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Monday, June 13, 2011

हास्य कविता-धर्म के धंधे में कोई कर नहीं है (hasya kavita-dharm ke dhandhe mein tax nahin hai)

चेले ने कहा गुरु से
‘गुरुजी,
अब तो आपकी सेवा में बहुत सारे
चेले आ गये हैं,
सभी आपके भक्तों को भा गये हैं,
मुझे अब समाज सेवा के लिये
आश्रम से बाहर जाने की
सहमति प्रदान करे,
किसी बड़ी संस्था में पद लेकर
आपका नाम रौशन करूं,
अनुमति प्रदान करें।’
सुनकर गुरु जी बोले
‘सीधी बात क्यों नहीं कहता
कि अब अपनी धार्मिक छवि को
नकदी में भुनाना चाहता है,
माया के लोभ में
ज्ञान को भुलाना चाहता है,
मगर भईये!
समाज सेवा में राजनीति चलती है,
बाहर लगते हैं जनकल्याण के नारे
अंदर कमीशन पाने की नीयत पलती है,
तुझे लग रहा है कि यह रास्ता सरल है,
मगर वहां बदनामी का खतरा हर पल है,
फिर तेरा अनुभव तो पूजा पाठ का है
राजनीति में एक तरह से तू तो उल्लू काठ का है,
वहां पहले से ही मौजूद बड़े बड़े धुरंधर हैं,
कुछ बाहर पेल रहे हैं डंड तो कुछ अंदर हैं,
उनकी आपस में तयशुदा होती जंग,
देखती है जनता बड़े चाव से
भले ही हालातों से तंग,
फिर तू समाज सेवा के नाम पर
कोई आंदोलन चलायेगा,
डंडे की मार खाकर यहीं लौट आयेगा,
भले ही मेरी वजह से
तेरे को कई समाज सेवक मानते हैं,
पर उनके इलाके में अगर तू घुसा
मार खायेगा
यह हम जानते हैं,
वहां जाकर नाकामी तेरे हाथ आयेगी,
यह बदनामी मेरे नाम के साथ भी जायेगी,
इसलिये अच्छा है
कहंी दूसरी जगह आश्रम बनाकर
तू भी स्वामी बन जा,
धर्म के धंधे में एक खंबे की तरह तन जा,
यहां डंडे का डर नहीं है,
कमाई पर कोई कर नहीं है,
अभी तक मैं अपना खजाना अकेला भरता था
अब अलग होकर दोनों ही
अपनी तिजोरी दुगुनी गति से भरें।’
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संकलक लेखक  एवं संपादक-दीपक   'भारतदीप',ग्वालियर 
Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
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Tuesday, August 10, 2010

कमीशन की बरसात-हास्य कविताएँ (commision ki barsat-hasya kavitaen)

बच्चे को मैदान पर हॉकी खेलते देख
पुराने एक खिलाड़ी ने उससे कहा
‘‘बेटा, बॉल से हॉकी कुछ समय तक
तक खेलना ठीक है,
फिर कुछ समय बाद पैसे का खेल भी सीख,
अगर केवल हॉकी खेलेगा  तो
बाद में मांगेगा भीख।’’
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बरसात के पानी से मैदान भर गया
खिलाड़ी दुःखी हो गये
पर प्रबंधक खुश होकर कार्यकर्ताओं में मिठाई बांटने लगा
जब उससे पूछा गया तो वह बोला
‘‘अरे, यह सब बरसात की मेहरबानी है,
मैदान बनाने के लिये फिर मदद आनी है।
वैसे ही मैदान ऊबड़ खाबड़ हो गया था,
पैसा तो आया
पर कैसे खर्च करूं समझ नहीं पाया,
इधर उधर सब बरबाद हो गये,
इधर जांच करने वाले भी आये थे
तो जैसे मेरे होश खो गये,
अब तो दिखाऊंगा सारी बरसात की कारिस्तानी,
हो जायेगा फिर दौलत की देवी की मेहरबानी,
धूप फिर पानी सुखा देगी
अगर फिर बरसात हुई तो समझ लो
अगली किश्त भी अपने नाम पर आनी है,
तुम खाओ मिठाई
मुझे तो बस किसी तरह कमीशन खानी है।
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कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Thursday, June 3, 2010

धूप में जवानी थोड़ा पक गयी है-हास्य कविता (dhoop men javani thoda pak gayi hai-hindi hasya kavita)

अंतर्जाल पर रोज मिलते थे
प्यार भरे शब्द एक दूसरे के लिये लिखते थे,
बहुत दिन बाद
आशिक और माशुका को
आपस में मिलने की बात दिमाग में आई,
एक तारीख चुनकर अपनी मीट होटल में सजाई।
आशिक पहले पहुंचकर टेबल पर बैठ गया
माशुका थोड़ी देर बाद आई।
दोनों ने देखा एक दूसरे को
तब एक उदासी उनके चेहरे पर नज़र आई।
फिर भी खाना पीना टेबल पर सज गया
तो उसे खाने की इच्छा उनके मन में आई।
आशिक ने बिल की कीमत बड़े बेमन से चुकाई।

बातचीत का दौर शुरु हुआ तो
माशुका एकदम जोर से आशिक पर चिल्लाई,
‘सच कहते हैं इंटरनेट पर
धोखे हजार है,
जो खाये वह हो बरबाद
जो दे उसकी तो बहार है
तुम तो छत्तीस के लगते हो
भले ही इंटरनेट में अपने फोटो में
पच्चीस के बांके जवान की तरह फबते हो,
शर्म की बात है
तुमने अपनी उम्र मुझे केवल तीस बताई।’

सुनकर उठ खड़ा हुआ आशिक
और बोला
‘तीस साल का ही हूं
वह तो धूप में जवानी थोड़ा पक गयी है,
तुम्हारे लिये टंकित करते हुए श्रृंगार रस से भरी कवितायें
यह आंखें कुछ थक गयी हैं,
कंप्यूटर पर बैठा बैठा
मोटा और भद्दा हो गया हूं,
पर इसका मतलब यह नहीं कि
जवानी का दिल बिछाकर सो गया हूं,
मेरी बात छोड़ो,
बात का रुख अपनी तरफ मोड़ो,
तुम छह साल से अपनी उम्र
अट्ठारह ही बता रही हो,
फोटो दिखाकर यूं ही सता रही हो,
जब तुम्हें मीट में आते देखा तो सोच रहा था
पता नहीं यह कहीं मेरी माशुका की
माताश्री तो नहीं आयी है।
मुझ पर लगा रही है हो छह साल
कम उम्र बताने का आरोप जबकि
तुमने तो कम से कम
सात साल सात महीने कम बतायी है।
जहां तक मेरा अनुमान है
तुम्हारा नाम भी दूसरा होगा
मुझ से तो तुमने छद्म मोहब्बत रचाई है।
होटल में खा पीकर चली जाओगी,
फिर दूसरी जगह दाव आजमाओगी,
मेरी यह गलती थी जो
छह साल तक तुम्हें अपने दिल की रानी माना,
अपनी तरफ देखो मुझे न दो ताना,
तुम्हें क्या दोष दूं
इंटरनेट की माया
दुनियां की तरह अज़ीब है
इसलिये मैंने यह छठी ठोकर खाई।’

इस तरह आशिक माशुक की पहली मीट ने
दोनों के इश्क की कब्र बनाई।
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Wednesday, April 7, 2010

पैंतरेबाजी-हिन्दी शायरी

पैंतरेबाजी से प्रसिद्धि भी जल्दी मिल जाती है,
सीधी राह में भी अड़चन कम न आती है।
शादी पर बारात निकले, या गमी में शवयात्रा
खुशी और गमी भी बाजार में अब बेची जाती है।
हम बैठे देख रहे परदे पर, सब नाटक है सच नहीं
मुफ्त नहीं है, विज्ञापन की कीमत से शय बढ़ जाती है।
कहें दीपक बापू शादी से तलाक तक देखते रहो
बिके पात्रों के अभिनय में गज़ब की सच्चाई नज़र आती है।
कुछ मज़हब की बातें होती, कुछ शायरी भी देती सुनाई
जहां है दौलत का खजाना, वहां की गाथा गायी जाती है।
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Monday, February 1, 2010

नयी स्वयंवर परंपरा-हिन्दी हास्य कविता (nai svyamvar parampara-hindi comic poem)

पति ने पत्नी से कहा

‘ बहुत कोशिश पर भी इतने दिनों में

अपने बेटे की

 शादी नहीं करवा पाये,

कमाता कौड़ी भी नहीं है

पर कमाऊ दिखाने के लिये

अपने बैंक खाते भी उसके नाम करवाये।

जानने वाले लोग पोल खाते हैं

इसलिये क्यों न अब उसके लिये स्वयंवर

आयोजित किया जाये।

नयी परंपरा है

लोग दौड़े चले आयेंगे

हो सकता है कि काम बन जाये।’

पत्नी ने कहा

‘हां, अच्छा है

अपना बेटा भी भगवान राम की तरह ही गुणवान है,

भले ही कमाता नहीं पर अपनी शान है,

सीता जैसी बहू मिल जाये

तो जीवन धन्य हो जाये,

पर समधी भी जनक जैसा हो,

दहेज देने में झिझके नहीं, ऐसा हो,

पर किसी पर यकीन नहीं करना

अपने कार्यक्रम में ऐसे ही लोगों को

आमंत्रित करना जिनके पास माल हो,

ऐसा न कि बाद में बुरा हाल हो,

घुसने से पहले सभी को

अपनी मांग बता देना,

उनकी हालत भी पता कर लेना,

सभी खोये रहें इस नयी स्वयंवर परंपरा में

पर तुम कम दहेज पर सहमत न होना

कोई कितना भी समझाये।’

कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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