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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
Friday, March 14, 2008
नारद १ जनवरी १९७० में पहुंचा
Thursday, March 6, 2008
चाणक्य नीति:वाणी पर संयम रखने वाले ही लोकप्रिय होते हैं
चाणक्य कथन-समाज में लोकप्रियता अर्जित करने के लिए सबसे पहले दूसरों की निंदा करना बंद कर देना चाहिऐ। परनिंदा करने में रस लेना मानव की स्वाभाविक प्रवृति है। वाणी पर संयम रखना एक तरह से तपस्या है। जो दूसरों की निंदा नहीं करता वही समाज में लोकप्रियता अर्जित कर सकता है।
लेखकीय अभिमत- हमारा अध्यात्म दर्शन कहता है कि बड़ी लकीर को थूक से छोटी करने वाला वाला मूर्ख और उसके मुकाबले बड़ी लकीर खींचने वाला बुद्धिमान होता है। हमने देखा होगा कि अधिकतर लोग दूसरेको छोटा और घटिया बताकर अपने को बडा और ऊंचा साबित करना चाहते हैं। 'अमुक व्यक्ति ऐसा है', 'अमुक व्यक्ति में यह दोष है, 'और अमुक व्यक्ति वह बुरा काम करता है'-ऐसी चर्चा अक्सर लोग करते हैं और उनका आशय यह होता है कि हम भले, उस दोष से रहित और अच्छे काम करने वाले लोग हैं। आप और हम में से अधिकतर लोग ऐसा ही करते हैं।
इसका एक दूसरा रूप भी देखें। जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे की निंदा कर जब हमारे सामने से हटता है तो हम उसमें भी दोष देखने लगते हैं और वही बातें उसके बारे में सोचते हैं जो वह दूसरे के बारे में कह रहा था। मन ही मन कई बार कहते हैं कि 'उसके दोष तो देखता है अपने नहीं'।
क्या हम कभी सोचते हैं कि कहीं हम भी किसी की निंदा करते हैं और जब वहाँ से हटते हैं तो दूसरा व्यक्ति भी हमारे बारे में यही सोचता होगा। हम वाणी पर संयम की बात तो करते हैं पर आत्ममंथन नहीं करते। हम वाणी से अच्छा बोलते हैं तो वातावरण भी वैसा ही बनता है और खराब बोलते हैं तो खराब। जब हम किसी से अच्छा बोलकर अलग होंगे तो दूसरे व्यक्ति के मन में अच्छे विचार छोड़ जायेंगे तो वह अच्छा सोचेगा और खराब छोड़ जायेंगे तो वह हम में भी दोष देखेगा। हम अपनी इन्द्रियों से ही ग्रहण करते है और विसर्जन भी और सब अपने लिए ही प्रभावकारी होता है। अत: हमें अपने वाणी पर संयम रखते हुए अच्छी बात ही करना चाहिए।
Saturday, February 23, 2008
विदुर नीति: सरल स्वभाव का विरोधी हो वह बल नहीं
२.जो बिना रोग के उत्पन्न, कड़वा, सिर में दर्द पैदा करने वाला, पाप से संबद्ध, कठोर, तीखा और गरम है जो सज्जनों द्वारा ग्रहण करने योग्य नही और जिसे दुर्जन ही व्यक्त सकते हैं, उस क्रोध को पी जाइये और शांत हो जाइये।
३.रोग से पीड़ित मनुष्य मधुर फलों का आदर नहीं करते, विषयों में भी उन्हें जीवन का सुख और सार भी नहीं मिल पता। रोगी सदा ही दुखी रहते हैं। वह न तो धारण से प्राप्त धन का और वैभव के सुख का अनुभव कर पाते हैं ।
४.वह बल नहीं है जिसका जो सरल स्वभाव का विरोधी हो। सूक्ष्म धर्म को शीघ्र ही ग्रहण करना चाहिए। क्रूरता से अर्जित धन नष्ट होता है। यदि धन सात्विक मार्ग से आया है तो वह लंबे समय तक स्थिर रहता है.
Thursday, February 21, 2008
संत कबीर वाणी:सत्संग का सुख वैकुण्ठ में कहाँ
जो सुख साधू संग में, सो वैकुण्ठ में न होय
संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं की जब मेरे को लेन हेतु रामजी ने बुलावा भेजा तो रोना आ गया क्योंकि जो सुख साधू और संतों की संगत से जो सुख मिलता है वह भला वैकुण्ठ में कहाँ मिलता है।
लुट सके तो लूट ले, संत नाम की लूट
पीछे फिर पछताओगे, प्राण जाहिं जब छूट
संत कबीरदास जी कहते हैं की भगवान के नाम का स्मरण कर ले नहीं तो समय व्यतीत हो जाने पर पश्चाताप करने से कुछ लाभ नहीं है।
Tuesday, January 15, 2008
स्वेट मार्डेन-अपने मन में शंका को स्थान न दें
Saturday, January 12, 2008
संत कबीर वाणी:सकाम भक्ति निष्फल होती है
जिन दिल बांध्या एक सूं, ते सुखु सोवे निचींत
संत कबीर दास जी कहते हैं की कलियुग में आकर हमने बहुतों को मित्र बनाया पर जिन्होंने अपने दिल को एक से ही बाँध लिया, वे ही निश्च्नंत सुख के नींद सो सकते हैं.
जब लगा भगहित सकामता, तब लगा निर्फल सेव
कहै 'कबीर' वै क्यूं मिलै, निहकामी निज देव
संत कबीर दास जी कहते हैं कि भक्ति जब तक सकाम है, भगवान की सारी सेवा तब तक निष्फल ही है. निश्कामी देव से सकामे साधक की भेंट कैसे हो सकती है.
Tuesday, January 8, 2008
संत कबीर वाणी:जहाँ अंहकार वहाँ विकार
कोई साधू जन पारखी, बिरला तत्व बिचार
संत शिरोमणि कबीर दास जे कहते हैं कि सारे संसार के लोग मोह के फंदे में फंसे हुए हैं और कोई भी इस फंदे को काटने में समर्थ नहीं है। कोई पारखी साधू ही विरला होता है जो इस तत्व पर विचार करके इस फंदे से मुक्त हो जाता है।
जहाँ आपा तहं आपदा, जहाँ संसै तहां सोग
कहैं कबीर कैसे मिटें, चारों दीरघ रोग
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जहाँ अहंकार हैं वहाँ अनेक प्रकार की विपत्तियाँ स्वत: आ जातीं हैं इसी प्रकार जहाँ संशय होता वहाँ शोक अवश्य उपस्थित हो जाता है। अत चारों रोग-अहं, आपत्तियां संशय और शोक-कैसे मिट सकते हैं।
Sunday, January 6, 2008
क्रिकेट में बेईमानी:ज़रा चाणक्य नीति देख लें
1.किसी भी व्यक्ति का सम्मान जिस क्षेत्र में न हो उसे त्याग देना चाहिऐ क्योंकि सम्मान के बिना जीवन का कोई अर्थ नहीं रह जाता।
मैं सोच रहा था कि क्या वहाँ बीसीसीआई की टीम का सम्मान कहीं रह गया है जो वहाँ अभी भी रुकी हुई है।
2.अपने कर्तव्य से विमुख होकर होकर कहीं भी सम्मान नहीं पाता है। अपने सम्मान के रक्षा स्वयं करनी होती है।
क्या उसकी टीम जो अपने देश के नाम को धारण किये बैठी है देश के सम्मान की रक्षा का कर्तव्य निर्वाह कर रही है और अपमानित करने वालों के खिलाफ कहीं कोई कार्यवाही की है।
3.ऐसा धन जो बैरियों की शरण में जाने पर मिलता है उसे त्याग देना चाहिए।
जिस तरह आस्ट्रेलिया में खिलाडियों और अंपायरों ने उसके साथ व्यवहार किया है क्या उसे बैरियों जैसा नहीं है और अब भी यह टीम तीसरे टेस्ट के लिए तैयार हो गयी है। क्या यह व्यवासायिक मजबूरी निभाना अब भी जरूरी है।
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