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Monday, September 27, 2010

अयोध्या में राम मंदिर और शतरंज की बिसात-व्यंग्य क्षणिकाऐं (ayodhya men ram mandir aur shataraj ki bisat-short hindi poem's)

राम के नाम की महिमा महान है,
जिन्होंने राजा राम को भजा
वह वज़ीर हो गये,
जिन्होंने बनवास और त्यागी रूप का किया बखान
वह भी बड़े फकीर हो गये,
जिन्होंने बेचा बीच बाज़ार नाम
वह भी अमीर हो गये,
मगर जिन्होंने भजा नाम दिल से
रहे उनके हमेशा अपने बनकर राम
मतलब निकालने वाले
क्या पहचानेंगे उनको
दौलत और शौहरत की छांह में
उनके ज़मीर सो गये।
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अयोध्या में राम मंदिर
बनेगा या नहीं इस पर
बरसों तक बहस चली है,
हृदय की आस्था
बाहर दिखाने के भी फायदे हैं
बना दिया राम जन्मभूमि को
शतरंज की बिसात
प्यादे भी बन गये वज़ीर
ऐसी शानदार चाल चली है।
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राम से भी बड़ा है राम का नाम
यह अब सभी को पता चला है,
दिल में न भी हो
पर बस यूं ही लेते रहे जो राम का नाम
उनके घर पर घी का चिराग जला है।
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राम का नाम लेते लेते
कई प्यादे भी वज़ीर हो गये,
बनवासी राम को भजता कौन
राजा राम की गाते गाते
राजाओं जैसे आज के फकीर हो गये।
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कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Saturday, September 25, 2010

कॉमनवेल्थ खेलों में घूसखोरी का वैश्वीकृत खेल-हिन्दी व्यंग्य लेख (comanwealth games in india and bribe world system-hindi satire article)

आर्थिक वैश्वीकरण तो सुना था पर उसके साथ घूस का भी वैश्वीकरण हो जायेगा यह नहीं सोचा था। दिल्ली में कॉमनवेल्थ खेल राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन हो रहा है। उसके आयोजन को लेकर जिस तरह चर्चायें आ रही हैं वह खेलों से अधिक रहस्य, रोमांच और रोचकता पैदा कर रही हैं। अगर आराम से चुपचाप खेल संपन्न हो जाते तो शायद इतना रोमांच नहीं होता जितना अब हो रहा है। पुल गिर गया कुछ स्टेडियमों की छतों से पानी टपक गया और तमाम तरह की अव्यवस्थाऐं पैदा होने की बात भी सामने आयी तो कुछ राष्ट्रभक्त शार्मिंदगी के साथ चिंतित भी हो गये हैं यह सोचकर कि इससे तो यह तो देश की बदनामी का वैश्वीकरण हो जायेगा।
अभी तक भ्रष्टाचार एक अंदरूनी समस्या थी पर अब उसकी पोल तो विश्व स्तर पर दिखाई दे रही है। अरे, घूसखोरी हमारे देश में ही नहीं है बल्कि बाहर भी है। आस्ट्रेलिया के अखबार ने दावा किया है कि कॉमनवेल्थ खेल आयोजन का प्रस्ताव पास कराने के लिये 72 देशों को रिश्वत दी गयी। इस अखबार ने अपने देश पर भी 55 लाख घूस लगाने के साथ में यह भी जोड़ा है कि आस्ट्रेलिया तो वैसे ही नई दिल्ली में कॉमनवेल्थ खेल के आयोजन का समर्थन करने वाला था। अगर इस खबर को सही माना जाये तो ऐसा लगता है कि कॉमनवेल्थ खेलों के आयोजन का प्रस्ताव पास कराने के लिये कहीं घूसखोरी का मेला लगा था। आस्ट्रेलिया ने भी बहती गंगा में हाथ धो दिया यह सोचकर कि जब हमाम में सब नंगे हैं तो हमीं क्यों नैतिकता की चादर ओढें रहें।
मतलब यह कि घूसखोरी को लेकर अब हमें शार्मिंदा होने की जरूरत नहीं है। घटिया काम के लिये भी काहेको शार्मिंदा हों? नई दिल्ली में प्रस्तावित इन कॉमनवेल्थ खेलों के लिये हुए निर्माण कार्यों में ब्रिटेन की कंपनियां भी शािमल हैंे। अरे, अंग्रेजों की ईमानदारी तो सदा विख्यात रही है ऐसे में अगर वही धोखा दे गये तो क्या करें? एक रोचक तथ्य टीवी पर हमारे सामने आया कि ब्रिटेन के किसी प्रतिनिधि ने खेल की अव्यवस्था पर असंतोष जताया मगर दो दिन में वह खुश हो गया और बोला कि ‘सब ठीक ठाक है।’
यह कंपनी प्रणाली ब्रिटेन की देन है। जब हम वाणिज्य स्नातक की शिक्षा ग्रहण कर रहे थे तब एक किताब में पढ़ा था कि ‘कंपनी एक अदृश्य दैत्य है, जिसके काले कारनामे आम निवेशक नहीं जान पाता।’ तब यह हमें यही पता नहीं था कि कंपनी होती क्या है क्योंकि भारत में तब तब निजी व्यापार की प्रधानता थी, मगर आर्थिक उदारीकरण की वजह से इतनी तेजी अपने देश में कंपनी प्रणाली आ गयी कि बहुत समय बाद हमारे यह समझ में आया कि इस दैत्य का रूप कैसा है जो अक्सर घूसखोरी और घोटालों के रूप में प्रकट होता है। अब तो यह हालत है कि माफिया लोग भी अपने गिरोह का नाम कंपनी रखते हैं। इतना ही नहीं यही माफिया भी कंपनियों में निवेश करते हैं ऐसे समाचार अखबारों में छपते रहते हैं। अब यह कहना कठिन है कि किस कंपनी के नाम के पीछे देवता का या दानव का मुखौटा है। वैसे देवताओं और दानवों में बैर माना जाता है पर समुद्र मंथन के समय दोनों एक हो गये थे और उस समय आम इंसानों को पूछा हो यह कहीं उल्लेख नहीं मिलता। अभिप्राय यह है कि देवताओं का काम भी दानवों के बिना नहंी चलता। वैसे दोनों भाई हैं और किसी भी हालत में उनके सामने एक आम आदमी की कोई भूमिका नहीं है। इसलिये कहीं देवता दानवों से तो कहीं दानव देवताओं के सहारे आजकल काम चला रहे हैं। संभव है कि घूसखोरी के मेले में दोनों ही शािमल हुए हों आखिर वहां धन मंथन होने वाला था। उसके बाद शुरु होने वाला था निर्माण कार्य का दौर जिसमें देवताओं और दानव नाम धारी इन मुखौटों ने खूब धन मंथन किया होगा वरना क्यों यह घूसखोरी का दौर चला? दानवों को मिला तो कमीशन या दलाली कहो और देवताओं को मिला तो चंदा कहो?मुश्किल यह है कि उनके बंधुआ प्रचारक ही कह रहे हैं कि यह सब घूसखोरी है।
ऐसा लगता है कि आजकल के देवता और दानव घूसखोरी से ही खुश हैं। देवताओं का मन चंदे से तो दानवों का दलाली से नहीं भरता। जिन्होंने घुस दी होगी यकीनन उनको निर्माण कार्यों से जोरदार लाभ हुआ होगा और जिन्होंने ली होगी उनको भी आगे अच्छी संभावनाऐं दिखी होंगी-मेहमान बनने पर भी तमाम लाभ होते ही हैं। घूस लेने वाले खेल संगठन और देने वाली कंपनियां रही होंगी। मतलब बात निरंकार रूप की तरफ चली गयी क्योंकि यहां चेहरे बैनरों के पीछे छिप जाते हैं। कंपनी प्रणाली का तो अज़ीब रूप है। कंपनी के शिखर पुरुषों का कोई प्रत्यक्ष आर्थिक दायित्व नहीं होता। लाभ हो तो उनकी पौ बाहर और कंपनी डूब जाये तो उनको आंच भी नहीं आती। इतना ही आम निवेशकों का पैसा उनके खाते में मान लिया जाता है। अक्सर कुछ पत्रिकाऐं अमीरों की सूची जारी करती हैं जो कंपनियों के प्रबंध निदेशक होते हैं। तब अक्सर सवाल हमारे मन में आता है कि उन अमीरों की अपनी अकेले की संपत्ति बताई जा रही है या कंपनियों की जिनमें आम निवेशक भी शािमल है।
अक्सर भारत में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की चर्चा होती है। लोग उनको विदेशी कहकर पुकारते हैं पर इस बात की कोई गारंटी नहीं दे सकता कि उनमें भारत के पूंजीपतियों का अप्रत्यक्ष रूप से धन नहीं लगा होगा। भारत में विदेशी निवेश को लेकर कुछ आर्थिक विशेषज्ञ बहुत उत्साहित रहते हैं तब सवाल यह उठता है कि क्या इसके पीछे उनके कुछ निजी स्वार्थ हैं।
क्रिकेट की एक क्लब स्तरीय प्रतियोगिता इंडियन प्रीमियर लीग में एक टीम के मालिकाना हक को लेकर एक दिलचस्प तथ्य सामने आया था। जो कंपनी एक टीम की मालिक है उसकी मालिक चार कंपनियां हैं। फिर उन चार अलग अलग अलग कंपनियों की चार चार अलग कंपनियां मालिक हैं। ऐसे ही कंपनियों के पीछे कपंनी का दौर टीवी चैनल सुना रहा था पर हमारे समझ में आखिर तक यह नहीं आया कि कौन आदमी उसका मालिक है। इतना ही नहीं भारत के एक क्लब की टीम का मालिकाना हक ब्रिटेन और मॉरीशस देशों की कंपनियों तक दिखाई देने लगा था। अब पता नहीं इन मामलों का क्या हुआ? एक कंपनी के आदमी का नाम आया तो पता चला कि वह तो केवल दिखावे ही मालिक है उसके पीछे तो कोई अदृश्य ताकते हैं। क्रिकेट या अन्य खेलों के विकास में यह अदृश्य शक्तिया अगर देवीय हैं तो छिपती हैं क्योंकि यह काम तो दानवों का ही है। क्रिकेट की क्लब स्तरीय प्रतियोगिताओं के फिक्सिंग का मामला जिस तरह सामने आ रहा है उससे तो नहीं लगता कि यह शक्तियां उसके विकास के लिये काम कर रही हैं। वैसे भी कंपनियां आर्थिक उद्देश्यों को चालाकी से प्राप्त करने के लिये बनाई जाती हैं जहां बिना आर्थिक दायित्व के मुनाफा जेब में रखा जाता है और हानि आम निवेशक की तरफ सरका दी जाती है। पैसा आम निवेशक का और सिर उठाकर घूम रहे हैं उससे कर्जा लेकर लोग। पार्टियों में कंपनियों के प्रबंध निदेशक की तरह नहीं मालिक की तरह जाते हैं और प्रचार माध्यमों में उनका जिक्र राजा की तरह होता है।
राष्ट्रमंडल खेलों का स्तर बहुत ऊंचा माना नहीं जाता। अनेक लोगों को यह सुनकर निराशा होगी जनचर्चा में इसमें व्याप्त कमियों की बात आती है पर कोई इसमें होने वाले खेलों में दिलचस्पी लेता हो ऐसा नहीं दिखता। बहरहाल इस तरह की घूसखोरी ने आर्थिक वैश्वीकरण तथा भ्रष्टाचारी के विश्वव्यापी होने की पोल खोलकर रख दी है। इसलिये राष्ट्रभक्तों को शर्मिंदा या चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है। यह कंपनी और कमीशन का खेल है जिसका लक्ष्य है विकास करना यानि बैंकों में अपनी जमा राशि बढ़ाना, समाज में अपनी सक्रियता बनाये रखना और प्रचार में प्रभुत्व दिखाना। जी हां, देश और खेलों का विकास इस स्वरूप का नाम है।
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Sunday, September 19, 2010

खामोशी-हिन्दी कविता (khamoshi-hindi kavita)

इशारों में कहते हैं
तो वह समझ नहीं पाते
सीधे कहें तो चिढ़ जायेंगे,
हमारी बदज़ुबानी के बयान
सभी जगह गीत की तरह गायेंगे।
बेहतर है खामोशी ओढ़ लें
समय के पहिये ही
प्रस्तुत करेंगे उनके सामने सच के लफ्ज़
जब उनको ढोकर आयेंगे।
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Sunday, September 12, 2010

हिन्दी में चिंदी लेखन-हिन्दी व्यंग्य (hindi men chindi lekhan-hindi vyangya)

वह नब्बे साल के अंग्रेजी लेखक हैं मगर उनको हिन्दी आती होगी इसमें संदेह है पर हिन्दी के समाचार पत्र पत्रिकाऐं उनके लेख अपने यहां छापते हैं-यकीनन ऐसा अनुवाद के द्वारा ही होता होगा। वह क्या लिखते हैं? इसका सीधा जवाब यह है कि विवादों को अधिक विवादास्पद बनाना, संवेदनाओं को अधिक उभारना और कल्पित संस्मरणों से अपने अपने आप को श्रेष्ठ साबित करना। अगर हिन्दी के सामान्य लेखक से भी उनकी तुलना की जाये तो उनका स्तर कोई अधिक ऊंचा नहीं है मगर चूंकि हमारे प्रकाशन जगत का नियम बन गया है कि वह केवल एक लेखक के रूप में किसी व्यक्ति को तभी स्वीकार करेंगे जब उसके साथ दौलत, शौहरत तथा ऊंचे पद का बिल्ला लगा होना चाहिये। यह तभी संभव है जब कोई लेखक आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक तथा धार्मिक शिखर पुरुषों का सानिध्य प्राप्त करे और दुर्भाग्य कि वह उनको ही मिलता है जिनको अंग्रेजी आती है और तय बात है कि देश के अनेक हिन्दी संपादक उनके प्रशंसक बन जाते हैं।
उन वृद्ध लेखक ने अपने एक लेख में भिंडरवाले और ओसामा बिन लादेन से वीर सावरकर की तुलना कर डाली। यकीनन यह चिढ़ाने वाली बात है। अगर अंग्रेजी अखबार में ही यह सब छप जाता तो कोई बात नहीं मगर उसे हिन्दी अखबार में भी जगह मिली। यह हिन्दी की महिमा है कि जब तक उसमें कोई लेखक न छपे तब तक वह अपने को पूर्ण नहीं मान सकता और जितने भी इस समय प्रतिष्ठित लेखक हैं वह अंग्रेजी के ही हैं इसलिये ही अपने अनुवाद अखबारों में छपवाते हैं। इससे प्रकाशन जगत और लेखक दोनों का काम सिद्ध होता है। अंग्रेजी का लेखक पूर्णता पाता है तो हिन्दी प्रकाशन जगत के कर्णधार भी यह सोचकर चैन की संास लेते हैं कि किसी आम हिन्दी लेखक की सहायता लिये बगैर ही हिन्दी में अपना काम चला लिया।
वह लेखक क्या लिखते हैं? उनका लिखा याद नहीं आ रहा है। चलिये उनकी शैली में कुछ अपनी शैली मिलाकर एक कल्पित संस्मरण लिख लेते हैं।
मैं ताजमहल पहुंच गया। उस समय आसमान में बादल थे पर उमस के कारण पसीना भी बहुत आ रहा था। कभी कभी ठंडी हवा चल रही थी तब थोड़ा अच्छा लगता था। बीच बीच में धूप भी निकल आती थी। ताजमहल के प्रवेश द्वार पर खड़ा होकर मैं उसे निहार रहा था। तभी वहां दो विदेशी लड़किया आयीं। बाद में पता लगा कि एक फ्रांस की तो दूसरी ब्रिटेन की है।
फ्रांसीसी  लड़की मुझे एकटक निहारते हुए देखकर बोली-‘‘आप ताजमहल को इस तरह घूर कर देख रहे हैं लगता है आप यहां पहली बार आये हैं। आप तो इसी देश के ही हैं शायद....आप इस ताजमहल के बारे में क्या सोचते हैं।’
मैं अवाक होकर उसे देख रहा था। वह बहुत सुंदर थी। उसने जींस पहन रखी थी। उसके ऊपर लंबा  पीले रंग का कुर्ता  उसके घुटनों तक लटक रहा था। मैने उससे कहा-‘‘ मैं ताजमहल देखने आज नहीं आया बल्कि एक प्रसिद्ध लेखक की किताब यहां ढूंढने आया हूं। उस किताब को अनेक शहरों में ढूंढा पर नहीं मिली। सोच रहा हूं कि यहां कोई हॉकर शायद उसे बेचता हुए मिल जाये। वह किताब मिल जाये तो उसे पढ़कर कल तसल्ली से ताज़महल देखूंगा और सोचूंगा।’
वह फ्रांसीसी  लड़की पहले तो मेरी शक्ल हैरानी से देखने लगी फिर बोली-‘पर आप तो एकटक इसे देखे जा रहे हैं और कहते हैं कि कल देखूंगा।’’
मैंने कहा-‘‘मेरी आंखें वहां जरूर हैं पर ताजमहल को नहीं  देख रहा और न सोच रहा  क्योंकि उसके लिये मुझे उस प्रसिद्ध लेखक की एक अदद किताब की तलाश है जिसमें यह दावा किया गया है कि ताजमहल किसी समय तेजोमहालय नाम का एक शिव मंदिर था।’’
उसके पास खड़ी अंग्रेज लड़की ने कहा-‘हमारा मतलब यह था कि आप इस समय ताजमहल के बारे में क्या सोच रहे हैं? वह किताब पढ़ने के बाद आप जो भी सोचें, हमारी बला से! आप किताब पढ़ने की बात बताकर अपने आपको विद्वान क्यों साबित करना चाहते हैं?’
मैंने कहा-‘नहीं, बिना किताब पढ़े हम आधुनिक हिन्दी लोगों की सोच नहीं चलती। मैं आपसे क्षमाप्रार्थी हूं, बस मुझे वह किताब मिल जाये तो....अपना विचार आपको बता दूंगा।’
अंग्रेज लड़की ने कहा-‘कमाल है! एक तो हम यहां ताज़महल देख रहे है दूसरा आपको! जो किताब पढ़े बिना अपनी सोच बताने को तैयार नहीं है।’
मैंने कहा-‘क्या करें? आपके देश की डेढ़ सौ साल की गुलामी हमारी सोचने की ताकत को भी गुलाम बनाकर रख गयी। इसलिये बिना किताब के चलती नहीं।’
बात आयी गयी खत्म हो गयी थी। मैं शाम को बार में बैठा अपने एक साथी के साथ शराब पी रहा था। मेरा साथी उस समय मेरे सामने बैठा सिगरेट के कश लेता हुआ मेरी समस्या का समाधान सोच रहा था।’
नशे के सरूर में मेरी आंखें भी अब कुछ सोच रही थीं। अचानक मेरे पास दो कदम आकर रुके और सुरीली आवाज मेरी कानों गूंजी-‘हलौ, आप यहां क्या ताज़महल पर लिखी वह किताब ढूंढने आये हैं।’
मैने अचकचा कर दायें तरफ ऊपर मुंह कर देखा तो वह फ्रांसिसी लड़की खड़ी थी। उसके साथ ही वह अंग्रेज लड़की कुछ दूर थी जो अब पास आ गयी। वह फ्रांसिसी लड़की मुस्करा रही थी और यकीनन उसका प्रश्न मजाक उड़ाने जैसा ही था।
मैंने हंसकर कहा-‘हां, इस कबाड़ी को इसलिये ही यहां लाया हूं क्योकि इसने वादा किया है कि एक पैग पीने का बाद याद करेगा कि इसने वह किताब कहां देखी थी। वह किताब उसके कबाड़ की दुकान पर भी हो सकती है, ऐसा इसने बताया।’’
अंग्रेज लड़की बोली-‘अच्छा! आप अगर किताब पा लें तो पढ़कर कल हमें जरूर बताईयेगा कि ताजमहल के बारे में क्या सोचते हैं? कल हम वहां फिर आयेंगीं।’
मैंने कहा-‘ताजमहल एक बहुत अच्छी देखने लायक जगह है। उसे देखकर ऐसा अद्भुत अहसास होता है जिसका शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता।’
दोनों लड़कियां चौंक गयी। अंग्रेज लड़की बुझे घूरते हुए बोली-‘पर आपने तो वह किताब पढ़ी भी नहीं। फिर यह टिप्पणी कैसे कर दी। आप तो बिना किताब पढ़े कुछ सोचते ही नहीं’।
मैंने कहा-‘हां यह एक सच बात है पर दूसरा सच यह भी है कि शराब सब बुलवा लेती है जो आप सामान्य तौर से नहीं बोल पाते।’’
यह था एक कल्पित संस्मरण! यह कुछ बड़ा हो गया और इसे ताज़महल से बार तक इसे खींचकर नहीं लाते तो भी चल जाता पर लिखते लिखते अपनी शैली हावी हो ही जाती है क्योकि ताज़महल तक यह संस्मरण ठीक ठाक था पर उससे आगे इसमें कुछ अधिक प्रभाव लग रहा है।
मगर हम जिस लेखक की चर्चा कर रहे हैं वह इसी तरह ही दो तीन संस्मरण लिखकर और साथ में विवादास्पद मुद्दों पर आधी अधूरी होने के साथ ही बेतुकी राय रखकर लेख बना लेते हैं।
वैसे भी अंग्रेजी में लिखने पर हिन्दी में प्रसिद्धि पाने वाले लेखक को शायद ही हिन्दी लिखना आती हो पर अपने यहां एक कहावत हैं न कि ‘घर का ब्राह्म्ण बैल बराबर, आन गांव का सिद्ध’। अंग्रेजी लेखक को ही सिद्ध माना जाता है और हिन्दी को बेचारा। अंग्रेजी के अनेक लेखक बेतुकी, और स्तरहीन लिखकर भी हिन्दी में छाये रहते हैं। इनमें से अधिकतर राजनीतिक घटनाओं पर संबंधित पात्रों का नाम लिखकर ही उनका प्रसिद्ध बनाते हैं-अब यह उस पात्र की प्रशंसा करें या आलोचना दोनों में उसका नाम तो होता ही है। इनमें इतनी तमीज़ नहीं है कि जो व्यक्ति देह के साथ जीवित नहीं हो उस पर आक्षेपात्मक तो कभी नहीं लिखना चाहिये। कम से कम उनकी मूल छबि से तो छेड़छाड़ नहीं करना चाहिये। भिंडरवाले और ओसामा बिन लादेन की छबि अच्छी नहीं है पर सावरकर को एक योद्ध माना जाता है। उनके विचारों से किसी को असहमति हो सकती है पर इसको लेकर उनकी छबि पर प्रहार करना एक अनुचित कृत्य हैं। बहरहाल हिन्दी में ऐसे ही चिंदी लेखक प्रसिद्ध होते रहे हैं और यही शिकायत भी करते हैं कि हिन्दी में अच्छा लिखा नहीं जा रहा। चिंदी लेखक यानि अंग्रेजी में टुकड़े टुकड़े लिखकर उसके हिन्दी में बेचने वाले
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Saturday, September 4, 2010

नक्सली आतंक को युद्ध नहीं कहा जा सकता-हिन्दी लेख (it is terarrism not war by naxlit)

न कोई तर्क से बात करने वाला है और समझने वाला! बहसें होती हैं, चंद नारे उधर से नक्सली लगाते हैं तो चंद नपे तुले वाक्य इधर से सुनाकर इतिश्री कर ली जाती है। कथित नक्सलवादर पढ़े लिखे हैं पर शिक्षा तो उनकी वही है जो उनसे बहस करने वालों की है। एक टीवी चैनल पर एक नक्सली नेता से भेंट कुछ यूं देखी सुनी।
एंकर-‘आप गरीबों के लिए लड़ने का दावा करते हैं पर जो पुलिस वाले अपने अपहृत किये हैं वह सभी गरीब ही तो हैं?’
नक्सली नेता-‘यह तो युद्ध है। जो सामने आता है उसे मारना ही पड़ता है।’
एंकर-‘यह पुलिस वाले तो बिचारे ड्यूटी कर रहे हैं, वह किसी के आदेश पर वहां आये हैं। आपकी लड़ाई तो व्यवस्था से हैं आप उसको बिगाड़ने वालों तक क्यों नहीं पहुंचते।’
नक्सली नेता-हम वहां भी पहुंचेंगे, पर अभी तो युद्ध में जो सामने हैं उसे तो मारेंगे ही। हमारी मांगें पूरी हो जायें तो उनको रिहा कर देंगे।’
नक्सली नेता बड़े शतिराने तरीके से अपने आतंक को युद्ध कह रहा है पर उसे कौन बताने वाला है कि युद्ध के सच्चे योद्धा कुछ नियमों का पालन करते हैं। इनका पालन कैसे होता है हमारे अध्यात्मिक दर्शन में बताया जा चुका है पर उनको मनुवादी, सवर्णवादी तथा पूंजीवादी बताकर कुछ लोग पढ़ना नहीं चाहते।
उसमें स्पष्ट कहा गया है कि
शरण में आये हुए पर
हथियार हाथ में न होने पर
युद्ध में पीठ पीछे होने पर
युद्ध से भागने पर
हथियार डालने वाले
युद्ध न करने या घायल हो जाने पर वहीं बैठे योद्धा पर कभी वार नहीं करना चाहिये।
चलिये भारतीय अध्यात्म दर्शन बुरा ही सही मगर इन नियमों का पालन तो दुनियां में हर जगह होता है। जो पेशेवर योद्धा है वह इसका पालन करते हैं और यही उनकी वीरता का परिचायक होता है। युद्ध में वीरता तभी तक ही सिद्ध मानी जाती है जब तक सामने से लड़ रहे योद्धा को परास्त न किया जाये। उससे इतर तो छल कपट माना जाता है। अब महाभारत युद्ध में कुछ जगह कौरवों से छलकपट हुआ तो इसलिये कि उन्होंने भी अभिमन्यु को छल से मारा था।
मुख्य सवाल यह है कि टीवी चैनलों में बैठे संपादक और एंकरों की भी है जो इन बातों को नहीं जानते। इससे जाहिर होता है कि निजी क्षेत्र में कम से कम संचार माध्यमों में योग्यता और ज्ञान से अधिक चेहरा और आवाज के साथ ही निज प्रबंधन की क्षमता की प्रधानता है जिसके आधार पर वहां काम मिलता है। अब जरा उन बुद्धिजीवियों की भी बात करें जो इन नक्सलियों को वीर मानते हैं।
असावधान, सो रहे तथा खाना खा रहे पुलिस कर्मियों पर जिस तरह नक्सली हमले करते हैं वह उनके कायर और क्रूर होने की निशानी है। दूसरा अभी हाल ही में बिहार में अपहृत पुलिस कर्मियों की घटना जो सामने आयी है उसमें एक तथ्य ऐसा है जो कुछ अलग से हटकर सोचने को मज़बूर करता है। वह है तनाव ग्रस्त क्षेत्र से आदिवासियों के पलायन का जो कि पुलिस की घेराबंदी के चलते वहां से बाहर आ रहे हैं। इधर पुलिस उधर नक्सली ऐसे में उनके लिये जीवन बचाने का यही एक रास्त है क्योंकि वह आम आदमी हैं। ऐसी स्थिति में उनकी हमदर्दी नक्सलियों से होगी इस पर उनके अंध समर्थक ही यकीन कर सकते हैं। कहीं यह नक्सलवाद भी क्रिकेट मैचों की तरह फिक्स तो नहीं है। आदिवासियों का यह पलायन कहीं उनके स्थाई पलायन का पूर्वाभ्यास तो नहीं है। क्योंकि आदिवासी क्षेत्रों में विकास न होने की बात कही जाती है और उसका जो स्वरूप हमारे सामने हैं वह केवल पूंजीपति ही करते हैं। इसके लिये उनको चाहिऐ सस्ती ज़मीन! आदिवासी ऐसे ज़मीन देंगे नहीं मगर उनसे लेनी है। इसलिये वहां तनाव पैदा कर उनको पहले अस्थाई रूप से पलायन करने के लिये विवश किया गया। बाद में विकास करने के नाम पर कोई समझौता किया जाये तो उसमें पूंजीपतियों की भूमिका तो बिना आमंत्रण के होनी ही है तब अशांति से ऊबे आदिवासी जहां अब उनको अस्थाई बसाहट मिले वहां रहने को तैयार कर ज़मीन उनसे औने पौने दामों पर खरीद ली जाये-क्या ऐसी किसी योजना की आशंका से इंकार किया जा सकता है।
जहां तक पुलिस जवानों के मरने का सवाल है तो वह आम लोग हैं और उनसे आमजन की हमदर्दी ही हो सकती है बाकी तो जुबानी जमा खर्च वाले बहुत बड़े लोग हैं। किं्रकेट में खूब फिक्सिंग चलती है किसी को परवाह नहीं क्योंकि उसमें आम इंसान ही ठगा जाता है। जो क्रिकेट में सट्टा चला रहे हैं वही फिल्मों से भी जुड़े हैं तो आतंकवादियों को भी पैसा पहुंचा रहे हैं। यह आतंक भी फिक्सिंग जैसा लगता है जिसमें स्थापित लोगों को कोई अंतर नहीं पड़ता। मरने वाला भी छोटा आदमी और मारने वाला भी।
एक पुलिस वाले को मार दिया है। उसके जवाब में नक्सली नेता कहता है कि‘हमारी कमेटी ने यह निर्णय लिया।’
मतलब कमेटी में बैठे लोग सीधे मारने नहीं आते और जो मारते हैं यह निर्णयकर्ता नहीं है। घालमेल यही से शुरु होता है। इस बात की पूरी गुंजायश है कि जहां अधिक लोग निर्णय करने वाले होते हैं वहां बाहर से आये निर्देंशों का पालन किया जाता है। आखिरी बात यह युद्ध है तो कमेटी ने निर्णय क्यों लिया? क्या कभी सुना है कि युद्ध में कमेटियां निर्णय देती हैं और सैनिक गोलियां चलाते हैं। जो पुलिस वाले बंधक हैं वह निहत्थे हैं और स्पष्टतः एक तरह से कथित नक्सली योद्धाओं के की शरण में है। आधुनिक युग में भी युद्धबंदियों की हत्या एक अपराध ही माना जाता है। इसलिये जो बुद्धिमान लोग इन नक्सलियों में वीरता का गुण देखते हैं वह जरा अपनी राय पर विचार कर लें। जो इन नक्सलियों से असहमत हैं वह भी जरा यह सवाल उनके सामने उठायें। यह बतायें कि यह युद्ध नहीं होता। इसका केवल एक ही नाम है‘आतंक।’
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Monday, August 30, 2010

अपराधियों की छबि समाज सेवकों जैसी-हास्य कविताएँ (image of criminal-hindi comic poem)

फर्जी मुठभेड़ों की चर्चा कुछ
इस तरह सरेआम हो जाती कि
अपराधियों की छबि भी
समाज सेवकों जैसी बन जाती है।
कई कत्ल करने पर भी
पहरेदारों की गोली से मरे हुए
पाते शहीदों जैसा मान,
बचकर निकल गये
जाकर परदेस में बनाते अपनी शान
उनकी कहानियां चलती हैं नायकों की तरह
जिससे गर्दन उनकी तन जाती है।
--------
टीवी चैनल के बॉस ने
अपने संवाददाता से कहा
‘आजकल फर्जी मुठभेड़ों की चल रही चर्चा,
तुम भी कोई ढूंढ लो, इसमें नहीं होगा खर्चा।
एक बात ध्यान रखना
पहरेदारों की गोली से मरे इंसान ने
चाहे कितने भी अपराध किये हों
उनको मत दिखाना,
शहीद के रूप में उसका नाम लिखाना,
जनता में जज़्बात उठाना है,
हमदर्दी का करना है व्यापार
इसलिये उसकी हर बात को भुलाना है,
मत करना उनके संगीन कारनामों की चर्चा।
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Thursday, August 26, 2010

नई उम्मीद के चिराग-हिन्दी शायरी (nai ummeed ki chirag-hindi shayari)

वादे जुबान पर हैं उनके
नीयत में नहीं
यह समझ नहीं पाये,
धोखा होने का शक था
इसलिये मिलने पर भी नहीं पछताये।
------
खतरे कम रहें
इसलिये दोस्त कम ही बनाये,
दुनियां का इतिहास पढ़ा है हमने भी,
अपनों ने सबसे ज्यादा दगा के दाव लगाये।
--------
उनके मुंह फेर जाने पर
पल भर रो भी लिये,
मगर पहले से ही अंदेशा था कि
मतलब निकलते ही
वह साथ छोड़े देंगे
इसलिये जल्द ही संभलकर
नई उम्मीद के चिराग जलाये।
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Sunday, August 22, 2010

चेतना-हिन्दी शायरी(chetana-hindi shayari)

मर गयी है लोगों की चेतना इस कदर कि
सपने देखने के लिये भी
सोच उधार लेते हैं,
अपनी मंज़िल क्या पायेंगे वह लोग
जो हमराह के रूप में कच्चे यार लेते हैं,
अपने ख्वाबों में चाहे कितने भी देखे सपने
आकाश में उड़ने के
पर इंसान को पंख नहीं मिले
फिर भी कुछ लोग उड़ने के अरमान पाल लेते हैं।
----------
लोगों में चेतना लाने का काम
भी अब ठेके पर होने लगा है,
जिसने लिया वह सोने लगा है,
मर गये लोगों के जज़्बात
मुर्दा दिलों में हवस के कीड़ों का निवास होने लगा है।
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Thursday, August 19, 2010

नीयत-क्षणिका (neeyat-kshnika)

भ्रष्टाचार के विरुद्ध
अब कभी ज़ंग नहीं हो सकती,
अलबत्ता हिस्सा बांटने पर
हो सकता है झगड़ा
मगर मुफ्त में मिले पैसे को
हक की तरह वसूल करने में
किसी की नीयत तंग नहीं हो सकती।
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Saturday, August 14, 2010

नागपंचमी का अध्यात्मिक महत्व-हिन्दी लेख (naagpanchami ka mahatva-hindi lekh)

पूरे देश में नागपंचमी का पर्व बड़े धूमधाम से बनाया जाता है। दरअसल इसका धार्मिक महत्व सभी जानते हैं पर शायद ही कोई इसका अध्यात्मिक महत्व समझता हो क्योंकि उसका संबंध आंतरिक अनुभूतियों से है जो अव्यक्त होती हैं जबकि लोग व्यक्त भाव से मंदिरों में पूजा अर्चना कर ही इतिश्री कर लेते हैं। अध्यात्मिक विषय आंतरिक क्रियाओं से जुड़ा है उनका ज्ञान होने पर हम हमने कर्मों का दृश्यव्य के साथ अदृश्यव्य परिणामों का भी अध्ययन कर सकते हैं।
नागपंचमी मनाते हुए इस देश को बरसों हो गये पर आज भी नाग और सांप के नाम पर इतने भ्रम फैले हैं कि देखकर आश्चर्य होता है। मजे की बात यह है कि शिक्षित तबका भी उस भ्रम के साथ जी रहा है जबकि सच उसने अपनी किताबों में पढ़ा है।
जो भ्रम इस देश में फैले हैं वह यह है कि
-सारे सांप और नाग जहरीले होते हैं।
-सांप और नाग दूध पीते हैं।
-नाग बीन की आवाज पर नाचता है।
इनका सच यह है कि
-नब्बे फीसदी से अधिक सांप और नाग जहरीले नहीं होते।
-सांप और नाग दूध पी नहीं सकते क्योंकि उनके मुख में अंदर चीज ले जाने की क्षमता नहीं होती। वह निगलते हैं इसलिये चूहे या मैंढक को सीधे मुंह में लेकर पेट में निगल जाते हैं। ?
-सपेरा बीन बजाते हुए स्वयं भी नृत्य करता है जिसे देखकर उसका पालतू सांप या नाग नृत्य करता है। सांप या नाग को कान नहीं होते वह शरीर की धमनियों में जमीन पर होने वाले स्वर की अनुभूति कर अपना मार्ग चलता है।
अध्यात्मिक और आधुनिक ज्ञान के अभाव के कारण शिक्षित लोग जो कि आधुनिक कालोनी में बसते हैं वहां सांप या नाग के अपने घर में आने पर घबड़ा जाते हैं। वह कहते हैं कि सांप हमारे घर में आ गया जबकि सच यह है कि सांप या नाग के घर पर उन्होंने अपना निवास बनाया होता है। उनके घरों में सांप आने पर किसी को बुलाकर मरवा कर जलवा दिया जाता है। सांप को जीव शास्त्री वन संपदा मानते हैं क्योंकि वह फसलों को हानि पहुंचाने वाले कीड़ों को अपना भोजन बनाते हैं जिसमें चूहा भी शामिल है। अनेक लोग तो सांप और नाग को मनुष्य का बिना पाला हुआ वफादार जीव मानते हैं।
हमारे अध्यात्मिक ग्रंथों में सांपों और नागों की मनुष्य की तरह ही सक्रियता का वर्णन है। सबसे बड़ी बात यह है कि शेषनाग को प्रथ्वी धारण करने वाला माना गया है। इसे हम प्रतीकात्मक भी माने तो यह तो सच है कि सांप और नाग लंबे समय तक इस संसार के विनाशकारी कीड़ों को अपना भोजन बनाकर मनुष्य और पशुओं के जीवन का मार्ग ही प्रशस्त करते रहे हैं। जब कीटनाशक नहीं  रहे होंगे तब उनसे बचाने का काम इन्हीं जीवों ने किया होगा।
कालांतर में हम देखें तो सांप और नागों की संख्या कम होती गयी है और मनुष्य को अब अपनी फसलों के लिये कीटनाशक रसायनों का बड़े पैमाने पर उपयोग करना पड़ रहा है। इसका परिणाम यह हुआ है कि अब विशेषज्ञ फलों और सब्जियों को इन कीटनाशकों के कारण विषैले होने की बात भी कह रहे हैं। किसी समय लोग केवल फलाहार कर जीवन गुजारते थे क्योंकि उनके लिये पका हुआ भोजन बीमारियों का कारण था। अनेक लोग तो मटर तथा अन्य सब्जियां बिना पकाये हुए खाते थे क्योंकि वह पौष्टिक मानी जाती थीं। अब हालत यह है कि बिना पकाये ग्रहण करना एक जोखिम भरा काम होता जा रहा है क्योंकि उनमें मिले कीटनाशकों को धोना जरूरी है। इनमें से कुछ कीटनाशक धोने में तो कुछ पकाने में अपना प्रभाव खो देते हैं पर उसके बावजूद भी सब्जियों की पौष्टिकता कम हो रही है।
अगर सांपों और नागों को पूज्यनीय बताया गया तो उसका कारण उनकी मनुष्य के लिए उपयोगिता से था। मगर आज हालत क्या है? वन क्षेत्र कम होने के साथ ही पशु पक्षियों और अन्य उपयोगी जीवों का जीना दुश्वार हो गया है। बरसात के समय जब सांप या नाग जमीन से बाहर निकलते हैं तो उनका जीवन एक खतरे की तरफ बढ़ता है। अनेक सांप और नाग वाहनों से कुचल जाते हैं तो अनेक दूसरों के घर में घुसने की सजा पाते हैं।
पेड़ पौद्यों की पर्यावरण की रक्षा के लिये आवश्यकता है और सांप और नाग इन्हीं पेड़ पौद्यों को नष्ट करने वाले कीड़ों को समाप्त करते हैं। जहां तक उनके द्वारा काटे जाने की घटनाओं की बात है वह नगण्य होती हैं और समय पर चिकित्सा मिल जाये तो आदमी बच भी जाता है-मगर देश की व्यवस्था ऐसी है कि कोई काम सहजता से नहीं होता, कहीं चिकित्सक है तो दवा नहीं मिलती। ऐसे में सांप और नाग की हत्या क्रेवल लोग भय के कारण ही करते हैं। सांप या नाग के काटे जाने का भय इस कदर लोगों में है कि शिक्षित से शिक्षित आदमी को भी समझाना कठिन है।
इसके बावजूद यह एक मान्य तथ्य है कि अन्य जीवों के अस्तित्व के कारण ही मनुष्य का अस्तित्व है और अगर वह उनको नहीं बचायेगा तो खुद मिट जायेगा। नागपंचमी में नाग या सांप की पूजा करने से ही केवल इतिश्री नहीं समझनी चाहिए बल्कि इन जीवों की रक्षा के प्रयास भी किये जाने चाहिये। इस नागपंचमी पर पाठकों तथा ब्लाग लेखक मित्रों को बधाई। इस अवसर पर यह संकल्प लेना चाहिए कि वन्य जीवों की रक्षा हर संभव प्रयास से करेंगे।
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Tuesday, August 10, 2010

कमीशन की बरसात-हास्य कविताएँ (commision ki barsat-hasya kavitaen)

बच्चे को मैदान पर हॉकी खेलते देख
पुराने एक खिलाड़ी ने उससे कहा
‘‘बेटा, बॉल से हॉकी कुछ समय तक
तक खेलना ठीक है,
फिर कुछ समय बाद पैसे का खेल भी सीख,
अगर केवल हॉकी खेलेगा  तो
बाद में मांगेगा भीख।’’
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बरसात के पानी से मैदान भर गया
खिलाड़ी दुःखी हो गये
पर प्रबंधक खुश होकर कार्यकर्ताओं में मिठाई बांटने लगा
जब उससे पूछा गया तो वह बोला
‘‘अरे, यह सब बरसात की मेहरबानी है,
मैदान बनाने के लिये फिर मदद आनी है।
वैसे ही मैदान ऊबड़ खाबड़ हो गया था,
पैसा तो आया
पर कैसे खर्च करूं समझ नहीं पाया,
इधर उधर सब बरबाद हो गये,
इधर जांच करने वाले भी आये थे
तो जैसे मेरे होश खो गये,
अब तो दिखाऊंगा सारी बरसात की कारिस्तानी,
हो जायेगा फिर दौलत की देवी की मेहरबानी,
धूप फिर पानी सुखा देगी
अगर फिर बरसात हुई तो समझ लो
अगली किश्त भी अपने नाम पर आनी है,
तुम खाओ मिठाई
मुझे तो बस किसी तरह कमीशन खानी है।
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Saturday, August 7, 2010

वफ़ादार-हिन्दी हास्य कविता (vafadaar-hindi hasya kavita)

अपने तबादले से वह खुश नहीं थे,
क्योंकि नयी जगह पर
ऊपरी कमाई के अवसर कुछ नहीं थे,
इसलिये अपने बॉस के जाकर बोले,
‘‘मैंने तो आपकी आज्ञा का पालन
हमेशा वफादार की तरह किया,
मेरी टेबल पर जो भी तोहफा आया
बाद में डाला अपनी जेब में
आपका हिस्सा पहले आपके हवाले किया,
यह आप मेरे पेट पर क्यों मार रहे लात,
जो तबादले की कर दी घात।’’

बॉस ने रुंआसे होकर कहा
‘‘शायद तुम्हें पता नहीं
तुम्हारी वज़ह से मेरे ऊपर भी
संभावित जांच की तलवार लटकी है,
प्रचार वालों की नज़र अब तुम पर भी अटकी है,
जब आता है अपने पर संकट
तब शिकार के रूप में पेश
अपना वफ़ादार ही किया जाता है,
दाना दुश्मन से निपटते हैं बाद में
पहले नांदा दोस्त मिटाया जाता है,
तुम्हारे सभी जगह चर्चे हैं,
कि जितनी आमदनी है
उससे कई गुना घर के खर्चे हैं,
भला कौन बॉस सहन कर सकता है
अपने मातहत से अपनी तुलना,
बता रहे हैं लोग तुमको मेरे बराबर अमीर
तुम भी अब जाकर सुनना,
अधिकारी के अगाड़ी तुम चल रहे थे,
जैसे हम तुम्हारे हिस्से पर ही पल रहे थे,
एक तो छोटे के पिछाड़ी चलना मुझे मंजूर न था,
फिर तुम्हारी वज़ह से
हमारी मुसीबत का दिन भी दूर न था,
इसलिये तुम्हारा तबादला कर दिया,
अपने वफादार भी हम नहीं कृपालु
यह साबित कर
बदनामी से बचने के लिये रफादफा मामला कर दिया,
तुम्हारी वफदारी का यह है इनाम,
बर्खास्तगी का नहीं किया काम,
तबादले पर ही खत्म कर दी बात।
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Monday, August 2, 2010

विवाद की जरूरत-हिन्दी हास्य व्यंग्य (vivad ki jaroorat-hindi hasya vyangya)

वह भद्र पुरुष बुद्धिजीवी बहुत दिनों से बिना प्रचार के सांसें ले रहा था। कहने को लेखक था और संबंधों के दम पर अच्छा खासा छपता भी था पर अब न वह लिख पाता था और न ही उसकी दिलचस्पी थी। अलबत्ता अपने पुराने रिश्तों के सहारे कहीं उसने साहित्यक संस्थाओं के पद वगैरह जरूर हथिया कर रखे थे ताकि साहित्यकार की छबि बनी रहे। बहुत दिन से न तो अखबार में नाम आया और न ही टीवी चैनल वालों ने पूछा।
उस दिन एक भद्र महिला बुद्धिजीवी का फोन उसके पास आया। उसने रिसीवर उठाया ‘‘हलौ कौन बोल रहा है?’’
भद्र महिला ने कहा-‘‘मैं बोल रही हूं।’’
भद्र पुरुष ने कहा-‘‘कौन बोल रही हो। नाम तो बताओ।’’
भद्र महिला ने कहा-‘पहले अपनी खांसी बंद तो कर बुढऊ, तब तो बताऊं।’
भद्र पुरुष ने खांसते हुए कहा-‘‘पहले नाम तो बताओ! गोरी नाम है या काली या सांवली या दिलवाली! तुम नाम बताओगी तो खांसी अपने आप रुक जायेगी। नहीं तो मुझे यह भ्रम बना रहेगा कि पंद्रह दिन से मायके में गयी मेरी बीवी बोल रही है, उसे अधिक बात न करना पड़े इसलिये मेरा गला वैसे ही बिदकता है। मेरे समझाने पर भी नहीं समझता।’’
भद्र महिला-कमबख्त! तू अब भी नाम पूछता है। तेरा नाम तो डूबा जा रहा है। उसे बचाने के लिये मौका चाहिए कि नहीं!
भद्र पुरुष की खांसी रुक गयी और बोला-‘अच्छा! तू बोल रही है.........तभी मैं कहूं कि ऐसा स्वर किसका है जिसकी वजह से खांसी नहीं रुक रही। मेरे कान तो कोयल के स्वर सुनने के आदी हैं न कि कौएनी के!’
भद्र महिला-‘लगता है सठिया गये हो। अब यह कौएनी कौन? क्या हिन्दी में कोई नया शब्द जोड़ा है। तुझे खुशफहमी है कि तू हिन्दी का बड़ा ठेकेदार है।’
भद्र पुरुष बोला-‘‘कौए के नारी रूप को क्या कहेंगे? मेरे हिन्दी ज्ञान से इसके लिये यही शब्द ठीक है। अब ज्यादा माथा न खपा। बता मामला क्या है?’’
भद्र महिला-‘‘इधर बहुत दिन से मेरा नाम न तो अखबार में आ रहा है न तुम्हारा। इसलिये कुछ ऐसा करो कि अपना नाम चलता रहे। इधर इंटरनेट पर अपना नाम कहीं चमक नहीं रहा।’’
भद्र पुरुष-‘अपने तो चेले चपाटे चमका रहे हैं। रोज कोई न कोई विवाद खड़ा करता रहता हूं। तू अपनी कह, करना क्या है? हां, एक बात याद रखना मैं अब केवल विवाद ही खड़ा करता रहूंगा क्योंकि सीधा सपाट लिखना पढ़ना अब हिन्दी वाले जानते ही नहीं।’
भद्र महिला-‘‘कल एक कार्यक्रम रखा है जिसमें हम दोनों हिन्दी भाषा के साहित्य पर बहस करेंगे। तुम्हारे एक चेले ने ही इसे रखवाया है और कह रहा था कि गुरुजी को आप मना लो। जब बहस होगी तो तय बात विवाद तो होगा। आजकल के प्रचार जगत को विवादों की बहुत जरूरत है।’’
भद्र पुरुष ने हामी भर दी। दोनों समय पर वहां पहुंचे। पहले भद्र पुरुष को बोलना था। उसने भद्र महिला की तरफ देखा और बोला-‘अरे, आजकल कुछ महिला लेखिकाऐं तो यह साबित करने में जुटी हैं कि
उनके लिखे में कौन ज्यादा छिनालपन दिखा सकता है।’
उसने कनखियों से भद्र महिला बुद्धिजीवी को देखा। जैसे उसने सुना ही नहीं। भद्र पुरुष इधर उधर देखने लगा। पास में आयोजक चेला आया तो भद्र बुद्धिजीवी पुरुष ने उसके कान में कहा-‘‘यह सुन नहीं रही शायद! नहीं तो अभी तक तो हमला कर चुकी होंती।’’
चेला तत्काल महिला बुद्धिजीवी के पास गया और बोला-‘आपने सुनने वाली मशीन नहीं लगायी क्या?’
महिला ने वह भी नहीं सुना पर जब कानों में हाथ डाला तो झेंप गयी और तत्काल मशीन लगा ली। तब भद्र पुरुष की जान में जान आयी।
उसने फिर अपने शब्द दोहराये।
भद्र महिला तत्काल उठकर आयी और उसके हाथ से माईक खींचककर बोली-‘‘यह आदमी सरासर मूर्ख है। इसके लिखे में तो ऐसा छिछोरापन दिखता है कि पढ़ते हुए भी हमें शर्म आती है। फिर आज यह समूची महिला लेखिकाओं पर आक्षेप करता है। इसके अंदर सदियों पुरानी पुरुष अहं की भावना है। जिस तरह पुरुष स्त्री को हमेशा ही लांछित करता है। उसी तरह यह भी......’’
एक श्रोता उठकर बोला-‘‘उन्होंने केवल कुछ महिला लेखिकाऐं कहा है तो आप भी कुछ पुरुष कहें। आप दोनों कोई पुरुष या महिला के इकलौते प्रतिनिधि नहीं हैं। हिन्दी भाषा में अच्छे लेखक और लेखिकायें भी हैं पर आप दोनों कैसे हैं यह पता नहीं।’
इस पर भद्र बुद्धिजीवी चिल्ला पड़ा-‘‘ओए, तू कहां से बीच में कूद पड़ा। हम दोनों प्रसिद्ध बुद्धिजीवी हैं इसलिये समूचे मानव जाति के प्रतिनिधि हैं। बैठ जा.......हमें बोलने दे।’’
भद्र महिला-‘बोली और क्या? इस बहस में केवल विद्वान ही हिस्सा ले सकते हैं।’
वह श्रोता बोला-‘पर आप लोग यह किस तरह के असाहित्यक शब्द उपयोग में ला रहे हैं।’
तब आयोजक चेला बोला-‘तुम कोई साहित्यकार हो?’
श्रोता बोला-‘नहीं!
आयोजक चेला-‘तुम्हें कोई पुरस्कार मिला है?’
श्रोता ने ना में सिर हिलाया तो वह चिल्लाया-‘बैठ जा! इतने महान विद्वानों की बहस के बीच में मत बोल।’
श्रोता बोला-‘पर मैं तो इनका नाम भी पहली बार सुन रहा हूं। वैसे मैं सब्जी खरीदने घर से बाज़ार जा रहा था। बरसात की वजह से यहां सभागार के बाहर पोर्च में खड़ा था। अंदर नज़र पड़ी तो देखा कि यहां कोई साहित्यक कार्यक्रम हो रहा है सो चला आया। मुझे नहीं पता था कि यहां कोई भाषाई अखाड़ा है जहां साहित्यक पहलवान आ रहे हैं।’
भद्र महिला चीख पड़ी-‘मारो इसे! यह तो इससे ज्यादा छिछोरेपन की बात कर रहा है।’
इससे पहले कि कोई उससे कहता वह भाग निकला।
उसके साथ ही एक दूसरा श्रोता भी निकल आया और थोड़ी दूर चलने पर उसे रोका बोला-‘यार, अच्छा हुआ मैं बच गया। वरना यह सब बातें मैं ही कहने वाला था पर मेरे पास बैठे एक आदमी ने यह कहकर रोका यहां तो पहले से ही तयशुदा कुश्ती होने वाली है।’
पहले श्रोता ने कहा-‘तुम वहां क्यों गये थे?’
दूसरा श्रोता बोला-‘जैसे तुम बरसात से बचने के लिये गये थे। सुना है आजकल इंटरनेट की वजह से इन पुराने हिन्दी दुकानदारों की स्थिति ठीक नहीं है इसलिये ऐसे स्वांग रचे जा रहे हैं ताकि प्रचार जगत में अहमियत बनी रहे। ऐसा वहीं बैठे एक आदमी ने बताया। अब देखना इस पर चहूं ओर चर्चा होगी। निंदा परनिंदा होगी! कुछ जगह बहसें होंगी। दोनों का डूबता हुआ नाम चमकेगा।’
पहले श्रोता को यकीन नहीं हुआ पर अगले दिन उसने टीवी और समाचार पत्रों में यह सब सुना और पढ़ा। तब मन ही मन बुदबुदाया-छिछोरापन, छिनालपन और तयशुदा जंग।
सारे विवाद में प्रचार जगत में दो दिन तक दोनों भद्र पुरुष और महिला सक्रिय रहे। तीन दिन बाद भद्र महिला ने भद्र पुरुष को फोन किया-‘धन्यवाद, आपने तो कल कमाल कर दिया। एक ही शब्द से ही धोती फाड़कर रुमाल कर दिया। बुढ़ापे में भी रौनक कम नहीं हुई।’
भद्र पुरुष ने कहा-‘इसलिये ही तो ज्यादा लिखना कम कर दिया है। क्या जरूरत है, जब एक शब्द से ही विवाद खड़ा कर नाम कमाया जा सकता है!’
------------
नोट-यह हास्य व्यंग्य किसी घटना या व्यक्ति पर आधारित नहीं है। अगर इसमें लिखा किसी की कारितस्तानी से मेल खा जाये तो लेखक जिम्मेदार नहीं है। इसे केवल पाठकों के मनोरंजन के लिये लिखा गया है।
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Tuesday, July 27, 2010

खंजर और यकीन-हिन्दी शायरी (khanjar aur yakeen-hindi shayri)

खंजर उनके हाथ में है
सच बोलने की कसमें
बेकार खा रहे हैं,
सामने खड़ी है कायरों की फौज
सभी खौफ के मारे
हां में हां मिला रहे हैं।
कौन करेगा उनकी असलियत बयान
करते हैं जो हर रोज कत्ल
ऐसे कातिलों को
बहादुर जैसी इज्जत दिला रहे हैं।
------------
कुछ लोगों पर यकीन करना
यूं भी कठिन होता है,
क्योंकि पीठ पीछे खंजर घौंपने में
वह होते हैं माहिर,
दूसरा घाव न करें
इसलिये दर्द झेलते हुए भी
कोई नहीं करता उनकी असलियत जाहिर।
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Friday, July 23, 2010

खुश करने वाली सूरतें कम नज़र आती-हिन्दी शायरी (khush karne vali suhten-hindi shayri)

ख्वाहिशों का यह हाल है
कि एक पूरी होती
दूसरी चली आती है,
यह जिंदगी यूं ही उनको पूरा करते हुए की
जंग में बीत जाती है।
हंसी जो दिल से आये,
खुशी वह जो दूर तक भाये,
ग़मों में भी हैरान हो इंसान
सभी को खुश कर दे
ऐसी सूरतें कम हीं नज़र आती है।
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Tuesday, July 20, 2010

वर्षा ऋतु का दर्शन-हिन्दी व्यंग्य (vashya ritu ka darshan-hindi vyangya)

पुरानी लोक कथा है जिसे सभी पढ़ या सुन चुके हैं। एक किसान अपनी दो बेटियों से मिलने गया। एक बेटी किसान के घर में ब्याही थी। वह उससे मिलकर अपने घर जाने को तैयार हुआ तो बेटी ने कहा-‘पिताजी, भगवान से प्रार्थना करिये इस बार बरसात जल्दी और अच्छी हो क्योंकि अब खेतों में बोहनी का समय निकल रहा है।’
किसान ने कहा-‘हां भगवान से प्रार्थना करूंगा कि इस बार अच्छी और जल्दी बारिश हो।’
उसके बाद वह अपनी दूसरी बेटी से मिलने गया तो चलते समय उस बेटी नेे कहा-‘पिताजी, भगवान से प्रार्थना करिये कि अभी बारिश न हो क्योंकि
हमारे मटके धूप में सूखने के लिये रखे हुए हैं अगर पानी पड़ा तो सब बरबाद हो जायेगा। फिर बारिश होते ही उनकी बिक्री भी कम हो जाती है।’
यह तो पुरानी कहानी है जिसमें वर्षा ऋतु को लेकर मनुष्य समाज का अंतर्विरोध दर्शाया गया है पर वर्तमान समय में तो यही अंतर्विरोध एक मनुष्य में ही सिमट गया है और खासतौर से शहरी सभ्यता में तो इसके दर्शन प्रत्यक्ष किये जा सकते हैं।
हमारा घर ऐसी कालोनी में है जिसमें अपनी बोरिंग से ही पानी आता है। पिछले पांच छह वर्षों से गर्मियों में जिस संकट का सामना करना पड़ता है उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। इस बार फरवरी से ही संकट प्रारंभ हुआ जो हैरानी की बात थी। पिछली बार बारिश अच्छी हुई थी इसलिये हमें आशा थी कि इस बार पानी का स्तर अधिक नीचे नहीं जायेगा मगर फरवरी से ही संकट प्रारंभ हो गया। पानी पांच मिनट आता फिर बंद हो जाता था। तब बार बार मशीन बंद कर चलाना पड़ता। अप्रैल आते आते यह दो मिनट तक रह गया। जून आते आते एक मिनट तक रह गया। दरअसल हमारा इलाका पानी की बहुलता के लिये जाना जाता है और अनेक कारखाने इसलिये वहां बड़ी बड़ी मशीने लगाकर उसका दोहन करने लगे हैं।
अब समस्या दूसरी थी। अगर बोरिंग खुलवाते हैं तो कमरे में जाने वाला पाईप भी गल चुका है और उसे भी बदलवाना पड़ेगा क्योंकि वहां से हवा पकड़ लेती है। दो साल पहले पाईप दस फुट बढ़वाया था और अब उसमें बढ़ने की संभावना है कि पता नहीं। सोचा जब तक चल रहा है चलने दो। कहीं खुलवाया तो इससे भी न चले जायें। दूसरी बोरिंग खुदवाना इस समय महंगा काम हो सकता है दूसरा यह कि हम भी प्रंद्रह वर्षों से अपनी इस आशा को जिंदा रखते रहे हैं कि कालौनी में सरकारी पानी की लाईन आ जायेगी।
बहरहाल ऐसे में हमें बरसात से ही आसरा था। हर रोज यही लगता था कि आज पानी ने साथ छोड़ा कि अब छोड़ा। पिछले शनिवार जब आकाश में बादल चिढ़ा रहे थे तब तो लग रहा था कि अब पानी भी चिढ़ाने वाला है। आकाश से बादल चले जा रहे और नीचे सूखा। फिर उमस ऐसी कि लगता था कि शायद नरक इसे ही कहा जाता है।
ऐसे में बरसात हुई तो मजा आ गया। उम्मीद है कि कम से कम पानी अभी तत्काल साथ नहीं छोड़ेगा मगर सड़कों क्या करें? रात को घर लौटते हुए घर पहुंचना किसी जंग से कम नहीं लगता। सभी जगह विकास कार्यों की वजह से कीचड़! कई जगह बाई पास मार्ग ढूंढना पड़ता है। सबसे बड़ी बात यह कि अपनी कालोनी की सड़क अब पूरी तरह से मिट्टी वाली हो गयी है और डंबर नाममात्र को भी नहीं है, मगर यही सडक अब एक तरह से पानी संचय का काम करती है क्योकि बाकी जगह तो मकान बन गये हैं। जगह जगह पानी भर गया है पर फिर भी सड़क बन जाये ऐसा ख्याल नहीं आता क्योंकि हमारी मुख्य समस्या तो पानी है।
शाम को घर आते हुए पानी की बूंदे गिर रही थीं, सड़कों से जूझते हुए बढ़ रहे थे पर फिर भी दिल में यह ख्याल नहीं आया कि बरसात बंद हो जाये।
खराब सड़क देखकर चिढ़ आती है कि ‘यहां डंबरीकरण क्यों नहीं हो रहा है’ पर तत्काल अपनी बोरिंग का ख्याल आता है तो सोचते हैं कि बरसात तो कभी कभी न थम जायेगी तो सड़क वैसे ही दिखाई देगी पर अगर पानी नहीं मिला तो सड़क पर ही कहीं जाकर सरकारी स्त्रोत से पानी भरना पड़ेगा।
पिछले ऐसा ही वाक्या हुआ।
एक हमारी जान पहचान के सज्जन है उनके यहां सरकारी नल से पानी आता है। संयोगवश उस दिन बरसात हो रही थी और वह हमारे साथ ही एक दुकान की छत के नीचे आसरा लिये खड़े हुए थे। पता नहीं कैसे वह बड़बड़ाये कि ‘हे भगवान, पानी बंद हो जाये तो घर पहुंच जाऊं।’
पास ही एक ग्रामीण अपनी साइकिल खड़ी करके वहां बैठा बीड़ी पी रहा था। वह बोला-‘भगवान और जोर से बारिस कर।
फिर वह उन सज्जन की तरफ मूंह कर बोला-‘कैसी बात कर रहे हो। हमारे गांव में बोरिंग से पानी बहुत कठिनाई से निकल रहा है। खेत सूखे पड़े हैं और आप हो कि बारिश शुरु हुई नहीं है कि उसे बंद करने की प्रार्थना करने लगे।’
उस ग्रामीण ने बात हमारे मन की कही थी पर हमारे अंदर भी वैसा ही अंतर्द्वंद्व था जैसा कि किसान के मन में बेटियों की वजह से आया होगा।
बहरहाल स्थिति यह है कि सड़कों की हालत यह है कि बरसात के दिनों मे घर से बाहर निकलने की इच्छा ही नही होती। वैसे भी हमारे देश के अध्यात्म दर्शन में वर्षा ऋतु में बाहर निकलना वर्जित किया गया है । वैसे कुछ समय पहले तक कहा जाता था कि वर्तमान समय में सड़कें आदि बन गयी हैं इसलिये अब इस धारा से मुक्ति पायी जानी चाहिए पर जब देश के विभिन्न शहरों की स्थिति देखते हैं तो यह धारा आज भी प्रभावी लगती है क्योंकि डंबरीकृत सड़कें्र एक बरसात में ही बह जाती हैं उस पानी से लबालब सड़क पर कहां सीवर लाईन का गटर है पता नहीं क्योंकि उनमें गिरने वालों की बहुत बड़ी संख्या रहती है-ऐसे समाचार अक्सर आते रहते हें तब लगता है कि वर्षा ऋतु में भारतीय अध्यात्म ज्ञान आज भी प्रासांगिक है।
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Friday, July 16, 2010

हास्य कविताएँ -जैसे मस्ती ही उनका ईमान हो(jaise masti hee unka iman ho-hasya vyanyga kavitaen)

मतलब निकल जाये तो
दोस्त भी आंख फेर लेते हैं,
बात अगर पैसे की हो तो
वफादारी दांव पर धर देते हैं।
खुशफहमी है उनकी कि
हमने उन पर कभी भरोसा किया,
हालातों से मजबूर इंसान
कुछ भी कर सकता है
यह सच हमने भी जान लिया,
इसलिये गद्दारी को भी
हंस कर अपने पर लेते हैं।
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खूब वफा के उन्होंने वादे किये
मौका आया तो अपनी
बिचारगी जता दी
जैसे कोई बेबस इंसान हो।
हमने जो मुंह फेरा वहां से
मस्त हो गये वह अपनी महफिल में
जैसे मस्ती ही उनका ईमान हो।
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Thursday, July 15, 2010

सोचो जरा-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (socho jara-hindi vyangya kavitaen)

अपने हाथों ही अपने भविष्य का ठेका
अंधों को दे दिया
अब रोते क्यों हो,
रौशनी बेचकर
अपनी आंखों से
अपनी तिजोरी में बढ़ती हरियाली देखकर
वह खुश हो रहे हैं,
आंसु बहाने से अच्छा है
तुम सोचो जरा
दंड मिले खुद को
ऐसे अपराध इस धरती पर बोते क्यों हो।
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उनके काम पर उंगली न उठाओ,
अपने हाथ से
सारे हक तुमने उनको दिये हैं,
कुदरत ने दिये थे जो तोहफे तुमको
उनका इस्तेमाल तुमने बेजा किया
जैसे मुफ्त में लिये हैं।
कुछ वादों को झूठ में देकर
दूसरों से हक लेकर
वह लोग अपने पेट भरते नहीं थकते
क्योंकि उसे भरने के लिये ही
वह दूसरों के लिये जिए हैं।
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Sunday, July 11, 2010

व्यापार को खेल बनाने की कोशिश-हास्य व्यंग्य (vyapar aur khel-hindi hasya vyangya)

कल एक ब्लाग पर अपने एक आलेख में इस लेखक ने विश्व कप 2010 फुटबाल विश्व कप में स्पेन के विरुद्ध हालैंड के जीतने की भविष्यवाणी कर दी। क्यों की? न अब फुटबाल से वास्ता न ज्योतिष से। ज्योतिष गणना को तो सवाल ही अलबत्ता एक समय हॉकी और फुटबाल खेलने से वास्ता रहा जो समय के साथ छूट गया।
जब सवाल अपने से करें तो जवाब भी अपने को ही देना पड़ता है? अब अगर भविष्यवाणी गलत निकली तो अपने आप से मुंह छिपाना भी कठिन होगा। गनीमत है कि ब्लाग कम लोग पढ़ते हैं। पहला लेख कुछ बड़ा था इसलिये यह संभव नहीं है कि पढ़ने वालो को वह भविष्यवाणी याद रहे पर अपने को भूलना कठिन लगता है। गनीमत है कि यह पाठ लिखने जाने इस लेखक सहित अन्य पांच लोगों ने पढ़ा।
कल अपना लिखा पाठ आज स्वयं ही पढ़ा-ऐसी गलती शायद पहली बार की होगी। दरअसल कल जर्मनी के बारे में लिखते हुए उसकी जीत की भविष्यवाणी की पॉल बाबा से सहमति जताना था पर उसका आधार ज्योतिष नहीं बल्कि पिछले विश्व कप ं तक जर्मनी के खिलाड़ियों का प्रदर्शन देखकर था। यह बात लेख लिखते समय थी पर बाद में याद न रहा। यहां इस लेखक से चूक हो गयी क्योकि अगर वह भविष्यवाणी सही निकलती तो आज हालैंड के जीतने की भविष्यवाणी का तनाव नहीं रहता। पचास पचास फीसदी अवसर का लाभ मिल जाता।
दरअसल ऑक्टोपस यानि पॉल बाबा की अब तक सात भविष्यवाणियां सही निकल चुकी हैं। विश्व कप के खेल के साथ ऑक्टोपस का भी खेल चल रहा है। कुछ लोगों को आश्चर्य हो रहा है कि ऑक्टोपस की भविष्यवाणी सही कैसे निकल रही है।
दरअसल यह एक प्रायोजित खेल है। खेलों पर सट्टा लगाने में वैसे तो पूरे विश्व के लोग माहिर हैं पर आजकल पैसे के मामले में एशियाई देश आगे चल रहे हैं। इसक अलावा एशियाई लोग भूत, बाबा, प्रेत और सिद्धों के चक्कर में पड़े रहते हैं। भविष्य के चक्कर में अपना वर्तमान तबाह कर लेते हैं और तिस पर दो के चार होने की बात हो तो एक नहीं हजारों मूर्ख मिल जायेंगे।
जिस तरह अपने यहां क्रिकेट खिलाड़ी धन, प्रतिष्ठा और शक्ति अर्जित कर रहे हैं उसे देखते हुए फुटबाल गरीबों का खेल हो गया है और उसे एशियाई समर्थन की आवश्यकता है, शायद पॉल बाबा का प्रयोग इसलिये किया गया ताकि सेमीफायनल आते आते उसका लाभ एशियाई देशों में लिया जा सके।
अभी तक फुटबाल में सट्टबाजी की चर्चा नहीं हुई पर अब हो रही है। प्रचार माध्यम बता रहे हैं कि इस फायनल मैच में दो हजार करोड़ का सट्टा लग रहा है। तब खोपड़ी में बात आयी कि कहंीं केवल इस फायनल मैच में बड़ी रकम लगवाने के लिये प्रारंभ से ही इसकी कड़ी से कड़ी तो नहीं जोड़ी गयी। ऑक्टोपस-यह एक समुद्री जीव है-दिन में एक बार भविष्यवाणी करता था जबकि विश्व कप में अधिकतर दो मैच प्रतिदिन होते थे। इसका मतलब यह कि एक मैच में उसकी भविष्यवाणी नहीं होती। फिर इतने मैच हुए पर भविष्यवाणी छह या सात ही क्यों हुई? सीधी सी बात है कि फुटबाल के सट्टे में एशियाई देशों की सक्रियता कम रही होगी। इसलिये धीरे धीरे ऑक्टोपस बाबा को नायक के रूप में विकसित किया गया होगा। अपने यहां के प्रचार माध्यमों ने तीन बाबा और खड़े किये हैं-एक मगरमच्छ, एक तोता और बैल इन बाबाओं के प्रतिरूप हैं। दो हालैंड के तो दो स्पेन को संभावित विजेता बता रहे हैं।
इस विश्व कप फुटबाल के न हमने पहले मैच देखे न फायनल देखने का इरादा है। परिणाम भी हमें अगले दिन सुबह आठ बजे ही पता चलेगा जब अपने पोर्च में रखा अखबार उठायेंगे। वैसे प्रयास तो यही होगा कि प्रातः छह बजे उठकर योग साधना से पहले ही अखबार उठायें पर यह तभी संभव है कि हमें याद रहे कि कल रात कोई विश्व कप फुटबाल फायनल मैच हुआ है जिसके परिणाम की भविष्यवाणी हमने भी की है। वैसे हमारी दिलचस्पी फुटबाल मैच में कम ऑक्टोपस नामक उस जीव में ज्यादा है जो इस विषय में कुछ नहीं जानता पर उसके नाम पर करोड़ों के वारे न्यारे हो रहे हैं। शायद इसलिये कहते हैं कि भगवान जिन पर कृपालु है उनको ही मनुष्य यौनि मिलती है। मनुष्य यौनि में अपने लोक नायक या नायिका हो जाने पर सुखद आनंद की अनुभूति की जा सकती है जबकि अन्य जीवों के लिये यह संभव नहीं है। चाहे वह बंदर हो या कुत्ता, तोता हो या ऑक्टोपस या बैल को यह पता नहीं होता कि वह लोक नायक बन रहे हैं।
अब तो यह कहना कठिन है कि कौन जीतेगा। जब सारी दुनियां में ऑक्टोपस की भविष्यवाणी और फुटबाल की चर्चा हो रही है तब सट्टे वाले अपने मोबाइल, इंटरनेट तथा अन्य साधनों के द्वारा सक्रिय रहकर इस बात का हिसाब लगा रहे होंगे कि किसकी जीत में उनको फायदा है। फिर अपने आंकड़े बिठाने के प्रयास करेंगे। यकीन करिये अगर स्पेन की हार में उनका फायदा है तो ऑक्टोपस को भी खलनायक बना देंगे और हालैंड की जीत में लाभ है तो बैल को नंदी को भगवान शिव की सवारी कहकर सम्मानित करेंगे-उस बैल का भी यही नाम बताया गया है जिसने हालैंड के जीतने की भविष्यवाणी की है।
वैसे आशंका यही है कि ऑक्टोपस की भविष्यवाणी अधिक लोकप्रिय हुई है इसलिये लगाने वाले दाव स्पेन पर ही अधिक होंगे-इसका आधार यह है कि सट्टे पर पैसा लगाने वालों में अक्ल कम होती है और उनका पैसा बिना मेहनत का होता है इसलिये उसका महत्व नहीं जानते-ऐसे में हालैंड की जीत हो सकती है।
दो हजार करोड़ रुपये कम रकम नहीं होती। इसमें बड़े बड़े लोगों का ईमान डोल सकता है। दूसरों की बात तो छोड़िये कोई हमें दो हजार रुपये ही दे तो हम अभी हाल स्पेन के जीतने की भविष्यवाणी कर देते हैं-अधिक रकम इसलिये नहीं लिखी क्योंकि एटीएम से हम इससे अधिक रकम नही निकालते।
यह लेख कंप्यूटर पर दिख रहे टाईम कें अनुसार 10.49 पर लिखना प्रारंभ किया था और 10.25 मिनट पर समाप्त कर रहे हैं। हमारे यहां सुबह बिजली पांच घंटे चली जाती है इसलिये अब कंप्यूटर पर शाम आठ बजे से पहले आना संभव नहीं है। ऐसे में अब इस लेख को जब दोबारा पढेंगे तब तक यह विषय ही बासी हो चुका होगा। बस इतना देखना है कि बाज़ार के इस महानायक ऑक्टोपस का क्या होता है और सट्टेबाज खेल को प्रभावित कितना कर पाते हैं? अलबत्ता रकम देखकर लगता है कि यह खेल भी अब पैसे को हो गया है। इतनी बड़ी रकम से व्यापार करने वाले सौदे में अपनी पकड़ आखिरी तक नहीं छोड़ते-चाहे वह फुटबाल हो या क्रिकेट! वह हर जगह अपने मोहरे इस तरह फिट रखते हैं कि जनता को खेल तो खेल की तरह लगे पर भले ही वह उनका व्यापार हो।
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Friday, July 9, 2010

मूली सभी के लिये विषैली नहीं होती- व्यंग्य (mooli sabhi ke liye vishaili nahin hoti-hindi vyngya)

यही है बाज़ार और उससे प्रायोजित प्रचार माध्यमों को खेल कि लौकी भी अब विषैले पदार्थों में शामिल हो सकती है।
हमें याद है जब सात वर्ष पूर्व जब उच्च रक्तचाप की शिकायत होने पर आधुनिक चिकित्सकों के शरण लेनी पड़ी थी।
एक मित्र होम्योपैथी चिकित्सक ने रक्तचाप की नाप ली और कहा कि ‘तुम्हें उच्च रक्तचाप है।’
हमने कहा-‘ज्यादा झाड़ो नहीं! हम अपनी बीमारी स्वयं ही बता देते हैं। हमें शराब की बहुत खराब आदत है। फिर कल मंगलवार होने के कारण व्रत था इसलिये शाम को शादी में खाना देर से खाया। उससे पहले शराब का पैग लिया पर एक घूंट के बाद ही हमारी हालत बिगड़ गयी। बाद में खाना गया तो चैन आया पर रात को नींद आराम से आयी और अब चाय के बाद हालत बिगड़ी है। ऐसा लगता है कि गैस की समस्या है।’
चिकित्सक ने कहा‘-तुम अपनी बीमारी जानते हो तो मेरे पास क्यों आये।’
हमने कहा-‘कोई वायु विकार दूर करने वाली गोली बता दो।’
चिकित्सक ने कहा-‘ मित्र हो इसलिये अभी उच्च रक्तचाप की गोली देता हूं। वह भी आधी लेना और हां शराब और तंबाकू से पीछा छुड़ाओ। साथ ही यह चेकअप की कराओ।’
हमने गोली ली और घर आये। बीमारी की वजह स्वयं को पता थी। शराब से पीछा छुड़ाया। तंबाकू भी एकदम छोड़ दी-हालांकि वह अब भी है और योग साधना के कारण उसके दुष्परिणाम से बचे रहते हैं। उस समय इससे परहेज करने से शरीर के व्यसनों की वजह से सक्रिय अंग ढीले पड़ गये।
उसके बाद शुरु हुआ लोगों से चर्चा का सिलसिला। मधुमेह की समस्या थी पर अधिक नहीं। अब स्थिति यह थी कि हमें लगने लगा कि जीवन ऐसे ही संकट के साथ चलेगा। लोगों की सलाहें ली। एक ने कहा खाने के साथ सलाद लिया करो। हमने मूली खाना प्रारंभ किया। नियमित रूप से लेते और शाम को स्थिति बिगड़ती। मूली हम खाते थे खाना पचाने के लिये पर वह संकट की वजह बन रही है इसका पता चला तब जब किसी ने बताया कि मूली हर किसी को नहीं पचती। हमने दो दिन मूली छोड़ी तो समस्या से निजात मिली।
लोगों ने करेले और लौकी का जूस पीने की सलाह दी। हमने उसे अनसुना किया और अपना इलाज स्वयं ही शुरु किया। हमें पता था कि घरेलू समस्याओं की वजह से चार महीने तक साइकिल चलाना छोड़ने से शरीर में संकट पैदा हुआ है। साइकिल चलाना शुरु की। शराब एकदम कम कर दी पर तंबाकू छूटने नहीं छूटी।
सबकुछ सामान्य था पर मन में यह बात आ गयी कि हम उच्च रक्तचाप के शिकार है। उसी समय अखबार में पढ़ा कि देश के साठ प्रतिशत लोगों को पता ही नहीं कि वह मनोरोग का शिकार है और हमें लगने लगा कि हम उनमें से एक ही हैं। जिस चिकित्सक ने उच्च रक्तचाप के बाद तमाम तरह के चेकअप लिख कर दिये थे उसी ने ही एक अपने से बड़े होम्यापैथिक चिकित्सक के पास भेजा। उसने ही तमाम तरह के चेकअप किये और पर्चे पर लिखा हाईपर ऐसिडिटी। बात हमारी समझ में आ गयी क्योंकि वह हमारे पूर्वानुमान से मेल खाती थी। सब कुछ सामान्य होने के बावजूद मानसिक स्थिति खराब हो चली थी। इसी बीच एक योग शिविर कालोनी में लगा।
हम उन दिनों सुबह घूमने जाते थे। एक सज्जन ने हमसे कहा-‘अरे आप उस योग शिविर में आईये। इस तरह सैर करने से कोई अधिक लाभ नहीं होता।’
हमने शिविर में जाना किया। शिविर में जो शिक्षक आते थे। वह भले आदमी थे। पांचवें दिन योग साधना कर हम घर लौटे तो हालत बिगड़ गयी। तब हमने अपने ही फ्रिज में रखी बर्फी खाकर अपने पर नियंत्रण किया क्योंकि हमें पता था कि वायुविकार के हमले का प्रतिकार करने का यही एक उपाय है।
अगले दिन हमने योग शिक्षक को बताया तो उन्होंने अच्छी बात कहीं। वह बोले-‘एक बात बताईये कि अगर हमारे घर में अनेक किरायेदार हों और हम सबसे मकान खाली करने को कहें तो क्या वह प्रसन्न होंगे? कोई चुपचाप बद्दुआऐं देता जायेगा। कोई लड़ेगा, कोई केस भी कर सकता है। यह आपके अंदर वायु विकार है जो कर आपसे लड़ रहा था क्योंकि योग साधना उसको निकालने आयी थी।’
हमें उसके जवाब ने हतप्रभ कर दिया। सात वर्ष हो गये योग साधना करते हुए।  सच तो यह है कि ज़िन्दगी कि दूसरी पारी है जो योगढ़ना खेल रही है, न कि हम स्वयं!अब किसी चीज पर भरोसा नहीं। न लौकी न करेला। पपीता खाना पड़ता है क्योंकि तंबाकू की वजह से कब्जी का मुकाबला करने के वही काम आता है। तंबाकू न खायें तो खाना तरस जाये कि यह हमें खाता क्यों नहीं और पानी देखता रहे कि यह पीता क्यों नहीं!
जब तनाव के क्षण आते हैं तो हम तंबाकू का त्याग कर देते हैं क्योंकि हमें पता है कि वह मानसिक संतुलन बिगाड़ता है। साइकिल चलाकर दूर तक चले जाते हैं। घर लौटते हैं तो लगता ही नहीं कि साइकिल चलाकर आये हैं। तब सोचते हैं कि काश! यह योग साधना बचपन में किसी ने सिखाई होती।
इसी योग साधना को लेकर भी तमाम तरह के दुष्प्रचार होते रहते हैं जिसके बारे में हमारा दावा है कि खुश रहने के लिये इससे बेहतर कोई उपाय नहीं है। योग साधना से अमरत्व नहीं मिलता पर इंसानों की तरह जिंदा रहने की ताकत मिलती है। जहां तक पेट पालने का सवाल है तो पशु भी पल जाते हैं और इंसान ही केवल इस भ्रम में रहता है कि वह स्वयं को पाल रहा है।
टीवी चैनलों पर लौकी का जूस पीकर मरने वाले एक दंपत्ति की मौत होने के साथ ही एक अधेड़ के बीमार पड़ने की खबर जोरशोर से चल रही थी। इधर इंटरनेट पर पता चला कि जिन दंपत्ति की मौत हुई वह डिब्बा बंद था यानि किसी कंपनी के द्वारा पैक किया गया पर उसका नाम नहीं पता लगा। चैनल शायद इस बात को छिपा रहे हैं ताकि लोग स्वयं लोकी का रस बनाने से बचें और कंपनियों का खरीदें।
अनेक बार नकली दूध की खबरें आती हैं तब लगता है कि सारे देश में वही दूध बिक रहा है। तब मन खराब होता है। एक ब्लाग लेखक ने तो आरोप लगाया था कि कंपनियों के लिये दूध बेचने का मार्ग बनाने के लिये निजी असंगठित ंक्षेत्र को बदनाम करने के लिये ऐसा प्रचार किया जा रहा है। लौकी के बाद करेले पर निशाना लगेगा। योग साधना पर तो लगता ही रहता है। ऐसा क्यों?
कभी कभी सुबह योग साधना के पहले या बाद में पार्क जाना होता है। कभी कभी शाम को भी जाते हैं। वहां योग साधना, व्यायाम तथा सैर करने वालों की संख्या देखकर लगता है कि लोग अब अपने स्वास्थ्य को लेकर सजग हैं। हालांकि सुप्तावस्था में रहने वाले लोगों की संख्या कहंी अधिक है पर सजगता का बढ़ता दायरा दवा कंपनियों के लिये चिंता का विषय हो सकता है। अनेक जगह चिकित्सा शिविर लगते हैं जहां चिकित्सक अपने यहां चेकअप की सलाह लिखकर देते हैं।
प्रसंगवश कहते हैं कि देश में भुखमरी अधिक है पर आंकड़े बताते हैं कि खाकर मरने वालों की संख्या अधिक है भूख से मरने वालों की कम! सीधा मतलब है कि खाने पीने में सावधानी से बीमारी से बचा जा सकता है। कम से कम खाद्य पदार्थ अपने घर पर ही निर्माण किये जायें उतना ही अच्छा! प्रतिदिन योग साधना की जाये तो कहना ही क्या? बाज़ार और उसके प्रचार माध्यमों पर एकदम निष्कर्ष निकालना ठीक नहीं। हमने मूली से तौबा की पर इसका मतलब यह नहीं कि वह सभी के लिये विषैली है। वैसे अगर कोई प्रायोजित लेख लिखने के लिये कहे तो हम उस पर बहुत कुछ नकारात्मक लिख सकते हैं।
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