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Saturday, September 26, 2009

क्रिकेट मैच और हिंदी ब्लाग-हास्य व्यंग्य (cricket match and hindi blog-hindi hasya vyangya)

अंतर्जाल पर लिखने के अलग ही अनुभव है। इनमें से कुछ अनुभव ऐसे हैं जो समाज की गतिविधियों से इस तरह परिचय कराते हैं जिसका संबंध ब्लाग लिखने से सीधे न होते हुए भी लगता है। खासतौर से जब हिंदी में लिख रहे हैं तब कुछ अच्छी और बुरी घटनायें ऐसी होती हैं जिनको दर्ज करना जरूरी लगता है-ऐसे में क्रिकेट से संबंध हो तो हम उससे बच नहीं सकते।
वजह इसकी यह है कि कवितायें, कहानियां और व्यंग्य तो लिखना बहुत पहले ही शुरु किया था पर अखबारों में एक लेखक के रूप में छपने का श्रेय हमें 1983 में भारत के विश्व कप जीतने पर लिखे विषय के कारण ही मिला था। उसके बाद जो दौर चला वह एक अलग बात है पर अंतर्जाल पर भी हमने सबसे पहले अपना एक व्यंग्य क्रिकेट में सब चलता है यार शीर्षक से लिखा। उसमें 2007 में होने वाले संभावित विश्व क्रिकेट प्रतियोगिता में भारतीय टीम के चयन पर व्यंग्य कसा गया था। सामान्य हिन्दी फोंट में होने के कारण वह कोई पढ़ नहीं पाया पर उस समय रोमन लिपि में हिन्दी लिखना आसान नहीं था इसलिये 200ल में विश्व कप में भारतीय टीम की हार पर लिखे गये छोटे पाठ पर हमें पहली प्रतिक्रिया मिली थी। दरअसल वह पाठ एक पुराने खिलाड़ी के बयान पर था जिनकी हाल ही में मृत्यु गयी और टिप्पणी में उनके प्रति गुस्से का भाव था सो टिप्पणी उड़ाने के लिये पूरा पाठ ही उड़ाना पड़ा-उस समय तकनीकी जानकारी इतनी नहीं थी।
क्रिकेट में फिक्सिंग जैसी कथित घटनाओं ने हमें क्रिकेट से विरक्त कर दिया था और हम मन लगाने के लिये ही अंतर्जाल पर लिखने आये। उन्हीं दिनों विश्व कप भी चल रहा था और इधर ब्लाग बनने के दौर भी-कोई तकनीकी जानकारी देने वाला नहीं था वरना आज तो हम पांच मिनट में ब्लाग बनाकर कविता ठेल सकते हैं। कोई अनुभव नहीं था और क्रिकेट पर लिखने का हमारा कोई इरादा नहीं था। जब भी क्रिकेट पर लिखा तो व्यंग्य या हास्य कविता ही लिखी। एक बार जरूर बहक गये जब पिछले वर्ष बीस ओवरीय विश्व कप प्रतियोगिता में भारत जीता तो उस पर एक पाठ लिखा मगर वह बिना टिप्पणी के रहा तो हैरानी हुई तब हमने पता लगाया कि वह तो फोरमों पर पहुंचा ही नहीं। वजह हमने फीड बर्नर का कोड इस तरह लगााया कि वह ब्लाग हमारे यहां ही दिख सकता था। दो दिन बाद हमने उसको हटाया तो देखा कि वह फोरमों पर दिख रहा था।
इसी के चलते गुस्सा आया तो फिर एक हास्य कविता लिख डाली ‘बीस का नोट पचास में नहीं चलेगा’। कुछ लोगों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि हमें ही बेकार लगने वाली वह कविता सबसे अधिक टिप्पणियां प्राप्त कर चुकी है। अलबत्ता कुछ हिंदी ज्ञाता उस तमाम तरह की नाराजगी भी जता चुके हैं। उसका कविता में हमारा आशय यही था कि कुछ पुराने खिलाड़ी े केवल इसलिये पचास ओवर वाली टीम में बने हुए हैं क्योंकि उनके पास विज्ञापन मिलते हैं। ऐसे तीन खिलाड़ी बीस ओवरीय प्रतियोगिता में नहीं गये थे और अब उस विश्व कप की आड़ में उनको जीवनदान इसलिये मिलने वाला था क्योंकि विरक्त हो रहा भारतीय समुदाय फिर क्रिकेट की तरफ आकर्षित होने वाला था। पचास ओवरीय विश्व कप के बाद भारतीय बाजार प्रबंधकों को मूंह सूख गया था जिसे बीस ओवर से अमृत मिलने वाला था। हुआ भी यही। अब देखिए फिर क्रिकेट की तरफ लोगों का आकर्षण पहले जैसा ही हो गया जैसे 1983 के बाद बना था। वही हीरो अभी भी चल रहे हैं जिन्होंने कभी एक भी विश्व कप नहीं जितवाया। इस देश की हालत यही है कि जहां देखते हैं कि आकर्षण हैं वहीं अपना लोग मन लगा देते हैं।

हमें इस पर भी कोई आपत्ति नहीं है। हम कोई यह थोड़े ही कहते हैं कि हमारे ब्लाग पढ़ो जिसमें हम अनेक बार बेकार सी कवितायें और व्यंग्य ठूंस देते हैं।
दरअसल बात यह है कि क्रिकेट मैच वाले दिनों में हमारे ब्लाग सुपर फ्लाप हो जाते हैं। वैसे भी कोई हम हिट ब्लाग लेखक नहीं माने जाते पर जिस दिन क्रिकेट मैच हो उस दिन स्वयं को यह समझाते हुए भी डर लगता है कि हम हिंदी में ब्लाग लिख रहे हैं। अगर कोई क्रिकेट प्रेमी मित्र मिल जाये तो उससे इस विषय पर बात ही नहीं करते कि ब्लाग पर आज किस विषय पर लिखेंगे। शेष दिनों में ऐसे मित्रों से हमारी अपने ब्लाग के विषयों पर चर्चा होती है।
ब्लाग पर पाठ पठन/पाठक संख्या बताने वाले अनेक कांउटर लगाये जाते हैं। हमने भी दूसरों की देखादेखी अनेक प्रकार के काउंटर लगा चुके हैं-यह अलग बात है कि एक ‘गुड कांउटर’ की वजह से हमारे दो ब्लाग जब्त भी हो चुके हैं क्योंकि वह कांउटर किसी जुआ वगैरह से संबंधित था। कहें तो घुड़दौड़ की फिक्सिंग से भी हो सकता है। पूरी तरह हम भी उसके बारे में समझ नहीं पाये। हालांकि हमें लगता था कि पाठ पठन/पाठक संख्या बताने वाली उस वेबसाईट में कुछ गड़बड़ है पर फिर सोचते थे कि क्रिकेट जैसी ही होगी। वहां सब चल रहा है तो यहां चलने में क्या है?
उसका अफसोस भी नहीं है। मगर आज कुछ अधिक अफसोस वाला दिन था तो सोचा कि क्यों न अपने सारे गम एक ही दिन याद कर लिये जायें। रोज रोज का क्लेश हम नहीं पाल सकते। जब हम यह पाठ लिख रहे हैं तब कहीं भारत पाकिस्तान का क्रिकेट मैच चल रहा है। उससे हमारा लेना देना बस इतना ही है कि हमारे ब्लाग पचास फीसदी पिट रहे हैं। जो पचास फीसदी बचे हैं वह इसलिये क्योंकि वह मैच दिन में नहीं था-यानि अब सौ फीसदी पिट रहे हैं। ऐसा पहले भी हुआ है पर भारत पाकिस्तान का मैच बहुत दिन बाद हो रहा है इसलिये अधिक लोग देख रहे हैं। फिर इधर भाई लोगों ने जनता को बीसीसीआई की क्रिकेट टीम ‘विश्व में नंबर वन’होने’ की नशीली गोली पिला दी है। बस! सारी पब्लिक उधर!
हम इससे भी परेशान नहीं है। अरे, आज ब्लाग पिट रहे हैं कल फिर अपनी जगह पर आ जायेंगे। समस्या यह है कि हम इसमें कुछ ज्यादा ही सोच रहे हैं पर चिंतन नहीं लिख पा रहे। इस पर फिर कभी लिखेंगे। अलबत्ता हम यह सोच रहे हैं कि क्या क्रिकेट ने भारत की युवा पीढ़ी को दिमागी रूप से पंगु तो नहीं बना दिया। हमने पूरी युवावस्था क्रिकेट के खेल होने के भ्रम में गुजारी और अपनी नयी पीढ़ी को इसमें जाता देख रहे हैं। यकीनन हमने अगर अपना समय क्रिकेट पर बरबाद नहीं किया होता तो इस समय तीस से चालीस उपन्यास, सौ पचास कहानी संगह, एक हजार कविता संग्रह और पचास कभी चिंतन संग्रह छपवा चुके होते-यह अलग बात है कि पढ़ने वाले भी हम ही होते पर कम से कम अपना समय तो नष्ट करने का गम तो नहीं होता।
कहते हैं कि इस देश में हिंदी के अच्छे लेखक नहीं मिलते। मिलेंगे कहां से? हर नयी पीढ़ी को क्रिकेट खाये जा रहा है। न हिंदी के लेखक मिलते हैं न पाठक! यह ज्ञान हमें आज नहीं प्राप्त हुआ बल्कि पिछले तीन वर्ष से इस तरह अपने ब्लाग का उतार चढ़ाव देखकर सोचते थे।
आज हुआ यह कि हम पास के शहर में एक मंदिर में गये थे। लौटते हुए रास्ते में हमारा एक मित्र मिल गया और बोला-‘आज मेरे घर में लाईट नहीं है इसलिये दूसरे मित्र के घर मैच देखने जा रहा हूं। तुमने तो मना ही कर दिया कि मंदिर जाऊंगा।’
हमने कहा-‘पर तुमने बताया नहीं था कि मैच देखना है। अब चलो।’
वह बोला-‘अब क्या? मैंने उसे फोन कर दिया है। फिर मैच तो अब निकल ही रहा है।’
वह चला गया पर वहां हमें अपने ब्लाग याद आये-ऐसा बहुत कम होता है कि हम घर के बाहर कभी ब्लाग वगैरह याद करते हों । मित्रों के साथ किसी विषय पर होते समय यह जरूर कहते हैं कि इस पर लिखेंगे। हमने उसी मित्र को यह बताया था कि क्रिकेट मैच वाले दिन ब्लाग पिट जाता है। यही कारण है कि जब बातचीत के बाद वह जा रहा था तब उसने कहा‘हां, पर आज पाकिस्तान के साथ मैच है तुम्हारे ब्लाग तो पिट जायेंगे।’
इस बात ने हमारी चिंतन क्षमता जगा दी और घर आकर ब्लागों की पाठ पठन/पाठक संख्या देखी तो उसने इसकी पुष्टि की। मैच अधिक आकर्षक है तो हिंदी ब्लाग उतनी ही बुरी तरह से पिट रहा है। हो सकता है कि यह हमारे साथ ही होता हो और जो अच्छे लिखने वाले हों उनकी संख्या इतनी अधिक होती होगी कि उनको इसमें कमी का पता अधिक नहीं चले। हमें जरूर इसका आभास होता है तब सोचते हैं कि ‘क्या क्रिकेट मैचों की हिंदी से भला कोई ऐसी अदृश्य प्रतिस्पर्धा है जो इस तरह हो रहा है। वैसे संभवत कुछ अनुभवी लोग इस बात से सहमत हो सकते हैं कि क्रिकेट ने हमारी रुचियों को अप्राकृतिक और कृत्रिम आकर्षण का गुलाम बना दिया है और जिसकी वजह से हिंदी का रचनाकर्म भी प्रभावित होता है क्योंकि उसको समाज से अपेक्षित प्रोत्साहन नहीं मिलता। अपनी अपनी सोच है। हमने क्रिकेट मेें समय गंवाया है उसकी भरपाई करने के लिये अपनी बात लिखने बाज नहीं आते। लोग भी भला अपनी आदत से कहां बाज आते हैं और कहां क्रिकेट की हार पर विलाप करते हुए उसे भूल रहे थे फिर उसे याद करने लगे हैं।
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Monday, September 21, 2009

रहना अज़नबी होकर-हिंदी शायरी (rahana aznabi hokar-hindi shayri)

हमने छोड़ दिया यकीन करना
धोखे की बचने को यही रास्ता मिला
उधार तो अब भी देते हैं
वापसी पर नहीं होता किसी से गिला.
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दोस्ती में धोखे होते हैं
फिर क्यों रोते हैं.
अपनी हकीकत अपने से न छिपा सके
दोस्त को बाँट दी
हो गए बदनाम तो फिर क्यों रोते हैं.
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गैरों में अपनापन क्यों तलाशते हो
अपनों से अजनबी होकर.
वो गैर भी किसी के अपने हैं
जो आये हैं कहीं से अजनबी होकर.
रिश्ते भूल गया है निभाना
पूरा ही ज़माना
उम्मीद तो करते हैं सभी
एक दूसरे से वफ़ा की
फिर भी मारते हैं ठोकर
भले ही अपनों से अजनबी हो जाओ
पर फिर भी गैर से न उम्मीद करना
उसके लिए भी रहना अजनबी होकर.

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Wednesday, September 16, 2009

मुर्दाखानों में जिंदगी की रौशनी की तलाश-हिंदी साहित्य कविता (The search of light of life in dead mines - Hindi literature, poetry)

जमींदौज या राख हो चुके इंसानों के
राहों पर छपे कदमों को चूम कर
उसके निशान जमाने को दिखाते हैं।
गुजरते समय के साथ
बदलते जमाने को अपने ही
नजरिये से चलाने की कोशिश करते
वह लोग
मुर्दाखानों में जिंदगी की रौशनी जलाते हैं।
जितनी जिंदगियां चलती हैं
उतनी ही कहानियां पलती हैं
इस रंगबिरंगी दुनियां में
बस एक सूरज की रौशनी ही जलती है
बाकी चिराग तो
उधार पर अपना काम निभाते हैं।
हर चैहरे पर नाक और कान अलग अलग
सभी के अलग हैं शरीर
सबकी अपनी तकदीर और तब्दीर
पैरों और हाथों के निशान एक नहीं होते
यह सच जानने और समझने वाले ही
जिंदगी में अमन से रह पाते हैं।

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Friday, September 11, 2009

बासी खबर भी ताजा हो जाती-हिंदी व्यंग्य कविता (basi khabar taaza ho jatee-hindi vyangya kavita)

अखबार में छपी हर खबर
पुरानी नहीं हो जाती है।
कहीं धर्म तो कहीं भाषा और जाति के
झगड़ों में फंसे
इंसानी जज़्बातों की चाशनी में
उसके मरे हुए शब्दों को भी
डुबोकर फिर सजाया जाता
खबर फिर ताजी हो जाती है।
.............................
कौन कहता है कि
बासी कड़ी में उबाल नहीं आता।
देख लो
ढेर सारी खबरों को
जो हो जाती हैं बासी
आदमी जिंदा हो या स्वर्गवासी
उसके नाम की खबर
बरसों तक चलती है
जाति, धर्म और भाषा के
विषाद रस पर पलती है
हर रोज रूप बदलकर आती
अखबार फिर भी ताजा नजर आता।

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Wednesday, September 9, 2009

सवाल जवाब-हास्य कविता (saval javab-hasya kavita)

रिश्ता तय करने पहुंचे लड़के ने
लड़की से पूछा
‘‘क्या तुम्हें खाना पकाना
सिलाई कढ़ाई, बुनाई तथा
घर गृहस्थी का काम करना आता है।’’
पहले शर्माते
फिर लड़के से आंख मिलाते हुए
लड़की बोली
‘हां, सब आता है।
पर आप यह भी बताईये
क्या आपको घर गृहस्थी चलाने लायक
कमाना भी आता है।
मैं खाना पकाने के लिये
परंपरागत सामान नहीं उपयोग करती
चाहिये उसके लिए इलेक्ट्रोनिक सामान,
कढ़ाई के लिये ढेर सारे कपड़े
सिलाई, बुनाई और कढ़ाई की
कंप्यूटरीकृत मशीनें भी लाना होंगी
जिस पर करूंगी मैं यह सब काम
तभी होगा मुझे जिंदगी में इत्मीनान,
साथ में अपना मोबाईल, लैपटाप और
खुद के कमरे में अलग से टीवी हो
तभी मुझे मजा आता है।
अगर यह सब न कर सकें इंतजाम
तो कह जाईये कि ‘लड़की पसंद नहीं आई’
जो भी लड़का मुझे देखने आता
यही सवाल करता है
मेरा जवाब सुनकर यही कह जाता है।’’

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Sunday, September 6, 2009

काटना पर कुछ बोना नहीं- हास्य व्यंग्य कविताएँ (katana aur bona-hasya vyangya kavita)

काटना है पर कुछ बोना नहीं है
पाना है हर शय, कुछ खोना नहीं है।
पूरी जिंदगी का मजा जल्दी लेने के आदी लोग
आज कर, अभी कर की सोच के साथ
पल में प्रलय से इतना डरे हैं
कि खतरे देख नहीं पाते
क्योंकि अपनी ही जिंदगी उनको
ढोना नहीं है।
....................
आज के जमाने में शैतान भी
सजकर सामने आयेगा।
मनोरंजन में नयेपन की
चाहत में भाग रहे लोगों को
फरिश्ता नजर आयेगा।
इंसान की बढ़ती चाहत
अक्ल पर डाल देती है पर्दा
पीछे का सच किसे नहीं पता चल पायेगा।
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Monday, August 31, 2009

बीस में काम चलता हो पचास कौन खर्च करेगा-हिंदी हास्य कविता (20-twenty & one day cricket match-hindi hasya kavita

उन्होंने तय किया है कि
एक दिन में पचास ओवर की
जगह बीस ओवर वाले मैच खेलेंगे।
देखने वाले तो देखेंगे
जो नहीं देखने वाले
वह तो व्यंग्य बाण ऐसे भी फैंकेंगे।

सच है जब बीस रुपये खर्च से भी
हजार रुपया कमाया जा सकता है तो
पचास रुपये खर्च करने से क्या फायदा
फिल्म हो या खेल
अब तो कमाने का ही हो गया है कायदा
पचास ओवर तक कौन इंतजार करेगा
जब बीस ओवर में पैसे से झोला भरेगा
मूर्खों की कमी नहीं है जमाने में
मैदान पर दिखता है जो खेल
उस पर ही बहल जाते हैं लोग
नहीं देखते कि खिलाड़ियों को
अभिनेता की तरह पर्दे के पीछे
कौन लगा है नचाने में
पैसा बरस रहा है खेल के नाम पर
फिल्म वाले भी लग गये उसमें काम पर
दाव खेलने वाले भी
जल्दी परिणाम के ंलिये करते हैं इंतजार
खिलाने वाले भी
अब हो रहे हैं बेकरार
पैसे का खेल हो गया है
खेलते हैं पैसे वाले
निकल चुके हैंे कई के दिवाले
खाली जेब जिनकी है
बन जाते समय बरबाद करने वाले
अभिनेताओं में भगवान
खिलाड़ियों में देवता देखेंगे।

कहें दीपक बापू
‘नकली शयों का शौकीन हो गया जमाना
चतुरों को इसी से ही होता कमाना
पर्दे के नकली फरिश्तों के जन्म दिन पर
प्रचार करने वाले नाचते हैं
मैदान पर बाहर की डोर पर
खेलने वालों के करतबों पर
तकनीकी ज्ञान फांकते हैं
जब हो सकती है दो घंटे में कमाई
तो क्यों पांच घंटे बरबाद करेंगे
बीस रुपये में काम चलेगा तो
पचास क्यों खर्च करेंगे
आम आदमी हो गया है
मन से खाली मनोरंजन का भूखा
जुआ खेलने को तैयार, चाहे हो पैसे का सूखा
जिनके पास दो नंबर का पैसा
वह खुद कहीं खर्च करें या
उनके बच्चे कहीं फैंकेंगे।
खेल हो या फिल्म
जज्बातों के सौदागर तो
बस! अपना भरता झोला ही देखेंगे।

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Friday, August 28, 2009

फरिश्तों का मुखौटा-हिंदी हास्य कविताएँ (farishton ka maukhauta-hindi hasya kavitaen)


पर्दे पर आंखों के सामने
चलते फिरते और नाचते
हांड़मांस के इंसान
बुत की तरह लगते हैं।
ऐसा लगता है कि
जैसे पीछे कोई पकड़े है डोर
खींचने पर कर रहे हैं शोर
डोर पकड़े नट भी
खुद खींचते हों डोर, यह नहीं लगता
किसी दूसरे के इशारे पर
वह भी अपने हाथ नचाते लगते हैं
...........................
चारो तरफ मुखौटे सजे हैं
पीछे के मुख पहचान में नहीं आते।
नये जमाने का यह चालचलन है
फरिश्तों का मुखौटा शैतान लगाते।

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Sunday, August 23, 2009

किंग कहला रहे हैं-हास्य कविता (king kahala rahe hain-hindi hasya kavita)

भ्रम को सच बताकर

वह जमाने को बहला रहे हैं।

जज्बातों के सौदागर

दर्द यूं मु्फ्त में नहीं सहला रहे हैं।

आंखें हैं तुम्हारी तरफ

पर हाथ फैले हैं पीछे की तरफ

जहां से बटोर कर नकदी

अपनी जेब में ला रहे हैं

आज के युग में सिद्ध कोई नहीं है

सब खुद को किंग कहला रहे हैं।

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कितना असली और कितना नकली

किसकी पहचान करें।

अपने बारे में ही होने लगे

अब ढेर सारे शक

पहले उनसे तो उबरें।


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Monday, August 10, 2009

समंदर भी खुशी का डराने लगता है-हिंदी शायरी (samandar bhi darata hai-hindi shayri)

कभी धूप कभी छांव
कभी कालीन पर तो
कभी पथरीले रास्ते पर पांव
जिंदगी हर पल रंग
बदलती जाती है
फिर भी क्यों नहीं समझती आंखें
खुशी में झूमती हैं
गम होने परं आंसुओं से नहाती है।

समंदर भी खुशी का कभी
डराने लगता है
एक धारा में बहते हुए
एक रंग की कहानी कहते हुए
उकताहट हो जाती है
तब किसी का गम भी
रंग बिरंगा लगता है
उसमें ही रस की खुशबू आती है
बदलते अहसासों के लिये
पल पल बदलती है रंग
जिंदगी रंग बिरंगी कहलाती है।

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Friday, August 7, 2009

जिंदगी की कड़वी हकीकत-हिंदी शायरी (zindgi ki haqiqat-hindi shayri)

कड़वी हकीकतों के साथ
जिंदगी गुजारना एक आदत बन गयी है।
कुछ पल के लिये आई खुशियां
बहुत सुकून देती हैं
पर फिर वापस लौटी हकीकत
ज्यादा खूंखार लगती है
खुशनुमा अहसासों के बीच भी
उसकी याद डराये रहती है
कभी कभी लगता है
जिंदगी, कड़वी हकीकतों की
बंधुआ बन गयी है।
........................
तुम अपने गम के इल्जाम भी
हमारे नाम कर दो।
टूटते बिखरने की आदत
हो गयी है हमारी
कितने हादसे आये
याद नहीं रहता
कुछ नाम तुम भी भर दो।

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Tuesday, August 4, 2009

नियंत्रण के कायदे-व्यंग्य कविता (samaj ke kayde-hasya vyangya kavita)

वासनओं पर जितना नियंत्रण करोगे
वह बढ़ती जायेंगी।
तुम उन्हें भगाने की कोशिश मत करो
वह तुम्हें दौड़ायेंगी।

समाज को स्वच्छ रखने का
ख्याल बहुत अच्छा है
पर यहां हर कोई नहीं बच्चा है
वस्त्र पहनने की शर्त
आदमी ने खुद ओढ़ी है
आचरण की तरफ जिंदगी स्वयं मोड़ी है
वस्त्रों के पैमाने शर्म का आधार मत बनाओ
अल्प वस्त्र पहनकर नर नारियां
बटोर रहे हैं तालियां
वस्त्रहीन न घूमने का कायदा
उनको दे रहा है आधुनिक बनने फायदा
परंपराओं का वास्ता देकर
उन्हें मत चमकाओ
तोड़ने की भावनाऐं अधिक बढ़ जायेंगी।

खत्म करो सारे नियंत्रण
भेजो वस्त्र हीनता को आमंत्रण
फिर भी सारा जमाना वस्त्र पहनेगा
वरना गर्मी में जल जायेगा
सर्दी में बर्फ की तरह जम जायेगा
पर अल्प वस्त्रों को दोहरा खेल
नहीं चल पायेगा
जब देंगे वस्त्रहीन उनको ललकारेंगे
अल्प वस्त्र वाले आधुनिकता के भ्रम से
और लोगों की वाह वाह से भागेंगे
समाज के चलने की है अपनी राह
अल्पवस्त्रों को देखकर क्यों भरते आह
सौदागर मनोरंजन के नाम पर खेल रहे हैं
भले लोग हतप्रभ होकर सब झेल रहे हैं
वस्त्रहीनों को भी खुलकर सड़क पर आने दो
कमाई शौहरत जिन्होंने अल्पवस्त्रों से
उनको भी चुनौती मिल जाने दो
मनोरंजन को खेल को बन जाने दो संघर्ष
मत करो अमर्ष
जिनको अपनी इज्जत प्यारी है
वह कोई तमाशा नहीं करेंगे
वस्त्र उतारने के खेल में
जो चढ़ गये है बुलंदियों पर
पर वह भी कोई आशा नहीं करेंगे
पर्दे पर रोज आयेंगे नये वस्त्रहीन नायक नायिकायें
बदल जायेंगी सारी परिभाषायें
कितना भी कोई शौहरत वाला क्यों न हो
वस्त्रहीन दिखने से घबड़ाता है
जब होगी अपने से अधिक बलशाली
वस्त्रहीन आदमी की चुनौती
मांगने लगेंगे पानी
सब जानते हैं कि वस्त्रहीनों से
सर्वशक्तिमान भी डरता है
अभी तक समाज पर हंस कर
उसी से बटोरी है वाह वाही
उसकी फब्तियां उनको दहलायेंगी।
.............................
दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप
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Sunday, August 2, 2009

इलाज का मामला-हास्य कविता (ilaj ka mamla-hasya kavita)

चिकित्सक के गलत इलाज से
मरीज किसी तरह बच पाया।
निकला उसके अस्पताल से
घर पहुंचकर ही सांस ले पाया।
कभी सिर में दर्द रहता
तो कभी पांव से चलते हुए तकलीफ होती
‘जान बच गयी लाखों पाये’
यही सोचकर तसल्ली कर सब सहता
एक दिन उसे वकील से मिलने का ख्याल आया।
उसने जाकर उसे सब हाल बताया।
वकील ने उसे
क्षतिपूर्ति का मुकदमा करने की दी सलाह
साथ में चिकित्सक को भी नोटिस थमाया।
अब तो बढ़ गया झगड़ा
बदले हालत में
मरीज खुशी से हो गया तगड़ा
इधर चिकित्सक को भी समझौते के लिये
लोगों ने समझाया।
दोनों अपने वकीलों के साथ मिले एक जगह
ढूंढने लगे झगड़े की सही वजह
मरीज और चिकित्सक के वकील ने
दोनों को समझौते की लिए राजी कराया।
चिकित्सक ने मरीज की दस हजार फीस में से
पांच हजार उसके वकील और
पांच हजार अपने वाले को थमाया।
दोनों ने अपने पैसे अपनी जेब में रख लिये
यह देखकर
‘मेरे दस हजार कहां है
मुझे वापस दिलवाओ’
मरीज चिल्लाया।
मरीज का वकील बोला-
‘पगला गये हो
तुमने चिकित्सक का कितना नुक्सान कराया
तुम्हारे इलाज पर इतनी दवायेें लगाई
अपने लोगों से मेहनत कराई
फिर भी उनके हाथ कुछ नहीं आया।
तुमने मुफ्त में
उनके फाईव स्टार नुमा अस्पताल में
चार रातों के साथ दिन बिताया।
अब उनकी क्या गलती जो
तुमने आराम न पाया।
मैंने तुम्हें मुकदमें के लिये
भागदौड़ करा कर चंगा कर दिया
यही काम यह चिकित्सक भी करते
तो यह परेशानी नहीं आती
अपनी इसी गलती का
बिल इन्होंने भर दिया
क्या यह कम है
तुम तो अब स्वस्थ हो गये
फिर काहे का गम है
तुम्हें ठीक करने की फीस
हम दोनों वकीलों ने ले ली
तुम तो खर्च कर ही चुके
स्वस्थ होकर हर्जाना नहीं मांग सकते
बिचारे चिकित्ससक साहब का सोचो
जिनके हाथ कुछ न आया।’

.........................................
नोट-यह हास्य कविता एकदम काल्पनिक है। किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई लेनादेना नहीं है। अगर संयोग से किसी से इसकी कारिस्तानी मेल खा जाये तो वही इसके लिये जिम्मेदार होगा।



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Friday, July 31, 2009

पर्दे के पीछे-हिंदी हास्य व्यंग्य (Behind the scenes-Hindi comedy satire)

पर्दे के पीछे से आशय फिल्म या नाटक से नहीं है बल्कि भीड़ के अलग हटकर किये जा रहे विरोधाभासी व्यवहार से है। दरअसल लोगों की आदत है कि वह भीड़ में बैठकर सामने किसी विशिष्ट व्यक्ति को देखते हैं तो उसे पास जानने की इच्छा प्रबल हो उठती है। कुछ लोग भीड़ में चमकने वाले अभिनेताओं और संतों को अपना इष्ट बना लेते हैं। उसका स्वरूप उनके हृदय में इस तरह स्थापित हो जाता है कि ऐसे समझने लगते हैं जैसे कि वह व्यक्ति उनका आत्मीय हो। भले ही वह उसके पास नहीं जा पाते पर उनके अंतर्मन में वह रचा बसा होता है।
समझदार लोग जानते हैं कि यह उनका भ्रम है इसलिये केवल विचारों को आता जाता देखकर काम चला लेते हैं पर कुछ संवेदनशील लोग विशिष्ट हस्तियों के निकट तक पहुंचना चाहते हैं। सच कहें तो वह पर्दे के पीछे जाकर उनसे मिलना चाहते हैं। यह एक खतरनाक काम है क्योंकि भीड़ के सामने और पर्दे के पीछे व्यवहार में बहुत अंतर होता है।
एक संत कथा कर रहे थे। उनके प्रवचनों में भी वही बातें थी-‘मोह माया छोड़ दो’, ’लोगों का भला करो’, वगैरह वगैरह। पैसे के प्रति उनका मोह सर्वज्ञात था पर फिर भी अपने देश के लोग तत्वज्ञान होने के बावजूद भ्रम में रहना पसंद करते हैं इसलिये उनको सुनने भीड़ आती थी। एक प्रवचन कार्यक्रम खत्म होते ही वह पर्दे के पीछे पहुंचे गये। वहां अपने शिष्य से बोलो-‘आज कितना चढ़ावा आया। कल तो बहुत कम आया था। ऐसा प्रतीत होता है कि लोग मु्फ्त में प्रवचन सुनना चाहते हैं।’
वह शिष्य बोला-‘बाबा, आज तो छुट्टी का दिन है। भीड़ ज्यादा है। आज बाहर चंदे की पेटियां भी बढ़ा दी हैं। इसलिये कल से अच्छा चढ़ावा आयेगा।’
महाराज खुश नहीं हुए और बोले-‘तुमने परले शहर फोन किया। वहां के आयोजक से कहो कि कथा करने के हम इतने कम पैसे नहीं लेंगे।’
वह शिष्य बोला-‘मैंने उससे कहा था। वह आज आपको फोन करेगा।’
कथित संत बोले-‘मुझे उसने सुबह फोन किया था। उस समय तुम मेरे पास नहीं थे। मैंने उससे कहा कि इतने कम पैसे में कथा करने नहीं आऊंगा। तुम फिर एक बार फिर फोन करना। देखो राजी हो जायेगा। यहां चढ़ावा बहुत कम आया है। मेरे लिये यह हैरानी की बात है।’
इस बातचीत को एक अन्य श्रद्धालु सुन रहा था। दरअसल प्रवचन खत्म होते ही वह संत जी के शिष्यों को चकमा देते हुए वहां उनके करीब से दर्शन करने पहुंच गया था। शिष्य की नजर उस पर गयी और वह बोला-‘कौन हो भई, यहां कैसे आये।’
तब तक वह श्रद्धालू संतजी के पास पहुंच गया था और चरण पकड़ कर बोला-‘महाराज आपके पास से दर्शन किये।जीवन धन्य हो गया।’
प्रवचन के दौरान बात बात पर हंसने वाले उन संत जी का मूंह सूझा हुआ था। वह आशीर्वाद देते हुए बोले-‘ठीक है भई, पर इस तरह मत आया करो। हम भी आखिर इंसान है थक जाते हैं और हमें भी विश्राम की आवश्यकता होती है। अब तुम जाओ।’
उसने अपनी जेब से सौ का नोट निकालकर उनके पांव पर रख दिया और बोला-‘महाराज, यह लीजिये इस तुच्छ प्राणी की यह तुच्छ भेंट।’
शिष्य ने कहा-‘उठाओ यह नोट! महाराज को क्या भिखारी समझ रखा है। बाहर जाकर पेटी में डाल दो।’
महाराज ने कहा-‘अब ले लो।’
उन्होंने वह नोट स्वयं ही उठा लिया और उससे कहा-‘अब जाओ! हमारी आज्ञा का पालन करो।’
वह जाते हुए कुछ शमियाने के बाहर दरवाजे पर रुक गया यह जानने के लिये कि पर्दे के पीछे महाराज दूसरी कौनसी बातें करते हैं। उसने महाराज को कहते हुए सुना-‘लक्ष्मी को मत ठुकराया करो। क्या पता, बाहर जाकर उसका विचार बदल जाता। वैसे इस सौ के नोट से क्या होता है पर कम चढ़ावा आ रहा है तो जहां से जितना आ रहा है ले लो।’
संत शिष्य की बात जो भी हुई उससे उस श्रद्धालू का मन टूट गया। वह इस बात पर नहीं पछता रहा था कि उसके इष्टदेव की असलियत सामने आयी बल्कि परेशान वह बात को लेकर था कि वह पर्दे के पीछे गया क्यों? कम से कम उसका भ्रम तो बना रहता। जब सच कड़वे हों तो भ्रम में रहना भी आदमी को अच्छा लगता है। यह भ्रम तभी तक सत्य लगता है कि जब तक आदमी अपने आदरणीय का पीछा करते हुए पर्दे के पीछे नहीं चला जाता।
सच तो यह है कि पर्दे के पीछे न जाना चाहिये। पर्दे के पीछे बड़े बड़े खेल होते हैं।
एक विवाह समारोह में एक सज्जन पर्दे के पीछे किसी काम से चले गये। वहां से लौटे तो एक मित्र ने पूछा-‘क्या पर्दे के पीछे शराब पीने गये थे?’
‘नहीं-’उन सज्जन ने कहा-‘पर यह तुम क्यों पूछ रहे हो।’
मित्र ने कहा-‘ऐसे ही! शादी विवाह में लोग पर्दे के पीछे ऐसे ही शराब पीने जाते हैं।’
ऐसा हो सकता है कि कई जगह आपको शराब या सिगरेट का सेवन न करने के लिये जागरुकता उत्पन्न करने वाले सेमीनार होते दिखें। उनकी समाप्ति पर उसमें शामिल लोगों को अगर पर्दे के पीछे उन्हीं वस्तुओं का सेवन करते देखें तो हैरान न हो। सामने और पर्दे के पीछे आचरण करने के लोगा इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि उनको अपने कथन और कर्म के विरोधाभास दिखाई नहीं देते। इन विरोधाभासों को देखकर दिलोदिमाग में तनाव पैदा न हो इसलिये पर्दे के पीछे जाने का प्रयास ही नहीं करना चाहिये।
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Sunday, July 26, 2009

हकीकत से संग नहीं छुड़ा पाते-हिंदी शायरी(hindi shayri)


सोच भले ही दूर तक जाये
पर पांव भला हद से बाहर
कहां जा पाते।
तन्हाई के साथी ख्याल तो
हवा में उडते हैं
पर हाथ में पंख नहीं लग पाते।
इसलिये सपने देखकर
भूलना ही अच्छा लगता है
भले ही नापसंद हो
पर हकीकत से संग नहीं छुड़ा पाते।
.............................
उनके घर यूं न गये
क्योंकि भले ही दरवाजे खुले थे
पर दिल तो बंद थे।
उन तक पहुंचने के रास्ते तो च ौड़े थे
पर सच के दायरे तंग थे।

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Friday, July 24, 2009

इश्क और सच बोलने वाली मशीन-हास्य कविता (hasya kavita)

माशुका को उसकी सहेली ने समझाया
‘आजकल खुल गयी है
सच बोलने वाली मशीन की दुकानें
उसमें ले जाकर अपने आशिक को आजमाओ।
कहीं बाद में शादी कर    पछताना न पड़े
इसलिये चुपके से उसे वहां ले जाओ
उसके दिल में क्या है पता लगाओ।’

माशुका को आ गया ताव
भूल गयी इश्क का असली भाव
उसने आशिक को लेकर
सच बोलने वाली मशीन की दुकान के
सामने खड़ा कर दिया
और बोली
‘चलो अंदर
करो सच का सामना
फिर करना मेरी कामना
मशीन के सामने तुम बैठना
मैं बाहर टीवी पर देखूंगी
तुम सच्चे आशिक हो कि झूठे
पत लग जायेगा
सच की वजह से हमारा प्यार
मजबूत हो जायेगा
अब तुम अंदर जाओ।’

आशिक पहले घबड़ाया
फिर उसे भी ताव आया
और बोला
‘तुम्हारा और मेरा प्यार सच्चा है
पर फिर भी कहीं न कहीं कच्चा है
मैं अंदर जाकर सच का
सामना नहीं करूंगा
भले ही कुंआरा मरूंगा
मुझे सच बोलकर भला क्यों फंसना है
तुम मुझे छोड़ भी जाओ तो क्या फर्क पड़ेगा
मुझे दूसरी माशुकाओं से भी बचना है
कोई परवाह नहीं
तुम यहां सच सुनकर छोड़ जाओ
मुश्किल तब होगी जब
यह सब बातें दूसरों को जाकर तुम बताओ
बाकी माशुकाओं को पता चला तो
मुसीबत आ जायेगी
अभी तो एक ही जायेगी
बाद में कोई साथ नहीं आयेगी
मैं जा रहा हूं तुम्हें छोड़कर
इसलिये अब तुम माफ करो मुझे
अब तुम भी घर जाओ।’

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Tuesday, July 21, 2009

तीसरी बार सच का सामना-हास्य व्यंग्य (third time sach ka samna-hindi satire)

कविराज अपने घर से दूर उस पार्क में पहुंच गये। घर में बिजली नहीं थी और बरसात की वजह से सारी सड़कें सराबोर हो गयी थीं। पिछली बार एक बरसात में कविराज एक गड्ढे में गिर चुके थे। उस समय आसपास खड़े लोग भी उन पर हंस रहे थे। एक जानपहचान वाले ने हंसने वालों से कहा-तरस खाओ। हंस रहे हो! शर्म नहीं आती। एक कवि जो तुम्हारे लिये हमेशा सरस, समधुर और हास्य कवितायें ढूंढता हुआ सड़कों पर घूमता है अगर इस गड्ढे में गिर गया और तुम हंस रहे हो।’
एक ने कहा-‘इसलिये तो खुशी हो रही है। यह कवि लोग बेकार की कवितायें लिखते हैं।’
इतने में कविराज उठकर खड़े हो गये और बोले-‘आप लोग हंसे तो मुझे भी हंसने का अवसर मिलना चाहिये। आज इस गड्ढे में गिरने के विषय पर हास्य कविता लिखूंगा। आप लोग जरा अपना परिचय दीजिये।’
उन्होंने अपनी जेब से कागज और पेन निकाली जो अभी पानी से बची हुई थी और इधर वह लोग भाग निकले। जानपहचान वाले ने कहा-‘क्या मूर्ख कवि हो। हास्य कविता लिखने की बात करते हुए उनसे परिचय मांग रहे थे। हास्य मेें उनका सच लिख दोगे तो उनकी तो हालत खराब हो जायेगी।
कविराज ने कहा-‘पर मैं उनका पूरा परिचय तो नहीं मांग रहा था। भला उनका सच हास्य कविता में कैसे लिख सकता था?’
जानपहचान वाले ने कहा-‘तुम पूरा परिचय नहीं मांग रहे थे पर उनके दिमाग में तो अपना परिचय आ गया न! अपने सच पर कोई नजर नहीं डाले इसलिये वह भाग गये। सच से समाज भागता है।’
बात आयी गयी मगर कविराज ने उस दिन जब सड़कों पर लबालब पानी भरा देखा तो एक पार्क में चले गये। वहां भी भला बैठने की जगह कहां थी। उसी समय उन्हें एक पेड़ के नीच चबूतरा दिखाई दिया। वह उस पर बैठ गये। सोचा आज कुछ बरसात पर लिख लें। मगर कमबख्त वहां भी चैन कहां। पार्क के ठीक बाहर बाहर सड़क के किनारे एक चाय वाले का ठेला लगता था। अनेक बार लोग उस पार्क में खड़े होकर उसी चबूतरे पर बैठकर चाय पीते थे। आज बरसात की वजह से उसके पास लोग अधिक नहीं थे। इधर कविराज बैठे उधर से चाय वाले ने बाहर से चिल्ला कर पूछा-‘साहब, चाय दूं क्या?
कविराज ने कहा-‘नहीं भई, हम तो घर से पीकर आये हैं।’
उस ठेले वाले ने कहा-‘हमें क्या पता कि आपको चाय नहीं चाहिये। इस पार्क में इस पेड़ के नीचे तो हमसे चाय पीने वाले ही बैठते हैं।’
कविराज ने कहा-‘यह चबूतरा तुमने खरीदा है कि या पूरा पार्क ही तुम्हारे नाम पर लिख दिया गया है। हम यहां बैठकर कवितायें लिखेंगे।
कविराज ने अपनी जेब से डायरी निकाली और उस पर कुछ लिखने लगे। इधर बरसात बंद होने के बाद चाय के आशिक भी वहां आने लगे। एक साथ चार लोग आये और उसी चबूतरे पर बैठ गये एक तो कविराज के पास ही बैठ गया। उसने चाय वाले को चार चाय बनाने का आदेश दिया और कविराज के पास बैठकर उनका लिखा देखने लगा।
कविराज ने चश्में से उसे झांक कर देखा और पूछा-‘क्या देख रहे हो?’
उसने कहा-‘बस ऐसे ही नजर पड़ गयी, पर लगता है जैसे कि आप कविता सविता लिख रहे हैं।’
कविराज ने पूछा-‘यह कविता तो समझ में आ गया पर यह सविता क्या है? कहीं तुम इंटरनेट पर वह वेबसाईट तो नहीं देखते जो बदनाम हो गयी है।’
वह आदमी बोला-‘नहीं, पर मेरा छोटा भाई शायद देखता है। मैंने तो ऐसे ही कह दिया। अलबत्ता आपकी कविता बहुत अच्छी है। इसका शीर्षक क्या लिखेंगे?’
कविराज ने पूछा-‘तुमने यह कविता पढ़ ली जो कह रहे हो अच्छी है!’
उसने जवाब दिया-‘नहीं, ऐसे ही कह दिया।’
कविराज ने कहा-‘यही इसमें लिख रहा हूं कि लोग बिना देखे प्रशंसा या निंदा करते हैं। इसका शीर्षक होगा ‘सच का सामना’। बहरहाल आप अपना परिचय दें तो अच्छा रहेगा।’
वह घबड़ा गया और बोला-‘अरे, मुझे एक काम याद आ गया। फिर आता हूं।’
उसने अपने तीनों साथियों को भी इशारा किया और चाय वाले से कहा-‘अभी चाय मत लाना। हम अपना एक काम कर आ रहे हैं।’
चाय वाले का मूंह सूख गया पर वह कह कुछ नहीं पा रहा था। इधर उस आदमी के साथ आये तीन आदमियों ने भी यह वार्तालाप सुना और उसे अपने अनुकूल न पाकर अपने साथी की बात मानकर चले गये।
इतने में एक अन्य सज्जन आये। वह सिगरेट का धूंआ छोड़ते हुए कविराज के पास बैठ गये और चाय वाले से बोले-‘जरा, एक चाय बनाना।’
इधर कविराज अपनी कविता लिखने में लगे हुए थे। वह आदमी उनको लिखते देख पास में आ गया।
कविराज ने उसकी तरफ मूंह कर पूछा-‘क्या देख रहे हो।’
उन सज्जन ने कहा-‘यही कि आप क्या लिख रहे हैं?’
कविराज ने कहा-‘यह तो सच का सामना लिख रहा हूं। अच्छा हुआ आप मिल गये। बहुत देर से एक सिगरेट पीने वाला देख रहा था क्योंकि इससे कौन कौनसी बीमारियां होती है उसे बताना था और यह भी पूछना था कि इसे पीने में मजा क्या आता है? आप अपना परिचय दीजिये।ं’
उस आदमी ने एकदम सिगरेट फैंक दी और बोला-‘अरे, यह तो मैं पहली बार पीकर देख रहा हूं। अभी सामने से सामान लाता हूं फिर आपको परिचय दूंगा।’
उसने भी चाय वाले को चाय के लिये मना किया और खिसक गया। अब तो चाय वाले का धैर्य जवाब दे गया और बोला-‘साहब, यह हो क्या रहा है? यह मेरे ग्राहक क्यों भाग रहे हैं? महाराज, अगर आप नाराज हैं तो मुफ्त चाय पी लीजिये। कम से कम मेरा धंधा बर्बाद मत करिये। वैसे आपने उन लोगों से बात क्या की थी? जो चले गये।’
कविराज ने कहा-‘मैंने तो बस यही कहा था कि आजकल दूध भी साबुन वाले सामान से बनने लगा है। वैसे कुछ दिल पहले एक आदमी तुम्हारी चाय की शिकायत कर रहा था। उसने बताया कि तुम नकली दूध से चाय बनाते हो।’
चाय वाला घबड़ा गया और बोला-‘अब, दूध तो मेरे घर पर बनता नहीं है। जैसा आता है उससे चाय बनाता हूं। दूध की वैसे मुझे पहचान अधिक नहीं है। सच कहता हूं कि इसमें मेरी गलती नहीं है।’
कविराज ने उसकी तरफ घूरकर देखा और कहा-‘तुम्हें अच्छी तरह पता है कि दूध में मिलावट है।’
चाय वाला बोला-‘पर साहब, यह बात कहीं आप लिख मत देना। मैं गरीब आदमी हूं बर्बाद हो जाऊंगा। आप कौनसी अखबार के पत्रकार हैं?’
पता नहीं कविराज को क्या सूझा बोले-‘नहीं, हम तो मामूली कवि हैं। वैसे भी हम यहां बैठकर अपने पैसे का हिसाब कर रहे थे।’
चाय वाले का रुख एकदम बदल गया और बोला-‘उंह! फूटो यहां से! तुम जैसे छत्तीस कवि देखे हैं। चुपचाप यहां से चले जाओ। वरना बुलाता हूं इस सड़क के ठेकेदार से जो हमसे हर रोज पचास रुपये सुरक्षा कर वसूल करता है। वह बहुत खतरनाक आदमी है। ख्वामख्वाह में हमें और हमारे ग्राहकों को डरा रहे हो।’
कविराज हंसते हुए उठ गये। वह पीछे से बोला-‘फिर दिखना नहीं!
वह तेजी से चले जा रहे थे तो एक परिचित बोला-‘क्या बात है कविराज, भागे जा रहे हो। जरा बात तो कर लो।’
कविराज बोले-‘अभी नहीं। एक काम से जा रहा हूं।
उन परिचित ने पूछा-‘काम से जा रहे हो यह तो बता दिया। अब यह भी बता दो आ कहां से रहे हो?’
कविराज ने कहा-‘सच का सामना करके आ रहा हूं। अखबार में पढ़ना तो समझ में आ जायेगा।’
उन परिचित ने कहा-‘हां, अगर छप गया तो! वैसे मैंने सुना है कि आजकल तुम्हारी रचनायें अनेक अखबारों के कूड़ेदान की शोभा बढ़ा रही हैं।’
कविराज ने अपने कदम पीछे खींचे और उसके पास जाकर कहा-‘हां, यह भी सच है। एक दिन में दो बार सच से सामना हुआ है। अब यह भी लिखना पड़ेगा।’
वह सज्जन बोले-‘नहीं यार, तुम तो बुरा मान गये। कहीं हमारा नाम मत लिख देना। कहीं अखबार वालों ने छाप दिया तो बदनामी होगी। यकीनन तुम उसमें हमारे लिये कुछ अच्छा तो लिखने से रहे। अगर यह सच का सामना करके कहीं लिख दिया तो हो सकता है कि कोई सनसनी फैलने की उम्मीद में छाप दे। देखो इससे तुम्हारी और हमारी दोस्ती में फर्क पड़ सकता है!
कविराज धीरे धीरे बुदबुदाये-‘तीसरी बार!’ फिर अपने रास्ते चले गये।
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Wednesday, July 15, 2009

हंसी की तलाश-हिंदी शायरी (hansi ka khazana-hindi shayri)

अपने पर ही यूं हंस लेता हूं।
कोई मेरी इस हंसी से
अपना दर्द मिटा ले
कुछ लम्हें इसलिये उधार देता हूं।
मसखरा समझ ले जमाना तो क्या
अपनी ही मसखरी में
अपनी जिंदगी जी लेता हूं।
रोती सूरतें लिये लोग
खुश दिखने की कोशिश में
जिंदगी गुजार देते हैं
फिर भी किसी से हंसी
उधार नहीं लेते हैं
अपने घमंड में जी रहे लोग
दूसरे के दर्द पर सभी को हंसना आता है
उनकी हालतों पर रोने के लिये
मेरे पास भी दर्द कहां रहा जाता है
जमाने के पास कहां है हंसी का खजाना
इसलिये अपनी अंदर ही
उसकी तलाश कर लेता हूं।

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Saturday, July 11, 2009

अखबार की कतरन-व्यंग्य कविता (akhbar ki katran-hindi vyangya kavita)

दिन भर चाकरी कर
हर शाम अपने काम की
खबर देने अखबार के दफ्तर जाते हैं
सुबह पढ़ाते सभी को
फिर अखबार की कतरन
एलबम में सजाते हैं।
इसी तरह अपने कामयाबी के
प्रमाणपत्र सभी को दिखाते हैं।

सुनाते हैं दूसरों के कारनामे
अपने नाम से
टकराते हैं जाम अपना जाम से
सबूत के लिये
उधार के कारनामे अपने नाम लिखा लाते हैं।

चाहे कर ले कोई कितने भी जतन
लोग उनकी कद्र कहां करते हैं
जो अपने मियां मिट्ठू बन जाते हैं।

दूसरे की कामयाबी पर
रोटियां सैंकने की आदत है जिनकी
जरूरत होती है उनको ही
अखबार की कतरनों की
दिल से काम करने वाले
एक कामयाबी लेकर
दूसरी ओर बढ़ जाते हैं
उनके प्रमाण लोगों के
दिमाग के खुद ही छा जाते हैं।

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Wednesday, July 8, 2009

मिलावट और नकल का आतंक-हास्य व्यंग्य(nakal aur milavat par vyangya)

आतंक कोई बाहर विचरने वाला पशु नहीं बल्कि मानव के मन में रहने वाला भाव है जो उसके सामने तब उपस्थित होता है जब वह अपने लिये कठिन हालत पाता है। पूरे विश्व के साथ भारत में भी आंतक फैले होने की बात की जाती है पर अन्य से हमारी स्थिति थोड़ी अलग है। दूसरे देश कुछ लोगों द्वारा उठायी गयी बंदूकों के कारण आतंक से ग्रसित हैं पर भारत में तो यह आतंक का एक हिस्सा भर है। यह अलग बात है कि हमारे देश के बुद्धिमान बस उसी बंदूक वाले आतंक पर ही लिखते हैं।
बहुत दिन से हम देख रहे हैं कि हम सारे जमाने के आतंक पर लिख रहे हैं पर अपने मन में जिनका आंतक है उसकी भी चर्चा कर लें। सच बात तो यह है हम नकली नोटों और मिलावटी सामान से बहुत आतंकित हैं।
बाजार में जब किसी को पांच सौ का नोट देते हैं तो वह ऐसे देखता है कि जैसे कि किसी अपराधी ने उसे अपने चरित्र का प्रमाणपत्र देखने के लिये दिया हो। जब तक वह दुकानदार लेकर अपनी पेटी में वह नोट डालकर सौदा और बचे हुए पैसे वापस नहीं करता तब तक मन में जो उथल पुथल होती है उसमें हम कितनी बार घायल होते हैं यह पता ही नहीं-याद रहे पश्चिमी चिकित्सा शास्त्र यह कहता है कि तनाव से जो मनुष्य के दिमाग को क्षति पहुंचती है उसका पता उसे तत्काल नही चलता।
हमने अनेक दुकानदारों के सामने ताल ठौंकी-अरे, भईया हम यह नोट ए.टी.एम से ताजा ताजा निकाल कर लाये हैं।’
वह कहते हैं कि ‘साहब, आजकल तो ए़.टी.एम. से भी नकली नोट निकल आते हैं और वह सभी ताजा ही होते हैं।’
उस समय सारा आत्मविश्वास ध्वस्त नजर आता है। ऐसा लगता है कि जैसे बम फटा हो और हम अपनी किस्मत से साबित निकल गये।
यही मिलावटी सामान का हाल है। बाजार में खाने के नाम पर दिन-ब-दिन डरपोक होते जा रहे हैं। इधर टीवी पर सुना कि मिलावटी दूध में ऐसा सामान मिलाया जा रहा है जिसमें एक फीसदी भी शरीर के लिये पाचक नहीं हैं। मतलब यह कि पूरा का पूरा कचड़ा है जो पेट में जमा होता है और समय आने पर अपना दुष्प्रभाव दिखाता है। अभी उस दिन समाचार सुना कि एक तेरहवीं में विषाक्त खोये की मिठाई खाकर 1200 लोग एक साथ बीमार पड़ गये। उस समय हमारी सांसें उखड़ रही थी। उसी दौरान एक मित्र का फोन आया और उसने पूछा-‘क्या हालचाल हैं? तुम्हारे ब्लाग हिट हुए कि नहीं। अगर हो गये हों तो मिठाई खिला देना। हम अंधेरे में बैठे हैं और आज तुम्हारा ब्लाग नहीं देख पा रहे।’
हमने कहा-‘अच्छा है बैठे रहो। अगर लाईट आ गयी तो तुम टीवी समाचार भी जरूर देखोगे। वहां जब मिठाई खाकर बीमार पड़ने वालों की खबर सुनोगे तो फिर मिठाई नहीं मांगोगे बल्कि मिठाई खाना ही भूल जाओगे।’
मित्र ने कहा-‘’तुम चिंता मत करो। न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी। तुम कभी हिट नहीं बनोगे इसलिये मिठाई भी नहीं मिलेगी सो खतरा कम है। पर यार, वाकई बाहर खाने में हम दिमाग तनाव मे आ जाता है कि कहीं गलत चीज तो नहीं खा ली। उस दिन एक जगह चाय पी और बीच में छोड़ कर दुकानदार को पैसे दिये और उससे कहा‘यह हमारी इंसानियत ही समझना कि हमने पैसे दिये वरना तुम्हारा दूध खराब है उसमें बदबू आ रही है।’ उसने भी हमसे पैसे ले लिये। हैरानी की बात यह है कि लोग उसी चाय को पी रहे थे किसी ने उससे कुछ कहा नहीं।’’
पिछली दो दीवाली हमने बिना खोये की मिठाई खाये बिना ही मनाई हैं। कहां हमें उस दिन मिठाई खाने का शौक रहता था पर मिलावट के आतंक ने उसे छीन लिया। वजह यह है कि इधर दीवाली के दिन शुरु हुए उधर टीवी पर मिलावटी दूध के समाचार शुरु हो जाते हैं कहते हैं कि
1-शहरों में खोवा आ कहां से रहा है जबकि उस क्षेत्र में इतनी भैंसे ही नहीं्र है।
2-खोये में तमाम ऐसे रसायन मिले होते हैं जो पेट की आंतों में भारी हानि पहुंचाते हैं।
3-घी भी पूरी तरह से नकली बन रहा है।’
ऐसे समाचार जो दिमाग में आंतक फैलाते हैं वह बारूद के आतंक से कहीं कम नहीं होते। आप ही बताईये खोय की विषाक्त मिठाई खाकर 1200 लोग एक साथ बीमार हों तो उसे भला छोटी घटना माना जा सकता है? क्या जरूरी है कि दुनियां के किसी हिस्से में बारूद से लोग मरे उसे ही आतंकवादी घटना माना जायेगा?
समस्या यह नहीं है कि दूध, घी या खोवा मिलावटी सामान बन रहा है बल्कि हल्दी, मिर्ची और शक्कर में मिलावट की बात भी सामने आती है। इतना ही नहीं अब तो यह भी कहने लगे है कि सब्जियों और फलों में भी दवाईयां मिलाकर उन्हें प्रस्तुत किया जा रहा है और वह भी कम मनुष्य देह के लिये कम खतरनाक नहीं है।

जब बारूदी आतंक का समाचार चारों तरफ गूंज रहा होता है तब कुछ देर उस पर ध्यान अधिक रहता है पर जब अपने जीवन में कदम कदम पर नकली और खतरनाक सामान से सरोकार होने की आशंका है तो वह भी अब कम आतंकित नहीं करती। मतलब यह है कि चारों तरफ आंतक है पर हमारे देश के बुद्धिमान लोगों की आदत है कि विदेश के बताये रास्ते पर ही अपने विषय चुंनते हैं। हम इससे थोड़ा अलग हैं और हर विषय को एक आईना बनाकर अपने आसपास देखते हैं तब लगता है कि इस विश्व में बारूदी आतंक खत्म वैसे ही न होने वाला पर जो यह नकल और मिलावट का यह अप्रत्यक्ष आतंक है उसके परिणाम उससे कहीं अधिक गंभीर हैं। सोचने का अपना अपना तरीका है कोई सहमत न हो यह अलग बात है।
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