समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
Showing posts with label हिन्दी शायरी. Show all posts
Showing posts with label हिन्दी शायरी. Show all posts

Tuesday, August 10, 2010

कमीशन की बरसात-हास्य कविताएँ (commision ki barsat-hasya kavitaen)

बच्चे को मैदान पर हॉकी खेलते देख
पुराने एक खिलाड़ी ने उससे कहा
‘‘बेटा, बॉल से हॉकी कुछ समय तक
तक खेलना ठीक है,
फिर कुछ समय बाद पैसे का खेल भी सीख,
अगर केवल हॉकी खेलेगा  तो
बाद में मांगेगा भीख।’’
----------
बरसात के पानी से मैदान भर गया
खिलाड़ी दुःखी हो गये
पर प्रबंधक खुश होकर कार्यकर्ताओं में मिठाई बांटने लगा
जब उससे पूछा गया तो वह बोला
‘‘अरे, यह सब बरसात की मेहरबानी है,
मैदान बनाने के लिये फिर मदद आनी है।
वैसे ही मैदान ऊबड़ खाबड़ हो गया था,
पैसा तो आया
पर कैसे खर्च करूं समझ नहीं पाया,
इधर उधर सब बरबाद हो गये,
इधर जांच करने वाले भी आये थे
तो जैसे मेरे होश खो गये,
अब तो दिखाऊंगा सारी बरसात की कारिस्तानी,
हो जायेगा फिर दौलत की देवी की मेहरबानी,
धूप फिर पानी सुखा देगी
अगर फिर बरसात हुई तो समझ लो
अगली किश्त भी अपने नाम पर आनी है,
तुम खाओ मिठाई
मुझे तो बस किसी तरह कमीशन खानी है।
---------

कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
------------------------

दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

Sunday, May 2, 2010

सर्वशक्तिमान का दरवाजा-हिन्दी हास्य कविता (thief and states-hindi hasya kavita)

हांफता हुआ आया फंदेबाज
और बोला
‘दीपक बापू,
आज तो निकल गया इज्जत का जनाजा
बज जायेगा मेरे नाम का भी बाजा,
घर से पर्स में केवल पचास रुपये
लेकर निकला था कि कट गया,
मेरे लिये तो जैसे आसमान फट गया,
अब चिंता इस बात की है कि
कभी चोर पकड़ा गया तो
मेरा पर्स भी दिखायेगा,
उसमें मेरा परिचय पत्र है तो
वह नाम भी लिखायेगा,
दुःख इस बात का है कि
पचास रुपये थे उसमें
यह सुनकर हर कोई मुझ पर हंसेगा,
तब हमारा सिर शर्म के मारे जमीन में धंसेगा,
तरस जायेगा इज्जतदार मेहमानों के लिये
हमारे घर का दरवाजा।’

सुनकर तमतमाते हुए दीपक बापू बोले
‘बेशर्मी की भी हद करते हो,
पर्स में रखते हो परिचय पत्र
फिर पचास रुपये उसमें धरते हो,
दुआ करो चोर पकड़ा न जाये,
या पैसे निकालकर उसे कहीं फैंक आये
पकड़ा गया तो
उसकी बद्दुआ तुम्हारे नाम पर भी आयेगी,
जेल में पहुंचे है हजारों करोड़ चुराने वाले
उसे देखकर उसकी रूह शरमायेगी,
पहले अगर जेल जाकर भी वह चोर नहीं सुधरा होगा
क्योंकि उसने वहां अपने जैसों को ही बंद देखा होगा,
अब पहुंचेगा तो अपने को ‘गरीब श्रेणी’ में पायेगा,
मिलेंगे उसे ऐसे साथी, जिनकी लूटी रकम की बराबरी
वह सैंकड़ों जन्मों तक की चोरी में भी नहीं कर पायेगा,
बाहर की आजादी को तरसा करेगा,
जब ‘उच्च स्तरीय चोरों’ की गुलामी में चिलम भरेगा,
तब देगा उन घर स्वामियों को गालियां,
जिनके तालों में घुसी थी उसकी तालियां (चाबियां),
पकड़ा वह चोर न जाये,
या फिर पर्स उसका खो जाये
इसके लिये प्रार्थना करो
खुला है इसके लिये
बस एक सर्वशक्तिमान का दरवाजा।’
---------------

कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
------------------------

दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

Friday, April 16, 2010

क्रिकेट और चैरिटी-हिन्दी हास्य कविता (cricket and charity-hindi hasya kavita)

हांफता हुआ आया फंदेबाज और बोला
‘दीपक बापू
तुमने अपनी पूरी जिंदगी
क्रिकेट मैच देखने में गंवाई,
कुछ धंधे पानी की सोचते तो
पर कभी ‘चैरिटी’ (समाज सेवा) करने पर
अपनी अक्ल न चलाई,
करते तुम भी लोगों का भला
हो जाती तुम्हारी भी कमाई।’
सुनकर दीपक बापू हुए हैरान फिर बोले
‘अगर ‘चैरिटी’ के नाम पर
धंधा करना होता तो
फिर क्रिकेट ही क्या जरूरी है,
नहीं कोई ऐसी मजबूरी है,
चाहे चुनो कोई भी काम
‘चैरिटी’ की आड़ में करो सबका काम तमाम
जैसे अनाथ बच्चों की सेवा,
या फूंको वह मुर्दे जिनका नहंी कोई नामलेवा,
चल निकलता है धंधा,
कभी नहीं आता मंदा,
मुश्किल यह है कि भले आदमी को
अब अच्छे काम करने नहीं दिये जाते,
सारे काम
शातिरों के हिस्से में आते,
साठ बरसों से देश में गरीबी बढ़ी है,
वह दूर न हो सकी
पर बन गये उनके महल जिन्होंने
उसे हटाने की लड़ाई लड़ी है।
समाज सेवा का धंधा पुराना है,
करना नहीं किसी का भला
बस करते सभी को सुनाना है,
कभी चैरिटी के नाम पर होता था
फिल्मों का प्रदर्शन,
कभी नकली कुश्ती का दिखता था मंचन,
आजकल कहीं गरीबों, मजदूरों और बेबसों की चैरिटी के लिये
चल रही गोलियों और फट रहे बम,
कहंी क्रिकेट खेल दिखा रहा है दम,
सभी जगह दलालों ने खोल ली है
समाज सेवा की दुकान,
कमाई उनका लक्ष्य होता है
चाहे देश का हो नुक्सान,
सोचते सभी है अमीर बनने की
पर यह संभव नहीं है कि
समाज सेवा से हर कोई करे कमाई,
भलाई करने के लिये अब
सज्जन होना भी जरूरी नहीं है
चालाकी हो तो ही जीत सकते हो लड़ाई।
इसमें सारे काम करना ठीक है
छोड़कर किसी की सच में भलाई।
दूर रहे इसलिये हमेशा इससे
यह बात पहले ही हमारी समझ में आई
-----------

कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
------------------------

दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

Sunday, March 28, 2010

रास्ता बंद कर दो-हिन्दी व्यंग्य कविता (rasta band kar do-hindi vyangya kavita)

मशहूर हो जाने पर
वही बताओ दूसरों को रास्ते,
जो चुने नहीं तुमने अपने वास्ते।
कुछ नया कहने के लिये
चारों तरफ तुम्हें तारीफ भी मिलेगी,
तुम्हारे चाहने वालों के चेहरे
पर हंसी भी खिलेगी,
सोचने का शऊर न हो
पर दिखना तो चाहिये,
भले ही लफ्ज़ खुद न समझो
पर लिखना तो चाहिये,
कोई नया आकर तुम्हारी जगह न ले
इसलिये रास्ता बंद कर दो
आहिस्ते आहिस्ते।
---------

कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
------------------------

दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

Thursday, July 24, 2008

जैसे भेड़ों का झुंड जा रहा हो-व्यंग्य कविता

रास्ते के किनारे खड़ा वह
लोगों की भीड़ को भागते देख रहा है
पूछता है एक एक से उसकी मंजिल का पता
हर मुख से अलग अलग जवाब आ रहा है

कोई इंजीनियर बनने जा रहा है
कोई डाक्टर बनने जा रहा है
कोई एक्टर बनने जा रहा है
जो खुद नहीं बन सका वह आदमी
अपने बच्चों का हाथ पकड़े उसे
खींचता ले जा रहा है

ढूंढता है वह जो इंसानों की तरह
जीने की कोशिश करना सीख रहा हो
कोई जो दूसरों का हमदर्द
बनना सीख रहा हो
वह जो किसी के पीछे न भागना
सीख रहा हो
वह निराश हो जाता है यह देखकर
क्योंकि इंसानों की भीड़ नहीं
जैसे भेड़ों का झुंड जा रहा हो
.........................
यह कविता मूल रूप से इस ब्लाग दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका पर ही प्रकाशित है। इसकी अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं है।
कवि एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Thursday, July 10, 2008

रिश्तों के कभी नाम नहीं बदलते-हिन्दी ग़ज़ल


दुनियां में रिश्तों के तो बदलते नहीं कभी नाम
ठहराव का समय आता है जब, हो जाते अनाम
कुछ दिल में बसते हैं, पर कभी जुबां पर नहीं आते
उनके गीत गाते हैं, जिनसे निकलता है अपना काम
जो प्यार के होते हैं, उनको कभी गाकर नहीं सुनाते
ख्यालों मे घूमते रहते हैं, वह तो हमेशा सुबह शाम
रूह के रिश्ते हैं, वह भला लफ्जों में कब बयां होते
घी के ‘दीपक’ जलाकर, दिखाने का नहीं होता काम

---------------------------------
दीपक भारतदीप

Saturday, May 10, 2008

वही बनते महान-कविता




शब्दों के तीर चलाने के लिये
कलम को धनुष
स्याही को बनाओ कमान
यूं तो आत्ममुग्ध लोग जगह जगह
करते हैं अपने गुणों का स्वयं बखान
स्वार्थ के लिये देते सभी एक दूसरे को मान
जो खामोशी से चलते अपने जीवन पथ पर
करते हैं जो दूसरों के लिए संघर्ष
वही बनते महान
........................................
यूं तो आकाश में उड़ने की चाह में
सभी भ्रमित हो जाते हैं
ऊंचाई का पैमाना किसी के पास नहीं
फिर भी उड़े जाते हैं
कोई अटके बीच में
कोई फिर जमीन पर गिर जाते है
---------------------

दीपक भारतदीप

Thursday, May 1, 2008

मजदूर का बेटा कभी हीरो नहीं बनता है-व्यंग्य कविता

आज मजदूर दिवस है
आओ सब मिलकर नारे लगायें
जो गरीबों और मजदूरों को भायें
जन कल्याण और न्याय के लिये
जोर से आवाज उठायें
फिर भूल चाहे भूल जायें
एक ही दिन तो सब करना है
फिर कौन पूछेगा कोई कि
हम क्या कर रहे हैं
मजदूर दिवस कोई रोज नहीं आता
जो कोई फिक्र करें कि
उसके बाद भी कुछ करना होगा
फिर तो पूर वर्ष
न नारे होंगे न कोई सभायें
फिर क्यों घबड़ायें
................................
पत्थर तोडने वाले मजदूर की बेटी से
खेलते हुए दूसरे मजदूर के बेटे ने कहा
‘‘मै तो बड़ा होकर हीरो बनूंगा’
उसने कहा
‘‘अब ठहर गया है जमाना
समय बदलता है यह सत्य है
पर कितना भी बदले
मजदूर का बेटा हीरो नहीं बनता है
सब जगह यही है हाल
यहां आदमी अब मां के पेट से बनता है
मजदूर का बेटा चाहे कितना भी कर ले
वह समाज में हीरो नहीं बनता है
...............................

Friday, April 25, 2008

‘सिवाय रोटी के इंतजार के और क्या कर सकता हूं’-व्यंग्य कविता

कुर्ते और पैंट में लगे पैबंद
पुराना और मैला कुचला थैला लटकाये
अपनी दाढ़ी बढ़ाये लेखक
पहुंचा प्रकाशक के पास और बोला
‘‘आपके यहां कोई लेखक की
जगह खाली है
इधर मेरा पेट खाली है
बेटा रहता है बीमार और
परेशान और रोटी को तरसी घरवाली है
आप मुझे अपने यहां कम देंगे
तो आपका आभार मानूंगा
मैं बहुत अच्छा लिख सकता हूं’’

प्रकाशक ने कहा
‘‘बताने की जरूरत नहीं है
हाल तुम्हारे बता देते हैं कि
तुम्हें हिंदी में लिखना होगा
नाम तो होगा हमारे घर के ही सदस्य का
तुम्हें अपना नाम भूलना होगा
हां तुम लिख सकते हो अच्छा
यह भी समझ में आता है
तुम्हारा फटेहाल होना यह दर्शाता है
पर एक महीने तक और भी
तुम्हें भूखा रहना होगा
रोटी को भूलना होगा
कोई एडवांस नहीं मिलेगा
शर्त मंजूर हो तो तुम्हें काम पर रख सकता हूं

लेखक ने कहा
‘आप मुझे एक सप्ताह बाद
कुछ पैसे देना
फिर चाहे वेतन में से काट लेना
लिखने के साथ रोटी भी जरूरी है
पेट भरने पर मैं और भी अच्छा लिख सकता हूं’

प्रकाशक ने कहा
‘मुझे इतना भी अच्छा नहीं लिखवाना
इसीलिये पेट तुम्हारा नहीं भरवाना
अंग्रेजी के होते तो सोचता
हिंदी के हो इसलिये
नहीं दे सकता तुम्हें कोई बहाना
भूखे रहोगे तो भूख पर लिखोगे
बीमारी पर तभी लिख सकते हो
जब उस जैसे अपने को दिखोगे
मैं कोई किसी का दर्द हरने वाला नहीं
बल्कि उसका व्यापार करता हूं
लिखवाता हूं भूखे से उसकी रोटी
बहुंत समय तक उधार रखता हूं
अपनी शर्तों पर ही मैं चल सकता हूं’

इस तरह भूखा लेखक लिखने बैठ गया
सोचने लगा
‘सिवाय रोटी के इंतजार के और क्या कर सकता हूं’

Thursday, April 24, 2008

ज्ञान का व्यापार कर ले-हास्य कविता



पिता ने कहा अपने पुत्र से
‘बेटा नहीं लग रहा मन तेरा
स्कूल की पढ़ाई में तो
तो कहीं कोई गुरू ढूंढ ले
और जीवन का ज्ञान प्राप्त कर
अपना जीवन सफल कर ले’

पुत्र ने खुश होकर कहा
‘जी पिताजी आपने मेरे मन की बात कही
आज ही कोई गुरू ढूंढता हूं और
जो जीवन का ज्ञान देकर
मेरा जीवन सफल कर दे
चलूंगा उसी मार्ग पर
जहां मेरा मन सत्य के दर्शन कर ले’

सुनकर पिता को आया गुस्सा
और बोले
‘जब भी बात करना
उल्टी करना
मैं तुझे ज्ञान प्राप्त कर
उस मार्ग पर चलने के लिये नहीं कह रहा
मेरा मतलब तो यह है कि
तू भी ‘ज्ञान का व्यापार’ कर ले
अज्ञानियों के झुंड में उसे बेचकर
किसी तरह अपना घर भर ले’
....................................................
ज्ञान का व्यापार भी
अब बहुत फलफूल रहा है
जो बेचता है वह माया के झूले में झूल रहा है
कहने वाले भी कहें छोड़ दो
सुनने वाले भी दोहरायें कि
माया है महाठगिनी
नहीं है किसी की भगिनी
पकड़े हैं अपने हाथ में सभी अज्ञान
पर हर कोई ज्ञानी होने के अहंकार में फूल रहा है
....................................................

Monday, March 17, 2008

अपनी जिन्दगी की नैया पार लगायेंगे-कविता

जिन कागजों पर लिखे शब्दों से
बहकता है ज़माना
ढूँढता है लड़ने का बहाना
हम उन्हें नहीं पढ़ पायेंगे
अपनी जिन्दगी अपने ही शब्दों से सजायेंगे
ऐसी किताबों पर यकीन जताते लोग
जो खुद कभी पढ़ और समझ नहीं पाते
मतलब समझने के लिए सयानों के
घर के दरवाजे खटखटाते
अपनी अक्ल गिरवी रख आते
हम अपने यकीन के चिराग खुद ही जलायेंगे
अपनी जिन्दगी में रौशनी के लिए सब
किसी और से दियासलाई मांगते उधार
जैसे भलाई का होता हो व्यापार
कोई खरीदता है सिर झुकाकर
कोई देता हैं आकाश से लाकर
तय कर लो अपने यकीन से
अपनी जिन्दगी की नैया पार लगायेंगे
------------------------------------

Sunday, March 2, 2008

इश्क और बजट-हास्य कविता

लिखते-लिखते लव हो गया
दिखते-दिखते हो गयी लड़ाई
लिखने में आशिक ने किये थे
ढेर सारे वादे
जीवन भर सुख से रहने के इरादे
पर मार गयी सब महंगाई
इश्क में कौन बजट की तरफ देखता है
साथ-साथ रहने पर आती है
जीवन की सच्चाई
------------------------

इक तरफा इश्क के शिकार
आशिक ने लिखा
''तुम मेरे को अपना बना लो
जीवन भर मजे कराऊंगा
जो भी कहोगी खरीद लाऊंगा
ऐसी कोई और मिलेगा तुम्हें साथी नहीं
तुम्हें घुमाने के लिए हवाई जहाज भी ले आऊँगा''

लौटती डाक से जवाब आया
''कभी अखबार में बजट पढ़ते हो या नहीं
खर्च के बहुत सारी मदें तो बताई
पर आय का कोई जरिया भी तो बताया होता
कि 'यहाँ से कमाकर लाऊँगा''
--------------------

Thursday, February 28, 2008

अंतर्जाल है बहुत बड़ा मायाजाल-हास्य कविता

आया फंदेबाज और बोला
''क्या दीपक बापू लिखते हुए थकते नहीं हो
इस दुनिया में क्या हो रहा है तकते भी नहीं
अरे कहाँ अंतर्जाल पर
ब्लोग लिखते जा रहे हो
लोग नाम, नामा, इनाम और सम्मान
बटोरते हुए मशहूर हो जायेंगे
तुम जैसे तकते रह जायेंगे
हाथ घिसते रहोगे, पर लोगों तक नहीं पहुंच जायेंगे

टोपी पहनते हुए कहैं दीपक बापू
''यह है अंतर्जाल
बहुत बड़ा मायाजाल
और एक इंद्रजाल
यहाँ केवल नाम नहीं चलेंगे
जो जलाएगा शब्दों को दीपक की तरह
उसकी रौशनी में उनके नाम ही चमकेंगे
यहाँ बडे-बडे नाम नहीं चलेंगे
कर सकते हैं जो गागर में सागर की तरह
शब्दों के संजोने का काम
उनके ही डंके यहाँ बजेंगे
इनाम तो आखिर अलमारी में ही सजते
पर यहाँ शब्दों में भर देंगे चमक
उनके नाम ही आकाश में तैरेंगे
नाम तो होगा बहुतों के पास तिजोरी में
पर जिनके शब्दों में होगी सोने की चमक
वही यहाँ साहित्य के साहूकार बनेंगे
लिखीं गईं किताबें पडी रहतीं हैं कबाड़ में
पर यहाँ सभी शब्द अलग-अलग
किताब की तरह खुले में सांस लेते रहेंगे
उनकी सांस तब भी चलेगी
जब हम शवासन में आ जायेंगे
रोज करते हैं नये प्रयोग
तकनीकी श्रेणी के नहीं है तो क्या
कभी इसके भी विशेषज्ञ कहलायेंगे
जो बाजार में सजते
वह शब्दों के खेल नहीं समझते
जो समझते हैं वह सबसे बचते हुए
बस रोज लिखते जायेंगे
उनको नाम, नामा, इनाम और सम्मान
कहीं भी न मिले
पर बाद में उनके नाम पर दिए जायेंगे
यह अंतर्जाल बहुत बड़ा मायाजाल
चंद शब्द लिखकर जो
फंसेंगे माया के चक्कर में
वह यहाँ कभी विजेता नहीं कहलायेंगे
---------------------------------------

Sunday, February 10, 2008

भला कौन खुश रहा है इस भीड़ में-कविता साहित्य

अपने कुछ लोग खो गए
इस शहर की भीड़ में
उनके पते लिखे हैं
बहुत से कागजों पर
जो पड़े हैं फाईलों की भीड़ में

किसे ढूंढें और क्यों
ढेर सारे सवाल आते हैं सामने
किसी से मिलने की वजह
चाहिए हमको
जाएं मिलने तो वह भी
उठाते आने की वजह के प्रश्न सामने
समय निकला जाता है
जूझते हुए प्रश्नों की भीड़ में

अपने ही जाल में उलझे लोग
फुरसत नहीं पाते
जीवन की इस भागमभाग से
ओढ़ लिया है दिमाग में तनाव
कब ले सकते हैं दिल से काम
नहीं आता समझ में
खोये हुए है लोग
अपनी समस्याओं की भीड़ में

हम भीड़ में कहाँ तलाशें उनको
जो छोड़ नहीं पाते उसको
डरते हैं अपनी तन्हाई से
जीतने की क्या सोचेंगे वह
हारे हैं हर पल जिन्दगी के लड़ाई से
अकेले में अपने पहचाने का डर
उनके मन में रहता है
खोए रहना चाहते हैं भीड़ में

अकेले ही खडे देख रहे हैं उनको
वहाँ हाँफते और कांपते
जबरन हंसने की कोशिश करते हुए
कभी हमारे तन्हाई पर भी
हँसते हैं दूसरों के साथ
दूर रखते हैं हमारे से अपना हाथ
पर हम भी हँसते हैं
साथी है हमारी यह तन्हाई
भला कौन खुश रहा है इस भीड़ में
------------------------------------------

Sunday, December 30, 2007

बाजार के बजते ढोल

कहते हैं कि तौल-मोल के बोल
पर जमाने को लग गई है
ऐसी नजर कि
अब बिना भाव-ताव किये कोई
नहीं रहा अपनी जुबान से बोल
जहाँ तक कान जाते हैं
सुनाई देते हैं
बाजार के बजते हैं ढोल
कोई कहता यह खरीदो
कोई कहता यह पुराना बेच दो
सौदे किये जाते हुए और बेचने वाले मचाते शोर
ताकि खुल न जाये पोल
--------------------------------


अपने मन में है बस व्यापार
बाहर ढूंढते हैं प्यार
मन में ख्वाहिश
सोने, चांदी और धन
के हों भण्डार
पर दूसरा करे प्यार
मन की भाषा में हैं लाखों शब्द
पर बोलते हुए जुबान कांपती है
कोई सुनकर खुश हो जाये
अपनी नीयत पहले यह भांपती है
हम पर हो न्यौछावर
पर खुद किसी को न दें सहारा
बस यही होता है विचार
इसलिए वक्त ठहरा लगता है
छोटी मुसीबत बहुत बड़ा कहर लगता है
पहल करना सीख लें
प्यार का पहला शब्द
पहले कहना सीख लें
तो जिन्दगी में आ जाये बहार
-----------------

यह रचनाएँ जरूर पढ़ें

Related Posts with Thumbnails

हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर

यह रचनाएँ जरूर पढ़ें

Related Posts with Thumbnails

विशिष्ट पत्रिकाएँ