढ़ लिया है दिमाग में तनाव
कब ले सकते हैं दिल से काम
नहीं आता समझ में
खोये हुए है लोग
अपनी समस्याओं की भीड़ में

हम भीड़ में कहाँ तलाशें उनको
जो छोड़ नहीं पाते उसको
डरते हैं अपनी तन्हाई से
जीतने की क्या सोचेंगे वह
हारे हैं हर पल जिन्दगी के लड़ाई से
अकेले में अपने पहचाने का डर
उनके मन में रहता है
खोए रहना चाहते हैं भीड़ में

अकेले ही खडे देख रहे हैं उनको
वहाँ हाँफते और कांपते
जबरन हंसने की कोशिश करते हुए
कभी हमारे तन्हाई पर भी
हँसते हैं दूसरों के साथ
दूर रखते हैं हमारे से अपना हाथ
पर हम भी हँसते हैं
साथी है हमारी यह तन्हाई
भला कौन खुश रहा है इस भीड़ में
------------------------------------------

Tuesday, January 15, 2008

स्वेट मार्डेन-अपने मन में शंका को स्थान न दें

आपकी योग्यता के बारे में लोगों का विचार कुछ भी क्यों न हो आप कभी अपने मन में शंका को स्थान न दें की जिस कार्य को करने की आपके मन में इच्छा है या जो कुछ आप बनाना चाहते हैं वह आप नहीं कर सकते । अपने व्यक्तिगत विश्वास को हर संभव ढंग से बढाईये। आप ऐसा कर सकते हैं। अपने मन में बार-बार यह शब्द दोहराते रहे -''मैं आत्मा हूँ सब कुछ कर सकता हूँ। मेरे लिए प्रत्येक कार्य संभव है। असंभव शब्द मूर्खों के शब्दकोष में मिलता है-स्वेट मार्डेन।

Sunday, January 6, 2008

क्रिकेट में बेईमानी:ज़रा चाणक्य नीति देख लें

आस्ट्रेलिया में जो बीसीसीआई की टीम से जो व्यवहार हुआ उस पर सब चैनल दिखा रहे हैं और अपने देश के पुराने विद्वान खिलाड़ी अपनी-अपनी राय दे रहे हैं-उनकी बातें समझ में नहीं आ रहीं है । इस हालत में क्या करना चाहिए? मैंने सोचा क्यों न चाणक्य नीति देखी जाये। यहाँ मैं बता दूं कि महापुरुषों के सन्देश ज्ञान बघारने के लिए नहीं बल्कि स्वाध्याय करने के लिए लिखता हूँ। आज मैंने पुन: अपना लिखा ढूँढा उसमें मुझे कुछ वाक्य सही लगे और उन्हें प्रस्तुत कर रहा हूँ।

1.किसी भी व्यक्ति का सम्मान जिस क्षेत्र में न हो उसे त्याग देना चाहिऐ क्योंकि सम्मान के बिना जीवन का कोई अर्थ नहीं रह जाता।

मैं सोच रहा था कि क्या वहाँ बीसीसीआई की टीम का सम्मान कहीं रह गया है जो वहाँ अभी भी रुकी हुई है।

2.अपने कर्तव्य से विमुख होकर होकर कहीं भी सम्मान नहीं पाता है। अपने सम्मान के रक्षा स्वयं करनी होती है।

क्या उसकी टीम जो अपने देश के नाम को धारण किये बैठी है देश के सम्मान की रक्षा का कर्तव्य निर्वाह कर रही है और अपमानित करने वालों के खिलाफ कहीं कोई कार्यवाही की है।

3.ऐसा धन जो बैरियों की शरण में जाने पर मिलता है उसे त्याग देना चाहिए।
जिस तरह आस्ट्रेलिया में खिलाडियों और अंपायरों ने उसके साथ व्यवहार किया है क्या उसे बैरियों जैसा नहीं है और अब भी यह टीम तीसरे टेस्ट के लिए तैयार हो गयी है। क्या यह व्यवासायिक मजबूरी निभाना अब भी जरूरी है।

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