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Wednesday, January 28, 2009

कहीं प्रचार के लिये पहले से तय झगड़े होंगे-हास्य व्यंग्य कविताएँ

पहले तो क्रिकेट मैचों पर
फिक्सिंग की छाया नजर आती थी
अब खबरों में भी होने लगा है उसका अहसास।
शराबखानों पर करते हैं लोग
सर्वशक्तिमान का नाम लेकर हमला
कहीं टूटे कांच तो कहीं गमला
बहस छिड़ जाती है इस बात पर कि
सर्वशक्तिमान के बंदे ऐसे क्यों होना चाहिये
लंबे चैड़े नारों का दौर शुरु
हर वाद के आते हैं भाषण देने गुरु
ढेर सारे जुमले बोले जाते हैं
टूटे कांच और गमलों के साथ
जताई जाती है सहानुभूति
पर ‘शराब पीना बुरी बात है’
इस पर नहीं होता कोई प्रस्ताव पास।
खबरफरोश भूल जाते हैं शराब को
सर्वशक्तिमान के नाम पर ही
होती है उनको सनसनी की आस।
किसे झूठा समझें, किस पर करें विश्वास।
..............................
शराब चीज बहुत खराब है
पीने वाला भी कर सकता है
न पीने भी कर सकता है
भले झगड़ा खराब है।
शराब खानों पर हुए झगड़ो पर
अब रोना बंद कर दो
क्योंकि सदियों से
करवाती आयी है जंग यह शराब
जैसे जैसे बढ़ते जायेंगे शराब खाने
वैसे ही नये नये रूपों में झगड़े
सामने आयेंगे
कहीं पीने वाले पिटेंगे तो
कहीं किसी को पिटवायेंगे
कहीं जाति तो कहीं भाषा के
नाम पर होंगे
कहीं प्रचार के लिये
पहले से ही तय झगड़े होंगे
इन पर उठाये सवालों का
कभी कोई होता नहीं जवाब है।

...............................................
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Saturday, January 24, 2009

करोड़पति बने या रहे खाकपति-हास्य कविताएँ

फिल्मों की कहानी में
गंदी बस्ती का लड़का
करोड़पति बन जाता है
पर हकीकत में भला कहां
कोई ऐसा पात्र नजर आता है
यह तो है बाजार के प्रचार का खेल
जो पहले करोड़पति बनने वाले
सवाल जवाब का कार्यक्रम बनाता है
उठते हैं उसकी सच्चाई पर सवाल
पर भला झूठ और ख्वाब के सौदागर
पर उसका असर कहां आता है
फिर बाजार रचता है
गंदी बस्ती का एक काल्पनिक पात्र
जो करोड़पति का इनाम जीत जाता है
प्रचार फिर उस काल्पनिक पात्र पर जाता है
सच कहते हैं एक झूठ सच बोलो
तो वह सच नजर आता है
.....................................
अमीरों में कभी भेद नहीं होता
पर गरीबों में बना दिये
जाति,भाषा और धर्म के कई भेद
करते हैं बाजार के सौदागर
समय पर अपना शासन चलाने के लिये
उसमें बहुत छेद
जिसका तूती बोलती है
उसी वर्ग के गरीब की तूती बजाते
भले ही उनके काम भी नहीं आते
पर दूसरे को तकलीफ पहुंचाते हुए
उनके मन में नहीं होता खेद
.......................
एक गरीब ने कहा दूसरे से
चलता है करोड़पति देखने
सुना है फिल्म में बहुत मजा आता है’
दूसरे ने कहा
‘पहले पता करूंगा कि
उसमें नायक के फिल्मी नाम की जाति कौनसी है
फिर चलूंगा
अगर तेरी जाति का नाम हुआ तो
मुझे गुस्सा आ जायेगा
करोड़पति बने या रहे खाकपति
मुझे तो अपनी जाति के नायक के फिल्मी नाम पर बनी
फिल्म देखने में ही मजा आता है

.................................................
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Wednesday, January 21, 2009

चमचे और दोस्त-व्यंग्य कविता

घूमते हुए एक शख्स के पीछे

दो ही प्रकार के लोग नहीं उकताते

एक होते अजीज दोस्त

दूसरे चमचे कहलाते

अजीज तो दिल की

धड़कनों में बसते हैं

उनसे दूरी बहुत सताती है

पर चमचे जब तक मिलता माल है

तभी तक अपने घर के चक्कर लगाते

कभी कभी कर तारीफों के ऐसे पुल भी

बांध जाते हैं

जिससे सुनकर अपने दोस्त भी शरमा जाते

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Thursday, January 15, 2009

महानतम दिखाने के लिये-व्यंग्य

फिल्म,खेल,कला और साहित्य का कोई देश नहीं होता-ऐसा जुमला हमारे देश के मूर्धन्य बुद्धिजीवी और लेखक मानते हैं पर अवसर पाते ही वह इनसे देशभक्ति के जज्बात जोड़ने से बाज नहीं आते। यह अवसर होता है जब कोई पश्चिम से किसी को पुरस्कार या सम्मान मिलता है या नहीं मिलता है। मिल जाये तो वाह वाह हो जाती है। देश का गौरव और सम्मान बढ़ने पर प्रसन्नता व्यक्त की जाती है और न मिले तो पश्चिमी देशों की उन संस्थाओं को कोसा जाता है जो इनको प्रदान करती है।
असल में बात यह हुई कि अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद ने अब तक दुनियां के महानतम बल्लेबाजों की सूची जारी की उसमें पहले दस में कोई भारतीय खिलाड़ी शामिल नहीं है। अपने प्रचार माध्यम उस सूची को पहले बीस तक ले गये क्योंकि बीसवें नंबर पर भारत के महानतम बल्लेबाज सुनील गावस्कर का नाम है-1983 में जीते गये इकलौते विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता में वह भारतीय टीम के वह भी सदस्य था इसलिये उनकी महानता पर कोई संदेह नहीं है। बीस के बाद उनकी नजर 26 वें नंबर पर गयी जहां उस बल्लेबाज का नाम था जिसे भारतीय प्रचार माध्यम दुनियां के क्रिकेट का भगवान घोषित कर चुके हैं। हाय! यह क्या गजब हो गया। भारतीय प्रचार माध्यमों की हवा खराब हो गयी। इस देश की जनता का भ्रम टूट न जाये इसलिये उसे बनाये रखने के लिये उन्होंने बहस शुरु कर दी है और उस सूची को नकार ही दिया।

यह होना ही था। ईमानदारी की बात यह है कि ज्ञानी लोग खेल वगैरह में देशप्रेम जैसी बात जोड़ने का समर्थन नहीं करते। दूसरी बात यह है कि जिस भगवान के किकेट अवतार को भारतीय प्रचार माध्यम जिस तरह अपने व्यवसायिक मजबूरियों के चलते अभी तक ढो रहे हैं उसके खेल पर अपने देश में ही लोग सवाल उठाते हैं। इसमें भी एक मजेदार बात यह है कि जिन बीस भारतीय बल्लेबाजों के नाम है उनमें एक ही भारतीय है बाकी विदेशी है। इसलिये भारतीय लोग उस सूची को नकारने से तो रहे। वजह यह है कि इस देश के लोग यह जानते हुए भी कि ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ दूर के ढोलों पर ही अधिक यकीन करते हैं और यह प्रवृति प्रचार माध्यमों ने बढ़ाई हैं कमी नहीं की।

पहले 19 खिलाड़ी विदेशी महान होंगे इस बात पर इस देश के लोग यकीन कर लेंगे क्योंंकि वह देख रहे हैं कि जिस तरह इस देश के कथित कलाकार, खिलाड़ी, लेखक, पत्रकार तथा अन्य विशेषज्ञ विदेशी पुरस्कारों और सम्मानों के लिये मरे जाते हैं उस हिसाब से वहां योग्यता और तकनीकी के ऊंचे मानदंड होंगे। तय बात है कि 19 खिलाड़ी महान ही होंगे तभी तो उनको घोषित किया गया है। भारतीय प्रचार माध्यम क्रिकेट का गुणगान तो खूब करते हैं पर यह सच छिपा जाते हैं कि 1983 के बाद विश्व क्रिकेट के नाम यहां कुछ नहीं आया। फिर उनके ,द्वारा सुझाये गये महानतम बल्लेबाज की महानता का हाल यह है कि आजकल कई लोग चाहते हैं कि वह क्रिकेट से हट जाये मगर नहीं जनाब!

वह हर बार विश्व कप क्रिकेट कप का सपना दिखाता है पर वह पूरा नहीं होता। दावा यह है कि 19 साल से क्रिकेट खेल रहा है पर भई उसने कितने विश्व क्रिकेट जिताये मालुम नहीं। यह सही है कि महानतम की सूची में उस महानतम बल्लेबाज से पहले भी कई ऐसे बल्लेबाज हैं जिन्होंने अपने देश को विश्व कप नहीं जितवाया पर इसका दूसरा पक्ष यह भी कि उनमें अधिकतर के समय में विश्व कप होता भी नहीं था पर उन्होंने किकेट के विकास में वाकई उस समय योगदान दिया जब उसमें पैसा नहीं था। वैसे प्रचार माध्यम एक नहीं अपने तीन बल्लेबाजों के महानतम न होने पर नाराज है पर 26वें नंबर पर अपने अवतारी बल्लेबाज के होने पर अधिक बवाल मचा रहे हैं जिसका क्रिकेट के विकास में नहीं बल्कि उसके दोहन में अधिक योगदान रहा है।
यार, यहां भी इतने पुरस्कार मिलते हैं पर अपने देश के गुणी लोगों को पता नहीं वह हमेशा छोटे नजर आते हैं। हमारे यहां हर साल ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया जाता है पर प्रचार माध्यम उसका समाचार देकर फिर मूंह फेर लेते हैं पर अगर अमेरिका की कोई संस्था- जिसका नाम तक हम लोग नहीं जानते-अगर किसी को मिल जाये तो बस वह यहां भगवान बना दिया जाता है।

इसका परिणाम यह हुआ है कि जिन संस्थाओं को अपना नाम इस देश में नाम करना होता है वह यहां के किसी ऐसे अज्ञात आदमी को पुरस्कार देती है जिसने अपने जीवन में एकाध कोई किताब लिखी हो। हमारे यहां जिन लोगों को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलता है उन्होंनें कई किताबें लिखी होती हैं पर उनको प्रचार माध्यम पहचानते तक नहीं पर कोई एक पुस्तक लिखकर विदेश से पुरस्कार प्राप्त कर ले तो उसे बरसों तक ढोते हैं। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि जोकरों को पुरस्कार मिला हो। विदेशों से पुरस्कार विजेता तो ऐसे व्यवहार करते हैं जैसे कि वह हर विषय में जानते हों। कई बार तो वह अपने देश के संवदेनशीन मामलों में ऐसे बोलते हैं जैसे कि देश के विरोधी बोल रहे हों। तब यह भी संदेह होता है कि कहीं ऐसे लोगों को बकवास करने के लिये ही तो कहीं इस आश्वासन पर तो विदेशों में सम्मान या पुरस्कार नहीं दिये जाते कि अपने देश के लोगों को भावनात्मक रूप से आहत करते रहना।

हिंदी फिल्मों का हाल देखिये। विदेशी पुरस्कारों के लिये सभी दौड़ते फिरते हैं। हालत यह है कि अगर कहीं फिल्म पुरस्कार के नामांकित हो जाये तो उसका जीभर के प्रचार कर लिया जाता है जैसे कि वह मिल ही गया हो-हालांकि यह उनको पता होता है कि वह नहीं मिलेगा शायद इसलिये प्रचार की सारी कसर नामांकन से इनाम बंटने की बची की अवधि में ही कर लेते हैं। इन हिंदी फिल्म वालों से पूछिये कि जब हिंदी फिल्मों या टीवी सीरियलों के लिये इनाम वितरण होता है तब क्या देश की गैर हिंदी फिल्मों को कभी वह इनाम देते हैं जैसा कि वह अमेरिका में अंग्रेजी फिल्मकारों के बीच सम्मान चाहते हैं। सच तो यह है कि हमारे देश के दक्षिण भाषी फिल्मकारों की बनी अनेक फिल्मों का हिंदी में पुर्नफिल्मांकन प्रस्तुत किया जाता है जो बहुत सफल रहती हैं। दक्षिण का फिल्म उद्योग हिंदी से तकनीकी,कला,कहानी,संगीत और पटकथा में अधिक सक्षम माना जाता है। फिर भी कभी आपने सुना है कि किसी दक्षिण भारतीय फिल्म को हिंदी फिल्म समारोह में कभी देश सर्वश्रेष्ठ फिल्म घोषित किया गया हो। अपनों को सम्मान देने की बजाय दूसरों से इनाम पाने की चाहत ने गुणीजनों को पतन की गर्त में पहुंचा दिया है। सच तो यह है कि दक्ष हिंदी के लेखकों से तारतम्य के अभाव में हिंदी फिल्म उद्योग पैसा होते हुए भी लाचारगी की की स्थिति में हैं और उसकी अधिकांश फिल्में हालीवुड या दक्षिण भारतीय फिल्मों की नकल होती है। अपने ही हिंदी भाषी लेखकों,कलाकारों,गायकों, और संगीतकारों को कभी प्रोत्साहित न करने वाले हिंदी फिल्म उद्योग को विदेशों में सम्मान की आशा करना ही हास्यास्पद लगता है।

जी हां, सच यही है कि महानतम उस आदमी को कहा जाता है जो न केवल अपने जीवन में सफलता प्राप्त करे बल्कि दूसरों को भी ऐसी सफलता पाने में योगदान दे। भारत में एक ही महानतम क्रिकेट खिलाड़ी हुआ है वह कपिल देव क्योंकि उसके नाम पर एक विश्व कप हैं। हमारे महानतम हाकी खिलाड़ी स्व. ध्यानचंद के बाद वही एक लगते हैं महान जैसे। स्व. ध्यानचंद जी इसलिये महान नहीं थे कि हिटलर उनसे प्रभावित हुआ था बल्कि उन्होंने भारत को ओलंपिक में स्वर्ण पदक जितवाया था इसलिये महान कहे गये। इतना ही नहीं वह अपने खेल से अपनी टीम को प्रेरणा देते थे। सो प्रचार माध्यम यह समझ लें कि वह जिन खिलाडि़यों के महानतम न होने पर विलाप कर रहे हैं उस पर देश के लोगों की हमदर्दी उनके साथ नहीं है बल्कि उनके कार्यक्रम एक लाफ्टर शो की तरह दिख रहे हैं। वह अपने बताये माडलों को विश्व का महानतम बताने के लिये जूझ रहे हैं और यह पश्चिम वाले हैं गाहे बगाहे उन पर आघात कर जाते हैं।
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Saturday, January 10, 2009

पीठ पीछे सभी खंजर संजाये हैं-व्यंग्य कविता

चेहरे हैं उनके सजे हुए
अपने घर पर उन्होंने
पत्थर और प्लास्टिक के फूल सजाये हैं
अपनी जुबान से बात करते हैं
वह ईमान और वफा की
पर अपने करते नहीं वह धंधे जो
उन्होंने सभी को बताये हैं
नाम तो हैं बड़े आकर्षक पर
काम का कोई भरोसा नहीं है
कौन बिक जाये यहां
पता नहीं लगता
आजाद तो सभी दिखते हैं
चाल और चरित्र में ‘सत्य’ लिखते हैं
पर सवाल उठता है
फिर इतने सारे इंसान
गुलामों के बाजार में
बिकने कहां से आये हैं
फूल तो है सभी के एक हाथ में
पर दूसरे हाथ में पीठ पीछे
सभी खंजर सजाये हैं

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Tuesday, January 6, 2009

हंसी की फुहार-हास्य कविता

फंदेबाज लेकर अपने भतीजे को
पहुंचा और बोला
‘‘दीपक बापू, मेरा यह भतीजा
खूब लिखता है श्रृंगार रस से सराबोर कवितायें
पर नहीं सुनते पुरुष और महिलायें
आप तो इसे अब
हंसी का कार्यक्रम बतायें
ताकि हम लोग भी कुछ जमाने में इज्जत बनायें’’

उसके भतीजे को ऊपर से नीचे देखा
फिर गला खंखार कर
अपनी टोपी घुमाते बोले दीपक बापू
’’कमबख्त जब भी घर आते हो
साथ में होती बेहूदी समस्यायें
जिनके बारे में हम नहीं जानते
तुम्हें क्या बतायें
रसहीन शब्द पहले सजाओ
लोगों को सुनाते हुए कभी हाथ
तो कभी अपनी कमर मटकाओ
कर सको अभिनय तो मूंह भी बनाओ
चुटकुला हो या कविता सब चलेगा
जीवन के आचरण और चरित्र पर
कहने से अच्छा होगा
अपनी देह के विसर्जन करने वाले अंगों का
इशारे में प्रदर्शन करना
तभी हंसी का माहौन बनेगा
कामेडी बनकर चमकेगा
अपने साथ स्त्री रूप के मेकअप में
कोई पुरुष भी साथ ले जाना
उसकी सुंदरता के पर
अश्लील टिप्पणी शालीनता से करना
जिससे दर्शक बहक जायें
वाह वाह करने के अलावा
कुछ न बोल पायें
किसी के समझ में आये या नहीं
तुम तो अपनी बात कहते जाना
यौवन से अधिक यौन का विषय रखना
चुंबन का स्वाद न मीठा होता है न नमकीन
पर लोगों को फिर भी पंसद है देखना
हंसी की फुहार में भीगने का मन तो
हमारा भी होता है
दिल को नहला सकें हंसी से
पर सूखे शब्द और निरर्थक अदाओं से
कभी दिल खुश नहीं होता
फ़िर भी खुश दिखता है पता नहीं कैसे जमाना
इससे अधिक तुम्हें हम और क्या बताये"

..................................................
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Sunday, January 4, 2009

‘एक स्कूटर ब्लागर के ऊपर'-हास्य व्यंग्य

ब्लागर सड़क पर अपने स्कूटर से जा रहा था। सड़क ऊबड़ खाबड़ थी और ब्लागर और स्कूटर दोनों ही हांफते हुए बढ़ रहे थे कि अचानक एक गड्ढा आया और स्कूटर ने झटका खाया और अब वह आधा जमीन पर आधा अपने सवार ब्लागर के ऊपर था।

वह सड़क मुख्य सड़क से दूर थी इसलिये वहां अधिक भीड़ भाड़ नहीं थी। जमीन पर गिरे ब्लागर ने अपने ऊपर से स्कूटर उठाने का प्रयास करने से पहले अपने अंगों का अध्ययन किया तो पाया कि कहीं कोई चोट नहीं थी। अब वह जल्दी जल्दी अपने ऊपर से स्कूटर उठाने का प्रयास करने लगा कि कहीं कोई आदमी उसे गिरा हुआ देख न ले। अपने गिरने के दर्द से अधिक आदमी को इस बात की चिंता सताती है कि कोई उसे संकट में पड़ा देखकर हंसे नहीं।

ब्लागर ने अपने ऊपर से स्कूटर का कुछ भाग हटाया ही था कि उसके कानों में आवाज गूजी-‘क्या यहां रास्तें बैठकर स्कूटर पर कोई कविता या चिंतन लिख रहे हो?’
ब्लागर ने पलटकर देखा तो उसके होश हवास उड़ गये। एक तरह से उसके लिये यह दूसरी दुर्घटना थी। दूसरा ब्लागर खड़ा था। गिरे हुए पहले ब्लागर ने कहा-‘यार, यह गड्ढा सामने आ गया था तो मेरे स्कूटर का संतुलन बिगड़ गया।

दूसरे ब्लागर ने हाथ नचाते हुए कहा-‘स्कूटर का संतुलन बिगड़ा कि तुम्हारा? स्कूटर के पास दिमाग नहीं होता जो उसका संतुलन बिगड़े। तुम्हारे दिमाग का संतुलन बिगड़ा तो ही तुम यहां गिरे। अपना दोष स्कूटर पर मत डालो

पहले ब्लागर ने कहा-‘यार, तुम्हें शर्म नहीं आती। इस हालत में स्कूटर मेरे ऊपर से हटाने की बजाय अपनी कमेंट लगाये जा रहे हो।’

दूसरे ब्लागर ने कहा-‘वैसे तो मेरा काम कमेंट लगाना है तुम्हारे ऊपर से स्कूटर हटाने का नहीं। अब हटा ही देता हूं पर इस बारे में तुम अपने ब्लाग पर लिखना जरूर कि मैंने तुम्हारी मदद की! हां पर कमेंट का आग्रह नहीं करना।’
इस बात पर पहले ब्लागर को गुस्सा आ गया और उसने उसकी सहायता के बिना ही स्कूटर अपने ऊपर से हटा लिया और खड़ा हो गया और बोला-‘तुम्हें तो मजाक ही सूझता है।’
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘देखो मुझे कभी मजाक करना तो आता ही नहीं वरना मैं तुम्हारी तरह फूहड़ हास्य कवितायें लिखता। बहुत गंभीरता से कह रहा हूं कि तुम स्कूटर चलाना पहले सीख लो।’
पहले ब्लागर ने कहा-‘तुम मुझे स्कूटर सीखने के लिये कह रहे हो। दस वर्ष से यह स्कूटर चला रहा हूं। यह गड्ढा ऐसी जगह हो गया है कि इससे दूर निकलना कठिन था। इसलिये गिर गया, समझे।
दूसरा ब्लागर ने कहा-‘पर यह गड़ढा तो कई दिनों से है और तुम और हम कितनी बार यहां से निकल जाते हैं। वैसे तुम्हारा स्कूटर पुराना है इसलिये गिर गया उसे भी सड़क पर चलते हुए शर्म आती होगी। इतनी नयी और प्यारी गाडि़यां सड़क पर चलती हैं तो इस बूढ़े स्कूटर को शर्म आती ही होगी। कोई नया स्कूटर खरीद लो! क्यों पैसे की बचत कर अपने को कष्ट पहुंचा रहे हो।’
पहले ब्लागर ने कहा-‘नया स्कूटर क्या गड्ढे में नहीं गिरेग?’
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘तो कोई कार खरीद लो। अरे ,भई अपने आपको दुर्घटना से बचाओ। कहीं अधिक चोट लग गयी तो परेशान हो जाओगे। अच्छा अब मैं चलता हूं। ध्यान से जाना आगे और भी गड्ढे हैं। अभी तो तुम्हारी किस्मत अच्छी थी जो मैं आ गया। और हां इस दुर्घटना पर अगर लिखो तो यह जरूर लिखना कि मैंने आकर तुम्हें बचाया।’
पहले ब्लागर ने गुस्से में पूछा-‘तुमने आकर मुझे बचाया। क्या बकवाद करते हो?’
दूसरे ब्लागर ने कहा-’अगर मैं आकर तुम्हें गुस्सा नहीं दिलवाता तो शायद तुम पूरी ताकत से स्कूटर को नहीं हटा पाते।‘
दूसरा ब्लागर चला गया। पहले ब्लागर ने स्कूटर पर किक लगायी पर वह शुरू नहीं हुआ। तब वह उसे घसीटता हुआ मरम्मत की दुकान तक लाया। वहां उसका परिचित एक डाक्टर भी अपनी मोटर साइकिल की मरम्मत करवा रहा था। ब्लागर को देखते हुए बोला-‘क्या बात है? ऐसे स्कूटर खींचे चले आ रहे हो?’
ब्लागर ने कहा-‘खराब हो गया है।’
डाक्टर ने कहा-’स्कूटर पुराना हो गया। कोई नया खरीद लो।’
ब्लागर ने कहा-‘नया स्कूटर क्या खराब नहीं होगा? तुम्हारी यह दो साल पुरानी मोटर साइकिल भी तो आज खराब हुई। वैसे मैं इसे तुम्हें दूसरी या तीसरी बार बनवाते हुए देख रहा हूं।’
डाक्टर से बातचीत हो ही रही थी कि दूसरा ब्लागर किसी दूसरे के साथ उसके स्कूटर पर बैठ कर वहां से निकल रहा था। उसने जब पहले ब्लागर को वहां देखा तो उसने अपने साथी को वही रुकने के लिये कहा और उसे दूर खड़ाकर वहां आया जहां डाक्टर और पहला ब्लागर खड़े थे। डाक्टर भी उसे जानता था। उसने डाक्टर को देखकर कहा-’सर, आप अपनी गाड़ी बनवा रहे हैं उसमें समय लगेगा। यह मेरा मित्र है स्कूटर समेत एक गड्ढे में गिर गया था। यह घसीटता हुआ स्कूटर यहां तक लाया है। आप जरा इसके अंगों का निरीक्षण करें और देखें कि कहीं कोई गंभीर चोट तो नहीं आयी। यह सड़क पर गिरा हुआ था। स्कूटर इसके ऊपर था। मैंने उसे हटाया और फिर इसे उठाया। वहां से चला गया पर मेरा मन नहीं माना। अपने इस पड़ौसी से अनुरोध कर उसे स्कूटर पर ले आया कि देखूं कहीं कोई बड़ी अंदरूनी चोट तो नहीं है। आप थोड़ा इस दुकान के अंदर जाकर देख लेंे तो मुझे तसल्ली हो जाये।’
डाक्टर हंस पड़ा और बोला-‘तुम अपनी हरकत से बाज नहीं आओगे। यह तुम्हारा नहीं मेरा भी दोस्त है। यहां तुम इसका हालचाल पूछने नहीं आये बल्कि मुझे बताने आये हो कि यह कहीं गिर गये हो। अब तुम जाओ। तुम्हें अब इसकी दुर्घटना की बात हजम हो जायेगी। मुझे पता है कि तुम्हारा हाजमा बहुत खराब है जब तक कोई आंखों देखी घटना या दुर्घटना पांच दस लोग को बताते नहीं हो तब तक पेट में दर्द होता है।’

इतने में दूसरे ब्लागर का स्कूटर वाला साथी वहां आया और उससे बोला-‘भाई साहब, जल्दी चलो। बातें तो होती रहेंगी। मुझे अस्पताल अपनी मां के पास नाश्ता जल्दी लेकर पहुंचारा है। अगर मेरी मां को देखने चलना है तो जल्दी चलो। नहीं तो पीछे से आते रहना।’

दूसरे ब्लागर ने कहा-‘चलो चलते हैं।’फिर वह पहले ब्लागर को दूर लेजाकर बोला-‘डाक्टर साहब को दिखा देना कि कहीं अंदरूनी चोट तो नहीं है। हां, इस घटना पर रिपोर्ट जरूर लिखना ‘एक स्कूटर ब्लागर के ऊपर’।
वह चला गया तो ब्लागर अपने स्कूटर के पास लौटा तो डाक्टर ने उससे पूछा-‘यह तुम्हारा दोस्त कब से बन गया? मैं तो तुम्हें बचपन से जानता हूं इससे कैसे परिचय हुआ?’
ब्लागर ने कहा-‘बस ऐसे ही। मुझे भी याद नहीं कब इससे मुलाकात हुई। आप तो जानते हैं कि मैं एक लेखक हूं लोगों से मिलना होता है। सभी के साथ मिलने का सिलसिला चलता है। यह याद कहां रहता है कि किससे कब मुलाकात हुई?‘
डाक्टर ने कहां-‘ यह तुम्हें जाते जाते क्या कहा रहा था? एक स्कूटर! किसके ऊपर कह रहा था? यह मैं सुन नहीं पाया!’
इसी बीच में मैकनिक ने आकर डाक्टर से कहा-’लीजिये साहब, आपकी मोटर साइकिल बन गयी।’
पहले ब्लागर से विदा ले डाक्टर चला गया। दूसरे मैकनिक ने स्कूटर भी बना दिया था। पहले मैकनिक ने ब्लागर से पूछा‘-स्कूटर किसके ऊपर था? डाक्टर साहब क्या पूछ रहे थे? वह आपके दूसरे साथी क्या कह गये थे?’
ब्लागर आसमान में देखते धीरे धीरे बुदबुदाया-‘एक स्कूटर, ब्लागर के ऊपर!
मैकनिक ने कहा-‘यह ब्लागर कौन?’
पहले ब्लागर ने कहा-‘जो ब्लाग पर लिखता है?’
मैकनिक ने पूछा-‘यह ब्लाग क्या होता है?’
पहले ब्लागर ने कंधा उचकाते हुए कहा-‘मुझे नहीं मालुम?’
इधर दूसरा मैकनिक स्कूटर बनाकर पहले ब्लागर के पास लाया और पहले मैकनिक से बोला-‘तुम्हें नहीं मालुम ब्लाग क्या होता है? अरे, बड़े बड़े हीरो ब्लाग लिख रहे हैं। तू मुझसे कहता है न कि अखबार क्यों पढ़ता है? मैंने अखबार में पढ़ा है अरे, अखबार पढ़ने से नालेज मिलता है। देख तुझे और साहब दोनों का पता नहीं कि ब्लाग क्या होता है? वह जो डाक्टर साहब के पास जो दूसरे सज्जन आये थे और साहब की चैकिंग करने को कह रहे थे वह भी बहुत बड़े ब्लागर हैं। कितनी बार कहता हूं कि तुम भी अखबार पढ़ा करो।’

पहले ब्लागर ने मैकनिक को पैसे दिये और स्कूटर शुरू किया तो पहने मैकनिक ने पूछा-‘यह स्कूटर क्या उन सज्जन के ऊपर था।’
पहले ब्लागर ने कहा-‘नहींं।
वह वहां से चला गया तो पहले मैकनिक ने दूसरे से पूछा-‘अगर यह दूसरे सज्जन ब्लागर थे और स्कूटर उनके ऊपर नहीं था तो फिर यह स्कूटर किसके ऊपर था? घसीटते हुए तो यह सज्जन ले लाये थे तो वह ब्लागर कौन था।’
दूसरे मैकनिक-‘इसका ब्लाग से क्या संबंध?’
दूसरे ने अपना सिर पकड़ लिया और कहा-‘चलो यार, अब अपना काम करें।
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Wednesday, December 31, 2008

नहीं जानते कौन देवता कहां से आया-हास्य कविता

नववर्ष की पूर्व संध्या पर
फंदेबाज अग्रिम बधाई देने
घर आया और बोला
‘‘दीपक बापू, इधर कई बरसों से
सांताक्लाज का नाम बहुत सुनने में आया
हालत यह हो गयी सभी
हिंदी के सारे टीवी चैनल और
पत्र-पत्रिकाओं में यह नाम छाया
सुना है बच्चों को तोहफे देता है
हम बच्चे थे तो कभी वह नहीं आया
यह कहां का देवता है
जिसकी कृपा दृष्टि में यह देश अभी आया’

सुनकर पहले चौंके फिर
अपनी टोपी घुमाकर
कंप्यूटर पर उंगलियां नचाते हुए
बोले दीपक बापू
‘हम भी ज्यादा नहीं जानते
पहले अपने देवताओं के बारे में
पूरा जान लें, जिनको खुद मानते
मगर यह बाजार के विज्ञापन का खेल है
जो कहीं से लेता डालर
कहीं से खरीदता तेल है
इस देश के सौदागर जिससे माल कमाते हैं
उसके आगे सिर नवाते हैं
साथ में वहां के देवता की भी
जय जयकार गाते हैं
अपने देश के पुराने देवताओं की
कथायें सुना सुनाकर
ढोंगी संत अपना माल बनाते हैं
बाजार भी मौका नहीं चूकता पर
सभी दिन तो देश के देवताओं के
नाम पर नहीं लिखे जाते हैं
पर सौदागरों को चाहिऐ रोज नया देवता
इसलिये विदेश से उनका नाम ले आते हैं
अपने देश का उपभोक्ता और
विदेशी सेठ दोनों को करते खुश
एक तीर से दो शिकार कर जाते है
वैसे देवता भला कहां आते जाते
हृदय से याद करो देवता को
तो उनकी कृपा के फूल ऐसे ही बरस जाते
हम तो हैं संवेदनशील
जीते हैं अपने विश्वास के साथ
नहीं जानना कि कौन देवता कहां से आया
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दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
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Sunday, December 28, 2008

प्रतियोगिता से कहीं अधिक वजन जंग में आता है-लघू व्यंग्य

अपने वाद्ययंत्रों के साथ सजधजकर वह घर से बाहर निकला और अपनी मां से बोला-‘‘मां, आशीर्वाद दो जंग पर जा रहा हूं।’
मां घबड़ा गयी और बोली-‘बेटा, मैंने तुम्हें तो बड़ा आदमी बनने का सपना देखा था । भला तुम फौज में कब भर्ती हो गये? मुझे बताया ही नहीं। हाय! यह तूने क्या किया? बेटा जंग में अपना ख्याल रखना!’
बेटे ने कहा-‘तुम क्या बात करती हो? मैं तो सुरों की जंग में जा रहा हूं। अंग्रेजी में उसे कांपटीनशन कहते हैं।’
मां खुश हो गयी और बोली-‘विजयी भव! पर भला सुरों की जंग होती है या प्रतियोगिता?’
बेटे ने कहा-‘मां अपने प्रोग्राम को प्रचार में वजन देने के लिये वह प्रतियोगिता को जंग ही कहते हैं और फिर आपस में लड़ाई झगड़ा भी वहां करना पड़ता है। वहां जाना अब खेल नहीं जंग जैसा हो गया है।’
वह घर से निकला और फिर अपनी माशुका से मिलने गया और उससे बोला-‘मैं जंग पर जा रहा हूं। मेरे लौटने तक मेरा इंतजार करना। किसी और के चक्कर में मत पड़ना! यहां मेरे कई दुश्मन इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि कब मैं इस शहर से निकलूं तो मेरे प्रेम पर डाका डालें।’

माशुका घबड़ा गयी और बोली-‘देखो शहीद मत हो जाना। बचते बचाते लड़ना। मेरे को तुम्हारी चिंता लगी रहेगी। अगर तुम शहीद हो गये तो तुम्हारे दुश्मन अपने प्रेम पत्र लेकर हाल ही चले आयेंगे। उनका मुकाबला मुझसे नहीं होगा और मुझे भी यह शहर छोड़कर अपने शहर वापस जाना पड़ेगा। वैसे तुम फौज में भर्ती हो गये यह बात मेरे माता पिता को शायद पसंद नहीं आयेगी। जब उनको पता लगेगा तो मुझे यहां से वापस ले जायेंगे। इसलिये कह नहीं सकती कि तुम्हारे आने पर मैं मिलूंगी नहीं।’
उसने कहा-‘मैं सीमा पर होने वाली जंग में नहीं बल्कि सुरों की जंग मे जा रहा हूं। अगर जीतता रहा तो कुछ दिन लग जायेंगे।’

माशुका खुश हो गयी और बोली-अरे यह कहो न कि सिंगिंग कांपटीशन में जा रहा हूं। अरे, तुुम प्रोगाम का नाम बताना तो अपने परिवार वालों को बताऊंगी तो वह भी देखेंगे। हां, पर किसी प्रसिद्ध चैनल पर आना चाहिये। हल्के फुल्के चैनल पर होगा तो फिर बेकार है। हां, पर देखो यह जंग का नाम मत लिया करो। मुझे डर लगता है।’
उसने कहा-‘अरे, आजकल तो गीत संगीत प्रतियोगिता को जंग कहा जाने लगा है। लोग समझते हैं यही जंग है। अगर किसी से कहूं कि प्रतियोगिता में जा रहा हूंे तो बात में वजन नहीं आता इसलिये ‘जंग’ शब्द लगाता हूं। प्रतियोगिता तो ऐसा लगता है जैसे कि कोई पांच वर्ष का बच्चा चित्रकला प्रतियागिता में जा रहा हो। ‘जंग’ से प्रचार में वजन आता है।’
माशुका ने कहा-‘हां, यह बात ठीक लगती है। तुम यह कांपटीशन से जीतकर लौटोगे तो मैं तुम्हारा स्वागत ऐसा ही करूंगी कि जैसे कि जंग से लौटे बहादूरों का होता है। विजयी भव!
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Saturday, December 20, 2008

स्वर्ग में जगह दिलाने के लिए-हास्य कविता

एजेंट ने कहा उस बुजुर्ग आदमी से कि
"अपने जीवन का बीमा कराईये
और अपने मरने की बाद की चिंताओं से
हमेशा मुक्ति पाईये"
आदमी ने खुश होकर कहा
"बाकी चिंताओं से मुक्त हो गया हूँ
अपने सारे बोझ ढो गया हूँ
बस फिक्र मरने के बाद की है
देख रहा हूँ कई बच्चे
अच्छी तरह अपने बाप का
अन्तिम संस्कार नहीं करते
श्राद्ध करने के मामले पर आपस में लड़ते
बाप को स्वर्ग में जगह दिलाने के लिए
कुछ नहीं करते
आपकी इस बारे में क्या योजना है
पहले विस्तार से बताईये"

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Wednesday, December 17, 2008

बाजार में बिक सके वही मोहब्बत करना-व्यंग्य कविता

खूब करो क्योंकि हर जगह
लग रहे हैं मोहब्बत के नारे
बाजार में बिक सकें
उसमें करना ऐसे ही इशारे
उसमें ईमान,बोली,जाति और भाषा के भी
रंग भरे हों सारे
जमाने के जज्बात बनने और बिगड़ने के
अहसास भी उसमें दिखते हांे
ऐसा नाटक भी रचानां
किसी एकता की कहानी लिखते हों
भले ही झूठ पर
देश दुनियां की तरक्की भी दिखाना
परवाह नहीं करना किसी बंधन की
चाहे भले ही किसी के
टूटकर बिखर जायें सपने
रूठ जायें अपने
भले ही किसी के अरमानों को कुचल जाना
चंद पल की हो मोहब्बत कोई बात नहीं
देखने चले आयेंगे लोग सारे
हो सकती है
केवल जिस सर्वशक्तिमान से मोहब्बत
बैठे है सभी उसे बिसारे

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Thursday, December 11, 2008

बन जाए कोई आदमी एक चुटकुला-व्यंग्य कविता

अपने दर्द का बयाँ किससे करें
जबरन सब हँसते को तैयार हैं
ढूंढ रहे हैं सभी अपनी असलियत से
बचने के लिए रास्ते
खोज में हैं सभी कि मिल जाए
अपना दर्द सुनाकर
बन जाए कोई आदमी एक चुटकुला
दिल बहलाने के वास्ते
करते हैं लोग
ज़माने में उसका किस्सा सुनाकर
अपने को खुश दिखाने की कोशिश
इसलिए बेहतर है
खामोशी से देखते जाएँ
अपना दर्द सहते जाएँ
कोई नहीं किसी का हमदर्द
सभी यहाँ मतलब के यार हैं

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Wednesday, December 10, 2008

मोहब्बत है विज्ञापन के लिए-व्यंग्य कविता

जगह-जगह नारे लगेंगे
आज प्यार के नारे
बाहर ढूंढेंगे प्यार घर के दुलारे
प्यार का दिवस वही मनाते
जो प्यार का अर्थ संक्षिप्त ही समझ पाते
एक कोई साथी मिल जाये जो
बस हमारा दिल बहलाए
इसी तलाश में वह चले जाते

बदहवास से दौड़ रहे हैं
पार्क, होटल और सड़क पर
चीख रहे हैं
बधाई हो प्रेम दिवस की
पर लगता नहीं शब्दों का
दिल की जुबान से कोई हो वास्ता
बसता है जो खून में प्यार
भला क्या वह सड़क पर नाचता
अगर करे भी कोई प्यार तो
भला होश खो चुके लोग
क्या उसे समझ पाते
प्यार चाहिऐ और दिलदार चाहिए के
नारे लगा रहे
पर अक्ल हो गयी है भीड़ की साथी
कैसे होगी दोस्त और दुश्मन की पहचान
जब बंद है दिमाग से दिल की तरफ
जाने का रास्ता
अँधेरे में वासना का नृत्य करने के लिए
प्यार का ढोंग रचाते
यह प्यार है बाजार का खेल
शाश्वत प्रेम का मतलब
क्या वाह जानेंगे जो
विज्ञापनों के खेल में बहक जाते

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Monday, December 8, 2008

हर नशा बना देता है बेहया-व्यंग्य शायरी

सुबह का भूला शाम को
घर वापस आ जाता है
पर रात को जो भटका
वह सुबह तक वापस
नहीं आये तो घर में
तूफ़ान मच जाता है
घर में भूख का डेरा
शराब से नशे में चूर
आदमी की आंखों में
मदहोशी का अँधेरा
किसी गटर में गिरकर
या किसी वाहन से कुचलकर
जीवन की जो दे जाता है आहुति
उस पर भला कौन तरस खाता है
शराब मत पियो यारो शराब
उसका नशा तुम्हारी जिन्दगी को
खुद ही पी जाता है
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शराब का नशा आख़िर
दिमाग से उतर जाता है
पर दौलत, शौहरत और सोहबत का नशा
सिर चढ़कर बोले
आदमी को बेहया बना देता है
ज्ञान के अंधे से बुरा है
किसी का अज्ञान में मदांध होना
जो आदमी को शैतान बना देता है
जो निर्धन हैं और
पूंजी जोडे हैं विनम्रता की
उनसे दोस्ती भली
अपनी अमीरी, पहुंच और सोहबत के
नशे में चूर अहंकारी से दूरी भली
पीठ में छुरा घौपने में
उनमें तनिक भय नहीं आता है

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Friday, December 5, 2008

पेट भरा होते भी इंसान रोटी की जुगाड़ में जुट जाता-व्यंग्य शायरी

हमें पूछा था अपने दिल को
बहलाने के लिए किसी जगह का पता
उन्होने बाजार का रास्ता बता दिया
जहां बिकती है दिल की खुशी
दौलत के सिक्कों से
जहाँ पहुंचे तो सौदागरों ने
मोलभाव में उलझा दिया
अगर बाजार में मिलती दिल की खुशी
और दिमाग का चैन
तो इस दुनिया में रहता
हर आदमी क्यों इतना बैचैन
हम घर पहुंचे और सांस ली
आँखें बंद की और सिर तकिये पर रखा
आखिर उस नींद ने ही जिसे हम
ढूढ़ते हुए थक गये थे
उसका पता दिया

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सांप के पास जहर है
पर डसने किसी को खुद नहीं जाता
कुता काट सकता है
पर अकारण नहीं काटने आता
निरीह गाय नुकीले सींग होते
हुए भी खामोश सहती हैं अनाचार
किसी को अनजाने में लग जाये अलग बात
पर उसके मन में किसी को मरने का
विचार में नहीं आता
भूखा न हो तो शेर भी
कभी शिकार पर नहीं जाता
हर इंसान एक दूसरे को
सिखाता हैं इंसानियत का पाठ
भूल जाता हां जब खुद का वक्त आता
एक पल की रोटी अभी पेट में होती है
दूसरी की जुगाड़ में लग जाता
पीछे से वार करते हुए इंसान
जहरीले शिकारी के भेष में होता है जब
किसी और जीव का नाम
उसके साथ शोभा नहीं पाता
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Friday, November 28, 2008

दूसरा सच-हिंदी शायरी


कहीं लगी आग है
कहीं बरसती बहार
कहीं है खुशी खेलती
कहीं गम करते प्रहार
शोक मनाओ
मूंह फेर जाओ
जीवन के पल तो गुजरते जाना है
जो दिल को तकलीफ दें
मत उठाओ उन यादों का भार

धरती बहुत बड़ी है
जबकि जिंदगी छोटी
कभी हादसे होते सामने
कभी लग जाती है हाथ मिल्कियत मोटी
धरती के कुछ टुकडों पर बरसती आग
तो बर्फ बिखेरती शीतलता का राग
जो छोड़ जाते दुनिया
उनका शोक क्यों करते
जो जिंदा है उनकी कद्र करो
कभी कभी आसमान से बरसा कहर
शब्दों को सहमा देता है
पर फिर भी समझना नहीं उनकी हार

दिखलाते है बहुत लोग तस्वीरें बनाकर
सभी को सच समझना नहीं
उनके पीछे छिपा होता है
दूसरा सच कहीं
कदम कदम पर बिखरा है प्रायोजित झूठ
तस्वीरें के पीछे देखे बिना
अपनी राय कायम करना नहीं
बिकते हैं बाजार में जज्बात
इसलिये जोड़ी जाती है उनसे हर बात
गुलाम बनाने के लिये
आदमी को पकड़ने की बजाय
उसके दिमाग पर किया जाता है घात
रची जाती है हर पल यहां
दर्द की नयी दास्तान
गिराया जाता है कोई न कोई छोटा आदमी
किसी को बनाने के लिये महान
कई हकीकतें हमेशा कहानियां नहीं बनतीं
पर कहानियां कई बार हकीकत हो जाती
जज्बात के सौदागरों का क्या
कभी दर्द तो कभी खुशी
उनके लिये बेचने की शय बन जाती
आखों से देखा
कानों से सुना
हाथों से छुआ भी झूठ हो सकता है
अगर अपनी सोच में नहीं गहराई तो
वाद और नारों का जाल में
किसी का दिमाग भी उलझ सकता है
जितना बड़ा है विज्ञान
उतना ही भ्रमित हुआ ज्ञान
इस जहां में हो गये हैं धोखे अपार

अपनी आंखों से सुनना
कानों से भी खूब सुनना
छूकर हाथ से देख लेना
पर अपने जज्बातों पर रखना काबू
नहीं आये किसी के बहकावे में
तो कुछ लोग अभिमानी कहेंगे कहेंगे
सवाल पूछोगे तो
शोर मचाने वाली कहानी कहेंगे
पल भर में टूटते और बनते लोगों के ख्याल
किसी की सोच को आगे नहीं बढ़ाते
तस्वीरों की सच्चाई में वह खुद ही बहक जाते
दुनियां इतनी बड़ी है पर
थोड़ी दुर्गंध में घबड़ाते
और मामूली सुंगंध में लोग महक जाते
कभी हादसों से गुजरती तो
कभी खुशियों के साथ बहती यह जिंदगी
बहती हुई धारा है
आदमी बनते बिगड़ते हैं हर पल
वह रंग बदलती है बारबार
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Monday, November 24, 2008

धड़कनों और जज्बातों का अहसास न था-हिंदी शायरी

चले थे हम अपने इस अनजान पथ पर
न मंजिल का पता था
न मकसद का
लोगों ने किये कई सवाल
जिनका जवाब नहीं था

क्योंकि जहां जिंदगी चलती है
दौलत कमाने के वास्ते
वहां बिकते है सभी रास्ते
जहां चाहता है इंसान शौहरत अपने लिये
वहां तैयार हो जाता है समझौतों के लिये
जहां ख्वाहिश है महल पाने की
वहां भला कौन करता है फिक्र करता जमाने की
जिसके दिल में ख्याल है
खुली आंखों से देखना जिंदगी को
वह जमाने से अलग हो जाते
चलते लगते हैं सबके साथ रास्ते पर
पर जमीन की हर चीज में अपन ख्याल नहीं लगाते
पत्थर और पैसों में जज्बात ढूंढने वाले
भला कब खुश रह पाते
हमने भी देख लिया
छूकर हर शय को
जिन पर मर मिटता है जमाना
कोशिश करता है हर चीज में खुद ही समाना
चमकती लगी हर शय
जिसमें दिल लगा लिया लोगों ने
हम दूर होकर चलते रहे अपने रास्ते पर
क्योंकि उनमें धड़कनों और जज्बातों का अहसास न था

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Saturday, November 15, 2008

फिर किनारों ने सुध नहीं ली-व्यंग्य शायरी

तालाब के चारों और किनारे थे
पर पानी में नहाने की लालच मेंं
नयनों के उनसे आंखें फेर लीं
पर जब डूबने लगे तो हाथ उठाकर
मांगने लगे मदद
पर किनारों ने फिर सुध नहीं ली
.....................................
दिल तो चाहे जहां जाने को
मचलता है
बंद हो जातीं हैं आंखें तब
अक्ल पर परदा हो जाता है
पर जब डगमगाते हैं पांव
जब किसी अनजानी राह पर
तब दुबक जाता है दिल किसी एक कोने में
दिमाग की तरफ जब डालते हैं निगाहें
तो वहां भी खालीपन पलता है

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Sunday, November 2, 2008

देवताओं की कृपा है इसलिये अमीरी भी बसती है-आलेख

भारत की गरीबी पूरे विश्व में हमेशा चर्चित रही है। यही कारण है कि भारत के जब आर्थिक विकास की चर्चा होती है तो यहां की गरीबी पर भी दृष्टिपात किया जाता है। अभी तक विश्व के अनेक लोग यह तय नहीं कर पा रहे कि भारत एक गरीब देश है या अमीर।
स्विस बैंक एसोसिएशन में विभिन्न देशों के लोगों द्वारा जमा के आंकड़े देकर यह सवाल पूछा गया है कि ‘कौन कहता है कि भारत एक गरीब देश है’। इसमें क्रमवार पहले पांच देशों का नाम दिया गया है। ताज्जुब की बात है कि भारत का पहला नंबर है और शायद इसी कारण यह प्रश्न किया गया है।
कुछ लोग हैरान है! हर कोई अपने दृष्टिकोण से टिप्पणी कर रहा है। इस लेखक ने भी इसे पढ़ा पर उसकी दिलचस्पी केवल स्विस बैंक द्वारा दिये गये आंकड़े और ऊपर ब्लाग में लिखे गये शीर्षक में थी।
पहले तो यह बात है कि हम कतई नहीं कहते कि भारत एक गरीब देश है। हां, दुनियां के सबसे अधिक गरीब यहां रहते हैं और औसत आंकड़े भी अन्य देशों से अधिक है इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता। यही गरीब एक शोपीस बन गया है। उसके नाम पर जितनी सहायता देश और विदेशों से आती है वह अगर उसके पास पहुंच जाये तो शायद वह अपनी गरीबी भूल जाये। ऐसा होना नहीं है क्योंकि फिर दुनियां भर के अमीर क्या करेंगे? यहां की गरीबी मिटती नहीं तो केवल इसलिये कि वह विश्व की दर्शनीय वस्तु बनकर रह गयी है जिसके आधार पर अनेक फिल्में और उपन्यास बिक जाते हैं। कुछ लोग यहां भी उनके नाम पर नारे और वाद चलाकर अपना काम चला लेते हैं इस आशा में शायद उनको विदेश में कोई पुरस्कार मिल जाये। अनेक फिल्में बनीं और उपन्यास लिखे गये और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उनको पुरस्कार मिला। कथित रूप से सम्मानित फिल्मकार और उपन्यासकार उसके परिणाम स्वरूप यहां अपने जलवे पेलते रहे। कई लोग मूंह बनाकर गरीबों को दर्द का बयां करते हैं तो कुछ विदेश से सम्मानित होकर यहां अनर्गल बातें करते हैं और उनको अखबार में जगह मिल जाती है।

एक उपन्यासकारा हैं जिनका उपन्यास विदेश में सम्मानित हो गया उसके बाद ही उनको इस देश में पहचाना गया। आजकल उनके अनेक विषयों पर विचार प्रकाशित होते हैं और यकीन मानिये वह एकदक अनर्गल प्रलाप लगते हैं। अंतर्जाल पर मित्र लोग उसके विचार प्रकाशित कर अपने आपको धन्य समझते हैं। कई बार विचार आता है कि यहां जवाब दें पर एक तो यहां पाठक कम है दूसरे यह लेखक कोई प्रसिद्ध नहीं कि कोई उसकी सुनेगा। इसलिये ऊर्जा बेकार करना ठीक नहीं लगता है । बहरहाल भारत की गरीबी और कथित सामाजिक दुर्दशा पर अंग्रेजी में लिखने वाले बहुत लोकप्रिय होते हैं पर हिंदी में उनका कोई सम्मान नहीं होता। हिंदी वाले वैसे ही गरीब हैं भला वह क्यों ऐसी बोरिंग रचनाऐं पढ़ेंगे। वैसे भी कहा जाता है कि आदमी के मन को अपनी विपरीत परिस्थितियों का देख और पढ़कर ही मनोरंजन प्राप्त होता है और अंग्रेजी वालों के पास धन और वैभव इसलिये उनको ही ऐसी रचनायें पसंद आती हैं।

बहरहाल हम देश की अमीरी और यहां गरीबों की स्थिति पर नजर डालें। यह देश अमीर है क्योंकि यहां देवताओं का वास है। इंद्र,वायु और अग्नि देवता यहां वास करते हैं और उनकी कृपा से अमीर और गरीब दोनों ही पल जाते हैं। यह कोई अंधविश्वास की स्थापना का प्रयास नहीं है। यह तो पश्चिम के भूवैज्ञानिक द्वारा दी गयी यह जानकारी है कि जितना भूजल भारत में उपलब्ध है उतना अन्य किसी देश में नहीं है। इस मामले में वह भारत को भाग्यशाली मानते हैं। अब यह तो सभी जानते हैं कि इस प्रथ्वी पर जीवन का आधार तो जल ही है। जल की वजह से यहां वायु और अग्नि देवता की भी कृपा है। यही कारण लोग उनको पूजते हैं और वह उनकी रक्षा करते हैं। ब्रह्मा जी ने देवताओं की उत्पति कर यही कहा था कि देवता प्रथ्वी पर जीवन का सृजन कर उसका पालन करें और मनुष्य उनकी पूजा करें। यही तो सब सदियों से चल रहा है। ब्रह्मा जी ने धन धान्य से इस देश को संपन्न किया और फिर लोगों को मानसिक शांति दिलाने के लिये भक्ति अध्यात्म ज्ञान के लिये भी यहां अपने विचार भी रखे। याद रखिये भारत को विश्व में अध्यात्म गुरु भी माना जाता है और सोने की चिडि़या तो पहले भी कहा जाता था पर बीच में छोड़ दिया था अब फिर सवाल उठा है तो जवाब देना पड़ता है कि हां भई यहां लक्ष्मीजी का भी वास है।

इस देश का आकर्षण सदियों से विश्व की दृष्टि में रहा है क्योंकि यहां का अध्यात्मिक ज्ञान और धन धान्य से संपन्नता सभी को लुभाती है। यही कारण है कि इस पर आक्रमण होते रहे। लोग यहां से लूटकर सामान अपने देश में पहुंचाते रहे, मगर फिर भी यह देश गरीब नहीं हुआ क्योकि यहां प्राकृतिक साधनों में की स्थिति यथावत रही। अन्य हमलावार तो यहां की संस्कृति नहीं मिटा सके पर अंग्रेजों ने यह काम भी कर दिया। देश के विभिन्न राजाओं और अन्य शीर्षस्थ लोगों में व्याप्त अहंकार का लाभ उठाकर उनको ही आपस में लड़ाया। आये थे ईस्ट इंडिया कंपनी के नाम से व्यापार करने और देश के शासक बन गये। इस देश में हमेशा शासन रहे इसलिये ऐसी शिक्षा पद्धति का निर्माण किया जो केवल गुलाम पैदा करती है। वह चले गये पर अपना तंत्र ऐसा बना गये कि आज भी देश का छोटा बड़ा आदमी उनको ही पदचिन्हों पर चल रहा है। आपस में ही एक दूसरे पर विश्वास नहीं है।

पैसा तो गरीब का ही है क्योंकि उसके पसीने से ही बनता है आर्थिक सम्राज्य। किसान जमीन में जो फसल उगाते हैं उसी से ही सारे देश का काम चलता है। मजदूर और किसान को अपने श्रम का जो प्रतिफल मिलना चाहिये वह पूरा नहीं मिलता। उसको प्रतिफल में हुई कमी बनाते हैं किसी को अमीर और वहीं पैसा आज स्विस बैंक में जमा है।
भारतीय अध्यात्म में दान की महिमा बहुत है पर गरीबों के मसीहाओं को वह रास नहीं आता क्योंकि उसमें हक जैसा आभास नहीं आता। गरीबों को हक दिलाने का नारा यहां के लोगों को आज भी प्रिय लगता है और जो जितनी जोर से यह नारा लगाता है वह उनका दिल जीत लेता है। यही कारण है कि जन कल्याण एक फैशन और व्यापार की तरह हो गया है। जो जन कल्याण समाज के शक्तिशाली लोग स्वेच्छा करते थे वह भी इस कारण पीछे हट गये। अब जल कल्याण केवल राज्य के अधीन है और सभी समाजों और समुदायों के शीर्षस्थ लोग केवल उन पर नियंत्रण करने के लिये कल्याण का दिखावा करते हैं।

इस देश से पैसा ले जायेंगे फिर भी यह देश हारेगा नहीं-यह बात अंग्रेजों ने देख ली थी। वह यहां के लोगों के मन मस्तिष्क से भारतीय अध्यात्म और दर्शन की स्मृतियां मिटाना चाहते थे। इसलिये उन्होंने ऐसी विचारधाराओं को आगे बढ़ाया जो उसे नष्ट कर सकते है।
मूर्तिपूजा अंध विश्वास है। सभी भगवान के स्वरूप मिथक हैं। सभी साधु सन्यासी भ्रष्ट हैं। यज्ञ हवन से कुछ नहीं होता। आदि आदि ऐसी बातें कही गयीं। आज भारत में उनके अग्रज भी यही कहते हैं। वैसे कहने वाले कुछ भी कहते रहें पर यह वास्तविकता यह है कि अनेक लोग उनकी परवाह नहीं करते। मंदिर जाकर पत्थर की प्रतिमा पर माला या जल चढ़ाने वाले सुखी नहीं है तो वह भी कौन सुखी हैं जो नहंी जाते। आस्तिक दुखी है तो नास्तिक कौन यहां स्वर्ग भोग रहे हैं। इसके विपरीत जो मंदिरों पर जाकर माला या जल चढ़ाकर अपने आस्तिक भाव से जुड़े है उनके चेहरे पर फिर भी रौनक लगती है और अवसर पर पड़े तो वही किसी गरीब की सहायता कर देते हैं। जो अपने नास्तिक होने के अहंकार में हैं वह तो बस गरीबों की तरफ देखकर अपनी बातें बोल और लिखकर प्रसिद्ध जरूर पा लेते हैं पर किसी गरीब के लिये व्यक्तिगत रूप से कुछ नहीं करते। इसके लिये वह राज्य की तरफ देखते हैं और उसे ही कोसते है।

पहले अनेक लोग ऐेसे होते थे जो थोड़ा पैसा होने पर कहीं तीर्थ वगैरह करने चले जाते थे। वहां अनेक सेठ साहुकारों द्वारा बनी गयी धर्मशालायें होती थीं पर अब तो सभी जगह फाइव स्टार होटल हो गये हैं और यकीनन उनको उनमे सामान्य आदमी के रहने की शक्ति नहीं होती। इसके बावजूद लोग जाते हैं क्योंकि देवताओं की कृपा से खाना और पानी तो मिल ही जाता है। अमीर और गरीब आज भी अपने देवताओं को पूजते है और अभी भी यह पश्चिम के लिये यह असहनीय है। इसलिये वह ऐसा सवाल उठाते हैं कि ‘कौन कहता है कि भारत गरीब है‘। मगर उनसे यह कहा किसने था? कार्ल माक्र्स ने अपनी विचारधारा को पश्चिम में बैठकर लिखा था। उनका मित्र भी एक पूंजीपति था। मजे की बात यह है कि पश्चिम और पूंजीपति ही उनकी विचारधारा के विरोधी रहे पर पूर्व के लोगों ने उसे हाथों हाथ लिया क्योंकि उसमें थे केवल गरीबों के नारे जिसमें गरीब आसानी से बहल जाये।

पूर्व में समाज स्वसंचालित थे पर धीरे धीरे समाज को सरकार से नियंत्रित बना कर उनको समाप्त कर दिया गया । अब अमीर लोग समाज के गरीब लोगों के लिये स्वयं कल्याण करने का काम नहीं करते बल्कि यह राज्य की जिम्मेदारी मानते हैं। धन तो धन है वह उनके पास बढ़ता ही जाता है और वह उनको पश्चिम में भेज देते हैं। पश्चिम की मौज है और यहां चलती रहते हैं बस खालीपीली बहसें। समाज,भाषा और क्षेत्रों को लेकर लोग आपस में झगडे करते है। चीन अपने समाज को मिटा चुका है अब वह दूसरी जगह यही करने का काम कर रहा है। वह अपनी प्रगति का प्रचार कर रहा है पर उसकी वास्तविकता बताने के लिये वहां कोई स्वतंत्र माध्यम नहीं है। भारत में कम से कम यह तो है कि सब सामने आ जाता है। जैसे यह बात आ गयी कि स्विस बैंकों में सबसे अधिक भारतीयों का पैसा जमा है। बहरहाल यह बात तो है कि भारत में देवताओं की कृपा के कारण प्राकृतिक साधनों का बाहुल्य है इसलिये यहां गरीबी के साथ अमीरों की भी बस्ती है। यह अलग बात है कि अमीर अपना अतिरिक्त धन गरीबों के साथ नहीं बांटते बल्कि पश्चिम वालों पर भरोसा कर उनको सौंप देते हैं।
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Thursday, October 30, 2008

धमाकों से शब्द उदास हो जाते हैं-हिन्दी कविता

जब बमों की आवाज से
शहर काँप जाते हैं
बाज़ार में सड़कों पर
फैले खून के दृश्य
आखों के सामने आते हैं
तब बैठने लगता है दिल
लड़खडाने लगती है जुबान
हाथ रुक जाते हैं
तब अपने शब्द लडखडाते नजर आते हैं

लगता है कि कोई
मुस्करा रहा है यह बेबसी देखकर
क्योंकि बुलंद आवाज और
बोलते शब्द उसे पसंद नहीं आते हैं
उसके चेहरे पर है कुटिलता का भाव
लगता है उसी ने दिया है घाव
आजादी देने के बहाने
अपने पास बुलाकर
मन में खौफ भरकर
लोगों को गुलाम बनाने के बहाने उसे खूब आते हैं

क्या बाँटें दर्द अपना
किससे कहें हाल दिल का
लोगों के खून के साथ होली खेलने वाले
चुपके से निकल जाते हैं
अपना उदास चेहरा किसे दिखाएँ
कही अपने कदम न लडखडायें
यहाँ खंजर लिए है कौन
पता नहीं चलता
पीठ में घोंपने के लिए सब तैयार नजर आते हैं

ज़माने में अमन और चैन बेचने का भी
व्यापार होता है
भले ही मिल नहीं पाते हैं
पर दहशत के सौदागर फलते हैं इसलिए
क्योंकि दाम लेकर खून का
सौदा हाथों हाथ किये जाते हैं
इंसानी रिश्तों को वह क्या समझेंगे
जो इसका मोल नहीं जान पाते हैं
बुलंद आवाज़ और शब्दों की ताकत क्या समझेंगे
वह बम धमाकों में ही
अपने को कामयाब समझ पाते हैं
उनकी आवाज से खून बहता है सड़क पर
तकलीफों के कारवाँ
लोगों के घर पहुँच जाते हैं
पर सहमा शब्द
लडखडाते हुए चलते हुए भी
लम्बी दूरी तय कर जाते हैं
मिटते नहीं कभी
समय की मार से मरने वाले बचे ही कहाँ
पर मारने वाले भी कब बच पाते हैं
दहशत से शब्द कभी न कभी तो उबार आते हैं
भले ही धमाको से शब्द उदास हो जाते हैं

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