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Sunday, May 5, 2013

गर्मी में वाणी का मौन ही बरफ का काम कर सकता है-ग्रीष्म ऋतु पर हिन्दी लेख (Garmi mein vani ka maun he baraf ka kam kar sakta hai-greeshma ritu par hindi lekh)



    उत्तर भारत में अब गर्मी तेजी से बढ़ती जा रही है। जब पूरा विश्व ही गर्म हो रहा हो तब नियमित रूप से गर्मी में रहने वाले लोगों को  पहले से अधिक संकट झेलने के लिये मानसिक रूप से तैयार होना ही चाहिये।  ऐसा नहीं है कि हमने गर्मी पहले नहीं झेली है या अब आयु की बजह से गर्मी झेलना कठिन हो रहा है अलबत्ता इतना अनुभव जरूर हो रहा है कि गर्मी अब भयानक प्रहार करने वाली साबित हो रही है।  मौसम की दूसरी विचित्रता यह है कि प्रातः थोड़ा ठंडा रहता है जबकि पहले गर्मियों में निरंतर ही आग का सामना होता था।  प्रातःकाल का यह मौसम कब तक साथ निभायेगा यह कहना कठिन है।
   मौसम वैज्ञानिक बरसों से इस बढ़ती गर्मी की चेतावनी देते आ रहे हैं।  दरअसल इस धरती और अंतरिक्ष के बीच एक ओजोन परत होती है  जो सूर्य की किरणों को सीधे जमीन पर आने से रोकती है।  अब उसमे छेद होने की बात बहुत पहले सामने आयी थी।  इस छेद से निकली सीधी किरणें देश को गर्म करेंगी यह चेतावनी पहुत पहले से वैज्ञानिक देते आ रहे हैं।  लगातार वैज्ञानिक यह बताते आ रहे हैं कि वह छेद बढ़ता ही जा रहा है। अब कुछ वैज्ञानिक कहते हैं कि विश्व में विकास के मंदिर कारखाने ऐसी गैसें उत्सजर्तित कर रहे हैं जो उसमें छेद किये दे रही हैं तो कुछ कहते हैं कि यह गैसे वायुमंडल में घुलकर गर्मी बढ़ा रही हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि ओजोन पर्त के बढ़ते छेद की वजह से गर्मी बढ़ रही है या फिर गैसों का उपयोग असली संकट का कारण है या फिर दोनों ही कारण इसके लिये तर्कसंगत माने, यह हम जैसे अवैज्ञानिकों के लिये तय करना कठिन है ।  बहरहाल विश्व में पर्यावरण असंतुलन दूर करने के लिये अनेक सम्मेलन हो चुके हैं। अमेरिका समेत विश्व के अनेक देशों के राष्ट्राध्यक्ष उनमें शािमल होने की रस्म अदायगी करते हैं। फिर गैस उत्सर्जन के लिये विकासशील देशों को जिम्मेदार बताकर विकसित राष्ट्रों के प्रमुख अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। यह अलग बात है कि अब इस असंतुलन के दुष्प्रभाव विकसित राष्ट्रों को भी झेलनी पड़ रहे है।
        एक बात तय है कि आधुनिक कथित राजकीय व्यवस्थाओं वाली विचाराधारायें केवल रुदन तक ही सभ्यता को ले जाती हैं।  लोकतंत्र हो या तानाशाही या राजतंत्र कोई व्यवस्था लोगों की समस्या का निराकरण करने के लिये राज्यकर्म में लिप्त लोगों को प्रेरित करते नहीं लगती। दरअसल विश्व में पूंजीपतियों का वर्चस्प बढ़ा है। यह नये पूंजीपति केवल लाभ की भाषा जानते हैं। समाज कल्याण उनके लिये निजी नहीं बल्कि शासन तंत्र का विषय  है। वह शासनतंत्र जिसके अनेक सूत्र इन्हीं पूंजीपतियों के हाथ में है।  यह पूंजीपति यह तो चाहते है कि विश्व का शासनतंत्र उनके लाभ के लिये काम करता रहे। यह वर्ग तो यह भी चाहता है कि  शासनतंत्र आम आदमी तथा पर्यावरण की चिंता करता तो दिखे, चाहे तो समस्या हल के लिये दिखावटी कदम भी उठाये पर उनके हितों पर कुठाराघात बिल्कुल न हो। जबकि सच यह है कि यही इन्हीं पूंजीपतियों  के विकास मंदिर अब वैश्विक संकट का कारण भी बन रहे हैं। सच बात तो यह है कि वैश्विक उदारीकरण ने कई विषयों को  अंधरे में ढकेल दिया है।  आर्थिक विकास की पटरी पर पूरा विश्व दौड़ रहा है पर धार्मिक, सामाजिक तथा कलात्मक क्षेत्र में विकास के मुद्दे में नवसृजन का मुद्दा अब गौण हो गया है।  पूंजीपति इस क्षेत्र में अपना पैसा लगाते हैं पर उनका लक्ष्य व्यक्तिगत प्रचार बढ़ाना रहता है। उसमें भी वह चाटुकारों के साथ ही ऐसे शिखर पुरुषों को प्रोत्साहित करते हैं जो उनकी पूंजी वृद्धि में गुणात्मक योगदान दे सकें।  अब वातानुकूलित भवनों, कारों, रेलों तथा वायुयानों की उपलब्धता ने ऐसे पूंजीपतियों को समाज के आम आदमी सोच से दूर ही कर दिया है।
          बहरहाल अगले दो महीने उत्तरभारत के लिये अत्ंयंत कष्टकारक रहेंगे।  जब तक बरसात नहीं आती तब तक सूखे से दुर्गति के समाचार आते रहेंगे।  यह अलग बात है कि बरसात के बाद की उमस भी अब गर्मी का ही हिस्सा हो गयी है।  इसका मतलब है कि आगामी अक्टुबर तक यह गर्म मौसम अपना उग्र रूप दिखाता रहेगा।  कुछ मनोविशेषज्ञ मानते हैं कि गर्मी का मौसम सामाजिक तथा पारिवारिक रूप से भी तनाव का जनक होता है। यही सबसे बड़ी समस्या हेाती है। सच बात तो यह है कि कहा भी जाता है कि तन की अग्नि से अधिक मन की अग्नि जलाती हैं संकट तब आता है जब आप शांत रहना चाहते हैं पर सामने वाला आपके मन की अग्नि भड़काने के लिये तत्पर रहता है।  ऐसे में हम जैसे लोगों के लिये ध्यान ही वह विधा है जो ब्रह्मास्त्र का काम करती है।  जब कोई गर्मी के दिनों में हमारे दिमाग में गर्मी लाने का प्रयास करे ध्यान में घुस जायें।  वैसे भी गर्मी के मार से लोग जल्दी थकते  लोग अपनी उकताहट दूसरे की तरफ धकेलने का प्रयास करते हैं।  उनसे मौन होकर ही लड़ा जा सकता है।  वहां मौन ही बरफ का काम कर सकता है           

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
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Thursday, April 11, 2013

विक्रम संवतः 2070 का प्रांरभ-चिंत्तन लेख तथा संपादकीय (hindu new year or nav varsha vikrama sanvat 2070-hindu thought article and editorial)

  आज पूरे भारत में भारतीय नववर्ष 2070 मनाया जा रहा है। इसे हम विक्रमी संवत भी कहते हैं।  मूलतः इसे हिन्दू नर्व वर्ष कहते हैं पर इसे प्रथक प्रथक समाज अपने ढंग से मनाते हैं।  सिन्धी समाज चेटीचांड तो पंजाबी इसे वैशाखी के रूप तो दक्षिण में इसे उगादि का नाम देकर मनाया जाता है। प्रथक नाम होने के बावजूद समाजों में कहीं वैचारिक भिन्नता का भाव नहीं होता।  यही हमारे संस्कार और संस्कृति हैं।
     आश्चर्य इस बात का है कि इस अवसर पर भारतीय प्रचार माध्यम केवल औपचारिकता निभाते हुए समाचार भर देते हैं जबकि इसे मनाने वालों की संख्या अंग्रेजी नव वर्ष पर झूमने वालों से अधिक होती है।  इससे यह बात तो पता लगती है कि बाज़ार और प्रचार माध्यम उस नयी पीढ़ी को लक्ष्य कर  अपने कार्यक्रम तथा समाचार बनाते हैं जो उन  आधुनिक वस्तुओं की क्रेता बनती है जिसके विज्ञापन उनके संस्थान चलाते हैं।  हमने दोनो नववर्षों की तुलना करते हुए भारतीय नववर्ष के मनाने वालों की संख्या इसलिये ज्यादा बताई क्योंकि अंग्रेजी नववर्ष पर बधाई ढोने की औपचारिकता वह समाज अब बड़े अनमने ढंग से निभा रहा है जिससे अंग्रेजी भाषा और संस्कृति ने लाचार बना दिया है। हम यह तो नहीं कहते कि अंग्रेजी संस्कृति या भाषा कोई बुरी बात नहीं है पर इतना जरूर मानते हैं कि भाषा, भाव, और भक्त की अपनी अपनी भूमि  से संबंध होता है। भूमि का भूगोल भावों का निर्माण करता है जो कि भाषा और भक्त के स्वरूप का निर्धारित करने वाला तत्व है।  जिस तरह चाय की फसल के लिये असम  तो गेहूं के लिये उत्तर भारत का मैदानी इलाका उपयुक्त है। उसी तरह सेव के लिये हिमालय के बर्फीले इलाके प्रकृति ने बनाये हैं। चावल के लिये छत्तीसगढ़ धान का कटोरा कहा जाता है। कहने का अभिप्राय यह है कि  हम एक फसल को दूसरी जगह नहीं पैदा कर सकते। इन्हीं फसलों के अनुसार ही पर्व बनते हैं। भारतीय नववर्ष सभी जगह भिन्न रूपों में इसी कारण मनाया जाता है।  यह पर्व हर भारतीय धर्म  के मानने वाले के घर में सहजता से मनाया जाता है जबकि अंग्रेजी संवत् के लिये बाज़ार को प्रचार का तामझाम लेकर  जूझना पड़ता है।
    हम यहां श्रीमद्भागवत गीता की बात करें तो शायद लोगों को अजीब लगे।  उसमें ‘‘गुण ही गुण को बरतता है’’ वाला सूत्र बताया गया है।  यह  अत्यंत वैज्ञानिक सूत्र है। फिर यह भी कहा जाता है कि जैसा खाये वैसा अन्न। दरअसल अन्न में आत्मा होती है और उसके स्वभाव के भिन्न  रूपों का भी भिन्न स्वभाव है इसलिये उनका सेवन करने वाला उससे प्रभावित होता है।  हम इस बात से इंकार नहीं कर सकते कि आदमी रहन सहन, खान पान, और संगत से प्रभावित होता है।  बात को लंबा खींचने की बजाय संक्षेप में यह कहें कि भूमि के अनुसार ही संस्कृति बनती है।  अंग्रेजी भाषा और संस्कृति का भारत में प्रचार हो इसका विरोध हम नहीं कर रहे पर यह स्पष्ट कर दें कि भाषा, भूगोल, भाव तथा भक्त के स्वभाव में वह कभी स्थाई जगह नहीं सकती।  जबरन या अनायास प्रयास से अंग्रेजी संस्कृति, संस्कार और सभ्यता लाने का प्रयास यहां लोगों को अन्मयस्क बना रहा है। लोग न इधर के रहे हैं  न उधर के।  भाषा की दृष्टि में तुतलाहट, भाव की दृष्टि में फुसलाहट और भक्त की दृष्टि में झुंझलाहट स्पष्ट रूप से सामने आती जा रही है। भक्त से हमारा आशय सभ्य मनुष्य से है और विरोधाभास में फंसा हमारा समाज उसका एक समूह है।
           अध्यात्म ज्ञान के अभाव में आत्ममंथन की प्रक्रिया हो नहीं  सकती जबकि   एक सभ्य, संस्कारवान और सशक्त व्यक्ति बनने क लिये आत्ममंथन की प्रक्रिया से गुजरना जरूरी है। फिलहाल तो प्रचार माध्यम देश के विकास को लेकर आत्ममुग्ध हैं पर उससे जो भाषा, भाव और भक्त का विनाश हुआ है उसका आंकलन करने का समय अभी किसी के पास नहीं है।  अर्थोपार्जन ने अध्यात्म के विषय को गौण कर दिया है।  ऐसे में इस नववर्ष पर आत्ममंथन की प्रक्रिंया से गुजरने का प्रण करें तो शायद हमें इस विकसित संसार का वह पतनशील दृश्य भी दिखाई दे जिससे हम बचना चाहते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि फिर भी कुछ लोग हैं जो पुरानी राह पर चल रहे हें और उनसे ही यह अपेक्षा की जाती है कि वह आधार भक्त  स्तंभ की तरह भाषा और भाव को बचाये रहेंगे।
     इस नववर्ष पर सभी पाठकों को हार्दिक बधाई तथा शुभाकामनायें।  
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Wednesday, March 27, 2013

अध्यात्मिक विषय पर इंटरनेट पर निजी चर्चा पर वीडियो जारी करने का प्रायोगिक प्रयास

अध्यात्म के  विषय पर यह वीडियो एक प्रयोग के लिये प्रस्तुत किया जा रहा है। अगर इस पर सही प्रतिक्रियायें मिली तो अन्य वीडियो भी प्रस्तुत किया जा रहा है। याद रखें यह एकल अव्यवसायिक प्रयास है। इसमें व्यवसायिक आकर्षण ढूंढना व्यर्थ होगा। http://youtu.be/zKkqSF7Z7CQ

Tuesday, February 26, 2013

मन का गुलशन-हिन्दी शायरी (man ka gulshan-hindi shayari)

बालपन की कच्ची माटी में
खिला था गुलशन
उम्र के दौर के साथ मुरझा गया
ख्वाहिशों ने बढ़ाये कदम दिल में
पत्थरों के शहर में सपना सजा नया,
कहें दीपक बापु
उस्ताद के ओहदे पर बैठे लोगों ने
सिखाई केवल मतलबपरस्ती,
दिखाई दौलत के दरिया में मस्ती,
अपनी उम्र से अब वह टूटेबालपन की कच्ची माटी में
खिला था गुलशन
उम्र के दौर के साथ मुरझा गया
ख्वाहिशों ने बढ़ाये कदम दिल में
पत्थरों के शहर में सपना सजा नया,
कहें दीपक बापु
उस्ताद के ओहदे पर बैठे लोगों ने
सिखाई केवल मतलबपरस्ती,
दिखाई दौलत के दरिया में मस्ती,
अपनी उम्र से अब वह टूटे बालपन की कच्ची माटी में
खिला था गुलशन
उम्र के दौर के साथ मुरझा गया
ख्वाहिशों ने बढ़ाये कदम दिल में
पत्थरों के शहर में सपना सजा नया,
कहें दीपक बापु
उस्ताद के ओहदे पर बैठे लोगों ने
सिखाई केवल मतलबपरस्ती,
दिखाई दौलत के दरिया में मस्ती,
अपनी उम्र से अब वह टूटे
हैं उनके ख्वाब आंखों से रूठे हैं,
अब ताक रहे हैं
जवां शार्गिदों के माटी से बने पत्थर दिल में
कब बहेगी नदी बनकर दया।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Friday, February 1, 2013

दर्द का समंदर सूख गया है-हिन्दी शायरी (dard ka samandar sookh gaya hai-hindi shayri or poem

दर्द का समंदर सूख गया है
आंसुओं की कोई नदी
अब बहकर वहां नहीं आती,
कितना भी दर्दनाक मंजर हो
होठों पर कड़वी
बस यूं ही चली आती।
कहें दीपक बापू
कब तक रोते ज़माने के हाल पर
सभी ने बोये हैं बबूल
आम के लिये मुंह खोले बैठे हैं
स्वाद के लिये ललचाये लोग
चल पड़ते हैं अंधेरी राहों पर
अपनी ही मंजिल की तस्वीर
कभी उनकी आंखों में नहीं आती,
मर गये जज़्बात
सांस भले चलती रहे
पर खुशबू और बदबू  पहचान नहीं पाती।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
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Wednesday, January 23, 2013

इस संसार में मन लगाने के दो सहज साधन हैं, कमाना और परनिंदा करना-हिन्दी चिंत्तन लेख (is sansar mein man lagane ke do sahaj sadhan hain, kamana aur parninda karna)

       आदमी का मन उसे भटकाता है।  थोड़ा है तो आदमी दुःखी है और ज्यादा है तो भी खुश नहीं है। धन, संपदा तथा पद अगर कम है तो आदमी इस बात का प्रयास करता है कि उसमें वृद्धि हो।  यदि वह सफलता के चरमोत्कर्ष है तो वह उसका मन इस  चिंता में घुलता है कि वह किसी भी तरह अपने वैभव की रक्षा  करता रहे।
           कहा जाता है कि दूसरे की दौलत बुद्धिमान को चार गुनी और मूर्ख को सौ गुनी दिखाई देती है।  इसका मतलब यह है कि मायावी संसार बुद्धिमान को भी विचलित करता है भले ही मूर्ख की अपेक्षा उसके तनाव की मात्रा कम हो।  कुछ महानुभाव अच्छा काम करने के इच्छुक हैं तो समय नहीं मिलता और समय मिलता है तो उनका मन नहीं करता।
   एक सज्जन उस दिन अपनी शारीरिक व्याधियों का बखान दूसरे सज्जन से कर  रहे थे।  पैर से शुरु हुए तो सिरदर्द कर ही दम लिया।  दूसरे सज्जन ने कहा-‘‘यार, आप सुबह उठकर घूमा करो। हो सके तो कहीं योग साधना का अभ्यास करो।’’
      पहले सज्जन ने कहा-‘‘कैसे करूं? रात को देर से सोता हूं!  दुकान से से घर दस बजे आता हूं। फिर परिवार के सदस्यों से बात करने में ही दो बज जाते हैं। किसी भी हालत में सुबह आठ बजे से पहले उठ नही सकता।
      दूसरे सज्जन ने कहा-‘‘अब यह तो तुम्हारी समस्या है। बढ़ती  उम्र के साथ शारीरिक व्याधियां बढ़ती ही जायेंगी।  अब तो तरीका यह है कि दुकान से जल्दी आया करो। अपने व्यापार का कुछ जिम्मा अपने लड़के को सौंप दो।  दूसरा उपाय यह है कि रात को जल्दी सोकर सुबह जल्दी उठने का प्रयास करो।  बाहर से घूमकर आओ और चाय के समय परिवार के सदस्यों से बातचीत करो।
      पहले सज्जन ने कहा-‘‘बच्चे को तो मैं इंजीनियरिंग पढ़ा रहा हूं।  मैं नहीं चाहता कि बच्चा व्यापार में आये।  व्यापार की अब कोई इज्जत नहीं बची है। कहीं अच्छी नौकरी मिल जायेगी तो उसकी भी जिंदगी में चमक होगी।’’
         दूसरे सज्जन ने कहा-‘‘अगर बच्चे को इंजीनियर बनाना है तो फिर इतना कमाना किसके लिये? तुम दुकान से जल्दी आ जाया करो।’’
      पहले सज्जन ने कहा-‘‘यह नहीं हो सकता।  भला कोई अपनी कमाई से मुंह कैसे मोड़ सकता है।
         दूसरे सज्जन ने एक तीसरे सज्जन का नाम लेकर कहा-‘‘हम दोनों के ही  एक मित्र ने भी अपनी बच्चे को चिकित्सा शिक्षा के लिये भेजा है। अब वह जल्दी घर आ जाता है। सुबह उठकर उसे उद्यान में घूमने जाते मैंने  कई बार देखा है।’’
         पहले सज्जन ने कहा-‘‘अरे, उसकी क्या बात करते हो? उसकी दुकान इतनी चलती कहां है? उसने अपनी जिंदगी में कमाया ही क्या है? वह मेरे स्तर का नहीं है।  तुम भी किसकी बात लेकर बैठ गये। मैं अपनी बीमारियों के बारे में तुमसे उपाय पूछ रहा हूं और तुम हो कि उसे बढ़ा रहे हो।’
             दूसरे सज्जन ने हंसते हुए कहा-‘‘तुम्हारी बीमारयों का कोई उपाय मेरे पास तो नहीं है।  किसी चिकित्सक के पास जाओ।  मैं तुम्हें गलत सलाह दे बैठा।  दरअसल इस संसार में मन लगाने के लिये दो बढ़िया साधन हैं एक है कमाना दूसरा परनिंदा करना। कुछ लोगों के लिये तीसरा काम है मुफ्त में सलाह देना जिसकी गलती मैं कर ही चुका।’’
          वास्तव में हर आदमी राजनीति, धर्म, अर्थ, फिल्म, साहित्य तथा कला के क्षेत्रों पर स्थित प्रतिष्ठित लोगों को देखकर उन जैसा बनने का विचार तो करता है पर उसके लिये जो निज भावों का त्याग और परिश्रम चाहिये उसे कोई नहीं करना चाहता।  जिन लोगों को प्रतिष्ठत क्षेत्रों में सफलता मिली है उन्होंने पहले अपने समय का कुछ भाग मुफ्त में खर्च किया होता है।  जबकि सामान्य हर आदमी हर पल अपनी सक्रियता का दाम चाहता है। कुछ लोग तो पूरी जिंदगी परिवार के भरण भोषण में इस आशा के साथ गुजार देते है कि वह उनसे फुरसत पाकर कोई रचनात्मक कार्य करेंगे।  हालांकि उन्हें अपने काम के दौरान भी फुरसत मिलती है तो वह उस दौरान दूसरों के दोष निकालकर उसे नष्ट कर देते हैं।  राजनीति, धर्म, अर्थ, फिल्म, साहित्य तथा कला के क्षेत्र में प्रतिष्ठत लोगों के बारे में आमजन में यह भावना रहती है कि वह तो जन्मजात विरासत के कारण बने हैं।  सच बात तो यह है कि हमारे समाज में अध्यात्म ज्ञान से लोगों की दूरी बढ़ती जा रही है।  अनेक लोगों ने अपने आसपास सुविधाओं का इस कदर संग्रह कर लिया है कि उन्हें अपने पांव पर चलना भी बदनामी का विषय लगता है।  लोग परोपकार करना तो एकदम मूर्खता मानते हैं  इसी कारण एक दूसरे की प्रशंसा करने की बजाय निंदा कर अपनी श्रेष्ठता साबित करते हैं। दूसरे को दोष गिनाते हैं ताकि अपने को श्रेष्ठ साबित कर सकें।  रचनात्मक प्रवृत्तियों से परे लोगों के पास दो ही काम सहज रहे गये हैं कि एक अपने स्वार्थ की पूर्ति दूसरा परनिंदा करना।
         रुग्ण हो चुके समाज में कुछ लोग ऐसे हैं जो स्वयं अध्यात्म ज्ञान के साधक हैं पर सांसरिक विषयों से संबंध रखने की बाध्यता की वजह से दूसरों के अज्ञान के दोष को सहजता से झेलते हैं।  यही एक तरीका भी है।  अगर आप योग, ज्ञान, ध्यान और भक्ति साधक हैं तो दूसरों के दोषों को अनदेखा करें।  अब लोगों के सहिष्णुता का भाव कम हो गया है। थोड़ी आलोचना पर लोग बौखला जाते है।  पैसे, पद और प्रतिष्ठा से सराबोर लोगों के पास फटकना भी अब खतरनाक लगता है।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Friday, January 11, 2013

खबर और बहस के बीच सुंदरियां-हिन्दी व्यंग्य कविता (khabar aur bahas ke beech sundriyan-hindi vyangya kavita,beuty queen news and disscusion-hindi satire poem)

कुछ खबरें खुशी में झुलाती हैं,
कुछ खबरें जोर से रुलाती हैं।
कमबख्त!
किस पर देर तक गौर करें
अपनी खूंखार असलियतें भी
जल्दी से अपनी तरफ बुलाती हैं।
कहें दीपक बापू
खबरचियों का धंधा है
लोगों के जज़्बातों से खेलना,
कभी होठों में हंसी लाने की कोशिश होती
कभी शुरु होता आंखों में आंसु पेलना,
बिकने के लिये बाज़ार में बहुत सामान है,
ग्राहक खुश है खरीद कर शान में,
हमारे जज़्बातों से न कर पाये खिलवाड़ कोई
इसलिये फेर लेते हैं नज़रे
विज्ञापनों में दिखने वाली सुंदरियों से
खबर और बहस के बीच कंपनियों के
उत्पाद बिकवाने के लिये
अपने हाथ में झुलाती हैं।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Sunday, December 30, 2012

अशिष्य को उपदेश देना व्यर्थ-हिन्दी सामाजिक लेख एंव चिंत्तन (ashishya ki updesh dena vyarth-hindi social article evn thought)

              हमारे देश में अंग्रेजों ने राज्य किया। वह चले गये पर अपने पीछे कुछ अपने अनुजनुमा-यानि ऐसे भारतीय जो उनकी संस्कृति को अत्यंत वैज्ञानिक मानते है-को यहीं छोड़ गये। इन्हीं अनुजों ने भारत में उनकी संस्कृति का विकास इस तरह किया कि पूरा देश ही उनकी चपेट में आ गया है।  ग्रामीण क्षेत्र भले बचे हुए हों  पर शहरी क्षेत्र तो पूरी तरह इस संस्कृति की चपेट में आ गये हैं। अंग्रेजी संस्कृति की सबसे बड़ी खूबी यह है कि हमेशा ही बड़ी बड़ी बातें करो, बिना पूछे ज्ञान दो। हर विषय पर बोलो।  विज्ञान में पढ़े लोग सामाजिक विषय पर बोलते हैं और समाजशास्त्र पढ़े लोग विज्ञान में अपना ज्ञान बघारते हैं।  मजे की बात यह है कि इस देश में राजनीति शास्त्र बहुत कम लोगों ने पढ़ा होगा पर देश की हालत पर जगह जगह चर्चा होती मिल जायेगी।
      देश में कहीं बड़ा हादसा हो या महिलाओं के विरुद्ध अनाचार की घटना टीवी चैनलों पर बड़े बड़े विद्वान बहस करने आते हैं। उन्हें बोलना है इसलिये बोलते हैं। टीवी चैनल वालों के कर्णधारों को  बड़े शहरों में रहने वाले इन पेशेवर बुद्धिजीवियों की शिक्षा का पता होता है पर उनकी धारणा शक्ति का ज्ञान नहीं होता।  पता कौन करेगा? हमारे देश में कमाने की प्रवृत्ति तो सभी में है पर व्यवसायिकतता का अभाव है। व्यवसायिक भाव का मतलब यह है कि जिस काम से धन कमाना हो उसे पूरे ज्ञान के साथ पूर्ण किया जाये।  फिल्म, टीवी, पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में केवल सतही ज्ञान वालों को आगे बढ़ने का अवसर मिल रहा है इसलिये अधिक कला कौशल की आशा करना व्यर्थ दिखता है।
      दरअसल अंग्रेजी संस्कृति ने देश में खान पान, रहन सहन और आचार विचार में जो बदलाव किया है उससे धन कमाने के नये स्त्रोतों का सृजन हुआ जरूर है पर काम करने का नया तरीका कोई सीख नहीं पाया। मनोवृत्तियां पुरानी हैं अंग्रेज अपना काम पूरी लगन के साथ व्यवसायिक प्रवृत्ति से करते हैं।  जबकि भारत में काम किसी भी तरह कर पैसा कमाना है, यही लक्ष्य रहता है। इस प्रवृत्ति की वजह से हमारे देश में प्रबंध कौशल का अभाव कहीं भी किसी क्षेत्र में देखा जा सकता है। सेठ जैसे हैं वैसे ही कर्मचारी हैं। सेठों को ज्ञान नहीं कि अलग अलग विषयों मे श्रेष्ठता क्या होती है तो कर्मचारियों को भी क्या पड़ी है कि विशेषज्ञता प्राप्त कर उनकी चाकरी करें।
विदुर नीति में कहा गया है कि
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तत्वज्ञं सर्वभूतानां योगज्ञः सर्वकर्मणाम्।
उपायज्ञो मनुष्याणां नर पण्डित उच्यते।।
     हिन्दी में भावार्थ-जो मनुष्य संपूर्ण भौतिक पदार्थों का ज्ञान तथा सभी कर्मों का काम करने का तरीका समझता है वह पण्डित कहलाता है।

अशिष्यं शास्ति यो राजन् पश्च शून्यमुपासते।
कदर्य भजते यश्च तमाहुर्मूढचेतासम्
      हिन्दी में भावार्थ-जो अशिष्य को उपदेश देता है, शून्य की उपासना करता है और कृपण का आश्रय लेता है वह मूढ़ चित्त वाला कहलाता है।
          यही कारण है कि प्रचार माध्यमों में मनोरंजन के साथ रुदन भी एक व्यापार का हिस्सा बन गया है।  अभी हाल में दिल्ली में घटित एक सामूहिक घटना पर प्रचार माध्यमोें में हो हल्ला मचा।  इसमें कोई संदेह नहीं है कि देश में नारियों के प्रति अपराधों की घटनायें बढ़ गयी हैं मगर जिस तरह राजधानी में घटित इस घटना को प्रतीक बनाकर सभी जगह बहस गयी वह हैरान करने वाली थी।  घटना यह थी एक बस में एक लड़का और लड़की चढ़़े। बस में मौजूद छह लोगों ने लड़के को घायल कर लड़की के साथ बलात्कार किया। इतना ही नहीं उसके बाद लड़की को इस तरह मारा कि वह मर ही जाये।  यह बलात्कार की घटना थी पर सामान्य नहीं थी। यह नारी अत्याचर से जुड़ी तो थी पर इसमें व्यवस्था संबंधी दोष भी जिम्मेदार थे।  आमतौर से सामाजिक विशेषज्ञ यह बताते हैं कि नारियों के प्रति 99 प्रतिशत अपराधों में उनके निज संपर्क में रहने वाले लोग जिम्मेदार होते हैं। वाकई यह समाज से जुड़ा विषय है पर जिस तरह बस में अनजान लड़कों ने यह अपराध किया वह व्यवस्था संबंधी अनेक प्रश्न खड़े करता है पर किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया।
        सभी विद्वान उस समाज को जाग्रत करते रहे जो उनका शिष्य नहीं है।  वह इस घटना से समाज को जगाना चाहते थे।  अपीलें कर रहे थे।  अब यह किसे समझायें कि इस संसार में देव और असुर दो प्रकार के मनुष्य होते हैं।  सामान्य मनुष्य को कानून से डर लगता है इसलिये वह अपराध नहीं करता। उससे नारियों पर अनाचार करने की  अपील करने की आवश्यकता भी नहीं है मगर जिनकी प्रवृत्तियां आसुरी हैं वह आग्रहों से नहीं दंड से डराये जा सकते हैं। न मानने पर दंडित किये जा सकते हैं।
        अनेक विशेषज्ञ  तो इस घटना के प्रचार से इतना डर गये कि देश में पहले ही फैशन की तरह प्रचलित कन्या भ्रुण हत्या अधिक बढ़ न जाये।  अभी तक तो यह स्थिति है कि पहली संतान के रूप में बेटी होने तक सामान्य लोग स्वीकार कर लेते हैं मगर अगर इस तरह अनजान लोगों से लड़कियों के लिये खतरे बढ़े तो हो सकता है कि यह सीमा भी टूट जाये।  ऐसे में लड़के और लड़कियों का अनुपात संतुलन अधिक बिगड़ सकता है।
      बहरहाल ऐसी अनेक घटनायें हैं जिस पर कथित लोग रटी रटायी बातें करते हैं।  जहां अपराध हों पर वहां समाज क्या कर लेगा? समाज पर नियंत्रण के लिये तो राज्य व्यवसथा बनी है।  अगर समाज में अपराधों की स्थिति शून्य हो जाये तो राज्य व्यवस्था की आवश्यकता क्या है? चूंकि इस संसार में देव तथा असुर दोनों का निवास रहना ही है तो अपराध संख्या शून्य नहीं हो सकती। हमारे बुद्धिजीवी चाहे कितना भी जोर लगाकर नारे लगाते रहें अपराध शून्य नहीं होंगे पर कम जरूर हो सकते हैं।  समाज कोई एक इकाई नहीं होता। हर व्यक्ति का अपना  अपना  स्वभाव होता है।  उसके अनुसार ही सभी का आचरण अलग अलग हैं। सभी देव नहीं है पर सभी असुर भी नहीं है।  अनियंत्रित व्यक्ति पर अंकुश के लिये ही राज्य व्यवस्था होती है।  राजधानी की इस घटना में राज्य व्यवस्था से प्रथक आर्थिक तथासामाजिक तत्व भी जिम्मेदार थे।  इस प्रकरण में पूरी बात पुलिस पर डालना भी ठीक नहीं लगता।  पुलिस तो व्यवस्था लागू करने वाली अंतिम संस्था है जबकि यह प्रकरण संपूर्ण व्यवस्था के अनेक भागों पर प्रश्न खड़ा करता है। उन पर किसी ने दृष्टिपात नहीं किया। यह प्रमाणित करता है कि अनाधिकार बोलने की छूट केवल मनोरंजन सामग्री बढ़ाने के लिये प्रचार माध्यमों पर मिल ही जाती है।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
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Monday, December 24, 2012

आदमी का दिल और दिमाग-हिन्दी कविता (admi ka dil aur dimag-hindi poem or kavita)

आदमी का दिल और दिमाग-हिन्दी कविता
समाज में चेतना अभियान
कहां से प्रारंभ करें
यहां कोई दुआ
कोई दवा
और कोई दारु के लिये बेकरार है,
अपने शब्दों से किसे  खुश करे
कोई रोटी
कोई कपड़ा
कोई छत पाने के लिये
जंग लड़ने को खड़ा तैयार है।
कहें दीपक बापू
अपनी समस्याओं पर सोचते हुए लोग रोते,
हर पल  चिंताओं में होते,
दिल उठा रहा है
लाचारियों का बोझ
दिमाग में बसा है वही इंसान
जो उनके मतलब का यार है।


हिन्दी साहित्य,समाज,मस्ती,मनोरंजन,hindi sahitya,society

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Sunday, December 2, 2012

भर्तृहरि नीति शतक-मौन रहने का गुण आभूषण की तरह (maun rahana abhushan ki tarah-bhritrihari neeti shatak)

               आदमी का मन  अपनी इंद्रियों के वश में है।  हाथ खाली है तो मन काम करने की सोचता है। पांव बैठे बैठे थक गये हों तो वह चलना चाहता है।  आंखे हमेशा कुछ देखना चाहती हैं। सबसे ज्यादा परेशान करती है
तो वह है मनुष्य की जीभ।  खाते खाते थक जाये तो बोलने के लिये उतावली हो उठती है। उस समय  न मन बुद्धि में विषय सोचता है न कोई उसे विषय सूझता है।  इसलिये चार लोगों में जो विषय उठ जाये उसी पर ही आदमी बोलने लगता है। टीवी पर या अखबार में कोई विषय बोलने के लिये ढूंढ लेता है। कहने का अभिप्राय यह है कि मनुष्य कोई अपना विषय नहीं चुनता बल्कि बाहर से कोई सूझाये तभी बोल पाता है।  ऐसे में आदमी बोलने के लिये बोलता है। जो मन में आये वह तत्कला बोलता है और बुद्धि से काम लेना उसके लिये तब संभव नहीं होता। यही कारण है कि हमारे समाज में सभी एक दूसरे को पीठ पीछ  मूर्ख कहते हैं।
          अगर कोई मौन होकर सामूहिक वार्तालापों में बैठे तो उसकी चिंतन ग्रंथियां जाग्रत हो उठती हैं।  ऐसे में वह अनुभव कर सकता है कि आजकल लोग निरर्थक विषयों पर चर्चा कर समय नष्ट करते हैं।  मौन होकर यही अनुभव किया जा सकता है कि किस तरह लोग अहंकार वश  आत्मप्रवंचना करने के साथ ही अपनी झूठी शक्ति का बखान करते हैं।  सभी मोह में फंसे हैं और दूसरे को भी  वैसे ही जाल में फंसाते हैं।
भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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स्वायत्तमेकांतगुणं विधात्रा विनिर्मितम् छादनज्ञतायाः।
विशेषतः सर्वविदं समाजे विभूषणं मौनपण्डितानाम्।।
           हिन्दी में भावार्थ-विधाता ने स्वतंत्र रहने के लिये एक गुण मौन रहने का सृजन विधाता ने किया है जिसका चाहे जब प्रयोग किया जा सकता है। खासतौर से जब विद्वान समाज में उपस्थित होने का अवसर मिल तब मौन रहने का गुण  एक तरह आभूषण का काम करता है। लोग समझते हैं कि यह भी ज्ञानी है।
अज्ञः सुखमाराध्य सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञः।
ज्ञानलावदुर्विदग्धं ब्रह्माऽप तं नरं न रञ्जयति।।
                हिन्दी में भावार्थ-अज्ञानियों के पास अगर थोड़ी बुद्धि हो तो उसे समझाया जा सकता है पर जिसके पास उसका लेशमात्र अंश भी नहीं है उसे समझाना ब्रह्मा के  बस का भी नहीं है।
               जिन लोगों के पास थोड़ी बहुत बुद्धि है पर ज्ञान नहीं तो उसे समझाया जा सकता है, पर जिन्होंने तय कर लिया है कि वह सबसे बड़े बुद्धिमान है उन्हें समझाना एकदम कठिन है। बुद्धिहीनता अहंकार को जन्म देती है।  उस आदमी के पास स्वार्थों से इतर विषयों में जिज्ञासा में कतई नहीं रहती।  यही बुद्धिहीनता  दैहिक और मानसिक व्याधियों का शिकार बनाती है, ऐसे में कोई मनुष्य अध्यात्मिक दर्शन की तरफ झांकने की सोच भी नहीं सकता।  अध्यात्मिक ज्ञान के बिना कोई मनुष्य जीवन में प्रसन्न नहीं रह सकता यह भी सच है।  मुश्किल यह है कि आदमी मौन नहीं रहना चाहता। वह हर बार अभिव्यक्त होने के लिये लालायित रहता है।  चुप बैठना मौन नहीं होता। मौन का मतलब है समस्त इंद्रियां निष्क्रिय हों और मनुष्य अपनी आत्मा से संपर्क रखे।  सरल दिखने वाला यह काम उन लोगों के लिये कठिन है जिनके पास बुद्धि नहीं है। ज्ञानियों के लिये एक सहज कार्य है,  जिनके पास बुद्धि है उनको कोई समझा भी सकता हैं पर जिनके मन में अहंकार, काम, क्रोध लोभ, लालच और प्रतिष्ठा पाने का मोह ही संसार का सबसे बड़ा विषय है उनसे ज्ञान चर्चा करना ही व्यर्थ है।   
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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Saturday, November 10, 2012

मरे आशिक का भूत-हिन्दी हास्य कविता (mare ashik ka bhoot-hindi hasya kavita)

चेले ने कहा उस्ताद से
‘‘महाराज,
केवल झाड़ फूंकने से अब काम नहीं चलने वाला,
कुछ नया करो वरना लग जायेगा आपकी दरबार में ताला,
आप भी अब फिल्मी हीरो की तरह
माशुका पटाने के नुस्खे बताना शुरु करें,
शायद नये युवा आपके नाम के साथ  शब्द गुरु भरें,
वरना यही सब थम जायेगा,
खालीपन का यहां गम आयेगा,
मेरा भी अब यहां मन नहीं लगता
छोड़ दूंगा आना जब वह उचट जायेगा।

सुनकर उस्ताद ने कहा
‘‘जाना है तो चला जा,
तू ही इश्क गुरु बन कर आ,
हमसे यह बेईमानी नहीं हो पायेगी,
इश्क तो मिल जाये पैसे के धोखे मे,ं
अपनी तबाही पर रोते  लोग
जब जिंदगी की सच्चाई दिखती अभाव के खोके में,
महंगाई का हाल यह है कि
सामान हो गये महंगे
आदमी सस्ता हो गया है,
आशिकी हो सकती है थोड़ी देर
जिंदगी का हाल खस्ता हो गया है,
जब तक किसी ने इश्क करने के तरीके पूछे
तभी तक ठीक है
हम फिल्म के हीरो नहीं
जिंदगी के फलासफे के उस्ताद है
किसी ने पूछा अगर गृहस्थी चलाने का तरीका
तब हमारे पास जवाब मुश्किल होगा,
कमबख्त,
जिस रास्ते से भाग कर
सर्वशक्तिमान का यह डेरा जमाया है
कुछ नहीं केवल उस्ताद का खिताब कमाया है
हम जानते हैं जो इश्क में हमने भोगा,
तू भी कर बंद आना कल से
वरना हमारे अंदर मरे आशिक का
भूत जाकर तेरी पीछे लग जायेगा।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Tuesday, October 2, 2012

तुम क्या सबक सिखाते हो-हिंदी कविता

बड़े बड़े शहर इतिहास में मिट गये,
कई बादशाह अपने कारनामों से पिट गये,
बहुत नामचीन और नामेवाले लोग हुए
अपने घमंड के साथ ही घिसटते रहे
फिर तुम क्यों इतना इतराते हो,
ओ, दौलत, शौहरत और ताकत वालों
अपनी कामयाबी पर नाज करने वालों
तन्ख्वाह देकर  कारिंदों को
खुद की तारीफ करना ही क्यों सिखलाते हो।
कहें दीपक बापू
आज तुम जहां खड़े हो
कल वहां कोई दूसरा खड़ा था,
जैसे तुम हो वैसे ही वह भी अड़ा था
अगर तुम न होते
तुम्हारी जगह कोई दूसरा होता
तुम क्यों अपने से जमाने को
सबक सीखना सिखलाते हो।
एक दिन तुम अपनी तारीफों से उकता जाओगे,
अपने खड़े किये अकेलेपन से डर जाओगे,
अपने महलों की रौशनी से
सभी की आंखों को कर दिया अंधा
अपने दिल का  खालीपन तब किसे दिखलाओगे।
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Tuesday, September 18, 2012

ज़माने के जज्बात-हिंदी कविता (zamane ke jazbat-hindi poem)

उनके चेहरे पर मुखौटा है
उसके पीछे कौन है,
जवाब में वह मौन है।
कहें दीपक बापू जिंदगी में
इतने मंजर हमने देखे हैं
बस चेहरे बदलते हैं
ज़माने का भला करने की
अदायें पुरानी दिखाते हुए सभी
पर्दे पर  टहलते है,
उनका जिस्म सजा है अपने आकाओं के
दान और चंदे  पर,
भर लिये सोने और चांदी से अपने घर,
क्या जाने ज़माने का वह दर्द,
जज्बात हो गये उनके सर्द,
क्यों जानेंगे
दरवाजे पर बीमार, बेकार और भूखा
आकर खड़ा कौन है?

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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Monday, September 10, 2012

हिंदी दिवस पर लेख -बीस हिन्दी ब्लॉग ने पच्चीस लाख पाठक/पाठ पठन संख्या पार की-हिन्दी संपादकीय (hindi diwas or divas par lekh-blog and it's vews-hindi editorial)


                  अंतर्जाल पर हिन्दी ब्लॉग लेखन एक तरह से थम गया है। इसका मुख्य कारण नयी पीढ़ी का फेसबुक की तरफ मुड़ जाना है। संवाद संप्रेक्षण की बृहद सीमा के बावजूद हिन्दी के ब्लॉग जगत में कोई ऐसी रचना पढ़ने को नहीं मिल रही जिससे याद रखा जा सके। समसामयिक विषयों पर भी वैसा ही पढ़ने को मिल रहा है जैसा कि परंपरागत प्रचार माध्यमों में-टीवी चैनल और पत्र पत्रिकाऐं-पढ़ने को मिल रहा है। दरअसल जब इस लेखक ने अपना लेखन ब्लॉग पर प्रारंभ किया था तब न तो सामने कोई लक्ष्य था न ही आशा। जिज्ञासावश प्रारंभ किये गये इस लेखन के दौरान समाज के पहले से ही मस्तिष्क में कल्पित रूप को सच में सामने देखा जिसे अपनी रचनाओं में भी व्यक्त किया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि अध्यात्मिक लेखन ने न केवल जीवन में परिपक्व बनाया बल्कि लक्ष्य की तरफ बढ़ने का संकल्प मजबूत करने के साथ ही अभिव्यक्ति को तीक्ष्ण बनाया। अब आंखें बंदकर कंप्यूटर पर उंगलियों से टंकण करते हैं तो देखने वाले लोग हैरान होकर पूछते हैं कि आखिर यह करते कैसे हो?
                प्रारंभ में इस हिन्दी ब्लॉग जगत में कुछ दोस्त बने थे। अंतर्जाल पर हिन्दी में ब्लॉग लेखन उस समय प्रारंभिक दौर में था। पहले लगा कि वह वास्तविक दुनियां हैं पर जल्द लगा कि यह केवल आभास भर था। मित्र एक था या दो या पांच, कहना कठिन है। यह संभव है कि एक मित्र हो और पांच रूप धरता हो। संभव है दो हों। एक बात तय रही कि कम से कम एक आदमी ऐसा है जो हम जैसा सोच रखता है। वह दो भी हो सकते हैं यह हम नहीं मानते। अद्वितीय हम हैं यह हम मानते हैं पर बुद्धिमान या अज्ञानी यह दूसरों के लिये विश्लेषण का विषय है। जीवन में लेखन प्रारंभ करते समय हमारे एक मित्र ने हमें बता दिया था कि तुम्हारा सोच अद्वितीय है और इसे अद्वितीय आदमी ही समझेगा। एक हमारे परिचित लेखक मित्र हैं वह भी ब्लॉग लेखन करते हैं और उनकी प्रवृत्तियां भी अद्वितीय श्रेणी की है। इसका मतलब यह कि कम से हम जैसे दो लोग हैं जो हमारी बात समझते हैं। अगर इस ब्लॉग लेख्न की बात की जाये तो हमारे लिये यही संतोष का विषय है कि हम जैसे विचार वाला एक आदमी तो यहां है।
              इधर हिन्दी दिवस आ रहा है। ब्लॉग लेखन अब हमारे लिये एकाकी यात्रा हो गयी है। हिन्दी लेखन में यह दुविधा है कि अगर आप अकेले होकर लिखते हैं तो प्रचार के प्रबंधन के अभाव में आपको कोई पूछता नहीं है और अगर प्रबंधन करने जाते हैं तो लिखने की धार खत्म हो ही जाती है। हिन्दी में ब्लॉग लेखन बेपरवाह होकर ही किया जा सकता है। शुरुआती दौर में हमें एक दो मित्र ऐसे मिले जिनसे यह अपेक्षा थी कि शायद वह लंबी लड़ाई के साथी हैं पर बाद में पता लगा कि वह प्रबंध कौशल दिखाते हुए हमें अपने साथियों की भीड़ में शािमल किये हुए थे। अब शायद भीड़ बढ़ गयी तो वह उनके अगुवा होकर प्रचार अभियान में इस तरह जुटे कि हमारा नाम तक उनको याद नहीं रहा है। हिन्दी लेखन की यह दूसरी दुविधा यह है कि वही लेखक बड़ा या महान कहलाता है जिसके चार छह लेखक शागिर्द हों। हम भी किसी के शागिर्द बन जाते पर चूंकि व्यवसायिक रूप से इसका कोई लाभ हमें मिलने की संभावना नहीं लगी तो बराबरी का व्यवहार करते रहे। अखबारों में कभी हमारा नाम ब्लॉगर के रूप में दर्ज नहीं हो्रता इसलिये हमारे पाठक कभी किसी समाचार पत्र या पत्रिका ब्लॉग से संबंधित सामग्री देखकर हमारा नाम न खोजें तो अच्छा ही है। उस दिन हमारे एक दोस्त ने हमसे पूछा कि ‘‘यार तुम अंतर्जाल पर हिन्दी भाषा में इतना सारा लिखते हो पर कोई सम्मान वगैरह की खबर नहीं आती।’’
          हमने उत्तर दिया कि-‘‘एक लेखक के रूप में तुम ही क्या सम्मान देते हो कि दूसरा देगा।’’
लिखते तो हम पहले भी थे पर मानना पड़ेगा कि अंतर्जाल पर लिखते हुए हम श्रद्धेय गणेश जी भगवान की ऐसी कृपा बरसती है कि एक बार लिखना प्रारंभ करते है तो फिर रुकते नही। रचना स्वतः प्रवाहित होकर आती है। कभी कभी पुराने ब्लॉग मित्रों की याद आती है पर लेखन व्यवसाय से जुड़े उन लोगों से यह आशा करना उनके साथ ज्यादती करना है कि वह हमारे साथ जुड़े रहें या कहीं हमारी चर्चा करें।
          फेसबुक पर नयी पीढ़ी सक्रिय है और ब्लॉग लेखन में उनकी रुचि नहीं है। फिर भी जो लोग ब्लॉग लिखना चाहते हैं वह मानकर चलें कि उनकी एकाकी यात्रा होगी। हिन्दी ब्लॉग लेखन में पूरी तरह से क्षेत्रीयता तथा जातीयता उसी तरह हावी है जिस तरह पुराने समय में थी। बड़े शहर या प्रतिष्ठित प्रदेश का निवासी होने का अहंकार यहां भी लेखकों में है। इस अहंकार की वजह से लिखने की बात हम नहीं जानते पर पढ़ना कई लोगों का बिगड़ गया। पहले उनको हमारी रचनाऐं दिखती थी पर अब हम उनके लिये लापता हो गये हैं। यह कोई शिकायत नहीं है। सच बात तो यह है कि इस एकाकीपन ने हमें बेपरवाह बना दिया है। हमारी पाठक संख्या लगातार बढ़ी है। साथ ही यह विश्वास भी बढ़ा है कि जब हम कोई गद्य रचना करेंगे तो लोग उसे पूरा पढ़े बिना छोड़ेंगे नहीं। इसका कारण यह कि श्रीमद्भागवत गीता के अध्ययन ने हमें ऐसा बना दिया है कि हमारी गद्य रचनाओं में आई सामग्री कही अन्यत्र मिल ही नहीं सकती। यह सब इसी अंतर्जाल पर श्रीगीता पर लिखते लिखते ही अनुभव हुआ है। फुरसत और समर्थन के अभाव में कभी कभी कुछ बेकार कवितायें लिखते हैं तो उनमें भी कुछ ऐसा होता है कि व्याकररण की दृष्टि से अक्षम होते हुए भी सामग्री अपने भाव के कारण लोकप्रिय हो जाती है।
         ग्वालियर एक छोटा शहर है तो मध्यप्रदेश एक ऐसा प्रदेश है जिसकी प्रतिभाओं को वहीं रहते स्वीकार नहीं किया जाता। बड़े शहर में जाकर बड़े हिन्दी व्यवसायिक प्रतिष्ठानों में कथित बड़े विद्वानों की चरणसेवा किये बिना राष्ट्रीय पटल पर स्थापित होना कठिन है पर अंतर्जाल पर हमें पढ़ने वाले पाठक जानते होंगे रचनायें हमेशा ही व्यापक दायरों में सोचने वाले लोगों के हाथ से होती है। कथित हिन्दी लेखक साम सामयिक विषयों में लिखकर आत्ममुग्ध होते हैं पर आम पाठक के लिये वह कोई स्मरणीय रचना नहीं लिख पाते। हमारे ब्लॉग पर ऐसी कई रचनायें हैं जो लोग पढ़कर आंदोलित या उत्तेजित होने की बजाय चिंत्तन में गोते लगाते हैं। बहरहाल यह बकवास हमने इसलिये कि हमारे बीस ब्लॉग कुल पच्चीस लाख की पाठक/पाठ पठन संख्या पार कर कर गये हैं। इस पर हम अपने पाठक तथा टिप्पणीकर्ताओं के आभारी है जिनके प्रोत्साहन की वजह से यह सब हुआ। अब चूंकि ब्लाग लेखक मित्रों से संपर्क बंद है इसलिये उनको इस बात के लिये धन्यवाद देना व्यर्थ है क्योंकि उनको तो यह मालुम भी नहीं होगा कि हमने ब्लॉग लिखना बंद नहीं किया भले ही अखबार वगैरह में हमारा नाम नहीं देते। जय श्री राम, जय श्री कृष्ण!
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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Wednesday, August 29, 2012

कसाब को सजा देना ही काफी नहीं-हिन्दी लेख (kasab ko saja dena kafi nahin-hindi lekh and article)

           मुंबई हमले में पकड़े गये एक अपराधी कसाब को फांसी की सजा सुप्रीम कोर्ट ने बहाल रखी है।  प्रचार माध्यमों में इसे प्रमुखता से इस तरह प्रचारित किया गया है जैसे कि इस कांड का असली अपराधी वह एक ही है।  एक बात तय है कि कसाब को मौत से कम सजा नहीं मिल सकती क्योंकि वह अपराध में प्रत्यक्ष  रूप् से शामिल है पर इसका एक दूसरा प़क्ष यह भी है कि वह इस अपराध मे एक अस्त्र शस्त्र के रूप में उपयोग लाया गया है।  जिन लोगों के हृदय में इस हमले को लेकर बहुत क्षोभ है उनके लिये कसाब को सजा देना एक मामूली बात है।  यह ऐसे ही जैसे कि किसी हत्या में प्रयुक्त चाकू, तलवार और पिस्तौल को जब्त कर लेना। जब्त हथियार किसी को फिर प्रयोग के लिये नहीं  देकर उसे नष्ट कर  दिया जाता।  कसाब की जिंदगी भी वापस नहीं होगी पर उसकी मौती की सजा किसी हथियार को नष्ट करने से अधिक नहीं है।
     एक प्राणहीन हथियार इंसान के निर्देश के अनुसार चलता है पर जिस इंसान की बुद्धि ही  हर ली जाये वह भी प्राणहीन हथियार की तरह अन्य व्यक्ति के इशारे पर  अपराध की राह पर चलता है। जिस तरह हम किसी हथियार को सजा न देकर उसे नष्ट करते हैं पर प्रयोग करने वाले इंसान को ही दंड देते हैं वैसे ही इस कांड कसाब को हथियार की तरह उपयोग करने वाले इंसानों का सजा दिये बिना इस कांड की सजा पूरी नहीं मानी जा सकती है।  जब किसी इंसान के हाथ के हथियार से किसी व्यक्ति की हत्या होती है तो हम यह नहीं कहते कि अमुक हथियार ने मारा है। तब उसका इस्तेमाल करने वाले इंसान को दंड देते हैं।  हथियार को नष्ट करते हैं यह अलग बात है।
       जब हम मुंबई के दर्दनाक हादसे को याद करते हैं तो कसाब प्रत्यक्ष रूप से दिखता है  पर उसे हथियार की तरह इस्तेमाल करने वाले लोग अभी भी पाकिस्तान में घूम रहे हैं।
        अस्त्र वह है जो आदमी अपने हाथ में पकड़कर कर इस्तेमाल करता है-जैसे तलवार, चाकू , गदा और त्रिशूल। उसी तरह शस्त्र वह है जो फैंककर उपयोग में लाया जाता है जैसे तीर, भाला या पत्थर।  तीरकमान और गोली अस्त्रों शस्त्रों का संयुक्त रूप है।  यहां कसाब शस्त्र का रूप है जिसे भारत में फैंका गया है कि ताकि निर्दोष  लोग मारे जायें।
      भारतीय प्रचार माध्यम हर छोटे बड़े विषय को अपने हल्के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण बनाकर उस पर चर्चा करते हैं।  उसमें शामिल विद्वानों  के विचार भी अत्यंत हल्के होते हैं। कसाब एक युवक है जो गरीब परिवार का है पर लालच लोभ तथा क्रूरता के कारण वह इस अपराध में शामिल हुआ। जिन लोगों ने उसे इस अपराध में शामिल किया उन्होंने उसे तमाम तरह के प्रलोभन देकर जीवन की सुरक्षा वादा कर इसमें शामिल किया।  कसाब ने जिनको मारा उनसे उसकी प्रत्यक्ष शत्रुता नहीं थी।  वह तो भारत पर हमले के लिये दुश्मनों का हथियार बना। हम इस हथियार को समाप्त कर यह मान रहे हैं कि भारी जीत मिल गयी तो मुंबई अपराध से नाखुश लोगों को हैरानी होती है।
        जिन लोगों के दिमाग में 1971 के भारत पाक युद्ध की स्मृतियां हैं उन्हें स्मरण होगा कि अनेक जगह पाकिस्तानी सेना के हाथ से भारतीय सेना ने जो हथियार छीने थे उनकी प्रदर्शनी हुई थी। चूंकि भारत ने उस युद्ध में पाकिस्तान को परास्त किया था इसलिये रुचि के साथ यह हथियार देखे गये।  कसाब की मौत तो ऐसे युद्ध का हथियार दिखाना भर होगी जो अभी जीता नहीं गया है। कुछ लोगों ने कसाब नाम का यह शस्त्र फैंककर हमारे निर्दोष लोगों को मारा है हम उसे नष्ट कर जीत का जश्न नहीं मना सकते।  जब मुंबई के गुनाहगारों के पाकिस्तान में खुलेआम घूमते देखते हैं तो कसाब जैसे शस्त्र को नष्ट करना एक मामूली बात नज़र आती है।  हमारा मानना है कि कसाब को जल्द से जल्द सजा देने के साथ ही पाकिस्तान से असली गुनाहगारों लेने का प्रयास करना चाहिए।  कसाब के साथ कानूनी रूप से कोई रियायत नहीं होना चाहिए।  उसे खाने पीने मेंवह सब भी नहीं देना चाहिए जो वह मांगता है।  वह शस्त्र है पर मनुष्य भी है।  उसकी बुद्धि हर ली गयी और उसने ऐसा होने दिया यह भी उसका अपराध है इसलिये उसे मानसिक प्रताड़ना देना भी बुरा नहीं है।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
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Monday, August 20, 2012

तोहफे का जाल-हिंदी कविता (tohfe ka jaal-hindi poem or kavita)



तोहफे देने वालों की
नीयत पर भला कौन शक करता है,
बंद हो जाते हैं अक्ल के दरवाजे
इंसान हाथ में लेते हुए आहें भरता है।
कहें दीपक बापू
आम आदमी के दिल से खेलने का
तरीका है तोहफे देना
जिसे पाने की करता है वह जद्दोजेहद
खोने की बात सोचने से भी डरता है।
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तोहफों का जाल बुनते हैं वह लोग
जिनके दिल मतलबी ओर तंग हैं,
कहें दीपक बापू
नीयत है जिनकी काली
बाहर दिखाते  वह तरह तरह के रंग हैं
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’’,
ग्वालियर, मध्यप्रदेश

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Tuesday, August 14, 2012

स्वतंत्रता दिवस मनायें-हिन्दी व्यंग्य कविता (swatantrata diwas manayen-hindi satire poem)


स्वतंत्रता दिवस का सच
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आओ, अपनी स्वतंत्रता दिवस का
जोरदार जश्न मनायें,
अपनी आदतों, जरूरतों और
जिम्मेदारियों के बंधन से
मुक्त रहने का अहसास पायें।
कहें दीपक बापू
भ्रमों के साथ  रहती हो  जिंदगी
हकीकतों पर भी शक होने लगता है,
कड़वे सच के सोच से डर बढ़ता है,
हाथ पांव बंधे हैं रिवाजों की जंजीर में
जुबान उधार के शब्द बोलती है,
सभी दिन दूसरों के सामने झूठ को सच
और सच को झूठ बताते हैं,
एक दिन अपने को भी बतायें। 
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लेखक एवं कवि- दीपक राज कुकरेजा,ग्वालियर

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लेखक एवं कवि- दीपक राज कुकरेजा,ग्वालियर


Wednesday, August 8, 2012

ख्वाब पत्थरों के बीच सो गया है-हिन्दी कविता (khwab pattharon ke beech so gaya hai-hindi kavita

अपने दर्द और खुशी पर
लिखने का मन अब नहीं करता है,
संवेदनहीन इंसानों से अपने
अंदर की बात कहने से
अब दिल नहीं भरता है,
सामानों की भीड़ में
दोस्त का नाता खो गया है।
बाज़ार में ढूंढ रहा है नयापन
पुराने रिश्तों से हर कोई बोर हो गया है।
कहें दीपक बापू
ताजगी के अहसास
अब महफिलों में नहीं आते,
अंतर्मन को छू लें
वह सुर कान में नहीं आते,
क्या करेंगे आजकल के लोग तरक्की
जिनका ख्वाब पत्थरों के बीच सो गया है।
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Thursday, July 26, 2012

अन्ना हजारे के आंदोलन की छवि कमजोर होने के बुरे संकेत-हिन्दी लेख(new post on anna hazare's movement against corruption-new article and post)

                    अन्ना हजारे की टीम ने एक बार फिर जनलोकपाल बनाने के लिये अपना आंदोलन प्रारंभ कर दिया है।  अगर जरूरत पड़ी  और स्वास्थ्य न ेसाथ दिया तो अन्ना हजारे स्वयं भी अनशन पर बैठ सकते हैं।  अगर मगर किन्तु परंतु और यह वह के चक्कर में अन्ना हजारे जी का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन अपनी उज्जवल छवि खो चुका है इसका पता तो इसके पा्ररंभ होने के एक दिन पहले ही इंटरनेट पर उन लोगों को चल गया होगा जो लेखन और रचनाओं के माध्यम से ब्लाग लिखने के साथ ही उसे पढ़ने वालों का मार्ग भी देखते हैं।  सर्च इंजिनों में इस आंदोलन के लिये खोज कम हुई है यह हम बड़े सादगी से लिख रहे हैं हकीकत यह है कि लोगों की रुचि इसमें खत्म हो गयी लगती है।  कुछ लोग यह कहें कि पूरे भारत की जनता इंटरनेट से जुड़ी नहीं है इसलिये इस आधार इस आंदोलन की लोकप्रियता कम होने की बात ठीक नहीं है पर हमारा अनुभव यह कहता है कि जब प्रचार माध्यमों में इस आंदोलनों का जोर था तब इंटरनेट पर भी इसकी खोज जमकर हो रही थी।  कहने का अभिप्राय यह है कि समाज की रुचियों में समानता होती है यह अलग बात है कि लोग अपने अपने स्तर के अनुसार साधनों का चयन कर समान विषयों से जुड़ते हैं।

            आखिर यह सब कैसे हो गया? इस आंदोलन से भले ही कुछ चेहरे चमके हों, अनेक लोगों को बौद्धिक विलास का सामग्री मिली हो तथा इसके समाचारों के साथ ही बहसें प्रसारित कर समाचार चैनलों ने भले ही विज्ञापनों के लिये जमकर समय का इस्तेमाल किया हो पर इसका परिणाम वहीं का वहीं है जहां से यह प्रारंभ हुआ था। अगर हम परिणामों को आंकड़ों में नापें तो सामने शून्य ही आता है।

          अन्ना हजारे के साथ जुड़े संगठनो के कर्णधारों ने उनके चेहरे का खूब उपयोग किया पर यह साफ दिखाई दिया कि कहीं न कहीं उनके लक्ष्य अस्पष्ट थे।  साफ बात यह है कि अन्ना और उनकी टीम आज भी दो अलग भाग दिखाई देते हैं।  अन्ना अकेले हैं पर उनके साथ जुड़े अन्य लोग अपने संगठन उनके पीछे लाकर स्वयं के  चेहरे चमकाने के अलावा कुछ नहीं कर पाये। जब यह अंादोलन अपने स्वर्णिम दौर  में था तब लोगों की भावनायें उच्च स्तर पर उसके साथ जुड़ी थीं।  उन भावनाओं से विभोर होकर आंदोलन के कर्णधार अनेक  तरह के ऐसे बयान देने लगे थे जिससे आंदोलन के लक्ष्य तथा विचार अस्पष्ट दिखाई देने लगे  थे।  उनके शब्दों में उत्साह  अधिक पर  गंभीर तथा स्पटतः विचारों का अभाव दिखाई देने लगा था।  उनकी कोई स्पष्ट योजना नही थी न ही  भविष्य के स्परूप की कोई कल्पना थी।  खाली बयानबाजी तथा अस्पष्ट वादों के बीच यह आंदोलन लंबे समय तक लोकप्रिय नहीं बना रह सका।
              अब सब थम चुका है।  हमारा मानना है कि अन्ना अब शायद ही स्वयं अनशन पर बैठें क्योंकि वह हवा का रुख देखकर अपनी चाल चलने वाली ऐसी शख्सियत हैं जो अपने इसी गुण की वजह से लोकप्रिय हैं।  प्रचार माध्यम अन्ना हजारे के आंदोलन को फ्लाप शो कर रहे हैं तो यह बात मानना ही पड़ती है।  यकीनन अन्ना यह सब भांपने में माहिर हैं और वह अपने कदम उस तरह आगे न बढ़ायें जैसे कि उनकी टीम अपेक्षा कर रही है। इतना अनुमान तो प्रचार प्रबंधको ने लगा ही लिया होगा कि इस बार यह आंदोलन अब उनके लिये विज्ञापन प्रसारित करने का इतना समय नहीं दिला सकता।  अगर हम वर्तमान समय में लोकप्रियता का आधार तय करें तो वह केवल यही है कि किसी शख्सियत की लोकप्रियता उतनी ही होती है जितनी वह प्रचार  माध्यमों को विज्ञापन के बीच प्रसारित खाली समय में अपनी जगह बना सके।  अन्ना समाचारों में तो हैं पर विज्ञापनों के लिये समय जुटाने का सामर्थ्य उनके आंदोलन में अब उतना नहीं है।  यही कारण है कि प्रचार माध्यम अब शायद इस आंदोलन के लिये वैसे काम न करें जैसे कि पहले करते रहे थे।  9 अगस्त से बाबा रामदेव भी अपना आंदोलन चलाने वाले हैं। वह इस समय देश में लगातार इसका प्रचार कर रहे हैं।  उनके इस आंदोलन की स्थिति पर भी लिखेंगे पर पहले अवलोकन करें।
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Monday, April 2, 2012

पहले अपने को सिखायें-हिन्दी कविता (pahale ko sikhayen-hindi kaivta or poem)

आओ
जो भटके हैं उनको रास्ता दिखायें,
ऊंचे इंसानों में अपना नाम लिखायें
यकीन करो
कोई हमारी बात मानेगा नहीं
जिद्दी है जमाना
डूब जायेगा हर कोई अपनी
मतलब परस्ती के कीचड़ में
पर कोई समझना नहीं चाहेगा
जिंदगी जीना उसूलों के साथ सरल है
अलबत्ता साफ नीयत जरूरी है
यह हम अपने को सिखायें।
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