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Wednesday, March 4, 2009

फासले पर रखो अपना विश्वास-हिंदी शायरी

जिसके लिये प्रेम होता दिल में पैदा
उसके पास जाने की
इच्छा मन में बढ़ जाती है
आंखें देखती हैं पर
बुद्धि अंधेरे में फंस जाती है
कुंद पड़ा दिमाग नहीं देख पाता सच
कहते हैं दूर के ढोल सुहावने
पर दूरी होने पर ही
किसी इंसान की असलियत समझ में आती है
इसलिये फासले पर रखो अपना विश्वास
किसी से टकराने पर
हादसों से जिंदगी घिर जाती है

..................................
दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप

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Saturday, October 25, 2008

अपने हाथ मलते रहे-हिन्दी शायरी

उनकी निगाहों पर ही
हमेशा मरते रहे
जो देखा उन्होंने एक नज़र
हम हर बार आहें भरते रहे
कभी कोशिश नहीं की
उनके दिल को पढने की
जो आँखों में हैं वही होगा उसमें भी
यही सोचकर उनकी संगत करते रहे
जब उन्होंने खोला दिल का राज़ तो
किसी और का नाम लिखा था
हमें कुछ फिर नहीं दिखा था
आँखे बंद कर बस अपने हाथ मलते रहे

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दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप

Friday, June 20, 2008

सनसनी गद्दारी से फैलती है वफादारी से नहीं-व्यंग्य

जब शाम को घर पहुंचने के बाद आराम कर रहा था तो पत्नी ने कहा-‘आज इंटरनेट का बिल भर आये कि नहीं!
मैंने कहा-‘तुम बाजार चली जाती तो वहीं भर जाता। मेरे को काम की वजह से ध्यान नहीं रहता।’
पत्नी ने कहा-‘घर पर क्या कम काम है? बाजार जाने का समय ही कहां मिलता है? अब यह बिल भरने का जिम्मा मुझ पर मत डालो।’
मैंने कहा-‘तुम घर के काम के लिये कोई नौकर या बाई क्यों नहीें रख लेती।’
मेरी पत्नी ने कहा-‘क्या कत्ल होने या करने का इरादा है। वैसे भी तुम जिस तरह कंप्यूटर से रात के 11 बजे चिपकने के बाद सोते हो तो तुम्हें होश नहीं रहता। कहीं मेरा कत्ल हो जाये तो सफाई देते परेशान हो जाओगे। अभी मीडिया वाले पूछते फिर रहे हैं कि आठ फुट की दूरी से किसी को अपने बेटी की हत्या पर कोई चिल्लाने की आवाज कैसे नहीं आ सकती। अगर मेरा कत्ल हो जाये तो तुम तो आठ इंच की दूरी पर आवाज न सुन पाने की सफाई कैसे दोगे? मीडिया वाले कैसे तुम पर यकीन करेंगे? यही सोचकर चिंतित हो जाती हूं। ऐसे में तुम नौकर या बाई रखने की बात सोचना भी नहीं। वैसे अगर स्वयं काम करने की आदत छोड़ दी तो फिर हाथ नहीं आयेगा। समय से पहले बुढ़ापा बुलाना भी ठीक नहीं है।
मैंने कहा-‘इतने सारे नौकर काम कर रहे हैं सभी के घर कत्ल थोड़े ही होते हैं। तुम कोई देख लो। मैं फिर उसकी जांच कर लूंगा।’
मेरी पत्नी ने हंसते हुए कहा-‘कहां जांच कर लोगे? अपनी जिंदगी में कभी कोई नौकर रखा है जो इसका अभ्यास हो।’

मैंने कहा-‘तुम तो रख लो। हम तो बड़े न सही छोटे सेठ के परिवार में पैदा हुए इसलिये जानते हैं कि नौकर को किस तरह रखा जाता है।’

मेरी पत्नी ने कहा-‘दुकान पर नौकर रखना अलग बात है और घर में अलग। टीवी पर समाचार देखो ऐसे नौकरों के कारनामे आते हैं जिनको घर के परिवार के सदस्य की तरह रखा गया और वह मालिक का कत्ल कर चले गये।’
मैंने कहा-‘क्या आज कोई इस बारे में टीवी पर कोई कार्यक्रम देखा है?’
उसने कहा-‘हां, तभी तो कह रही हूं।’
मैंने कहा-‘तब तो तुम्हें समझाना कठिन है। अगर तुम कोई टीवी पर बात देख लेती हो तो उसका तुम पर असर ऐसा होता है कि फिर उसे मिटा पाना मेरे लिये संभव नहीं है।’

बहरहाल हम खामोश हो गये। वैसे घर में काम के लिये किसी को न रखने का यही कारण रहा है कि हमने जितने भी अपराध देखे हैं ऐसे लोगों द्वारा करते हुए देखे हैं जिनको घर में घुस कर काम करने की इजाजत दी गयी । सात वर्ष पहले एक बार हमारे बराबर वाले मकान में लूट हो गयी। उस समय मैं घर से दूर था पर जिन सज्जन के घर लूट हुई वह मेरे से अधिक दूरी पर नहीं थी। कोई बिजली के बिल के बहाने पड़ौसी के घर में गया और उनकी पत्नी चाकू की नौक पर धमका कर हाथ बांध लिये और सामान लूट कर अपराधी चले गये। मेरी पत्नी अपनी छत पर गयी तो उसे कहीं से घुटी हुई आवाज में चीखने की आवाज आई। वह पड़ौसी की छत पर गयी और लोहे के टट्र से झांक कर देख तो दंग रह गयी। वह ऊपर से चिल्लाती हुई नीचे आयी। उसकी आवाज कर हमारे पड़ौस में रहने वाली एक अन्य औरत भी आ गयी। दोनो पड़ौसी के घर गयी और उस महिला को मुक्त किया। उनके टेलीफोन का कनेक्शन काट दिया गया था सो मेरी पत्नी ने मुझे फोन कर उस पड़ौसी को भी साथ लाने को कहा।
मैं एक अन्य मित्र को लेकर उन पड़ौसी के कार्यालय में उनके पास गया। सबसे पहले उन्होंने अपनी पत्नी का हाल पूछा तो मैने अपनी पत्नी से बात करायी। तब वह बोले-‘यार, अगर पत्नी ठीक है तो मैं तो पुलिस में रपट नहीं करवाऊंगा।’
वह अपने एक मित्र को लेकर स्कूटर पर घर की तरफ रवाना हुए और मैं अपनी साइकिल से घर रवाना हुआ। चलते समय मेरे मित्र ने कहा-‘ अगर यह पुलिस में रिपोर्ट नहीं लिखवाते तो ठीक ही है वरना तुम्हारी पत्नी से भी पूछताछ होगी।’
हम भी घर रवाना हुए। वहां पहुंचे तो पुलिस वहां आ चुकी थी। मेरी पत्नी ने पड़ौसी के भाई को भी फोन किया था और उन्होंने वहीं से पुलिस का सूचना दी। अधिक सामान की लूट नहीं हुई पर सब दहशत में तो आ ही गये थे।

एक दो माह बीता होगा। उस समय घर में किसी को काम पर रखने का विचार कर रहे थे तो पता लगा कि पड़ौसी के यहां लूट के आरोपी पकड़े गये और उनमें एक ऐसा व्यक्ति शामिल था जो उनके यहां मकान बनते समय ही फर्नीचर का काम कर गया था। इससे हमारी पत्नी डर गयी और कहने लगी तब तो हम कभी भी किसी ऐसे व्यक्ति को घुसने ही न दें जिसे हम नहीं जानते। यही हमारे लिये अच्छा रहेगा।’
यह घटना हमारे निकट हुई थी उसका प्रभाव मेरी पत्नी पर ऐसा पड़ा कि फिर घर में किसी बाई या नौकर को घुसने देने की बात सोचने से ही उसका रक्तचाप बढ़ जाता है। फिर उसके बाद जब भी कभी वह काम अधिक होने की बात करती हैं मैं किसी को काम पर रखने के लिये कहता हूं पर टीवी पर अक्सर ऐसी खबरें आती हैं कि अपना विचार स्थगित कर देती हैं।’

उस दिन कहने लगी-‘पता नहीं लोग अपना काम स्वयं क्यों नहीं करते। नौकर रख लेते हैं।
मैंने कहा-‘तुम भी रख सकती हो। अगर यह टीवी चैनल देखना बंद कर दो। कभी सोचती हो कि ग्यारह सौ वर्ग फुट के भूखंड पर बने मकान की सफाई में ही जब तुम्हारा यह हाल है तो पांच-पांच हजार वर्ग फुट पर बने मकान वाले कैसे उसकी सफाई कर सकते हैं? मुझसे बार बार कहती हो कि छोटा प्लाट लेते। क्या जरूरी था कि इतना बड़ा पोर्च और आंगन भी होता। तब उन बड़े लोगों की क्या हालत होगी जो जमाने को दिखाने के लिये इतने बड़े मकान बनाते हैं। वह अपनी पत्नियों के तानों का कैसे सामना कर सकते हैं जब मेरे लिये ही मुश्किल हो जाता है।’
हमारी पत्नी सोच में पड़ गयी। इधर सास-बहू के धारावाहिकों का समय भी हो रहा था। वह टीवी खोलते हुए बोली-‘इन धारावाहिकों में तो नौकर वफादार दिखाते हैं।
मैंने हंसते हुुए कहा-‘तो रख लो।’
फिर वह बोली-‘पर वह न्यूज चैनल तो कुछ और दिखा रहे है।
मैंने कहा-‘तो फिर इंतजार करो। जब दोनों में एक जैसा ‘नौकर पुराण दिखाने लगें तब रखना। वैसे समाचार हमेशा सनसनी से ही बनते हैं और गद्दारी से ही वह बनती है वफदारी से नहीं। इसलिये दोनों ही जगह एक जैसा ‘नौकर पुराण’ दिखे यह संभव नहीं है। इसलिये मुझे नहीं लगता कि तुम किसी को घर पर काम पर रख पाओगी।’
मेरी पत्नी ने मुस्कराते हुए पूछा-‘तुम्हारे ब्लाग पर क्या दिखाते हैं?’

मैंने कहा-‘अब यह तो देखना पड़ेगा कि किसने टीवी पर क्या देखा है? बहरहाल मैंने तो कुछ नहीं देखा सो कुछ भी नहीं लिख सकता। सिवाय इसके कि वफदारी से नहीं गद्दारी से फैलती है सनसनी।’
मेरी पत्नी ने पूछा-‘इसका क्या मतलब?’
मैंने कहा-‘मुझे स्वयं ही नहीं मालुम

दीपक भारतदीप

Monday, March 31, 2008

इसलिए आत्मकथा नहीं लिखते-व्यंग्य

बरसों पहले कृश्न चंदर का उपन्यास देख ‘एक गधे की आत्मकथा’। पूरा नहीं पढ़ा क्योंकि उसमें गधे का बोलना-चालना समझ में नहीं आ रहा था। मैंने अपने जीवन में पढ़ने की शूरूआत पंचतंत्र की कहानियों और रामचरित मानस से की है इसलिये मुझे कई ऐसे उपन्यास भी नहीं समझ में आते जो बहुत प्रसिद्ध हैं। हां, ‘स्वर्णलता’ मेरा प्रिय उपन्यास है। बंगाली भाषा में लिखे गये इस उपन्यास का हिंदी अनुवाद मैने पढ़ा और मुझे बहुत पंसद आया जिन लोगों ने इसे पढ़ा होगा वह समझ सकते हैं कि वह मुझे क्यों पसंद आया। मुझे संघर्ष करने वाले पात्र पसंद है और वह भी जब कहीं न कहीं विजेता होते हैं। कृश्न चंदर के उस उपन्यास को मैने अपने बचपन में पढ़ने की बहुत कोशिश की पर नहीं पढ़ सका। हां, तब ख्याल आता था कि अगर जिंदगी में अच्छा लेखन नहीं कर पाये तो आत्म कथा जरूर लिखेंगे।

अभी भी कई बार ख्याल आता है कि आत्मकथा लिख डालें पर होता यह कि हमें उस उपन्यास की याद आ जाती है और तब सोचते हैं कि उसमें लिखें क्या? उसका शीर्षक क्या लिखे? कहीं न कहीं तो लिखना पड़ेगा कि आत्मकथा। अपना नाम लिखें या मेरी आत्मकथा लिख ही काम चलाये। मुख्य मुद्दा तो है उसमें लिखने वाली संभावित सामग्री। हम उसमें लिखेंगे तो अपने तन और मन पर जो बोझ उठाते हुए ही दिखेंगे। हमारी जिन्दगी भी मस्खरी से कम नहीं रही। लिखने की दृष्टि से भी अपनी भाषा शैली कृश्न चंदर जैसी नहीं हो सकती। वैसे तो ब्लाग लेखक के रूप में कोई नाम नहीं है और लेखक के रूप में भी कोई पहचान नहीं है पर मान लीजिये कोई थोड़ा बहुत नाम पढ़कर किताब ले भी तो वह कहेगा यह तो आदमी की कम गधे की आत्मकथा अधिक लगती है। अपने तन और मन पर इतना बोझ तो कोई गधा ही उठा सकता है। इतना अपमान सहन करने की ताकत तो केवल गधे में ही होती है। ऐसी बहस तो केवल तो कोई गधा ही कर सकता है। एक के बाद एक गल्तियां तो कोई गधा ही कर सकता है।

हम खुद बदनाम हों तो कोई बात नहीं है पर अगर हमने वाकई उसमें कई सच लिखे तो कई ऐसे लोग बदनाम हो जायेगे जिनके मूंह पर हमने कभी उनकी मूर्खताऐं और बेईमानियां उनके मूंह पर नहीं कही। आदमी दूसरे को धोखा देता है या खुद खाता है इस प्रश्न की खोज अगर हमने अपनी आत्मकथा में दिखाई तो ऐसे लोगों पर कीचड़ के छींटे गिरेंगे जिनको वह हमसे छिपाने की आशा करते हैं। जीवन के सत्य के साथ भी बहूत लोग जीते हैं यह हमने देखा है पर अधिकतर लोग बनावटी जिन्दगी जीते हैं। अपने भ्रम को दूसरे शिक्षा और संस्कार के नाम पर थोपते हैं। चारों तरफ जीवन का ज्ञान देने वाले लोग अपने जीवन में जिस अज्ञान के अंधेरे में रहते हैं उसे देखकर उन पर कभी हंसी तो कभी तरस आता है। हमारे आसपास अपने जीवन के झंझावतों में फंसे लोग यह आशा तो करते हैं कि हम उनकी मदद करें पर उनकी शर्तों के अनुसार। हमने देखा है कि हमने ही दूसरों की शर्तें मानी पर हमारा अवसर आया तो अपनी शर्तें थोपीं फिर भी वैसी मदद भी नहीं की जैसी हमने अपेक्षा की थी।

मतलब यह कि अपनी आत्मकथा लिखने से अच्छा है कि किश्तों में कहानियों और व्यंग्यों में अपनी बात कहते रहें। इतनी बड़ी किताब लिखें और फिर अपने पैसे लेकर प्रकाशक ढूंढें और इस बात की कोई गारंटी नहीं कि कोई उसे पढ़ेगा। हमारे एक मित्र से जब हमने आत्मकथा लिखने की बात की तो वह बोला-‘‘अभी तुम अपने व्यंग्यों में हम पर बहुत फब्तियां कस जाते हो और किताब में भी कोई अपनी गल्तियां थोड़े ही लिखोगे हमारे ऊपर ही सब लिखोगे। मत लिखो क्योंकि अपने को जितना सही साबित करने की करोगे उतना ही झूठे माने जाओगे। अपनी रचनाओं में तुम अपनी चर्चा नहीं करते इसलिये कोई तुम्हारे नाम से अधिक चर्चा नहीं करता पर आत्मकथा में सब तुम्हें झूठा ही समझेंगे।’’

सो तमाम विचार कर हमने आत्मकथा लिखने का कार्यक्रम स्थगित कर दिया।

Thursday, March 6, 2008

चाणक्य नीति:वाणी पर संयम रखने वाले ही लोकप्रिय होते हैं

चाणक्य कथन-समाज में लोकप्रियता अर्जित करने के लिए सबसे पहले दूसरों की निंदा करना बंद कर देना चाहिऐ। परनिंदा करने में रस लेना मानव की स्वाभाविक प्रवृति है। वाणी पर संयम रखना एक तरह से तपस्या है। जो दूसरों की निंदा नहीं करता वही समाज में लोकप्रियता अर्जित कर सकता है।

लेखकीय अभिमत- हमारा अध्यात्म दर्शन कहता है कि बड़ी लकीर को थूक से छोटी करने वाला वाला मूर्ख और उसके मुकाबले बड़ी लकीर खींचने वाला बुद्धिमान होता है। हमने देखा होगा कि अधिकतर लोग दूसरेको छोटा और घटिया बताकर अपने को बडा और ऊंचा साबित करना चाहते हैं। 'अमुक व्यक्ति ऐसा है', 'अमुक व्यक्ति में यह दोष है, 'और अमुक व्यक्ति वह बुरा काम करता है'-ऐसी चर्चा अक्सर लोग करते हैं और उनका आशय यह होता है कि हम भले, उस दोष से रहित और अच्छे काम करने वाले लोग हैं। आप और हम में से अधिकतर लोग ऐसा ही करते हैं।

इसका एक दूसरा रूप भी देखें। जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे की निंदा कर जब हमारे सामने से हटता है तो हम उसमें भी दोष देखने लगते हैं और वही बातें उसके बारे में सोचते हैं जो वह दूसरे के बारे में कह रहा था। मन ही मन कई बार कहते हैं कि 'उसके दोष तो देखता है अपने नहीं'।

क्या हम कभी सोचते हैं कि कहीं हम भी किसी की निंदा करते हैं और जब वहाँ से हटते हैं तो दूसरा व्यक्ति भी हमारे बारे में यही सोचता होगा। हम वाणी पर संयम की बात तो करते हैं पर आत्ममंथन नहीं करते। हम वाणी से अच्छा बोलते हैं तो वातावरण भी वैसा ही बनता है और खराब बोलते हैं तो खराब। जब हम किसी से अच्छा बोलकर अलग होंगे तो दूसरे व्यक्ति के मन में अच्छे विचार छोड़ जायेंगे तो वह अच्छा सोचेगा और खराब छोड़ जायेंगे तो वह हम में भी दोष देखेगा। हम अपनी इन्द्रियों से ही ग्रहण करते है और विसर्जन भी और सब अपने लिए ही प्रभावकारी होता है। अत: हमें अपने वाणी पर संयम रखते हुए अच्छी बात ही करना चाहिए।

Friday, February 15, 2008

अपने अस्तित्व के निशान-कविता साहित्य

पूरी जिन्दगी जुटाते सामान
पर कितना ले पाते उससे काम
फ़िर भी रुकते नहीं
चले जा रहे अंधेरे रास्ते पर
रौशनी की तलाश में
शायद मिल जाए खुशी का निशान

एक सामान जुटाते
दूसरों के नाम सामने आ जाते
कल जो लिया था उसे आज पुराना पाते
बाजार से लाने की करते कवायद
कुछ फ़िर नया
लोग भी नए नाम सुझाते
चलता जाता है अनवरत यह क्रम
अपने चलने का होता हमें भ्रम
जमीन पर चलते तो कार की चाहत होती
कार में होते, चाहते हवा में उड़ने वाला विमान

समान टूटते और बिखरते जाते
हम उन्हें कबाड़ में भेजते जाते
हर बार नया पाने की चाहत में चले जाते
चलाता है जो मन
नहीं समझते इशारे
कभी-कभी उससे बात करते तो
यह पाते जान
वह चाहता है खामोशी से दुनिया को
एक दृष्टा बनकर देखना
जब जुटाते हम उसके चैन के लिए समान
हम अपने होने के प्रमाण इस
दुनिया में छोड़ना चाहते और
वह चाहता देखना
अपने अस्तित्व के निशान

Tuesday, January 15, 2008

स्वेट मार्डेन-अपने मन में शंका को स्थान न दें

आपकी योग्यता के बारे में लोगों का विचार कुछ भी क्यों न हो आप कभी अपने मन में शंका को स्थान न दें की जिस कार्य को करने की आपके मन में इच्छा है या जो कुछ आप बनाना चाहते हैं वह आप नहीं कर सकते । अपने व्यक्तिगत विश्वास को हर संभव ढंग से बढाईये। आप ऐसा कर सकते हैं। अपने मन में बार-बार यह शब्द दोहराते रहे -''मैं आत्मा हूँ सब कुछ कर सकता हूँ। मेरे लिए प्रत्येक कार्य संभव है। असंभव शब्द मूर्खों के शब्दकोष में मिलता है-स्वेट मार्डेन।

Saturday, January 12, 2008

संत कबीर वाणी:सकाम भक्ति निष्फल होती है

कबीर कलिजुग आइ करि, कीये बहुत जो भीत
जिन दिल बांध्या एक सूं, ते सुखु सोवे निचींत


संत कबीर दास जी कहते हैं की कलियुग में आकर हमने बहुतों को मित्र बनाया पर जिन्होंने अपने दिल को एक से ही बाँध लिया, वे ही निश्च्नंत सुख के नींद सो सकते हैं.

जब लगा भगहित सकामता, तब लगा निर्फल सेव
कहै 'कबीर' वै क्यूं मिलै, निहकामी निज देव

संत कबीर दास जी कहते हैं कि भक्ति जब तक सकाम है, भगवान की सारी सेवा तब तक निष्फल ही है. निश्कामी देव से सकामे साधक की भेंट कैसे हो सकती है.

Monday, January 7, 2008

रहीम के दोहे:संपति के पास विपत्ति ही ले जाती है

कोउ रहीम जनि कहू के, द्वार गए पछिताय
संपति के सब जात हैं, विपति सबै ले जाय


कविवर रहीम कहते हैं कि विपत्ति अपने पर सभी को किसी से मदद मांगनी पड़ती हैं और इसमें शर्माने या पछताने से कोई लाभ नहीं है क्योंकि जिसके पास संपति है उनके पास विपति लोगों को ले ही जाती है।

खर्च बढ्यो, उद्यम घट्यो, नृपति निठुर मन कीन
कहू रहीम कैसे जिए, थोरे जल की मीन


कविवर रहीम कहते हैं कि व्यय अधिक हो गया, प्रयास भी घाट गया और स्वामी निष्ठुर हो गया तो कैसे काम चलेगा। कम जल में मछली कैसा जिंदा रह सकती हैं।

Saturday, January 5, 2008

चाणक्य नीति:जब तक वाणी मधुर न हो कोयल मौन रहती है

1. यह मनुष्य का स्वभाव है की यदि वह दूसरे के गुण और श्रेष्ठता को नहीं जानता तो वह हमेशा उसकी निंदा करता रहता है। इस बाट से ज़रा भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

उदाहरण- यदि किसी भीलनी को गजमुक्ता (हाथी के कपाल में पाया जाने वाला काले रंग का मूल्यवान मोती) मिल जाये तो उसका मूल्य न जानने के कारण वह उसे साधारण मानकर माला में पिरो देती है और गले में पहनती है।

2.बसंत ऋतू में फलने वाले आम्रमंजरी के स्वाद से प्राणी को पुलकित करने वाली कोयल की वाणी जब तक मधुर और कर्ण प्रिय नहीं हो जाती तबतक मौन रहकर ही अपना जीवन व्यतीत करती है।
इसका आशय यह है हर मनुष्य को किसी भी कार्य को करने के लिए उचित समय की प्रतीक्षा करना चाहिए अन्यथा असफलता का भय बना रहता है।
3.राजा , अग्नि, गुरु और स्त्री इन चारों से न अधिक दूर रहना चाहिऐ न अधिक पास अर्थात इनकी अत्यधिक समीपता विनाश का कारण बनती है और इनसे दूर रहने पर भी कोई लाभ नहीं होता। अत: विनाश से बचने के लिए बीच का रास्ता अपनाना चाहिऐ।

Friday, January 4, 2008

चाणक्य नीति:देवालयों का धन हड़पने वाला चांडाल

1.देव-मंदिरों के लिए निर्धारित भूमि, रत्नकोश (धन और अन्य संपदा), गुरुओं के भूमि जो धोखे से अपने कपट के व्यवहार से हड़प लेता है उसे चांडाल कहा जाता है।

2.रूप की शोभा गुण है। अगर गुण नहीं है तो रूपवान स्त्री और पुरुष भी कुरूप लगने लगता है।
3.कुल की शोभा शील मैं है। अगर शील नहीं है तो उच्च कुल का व्यक्ति भी नीच और गन्दा लगने लगता है।
4.विद्या की शोभा उसकी सिद्धि में है। जिस विद्या से कोई उपलब्धि प्राप्त हो वही काम की है।धन की शोभा उसके उपयोग में है ।
5.धन के व्यय में अगर कंजूसी की जाये तो वह किसी मतलब का नहीं रह जाता है, अत: उसे खर्च करते रहना चाहिऐ।
6.ऐसा धन जो अत्यंत पीडा, धर्म त्यागने और बैरियों के शरण में जाने से मिलता है, वह स्वीकार नहीं करना चाहिए।
7.बिना पढी पुस्तक की विद्या और अपना कमाया धन दूसरों के हाथ में देने पर समय पर न विद्या काम आती है न धनं.

Thursday, January 3, 2008

जहाँ सतीत्व को खतरा वहाँ साधुत्व क्या बच पायेगा

चेले ने गुरु से कहा
गुरूजी, कल मैं आश्रम से
बाहर निकलकर शहर जाऊंगा
वहाँ कहीं नये साल का जश्न मनाऊँगा
आप तो देते हो पुरातन शिक्षा
मंगवाते हो घर-घर से भिक्षा
अब नवीनतम शिक्षा लेने का विचार आया
शहर से कुछ लोगों का आफर आया
इस बहाने शहर भी देख आऊँगा''

गुरूजी बोले
''तो अन्तिम प्रणाम करता जा
मन हो तो गुरु दक्षिणा भी दे जा
जिन स्थानों पर औरत की अस्मत
अब सुरक्षित नहीं
जायेगा तू वहीं
बहुत हंगामा मचायेगा
जहाँ सतीत्व को ख़तरा हो
वहाँ तेरा साधुत्व भला कहाँ बच पाएगा
जाना है तो जा
तेरे लौटने में मुझे संशय है
इसलिए मैं तेरी जगह
अब कोई नया शिष्य
अपने इस आश्रम में बसाऊंगा
-------------------------------

Wednesday, January 2, 2008

चाणक्य नीति:छोटे आदमी से ज्ञान मिले तो ग्रहण करें

1.ईर्ष्या असफलता का दूसरा नाम है। अपनी असफलता और दुसरे की सफलता से मनुष्य ईर्ष्यालु हो जाता। ईर्ष्याग्रस्त मनुष्य महत्वहीन होता है, अतएव ईर्ष्या करना अपना महत्व घटाता है,हजारों गायों के बीच बछ्दा केवल अपने माँ के पास जाता है, इसी प्रकार मनुष्य का कर्म भी उसी में पाया जाता है, जो उसका कर्ता होता है। कर्ता कर्म का फल भोगे बिना कैसे रह सकता है ।
2.ईश्वर ने सोने में सुगंध नहीं डाली, गन्ने में फल नहीं लगाए, चन्दन के पेड को फूलों से नहीं सजाया , विद्वान को धन से संपन्न नहीं बनाया और राजा को दीर्घायु प्रदान नहीं की। इनके साथ इस तरह के अभाव का रहस्य का कारण यही है इन वस्तुओं के उपयोग के साथ और मनुष्यों में उसकी प्रवृति में दुरूपयोग और अहंकार का भाव पैदा न हो। अगर इससे ज्यादा गुण होते तो यह दोनों के लिए घातक होता।
3.यदि गंदे स्थान पर सोना पडा है उसे उठाने में गुरेज नहीं करना नहीं चाहिए, क्योंकि वह कीमती हैं। यदि विद्या निम्न कोटि के व्यक्ति से भी सीखना पडे तो संकोच नहीं करना चाहिए, क्योंकि वह उपयोगी होती है। यदि विष से अमृत मिलता है जरूर प्राप्त करना चाहिए।
*इसका आशय यह है हमें अगर ज्ञान अपने लघु व्यक्ति से मिलता हो तो उसे ग्रहण करना चाहिऐ। सज्जन व्यक्ति से अगर वह गरीब भी है तो संपर्क करना चाहिए। आगे व्यक्ति गुणी है पर निम्न जति या वर्ग है तो भी उसकी प्रशंसा करना चाहिए।
4.युवावस्था में काम-क्रोध हावी होते हैं, इसी कारण व्यक्ति की विवेक शक्ति निष्क्रिय हो जाती है। काम वासना से व्यक्ति को कुछ नहीं सूझता। काम-क्रोध व्यक्ति को अँधा कर देता है।
५।धूर्तता, अन्याय और बैईमानी आदि से अर्जित धन से संपन्न आदमी अधिक से अधिक दस वर्ष तक संपन्न रह सकता है, ग्यारहवें वर्ष में मूल के साथ-साथ पूरा अर्जित धन नष्ट हो जाता है।<ब्र />
*इसका सीधा आशय यह है कि भ्रष्ट और गलत तरीके से कमाया गया पैसा दस वर्ष तक ही सुख दे सकता है, हो सकता है कि इससे पहले ही वह नष्ट हो जाय।

Friday, December 28, 2007

सिक्स सिक्सर जैसा आईडियल

लड़के ने दिया लडकी को
'आई लव यू' का प्रपोजल
लडकी ने 'सोचूँगी पर मेरी पसंद है
कि इंडियन आइडियल जैसा कोई'
कहकर लगा दिया डिस्पोजल
वह खुश हो गया
और हर रोज उसकी राह में खडा होकर
नित नए रचता स्वांग
जब वह निकलती वहाँ से
फिल्मी गाने ऐसे गाता
जैसे पी रखी हो भांग
वह उसे मुस्कराकर देखती और निकल जाती
वह खुश होता हर पल
कई दिन तक चला यह नाटक
पर अभी तक मंजूर
नहीं हुआ था उसका प्रपोजल

उस दिन लडकी उसके पास से गुजरी
और जोर से बोली
'बंद करो यह फिल्मी गाने
अब नहीं रह गए मेरे लिए इसके मायने
अब मेरी पसंद है
ट्वंटी ओवर में सिक्स सिक्सर
लगाने वाले जैसा आइडियल'
लड़का हक्का बक्का खडा रहा
ओपनिंग होने से पहले ही
उसके प्यार का डिस्पोजल
----------------------

Thursday, December 27, 2007

हिट ब्लोगर ने प्रेम में नो कमेन्ट पाया

कमेन्ट पाने का उसने कीर्तिमान बनाया
जोश में आकर उसने लिखा
अपनी प्रेयसी को प्रेम पत्र
इकतरफा प्रेम ने उसे बनाया शायर
बहुत दिन तक सड़क किनारे खडे होकर
वह अपनी प्रियतमा को देखता
उसका दिल फिर भी नहीं आया
शायर बन गया ब्लोगर
उसकी कविताओं ने जमकर हिट पाया
'प्रियतमा तुम मेरा ब्लोग पढ़ लो
देखो तुम पर कवितायेँ लिखते
कितना हिट हो गया हूँ
कमेन्ट में मैंने कीर्तिमान बनाया
तुम अब पसीज जाओ
मेरे इस प्रेम पत्र पर
प्रेम भरी कमेन्ट लगाओ
बस यही कमी रह गई है
वैसे मैंने खूब नाम कमाया'

लौटती डाक से जवाब आया
उसने लिफाफा खोला
और अपने ही पत्र के नीचे
'नो कमेंट' लिखा पाया
हतप्रभ ब्लोगर चिल्लाने लगा
"कैसा है यह ऊपर वाले का खेल
जिसके लिए इम्तहान देकर पास किया
वही कर गई फेल
उसके प्रेम में कितनी कवितायेँ लिखीं
कमेन्ट का अंबार लगाया
उसी ने 'नो कमेन्ट' का बोर्ड दिखाया"

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