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Saturday 16 May 2009

बिचारा साथी नहीं पाता-त्रिपदम

वह बिचारा
मशहूर नहीं है
यूं हार जाता।

बिचारापन
संवेदना जुटा ले
प्रेम न पाता।

कुछ न किया
इसका खेद कभी
शोभा न पाता।

वह वक्त था
मौका पकड़ने का
अब न आता!

काठ की हांडी
चढ़ती बार बार
सच न आता!

वक्त काम का
बहानों में गुजारा
लौट न आता।

असफलता
पीछे ही चलती हैं
लेकर खाता!

बन बिचारा
भले भीड़ जुटा लें
साथी न पाता।

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कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

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