वही बांट रहे हैं जमाने में अंधेरा
अपने विश्वास में टूट गये हैं
किससे करें शिकायत
अपनों ने ही गैर बनकर घेरा।
लेकर जमाने भर की रौशनी
वादा करते रहे हमेशा चिराग जलाने का
अब लगे हैं इस कोशिश में
चाहे जमाने में रौशनी न हो
पर कभी खुद के घर में न हो अंधेरा।
रुख बदल गये हैं तेल के दरिया
जो बांटते थे रौशनी इंसानों को
मुड़कर चले जा रहे उनके घरों में
जहां पहले ही है, रौशनी का डेरा।
आंखों में जब पड़ती है रौशनी
इंसान अंधा हो ही जाता है
मगर ‘और चाहिये रौशनी’ की चाहत
करने वालों को भला यह कहां समझ में आता है
फिर मजा तो सभी को मिलता है
जब अपने घर में हो रौशनी
दूसरे के घर में हो धुप्प अंधेरा।
गैरों से जंग लड़ते लड़ते थक गये
कैसे लड़े
जो किया अपनों ने ही अंधेरा।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप
दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप
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