मयखाने से जब निकले थे
आखिरी बार
तब सोचा न था कि अब
यहां फिर कभी नहीं हम नहीं आयेंगे
अब भी देखते हैं राह पर चलते हुए
मयखानों की तरफ
पर अस्पताल जाने के डर से
मूंह फेर जाते हैं
घर में रखी आधी बोतल देखकर भी
डर जाते हैं
मन में आते ही कब पी जायेंगे
पता नहीं कब मय के डर के मुक्त हो पायेंगे
यह अव्यवसायिक ब्लॉग/पत्रिका है तथा इसमें लेखक की मौलिक एवं स्वरचित रचनाएं प्रकाशित है. इन रचनाओं को अन्य कहीं प्रकाशन के लिए पूर्व अनुमति लेना जरूरी है. ब्लॉग लेखकों को यह ब्लॉग लिंक करने की अनुमति है पर अन्य व्यवसायिक प्रकाशनों को यहाँ प्रकाशित रचनाओं के लिए पूर्व सूचना देकर अनुमति लेना आवश्यक है. लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर
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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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Wednesday, April 2, 2008
Friday, February 15, 2008
अपने अस्तित्व के निशान-कविता साहित्य
पूरी जिन्दगी जुटाते सामान
पर कितना ले पाते उससे काम
फ़िर भी रुकते नहीं
चले जा रहे अंधेरे रास्ते पर
रौशनी की तलाश में
शायद मिल जाए खुशी का निशान
एक सामान जुटाते
दूसरों के नाम सामने आ जाते
कल जो लिया था उसे आज पुराना पाते
बाजार से लाने की करते कवायद
कुछ फ़िर नया
लोग भी नए नाम सुझाते
चलता जाता है अनवरत यह क्रम
अपने चलने का होता हमें भ्रम
जमीन पर चलते तो कार की चाहत होती
कार में होते, चाहते हवा में उड़ने वाला विमान
समान टूटते और बिखरते जाते
हम उन्हें कबाड़ में भेजते जाते
हर बार नया पाने की चाहत में चले जाते
चलाता है जो मन
नहीं समझते इशारे
कभी-कभी उससे बात करते तो
यह पाते जान
वह चाहता है खामोशी से दुनिया को
एक दृष्टा बनकर देखना
जब जुटाते हम उसके चैन के लिए समान
हम अपने होने के प्रमाण इस
दुनिया में छोड़ना चाहते और
वह चाहता देखना
अपने अस्तित्व के निशान
पर कितना ले पाते उससे काम
फ़िर भी रुकते नहीं
चले जा रहे अंधेरे रास्ते पर
रौशनी की तलाश में
शायद मिल जाए खुशी का निशान
एक सामान जुटाते
दूसरों के नाम सामने आ जाते
कल जो लिया था उसे आज पुराना पाते
बाजार से लाने की करते कवायद
कुछ फ़िर नया
लोग भी नए नाम सुझाते
चलता जाता है अनवरत यह क्रम
अपने चलने का होता हमें भ्रम
जमीन पर चलते तो कार की चाहत होती
कार में होते, चाहते हवा में उड़ने वाला विमान
समान टूटते और बिखरते जाते
हम उन्हें कबाड़ में भेजते जाते
हर बार नया पाने की चाहत में चले जाते
चलाता है जो मन
नहीं समझते इशारे
कभी-कभी उससे बात करते तो
यह पाते जान
वह चाहता है खामोशी से दुनिया को
एक दृष्टा बनकर देखना
जब जुटाते हम उसके चैन के लिए समान
हम अपने होने के प्रमाण इस
दुनिया में छोड़ना चाहते और
वह चाहता देखना
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