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Wednesday, April 27, 2011

हास्य कविताएँ -दौलत बहुत जरूरी है (daulat bahut jaroori hai-hindi hasya kavitaen)

बीमार गुरु ने चेले से
अपनी पार्थिव देह के संस्कार के बारे में पूछा
तो वह बोला-
‘‘महाराज,
भगवान करेगा आप ठीक हो जायेंगे,
जिंदगी भर चमत्कार किया है
भगवान अब आपके लिये
चमत्कार करने आयेंगे,
अगर ऐसा नहीं हुआ तो
आपकी अर्थी को बड़ी सादगी से सजायेंगे,
आपने हमेशा गरीबों का भला किया
इसलिये कोई शान शौकत नहीं दिखायेंगे।’’

सुनकर मरणासन्न गुरुजी
उठकर बैठे और बोले,
‘‘कमबख्त
किस जन्म का बदला लेने आया है,
जो यह सादगी का नारा बताया है,
तुझे मैंने कितनी बार बताया है कि
आदमी गरीब है या अमीर है
अज्ञानी है कि संत है,
या आम है कि खास है
इसका पता उसके मरने पर
निकलने वाली अर्थी से चलता है,
जिनकी जिंदगी बेरौनक रही
उनकी अर्थी में कोई नहीं चलता है,
जो जलाते हर समय ज्ञान का प्रकाश
उनकी पार्थिव देह के चारों तरफ
घी का दीपक जलता है,
सजता है फूलों का बाग,
बजता है चारों तरफ विरह का राग
फिर गरीबों के कल्याण के व्यापार में
कुछ ही इंसानों का भला किया जाता है,
बाकी तो ज़माने से सोना लूटकर उसे गला दिया जाता है,
हमारी अर्थी और दाह संस्कार पर तुम
धूमधड़कारा करना
इसी शर्त पर हमें मंजूर है अभी मरना,
वरना अपनी बीमारी साथ लेकर जिंदा रहेंगे
चाहे जितना दर्द हम सहेंगे,
मरने से पहले प्रिय शिष्य के रूप में
तुम्हारी जगह किसी दूसरे का नाम
वसीयत में लिखायेंगे,
दौलत बहुत जरूरी है
यह मरने के बाद भी दिखायेंगे।’’
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चेले ने कहा गुरु से
‘महाराज,
ढेर सारा पैसा आ गया है,
अपना फाईव स्टार होटल नुमा
आश्रम भी बनकर लगता नया है,,
यह सब आपके चमत्कारों का परिणाम है,
सत्संग में आपके पीछे खड़े होकर
भभूत, घड़ी और अंगूठी दी मैंने
पर हवाओं का हुआ नाम है
मगर अब छवि बदलने का समय आया है,
ज्ञान के बिना यह अंधेरी माया है,
इसलिये अब लोगों को पुराने ग्रथों से
रटकर उपदेश दिया करें,
ज्ञानियों से भी वाह वाह लिया करें,
वरना कोई आपको संत नहीं मानेगा,
हर कोई जादूगर जानेगा।’’

सुनकर बोले गुरुजी
‘मूर्ख,
क्या धरा ज्ञान में,
चमक है बस दौलत की शान में,
भला,
तूने किसी ज्ञानी को अपने आश्रम में आते देखा,
किसी ज्ञानी को महलनुमा आश्रम में
घर बसाते देखा है
हमारा देश विश्व में विश्व गुरु इसलिये कहलाता है
क्योंकि अज्ञान के अंधेरे में ज्ञान रौशन हो पाता है,
इस काम के लिये ढेर सारे लोग हैं,
जिनको मुफ्त में ज्ञान बांटने और दान करने जैसे रोग हैं,,
अपने देश में बहुत तंगहाली है
इसलिये अपने चमत्कार की चारो तरफ लाली है,
अगर हमने चमत्कार छोड़कर ज्ञान बघारा तो
हर कोई हमें मरा जानेगा।
जिंदा रहकर चमत्कार करते रहे
तो हर कोई हमें अमर मानेगा।’’
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कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर 
poet writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwalior
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Friday, April 22, 2011

हास्य कविता-भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन (bhrashtachar virodhi andolan or anti corruption movement-hasya kavita)

समाज सेवक की पत्नी ने कहा
‘तुम भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में
शामिल मत हो जाना,
वरना पड़ेगा पछताना।
बंद हो जायेगा मिलना कमीशन,
रद्द हो जायेगा बालक का
स्कूल में हुआ नया एडमीशन,
हमारे घर का काम
ऐसे ही लोगों से चलता है,
जिनका कुनबा दो नंबर के धन पर पलता है,
काले धन की बात भी
तुम नहीं उठाना,
मुश्किल हो जायेगा अपना ही खर्च जुटाना,
यह सच है जो मैंने तुम्हें बताया,
फिर न कहना पहले क्यों नहीं समझाया।’
सुनकर समाज सेवक हंसे
और बोले
‘‘मुझे समाज में अनुभवी कहा जाता है,
इसलिये हर कोई आंदोलन में बुलाता है,
अरे,
तुम्हें मालुम नहीं है
आजकल क्रिकेट हो या समाज सेवा
हर कोई अनुभवी आदमी से जोड़ता नाता है,
क्योंकि आंदोलन हो या खेल
परिणाम फिक्स करना उसी को आता है,
भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में
मेरा जाना जरूरी है,
जिसकी ईमानदारी से बहुत दूरी है,
इसमें जाकर भाषण करूंगा,
अपने ही समर्थकों में नया जोशा भरूंगा,
अपने किसी दानदाता का नाम
कोई थोडे ही वहां लूंगा,
बस, हवा में ही खींचकर शब्द बम दूंगा,
इस आधुनिक लोकतंत्र में
मेरे जैसे ही लोग पलते हैं,
जो आंदोलन के पेशे में ढलते हैं,
भ्रष्टाचार का विरोध सुनकर
तुम क्यों घबड़ाती हो,
इस बार मॉल में शापिंग के समय
तुम्हारे पर्स मे ज्यादा रकम होगी
जो तुम साथ ले जाती हो,
इस देश में भ्रष्टाचार
बन गया है शिष्टाचार,
जैसे वह बढ़ेगा,
उसके विरोध के साथ ही
अपना कमीशन भी चढ़ेगा,
आधुनिक लोकतंत्र में
आंदोलन होते मैच की तरह
एक दूसरे को गिरायेगा,
दूसरा उसको हिलायेगा,
अपनी समाज सेवा का धंधा ऐसा है
जिस पर रहेगी हमेशा दौलत की छाया।’’
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Saturday, April 16, 2011

जमाने में अंधेरे वही पाले हैं-हिन्दी हाइकू

(1)
वह राक्षस
देवता का चेहरा
लगा रहा है।
(2)
लुटेरा दिल
जज़्बात का धंधा
सजा रहा है।
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(1)
साफ वस्त्र
पहन घूम रहे
दिल काले हैं।
(2)
दान लूटा है
जमाने में अंधेरे
वही पाले हैं।
--------------



संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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Monday, April 4, 2011

नकली ट्राफी का खेल-व्यंग्य चिंत्तन (nakli cup or trofy ka khel-vyangya chittan)

             समझ में नहीं आ रहा है कि व्यंग्य लिखें कि गंभीर चिंत्तन। क्रिकेट को वैसे ही यकीनी खेल नहीं मानते। यहां तक कि जिसे लोग टीम इंडिया कहकर देश के लोग सिर पर उठाये रहते हैं उसके लिये भी हमने केवल एक क्लब बीसीसीआई की टीम मानते हैं। यह क्लब अपने क्रिकेट के व्यापार के लिये भारत के नाम, झंडे और गान का इस्तेमाल करता है इसलिये ही उसे भारत में दर्शक भारी मात्रा में मिलते हैं जिनकी जेब की दम पर पूरी दुनिया का क्रिकेट चल रहा है। बहरहाल हमारी टीम ने विश्व कप जीता खुशी की बात है-जीतने पर हम ऐसा ही करते हैं, हारने पर बीसीसीआई की टीम कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं-खिलाड़ियों के हाथ में ट्राफी या कप देखकर खुशी हुई।
            धोनी और गंभीर ने मन मोह लिया, मगर सारी प्रसन्नता चौबीस घंटे में हवा हो गयी। पता लगा कि उनको नकली कप या ट्राफी दी गयी है और असली भारतीय कस्टम विभाग के भंडार कक्ष की शोभा बढ़ा रही है। गनीमत है कि नागरिक सेवाओं से जुड़े कर्मचारी गोपनीयता के नियमों का पालन करते हैं वरना भंडार कक्ष में रखी ट्राफी का सरेआम दृश्य प्रसारित होता तब देश की इज्जत पर जो बट्टा लगता वह दुःखदायी होता।

            वैसे प्रचार माध्यम घुमाफिरा रहे हैं। बीसीसीआई के प्रवक्ता ने जब यह माना है कि ट्राफी नकली है तब उसमें शक की गुंजायश नहंी रहती। फिर भी आईसीसी कहती है कि असली ट्राफी यह कप है। वैसे प्रचार माध्यमों ने प्रमाणित कर दिया है कि वानखेड़े स्टेडियम में खेले गये विश्व कप 2011 के मैच के बाद भारत को दी गयी ट्राफी नकली है। उसमें विश्व कप का वह लोगो नहीं दिख रहा जिसे कोलंबो में अनावरण के समय देखा गया था। चूंकि यह ट्राफी अत्यंत महत्वपूर्ण है इसलिये यह संभव नहीं है कि उसे कहीं खुले में रखा गया हो जिससे उसका रंग उड़ जाये।
मतलब यह कि यह नकली ट्राफी है।
                  यह देश के साथ मजाक है और यकीनन बिना सोचे समझे नहीं किया गया। यह चिढ़कर किया गया है ताकि भारतीय लोग खुशी के बाद अवसाद के वातावरण का सामना करें। कोई है जो भारत की जीत से चिढ़ गया है। कौन हैं वह लोग? इसकी पड़ताल जरूरी है।

               इसमें कोई संदेह नहीं है कि सट्टेबाजों की ताकत जहां व्यापक है वहीं उनके हाथ लंबे हैं। कहा जाता है कि दुनियां के देशों के कानूनों से अलग आईसीसी तथा सट्टेबाजों का के नियम हैं। वह कई जगह कानून बनकर काम चलाते हैं वहां उनके हाथ भी लंबे हैं। भले ही कहा जाता है कि गोरे ईमानदार होते हैं पर जिस तरह अपराधियों के हाथ वह बिकते देखे गये हैं उससे यह भ्रम टूट गया है। ऐसा लगता है कि इस विश्व कप में कहीं न कहीं सट्टेबाजों को अपना काम सही तरह से करने का अवसर नहीं मिला। सेमीफायनल में पाकिस्तान और फायनल में श्रीलंका पर भारत की जीत तय मानी जा रही थी। ऐसे में सट्टेबाजों के लिये विपरीत परिणाम ही फायदेमंद हो सकता था पर ऐसा हुआ नहीं। हालांकि सट्टेबाजों ने अब स्पॉटफिक्सिंग का रास्ता निकाल लिया है पर लगता है कि वह अपनी कमाई से संतुष्ट नहीं है। फिर सेमीफायनल में पहुंची चार टीमों में-भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका तथा न्यूजीलैंड-से तीन गोरवर्ण का प्रतिनिधित्व नहीं करती। क्या गोरों के मन में यह मलाल रह गया था?
                  दूसरा सेमीफायनल और फायनल मैचों को भारत के अनेक संवैधानिक, राजनीतिक, आर्थिक, फिल्मी तथा अन्य विशिष्ट क्षेत्रों से जुड़े शिखर पुरुषों ने देखा। अपने कामकाज से फुरसत निकालकर वह कुछ देर आम इंसानों की तरह मैच देखने आये? उनकी मासुमियत तथा रुचियों को मजाक उड़ाने का कहीं यह इरादा तो नहीं है? क्या गोरे तथा भारत के विरोधियों को यह लगता है कि अमेरिका की लीबिया पर चल रही बमबारी को ही हम लोग देखते रहें और अपने क्रिकेट मैचों को देखना बंद कर देते।
क्रिकेट मैचों में हारने या जीतने पर भावुक नहीं होना चाहिए, यह हम हमेशा ही कहते रहे हैं पर नकली कप का मामला राष्ट्रवादियों को चिढ़ाने वाला है। भारत में आज नववर्ष विक्रम या विक्रमी संवत् 2068 के आगमन का स्वागत हो रहा है। ईसाई संवत् मानने वालों को यह बात समझ में नहीं आयेगी कि ऐसे अवसर इस तरह की अपमान जनक खबर बेहद दुःखदायी है। दो कौड़ी की आईसीसी-विश्व की क्रिकेट पर नियंत्रण करने वाली संस्था-और एक कोड़ी का फायनल मैच, पर देश का नाम अनमोल है। क्रिकेटर और उससे जुड़े संघों के लोग पैसे कमाने के चक्कर में चुप बैठ जायेंगे पर जिनको क्रिकेट से अधिक देश के प्रति प्रेम का भाव है वह इस व्यवहार से क्षुब्ध अवश्य होंगे।
          यह तो एक विचार है। इसका दूसरा पक्ष यह भी हो सकता है कि यह समाचार ही फिक्स कर बनाया गया हो। विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता का फायनल देखने के बाद यहां के लोगों का क्रिकेट से मन भर सकता है। इधर एक क्लब स्तरीय प्रतियोगिता शुरु हो रही है और उसे दर्शक कम मिल सकते हैं क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता और क्लब स्तरीय क्रिकेट मैचों में अंतर होता है। कहीं यह विश्व कप प्रतियोगिता का स्तर कमतर साबित करने का प्रयास तो नहीं है ताकि दर्शक इसे भूल जायें और क्लब स्तरीय प्रतियोगिता की तरफ जायें।
इधर यह भी सुनने में आया था कि कुछ सट्टेबाज इधर उधर पकड़े गये। उनके साथ आस्ट्रेलिया के दो गोरे खिलाड़ियों की मिलीभगत की बात सामने आयी। शायद इससे गोरे लोगों को सदमा लगा हो।
                  कहने का अभिप्राय है कि यह घटना पूर्वनियोजित है। इससे दो उद्देश्य या दोनों में से एक प्राप्त करने का प्रयास हो सकता है।
        एक तो भारत को अपमानित करना या फिर विश्व कप प्रतियोगिता को कमतर साबित करना ताकि क्लब स्तरीय प्रतियोगिता की तरफ जायें। लंबे समय तक विश्व कप की खुमारी उन पर न रहे क्योंकि छह अप्रैल से क्लब स्तरीय प्रतियोगिता प्रारंभ होने वाली है। शक की पूरी गुंजायश है कि इतनी बड़ी प्रतियोगिता में सब कुछ ठीकठाक रहा तो यह ट्राफी कस्टम का कर चुकाकर स्टेडियम में लायी क्यों न गयी? क्या वह इसे फ्री में लाना चाहते थे? करोड़ो रुपये की मालिक संस्थायें 20 लाख रुपये खर्च करने से मुकर क्यों गयीं? आखिरी बात दूसरी नकली ट्राफी अचानक कैसे बनकर आ गयी? मतलब जांच हो तो मामला कुछ का कुछ निकल सकता है।
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Friday, March 25, 2011

वफादारी का चोला-व्यंग्य कवितायें (vafadari ka chola-vyangya kavitaen)

अपनों पर नहीं यकीन
इसलिये गैरों से उनके शिकवे और शिकायत करते हैं,
परायों के कमरे में जाकर छूते हैं पांव,
उनसे मुलाकात का दंभ भरते है आकर अपने गांव,
कुछ खास हैं
यह दिखाने के लिये
आखिर अपने रिश्तों में ही दम भरते हैं।
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अपनों से छिप कर वह
परदेसियों से आंखें लड़ाते हैं,
जिनको अपनी गली में नहीं मिलती इज्जत
वही बाहर जाकर अपना दर्द
बयान कर आते हैं।
साथियों में फिर वैसे ही वफादारी का
चोला पहनकर खामोशी से खड़े हो जाते हैं।
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Saturday, March 19, 2011

होली और ध्यान-हिन्दी कविता (holi aur dhyan-hindi kavita)

आओ ध्यान लगायें,
नकली गुलाल और रंग में
खेलने से जलेंगी आंखें और बदन
इसलिये अपने अंतर्मन में
स्थापित कर लें एक सुंदर स्वरूप

उसके आगे   अपनी हृदय का दीपक जलायें।
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किस पर रंग फैंककर
किसका व्यक्तित्व अपने हाथ से चमकायें,
अपने हृदय को कर दें ध्यान में मग्न,
हो जायेंगे कीचड़ की समाधियां भग्न,
बरस भर जमा किया है कीचड़ मन में
वहां ज्ञान का कमल लगायें।
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Sunday, March 6, 2011

हाथ मुफ्त में घिस जायेगा-हिन्दी व्यंग्य कविता (hath mufta mein ghis jayega-hindi vyangya kavita)

पद का नशा ही ऐसा है कि
जो बैठता है कुर्सी पर
खास आदमी बन जाता है,
राह चलते हुए उसके साथ
रहता है आम आदमी का अहसास
दर्द झेलते हुए भी उसका
इलाज नहीं कर पाता
कलम के शेर, कागज पर ही दहाडेंगे
ज़मीन से उनका भला क्या नाता है।
--------------
समाज में समस्याओं का अंबार है
उसे कौन निपटायेगा,
हर कोई करेगा शिकायत
फिर मौन हो जायेगा।
हल करने के लिये हाथ
कोई नहीं चलाता
मुफ्त में घिस जायेगा।
‘‘‘‘‘‘‘‘‘‘
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Monday, February 28, 2011

जरूरतमंदों के सगे-हिन्दी शायरी (jaruratmandon ke sage-hindi shayri)

उनकी कोशिश यही थी
अपने दर्द पर आंसू कुछ इस तरह बहायें
कि पूरे जहां का दर्द उसमें समाया लगे।
उम्मीद थी शायद कुछ लोग
इलाज के लिये दें मदद
उनके अंदर दान का जज़्बात जगे।
आ गया पैसा जेब में
तो अपने एक हाथ से दूसरे में देने लगे,
भलाई बन गयी उनका व्यापार
अपनी जरूरतें पूरी करते रहे
हल्दी लगी न फिटकरी
धेला भी खर्च नहीं किया
पर प्रचार करते हुए
बन गये जरूरतमंदों के सगे।
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Monday, February 21, 2011

पहरे साथ लेकर वह लूट में जुटे हैं-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (pahare sath lekar loot-hindi vyangya kavitaen)

अपने चेहरे कालिख से पुते हैं,
वही दूसरों की कमीज पर
दाग लगाने में जुटे हैं।
अपने चरित्र को ईमान से नहीं नहला सकते,
ज़माने में सभी की नाक पर फब्तियां कसते,
कौन कर सकता है दबंगों कीशिकायत
पहरे साथ लेकर वह लूट में जुटे हैं।
-----------
कब सोचा था हमने कि
ज़माने को लूटने वाले
कभी अपनी ईमान का दम भरेंगे,
एक दूसरे को बेईमान बताते पहरेदार
लुटेरों का नाम लेते हुए भी डरेंगे।
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Thursday, February 10, 2011

नेकनीयती का दावा-हिन्दी व्यंग्य कविता (nekneeyati ka dava-hindi vyangya kavitaen)

वह लूट का धन छिपाने के लिये
ज़माने में मनोरंजन पर खर्च कर आते हैं,
गरीबी और भुखमरी का रोग छिपाने के लिये
उस पर क्रिकेट के छक्के,
और फिल्म के झटके,
दवा और मरहम की तरह लगाते हैं।
धन सफेद हो तो
किसे चिंता होती है,
पर काला हो तो
अनिद्रा साथ होती है,
मगर लूट का हो तो
अपना पाप छिपाने के लिये
धर्म की आड़ होना भी जरूरी पाते हैं।
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अब फिक्र यह नहीं कि अपनों ने हमें लूटा है,
पर डर है कि रिश्तों का भांडा सरेराह फूटा है।
ग़म पैसा जाने का नहीं, क्योंकि वह फिर आयेंगे,
चिंता है कि कुनबे की नेकनीयती का दावा झूठा है।
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Friday, February 4, 2011

भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनयुद्ध में व्यवस्था में बदलाव बिना विजय संभव नहीं-हिन्दी लेख (bhrashtachar aur januddh-hindi lekh)

सुनने में आया है कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध कहीं जनयुद्ध शुरु हो गया है। बड़े बड़े नाम हैं जो इस युद्ध की अगुआई कर रहे हैं। ऐसे नामों की छबि को लेकर कोई संदेह है क्योंकि वह स्वच्छ है। कुछ विद्वान हैं तो कुछ कानूनविद! हम यहां कि इस जनयुद्ध के सकारात्मक होने पर संदेह नहीं कर रहे पर एक सवाल तो उठायेंगे कि कहीं यह अभियान भी तो केवल नारों तक ही तो नहीं सिमट जायेगा?
विश्व प्रसिद्ध योग शिक्षक बाबा रामदेव के व्यक्त्तिव को कोई चुनौती नहीं दे सकता पर उनके चिंतन की सीमाओं की चर्चा हो सकती है। श्रीमती किरण बेदी की सक्रियता प्रसन्नता देने वाली है पर सवाल यह है कि वह भ्रष्टाचार का बाह्य रूप देख रही हैं यह उसका गहराई से भी उन्होंने अध्ययन किया है। बाबा रामदेव योग के आसन सिखाते हैं मगर उनके परिणामों के बारे में वह आधुनिक चिकित्सकीय साधनों का सहारा लेते हैं। सच बात तो यह है कि बाबा रामदेव योग आसन और प्राणायाम जरूर सिद्धहस्त हैं पर उसके आठों अंगों के बारे में में पूर्ण विद्वता प्रमाणिक नहीं है। फिर भी भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनयुद्ध प्रारंभ करने वाले महानुभावों को साधुवाद! उनकी प्रशंसा हम इस बात के लिये तो अवश्य करेंगे कि वह इस देश में व्याप्त इस निराशावाद से मुक्ति दिलाने में सहायक हो रहे हैं कि भ्रष्टाचार को मिटाना अब संभव नहीं है।
सवाल यह है कि भ्रष्टाचार समस्या है या समस्याओं का परिणाम! इस पर शायद बहस लंबी खिंच जायेगी पर इतना तय है कि वर्तमान व्यवस्था में भ्रष्टाचार अपनी जगह बनाये रखेगा चाहे जितने अभियान उसके खिलाफ चलाये जायें। मुख्य समस्या व्यवस्था में है कि उससे जुड़े लोगों में, इस बात का पता तभी लग सकता है जब एक आम आदमी के चिंतक के रूप में विचार किया जाये।
जो विद्वान भ्रष्टाचार को मिटाने की बात करते हैं तो वह भ्रष्ट तत्वों को पकड़ने या उनकी पोल खोलने के लिये तैयार हैं मगर यह हल नहीं है। सबसे बड़ी बात यह है कि हम अपने राज्य, समाज, परिवार तथा समाजसेवी संस्थाओं की संचालन व्यवस्था को देखें जो अब पूरी तरह पश्चिम की नकल पर चल रही है। ऐसा नहीं है कि कभी कोई राज्य भ्रष्टाचार से मुक्त रहा हो। अगर ऐसा न होता तो हम अपने यहां राम राज्य के ही सर्वोत्तम होने की बात स्वयं मानते हैं। इसका आशय यह है कि उससे पहले और बाद की राज्य व्यवस्थायें दोषपूर्ण रही हैं। इसके बावजूद भारतीय राज्य व्यवस्थाओं में राजाओं की जनता के प्रति निजी सहानुभूति एक महत्वपूर्ण पक्ष रहा है। इसमें राजा भले ही कोई कैसे भी बना हो वह प्रजा के प्रति निजी रूप से संवेदनशील रहता था-कुछ अपवादों को छोड़ना ही ठीक रहेगा। आधुनिक लोकतंत्र में भले ही राजा का चुनाव जनता करती हो पर वह निजी रूप से संवेदनशील हो यह जरूरी नहीं है। राज्य कर्म से जुड़ने वाले जनता का मत लेने के लिये प्रयास करते हैं। इस दौरान उनका अनाप शनाप पैसा खर्च होता है जो अंततः धनवानों से ही लिया जाता है जिनको राजकीय रूप से फिर उपकृत करना पड़ता है। उनको अपनी कुर्सी जनता की नहीं धन की देन लगती है। बस, यहीं से भ्रष्टाचार का खेल प्रारंभ हो जाता है।
अब जो देश की स्थिति है उसमें हम आधुनिक लोकतंत्र से पीछे नहीं हट सकते पर व्यवस्था में बदलाव के लिये यह जरूरी है कि राज्य पर समाज का दबाव कम हो। यह तभी संभव है जब समाज की सामान्य व्यवस्था में राजकीय हस्तक्षेप कर हो। सबसे बड़ी बात यह है कि हमें अपना पूरा संविधान फिर से लिखना होगा। पहले तो यह निश्चय करना होगा कि जो अंग्रेजों ने कानून बनाये उनको पूरी तरह से खत्म करें। अंग्रेजों ने हमारे संविधान के कई कानून इसलिये बनाये थे जिससे कि वह यहां के लोगों को नियंत्रण में रख सकें। वह यहां के समाज में दमघोंटू वातावरण बनाये रखना चाहते थे जबकि उनका समाज खुले विचारों में सांस लेता है। उनके जाने के बाद भारत का संविधान बना पर उसमें अंग्रेजों के बनाये अनेक कानून आज भी शामिल हैं। सीधी बात कहें तो यह कि समाज में राज्य का हस्तक्षेप कम होना चाहिये। भारतीय संविधान की व्यवस्था ऐसी है कि उसकी किताबों की पूरी जानकारी बड़े बड़े से वकील को भी तब होती है जब संबंधित विषय पर पढ़ता है। उसी संविधान की हर धारा की जानकारी आम आदमी होना अनिवार्य माना गया है। अनेक प्रकार के कर जनता पर लगाये गये हैं पर राजकीय संस्थाओं के लिये आम जनता के प्रति कोई दायित्व अनिवार्य और नियमित नहीं है। केंद्रीय सरकार को जनता के प्रति सीधे जवाबदेह नहंी बनाया जा सकता। कुछ हद तक राज्य की संस्थाओं को भी मुक्ति दी जा सकती है पर स्थानीय संस्थाओं के दायित्वों को कर वसूली से जोड़ा जाना चाहिये। इतना ही स्थानीय संस्थाओं में कार्यरत अधिकारियों और कर्मचारियों की जनता के प्रति सीधी जवाबदेही तय होना चाहिये। प्रशासनिक व्यवस्थाओं से अलग जनसुविधाओं वाले विभागों को-स्वास्थ्य, शिक्षा तथा परिवहन-जनोन्मुखी बनाया जाना न कि धनोन्मुखी।
सबसे बड़ी बात यह है कि सभी प्रकार के करों की समीक्षा कर उनकी दरों का मानकीकरण होना चाहिये। जनता से सीधे जुड़े काम होने की निर्धारित अवधि तय की जाना चाहिये-इस मामले में हाल ही में मध्यप्रदेश सरकार के उठाये गये कदम प्रशंसनीय है। कहने का अभिप्राय यह है कि जब लोकतंत्र है तो सरकार की शक्ति को लोगों से अधिक नहीं होना चाहिये। आखिरी बात यह कि भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिये वर्तमान व्यवस्था में बदलाव की बात सोची जानी चाहिये। यह भारी चिंतन का काम है पर इसके बिना काम भी नहीं चलने वाला। खाली नारे लगाने से कुंछ नहीं होगा।
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कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Saturday, January 22, 2011

ज़मीन पर तैराकी-हिन्दी व्यंग्य (zamih par tairaki-hindi vyangya-hindi vyangya)

टीवी पर प्रसारित एक समाचार को देख सुनकर यह विचार नहीं बन पाया कि उस पर व्यंग्य लिखें कि चिंतन! खबर यह थी कि झारखंड में राष्ट्रीय खेलों में भाग लेने वाले तैराकों को जमीन पर तैराकी का प्रशिक्षण दिया जा रहा है क्योंकि पानी का प्रबंध नहीं हो पाया। समाचार के साथ प्रसारित दृश्यों में बाकायदा खिलाड़ियों को जमीन पर तैराकी जैसे हाथ पांव मारते दिखाया गया। उसे देखकर तो यही लगा कि जैसे कि वह योग साधना जैसा कुछ कर रहे हैं। अब हम सोच रहे थे कि इस पर हंसे कि रोऐं! हंसें तो व्यंग्य लिखना पड़ता और रोऐं तो चिंतन! मगर यह खबर तो ऐसा स्तब्ध किये दे रही थी कि लगने लगा कि इस पर तो हिन्दी में कोई विद्या लिखने लायक तो है ही नहीं-कम से कम अपनी बुद्धि में तो नहीं।
यह समाचार हास्य कविता जैसा भी नहीं था क्योंकि उस पर हंसी नहीं आती। व्यंग्य जैसा लिखें तो लगता है कि प्रस्तुति दर्दनाक बन जायेगी। मित्र लोग हास्य कविता लिखना पसंद नहीं करते। शायरियां लिखना हमें आता नहीं। हास्य व्यंग्य देखकर लोग कह देते हैं कि यह तो चिंतन जैसा बन गया। लोग गंभीर चिंतन लिखने के लिये कहते हैं पर जब दर्द असहनीय हो जाये तो एक ही रास्ता है कि हास्यासन किया जाये।
जमीन पर तैराकी का प्रशिक्षण अपने आपमें एक अजूबा है जो शायद अपने ही देश में संभव है। युवा पीढ़ी को आगे लाने के दावे रोज सुनते हैं पर इस सवाल का जवाब कौन देगा कि घर में ही जब पानी का अकाल हो तो बाहर कौन जाकर शेर जैसी तैराकी करेगा। मगरमच्छ कागज का बांध बनाकर पानी को रोक लें तो आम आदमी मछली जैसे भी कहां तैर पायेगा।
बहुत हास्य व्यंग्य लिखे और पढ़े पर लगता है कि बेकार रहा। शरद जोशी, हरिशंकर परसाईं और श्रीलाल शुक्ल हिन्दी भाषा में हास्य व्यंग्य लिखने के लिये जाने जाते हैं। उन जैसे रचनाकारों का हिन्दी साहित्य में बहुत बड़ा स्थान है। श्री शरद जोशी का एक वाक्य तो भूलाये नहीं भूलता कि ‘हम इसलिये अब तक जिंदा हैं क्योंकि हमें मारने के लिये किसी के पास फुर्सत नहीं है।’
उनका आशय यही था कि चूंकि लुटने पिटने के लिये बहुत सारे धनी मानी लोग हैं पर लूटने वाले कम हैं। इसलिये अपना नंबर तो आने से रहा। बहरहाल अब तो देश में ऐसी ऐसी घटनायें होने लगी हैं कि कहना पड़ता है कि बड़े बड़े व्यंग्यकार भी ऐसी कल्पना क्या कर पायें? जब कोई रचनाकार व्यंग्य लिखता है तो समाज में व्याप्त अंर्तविरोधों में अपनी कुछ कल्पना शक्ति का भी सहारा लेता है। ऐसी रचना कोई शायद कोई नहीं कर पाया कि नयी पीढ़ी को जमीन पर तैराकी का प्रशिक्षण देकर उनसे पदक लाने की आशा की जायेगी। कागजी बांध इतने शक्तिशाली हो जायेंगे कि पानी की एक बूंद का निकलकर जमीन पर आना भी संभव नहीं होगा।
हां कई व्यंग्य पढ़ने को मिले पर ऐसा नहीं! कुंऐं कागज पर खुद जमीन पर लापता हो गये। सार्वजनिक उद्यान फाईलों में हरियाली से लहलहाते रहे पर वहां कचड़ा घर दिखता रहा। सड़कें किसी फिल्मी हीरोईन के गाल की तरह चिकनी बनकर कागज पर चमकती रहीं पर उन पर पैदल चलना भी दूभर रहा है। ऐसा कई बार पढ़ा और सुना। संभव है कि कहंीं तैराकी का तालाब बनाकर वहां प्रशिक्षण भी कागजों पर दिया गया हो। मगर यहां तो सचमुच प्रशिक्षण दिया जा रहा है। मतलब आधा हास्य और आधा व्यंग्य! अवाक खड़े होकर देखने के बाद चिंतन क्या काम करेगा?
नयी पीढ़ी के लड़के लड़कियों के साथ किया गया यह क्रूर मजाक इराक की याद दिलाता है। जहां सद्दाम के बेटे पर आरोप लगाया कि अपनी फुटबाल टीम के हारने पर उसने उसके सदस्यों की हत्या कर दी थी। यहां दैहिक हत्या नहीं की गयी पर जवान पीढ़ी के उत्साह की हत्या का पाप मौजूद है। आदमी की देह हत्या और उसके सपने की हत्या एक समान ही है क्योंकि सपना टूटने पर आदमी मृतक समान ही हो जाता है।
हैरानी की बात यह है किसी को खौफ नहीं है। इस बात की चिंता नहीं है कि कहीं प्रचार माध्यमों की नज़र इस पर न पड़ जाये। बच्चों को जमीन पर छाती रगड़ने के लिये कहना वह भी तैराकी के खेल के प्रशिक्षण के नाम पर! यह भारत है जहां खेलों के विकास के नाम पर करोड़ों फूंके जा रहे हैं और खिलाड़ियों को फालतू की चीज माना जा रहा है। वैसे हमारे अनेक खिलाड़ी खेलोें के विकास की बात करते हैं पर बताईये उनका भी कहीं विकास होता है। खेलों से तो आदमी का विकास होता है वह भी तब जब अपने खिलाड़ियों को सुविधायें दें। क्रिकेट के एक महान धुरंधर उस दिन कह रहे थे कि ‘आईपीएल से भारत में क्रिकेट का विकास हुआ है!’
क्रिकेट का विकास चाहिये या क्रिकेट से देश की युवा पीढ़ी का! जहां तक देश की युवा पीढ़ी का क्रिकेट से विकास करने की बात है तो उसका कोई मतलब नहीं है क्योंकि यह खेल बच्चे बच्चे में अपनी जड़ें जमा चुका है। ऐसे में जब कोई क्रिकेट खेल के विकास की बात कर रहा है तो वह ढोंगी है और अपने धंधे का जुगाड़ कर रहा है। अभी कॉमनवेल्थ हुए। एक दो दिन तक प्रचार माध्यम उसकी कमियों का रोना रोते रहे पर जैसे ही अपना मतलब बना सभी उसे देश में खेलों के विकास से उसे जोड़ने लगे। दिल्ली में हुए इन खेलों से देश के खिलाड़ियों में क्या सुधार आया पता नहीं पर चीन में हुए एशियाड में असलियत उजागर हो गयी। दिल्ली में खेल सुविधायें बनने से देश में खेल का स्तर नहीं सुधर सकता। अगर भारत को खेल में अपना नाम ऊंचा करना है तो उसे शहरों की बजाय गांवों में अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए। खासतौर से आदिवासी इलाकों में। शहर वाले केवल क्रिकेट खेलने की कुब्बत रखते हैं क्योंकि उसमें फिटनेस अधिक जरूरी नहीं है। झारखंड आदिवासी इलाका है और वहां अच्छे खिलाड़ियों के मिलने की पूरी संभावना है पर वहां सुविधाओं का यह हाल है तब अंतर्राष्ट्रीय खेलों में हमें ज्यादा आशा नहींे करना चाहिए। सच बात तो यह है कि हमारे यहां के आर्थिक सामाजिक तथा प्रतिष्ठित शिखरों पर बैठ महापुरुषों को खेल चाहिये नाम और नामा कमाने के लिये न कि खिलाड़ी। खेलों के आयोजन से उनका कमीशन बनता है और अखबारों में प्रचार होता है सो अलग! खिलाड़ी तो खाना मांगता है और वह भी अच्छा!
खाने पर याद आयी उतरांचल की एक खबर! वहां बर्फ पर खेले जाने वाले खेल के लिये विदेश से खिलाड़ी आये जिसमें पाकिस्तानी भी शामिल थे। सभी को जमीन पर बैठकर हल्का खाना खिलाया गया और आयोजन से जुड़े पदाधिकारी टेबलों पर बैठकर ऊंचा खाना खाते रहे। मतलब यह कि जिन पर खेलों का जिम्मा है उनको खाने से मतलब है खिलाड़ी से नहीं इसलिये ही वह खेलों के विकास की बात करते हैं जो कभी हो ही नहीं सकता क्योकि खेलों से एक स्वस्थ और उत्साही मनुष्य का निर्माण होता और यही इनके आयोजन का मतलब होता है। खेलों के नाम जो भी शीर्ष पुरुष सक्रिय हैं उनको खेल चाहिये न खिलाड़ी! उनको स्वस्थ समाज नहीं चाहिये क्योंकि उसमें चेतना होती है और वहां ज़मीन पर तैराकी का प्रशिक्षण देना संभव नहीं है। इसलिये उन्होंनें जड़ समाज की सरंचना को ही महत्व दिया है कहने को दावे कुछ भी करते रहें।
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Friday, January 7, 2011

लालबत्ती-हिन्दी व्यंग्य (lalbatti or red light-hindi satire article)

लालबत्ती वाली गाड़ियों को देखते ही आम आदमी की आंखें फटी और कान खड़े हो जाते हैं। इसका मतलब यह है कि कोई विशिष्ट व्यक्ति उस वाहन में है जिसका मार्ग रोकना या बाधा डालना खतरे से खाली नहीं है। आधुनिक राजशाही में यह लालबत्ती विशिष्टता का प्रतीक बन गयी है। आजकल के युवा वर्ग न पद देखते है न वेतन बस उनकी चाहत यही होती है कि किसी तरह से लालबत्ती की गाड़ी में चलने का सौभाग्य मिल जाये। कुछ लोग तो मजाक मजाक में कहते भी हैं कि‘अमुक आदमी पहले क्या था? अब तो लालबत्ती वाली गाड़ी में घूम रहा है।’
मगर कुछ यह कुदरत का नियम ऐसा है कि सपने भले ही सभी के एक जैसे हों पर भाग्य एक जैसा नहीं होता। अनेक लोग लालबत्ती की गाड़ी की सवारी के योग्य हो जाते हैं तो कुछ नहीं! मगर सपना तो सपना है जो आज की राजशाही जिसे हम लोकतंत्र भी कहते हैं, यह अवसर कुछ लोगो को सहजतना से प्रदान करती है।
उस दिन एक टीवी चैनल पर लालबत्ती के दुरुपयोग से संबंधित एक कार्यक्रम आ रहा था। पता लगा कि ऐसे अनेक लोग अपनी गाड़ियों पर लालबत्ती लगाते हैं लालबत्ती लगी गाड़ियों का दुरुपयोग कर रहे हैं जिनको कानूनन यह सुविधा प्राप्त नहीं है। यहां यह बात दें कि लालबत्ती का उपयोग केवल सरकारी गाड़ियों में ही किया जाता है जो कि संविधानिक पदाधिकारियों को ही प्रदान की जाती हैं। मगर लालबत्ती का मोह ऐसा है कि अनेक लोग ऐसे भी हैं जो अपनी गाड़ियों पर बिना नियम के ही इसको लगवा रहे हैं। ऐसे लोग भी हैं जिनको लालबत्ती लगाकर चलने का अधिकार तभी है जब वह कर्तव्य पर हों पर वह तो मेलों में अपने परिवार को लेकर जाते हैं। अनेक जनप्रतिनिधियों को लालबत्ती के उपयोग की अनुमति नहीं हैं पर जनसेवा के लिये वह उसका उपयोग करने का दावा करते हैं।
चर्चा मज़ेदार थी। एक पूर्व पुलिस अधिकारी ने बताया कि सीमित संवैधानिक पदाधिकरियों को ही इसका अधिकार है। सामान्य जनप्रतिनिधियों को इसके उपयोग का अधिकारी नहीं है। ऐसे में कुछ जनप्रतिनिधियों से जब इस संबंध में सवाल किया गया तो उनका जवाब ऐसा था कि उस पर यकीन करना शायद सभी के लिये संभव न हो। उनका कहना था कि
‘‘जिस तरह एंबूलैंस को लालबत्ती लगाने का अधिकार है उसी तरह हमें भी है। आखिर हमारा चुनाव क्षेत्र है जहां आये दिन परेशान लोगों की सूचना पर हमें जाना पड़ता है। ऐसी आपातस्थिति में ट्रैफिक में फंसने के लिये लालबत्ती का होना अनिवार्य है।’’
एक ने कहा कि
‘‘इससे सुरक्षा मिलती है। इस समय कानून व्यवस्था की स्थिति खराब है और आम आदमी पर खतरा बहुत है। लालबत्ती देखकर कोई उस वक्र दृष्टि नहीं डालता। फिर टेªफिक में फंसने पर समय खराबा होगा तो हम जनसेवा कब करेंगे?’’
एक अन्य ने कहा कि
‘‘हम जनप्रतिनिधि हैं और लालबत्ती हमारी इसी विशिष्टता का बयान करती है।’
पूर्व पुलिस अधिकारी ने इस हैरानी जाहिर करते हुए कहा कि‘‘चाहे कुछ भी हो जनप्रतिनिधि को कानून का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। अगर वह जरूरत समझते हैं तो ऐसे नियम क्यों नहीं बना लेते जिससे उन पर उंगली न उठे।’’
बात लाजवाब थी। अगर जनप्रतिनिधियों को लालबत्ती का अधिकार चाहिए तो वह अपने मंचों पर जाकर अपनी बात क्यों नहीं रखते? वह कानून बनाने का हक रखते हैं तब कानून क्यों नहीं बनवाते?
मगर अपने देश की स्थिति यह है कि विशिष्ट होने या दिखने की चाहत सभी में है पर उसके दायित्वों का बोध किसी को नहीं है। जब विशिष्ट हो गये तो कुछ करने को नहीं रह जाता। बस, अपने मोहल्ले, रिश्तेदारों और मित्रों में विशिष्ट दिखो। लोग वाह वाह करें! करना कुछ नहीं है क्योंकि विशिष्ट बनते ही इसलिये हैं कि आगे कुछ नहीं करना! मेहनत से बच जायेंगे! कानून क्यों बनवायें? वह तो वह पैसे ही इशारों पर चलता है! भला विशिष्ट कभी इसलिये बना जाता है कि दायित्व निभाया जाये? विशिष्ट होने का मतलब तो अपने दायित्व से मुक्त हो जाना है बाकी काम तो दूसरे करेंगे! कानून बनाने का काम तो तभी करेेंगे जब कोई दूसरा सामने रखेगा। मगर रखेगा कौन? सभी तो विशिष्टता का सुख उठा रहे हैं। जब सुख ऐसे ही मिल रहा है तो उसके लिये कानून बनाने की क्या जरूरत?
मगर लालबत्ती का शौक ऐसा है कि अनेक लोग तो ऐसे ही लगवा लेते हैं। लालबत्ती का खौफ भी ऐसा है कि दिल्ली में एक डकैत गिरोह के लोग पकड़े गये जो लालबत्ती लगी गाड़ी का उपयोग पड़ौसी शहर से आने के लिये करते थे। लालबत्ती देखकर उनको कहीं रोका नहीं जाता था। पकड़े जाने पर पुलिस के कान खड़े हुए पर फिर भी यह संभव नहीं है कि कोई किसी लालगाड़ी लगी गाड़ी को रोकने का साहस कर सके। सरकारी हो या निजी लोग लालगाड़ी पर सवार होने के बाद विशिष्टता की अनुभूति साथ लेकर चलते हैं। सरकारी आदमी तो ठीक है पर निजी लोग तो रोकने पर ही कह सकते हैं-‘ए, तुम मुझे जानते नहीं। अमुक आदमी का अमुक संबंधी हूं।’
मुद्दा यह है कि आदमी की विशिष्टता केवल लालबत्ती के इर्दगिर्द आकर सिमट गयी है। हम कहीं भी सिग्नल पर लालबत्ती देखकर रुक जाते हैं क्योंकि अपने आम आदमी होने का अहसास साथ ही रहता है। यह अहसास ऐसा है कि अगर खुदा न खास्ता कहीं लालगाड़ी वाली गाड़ी में बेठने लायक योग्यता भी मिल जाये तो अपने चालक से-अपुन को गाड़ी न चलाना आती है न सीखने का इरादा है-सिग्नल पर लाल बत्ती देखकर कहेंगे कि ‘रुक जा भाई, क्या चालाना करवायेगा?’
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Tuesday, December 28, 2010

उपवास और भूख-हिन्दी शायरी

रोटी की तलाश में
आंखें फैलाये इंसान को
कभी पशु न समझो,
जब तुम्हारा पेट खाली होगा
तुम भी ऐसे ही नज़र आओगे।
दरियादिल बनकर देखो
उपवास और भूख के अंतर को
तभी समझ पाओगे।
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Friday, December 24, 2010

प्याज पुराण-लघु हिन्दी व्यंग्य (pyaj puran-laghu hindi vyangya)

प्याज के महंगे होने के लेकर हमारे देश के प्रचार माध्यम खूब छोड़ मचा रहे हैं। स्पष्टतः विज्ञापनों के बीच में प्रसारण में उनको इस विषय पर खूब सामग्री मिल रही है। सवाल यह है कि प्याज़ का महंगा होना क्या वाकई उतनी बड़ी समस्या है जितनी प्रचारित की जा रही है। संभव है देश के महानगरों में इसका असर हो पर छोटे शहरों में इसका कोई प्रभाव नहीं दिखाई दे रहा है।
एक मज़दूर से इस लेखक की चर्चा हुई।
उससे लेखक ने कहा-‘प्याज़ वाकई महंगी है।’
मज़दूर ने कहा कि‘नहीं, आज सुबह एक ठेले वाले से पूछा तो उसने पैंतीस रुपये किलो बताई।’-
लेखक ने कहा‘-वाकई बहुत महंगी है। अब देखो जो गरीब लोग सब्जी नहीं खरीद पाते उनके लिये प्याज ही सब्जी के रूप में बचती है।’
उस मज़दूर ने कहा-‘हमेशा तो नहीं खाते पर कभी कभी मिर्ची के साथ प्याज का सलाद बनाकर खा लेते हैं। बाकी महंगी तो सारी सब्जियां हो रही हैं। वैसे भी प्याज और लहसून कौन सभी लोग खाते हैं।’
जब प्याज़ के महंगे होने की बात आती है तो कहा जाता है कि गरीब लोग सब्जी की जगह इसका उपयोग कच्चे सलाद के रूप में ही करते हैं। हमारे देश में गरीब और मज़दूर की समस्याओं का रोना लेकर हिट होने का एक आसान फार्मूला है। ऐसे में जब किसी ऐसे विषय पर लिखा जाये जो वाकई संवेदनशील होने के साथ गरीब से भी जुड़ा हो तो कुछ प्रमाणिकता के साथ स्वयं भी जुड़ना चाहिए। हमने एक नहीं दो दिहाड़ी मज़दूरों को टटोला। महंगाई तथा अन्य समस्याओं से पीड़ित उन लोगों ने केवल प्याज़ की महंगाई को लेकर कोई अधिक बयान नहीं दिया।
हमारी जानकारी में यह दूसरा अवसर है जब प्याज़ की महंगाई की चर्चा हुई है। पहले चर्चा हुई तो पता चला कि उससे उस दौरान हुए राज्य विधानसभा चुनावों के परिणाम प्रभावित हुए। अब पता नहीं आगे क्या होगा?
जहां तक प्याज और लहसून का सवाल है तो इनका उपयोग सभी लोग नहंी करते। अनेक लोग तो इनका खाना ही अपराध समझते हैं। मनुस्मृति में प्याज़ को लेकर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया पर लहसून के सेवन के लिये मना किया गया है जो कि संभवतः प्याज की प्रजाति की ही उत्पति है। अनेक लोग तो प्याज खाने वालों को किराये पर मकान देने से मना कर देतें हैं और देते भी हैं तो न खाने की शर्त के साथ! लहसून को तो तामस पदार्थ माना गया है।
ऐसे में प्याज की कीमतें बढ़ने की चर्चा सीमित वर्ग को प्रभावित करतीं दिखती है वह भी केवल बड़े शहरों के बुद्धिमान नागरिकों को! प्रचार माध्यम इस पर प्रायोजित आंसु बहा रहे हैं। ऐसा लगता है कि उनको देश की बहुत फिक्र हैं। जबकि सच यह है कि प्याज़ के बढ़ने के समाचारों वजह से अन्य सब्जियां महंगी हो रही हैं।
चूंकि सारे टीवी चैनल महानगरों में है तो प्याज की महंगाई पर रोने के लिये वह लाते भी ऐसे ही लोग हैं जो धनी या मध्यम वर्ग के हैं। वह प्याज हाथ में लेकर उसकी महंगाई का रोना लेते हैं। हवाला इस बात का दिया जाता है गरीब इससे रोटी खाते हैं। ऐसे लोगों को देश की स्थिति का आभास नहीं है। इस देश में तो कई जगह ऐसी स्थिति है कि प्याज क्या लोग घास खाकर भी गुजारा करते हैं। जिनके पास पैसा नहीं है वह रोटी खाने के लिये प्याज क्या खरीदेंगे उनके पास तो रोटी भी नहीं होती। मुश्किल वही है कि गरीब के लिये रोते रहो और अपना चेहरा लोगों की आंखों पर थोपे रहो-इस फार्मूले पर काम करते रहने से प्रचार माध्यमों में अपना निरंतर रूप से चलाया जा सकता है।
वैसे भी प्याज़ को भोजन की कोई आवश्यक वस्तु नहीं माना जाता। ऐसे कई लोग हैं जिन्होंने पूरी जिंदगी बिना प्याज़ खाये निकाली है। फिर भी जिन लोगों को गरीबों की चिंता है वह प्याज़ न खायें तो मर नहीं जायेंगे। इसलिये हमारी तो सलाह यह है कि जिन लोगों के पास अन्य सब्जियां खरीदने की शक्ति है वह तब तक प्याज का सेवन न करें जब तक वह सस्ता न हो जाये। ताकि गरीबों के लिये रोने वालों का प्रलाप हमारे सामने न आये। टीवी चैनलों पर अच्छी साड़ियां पहने महिलायें या जोरदार पैंट शर्ट पहने चश्मा लगाये पुरुष जब प्याज़ की महंगाई का रोना रोते हैं तो अफसोस होता है यह देखकर कि उनकी सहशीलता कम हो गयी है। जिस प्याज़ के बिना उनके ही देश के अनेक लोग जिंदा रह जाते हैं उसे वह एक महीने के लिये नहीं छोड़ सकते। बहरहाल या प्याज की महंगाई का पुराण भी एक प्रचार माध्यमों का ढकोसला है जिनको विज्ञापन के बीच अपना काम चलाना है।
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Friday, December 10, 2010

प्रकृति और घोटाले-हिन्दी हास्य कविता (prakruti aur ghaotale-hindi hasya kavita)

शिक्षक ने बच्चों से कहा
‘‘हमारे देश पर प्रकृति की
बहुत बड़ी कृपा है,
यहां बरसात भी होती समय पर
तो सूरज भी तपा है,
एक तरफ हिमालय देता है पहरा,
तीन तरफ हिमालाय बांधे है सहरा,
सुरक्षा है चारों तरफ
इसलिये हमेशा ही यहाँ जन जन ने
भगवान का नाप जपा है।’’

सुनकर एक बालक बोला,
‘‘मगर मास्टर जी
मेरे दादाजी, पिताजी से कह रहे थे
कि 'पहले तो होते थे देश में घोटाले
पर अब तो चारों तरफ  उनमें फंसा है,
देखो,
जो करते हैं नैतिकता की बात कलमकार
वही रोते हैं भ्रष्टाचार पर
हम  जैसे आम लोग उनके
शब्दों से नहीं  दलाली के काम  पर खफा हैं,
देश में बढ़ गया है पाप, चारों तरफ
तभी तक कोई  आदमी  ईमानदार दिखाई देता
जब तक घोटालों में नहीं नपा है,।"
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कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Monday, December 6, 2010

भक्ति की आड़ में मनोरंजन बेचने का प्रयास-हिन्दी व्यंग्य (bhakti aur manoranjan-hindi vyangya)

गुजरात के एक शहर में एक दिलचस्प समाचार टीवी चैनल पर देखने को मिला। वहां एक मंदिर निर्माण में धन जुटाने के लिये नृत्य और संगीत का कार्यक्रम आयोजित किया गया ताकि उससे मिलने वाली राशि से सर्वशक्तिमान को अनुग्रहीत किया जा सके। खबर देखकर तो हंसी आ गयी। वहां कार्यक्रम देखने के लिये अनेक लोग आये पर वह इतनी कम देर चला कि उससे अपने को ठगा अनुभव कर रहे अनेक दर्शक नाराज हो गये और उन्होंने कुर्सियां तोड़ डाली। इस धर्म और मनोरंजन के बीच रिश्ता देखकर बहुत सारे ख्याल मन में आये।
कार्ल मार्क्स की बहुत सारी बातें हमारे समझ में नहीं आती पर उसने जो कहा है कि धर्म एक अफीम की तरह है उसमें कोई शक नहीं है। मगर कार्ल मार्क्स ने कहा है कि दुनियां का सबसे बड़ा सच रोटी है, यही कारण है कि उसका कोई चेला इस बात पर यकीन नहीं करता कि जिसने पेट दिया है वह भोजन भी देता है। इसलिये सभी गरीबों और मज़दूरों को रोटी दिलाने में लगे हैं। मगर सत्य रोटी नहीं जीवन है जो कि अपनी गति से इस धरती पर विचरण करता है भले ही जीव पैदा होने के साथ ही मरते हैं भी हैं पर सभी भूखे नहंी मरते।
अलबत्ता अगर कार्ल मार्क्स भारत आया होता तो वह अनेक अन्य सत्य भी जान जाता। इस देश में रोटी के साथ ही स्वाद भी बड़ा सत्य है। लोग रोटी से अधिक स्वाद पर अपना ध्यान रखते हैं। रोटी पेट भरने के लिये नहीं पेट भरने को ही जीवन मानते हैं। पेट भर कर उनका मन मनोरंजन की तरह भागता है और यह मनोरंजन भी कहीं इतना बड़ा सत्य बन जाता है कि रोटी को भी आदमी भूलकर उसमे मस्त रहता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि गरीबी से जूझ रहे इस देश में भूख से कम बल्कि भरपेट और गंदा खाने से लोग अधिक बीमार पड़ने के साथ ही मरते भी हैं। यही कारण है कि कार्ल मार्क्स के शिष्य तथा अनुयायी बरसों तक इस पूरे देश में भूखों और गरीबों के सहारे सत्ता का स्वाद चखने का सपना पाले रहे पर चंद इलाकों के अलावा कुछ हाथ नहीं आता। धर्म को अफीम मानने वाले इस गुरु के चेले आज की धर्मनिरपेक्षता का स्वांग रच रहे हैं और उसमें अब उनको अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक के बीच अपना सपना साकार होता दिखता है। इनमें कई तो सर्वशक्तिमान के एक दरबार ढहने पर अपना विलाप हर साल करते हैं। वैसे रोटी का सत्य ही केवल सत्य नहीं है। रोटी का स्वाद भी सत्य नहीं है। मनोरंजन भी सत्य नहीं है। उनके लिए सत्य केवल धर्मनिरपेक्षता है। बहुसंख्यक समाज के कुछ टुकड़े गरीबी, भुखमरी तथा बेकारी के नाम पर तो वैसे ही उनके साथ हो जाते हैं अब समूचा अल्पसंख्यक समाज भी हाथ आ जाये तो ही उनके सपने पूरे होंगे। यह अलग बात है कि बाबा रामदेव, आसाराम बापू तथा श्री रविशंकर जैसे संगठित धर्म प्रवर्तकों की धारा उसे पूरा होने देगी या नहीं क्योंकि देखा जा रहा है कि अपने धर्मों के पाखंड से उकताये भारतीय लोग एक नयी रौशनी योग तथा भारतीय अध्यात्म में ढूंढ रहे हैं।
इधर इन कार्ल मार्क्स के चेलों का सामना भारतीय धर्म रक्षकों से भी होता रहता है। शक है कि यह सब फिक्सिंग के तहत ही होता है। यह धर्म रक्षक भी वह हैं जो केवल मंदिरों के बनाने तक ही अपना अभियान रखते हैं। उनके लिए मंदिर बनाना ही धर्म निभाना है। ऐसा इसलिये कि मंदिर बनाने में ईंट, पत्थर, सीमेंट, लोहा, लकड़ी तथा अन्य सामान लगता है और उसकी खरीद में कमीशन बनने के साथ ही बाद में चढ़ावा भी आता है। गुजरात में तो धर्म की प्रवृत्ति बहंुत ज्यादा है। हमारे अध्यात्म के आधार स्तंभ भगवान श्रीकृष्ण ने वहीं अपना निवास बनाया था। आज भी अनेक बड़े संत वहीं के हैं। प्रसंगवश हम अनेक बार यह कह चुके हैं कि जिस तरह कमल कीचड़ में और गुलाब कांटों के बीच पनपता है उसी तरह हमारा अध्यात्म ज्ञान इसलिये ही सटीक है क्योंकि हमारे देश में अज्ञान का बोलबाला अधिक रहा है। दुष्टता में रावण और कंस जैसे प्रतापी शायद ही कहीं हुए जिनकी वजह से हम भगवान श्रीकृष्ण के साथ ही भगवान श्रीराम का नायकत्व हम अकेले ही नहीं बल्कि पूरे विश्व के लोग पहचान पाये। लोगों के मन में अज्ञान, लोभ, लालच तथा काम का ऐसा वास है कि वह उससे विरक्त होने पर अध्यात्म शांति के लिये भी उतनी तेजी से भागते हैं और फिर देश के चालाक धार्मिक ज्ञानी उनका दोहन करते हैं। ऐसा भी कहीं विश्व में अन्यत्र होता नहीं दिखता। जिस भारतीय योग को पूरा विश्व बरसों से मान रहा है उसकी मान्यता अब कहीं जाकर बाबा रामदेव के आकर्षण से बड़ी है। कोई येागी भी बिना युद्ध के महान बन सकता है, यही सोचकर योग की तरफ आम लोग आकर्षित हुए हैं। नतीजा यह है कि कहीं, हॉट योग, कहीं सैक्सी योग, कहीं नग्न योग तो कहीं हास्य योग भी होने लगा है। उसे एक नयी शैली में विक्रय वस्तु बना दिया है। मतलब धर्म कहीं न कहीं अफीम या व्यसन की तरह बिकने का काम करता ही है।
गुजरात में जिस जगह मंदिर बनाने के लिये आयोजन किया गया होगा उनकी ईमानदारी या बेईमानी पर हम सवाल नहीं उठा रहे बल्कि उनके चिंतन के तरीके पर ही अपनी राय रख रहे हैं जिसमें यह मान लिया गया है कि जिस तरह इस दुनियां में बिना गलत राह चले बड़ा आदमी नहीं बना जा सकता वैसे ही भगवान का मंदिर बनना भी संभव नहीं है।
हैरानी की बात है कि लोग दान देने की बजाय नृत्य और गीत के लिये पैसा खर्च कर आये-यकीनन उन्होंने सोचा होगा कि इस तरह हम धर्म का काम कर रहे हैं। अब दान लेना भी आसान नहीं रहा न! पहले अनेक स्थानों पर मंदिर बनाने या नवरात्रि और गणेश प्रतिमाओं की स्थापना को लेकर जबरदस्ती चंदा लेने के आरोप लगते थे। अब तो इस देश मे धर्मनिरपेक्षता मय वातावरण बना दिया गया है तो धार्मिक व्यवसायियों ने नृत्य और गीत के माध्यम से धन जुटाने के प्रयास शुरु किये हैं। कहीं गणेशोत्सव और नवरात्रि पर बाकायदा ऐसे कार्यक्रम हुए जिनमें भक्ति दिखावे की थी जिस पर मनोंरजन का लेबल चिपका दिया गया। मतलब भक्तों को अब दर्शक और श्रोता को चोला भी पहनाया जा रहा है।
हम यहां केवल इसके लिये शिखर पुरुषों को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते। आम लोग भी कम नहीं है। वह भी चाहते हैं कि हम दर्शक और श्रोता की तरह लुत्फ उठायें पर दिखें भक्त की तरह! अध्यात्मिक ज्ञान के बिना यह समाज भटकाव की तरफ जा रहा है।
हम अगर भारतीय अध्यात्म ज्ञान की बात करें तो उसे समझने वाले यहां कितने हैं, यह तय करना कठिन है! वजह यह है कि आदमी के अंदर स्वयं अभिव्यक्त होने की भावना उसे अहंकार की तरफ ले जाती है और अहंकार नैतिक पतन की तरफ! बहुत कम लोग इस बात पर यकीन करेंगे कि योगसाधना भी अगर नियमित की जाये तो वह व्यसन की तरफ चिपक जाती है यह अलग बात है कि वह खतरनाक नहीं है। ध्यान लगाने का अभ्यास हो जाये तो सारी दुनियां में चल रहे घटनाक्रम में स्वयं को देखने की इच्छा से आदमी विरक्त हो जाता है। मगर इससे यह फायदा होता है कि आपको कोई दूसरा संचालित नहंी कर सकता। भटकाव इसलिये नहीं होता क्योंकि अपना लक्ष्य हमेशा अपने पास रहता है जिसे हम कहते हैं मन की शांति! मनोरंजन कभी शांति नहीं देता बल्कि अपने साथ विकारों का ऐसा पिटारा ले आता है कि रात की नींद और दिन का चैन नहीं रह जाता। योग साधक भीड़ में इस बात का अहसास नहीं होने देता कि वह उससे अलग है पर होता तो है। धार्मिक तथा मनोंरजन के व्यवसायी इस कदर चालाक होते हैं कि वह आम इंसानों का अस्तित्व ही उससे अलग कर देते हैं पर योग साधक पर उनका जादू नहीं चलता। यही कारण है कि मनोरंजन और भक्ति को प्रथक रखने की कला वही जानते हैं। यह अलग बात है कि वह भक्ति में ही मनोरंजन करते हैं और बिना अध्यात्मिक ज्ञान के मनोरंजन को वह एक घटिया काम मानते हैं भले ही उसें सर्वशक्तिमान के लिये ढेर सारे निवेदन वाले गीत शामिल हों।
निष्कर्ष यही है कि जिस तरह इस संसार में कार्ल मार्क्स के अनुसार दो ही जातियां हैं एक अमीर और दूसरी गरीब! उसी तरह अपने देश में भी दो प्रकार के मनुष्य रहते हैं एक तो वह सच्चे भक्त हैं और दूसरे महा पाखंडी। मुश्किल यह है कि धर्म की ठेकेदारी अब विशुद्ध रूप से पाखंडियों के हाथ में आ गयी है जिनसे बचने की आवश्यकता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारतीय अध्यात्म के मूल तत्व अत्यंत प्रभावी हैं पर इसके लिये यह जरूरी है कि हम अपने धर्म ग्रंथों का स्वयं अध्ययन करें।
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Friday, December 3, 2010

नाम में वाकई कुछ नहीं रखा है-हिन्दी कवितायें (naam men khuchh nahin rakha hai-hindi kavitaen)

आदर्श होने का दावा
बाहर से लगता है
मगर उसके अंदर छिपे ढेर सारे दाग हैं,
रावण और कंस जैसे
नाम रखकर कोई कातिल बने
यह जरूरी नहीं है
देवताओं का मुखौटा लगाकर
उजाड़े कई लोगों ने बहुत सारे बाग हैं।
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नाम में वाकई कुछ नहीं रखा है,
दैत्यों ने भी कलियुग का अमृत चखा है,
अब उनको मरने का डर नहीं लगता
देवताओं के मुखौटे पहने लोग अब उनके सखा है।
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Tuesday, November 30, 2010

कौन मानेगा कि भूख इंसान को गद्दार बनाती है-हिन्दी लघु व्यंग्य (bhookh aur gaddari-hindi laghu vyangya)

प्रगतिशील और जनवादी कवियों की सामाजिक तथा राजनीतिक कविताओं पर वाहवाही कितनी भी मिलती हो पर तार्किक रूप से उनका कोई आधार नहीं होता। खासतौर से जब वह भूख, गरीबी और लाचारी से त्रस्त लोगों से क्रांति की आशा करते हैं। इतिहास के उद्धरण देकर सोये समाज को जगाने के लिये मज़दूर और गरीब को नायक बनने के लिये प्रेरित करते हैं। संभव है कुछ लोग इस बात पर नाराज हो जायें पर हमारे देश के बुद्धिजीवियों, लेखकों और अंग्रेजी शिक्षा से पढ़े लोगों ने आधुनिक युग के कुछ महानायक गढ़ लिये हैं उनके रास्ते पर चलने का दावा करते हैं। उनकी कवितायें खोखली तो निबंध कबाड़ हैं। यह बात गुस्से या निराशा में लिखी गयी हैं पर इस भय से मुक्त होकर कि जब बेईमानी और भ्रष्टाचार इस तरह खुलेआम हो रहा है और यह बुद्धिजीवी अभी भी अपनी लकीर पीट रहे हैं तब हमारा क्या कर लेंगे? इतिहास खोद रहे हैं जबकि वह एक भूलभुलैया है। दरअसल यह बात लिखने से पहले कवि नीरज की काव्यात्मक पंक्तियां दिमाग में आयी थीं जिसे शैक्षणिक पाठ में एक निबंध में पढ़ा और जिसे परीक्षा में उत्तरपुस्तिका में भी लिखा था। जहां तक हमारी स्मरण शक्ति जाती है उस पंक्ति के बाद ही लिखने के लिये कलम उठाई थी। आज उस कविता का आधा हिस्सा झूठ लगता है और लिखने के लिये ऐसी उत्तेजना पैदा हो रही है कि लगता है कि हिन्दी का आधुनिक और उत्तर आधुनिक काल केवल भ्रमवश ही चलता रहा है। याद्दाश्त के आधार पंक्तियां यह हैं।
तन की हवस मन को गुनाहगार बना देती है,
बाग को उजाड़ बना देती है,
ओ भूखे को देशभक्ति का उपदेश देने वालों
भूख इंसान को गद्दार बना देती है।
कवि नीरज की यह कविता उस समय बहुत अच्छी लगी थी।
एक अन्य कविता की पंक्तियां है जो शायद रघुवीर सहाय या राजेन्द्र यादव की हो सकती है जिसने हम पर बहुत प्रभाव डाला था।
हमसे तो यह धूल ही अच्छी
जो कुचले जाने पर प्रतिरोध तो करती है।
यहां बात कवि नीरज जी काव्यात्मक पंक्तियों की करें। तन की हवस मन को गुनाहगार बना देती है। यह सच लगता है मगर भूख इंसान को गद्दार बना देती है, इन पर एतराज है।
हम पिछले कई दिनों से देश के साथ गद्दारी करने के आरोप में पकड़े गये लोगों की बात करते हैं। इनमें से कोई भूखा नहीं है। एक तो पाकिस्तान में ही विदेश सेवा में कार्यरत एक महिला पकड़ी गयी जो वहां के सैन्य अधिकारी से प्रेम की पीगें बढ़ा रही थी। संभव है तन की हवस ने गुनाहगार बनाया हो पर उसने भी वहां पैसा कमाया जो शायद उसका मुख्य उद्देश्य था। हालांकि अब भी यह कहना कठिन है कि तन की हवस ने ऐसा किया या पैसे की लालच ने। मगर वह रोटी की भूखी नहीं थी। कम से नीरज जी की यह पंक्तियां वहां ठीक नहीं बैठती। अभी एक भारतीय प्रशासनिक सेवा का अधिकारी (आई. ए. एस.) भी एक अधिकारी पकड़ा गया। वह भी कौन? जिस पर देश की आंतरिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण दायित्व था। वह भी लड़कियों की मांग करता था। लगता है जैसे कि तन की हवस ने गुनाहगार बनाया मगर उसने पैसा भी कमाया और यही उसका ध्येय था। शारीरिक भूख से अधिक पैसे की लालच ने ही उसे देश की गद्दारी करने के लिये प्रेरित किया। पैसा हो तो शारीरिक हवस मिट ही जाती है इसलिये यह कहना बेकार है कि उन्होंने केवल यौन लाभ के लिये यह सब किया। इससे पहले भी एक अधिकारी पकड़ा गया जिस पर गोपनीय दस्तावेज लीक करने का आरोप लगा।
कोई बतायेगा कि किसी रोटी के भूखे ने देश से गद्दारी की हो। जरा, कोई बतायेगा कि किसी ने रोटी के लिये किसी का कत्ल किया हो! माओवाद के नाम पर चल रही हिंसा का समर्थन करने वाले वहां के क्षेत्रों की भूख और बेकारी की समस्याओं की बहुत आड़ लेते हैं। वह बताते हैं कि भूख की वजह से पूर्व में लोग हथियार उठा रहे हैं। जब उनसे कहा जाता है कि हथियार उठाने वाले तो भूखे नहीं है तो जवाब मिलता है कि वह भूखे नंगों को बचाने के लिये प्रेरित हुए हैं इसलिये हथियार उठाये हैं।
कौन बताये कि हमारे धर्मग्रंथों में एक सीता जी भी हुईं हैं जिन्होंने अपने पति भगवान श्रीराम को बताया था कि हथियार रखने से मन में हिंसा का भाव स्वतः आता है।
उन्होंने भगवान श्री राम को एक किस्सा सुनाया। एक तपस्वी की तपस्या से देवराज इंद्र विचलित हो गये तब उन्होंने उसके पास जाकर उससे कहा कि ‘मेरा यह खड्ग अपने पास धरोहर में रूप में रख लो कुछ दिन बाद ले जाऊंगा।’
तपस्वी ने रख लिया। चूंकि देवराज इंद्र बहुत प्रतिष्ठित थे इसलिये वह तपस्वी उस खड्ग की रक्षा मनोयोग से करने लगा। धीरे धीरे उसका मन तपस्या से अधिक उस खड्ग में लग गया और अंततः वह तपस्वी से हिंसक जीव बन गया। इससे तो यही आशय निकलता है कि जब हथियार रखने भर से ही तपस्वी का हृदय बदल गया तो जो यह आम माओवादी बंदूकें या बम होने पर देवता बने रह सकते हैं। तय बात है कि इससे वह वहीं अपने ही लोगों को आतंकित करते होंगे।
प्रगतिशील और जनवादियों ने भूख पर बहुत लिखा है। भूख में क्रांति की तलाश करते हुए इन लोगों पर अब तरस आने लगा है। उन पर ही नहीं अपने पर भी अब नाराजगी होने लगी है कि क्यों उनसे प्रभावित हुए। भूखा आदमी तो धीरे धीरे शारीरिक रूप से कमजोर हो जाता है और मानसिक रूप से उसकी स्थिति यह हो जाती है कि पत्थर भी उसको रोटी लगती है। इतना ही नहीं वह घास भी खाने लगता है। वह इतना अशक्त हो जाता है कि चोरी करना और कत्ल करने की सोचना भी उसके लिये मुश्किल हो जाता है। हालांकि हमारे बुजुर्ग कहते थे कि भूख आदमी शेर से भी लड़ जाता है पर अब उस पर यकीन नहीं होता।
देश में बरसों से भूख, गरीबी, बेरोजगारी और शोषण दूर करने का अभियान चल रहा है मगर उसका प्रभाव नहीं दिखता और अनेक बुद्धिजीवी इस पर रोते गाते हैं। यह अलग बात है कि इस पर इनाम के लिये वह राज्य और पूंजीपतियों से उनको सम्मान मिलता है-वह पूंजीपति जिन पर देश के गरीब रहने का आरोप लगाते हैं। ऐसे लोग केवल झूठ बेचते हैं। भूख से गद्दारी पैदा होने का भ्रम अब दिखने लगा है। जिनके पेट भरे हैं, जिनके पास सारे सुविधायें पहले से ही हैं। रोजगार की दृष्टि से ऐसे पद कि बेरोजगार ही नहीं बल्कि बारोजगारों के लिये भी एक क सपना हो। ऐसे में वह गद्दारी कर रहे हैं। तब कौन कहता है कि भूख इंसान को गद्दार बनाती है और कौन इसे मानेगा?
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Saturday, November 20, 2010

फासले-हिन्दी शायरी (fasle-hindi shayri)

फरिश्ते दिखने की चाहत में
खास इंसानों ने आम लोगों से
फासले जितना बढ़ा दिया है,
अपने लुटने और मरने का खौफ
अपने दिमाग पर उससे ज्यादा चढ़ा लिया है।
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अपनी ख्वाहिशें पूरी करने के लिये
वह आसमान में उड़े जा रहे हैं,
दौलत और शौहरत के तारे तोड़कर
इस जमीन में जिन पर करनी है हुकुमत
उनसे होते दूर होकर,
अनजाने खौफ और खतरे से जुड़े जा रहे हैं।
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