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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

Tuesday, October 2, 2012

तुम क्या सबक सिखाते हो-हिंदी कविता

बड़े बड़े शहर इतिहास में मिट गये,
कई बादशाह अपने कारनामों से पिट गये,
बहुत नामचीन और नामेवाले लोग हुए
अपने घमंड के साथ ही घिसटते रहे
फिर तुम क्यों इतना इतराते हो,
ओ, दौलत, शौहरत और ताकत वालों
अपनी कामयाबी पर नाज करने वालों
तन्ख्वाह देकर  कारिंदों को
खुद की तारीफ करना ही क्यों सिखलाते हो।
कहें दीपक बापू
आज तुम जहां खड़े हो
कल वहां कोई दूसरा खड़ा था,
जैसे तुम हो वैसे ही वह भी अड़ा था
अगर तुम न होते
तुम्हारी जगह कोई दूसरा होता
तुम क्यों अपने से जमाने को
सबक सीखना सिखलाते हो।
एक दिन तुम अपनी तारीफों से उकता जाओगे,
अपने खड़े किये अकेलेपन से डर जाओगे,
अपने महलों की रौशनी से
सभी की आंखों को कर दिया अंधा
अपने दिल का  खालीपन तब किसे दिखलाओगे।
--------------
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com
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यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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Tuesday, September 18, 2012

ज़माने के जज्बात-हिंदी कविता (zamane ke jazbat-hindi poem)

उनके चेहरे पर मुखौटा है
उसके पीछे कौन है,
जवाब में वह मौन है।
कहें दीपक बापू जिंदगी में
इतने मंजर हमने देखे हैं
बस चेहरे बदलते हैं
ज़माने का भला करने की
अदायें पुरानी दिखाते हुए सभी
पर्दे पर  टहलते है,
उनका जिस्म सजा है अपने आकाओं के
दान और चंदे  पर,
भर लिये सोने और चांदी से अपने घर,
क्या जाने ज़माने का वह दर्द,
जज्बात हो गये उनके सर्द,
क्यों जानेंगे
दरवाजे पर बीमार, बेकार और भूखा
आकर खड़ा कौन है?

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh
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Monday, September 10, 2012

हिंदी दिवस पर लेख -बीस हिन्दी ब्लॉग ने पच्चीस लाख पाठक/पाठ पठन संख्या पार की-हिन्दी संपादकीय (hindi diwas or divas par lekh-blog and it's vews-hindi editorial)


                  अंतर्जाल पर हिन्दी ब्लॉग लेखन एक तरह से थम गया है। इसका मुख्य कारण नयी पीढ़ी का फेसबुक की तरफ मुड़ जाना है। संवाद संप्रेक्षण की बृहद सीमा के बावजूद हिन्दी के ब्लॉग जगत में कोई ऐसी रचना पढ़ने को नहीं मिल रही जिससे याद रखा जा सके। समसामयिक विषयों पर भी वैसा ही पढ़ने को मिल रहा है जैसा कि परंपरागत प्रचार माध्यमों में-टीवी चैनल और पत्र पत्रिकाऐं-पढ़ने को मिल रहा है। दरअसल जब इस लेखक ने अपना लेखन ब्लॉग पर प्रारंभ किया था तब न तो सामने कोई लक्ष्य था न ही आशा। जिज्ञासावश प्रारंभ किये गये इस लेखन के दौरान समाज के पहले से ही मस्तिष्क में कल्पित रूप को सच में सामने देखा जिसे अपनी रचनाओं में भी व्यक्त किया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि अध्यात्मिक लेखन ने न केवल जीवन में परिपक्व बनाया बल्कि लक्ष्य की तरफ बढ़ने का संकल्प मजबूत करने के साथ ही अभिव्यक्ति को तीक्ष्ण बनाया। अब आंखें बंदकर कंप्यूटर पर उंगलियों से टंकण करते हैं तो देखने वाले लोग हैरान होकर पूछते हैं कि आखिर यह करते कैसे हो?
                प्रारंभ में इस हिन्दी ब्लॉग जगत में कुछ दोस्त बने थे। अंतर्जाल पर हिन्दी में ब्लॉग लेखन उस समय प्रारंभिक दौर में था। पहले लगा कि वह वास्तविक दुनियां हैं पर जल्द लगा कि यह केवल आभास भर था। मित्र एक था या दो या पांच, कहना कठिन है। यह संभव है कि एक मित्र हो और पांच रूप धरता हो। संभव है दो हों। एक बात तय रही कि कम से कम एक आदमी ऐसा है जो हम जैसा सोच रखता है। वह दो भी हो सकते हैं यह हम नहीं मानते। अद्वितीय हम हैं यह हम मानते हैं पर बुद्धिमान या अज्ञानी यह दूसरों के लिये विश्लेषण का विषय है। जीवन में लेखन प्रारंभ करते समय हमारे एक मित्र ने हमें बता दिया था कि तुम्हारा सोच अद्वितीय है और इसे अद्वितीय आदमी ही समझेगा। एक हमारे परिचित लेखक मित्र हैं वह भी ब्लॉग लेखन करते हैं और उनकी प्रवृत्तियां भी अद्वितीय श्रेणी की है। इसका मतलब यह कि कम से हम जैसे दो लोग हैं जो हमारी बात समझते हैं। अगर इस ब्लॉग लेख्न की बात की जाये तो हमारे लिये यही संतोष का विषय है कि हम जैसे विचार वाला एक आदमी तो यहां है।
              इधर हिन्दी दिवस आ रहा है। ब्लॉग लेखन अब हमारे लिये एकाकी यात्रा हो गयी है। हिन्दी लेखन में यह दुविधा है कि अगर आप अकेले होकर लिखते हैं तो प्रचार के प्रबंधन के अभाव में आपको कोई पूछता नहीं है और अगर प्रबंधन करने जाते हैं तो लिखने की धार खत्म हो ही जाती है। हिन्दी में ब्लॉग लेखन बेपरवाह होकर ही किया जा सकता है। शुरुआती दौर में हमें एक दो मित्र ऐसे मिले जिनसे यह अपेक्षा थी कि शायद वह लंबी लड़ाई के साथी हैं पर बाद में पता लगा कि वह प्रबंध कौशल दिखाते हुए हमें अपने साथियों की भीड़ में शािमल किये हुए थे। अब शायद भीड़ बढ़ गयी तो वह उनके अगुवा होकर प्रचार अभियान में इस तरह जुटे कि हमारा नाम तक उनको याद नहीं रहा है। हिन्दी लेखन की यह दूसरी दुविधा यह है कि वही लेखक बड़ा या महान कहलाता है जिसके चार छह लेखक शागिर्द हों। हम भी किसी के शागिर्द बन जाते पर चूंकि व्यवसायिक रूप से इसका कोई लाभ हमें मिलने की संभावना नहीं लगी तो बराबरी का व्यवहार करते रहे। अखबारों में कभी हमारा नाम ब्लॉगर के रूप में दर्ज नहीं हो्रता इसलिये हमारे पाठक कभी किसी समाचार पत्र या पत्रिका ब्लॉग से संबंधित सामग्री देखकर हमारा नाम न खोजें तो अच्छा ही है। उस दिन हमारे एक दोस्त ने हमसे पूछा कि ‘‘यार तुम अंतर्जाल पर हिन्दी भाषा में इतना सारा लिखते हो पर कोई सम्मान वगैरह की खबर नहीं आती।’’
          हमने उत्तर दिया कि-‘‘एक लेखक के रूप में तुम ही क्या सम्मान देते हो कि दूसरा देगा।’’
लिखते तो हम पहले भी थे पर मानना पड़ेगा कि अंतर्जाल पर लिखते हुए हम श्रद्धेय गणेश जी भगवान की ऐसी कृपा बरसती है कि एक बार लिखना प्रारंभ करते है तो फिर रुकते नही। रचना स्वतः प्रवाहित होकर आती है। कभी कभी पुराने ब्लॉग मित्रों की याद आती है पर लेखन व्यवसाय से जुड़े उन लोगों से यह आशा करना उनके साथ ज्यादती करना है कि वह हमारे साथ जुड़े रहें या कहीं हमारी चर्चा करें।
          फेसबुक पर नयी पीढ़ी सक्रिय है और ब्लॉग लेखन में उनकी रुचि नहीं है। फिर भी जो लोग ब्लॉग लिखना चाहते हैं वह मानकर चलें कि उनकी एकाकी यात्रा होगी। हिन्दी ब्लॉग लेखन में पूरी तरह से क्षेत्रीयता तथा जातीयता उसी तरह हावी है जिस तरह पुराने समय में थी। बड़े शहर या प्रतिष्ठित प्रदेश का निवासी होने का अहंकार यहां भी लेखकों में है। इस अहंकार की वजह से लिखने की बात हम नहीं जानते पर पढ़ना कई लोगों का बिगड़ गया। पहले उनको हमारी रचनाऐं दिखती थी पर अब हम उनके लिये लापता हो गये हैं। यह कोई शिकायत नहीं है। सच बात तो यह है कि इस एकाकीपन ने हमें बेपरवाह बना दिया है। हमारी पाठक संख्या लगातार बढ़ी है। साथ ही यह विश्वास भी बढ़ा है कि जब हम कोई गद्य रचना करेंगे तो लोग उसे पूरा पढ़े बिना छोड़ेंगे नहीं। इसका कारण यह कि श्रीमद्भागवत गीता के अध्ययन ने हमें ऐसा बना दिया है कि हमारी गद्य रचनाओं में आई सामग्री कही अन्यत्र मिल ही नहीं सकती। यह सब इसी अंतर्जाल पर श्रीगीता पर लिखते लिखते ही अनुभव हुआ है। फुरसत और समर्थन के अभाव में कभी कभी कुछ बेकार कवितायें लिखते हैं तो उनमें भी कुछ ऐसा होता है कि व्याकररण की दृष्टि से अक्षम होते हुए भी सामग्री अपने भाव के कारण लोकप्रिय हो जाती है।
         ग्वालियर एक छोटा शहर है तो मध्यप्रदेश एक ऐसा प्रदेश है जिसकी प्रतिभाओं को वहीं रहते स्वीकार नहीं किया जाता। बड़े शहर में जाकर बड़े हिन्दी व्यवसायिक प्रतिष्ठानों में कथित बड़े विद्वानों की चरणसेवा किये बिना राष्ट्रीय पटल पर स्थापित होना कठिन है पर अंतर्जाल पर हमें पढ़ने वाले पाठक जानते होंगे रचनायें हमेशा ही व्यापक दायरों में सोचने वाले लोगों के हाथ से होती है। कथित हिन्दी लेखक साम सामयिक विषयों में लिखकर आत्ममुग्ध होते हैं पर आम पाठक के लिये वह कोई स्मरणीय रचना नहीं लिख पाते। हमारे ब्लॉग पर ऐसी कई रचनायें हैं जो लोग पढ़कर आंदोलित या उत्तेजित होने की बजाय चिंत्तन में गोते लगाते हैं। बहरहाल यह बकवास हमने इसलिये कि हमारे बीस ब्लॉग कुल पच्चीस लाख की पाठक/पाठ पठन संख्या पार कर कर गये हैं। इस पर हम अपने पाठक तथा टिप्पणीकर्ताओं के आभारी है जिनके प्रोत्साहन की वजह से यह सब हुआ। अब चूंकि ब्लाग लेखक मित्रों से संपर्क बंद है इसलिये उनको इस बात के लिये धन्यवाद देना व्यर्थ है क्योंकि उनको तो यह मालुम भी नहीं होगा कि हमने ब्लॉग लिखना बंद नहीं किया भले ही अखबार वगैरह में हमारा नाम नहीं देते। जय श्री राम, जय श्री कृष्ण!
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
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Wednesday, August 29, 2012

कसाब को सजा देना ही काफी नहीं-हिन्दी लेख (kasab ko saja dena kafi nahin-hindi lekh and article)

           मुंबई हमले में पकड़े गये एक अपराधी कसाब को फांसी की सजा सुप्रीम कोर्ट ने बहाल रखी है।  प्रचार माध्यमों में इसे प्रमुखता से इस तरह प्रचारित किया गया है जैसे कि इस कांड का असली अपराधी वह एक ही है।  एक बात तय है कि कसाब को मौत से कम सजा नहीं मिल सकती क्योंकि वह अपराध में प्रत्यक्ष  रूप् से शामिल है पर इसका एक दूसरा प़क्ष यह भी है कि वह इस अपराध मे एक अस्त्र शस्त्र के रूप में उपयोग लाया गया है।  जिन लोगों के हृदय में इस हमले को लेकर बहुत क्षोभ है उनके लिये कसाब को सजा देना एक मामूली बात है।  यह ऐसे ही जैसे कि किसी हत्या में प्रयुक्त चाकू, तलवार और पिस्तौल को जब्त कर लेना। जब्त हथियार किसी को फिर प्रयोग के लिये नहीं  देकर उसे नष्ट कर  दिया जाता।  कसाब की जिंदगी भी वापस नहीं होगी पर उसकी मौती की सजा किसी हथियार को नष्ट करने से अधिक नहीं है।
     एक प्राणहीन हथियार इंसान के निर्देश के अनुसार चलता है पर जिस इंसान की बुद्धि ही  हर ली जाये वह भी प्राणहीन हथियार की तरह अन्य व्यक्ति के इशारे पर  अपराध की राह पर चलता है। जिस तरह हम किसी हथियार को सजा न देकर उसे नष्ट करते हैं पर प्रयोग करने वाले इंसान को ही दंड देते हैं वैसे ही इस कांड कसाब को हथियार की तरह उपयोग करने वाले इंसानों का सजा दिये बिना इस कांड की सजा पूरी नहीं मानी जा सकती है।  जब किसी इंसान के हाथ के हथियार से किसी व्यक्ति की हत्या होती है तो हम यह नहीं कहते कि अमुक हथियार ने मारा है। तब उसका इस्तेमाल करने वाले इंसान को दंड देते हैं।  हथियार को नष्ट करते हैं यह अलग बात है।
       जब हम मुंबई के दर्दनाक हादसे को याद करते हैं तो कसाब प्रत्यक्ष रूप से दिखता है  पर उसे हथियार की तरह इस्तेमाल करने वाले लोग अभी भी पाकिस्तान में घूम रहे हैं।
        अस्त्र वह है जो आदमी अपने हाथ में पकड़कर कर इस्तेमाल करता है-जैसे तलवार, चाकू , गदा और त्रिशूल। उसी तरह शस्त्र वह है जो फैंककर उपयोग में लाया जाता है जैसे तीर, भाला या पत्थर।  तीरकमान और गोली अस्त्रों शस्त्रों का संयुक्त रूप है।  यहां कसाब शस्त्र का रूप है जिसे भारत में फैंका गया है कि ताकि निर्दोष  लोग मारे जायें।
      भारतीय प्रचार माध्यम हर छोटे बड़े विषय को अपने हल्के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण बनाकर उस पर चर्चा करते हैं।  उसमें शामिल विद्वानों  के विचार भी अत्यंत हल्के होते हैं। कसाब एक युवक है जो गरीब परिवार का है पर लालच लोभ तथा क्रूरता के कारण वह इस अपराध में शामिल हुआ। जिन लोगों ने उसे इस अपराध में शामिल किया उन्होंने उसे तमाम तरह के प्रलोभन देकर जीवन की सुरक्षा वादा कर इसमें शामिल किया।  कसाब ने जिनको मारा उनसे उसकी प्रत्यक्ष शत्रुता नहीं थी।  वह तो भारत पर हमले के लिये दुश्मनों का हथियार बना। हम इस हथियार को समाप्त कर यह मान रहे हैं कि भारी जीत मिल गयी तो मुंबई अपराध से नाखुश लोगों को हैरानी होती है।
        जिन लोगों के दिमाग में 1971 के भारत पाक युद्ध की स्मृतियां हैं उन्हें स्मरण होगा कि अनेक जगह पाकिस्तानी सेना के हाथ से भारतीय सेना ने जो हथियार छीने थे उनकी प्रदर्शनी हुई थी। चूंकि भारत ने उस युद्ध में पाकिस्तान को परास्त किया था इसलिये रुचि के साथ यह हथियार देखे गये।  कसाब की मौत तो ऐसे युद्ध का हथियार दिखाना भर होगी जो अभी जीता नहीं गया है। कुछ लोगों ने कसाब नाम का यह शस्त्र फैंककर हमारे निर्दोष लोगों को मारा है हम उसे नष्ट कर जीत का जश्न नहीं मना सकते।  जब मुंबई के गुनाहगारों के पाकिस्तान में खुलेआम घूमते देखते हैं तो कसाब जैसे शस्त्र को नष्ट करना एक मामूली बात नज़र आती है।  हमारा मानना है कि कसाब को जल्द से जल्द सजा देने के साथ ही पाकिस्तान से असली गुनाहगारों लेने का प्रयास करना चाहिए।  कसाब के साथ कानूनी रूप से कोई रियायत नहीं होना चाहिए।  उसे खाने पीने मेंवह सब भी नहीं देना चाहिए जो वह मांगता है।  वह शस्त्र है पर मनुष्य भी है।  उसकी बुद्धि हर ली गयी और उसने ऐसा होने दिया यह भी उसका अपराध है इसलिये उसे मानसिक प्रताड़ना देना भी बुरा नहीं है।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja ""Bharatdeep""
Gwalior, madhyapradesh

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Monday, August 20, 2012

तोहफे का जाल-हिंदी कविता (tohfe ka jaal-hindi poem or kavita)



तोहफे देने वालों की
नीयत पर भला कौन शक करता है,
बंद हो जाते हैं अक्ल के दरवाजे
इंसान हाथ में लेते हुए आहें भरता है।
कहें दीपक बापू
आम आदमी के दिल से खेलने का
तरीका है तोहफे देना
जिसे पाने की करता है वह जद्दोजेहद
खोने की बात सोचने से भी डरता है।
--------
तोहफों का जाल बुनते हैं वह लोग
जिनके दिल मतलबी ओर तंग हैं,
कहें दीपक बापू
नीयत है जिनकी काली
बाहर दिखाते  वह तरह तरह के रंग हैं
------------------
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’’,
ग्वालियर, मध्यप्रदेश

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Tuesday, August 14, 2012

स्वतंत्रता दिवस मनायें-हिन्दी व्यंग्य कविता (swatantrata diwas manayen-hindi satire poem)


स्वतंत्रता दिवस का सच
---------
आओ, अपनी स्वतंत्रता दिवस का
जोरदार जश्न मनायें,
अपनी आदतों, जरूरतों और
जिम्मेदारियों के बंधन से
मुक्त रहने का अहसास पायें।
कहें दीपक बापू
भ्रमों के साथ  रहती हो  जिंदगी
हकीकतों पर भी शक होने लगता है,
कड़वे सच के सोच से डर बढ़ता है,
हाथ पांव बंधे हैं रिवाजों की जंजीर में
जुबान उधार के शब्द बोलती है,
सभी दिन दूसरों के सामने झूठ को सच
और सच को झूठ बताते हैं,
एक दिन अपने को भी बतायें। 
-------------
लेखक एवं कवि- दीपक राज कुकरेजा,ग्वालियर

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हिन्दी साहित्य,समाज,मस्ती,मनोरंजन
लेखक एवं कवि- दीपक राज कुकरेजा,ग्वालियर


Wednesday, August 8, 2012

ख्वाब पत्थरों के बीच सो गया है-हिन्दी कविता (khwab pattharon ke beech so gaya hai-hindi kavita

अपने दर्द और खुशी पर
लिखने का मन अब नहीं करता है,
संवेदनहीन इंसानों से अपने
अंदर की बात कहने से
अब दिल नहीं भरता है,
सामानों की भीड़ में
दोस्त का नाता खो गया है।
बाज़ार में ढूंढ रहा है नयापन
पुराने रिश्तों से हर कोई बोर हो गया है।
कहें दीपक बापू
ताजगी के अहसास
अब महफिलों में नहीं आते,
अंतर्मन को छू लें
वह सुर कान में नहीं आते,
क्या करेंगे आजकल के लोग तरक्की
जिनका ख्वाब पत्थरों के बीच सो गया है।
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कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Thursday, July 26, 2012

अन्ना हजारे के आंदोलन की छवि कमजोर होने के बुरे संकेत-हिन्दी लेख(new post on anna hazare's movement against corruption-new article and post)

                    अन्ना हजारे की टीम ने एक बार फिर जनलोकपाल बनाने के लिये अपना आंदोलन प्रारंभ कर दिया है।  अगर जरूरत पड़ी  और स्वास्थ्य न ेसाथ दिया तो अन्ना हजारे स्वयं भी अनशन पर बैठ सकते हैं।  अगर मगर किन्तु परंतु और यह वह के चक्कर में अन्ना हजारे जी का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन अपनी उज्जवल छवि खो चुका है इसका पता तो इसके पा्ररंभ होने के एक दिन पहले ही इंटरनेट पर उन लोगों को चल गया होगा जो लेखन और रचनाओं के माध्यम से ब्लाग लिखने के साथ ही उसे पढ़ने वालों का मार्ग भी देखते हैं।  सर्च इंजिनों में इस आंदोलन के लिये खोज कम हुई है यह हम बड़े सादगी से लिख रहे हैं हकीकत यह है कि लोगों की रुचि इसमें खत्म हो गयी लगती है।  कुछ लोग यह कहें कि पूरे भारत की जनता इंटरनेट से जुड़ी नहीं है इसलिये इस आधार इस आंदोलन की लोकप्रियता कम होने की बात ठीक नहीं है पर हमारा अनुभव यह कहता है कि जब प्रचार माध्यमों में इस आंदोलनों का जोर था तब इंटरनेट पर भी इसकी खोज जमकर हो रही थी।  कहने का अभिप्राय यह है कि समाज की रुचियों में समानता होती है यह अलग बात है कि लोग अपने अपने स्तर के अनुसार साधनों का चयन कर समान विषयों से जुड़ते हैं।

            आखिर यह सब कैसे हो गया? इस आंदोलन से भले ही कुछ चेहरे चमके हों, अनेक लोगों को बौद्धिक विलास का सामग्री मिली हो तथा इसके समाचारों के साथ ही बहसें प्रसारित कर समाचार चैनलों ने भले ही विज्ञापनों के लिये जमकर समय का इस्तेमाल किया हो पर इसका परिणाम वहीं का वहीं है जहां से यह प्रारंभ हुआ था। अगर हम परिणामों को आंकड़ों में नापें तो सामने शून्य ही आता है।

          अन्ना हजारे के साथ जुड़े संगठनो के कर्णधारों ने उनके चेहरे का खूब उपयोग किया पर यह साफ दिखाई दिया कि कहीं न कहीं उनके लक्ष्य अस्पष्ट थे।  साफ बात यह है कि अन्ना और उनकी टीम आज भी दो अलग भाग दिखाई देते हैं।  अन्ना अकेले हैं पर उनके साथ जुड़े अन्य लोग अपने संगठन उनके पीछे लाकर स्वयं के  चेहरे चमकाने के अलावा कुछ नहीं कर पाये। जब यह अंादोलन अपने स्वर्णिम दौर  में था तब लोगों की भावनायें उच्च स्तर पर उसके साथ जुड़ी थीं।  उन भावनाओं से विभोर होकर आंदोलन के कर्णधार अनेक  तरह के ऐसे बयान देने लगे थे जिससे आंदोलन के लक्ष्य तथा विचार अस्पष्ट दिखाई देने लगे  थे।  उनके शब्दों में उत्साह  अधिक पर  गंभीर तथा स्पटतः विचारों का अभाव दिखाई देने लगा था।  उनकी कोई स्पष्ट योजना नही थी न ही  भविष्य के स्परूप की कोई कल्पना थी।  खाली बयानबाजी तथा अस्पष्ट वादों के बीच यह आंदोलन लंबे समय तक लोकप्रिय नहीं बना रह सका।
              अब सब थम चुका है।  हमारा मानना है कि अन्ना अब शायद ही स्वयं अनशन पर बैठें क्योंकि वह हवा का रुख देखकर अपनी चाल चलने वाली ऐसी शख्सियत हैं जो अपने इसी गुण की वजह से लोकप्रिय हैं।  प्रचार माध्यम अन्ना हजारे के आंदोलन को फ्लाप शो कर रहे हैं तो यह बात मानना ही पड़ती है।  यकीनन अन्ना यह सब भांपने में माहिर हैं और वह अपने कदम उस तरह आगे न बढ़ायें जैसे कि उनकी टीम अपेक्षा कर रही है। इतना अनुमान तो प्रचार प्रबंधको ने लगा ही लिया होगा कि इस बार यह आंदोलन अब उनके लिये विज्ञापन प्रसारित करने का इतना समय नहीं दिला सकता।  अगर हम वर्तमान समय में लोकप्रियता का आधार तय करें तो वह केवल यही है कि किसी शख्सियत की लोकप्रियता उतनी ही होती है जितनी वह प्रचार  माध्यमों को विज्ञापन के बीच प्रसारित खाली समय में अपनी जगह बना सके।  अन्ना समाचारों में तो हैं पर विज्ञापनों के लिये समय जुटाने का सामर्थ्य उनके आंदोलन में अब उतना नहीं है।  यही कारण है कि प्रचार माध्यम अब शायद इस आंदोलन के लिये वैसे काम न करें जैसे कि पहले करते रहे थे।  9 अगस्त से बाबा रामदेव भी अपना आंदोलन चलाने वाले हैं। वह इस समय देश में लगातार इसका प्रचार कर रहे हैं।  उनके इस आंदोलन की स्थिति पर भी लिखेंगे पर पहले अवलोकन करें।
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Monday, April 2, 2012

पहले अपने को सिखायें-हिन्दी कविता (pahale ko sikhayen-hindi kaivta or poem)

आओ
जो भटके हैं उनको रास्ता दिखायें,
ऊंचे इंसानों में अपना नाम लिखायें
यकीन करो
कोई हमारी बात मानेगा नहीं
जिद्दी है जमाना
डूब जायेगा हर कोई अपनी
मतलब परस्ती के कीचड़ में
पर कोई समझना नहीं चाहेगा
जिंदगी जीना उसूलों के साथ सरल है
अलबत्ता साफ नीयत जरूरी है
यह हम अपने को सिखायें।
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Tuesday, March 13, 2012

असलियत किसी को न समझाना-हिन्दी कविता (asliyat kisee ko n samjhana-hindi kavita or poem)

अपनी आँखों से जो देखा है
वह सच किसी को न बताना,
अपने कानों से जो सुना नहीं
वह स्वर किसी को समझाना,
अपने दिमाग में भले ही पालो सपने
वह किसी के सामने न सजाना।
कहें दीपक बापू
जमाने के लोग अपने जिस्म का बोझ उठाने से लाचार है,
खरीदने वहाँ खड़े जाते, जहां खुशी का लगता बाज़ार है,
मरे जज़्बातों में हमदर्दी
ढूँढने में अपना वक्त गंवाना।
-------------------------

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com
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Wednesday, February 29, 2012

ज़िंदगी के आसरे-हिन्दी कविता (zindagi ke aasre-hindi poem)

हम तो कई बार टूटे और बिखरे
मगर आकाश के मालिक ने
फिर ज़मीन पर खड़ा कर दिया
उसकी कृपा पर
अपनी ज़िंदगी के सारे आसरे
बस यूं ही पार लगाएँगे।
कहें दीपक बापू
तुम अपनी फिक्र करो
अपने आसरे जिन कंधों पर
तुमने टिकाये हैं
सांसें चलना वह तुम्हारी बंद कर देंगे
मगर कब्र तक साथ नहीं आएंगे।
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Thursday, February 16, 2012

अपनी औकात-हिन्दी शायरी (apni aukat-hindi shayri)

गफलत में हम कुछ यूं रहे कि
जिन पर भरोसा किया
वह उसे निभाना जानते नहीं थे,
दूसरों से उम्मीद करते वह
पर खुद भी वफा निभाएँ यह
कभी मानते नहीं थे।
कहें दीपक बापू
लोगों के कायदे
अपने मतलब से बदल जाते हैं,
चालक ढूंढें अपने फायदे
मूर्ख हाथ मलते रह जाते हैं,
जिंदगी में दोस्ती और रिश्ते भी
सौदे की तरह जिये जाते हैं
जब तक हमारे जज़्बात कुचले न गए
दूसरों की क्या
हम अपनी औकात जानते नहीं थे।
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Thursday, February 9, 2012

टूटे बोल-हिन्दी शायरियाँ (toote bol-hindi shayriyan)

खत अब हम कहाँ लिखते हैं,
जज़्बातों को फोन पर
बस यूं ही फेंकते दिखते हैं।
कहें दीपक बापू
बोलने में बह गया
ख्यालों का दरिया
खाली खोपड़ी में
लफ्जों का पड़ गया है अकाल
आवाज़ों में टूटे बोल जोड़ते दिखते हैं।
----------------
इस जहां में
लोगों से क्या बात करें
पहले अपनी रूह की तो सुन लें।

कहें दीपक बापू
बात का बतंगड़ बन जाता है
मज़े की महफिलों में
दूसरों की बातें सुनकर
हैरान या परेशान हों
बेहतर हैं लुत्फ उठाएँ
अपने दिल के अंदर ही
जिन्हें खुद सुन सकें
उन लफ्जों का जाल बुन लें।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Saturday, January 28, 2012

किकेट मैच के लिये पांच गुना शक्ति वाला च्यवनप्राश लायें-लघु हिन्दी व्यंग्य (cricket match and chyavanprash-hindi vyangya or satire)

           च्यवनप्राश में तीन गुना शक्ति होती है-ऐसा कहना है बीसीसीआई क्रिकेट टीम के कप्तान का! अब इस तीन गुना शक्ति का पैमाना नापा जाये तो उसके सेवन से तीन दिन तक ही क्रिकेट खेलने लायक ही हो सकती है। गनीमत है कप्तान ने च्यवनप्राश के विज्ञापन में यह नहीं कहा कि इस च्यवनप्राश के सेवन से पांच गुना शक्ति मिलती है। वरना कंपनी पर उपभोक्ता फोरम में मुकदमा भी हो सकता था। फर्जी प्रचार से वस्तुऐं बेचना व्यापार की दृष्टि से अनुचित माना जाता है।
           बीसीसीआई की क्रिकेट टीम (indian cricket team and his australia tour)विदेश में पांच दिन के मैच खेलने  के लिये मैदान पर उतरती है पर तीन दिन में निपट जाती है। देश के शेर बाहर ढेर हो जाते हैं। सामने वाली टीम के तीन दिन में पांच विकेट जाते हैं और इनके बीस विकेट ढह जाते हैं। क्या करें? एक दिन खेलने की क्षमता है, च्यवनप्राश खाने पर तीन गुना ही शक्ति तो बढ़ती है। बाकी दो दिन कहां से दम दिखायें? इससे अच्छा है तो दो दिन मिलने पर तैराकी करें! क्लब में जायें। जश्न मनायें कि तीन दिन खेल लिये।
         च्यवनप्राश के नायक कप्तान ने तो यहां तक कह दिया है कि टेस्ट अब बंद होना चाहिये। उसकी खूब आलोचना हो रही है। हमारे समझ में नहीं आया कि उसका दोष क्या है? सब जानते हैं कि हमारे देश में शक्तिवर्द्धक के नाम पर च्यवनप्राश ही एक चीज है। अगर उसमें तीन गुना शक्ति आती है तो खिलाड़ी से अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि पांच गुना शक्ति अर्जित करे। इधर बीसीसीआई की क्रिकेट टीम की पांच दिन नहीं चली तो देश में हायतौबा मच गया है। यह हायतौबा मचाने वाले वह पुराने क्रिकेटर हैं जो विज्ञापनों के बोझ तले नहीं दबे। उनको नहीं मालुम कि अधिक धन का बोझ उठाना भी हरेक आदमी के बूते का काम नहीं है। शुद्ध रूप से क्रिकेट एक व्यवसाय है। टीम में वही खिलाड़ी होते हैं जिनके पास कंपनियों के विज्ञापन है। कंपनियां ही इस खेल की असली स्वामी है सामने भले ही कोई भी चेहरा दिखता हो। यही कारण है कि कंपनियों के चहेते खिलाड़ियों को टीम से हटाना आसान नहीं है। पुराने हैं तो फिर सवाल ही नहीं है क्योंकि एक नहीं दस दस कंपनियों के विज्ञापनों के नायक होते हैं। मैच के दौरान वही विज्ञापन आते हैं। इन्हीं कपंनियों के बोर्ड मैदान पर दिखते हैं। क्रिकेट सभ्य लोगों का खेल है और सभ्य लोगों के व्यवसाय और खेल कंपनी के बोर्ड तले ही होते हैं।
          बीसीसीआई की क्रिकेट टीम के विदेश में लगातार आठ बार हारने पर देश भर में रोना रहा है पर वहां क्रिकेट खिलाड़ियों को इसकी परवाह नहीं होगी। उनके पास तो इतना समय भी नहीं होगा कि वह हार के बारे में सोचें। मैच के बचे दो दिन वह अपने व्यवसाय की कमाई का हिसाब किताब जांच रहे होंगे। नये विज्ञापनों का इंतजार कर रहे होंगे। कंपनियां भी आश्वस्त होंगी यह सोचकर कि कोई बात नहीं देश के शेर है फिर यहां करिश्मा दिखाकर लोगों का गम मिटा देंगे। वैसे ही कहा जाता है कि जनता की याद्दाश्त कमजोर होती है।
        बहरहाल कुछ लोग बीसीसीआई की क्रिकेट टीम की दुर्दशा के लिये पूरे संगठन को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। हम इस राय के खिलाफ हैं। इससे अच्छा है तो यह है कि ऐसा च्यवनप्राश बनवाना चाहिए जो पांच गुना शक्ति दे सके। इसके लिये अपने यहां अनेक योग भोग चिकित्सक हैं उनकी सहायता ली जा सकती है। क्या इसकी दुगुनी खुराक लेकर छह गुना शक्ति पाई जा सकती है, इस विषय पर भी अनुंसधान करना चाहिए। बीसीसीआई की क्रिकेट टीम के कप्तान ने तो पूरी तरह से ईमानदारी से अपना काम किया है। उसने एक दिवसीय क्रिकेट में जमकर खेला है और च्यवनप्राश के सेवन से तीन गुना शक्ति प्राप्त कर तीन दिन तक पांच दिवसीय क्रिकेट में अपना किला लड़ाया है। अब यह अपने देश के आयुर्वेद विशेषज्ञों की गलती है कि उन्होंने पांच या छह गुना शक्ति वाला च्यवनप्राश नहीं बनाया जिसका विज्ञापन उसे दिया जाता। उससे आय पांच गुना होती तो खेलने का उत्साह भी उतना ही बढ़ता। जब नये संदर्भों में भारतीय अध्यात्म का नये तरह से विश्लेषण हो रहे हैं तो आयुर्वेद को भी इससे पीछे नहीं रहना चाहिए। बिचारे खिलाड़ियों को पांच या छह गुना शक्ति बढ़ाने वाला च्यवनप्राश नहीं दिया गया तो वह क्या करते? सो इस हार को भी व्यंग्य का हाजमोला खाकर हज़म कर लो।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

Friday, January 20, 2012

‘द सैटेनिक वर्सेज’ के लेखक सलमान रुशदी और जयपुर साहित्य सम्मेलन-हिन्दी लेख The Satanic Verses, Salman Rushdie and jaypur sahitya sammelan-hindi lekh article)

          द सैटेनिक वर्सेज (The Satanic Verses) के लेखक सलमान रुश्दी (Salman Rushdie) हमेशा विवादों में रहे है। अपने ही धर्म के प्रतिकूल किताब ‘‘ द सेटेनिक वर्सेज’’ लिखने वाले लेखक सलमान रुश्दी ने इसके पहले और बाद में अनेक किताबें लिखीं पर उनकी पहचान हमेशा इसी किताब की वजह से रही। हालांकि इस विवादास्पद किताब के बाद उनकी चर्चा अन्य किताबों की वजह से नहीं बल्कि बार शादियां कर बीवियां बदलने की वजह से होती रही है। हम जैसे अंग्रेजी से अनभिज्ञ लोगों को यह तो पता नहीं कि उनकी रचनाओं का स्तर क्या है पर कुछ विशेषज्ञ उनको उच्च रचनाकार नहीं मानते। अनेक अंग्रेजी विशेषज्ञों ने तो यहां तक लिखा था कि रुशदी की सैटनिक वर्सेज भी अंग्रेजी भाषा और शिल्प की दृष्टि से कोई उत्कृष्ट रचना नहीं है, अगर उन्होंने अपने धर्म के प्रतिकूल टिप्पणियां नहीं की होती और उनको तूल नहीं दिया जाता तो शायद ही कोई इस किताब को जानता।
         हम जब बाजार और प्रचार के संयुक्त प्रयासों को ध्यान से देखें तो यह आसानी से समझा जा सकता है कि सलमान रुशदी ही क्या अनेक रचनाकार केवल इसलिये लोकप्रिय होते हैं क्योंकि प्रकाशक ऐसे प्रचार की व्यवस्था करते है ताकि उनकी किताबें बिकें। अपने विवाद के कारण ही सैटेनिक वर्सेज अनेक भाषाओं में अनुवादित होकर बिकी। भारत में इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया इस कारण कभी इसका अन्य भाषा में प्रकाशन नहीं हुआ। इतना हीं नहीं किसी समाचार पत्र या पत्रिका ने इसके अंशों के प्रकाशन का साहस भी नहीं किया-कम से कम कम हिन्दी वालों में तो ऐसा साहस नहीं दिखा। इतना ही नहीं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के समर्थन में अनेक अवसर भीड़ जुटाने वालों में भी कोई ऐसा नहीं दिखा जिसने इस पर से प्रतिबंध हटाने की मांग की हो। हमारे लिये यह भूली बिसरी किताब हो गयी है।
         इधर कहीं  राजस्थान के जयपुर (Jaipur Literature Festival) शहर में साहित्य सम्मेलन हो रहा है। टीवी चैनलों के प्रसारण में वहां रुश्दी की किताब हमने रखी देखी। इसी सम्मेलन दो लोगों ने उसके अंश वाचन का प्रयास भी किया जिनको रोक दिया गया। जयपुर में हो रहे इस सम्मेलन की चर्चा भी इसलिये अधिक हुई क्योंकि उसमें सलमान रुशदी के आने की संभावना थी वरना शायद ही कोई चैनल इसे इस तरह स्थान देता। बहरहाल पता चला कि धमकियों की वजह से सलमान रुशदी जयपुर में नहीं आ रहे बल्कि वीडियो काफ्रेंस से संबोधित करेंगे। ऐसा लगता है कि इस बार भी बाज़ार और प्रचार का कोई फिक्स खेल चल रहा है। इसको नीचे लिखे बिंदुओं के संदर्भ में देखा जा सकता है।
         1. एक तरफ सैटेनिक वर्सेज के अंश पड़ने से दो महानुभावों को रोका जाता है दूसरी तरफ सलमान रुश्दी को इतना महत्व दिया जाता है कि उनके न आने पर उनको वीडियो प्रेस कांफ्रेंस के जरिये संबोधित करेंगे। यह विरोधाभास नहीं तो और क्या है कि जिस लेखक को अपनी विवादास्पद पुस्तक के जरिये प्रसिद्धि के कारण ही इतना बड़ा सम्मान दिया जा रहा है उसी के अंश वाचन पर रोक लग रही है।
       2. दूसरी बात यह कि इस पुस्तक पर देश में प्रतिबंध लगा था वह क्या हट गया है जो इसको प्रदर्शनी में रखा गया। हालांकि टीवी चैनलों पर हमने जो प्रदर्शनी देखी वह जयपुर की है या अन्यत्र जगह ऐसा हुआ है इसकी जानकारी हमें नहीं है। अगर प्रतिबंध नहीं हटा तो इसे भारत नहीं लाया जाना चाहिए था। यह अलग बात है कि हट गया हो पर इसकी विधिवत घोषणा नहीं की गयी हो।
       ऐसा लगता है जयपुर साहित्यकार सम्मेलन में सलमान रुश्दी के नाम के जरिये संभवत अन्य लेखकों को प्रकाशन बाज़ार विश्व में स्थापित करना चाहता है। यह संदेह इसलिये भी होता है क्योंकि सलमान रुश्दी के भारत आगमन की संभावनाओं के चलते ही हमें लगा था कि वह शायद ही आयें। उनके बाज़ार और प्रचार के संपर्क सूत्र उनसे कोई भी न आने का बहाना बनवा देंगे। देखा जाये तो प्रकाशन बाज़ार और प्रचार माध्यम हमेशा विवादास्पद और सनसनी के सहारे अपना काम चलाते हैं जिस कारण हिन्दी क्या किसी भी भाषा में साहित्यक रचनायें न के बराबर हो रही है। संभवतः जयपुर सम्मेलन अपने ही विश्व मे ही क्या उस शहर में ही प्रसिद्धि नहीं पाता जहां यह हो रहा है। सलमान रुश्दी के आने की घोषणा और फिर न आना एक तरह से तयशुदा योजना ही लगती है। आयोजक ने सैटेनिक वर्सेस के अंश पढ़ने से दो लोगों को इसलिये रोका क्योंकि इससे यहां लोग भड़क सकते है तो क्या उनका यह डर नहीं था कि सलममान रुशदी आने पर भी यह हो सकता है। ऐसे में यह शक तो होगा कि यह सब प्रचार के लिए  था।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

Monday, January 9, 2012

नर्क और स्वर्ग में कितनी दूरी-हिन्दी व्यंग्य कविताएँ (narak aur swarg ki doori-hindi vyangya kavitaen or satire poem)

हुकूमत की इज्ज़त करे
हर खास और आम इंसान
यह ज़रूरी है,
कभी दुश्मन का
कभी लुटेरों का खौफ ज़िंदा रखें
बादशाहों की यह मजबूरी है।
कहें दीपक बापू
फरिश्तों और शैतानों में
सदियों से चलता रहा है
यह फिक्सिंग का खेल
छुरी से निकाले कोई
कहीं आदमी श्रद्धा से
निकलवाने पहुँच जाता
अपने खून से तेल,
नहीं जानता कोई
नर्क की स्वर्ग से कितनी दूरी है।
----------------
शैतानों और फरिश्तों के बीच
दिखाने के लिए दुश्मनी का रिश्ता रहा है,
इधर जाये या उधर आसरा ले इंसान
लंबे बयानों में सभी का सोच पिसता रहा है।
कहें दीपक बापू
किसी ने बना लिया लुटेरों का गिरोह
किसी ने थाम लिया हुकूमत का चाबुक
दोनों एक दूसरे को ज़िंदा रखने को मजबूर
बेमतलब है यह सोचना कि
किसके बारे में क्या कहा है।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

Thursday, January 5, 2012

नया आइडिया-लघु हिन्दी हास्य व्यंग्य (naya idea-laghu hindi hasya vyangya or comedy satire article}

     उस्ताद ने शागिर्द से कहा-"मेरे तौंद बहुत बढ़ गई है, इसे कम करना होगा, वरना लोग मेरे उपदेशों पर यकीन नहीं करेंगे जिसमें मैं उनको कम खाने गम खाने और कसरत करो तंदुरुस्ती पाओ जैसी बातें कहता हूँ। आजकल मोटे लोगों को कोई पसंद नहीं करता, नयी पीढ़ी के लड़के लड़कियां मोटे लोगों को बूढ़ा और बीमार समझते हैं। सोच रहा हूँ कल सुबह से सैर पर जाना शुरू करूँ।"
     शागिर्द ने कहा-"उस्ताद सुबह जल्दी उठने के लिए रात को जल्दी सोना पड़ेगा। जल्दी सोने के लिए सोमरस का सेवन भी छोडना होगा।"
    उस्ताद ने कहा-"सोमरस का सेवन बंद नहीं कर सकता, क्योंकि उसी समय मेरे पास बोलने के ढेर सारे आइडिया आते हैं जिनके सहारे अपना समाज सुधार अभियान चलता है। ऐसा करते हैं सोमरस का सेवन हम दोनों अब शाम को ही कर लिया करेंगे।"
     शागिर्द ने कहा-"यह संभव नहीं है क्योंकि आपके कई शागिर्द शाम के बाद भी देर तक रुकते हैं, उनको अगर यह इल्म हो गया कि उनके उस्ताद शराब पीते हैं तो हो सकता है कि वह यहाँ आना छोड़ दें।"
    उस्ताद ने कहा-"ऐसा करो तुम सबसे कह दो कि हम अपना चित्तन और मनन का कार्यक्रम बदल रहे हैं इसलिए वह शाम होने से पहले ही चले जाया करें।"
    उस्ताद कुछ दिन तक अपने कार्यक्रम के अनुसार सुबह घूमने जाते रहे पर पेट था कि कम होने का नाम नहीं ले रहा था। उस्ताद ने शागिर्द से अपनी राय मांगी। शागिर्द बोला-"उस्ताद आप देश में फ़ेल रही महंगाई रोकने के लिए अनशन पर बैठ जाएँ। इससे प्रचार और पैसे बढ्ने के साथ आपका पेट भी कम होगा।"
    उस्ताद ने कहा-"कमबख्त तू शागिर्द है या मेरा दुश्मन1 मैं पतला होना चाहता हूँ,न कि मरना।
शागिर्द बोला-"मैं तो आपको सही सलाह दे रहा हूँ। सारा देश परेशान है। इससे आपको नए प्रायोजक और शागिर्द मिल जाएंगे। फिर आपका स्वास्थ भी अच्छा हो जाएगा।"
      उस्ताद ने कहा-"हाँ और तू बैठकर बाहर सोमरस पीना, मैं उधर अपना गला सुखाता रहूँ।"
शागिर्द ने कहा-"ठीक है,फिर आप ऐसा करें की शाम को कहीं अंदर घुस जाया करें। तब मैं बाहर बैठकर लोगों को भाषण वगैरह दिया करूंगा। अलबत्ता मेरे यह शर्त है कि मैं आपसे पहले ही जाम पी लूँगा।"
      उस्ताद ने पूछा-"वह तो ठीक है पर शराब पीकर खाली पेट कैसे सो जाएंगे?
    शागिर्द ने कहा-" आप शराब कोई नमकीन के साथ थोड़े ही पीएंगे, बल्कि काजू और सलाद भी आपको लाकर दूँगा। उस समय हमारे पास ढेर सारा चंदा होगा। वैसे आप चाहें तो कभी कभी भोजन में मलाई कोफता के साथ रोटी भी खा लेना। अपने तो ऐश हो जाएंगे।"
      उस्ताद ने कहा-"पर इससे मेरी तौंद कम नहीं होगीc"
     शागिर्द ने कहा- आप अब अभी तक तौंद करने के मसले पर ही सोच रहे हैं? अरे, आप तो नए शागिर्द बनाने के लिए ही यह सब करना चाहते हैं न! जब नया आइडिया आ गया तो फिर पुराने पर सोचना छोड़ दीजिए।"
        उस्ताद ने मुंडी हिलाते हुए कहा-"हूँ, हूँ !"

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

Wednesday, December 28, 2011

दिल का झंडाबरदार-हिन्दी शायरियां (Dil ka jhandabardar-hindi shayriyan or poem's)

अपने अपने सभी के इलाके हैं
कोई न कोई कहीं का सरदार है,
डूब हैं सभी अपने घर बचाने के लिये
गलतफहमी में रहे हम कि वह असरदार हैं।
कहें दीपक बापू दोगलापन खून में है इंसानों के
मतलब निकलने तक सभी हमारे तरफदार हैं,
बाज़ार में बिकते मुद्दे पर चर्चा करना बकवास है
खुश वही है जो खुद के दिल का झंडाबरदार है।
---------
अपने जिस्म का पसीना
हमने उनके लिये बहाया
जो केवल दौलत के अहंसानमंद है,
उनसे तारीफ की क्या उम्मीद करना
जिनके ख्याल अपने ही मतलब में बंद हैं
---------------
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

Wednesday, December 14, 2011

दोस्ती का दम-हिन्दी शायरी (dosti ka dam-hindi shayri)

न वह दिल के पास हैं
न उनके कदम कभी हमारे घर की ओर
बढ़ते नज़र आते हैं,
कहें दीपक बापू
उनसे दोस्ती का दम क्या भरें
जिनकी वफा पर लगे ढेर सारे दाग
दिखते हैं जहां को
मगर वह खूबसूरती से
खुद से सच से ही आँखें फेर जाते हैं।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

Sunday, December 11, 2011

अन्ना हजारे (अण्णा हज़ारे) ने दी युवा की नयी परिभाषा-हिन्दी लेख (Anna hazare and today yung nanaration-hindi lekh or article)

         अन्ना हजारे अत्यंत दिलचस्प आदमी हैं। सच कहें तो हमने गांधी को नहीं देखा न सुना पर जितना पढ़ा है उसके आधार पर यह कह सकते हैं कि अन्ना की उनसे तुलना करने का अब मतलब नहीं रहा। अन्ना हजारे तो अन्ना हजारे हैं और इतिहास भारत में आजादी के बाद के महान पुरुष के रूप में उनको दर्ज करेगा। 11 दिसंबर को जंतर मंतर पर अनशन के दौरान अपने भाषणों में उन्होंनें बहुत सारी बातें कही गयी। उनमें कुछ बातें ऐसी हैं जो नारों या वाद से आगे जाकर उनके गंभीर चिंतक होने का प्रमाण देती है। इनमें युवा शक्ति को लेकर उनका बयान अत्यंत गंभीर दर्शन का प्रमाण है।
        अक्सर हमारे यहां युवाओं को आगे लाने की बात कही जाती है। जहां कहीं कोई संगठन, संस्था या आंदोलन विफल होता है तो युवा नेतृत्व लाने का नारा देकर समाज को ताजगी दिलाने का प्रयास किया जाता है। लोग भी पुराने लोगों से दुःखी होते हैं। निराशा उनको मनोबल तोड़ चुकी होती है। नया चेहरा देखकर वह यह आशा बांध लेते हैं कि शायद उनका कल्याण होगा मगर ऐसा नहीं होता बल्कि हालात बद से बदतर हो जाते हैं। अलबत्ता नया या युवा चेहरा बताकर कुछ समय तक समूहों पर नियंत्रण किया जाता है। दरअसल हमारे देश के सामाजिक, धार्मिक तथा आर्थिक तथा अन्य संगठनों पर धनपतियों को अप्रत्यक्ष नियंत्रण है। कहने को सभी संगठन दावा करते हैं कि वह स्वतंत्र हैं पर कहीं न कहीं सभी प्रायोजन से प्रतिबद्ध दिखते हैं। युवा शक्ति के नाम पर अपने ही परिवार के सदस्यों को लाकर शिखर पुरुष खुश होते हैं तो परंपरागत से जीने वाला हमारा समाज भी खामोशी से स्वीकार करता है।
         अन्ना का कहना सही है कि युवा वही है जिसका हृदय या दिल जवान है। उनका यह भी कहना है कि अगर पैंतीस साल का आदमी हो और संघर्ष की स्थिति में कह दे कि जाने दो हमें क्या करना? वहीं कोई साठ साल को हो पर समाज के साथ खड़ा हो वही जवान है।
        एक तरह से उन्होंने यह साबित कर दिया है कि उनमें एक सक्षम नेता का गुण है। अपने अनशन से अपने आपको युवा साबित कर चुके अन्ना हजारे ने अपने दर्शन के व्यापक होने का इतना जबरदस्त प्रमाण है कि यह कहने में कोई झिझक नहीं है कि पहले महाराष्ट्र और फिर पूरे देश में छा जाने वाला मजबूत नेतृत्व का उनमें जन्मजात रहा होगा। यह सही है कि इसके लिये धनपतियों के प्रचार माध्यमों का कम योगदान नहीं है। रविवार को छुट्टी के दिन उनके एकदिवसीय अनशन का आयोजन कई तरह की बातों की तरफ ध्यान खींचता है। इस दिन अवकाश के दिन देश भर में अनेक जगह हुए अनशन में भीड़ स्वाभाविक रूप से जुट जाती है। घर बैठे लोग टीवी पर सीधा प्रसारण देखते हैं। अन्ना हजारे के व्यक्तित्व का प्रचार इतना हो चुका है कि टीवी चैनलों ने इसे विज्ञापनों के बीच समय पास करने का एक महत्वपूर्ण विषय बना लिया है। यह रविवार का दिन इसमें बहुत सहायक होता है। ऐसे में अन्ना का प्रभावी भाषण उन्हें एक नये महापुरुष के रूप में स्थापित कर सकता है। खास तौर से युवा शक्ति पर उनके बयान से जहां युवा आकर्षित होंगे वहीं बड़ी आयु के लोग भी प्रसन्न होंगे। यकीनन अन्ना हजारे ने अपनी बात कहते हुए इस बात का ध्यान रखा होगा।
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