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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

Monday, March 31, 2008

इसलिए आत्मकथा नहीं लिखते-व्यंग्य

बरसों पहले कृश्न चंदर का उपन्यास देख ‘एक गधे की आत्मकथा’। पूरा नहीं पढ़ा क्योंकि उसमें गधे का बोलना-चालना समझ में नहीं आ रहा था। मैंने अपने जीवन में पढ़ने की शूरूआत पंचतंत्र की कहानियों और रामचरित मानस से की है इसलिये मुझे कई ऐसे उपन्यास भी नहीं समझ में आते जो बहुत प्रसिद्ध हैं। हां, ‘स्वर्णलता’ मेरा प्रिय उपन्यास है। बंगाली भाषा में लिखे गये इस उपन्यास का हिंदी अनुवाद मैने पढ़ा और मुझे बहुत पंसद आया जिन लोगों ने इसे पढ़ा होगा वह समझ सकते हैं कि वह मुझे क्यों पसंद आया। मुझे संघर्ष करने वाले पात्र पसंद है और वह भी जब कहीं न कहीं विजेता होते हैं। कृश्न चंदर के उस उपन्यास को मैने अपने बचपन में पढ़ने की बहुत कोशिश की पर नहीं पढ़ सका। हां, तब ख्याल आता था कि अगर जिंदगी में अच्छा लेखन नहीं कर पाये तो आत्म कथा जरूर लिखेंगे।

अभी भी कई बार ख्याल आता है कि आत्मकथा लिख डालें पर होता यह कि हमें उस उपन्यास की याद आ जाती है और तब सोचते हैं कि उसमें लिखें क्या? उसका शीर्षक क्या लिखे? कहीं न कहीं तो लिखना पड़ेगा कि आत्मकथा। अपना नाम लिखें या मेरी आत्मकथा लिख ही काम चलाये। मुख्य मुद्दा तो है उसमें लिखने वाली संभावित सामग्री। हम उसमें लिखेंगे तो अपने तन और मन पर जो बोझ उठाते हुए ही दिखेंगे। हमारी जिन्दगी भी मस्खरी से कम नहीं रही। लिखने की दृष्टि से भी अपनी भाषा शैली कृश्न चंदर जैसी नहीं हो सकती। वैसे तो ब्लाग लेखक के रूप में कोई नाम नहीं है और लेखक के रूप में भी कोई पहचान नहीं है पर मान लीजिये कोई थोड़ा बहुत नाम पढ़कर किताब ले भी तो वह कहेगा यह तो आदमी की कम गधे की आत्मकथा अधिक लगती है। अपने तन और मन पर इतना बोझ तो कोई गधा ही उठा सकता है। इतना अपमान सहन करने की ताकत तो केवल गधे में ही होती है। ऐसी बहस तो केवल तो कोई गधा ही कर सकता है। एक के बाद एक गल्तियां तो कोई गधा ही कर सकता है।

हम खुद बदनाम हों तो कोई बात नहीं है पर अगर हमने वाकई उसमें कई सच लिखे तो कई ऐसे लोग बदनाम हो जायेगे जिनके मूंह पर हमने कभी उनकी मूर्खताऐं और बेईमानियां उनके मूंह पर नहीं कही। आदमी दूसरे को धोखा देता है या खुद खाता है इस प्रश्न की खोज अगर हमने अपनी आत्मकथा में दिखाई तो ऐसे लोगों पर कीचड़ के छींटे गिरेंगे जिनको वह हमसे छिपाने की आशा करते हैं। जीवन के सत्य के साथ भी बहूत लोग जीते हैं यह हमने देखा है पर अधिकतर लोग बनावटी जिन्दगी जीते हैं। अपने भ्रम को दूसरे शिक्षा और संस्कार के नाम पर थोपते हैं। चारों तरफ जीवन का ज्ञान देने वाले लोग अपने जीवन में जिस अज्ञान के अंधेरे में रहते हैं उसे देखकर उन पर कभी हंसी तो कभी तरस आता है। हमारे आसपास अपने जीवन के झंझावतों में फंसे लोग यह आशा तो करते हैं कि हम उनकी मदद करें पर उनकी शर्तों के अनुसार। हमने देखा है कि हमने ही दूसरों की शर्तें मानी पर हमारा अवसर आया तो अपनी शर्तें थोपीं फिर भी वैसी मदद भी नहीं की जैसी हमने अपेक्षा की थी।

मतलब यह कि अपनी आत्मकथा लिखने से अच्छा है कि किश्तों में कहानियों और व्यंग्यों में अपनी बात कहते रहें। इतनी बड़ी किताब लिखें और फिर अपने पैसे लेकर प्रकाशक ढूंढें और इस बात की कोई गारंटी नहीं कि कोई उसे पढ़ेगा। हमारे एक मित्र से जब हमने आत्मकथा लिखने की बात की तो वह बोला-‘‘अभी तुम अपने व्यंग्यों में हम पर बहुत फब्तियां कस जाते हो और किताब में भी कोई अपनी गल्तियां थोड़े ही लिखोगे हमारे ऊपर ही सब लिखोगे। मत लिखो क्योंकि अपने को जितना सही साबित करने की करोगे उतना ही झूठे माने जाओगे। अपनी रचनाओं में तुम अपनी चर्चा नहीं करते इसलिये कोई तुम्हारे नाम से अधिक चर्चा नहीं करता पर आत्मकथा में सब तुम्हें झूठा ही समझेंगे।’’

सो तमाम विचार कर हमने आत्मकथा लिखने का कार्यक्रम स्थगित कर दिया।

Monday, March 24, 2008

यादों में बसते हैं वही-हिन्दी शायरी

यूं तो सभी पल गुजर जाते
पर कुछ दिल में समा जाते
मिलते हैं इस जिन्दगी के सफर में बहुत लोग
अपना मुकाम आते ही बिछड़ जाते
पर कुछ चेहरे
दिल की नजरों में जगह
हमेशा के लिए बना जाते
तारीख तो रोज बदल जाती हैं
पर कुछ तारीखे को हम
कभी नहीं भुला पाते
देखते हैं सब
सुनते और बोलते ढेर सारे शब्द
पर यादों में बसते हैं वही
जो हमारे दिल को छू पाते
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Tuesday, March 18, 2008

पहले इंसान बनकर जीना चाहता हूँ-हिन्दी शायरी

जलकर राख होने से पहले
लोगों के अंधेरों में रौशनी बिखेरना चाहता हूँ
टूटकर बिखर जाने से पहले
बेसहारों का सहारा बनना चाहता हूँ
आसमान में उड़कर चले जाने से पहले
जमीन पर उम्मीद के फूल
बिखेर देना चाहता हूँ
सर्वशक्तिमान की दरबार में जाने से पहले
इंसान बनकर जीना चाहता हूँ
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Monday, March 17, 2008

अपनी जिन्दगी की नैया पार लगायेंगे-कविता

जिन कागजों पर लिखे शब्दों से
बहकता है ज़माना
ढूँढता है लड़ने का बहाना
हम उन्हें नहीं पढ़ पायेंगे
अपनी जिन्दगी अपने ही शब्दों से सजायेंगे
ऐसी किताबों पर यकीन जताते लोग
जो खुद कभी पढ़ और समझ नहीं पाते
मतलब समझने के लिए सयानों के
घर के दरवाजे खटखटाते
अपनी अक्ल गिरवी रख आते
हम अपने यकीन के चिराग खुद ही जलायेंगे
अपनी जिन्दगी में रौशनी के लिए सब
किसी और से दियासलाई मांगते उधार
जैसे भलाई का होता हो व्यापार
कोई खरीदता है सिर झुकाकर
कोई देता हैं आकाश से लाकर
तय कर लो अपने यकीन से
अपनी जिन्दगी की नैया पार लगायेंगे
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Friday, March 14, 2008

नारद १ जनवरी १९७० में पहुंचा

नारद आज १ जनवरी १९७० में पहुंच गया है। अभी तक टीवी सीरियलों और फिल्मों में तमाम पात्रों को इतिहास की तारीखों में जाते देखते थे पर आज नारद को भी जाते देखा। उसके लोगो पर क्लिक करने के बात मैं बहुत देर तक इस इन्तजार में बैठा रहा कि शायद आज धीरे-धीरे खुल रहा है। बहुत देर तक माथा मच्ची की पर कुछ समझ में नहीं आया। जब वापस लौटने को हुए तो तारीख पर नजर गयी। गुरूवार १ जनवरी १९७० की तारीख पडी थी। यह तो कंप्यूटर का खेल है। अगर उसमें १ जनवरी १९७० तारीख है तो वह पोस्ट भी उसी दिन की दिखायेगा और उस तारीख में तो कंप्यूटर का अता-पता नहीं था। फोरम चलाना कोई आसान काम नहीं है और अगर वहाँ विशेषज्ञ ठीक कर रहे हों तो कोई बात नहीं । अगर नहीं तो सूचित हो जाएं। पुराने ब्लोगर हैं और नारद को भी देखते हैं आखिर उसने हमें वह मुकाम दिया जिसकी कल्पना नहीं कर सकते थे। इसलिए अपना कर्तव्य समझ कर यह सूचना देरहे हैं और उम्मीद करते हैं कि जल्दी सब ठीक हो जायेगा। कंप्यूटर में तो यह सब चलता है।

Monday, March 10, 2008

रहीम के दोहे:गरीब की सच में मदद करे वही होते बडे लोग

जे गरीब पर हित करै, ते रहीम बड़लोग
कहाँ सुदामा बापुरो, कृष्ण मिताई जोग


कविवर रहीम कहते हैं जो छोटी और गरीब लोगों का कल्याण करें वही बडे लोग कहलाते हैं। कहाँ सुदामा गरीब थे पर भगवान् कृष्ण ने उनका कल्याण किया।

आज के संदर्भ में व्याख्या- आपने देखा होगा कि आर्थिक, सामाजिक, कला, व्यापार और अन्य क्षेत्रों में जो भी प्रसिद्धि हासिल करता है वह छोटे और गरीब लोगों के कल्याण में जुटने की बात जरूर करता है। कई बडे-बडे कार्यक्रमों का आयोजन भी गरीब, बीमार और बेबस लोगों के लिए धन जुटाने के लिए कथित रूप से किये जाते हैं-उनसे गरीबों का भला कितना होता है सब जानते हैं पर ऐसे लोग जानते हैं कि जब तक गरीब और बेबस की सेवा करते नहीं देखेंगे तब तक बडे और प्रतिष्ठित नहीं कहलायेंगे इसलिए वह कथित सेवा से एक तरह से प्रमाण पत्र जुटाते हैं। मगर असलियत सब जानते हैं इसलिए मन से उनका कोई सम्मान नहीं करता।

जिन लोगों को इस इहलोक में आकर अपना मनुष्य जीवन सार्थक करना हैं उन्हें निष्काम भाव से अपने से छोटे और गरीब लोगों की सेवा करना चाहिऐ इससे अपना कर्तव्य पूरा करने की खुशी भी होगी और समाज में सम्मान भी बढेगा। झूठे दिखावे से कुछ नहीं होने वाला है।

Sunday, March 9, 2008

संत कबीर वाणी:निन्दकों तुम जुग-जुग जियो

निन्दक हमरा जनि मरो, जीवो आदि जुगादि
कबीर सतगुरु पाइया, निन्दक के परसादि


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि हमारे निंदक तुम कभी मत मरो बल्कि युगों तक जियो क्योंकि तुम्हारे प्रसाद से ही हम सतगुरु को प्राप्त कर सकेंगे।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अक्सर कोई हमारी आलोचना करता है तो हम उत्तेजित हो जाते हैं और इतना तनाव ओढ़ लेते हैं कि अपने काम में गलतिया करते जाते हैं। हमें अपने आलोचकों से सीखना चाहिए। वह जो बात हमसे कहते हैं उसका सामने भले ही प्रतिवाद करें पर अकेले में आत्मचिन्तन अवश्य जरूर करना चाहिऐ। निन्दकों ने हमारा जो दुर्गुण हमें बताया हो उसे अपने अन्दर से हटाने की कोशिश करना चाहिए।

भक्ति मार्ग पर चलते हुए तो ऐसी आलोचना का सामना करना ही पड़ता है कि ''ढोंग कर रहे हो', 'तुम्हें तो और कोई काम ही नहीं है', और 'ऐसे भक्ति नहीं होती, हमारी तरह करो' आदि-आदि। कई बार तो लोग हंसी उडाते हैं। ऐसे में हमें आत्मचिन्त्तन जरूर करना चाहिए कि क्या वाकई उनका कहाँ सही है और क्या हमारा मार्ग गलत है। अगर नहीं तो सतत उस पर चलते हुए और अधिक मन लगाकर करना चाहिए।
इसी तरह अगर हम कोई काम कर रहे हैं और कोई आलोचक उसमें दोष निकालता है हमें उसे सुनना चाहिऐ और अपना दोष दूर करने का प्रयास करना चाहिए। इसके अलावा कोई हमारी कार्य प्रणाली में दोष बताता है हो तो उस पर सोचना चाहिए। हो सकता है कि उसमें बदलाव से अधिक सफलता मिले। कुल मिलाकर निन्दकों से विचलित नहीं होना चाहिए। कम से कम वह उन चाटुकारों से अच्छे होते हैं जो झूठी प्रशंसा कर हमें किसी बदलाव के लिए प्रेरित नहीं करते।

Thursday, March 6, 2008

चाणक्य नीति:वाणी पर संयम रखने वाले ही लोकप्रिय होते हैं

चाणक्य कथन-समाज में लोकप्रियता अर्जित करने के लिए सबसे पहले दूसरों की निंदा करना बंद कर देना चाहिऐ। परनिंदा करने में रस लेना मानव की स्वाभाविक प्रवृति है। वाणी पर संयम रखना एक तरह से तपस्या है। जो दूसरों की निंदा नहीं करता वही समाज में लोकप्रियता अर्जित कर सकता है।

लेखकीय अभिमत- हमारा अध्यात्म दर्शन कहता है कि बड़ी लकीर को थूक से छोटी करने वाला वाला मूर्ख और उसके मुकाबले बड़ी लकीर खींचने वाला बुद्धिमान होता है। हमने देखा होगा कि अधिकतर लोग दूसरेको छोटा और घटिया बताकर अपने को बडा और ऊंचा साबित करना चाहते हैं। 'अमुक व्यक्ति ऐसा है', 'अमुक व्यक्ति में यह दोष है, 'और अमुक व्यक्ति वह बुरा काम करता है'-ऐसी चर्चा अक्सर लोग करते हैं और उनका आशय यह होता है कि हम भले, उस दोष से रहित और अच्छे काम करने वाले लोग हैं। आप और हम में से अधिकतर लोग ऐसा ही करते हैं।

इसका एक दूसरा रूप भी देखें। जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे की निंदा कर जब हमारे सामने से हटता है तो हम उसमें भी दोष देखने लगते हैं और वही बातें उसके बारे में सोचते हैं जो वह दूसरे के बारे में कह रहा था। मन ही मन कई बार कहते हैं कि 'उसके दोष तो देखता है अपने नहीं'।

क्या हम कभी सोचते हैं कि कहीं हम भी किसी की निंदा करते हैं और जब वहाँ से हटते हैं तो दूसरा व्यक्ति भी हमारे बारे में यही सोचता होगा। हम वाणी पर संयम की बात तो करते हैं पर आत्ममंथन नहीं करते। हम वाणी से अच्छा बोलते हैं तो वातावरण भी वैसा ही बनता है और खराब बोलते हैं तो खराब। जब हम किसी से अच्छा बोलकर अलग होंगे तो दूसरे व्यक्ति के मन में अच्छे विचार छोड़ जायेंगे तो वह अच्छा सोचेगा और खराब छोड़ जायेंगे तो वह हम में भी दोष देखेगा। हम अपनी इन्द्रियों से ही ग्रहण करते है और विसर्जन भी और सब अपने लिए ही प्रभावकारी होता है। अत: हमें अपने वाणी पर संयम रखते हुए अच्छी बात ही करना चाहिए।

Sunday, March 2, 2008

इश्क और बजट-हास्य कविता

लिखते-लिखते लव हो गया
दिखते-दिखते हो गयी लड़ाई
लिखने में आशिक ने किये थे
ढेर सारे वादे
जीवन भर सुख से रहने के इरादे
पर मार गयी सब महंगाई
इश्क में कौन बजट की तरफ देखता है
साथ-साथ रहने पर आती है
जीवन की सच्चाई
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इक तरफा इश्क के शिकार
आशिक ने लिखा
''तुम मेरे को अपना बना लो
जीवन भर मजे कराऊंगा
जो भी कहोगी खरीद लाऊंगा
ऐसी कोई और मिलेगा तुम्हें साथी नहीं
तुम्हें घुमाने के लिए हवाई जहाज भी ले आऊँगा''

लौटती डाक से जवाब आया
''कभी अखबार में बजट पढ़ते हो या नहीं
खर्च के बहुत सारी मदें तो बताई
पर आय का कोई जरिया भी तो बताया होता
कि 'यहाँ से कमाकर लाऊँगा''
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Thursday, February 28, 2008

अंतर्जाल है बहुत बड़ा मायाजाल-हास्य कविता

आया फंदेबाज और बोला
''क्या दीपक बापू लिखते हुए थकते नहीं हो
इस दुनिया में क्या हो रहा है तकते भी नहीं
अरे कहाँ अंतर्जाल पर
ब्लोग लिखते जा रहे हो
लोग नाम, नामा, इनाम और सम्मान
बटोरते हुए मशहूर हो जायेंगे
तुम जैसे तकते रह जायेंगे
हाथ घिसते रहोगे, पर लोगों तक नहीं पहुंच जायेंगे

टोपी पहनते हुए कहैं दीपक बापू
''यह है अंतर्जाल
बहुत बड़ा मायाजाल
और एक इंद्रजाल
यहाँ केवल नाम नहीं चलेंगे
जो जलाएगा शब्दों को दीपक की तरह
उसकी रौशनी में उनके नाम ही चमकेंगे
यहाँ बडे-बडे नाम नहीं चलेंगे
कर सकते हैं जो गागर में सागर की तरह
शब्दों के संजोने का काम
उनके ही डंके यहाँ बजेंगे
इनाम तो आखिर अलमारी में ही सजते
पर यहाँ शब्दों में भर देंगे चमक
उनके नाम ही आकाश में तैरेंगे
नाम तो होगा बहुतों के पास तिजोरी में
पर जिनके शब्दों में होगी सोने की चमक
वही यहाँ साहित्य के साहूकार बनेंगे
लिखीं गईं किताबें पडी रहतीं हैं कबाड़ में
पर यहाँ सभी शब्द अलग-अलग
किताब की तरह खुले में सांस लेते रहेंगे
उनकी सांस तब भी चलेगी
जब हम शवासन में आ जायेंगे
रोज करते हैं नये प्रयोग
तकनीकी श्रेणी के नहीं है तो क्या
कभी इसके भी विशेषज्ञ कहलायेंगे
जो बाजार में सजते
वह शब्दों के खेल नहीं समझते
जो समझते हैं वह सबसे बचते हुए
बस रोज लिखते जायेंगे
उनको नाम, नामा, इनाम और सम्मान
कहीं भी न मिले
पर बाद में उनके नाम पर दिए जायेंगे
यह अंतर्जाल बहुत बड़ा मायाजाल
चंद शब्द लिखकर जो
फंसेंगे माया के चक्कर में
वह यहाँ कभी विजेता नहीं कहलायेंगे
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Tuesday, February 26, 2008

रहीम के दोहे:भविष्य बलवान होता है

भावी काहू ना दही, भावी दह भगवान
भावी ऐसी प्रबल है, कहि रहीम यह जान

कविवर रहीम कहते हैं की भविष्य को कोई नष्ट नहीं कर सकता। केवल प्रभु ही भविष्य के प्रभाव को ख़त्म कर सकते हैं। यह समझ लोग को भविष्य बहुत बलवान है।

भावी या उनमान को पांडव बनहिं रहीम
जदपि गौरि सुनी बाँझ है, बरु हैं संभु अजीम


कविवर रहीम कहते हैं की उसने भविष्य के लिए पांडवों को कृपालु बनाया। यद्यपि पार्वती को बाँझ कहा जाता है पर किन्तु भगवान शंकर की कृपा से वह दो पुत्रों की माता कहलायीं।

Saturday, February 23, 2008

विदुर नीति: सरल स्वभाव का विरोधी हो वह बल नहीं

१.मनुष्य में धन और आरोग्य को छोड़कर कोई दूसरा गुण नहीं है, क्योंकि रोगी मनुष्य मुर्दे के समान है।
२.जो बिना रोग के उत्पन्न, कड़वा, सिर में दर्द पैदा करने वाला, पाप से संबद्ध, कठोर, तीखा और गरम है जो सज्जनों द्वारा ग्रहण करने योग्य नही और जिसे दुर्जन ही व्यक्त सकते हैं, उस क्रोध को पी जाइये और शांत हो जाइये।
३.रोग से पीड़ित मनुष्य मधुर फलों का आदर नहीं करते, विषयों में भी उन्हें जीवन का सुख और सार भी नहीं मिल पता। रोगी सदा ही दुखी रहते हैं। वह न तो धारण से प्राप्त धन का और वैभव के सुख का अनुभव कर पाते हैं ।
४.वह बल नहीं है जिसका जो सरल स्वभाव का विरोधी हो। सूक्ष्म धर्म को शीघ्र ही ग्रहण करना चाहिए। क्रूरता से अर्जित धन नष्ट होता है। यदि धन सात्विक मार्ग से आया है तो वह लंबे समय तक स्थिर रहता है.

Thursday, February 21, 2008

संत कबीर वाणी:सत्संग का सुख वैकुण्ठ में कहाँ

राम बुलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय
जो सुख साधू संग में, सो वैकुण्ठ में न होय


संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं की जब मेरे को लेन हेतु रामजी ने बुलावा भेजा तो रोना आ गया क्योंकि जो सुख साधू और संतों की संगत से जो सुख मिलता है वह भला वैकुण्ठ में कहाँ मिलता है।

लुट सके तो लूट ले, संत नाम की लूट
पीछे फिर पछताओगे, प्राण जाहिं जब छूट


संत कबीरदास जी कहते हैं की भगवान के नाम का स्मरण कर ले नहीं तो समय व्यतीत हो जाने पर पश्चाताप करने से कुछ लाभ नहीं है।

Wednesday, February 20, 2008

रहीम के दोहे: बुरे दिनों में चुप रहना बेहतर

अब रहीम चुप करि रहउ समुझि दिननकर फेर
जब दिन नीके आई हैं बनत न लगि हैं देर


कविवर रहीम कहते हैं की बुरे दिनों के चक्र को समझकर अब मैं मौन धारण करके रहूँगा. जब जीवन में अच्छे दिन आएँगे तो कार्य बनते देर नहीं लगेगी।

अब रहीम मुश्किल पडी, गाढ़ै दोउ काम
सांचे से तो जग नहीं, झूठे मिलैं न राम



कविवर रहीम कहते हैं कि अब तो जीवन में ऐसी कठिनाई आ गयी है कि सब तरह के कार्य मुश्किल हो गए हैं. सत्य बोलने से संसार में चलना कठिन है तो तो झूठ बोलने से भगवान् का मिलना संभव नहीं है.

Saturday, February 16, 2008

संत कबीर वाणी:जहाँ गुण की कद्र न हो वहाँ रहना व्यर्थ

करनी का राजमा नहीं, कथनी मेरू समान

कथता बकता मर गया, मूरख मूढ़ अजान

संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि जिस व्यक्ति की करनी मिटटी के समान भी नहीं है और कथनी पर्वत के समान ऊंची है वह अपनी पूरी जिन्दगी बकवाद करते हुए गुजार देता है। ऐसे बकवादी मनुष्य की बात पर ध्यान नहीं देना चाहिऐ।

जहाँ न जाको गुन लहैं, तहां न ताको ठाँव

धोबी बसके क्या करे, दीगंबर के गाँव

संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि जहाँ कोई अपने गुण का सम्मान करने वाला व्यक्ति न हो तो वहाँ जाकर रहने से कोई लाभ नहीं है। जहाँ निर्धन व्यक्ति रहते हैं वहाँ कोई कपडे की धुलाई करने वाला व्यक्ति कैसे अपना व्यवसाय कर सकता है। उसी प्रकार विद्वान, गुणीऔर ज्ञानी मनुष्य को मूर्खों की संगतनहीं करना चाहिऐ क्योकि वह उसका उपहास करेंगे।

Friday, February 15, 2008

अपने अस्तित्व के निशान-कविता साहित्य

पूरी जिन्दगी जुटाते सामान
पर कितना ले पाते उससे काम
फ़िर भी रुकते नहीं
चले जा रहे अंधेरे रास्ते पर
रौशनी की तलाश में
शायद मिल जाए खुशी का निशान

एक सामान जुटाते
दूसरों के नाम सामने आ जाते
कल जो लिया था उसे आज पुराना पाते
बाजार से लाने की करते कवायद
कुछ फ़िर नया
लोग भी नए नाम सुझाते
चलता जाता है अनवरत यह क्रम
अपने चलने का होता हमें भ्रम
जमीन पर चलते तो कार की चाहत होती
कार में होते, चाहते हवा में उड़ने वाला विमान

समान टूटते और बिखरते जाते
हम उन्हें कबाड़ में भेजते जाते
हर बार नया पाने की चाहत में चले जाते
चलाता है जो मन
नहीं समझते इशारे
कभी-कभी उससे बात करते तो
यह पाते जान
वह चाहता है खामोशी से दुनिया को
एक दृष्टा बनकर देखना
जब जुटाते हम उसके चैन के लिए समान
हम अपने होने के प्रमाण इस
दुनिया में छोड़ना चाहते और
वह चाहता देखना
अपने अस्तित्व के निशान

Sunday, February 10, 2008

भला कौन खुश रहा है इस भीड़ में-कविता साहित्य

अपने कुछ लोग खो गए
इस शहर की भीड़ में
उनके पते लिखे हैं
बहुत से कागजों पर
जो पड़े हैं फाईलों की भीड़ में

किसे ढूंढें और क्यों
ढेर सारे सवाल आते हैं सामने
किसी से मिलने की वजह
चाहिए हमको
जाएं मिलने तो वह भी
उठाते आने की वजह के प्रश्न सामने
समय निकला जाता है
जूझते हुए प्रश्नों की भीड़ में

अपने ही जाल में उलझे लोग
फुरसत नहीं पाते
जीवन की इस भागमभाग से
ओढ़ लिया है दिमाग में तनाव
कब ले सकते हैं दिल से काम
नहीं आता समझ में
खोये हुए है लोग
अपनी समस्याओं की भीड़ में

हम भीड़ में कहाँ तलाशें उनको
जो छोड़ नहीं पाते उसको
डरते हैं अपनी तन्हाई से
जीतने की क्या सोचेंगे वह
हारे हैं हर पल जिन्दगी के लड़ाई से
अकेले में अपने पहचाने का डर
उनके मन में रहता है
खोए रहना चाहते हैं भीड़ में

अकेले ही खडे देख रहे हैं उनको
वहाँ हाँफते और कांपते
जबरन हंसने की कोशिश करते हुए
कभी हमारे तन्हाई पर भी
हँसते हैं दूसरों के साथ
दूर रखते हैं हमारे से अपना हाथ
पर हम भी हँसते हैं
साथी है हमारी यह तन्हाई
भला कौन खुश रहा है इस भीड़ में
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Tuesday, January 15, 2008

स्वेट मार्डेन-अपने मन में शंका को स्थान न दें

आपकी योग्यता के बारे में लोगों का विचार कुछ भी क्यों न हो आप कभी अपने मन में शंका को स्थान न दें की जिस कार्य को करने की आपके मन में इच्छा है या जो कुछ आप बनाना चाहते हैं वह आप नहीं कर सकते । अपने व्यक्तिगत विश्वास को हर संभव ढंग से बढाईये। आप ऐसा कर सकते हैं। अपने मन में बार-बार यह शब्द दोहराते रहे -''मैं आत्मा हूँ सब कुछ कर सकता हूँ। मेरे लिए प्रत्येक कार्य संभव है। असंभव शब्द मूर्खों के शब्दकोष में मिलता है-स्वेट मार्डेन।

Saturday, January 12, 2008

संत कबीर वाणी:सकाम भक्ति निष्फल होती है

कबीर कलिजुग आइ करि, कीये बहुत जो भीत
जिन दिल बांध्या एक सूं, ते सुखु सोवे निचींत


संत कबीर दास जी कहते हैं की कलियुग में आकर हमने बहुतों को मित्र बनाया पर जिन्होंने अपने दिल को एक से ही बाँध लिया, वे ही निश्च्नंत सुख के नींद सो सकते हैं.

जब लगा भगहित सकामता, तब लगा निर्फल सेव
कहै 'कबीर' वै क्यूं मिलै, निहकामी निज देव

संत कबीर दास जी कहते हैं कि भक्ति जब तक सकाम है, भगवान की सारी सेवा तब तक निष्फल ही है. निश्कामी देव से सकामे साधक की भेंट कैसे हो सकती है.

Wednesday, January 9, 2008

संत कबीर वाणी:भेष ने अलख को भुला दिया

चतुराई से हरी न मिलै, ए बातां की बात
एक निस प्रेही निरधार का गाहक गोपीनाथ


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि कितनी भी चतुराई कर लो उसके सहारे हरि मिलने का नहीं है, चतुराई की तो केवल दिखावे की बात है जबकि गोपीनाथ तो उसी के अपने होते हैं जो निस्पृह और निराधार होता है।

पघ से बूढी पृथमी, झूठे कुल की लार
अलघ बिसारियो भेष में, बूड़े काली धार


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि किसी न किसी प्रकार के पक्षों को लेकर और वाद-विवाद में पड़कर कुल की परम्पराओं पर चलते हुए सब डूब रहे हैं। भेष ने अलख को भुला दिया। तब काली धर में तो डूबना ही था।

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