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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

Wednesday, February 29, 2012

ज़िंदगी के आसरे-हिन्दी कविता (zindagi ke aasre-hindi poem)

हम तो कई बार टूटे और बिखरे
मगर आकाश के मालिक ने
फिर ज़मीन पर खड़ा कर दिया
उसकी कृपा पर
अपनी ज़िंदगी के सारे आसरे
बस यूं ही पार लगाएँगे।
कहें दीपक बापू
तुम अपनी फिक्र करो
अपने आसरे जिन कंधों पर
तुमने टिकाये हैं
सांसें चलना वह तुम्हारी बंद कर देंगे
मगर कब्र तक साथ नहीं आएंगे।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com
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Thursday, February 16, 2012

अपनी औकात-हिन्दी शायरी (apni aukat-hindi shayri)

गफलत में हम कुछ यूं रहे कि
जिन पर भरोसा किया
वह उसे निभाना जानते नहीं थे,
दूसरों से उम्मीद करते वह
पर खुद भी वफा निभाएँ यह
कभी मानते नहीं थे।
कहें दीपक बापू
लोगों के कायदे
अपने मतलब से बदल जाते हैं,
चालक ढूंढें अपने फायदे
मूर्ख हाथ मलते रह जाते हैं,
जिंदगी में दोस्ती और रिश्ते भी
सौदे की तरह जिये जाते हैं
जब तक हमारे जज़्बात कुचले न गए
दूसरों की क्या
हम अपनी औकात जानते नहीं थे।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
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Thursday, February 9, 2012

टूटे बोल-हिन्दी शायरियाँ (toote bol-hindi shayriyan)

खत अब हम कहाँ लिखते हैं,
जज़्बातों को फोन पर
बस यूं ही फेंकते दिखते हैं।
कहें दीपक बापू
बोलने में बह गया
ख्यालों का दरिया
खाली खोपड़ी में
लफ्जों का पड़ गया है अकाल
आवाज़ों में टूटे बोल जोड़ते दिखते हैं।
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इस जहां में
लोगों से क्या बात करें
पहले अपनी रूह की तो सुन लें।

कहें दीपक बापू
बात का बतंगड़ बन जाता है
मज़े की महफिलों में
दूसरों की बातें सुनकर
हैरान या परेशान हों
बेहतर हैं लुत्फ उठाएँ
अपने दिल के अंदर ही
जिन्हें खुद सुन सकें
उन लफ्जों का जाल बुन लें।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
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Saturday, January 28, 2012

किकेट मैच के लिये पांच गुना शक्ति वाला च्यवनप्राश लायें-लघु हिन्दी व्यंग्य (cricket match and chyavanprash-hindi vyangya or satire)

           च्यवनप्राश में तीन गुना शक्ति होती है-ऐसा कहना है बीसीसीआई क्रिकेट टीम के कप्तान का! अब इस तीन गुना शक्ति का पैमाना नापा जाये तो उसके सेवन से तीन दिन तक ही क्रिकेट खेलने लायक ही हो सकती है। गनीमत है कप्तान ने च्यवनप्राश के विज्ञापन में यह नहीं कहा कि इस च्यवनप्राश के सेवन से पांच गुना शक्ति मिलती है। वरना कंपनी पर उपभोक्ता फोरम में मुकदमा भी हो सकता था। फर्जी प्रचार से वस्तुऐं बेचना व्यापार की दृष्टि से अनुचित माना जाता है।
           बीसीसीआई की क्रिकेट टीम (indian cricket team and his australia tour)विदेश में पांच दिन के मैच खेलने  के लिये मैदान पर उतरती है पर तीन दिन में निपट जाती है। देश के शेर बाहर ढेर हो जाते हैं। सामने वाली टीम के तीन दिन में पांच विकेट जाते हैं और इनके बीस विकेट ढह जाते हैं। क्या करें? एक दिन खेलने की क्षमता है, च्यवनप्राश खाने पर तीन गुना ही शक्ति तो बढ़ती है। बाकी दो दिन कहां से दम दिखायें? इससे अच्छा है तो दो दिन मिलने पर तैराकी करें! क्लब में जायें। जश्न मनायें कि तीन दिन खेल लिये।
         च्यवनप्राश के नायक कप्तान ने तो यहां तक कह दिया है कि टेस्ट अब बंद होना चाहिये। उसकी खूब आलोचना हो रही है। हमारे समझ में नहीं आया कि उसका दोष क्या है? सब जानते हैं कि हमारे देश में शक्तिवर्द्धक के नाम पर च्यवनप्राश ही एक चीज है। अगर उसमें तीन गुना शक्ति आती है तो खिलाड़ी से अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि पांच गुना शक्ति अर्जित करे। इधर बीसीसीआई की क्रिकेट टीम की पांच दिन नहीं चली तो देश में हायतौबा मच गया है। यह हायतौबा मचाने वाले वह पुराने क्रिकेटर हैं जो विज्ञापनों के बोझ तले नहीं दबे। उनको नहीं मालुम कि अधिक धन का बोझ उठाना भी हरेक आदमी के बूते का काम नहीं है। शुद्ध रूप से क्रिकेट एक व्यवसाय है। टीम में वही खिलाड़ी होते हैं जिनके पास कंपनियों के विज्ञापन है। कंपनियां ही इस खेल की असली स्वामी है सामने भले ही कोई भी चेहरा दिखता हो। यही कारण है कि कंपनियों के चहेते खिलाड़ियों को टीम से हटाना आसान नहीं है। पुराने हैं तो फिर सवाल ही नहीं है क्योंकि एक नहीं दस दस कंपनियों के विज्ञापनों के नायक होते हैं। मैच के दौरान वही विज्ञापन आते हैं। इन्हीं कपंनियों के बोर्ड मैदान पर दिखते हैं। क्रिकेट सभ्य लोगों का खेल है और सभ्य लोगों के व्यवसाय और खेल कंपनी के बोर्ड तले ही होते हैं।
          बीसीसीआई की क्रिकेट टीम के विदेश में लगातार आठ बार हारने पर देश भर में रोना रहा है पर वहां क्रिकेट खिलाड़ियों को इसकी परवाह नहीं होगी। उनके पास तो इतना समय भी नहीं होगा कि वह हार के बारे में सोचें। मैच के बचे दो दिन वह अपने व्यवसाय की कमाई का हिसाब किताब जांच रहे होंगे। नये विज्ञापनों का इंतजार कर रहे होंगे। कंपनियां भी आश्वस्त होंगी यह सोचकर कि कोई बात नहीं देश के शेर है फिर यहां करिश्मा दिखाकर लोगों का गम मिटा देंगे। वैसे ही कहा जाता है कि जनता की याद्दाश्त कमजोर होती है।
        बहरहाल कुछ लोग बीसीसीआई की क्रिकेट टीम की दुर्दशा के लिये पूरे संगठन को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। हम इस राय के खिलाफ हैं। इससे अच्छा है तो यह है कि ऐसा च्यवनप्राश बनवाना चाहिए जो पांच गुना शक्ति दे सके। इसके लिये अपने यहां अनेक योग भोग चिकित्सक हैं उनकी सहायता ली जा सकती है। क्या इसकी दुगुनी खुराक लेकर छह गुना शक्ति पाई जा सकती है, इस विषय पर भी अनुंसधान करना चाहिए। बीसीसीआई की क्रिकेट टीम के कप्तान ने तो पूरी तरह से ईमानदारी से अपना काम किया है। उसने एक दिवसीय क्रिकेट में जमकर खेला है और च्यवनप्राश के सेवन से तीन गुना शक्ति प्राप्त कर तीन दिन तक पांच दिवसीय क्रिकेट में अपना किला लड़ाया है। अब यह अपने देश के आयुर्वेद विशेषज्ञों की गलती है कि उन्होंने पांच या छह गुना शक्ति वाला च्यवनप्राश नहीं बनाया जिसका विज्ञापन उसे दिया जाता। उससे आय पांच गुना होती तो खेलने का उत्साह भी उतना ही बढ़ता। जब नये संदर्भों में भारतीय अध्यात्म का नये तरह से विश्लेषण हो रहे हैं तो आयुर्वेद को भी इससे पीछे नहीं रहना चाहिए। बिचारे खिलाड़ियों को पांच या छह गुना शक्ति बढ़ाने वाला च्यवनप्राश नहीं दिया गया तो वह क्या करते? सो इस हार को भी व्यंग्य का हाजमोला खाकर हज़म कर लो।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

Friday, January 20, 2012

‘द सैटेनिक वर्सेज’ के लेखक सलमान रुशदी और जयपुर साहित्य सम्मेलन-हिन्दी लेख The Satanic Verses, Salman Rushdie and jaypur sahitya sammelan-hindi lekh article)

          द सैटेनिक वर्सेज (The Satanic Verses) के लेखक सलमान रुश्दी (Salman Rushdie) हमेशा विवादों में रहे है। अपने ही धर्म के प्रतिकूल किताब ‘‘ द सेटेनिक वर्सेज’’ लिखने वाले लेखक सलमान रुश्दी ने इसके पहले और बाद में अनेक किताबें लिखीं पर उनकी पहचान हमेशा इसी किताब की वजह से रही। हालांकि इस विवादास्पद किताब के बाद उनकी चर्चा अन्य किताबों की वजह से नहीं बल्कि बार शादियां कर बीवियां बदलने की वजह से होती रही है। हम जैसे अंग्रेजी से अनभिज्ञ लोगों को यह तो पता नहीं कि उनकी रचनाओं का स्तर क्या है पर कुछ विशेषज्ञ उनको उच्च रचनाकार नहीं मानते। अनेक अंग्रेजी विशेषज्ञों ने तो यहां तक लिखा था कि रुशदी की सैटनिक वर्सेज भी अंग्रेजी भाषा और शिल्प की दृष्टि से कोई उत्कृष्ट रचना नहीं है, अगर उन्होंने अपने धर्म के प्रतिकूल टिप्पणियां नहीं की होती और उनको तूल नहीं दिया जाता तो शायद ही कोई इस किताब को जानता।
         हम जब बाजार और प्रचार के संयुक्त प्रयासों को ध्यान से देखें तो यह आसानी से समझा जा सकता है कि सलमान रुशदी ही क्या अनेक रचनाकार केवल इसलिये लोकप्रिय होते हैं क्योंकि प्रकाशक ऐसे प्रचार की व्यवस्था करते है ताकि उनकी किताबें बिकें। अपने विवाद के कारण ही सैटेनिक वर्सेज अनेक भाषाओं में अनुवादित होकर बिकी। भारत में इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया इस कारण कभी इसका अन्य भाषा में प्रकाशन नहीं हुआ। इतना हीं नहीं किसी समाचार पत्र या पत्रिका ने इसके अंशों के प्रकाशन का साहस भी नहीं किया-कम से कम कम हिन्दी वालों में तो ऐसा साहस नहीं दिखा। इतना ही नहीं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के समर्थन में अनेक अवसर भीड़ जुटाने वालों में भी कोई ऐसा नहीं दिखा जिसने इस पर से प्रतिबंध हटाने की मांग की हो। हमारे लिये यह भूली बिसरी किताब हो गयी है।
         इधर कहीं  राजस्थान के जयपुर (Jaipur Literature Festival) शहर में साहित्य सम्मेलन हो रहा है। टीवी चैनलों के प्रसारण में वहां रुश्दी की किताब हमने रखी देखी। इसी सम्मेलन दो लोगों ने उसके अंश वाचन का प्रयास भी किया जिनको रोक दिया गया। जयपुर में हो रहे इस सम्मेलन की चर्चा भी इसलिये अधिक हुई क्योंकि उसमें सलमान रुशदी के आने की संभावना थी वरना शायद ही कोई चैनल इसे इस तरह स्थान देता। बहरहाल पता चला कि धमकियों की वजह से सलमान रुशदी जयपुर में नहीं आ रहे बल्कि वीडियो काफ्रेंस से संबोधित करेंगे। ऐसा लगता है कि इस बार भी बाज़ार और प्रचार का कोई फिक्स खेल चल रहा है। इसको नीचे लिखे बिंदुओं के संदर्भ में देखा जा सकता है।
         1. एक तरफ सैटेनिक वर्सेज के अंश पड़ने से दो महानुभावों को रोका जाता है दूसरी तरफ सलमान रुश्दी को इतना महत्व दिया जाता है कि उनके न आने पर उनको वीडियो प्रेस कांफ्रेंस के जरिये संबोधित करेंगे। यह विरोधाभास नहीं तो और क्या है कि जिस लेखक को अपनी विवादास्पद पुस्तक के जरिये प्रसिद्धि के कारण ही इतना बड़ा सम्मान दिया जा रहा है उसी के अंश वाचन पर रोक लग रही है।
       2. दूसरी बात यह कि इस पुस्तक पर देश में प्रतिबंध लगा था वह क्या हट गया है जो इसको प्रदर्शनी में रखा गया। हालांकि टीवी चैनलों पर हमने जो प्रदर्शनी देखी वह जयपुर की है या अन्यत्र जगह ऐसा हुआ है इसकी जानकारी हमें नहीं है। अगर प्रतिबंध नहीं हटा तो इसे भारत नहीं लाया जाना चाहिए था। यह अलग बात है कि हट गया हो पर इसकी विधिवत घोषणा नहीं की गयी हो।
       ऐसा लगता है जयपुर साहित्यकार सम्मेलन में सलमान रुश्दी के नाम के जरिये संभवत अन्य लेखकों को प्रकाशन बाज़ार विश्व में स्थापित करना चाहता है। यह संदेह इसलिये भी होता है क्योंकि सलमान रुश्दी के भारत आगमन की संभावनाओं के चलते ही हमें लगा था कि वह शायद ही आयें। उनके बाज़ार और प्रचार के संपर्क सूत्र उनसे कोई भी न आने का बहाना बनवा देंगे। देखा जाये तो प्रकाशन बाज़ार और प्रचार माध्यम हमेशा विवादास्पद और सनसनी के सहारे अपना काम चलाते हैं जिस कारण हिन्दी क्या किसी भी भाषा में साहित्यक रचनायें न के बराबर हो रही है। संभवतः जयपुर सम्मेलन अपने ही विश्व मे ही क्या उस शहर में ही प्रसिद्धि नहीं पाता जहां यह हो रहा है। सलमान रुश्दी के आने की घोषणा और फिर न आना एक तरह से तयशुदा योजना ही लगती है। आयोजक ने सैटेनिक वर्सेस के अंश पढ़ने से दो लोगों को इसलिये रोका क्योंकि इससे यहां लोग भड़क सकते है तो क्या उनका यह डर नहीं था कि सलममान रुशदी आने पर भी यह हो सकता है। ऐसे में यह शक तो होगा कि यह सब प्रचार के लिए  था।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

Monday, January 9, 2012

नर्क और स्वर्ग में कितनी दूरी-हिन्दी व्यंग्य कविताएँ (narak aur swarg ki doori-hindi vyangya kavitaen or satire poem)

हुकूमत की इज्ज़त करे
हर खास और आम इंसान
यह ज़रूरी है,
कभी दुश्मन का
कभी लुटेरों का खौफ ज़िंदा रखें
बादशाहों की यह मजबूरी है।
कहें दीपक बापू
फरिश्तों और शैतानों में
सदियों से चलता रहा है
यह फिक्सिंग का खेल
छुरी से निकाले कोई
कहीं आदमी श्रद्धा से
निकलवाने पहुँच जाता
अपने खून से तेल,
नहीं जानता कोई
नर्क की स्वर्ग से कितनी दूरी है।
----------------
शैतानों और फरिश्तों के बीच
दिखाने के लिए दुश्मनी का रिश्ता रहा है,
इधर जाये या उधर आसरा ले इंसान
लंबे बयानों में सभी का सोच पिसता रहा है।
कहें दीपक बापू
किसी ने बना लिया लुटेरों का गिरोह
किसी ने थाम लिया हुकूमत का चाबुक
दोनों एक दूसरे को ज़िंदा रखने को मजबूर
बेमतलब है यह सोचना कि
किसके बारे में क्या कहा है।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

Thursday, January 5, 2012

नया आइडिया-लघु हिन्दी हास्य व्यंग्य (naya idea-laghu hindi hasya vyangya or comedy satire article}

     उस्ताद ने शागिर्द से कहा-"मेरे तौंद बहुत बढ़ गई है, इसे कम करना होगा, वरना लोग मेरे उपदेशों पर यकीन नहीं करेंगे जिसमें मैं उनको कम खाने गम खाने और कसरत करो तंदुरुस्ती पाओ जैसी बातें कहता हूँ। आजकल मोटे लोगों को कोई पसंद नहीं करता, नयी पीढ़ी के लड़के लड़कियां मोटे लोगों को बूढ़ा और बीमार समझते हैं। सोच रहा हूँ कल सुबह से सैर पर जाना शुरू करूँ।"
     शागिर्द ने कहा-"उस्ताद सुबह जल्दी उठने के लिए रात को जल्दी सोना पड़ेगा। जल्दी सोने के लिए सोमरस का सेवन भी छोडना होगा।"
    उस्ताद ने कहा-"सोमरस का सेवन बंद नहीं कर सकता, क्योंकि उसी समय मेरे पास बोलने के ढेर सारे आइडिया आते हैं जिनके सहारे अपना समाज सुधार अभियान चलता है। ऐसा करते हैं सोमरस का सेवन हम दोनों अब शाम को ही कर लिया करेंगे।"
     शागिर्द ने कहा-"यह संभव नहीं है क्योंकि आपके कई शागिर्द शाम के बाद भी देर तक रुकते हैं, उनको अगर यह इल्म हो गया कि उनके उस्ताद शराब पीते हैं तो हो सकता है कि वह यहाँ आना छोड़ दें।"
    उस्ताद ने कहा-"ऐसा करो तुम सबसे कह दो कि हम अपना चित्तन और मनन का कार्यक्रम बदल रहे हैं इसलिए वह शाम होने से पहले ही चले जाया करें।"
    उस्ताद कुछ दिन तक अपने कार्यक्रम के अनुसार सुबह घूमने जाते रहे पर पेट था कि कम होने का नाम नहीं ले रहा था। उस्ताद ने शागिर्द से अपनी राय मांगी। शागिर्द बोला-"उस्ताद आप देश में फ़ेल रही महंगाई रोकने के लिए अनशन पर बैठ जाएँ। इससे प्रचार और पैसे बढ्ने के साथ आपका पेट भी कम होगा।"
    उस्ताद ने कहा-"कमबख्त तू शागिर्द है या मेरा दुश्मन1 मैं पतला होना चाहता हूँ,न कि मरना।
शागिर्द बोला-"मैं तो आपको सही सलाह दे रहा हूँ। सारा देश परेशान है। इससे आपको नए प्रायोजक और शागिर्द मिल जाएंगे। फिर आपका स्वास्थ भी अच्छा हो जाएगा।"
      उस्ताद ने कहा-"हाँ और तू बैठकर बाहर सोमरस पीना, मैं उधर अपना गला सुखाता रहूँ।"
शागिर्द ने कहा-"ठीक है,फिर आप ऐसा करें की शाम को कहीं अंदर घुस जाया करें। तब मैं बाहर बैठकर लोगों को भाषण वगैरह दिया करूंगा। अलबत्ता मेरे यह शर्त है कि मैं आपसे पहले ही जाम पी लूँगा।"
      उस्ताद ने पूछा-"वह तो ठीक है पर शराब पीकर खाली पेट कैसे सो जाएंगे?
    शागिर्द ने कहा-" आप शराब कोई नमकीन के साथ थोड़े ही पीएंगे, बल्कि काजू और सलाद भी आपको लाकर दूँगा। उस समय हमारे पास ढेर सारा चंदा होगा। वैसे आप चाहें तो कभी कभी भोजन में मलाई कोफता के साथ रोटी भी खा लेना। अपने तो ऐश हो जाएंगे।"
      उस्ताद ने कहा-"पर इससे मेरी तौंद कम नहीं होगीc"
     शागिर्द ने कहा- आप अब अभी तक तौंद करने के मसले पर ही सोच रहे हैं? अरे, आप तो नए शागिर्द बनाने के लिए ही यह सब करना चाहते हैं न! जब नया आइडिया आ गया तो फिर पुराने पर सोचना छोड़ दीजिए।"
        उस्ताद ने मुंडी हिलाते हुए कहा-"हूँ, हूँ !"

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

Wednesday, December 28, 2011

दिल का झंडाबरदार-हिन्दी शायरियां (Dil ka jhandabardar-hindi shayriyan or poem's)

अपने अपने सभी के इलाके हैं
कोई न कोई कहीं का सरदार है,
डूब हैं सभी अपने घर बचाने के लिये
गलतफहमी में रहे हम कि वह असरदार हैं।
कहें दीपक बापू दोगलापन खून में है इंसानों के
मतलब निकलने तक सभी हमारे तरफदार हैं,
बाज़ार में बिकते मुद्दे पर चर्चा करना बकवास है
खुश वही है जो खुद के दिल का झंडाबरदार है।
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अपने जिस्म का पसीना
हमने उनके लिये बहाया
जो केवल दौलत के अहंसानमंद है,
उनसे तारीफ की क्या उम्मीद करना
जिनके ख्याल अपने ही मतलब में बंद हैं
---------------
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

Wednesday, December 14, 2011

दोस्ती का दम-हिन्दी शायरी (dosti ka dam-hindi shayri)

न वह दिल के पास हैं
न उनके कदम कभी हमारे घर की ओर
बढ़ते नज़र आते हैं,
कहें दीपक बापू
उनसे दोस्ती का दम क्या भरें
जिनकी वफा पर लगे ढेर सारे दाग
दिखते हैं जहां को
मगर वह खूबसूरती से
खुद से सच से ही आँखें फेर जाते हैं।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

Sunday, December 11, 2011

अन्ना हजारे (अण्णा हज़ारे) ने दी युवा की नयी परिभाषा-हिन्दी लेख (Anna hazare and today yung nanaration-hindi lekh or article)

         अन्ना हजारे अत्यंत दिलचस्प आदमी हैं। सच कहें तो हमने गांधी को नहीं देखा न सुना पर जितना पढ़ा है उसके आधार पर यह कह सकते हैं कि अन्ना की उनसे तुलना करने का अब मतलब नहीं रहा। अन्ना हजारे तो अन्ना हजारे हैं और इतिहास भारत में आजादी के बाद के महान पुरुष के रूप में उनको दर्ज करेगा। 11 दिसंबर को जंतर मंतर पर अनशन के दौरान अपने भाषणों में उन्होंनें बहुत सारी बातें कही गयी। उनमें कुछ बातें ऐसी हैं जो नारों या वाद से आगे जाकर उनके गंभीर चिंतक होने का प्रमाण देती है। इनमें युवा शक्ति को लेकर उनका बयान अत्यंत गंभीर दर्शन का प्रमाण है।
        अक्सर हमारे यहां युवाओं को आगे लाने की बात कही जाती है। जहां कहीं कोई संगठन, संस्था या आंदोलन विफल होता है तो युवा नेतृत्व लाने का नारा देकर समाज को ताजगी दिलाने का प्रयास किया जाता है। लोग भी पुराने लोगों से दुःखी होते हैं। निराशा उनको मनोबल तोड़ चुकी होती है। नया चेहरा देखकर वह यह आशा बांध लेते हैं कि शायद उनका कल्याण होगा मगर ऐसा नहीं होता बल्कि हालात बद से बदतर हो जाते हैं। अलबत्ता नया या युवा चेहरा बताकर कुछ समय तक समूहों पर नियंत्रण किया जाता है। दरअसल हमारे देश के सामाजिक, धार्मिक तथा आर्थिक तथा अन्य संगठनों पर धनपतियों को अप्रत्यक्ष नियंत्रण है। कहने को सभी संगठन दावा करते हैं कि वह स्वतंत्र हैं पर कहीं न कहीं सभी प्रायोजन से प्रतिबद्ध दिखते हैं। युवा शक्ति के नाम पर अपने ही परिवार के सदस्यों को लाकर शिखर पुरुष खुश होते हैं तो परंपरागत से जीने वाला हमारा समाज भी खामोशी से स्वीकार करता है।
         अन्ना का कहना सही है कि युवा वही है जिसका हृदय या दिल जवान है। उनका यह भी कहना है कि अगर पैंतीस साल का आदमी हो और संघर्ष की स्थिति में कह दे कि जाने दो हमें क्या करना? वहीं कोई साठ साल को हो पर समाज के साथ खड़ा हो वही जवान है।
        एक तरह से उन्होंने यह साबित कर दिया है कि उनमें एक सक्षम नेता का गुण है। अपने अनशन से अपने आपको युवा साबित कर चुके अन्ना हजारे ने अपने दर्शन के व्यापक होने का इतना जबरदस्त प्रमाण है कि यह कहने में कोई झिझक नहीं है कि पहले महाराष्ट्र और फिर पूरे देश में छा जाने वाला मजबूत नेतृत्व का उनमें जन्मजात रहा होगा। यह सही है कि इसके लिये धनपतियों के प्रचार माध्यमों का कम योगदान नहीं है। रविवार को छुट्टी के दिन उनके एकदिवसीय अनशन का आयोजन कई तरह की बातों की तरफ ध्यान खींचता है। इस दिन अवकाश के दिन देश भर में अनेक जगह हुए अनशन में भीड़ स्वाभाविक रूप से जुट जाती है। घर बैठे लोग टीवी पर सीधा प्रसारण देखते हैं। अन्ना हजारे के व्यक्तित्व का प्रचार इतना हो चुका है कि टीवी चैनलों ने इसे विज्ञापनों के बीच समय पास करने का एक महत्वपूर्ण विषय बना लिया है। यह रविवार का दिन इसमें बहुत सहायक होता है। ऐसे में अन्ना का प्रभावी भाषण उन्हें एक नये महापुरुष के रूप में स्थापित कर सकता है। खास तौर से युवा शक्ति पर उनके बयान से जहां युवा आकर्षित होंगे वहीं बड़ी आयु के लोग भी प्रसन्न होंगे। यकीनन अन्ना हजारे ने अपनी बात कहते हुए इस बात का ध्यान रखा होगा।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

Monday, November 28, 2011

वॉल मार्ट के आगमन का भय और भारतीय बाज़ार-हिन्दी लेख और एफ डी आई पर चर्चा (wal-mart and indian market-hindi lekh FDI)

        खेरिज किराना व्यापार में विदेशी निवेश लाने के फैसले पर देश में बवाल बचा है और इस पर बहस हो रही है। एक आम लेखक और नागरिक के रूप में हमें इस फैसले के विरोध या समर्थन करने की शक्ति नहीं रखते हैं क्योंकि इस निर्णय तो शिखर पुरुषों को करना होता है। साथ ही चूंकि प्रचार माध्यमों में चर्चा करने में हम समर्थ नहीं है इसलिये अपने ब्लाग पर इसका आम नागरिकों की दृष्टि से विश्लेषण कर रहे हैं। हमने देखा कि आम जनमानस में इस निर्णय की कोई अधिक प्रतिक्रिया नहीं है। इसका कारण यह है कि आम जनमानस समझ नहीं पा रहा है कि आखिर मामला क्या है?
        अगर भारतीय बुद्धिजीवियों की बात की जाये तो उनका अध्ययन भले ही व्यापक होता है जिसके आधार वह तर्क गढ़ लेते हैं पर उनका चिंत्तन अत्यंत सीमित हैं इसलिये अधिक गहन जानकारी उनसे नहीं मिल पाती और उनके तक भी सतही होते हैं। यही अब भी हो रहा है। अगर खेरिज किराने के व्यापार में विदेशी निवेश की बात की जाये तो उस पर बहस अलग होनी चाहिए। अगर मसला संगठित किराना व्यापार ( मॉल या संयुक्त बाज़ार) का है तो वह भी बहस का विषय हो सकता है। जहां तक खेरिज किराना व्यापार में विदेशी निवेश का जो नया फैसला है उसे लेकर अधिक चिंतित होने वाली क्या बात है, यह अभी तक समझ में नहीं आया। दरअसल यह निर्णय हमारी उदारीकरण की उस नीति का इस पर सारे राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक संगठन चल रहे हैं। अगर हम यह मानते हैं कि केवल वाल मार्ट के आने से इस देश के छोटे किराने व्यापारी और किसान तबाह हो जायेंगे तो यह एक भारी भ्रम होगा क्योंकि हम जिन नीतियों पर समाज को चलता देख रहे हैं वह उससे अधिक खतरनाक हैं। यह खतरा लगातार हमारे साथ पहले से ही चल रहा है जिसमें छोटे मध्यम व्यवसाय अपनी महत्ता खोते जा रहे हैं।
           हमें याद है कि इससे पहले भी बड़ी कंपनियों के किराना के खेरिज व्यापार में उतरने का विरोध हुआ पर अंततः क्या हुआ? बड़े शहरों में बड़े मॉल खुल गये हैं। हमने अनेक मॉल स्वयं देखे हैं और यकीनन उन्होंने अनेक छोटे व्यवसायियों के ग्राहक-प्रगतिवादियों और जनवादियों के दृष्टि से कहें तो हक- छीने हैं। हम जब छोटे थे तो मेलों में बच्चों को खिलाने के लिये विभिन्न प्रकार के झूले लगते थे। कभी कभार मोहल्ले में भी लोग ले आते थे। आज मॉल में बच्चों के आधुनिक खेल हैं और तय बात है कि उन्होंने कहीं न कहीं गरीब लोगों की रोजी छीनी है। हम यहां यह भी उल्लेख करना चाहेंगे कि तब और बच्चों के रहन सहन और पहनावे में भी अंतर था। हम अगर उन्हीं झूलों के लायक थे पर आज के बच्चे अधिक धन की फसल में पैदा हुए हैं। तब समाज में माता पिता के बच्चों को स्वयं घुमाने फिराने का फैशन आज की तरह नहीं  था। यह काम हम स्वयं ही कर लेते थे। एक तरह से साफ बात कहें तो तब और अब का समाज बदला हुआ है। यह समाज उदारीकरण की वजह से बदला या उसके बदलते हुए रूप के आभास से नीतियां पहले ही बन गयी। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि उदारीकरण में पूंजीपतियों का पेट भरने के लिये समाज का बौद्धिक वर्ग पहले ही लगा हुआ था।
                 अब खुदरा किराना व्यापार की बात कर लें। धन्य है वह लोग जो आज भी खुदरा किराना व्यापार कर रहे हैं क्योंकि जिस तरह अब नौकरियों के प्रति समाज का रुझान बढ़ा है उसमें नयी पीढ़ी के बहुत कम लोग इसे करना चाहते हैं।
          हम यहां शहरी किराना व्यापार की बात कर रहे हैं क्योंकि मॉल और संयुक्त व्यापार केंद्र शहरों में ही हैं। पहली बात तो यह है कि जो पुराने स्थापित किराने व्यापारी हैं उनकी नयी पीढ़ी यह काम करे तो उस पर हमें कुछ नहीं कहना पर आजकल जिसे देखो वही किराना व्यापार कर रहा है। देखा जाये तो किराना व्यापारी अधिक हैं और ग्राहक कम! हमारे एक मित्र ने आज से पंद्रह साल पहले महंगाई का करण इन खुदरा व्यापारियों की अधिक संख्या को बताया था। उसने कहा था कि यह सारे व्यापारी खाने पीने की चीजें खरीद लेते हैं। फिर वह सड़ जाती हैं तो अनेक दुकानें बंद हो जाती हैं या वह फैंक देते हैं। इनकी वजह से अनेक चीजों की मांग बढ़ी नज़र आती है पर होती नहीं है मगर उनके दाम बढ़ जाते हैं। उसका मानना था कि इस तरह अनेक कंपनियां कमा रही हैं पर छोटे दुकानदार अपनी पूंजी बरबाद कर बंद हो जाते हैं। इसका अन्वेषण हमने नहीं किया पर जब हम अनेक दुकानदारों के यहां वस्तुओं की मात्रा देखते हैं तो यह बात साफ लगता है कि कंपनियों का सामान अधिक होगा ग्राहक कम!
          हमारे देश में बेरोजगारी अधिक है। एक समय तो यह कहा जाने लगा था कि कि जो भी अपने घर से रूठता है वही किराने की दुकान खोल लेता है। इधर मॉल खुल गये हैं। ईमानदारी की बात करें तो हमें मॉल से खरीदना अब भी महंगा लगता है। एक बात यह भी मान लीजिये कि मॉल से खरीदने वाले लोगो की संख्या अब भी कम है। हमारे मार्ग में ही एक कंपनी का खेरिज भंडार पड़ता है जहां सब्जियां मिलती हैं पर वहां से कभी खरीदी नहीं क्योंकि ठेले वाले के मुकाबले वहां ताजी और सस्ती सब्जी मिलेगी इसमें संशय होता है। हमारे शहर में कम से कम दो कंपनियों के खेरिज भंडार खुले और बंद भी हो गये यह हमने देखा।
          भारतीय अर्थव्यवस्था के अंतद्वंद्वों और उनके संचालन की नीतियों की कमियों पर हम लिखने बैठें तो बहुत सारी सामग्री है पर उसे यहां लिखना प्रासंगिक है। हम इन नीतियों को जब देश के लाभ या हानि से जोड़कर देखते हैं तो लगता है कि यह चर्चा का विषय नहीं है। इस देश में दो देश सामने ही दिख रहे हैं-एक इंडिया दूसरा भारत! कभी कभी तो ऐसा लगता है कि हम एक भारतीय होकर इंडियन मामले में दखल दे रहे हैं। कुछ लोगों को यह मजाक लगे पर वह मॉल और मार्केट में खड़े होकर चिंत्तन करें तो यह बात साफ दिखाई देगी। वॉल मार्ट एक विदेशी कंपनी है उससे क्या डरें, देशी कंपनियों ने भला कौन छोड़ा है? सीधी बात कहें तो नवीन नीति से देश के किसानों या खुदरा व्यापारियों के बर्बाद होने की आशंका अपनी समझ से परे है। हम मान लें कि वह कंपनी लूटने आ रही है तो उसका मुकाबला यहां मौजूद देशी कंपनियों से ही होगा। मॉल के ग्राहक ही वॉल मार्ट में जायेंगे जो कि देशी कंपनियों के लिये चुनौती है। बड़े शहरों का हमें पता नहीं पर छोटे शहरों में हमने देखा है कि कम से पचास ग्राम चाय खरीदने कोई मॉल नहीं जाता। देश में रोज कमाकर खाने वाल गरीब बहुत हैं और उनका सहारा खुदारा व्यापारी हैं। गरीब रहेगा तो खुदरा व्यापारी भी रहेगा। वॉल मार्ट या गरीबी मिटाने नहीं आ रही भले ही ऐसा दावा किया जा रहा है।
            अपने पास अधिक लिखने की गुंजायश नहीं है क्योंकि पढ़ने वाले सीमित हैं। इतना जरूर कह सकते हैं कि यह बड़े लोगों का आपसी द्वंद्व है जो अंततः आमजन के हित का नारा लगाते हुए लड़ते हैं। आज के आधुनिक युग में शक्तिशाली प्रचारतंत्र के कारण आमजन भी इतना तो जान गया है कि उसके हित का नारा लगाना इन शक्तिशाली आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा धार्मिक समूहों के शिखर पुरुषों की मजबूरी है। इसलिये उनके आपसी द्वंद्वों को रुचि से देखता है।
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कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

Friday, November 18, 2011

क्रिकेट और भ्रष्टाचार-हिन्दी हास्य व्यंग्य कविता (cricket and corruption-hindi hasya vyangya kavita or comdey satire poem)

हिन्दी साहित्य,समाज,मस्ती,मनोरंजन,शायरी
क्रिकेट में भ्रष्टाचार नहीं है,
फिक्सिंग    को जुआ कहना
कतई शिष्टाचार नहीं है।
कहें दीपक बापू
भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के खैरख्वाह
बल्ला हाथ में लिये गेंद खेल रहे हैं,
बाज़ार सौदागरों से के इशारे पर
देश के मसलों पर नारे लगाकर
ज़माने मे रुतवे पेल रहे हैं
सुना है क्रिकेट मैच में हर बॉल होती है फिक्स,
कभी कभी चौके से भी सस्ता हो जाता है सिक्स,
अगर क्रिकेट देखना छोड़ दें देश के लोग
भागने लगेगा यहां से बेईमानी का रोग,
न विज्ञापन दिखेंगे,
न सस्ते उत्पाद महंगे बिकेंगे,
शराब के सौदागर
खेल का बाज़ार लगा रहे हैं,
मनोरंजन के नाम पर हवस जगा रहे हैं,
आम इंसानों ने अपना दिमाग दे दिया है
बेईमानों के हाथ,
उम्मीद जोड़े हैं कुसंतों के साथ,
दो नंबर के धंधे की चाहत सभी को है
फिर कहते हैं कि भ्रष्टाचार यहीं है।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

Saturday, November 12, 2011

दिल पर बात-हिन्दी शायरी (dil par baat, subject of heart-hindi shayri or poem)

इंसानों के सिर
अपनी दौलत, शौहरत और ओहदों से
ऊंचे हो जाते हैं,
धरती पर चलते हों भले ही
मगर उनके  दिमाग
आसमानों में खो जाते हैं।
कहें दीपक बापू
जब तक इंसान चल रहा है खुद
उससे दोस्ती करना ठीक है
हुक्मरानों की संगत में रहकर
हुक्म चलाने लगे जो
उनसे दूर रहना ही ठीक है
क्योंकि कितने भी दरियादिल हों वह
दिल पर बात आये तो
खूंखार हो जाते हैं।
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कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
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Monday, October 31, 2011

घर और जिंदगी-हिंदी शायरी (ghar aur jindagi-hindi shayri)

आओ कुछ सपने देखें
अपने घर खुशियाँ आने की
गम तो पल पल मिल जाते हैं ज़माने में,
दूसरों को दर्द देना आसान है
वक्त लगता हैं बहुत किसी को हंसाने में,
कहैं दीपक बापू
कागज के घर बनाने में
गुजर जाती है जिंदगी
पल लगता है उसे जलाने में.

Sunday, October 16, 2011

गरीबी पर चिंत्तन-हिन्दी कविताएँ (garibi par chinttan or thought on powerty-hindi poem's or kaivtaen

अपने घर में सोने के भंडार
तुम भरवाते रहो,
गरीब इंसान की रोटी से
टुकड़ा टुकड़ा कर चुरवाते रहो,
जब तक बैठे हो महलों में
झौंपड़ियों को उजड़वाते रहो।
यह ज्यादा नहीं चलेगा,
ज़माने की भलाई करने के नाम पर
सिंहासनों पर बुत बनकर बैठे लोगों
सुनो जरा यह भी
किसी दिन इतिहास अपना रुख बदलेगा,
किसी दिन तुम्हारी शख्सियत का
काला चेहरा भी हो जायेगा दर्ज
तब तक भले ही अपने तारीफों के पुल
कागजों पर जुड़वाते रहो।
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वातानुकूलित कक्षों में बैठकर वह
देश से गरीबी हटाने के साथ
विकास दर बढ़ाने पर चिंत्तन करते हैं,
बहसों के बाद
कागजों पर दौलतमंदों के
घर भरने के लिये शब्द भरते हैं।
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Friday, October 7, 2011

सब्जी और चंदा-हिन्दी हास्य कविता (sabji aur chanda-hindi hasya kavita)

समाज सेवक की पत्नी ने कहा
‘‘सुनते हो जी!
आज नौकर छुट्टी पर गया है
तुम थैला लेकर जाओ,
उसमें
आलू , टमाटर और धनिया
खरीद कर लाना
जब घर वापस आओ।’’
समाज सेवक ने कहा
‘‘अभी तक तुम्हारे मस्तिष्क का विकास हुआ नहीं है,
घर पर खाना जरूरी है क्या
मेरे साथ चलो जहां में जा रहा हूं
खाने का होटल भी वहीं है,
अगर किसी ने देख लिया
थैले में हम सब्जी भर भरने लगे हैं,
तब दानदाता भी
हमारे थैले में पैसे की जगह

 आलू  और टमाटर भरने लगेंगे
छवि के दम पर चल रहा है अपना धंधा
वरना कौन लोग अपने सगे हैं,
नौकर एक दिन की छुट्टी पर गया है
तुम हमें हमेशा के लिये
समाज के धंधे से रिटायर न कराओ।’’
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Friday, September 23, 2011

देश के बिक जाने का खौफ-हिन्दी कविता (desh ke bik jane ka or terrar of sale of country-hindi kavita or poem)

यह खौफ क्यों सताता है तुमको
कि देश बिक जायेगा
कमबख्त, पहले लुटेरे
खुद लूटने आये इस देश का खजाना,
देश फिर भी फलाफूला
हो गये वह अपने देश रवाना,
अब उनके दलाल कमाकर दलाली
जमा कर रहे लुटेरों के घर दौलत,
फिर उधार उसे उधार लेकर आते हैं,
ब्याज भी यहीं से कमाते हैं
अपने बनकर पा रहे वफादार जैसी शौहरत
सब मिट जायेंगे एक दिन
देश फिर भी अपना कमाकर खायेगा
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Monday, September 12, 2011

हिन्दी दिवस पर कविता और लघु व्यंग्य (hindi diwas or hindi divas par kavita aur laghukatha)

        एक आयोजक ने अपने कवि मित्र को अपनी संस्था में हिन्दी दिवस पर आयोजित कार्यक्रम का आमंत्रण देते हुए कहा-‘यार, तुम कल 12 बजे आना। बढ़िया कार्यकम हैं। कार्यक्रम के बाद नाश्ते वगैरह का आयोजन किया गया है। कार्यक्रम में काव्य पाठ भी होगा तुम उसे सुन सकते हों!
     कवि मित्र ने कहा-‘‘तुम कहो तो हम कविता भी कर देंगे।’
      आयोजक ने कहा-‘‘देखो, यह कार्यक्रम मेरे पैसे से नहीं हो रहा है। जिन लोगों ने पैसे दिये हैं वह कविता करेंगे। सभी बड़े लोग हैं और उनको इसी दिन अपनी हिन्दी में भड़ास निकालने का अवसर मिलता है। तुम तो बस, उपस्थिति देने आना जिससे मेरी भी इज्जत बढ़ेगी।’’
        कवि मित्र ने कहा-‘‘इससे क्या? तुम एक दो कविता सुनाने का अवसर हमें भी दो।’
मित्र ने कहा-‘‘तुम तो मेरी उन बड़े लोगों से दुश्मनी कराओगे। तुम मंच पर आकर शुद्ध हिन्दी में काव्य पाठ करोगे, उसमें जोरदार सुर भरोगे। वह बड़े लोग जो अपनी भड़ास हिन्दी में निकालने के लिये यही दिन पाते हैं, अपनी हंग्रेजी यानि आधी हिन्दी और अंग्रेजी में अपनी बात कहेंगे और बीच में तुम्हारी कविता सुन ली तो कुंठित हो जायेंगे। इसलिये तुम्हें मंच पर लाने का खतरा मैं नहीं उठा सकता।’’
      कवि मित्र ने कहा-‘‘मैं वहां नहीं आऊंगा। तुम फुरसत पा लो तो रात को मेरे घर आ जाना। मैं भी हिन्दी दिवस पर कवितायें सुनाने के लिये आदमी ढूंढ रहा हूं पर कोई मिल नहीं रहा सभी हिन्दी दिवस में जा रहे हैं। अनेक लोग तो ऐसे हैं जिनको चार चार जगह से निमंत्रण मिले हैं। वह जाने से पहले हर जगह मिलने वाले नाश्ते की सामग्री पता कर रहे हैं। जहां अच्छा होगा वहंी जायेंगे। अलबत्ता तुम अपने यहां मिलने वाले नाश्ते की चीजें बता दो मैं उन हिन्दी प्रेमियों को बता दूंगा जो इस दिन ऐसे कार्यक्रम ढूंढते हैं।
मित्र खिसियाकर रह गया।
हिन्दी दिवस पर प्रस्तुत एक क्षणिका
----------------
उन्होंने अपने संस्थान में
हिन्दी धूमधाम से मनाया,
सभी वक्ताओं के भाषणों में
कहीं अंग्रेजी शब्द ठसे थे
तो किसी ने अंग्रेजी में ही
हिन्दी का महत्व बताया।
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Friday, September 2, 2011

भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचार-हिन्दी हास्य कवितायें (bhrashtachar aur bhrashtachar-hindi hasya kavita corruption and corrupted-hindi comic poem

वह ईमानदार हैं
इसलिये बिना दाम के
ईमान नहीं बेचते
मगर नेक हैं
मोलभाव नहीं करते।
................
एक आदमी ने दूसरे से पूछा
‘‘यार, हमारे जिम्मे जो काम हैं
उसे करने के लिये
हम लोगों से पैसा लेते हैं
कहीं इसी को तो भ्रष्टाचार नहीं कहा जाता है,
अगर यह सच है
छोड़ देते हैं यह काम
भ्रष्टाचारी कहलाना अब सहा नहीं जाता है।’’
दूसरे ने कहा
‘किस पागल ने हमारे काम को भ्रष्टाचार कहा है
काम के बदले दाम लेना
व्यापार कहलाता है,
जिसे नहीं मिलता वह
अपनी ईमानदारी को खुद ही सहलाता है,
वैसे मुझे नहीं मालुम भ्रष्टाचार किसे कहा जाता है,
पर लगता है कि कुछ लोग
बिना काम किये
पैसा लेते हैं,
फिर मुंह फेर लेते हैं,
ऐसे लोग मुफ्तखोर है या भिखारी
शायद दोनों को एक संबोधन देने के लिये
भ्रष्टाचारी कहकर पुकारा जाता है।’’
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कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Sunday, August 21, 2011

ईमानदारी की बही-हिन्दी हास्य कविता (imandari ki bahi or dayri of honesty-hindi hasya kavita or comic poem)

भ्रष्टाचारी ने ईमानदार को फटकारा
‘‘क्या पुराने जन्म के पापों का फल पा रहे हो,
बिना ऊपरी कमाई के जीवन गंवा रहे हो,
अरे
इसी जन्म में ही कोई अच्छा काम करते,
दान दक्षिणा  दूसरों को देकर
अपनी जेब भरने का काम भी करते,
लोग मुझे तुम्हारा दोस्त कहकर शरमाते हैं,
तुम्हारे बुरे हालात सभी जगह बताते हैं,
सच कहता हूं
तुम पर बहुत तरस आता है।’’
ईमानदार ने कहा
‘‘सच कहता हूं इसमें मेरा कोई दोष नहीं है,
घर में भी कोई इस बात पर कम रोष नहीं है,
जगह ऐसी मिली है
जहां कोई पैसा देने नहीं आता,
बस फाईलों का ढेर सामने बैठकर सताता,
ठोकपीटकर बनाया किस्मत ने ईमानदार,
वरना दौलत का बन जाता इजारेदार,
एक बात तुम्हारी बात सही है,
पुराने जन्म के पापों का फल है
अपनी ईमानदारी की बनी बही है,
यही तर्क अपनी दुर्भाग्य का समझ में आता है।
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