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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

Friday, February 24, 2017

जनकल्याण का अनुबंध चुनकर देते हैं-दीपकबापूवाणी (JanKalyan ka anubandh chunkar dete hain-DeepakBapuWani)

प्रेम शब्द छोड़ लव की तरफ बढ़े हैं, हिन्दी की जगह अंग्रेजी के झंडे चढ़े हैं।
‘दीपकबापू’ अपने स्वर्णिम इतिहास से डरे, पराये भ्रम में स्नातक जो पढ़े हैं।।
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बिना ज्ञान के भी बोल जाते हैं, अर्थरहित शब्द हवा में डोल जाते हैं।
‘दीपकबापू’ बाज़ार में ढूंढते मनोरंजन, आंसू भी हंसी के मोल पाते हैं।।
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कचड़े के ढेर में फूल उगाने का वादा, कांटे का स्वर्ण बनाने का बेचें इरादा।
‘दीपकबापू’ रख लिया ज्ञान कनस्तर में, तर्कों से नारे महंगे हो गये ज्यादा।।
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विकास के स्तंभ वह लगाने चले हैं, जिनके घर चंदे से चिराग जले हैं।
आमआदमी लड़ते सदा अंधेरे से,‘दीपकबापू’ महल के बुत मुफ्त में पले है।।
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सबका भाग्य उनकी मुट्ठी में बंद है, यह भ्रम पाले मूर्ख भी चंद हैं।
‘दीपकबापू’ महलों में मिला घर, दुनियां की चिंता करें पर सोच मंद है।।
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नयी जिंदगी के सब तरीके सीखे हैं, जुबान के स्वाद मिर्च से तीखे हैं।
‘दीपकबापू’ जज़्बात की लाद अर्थी, पूछें इश्क के मिजाज क्यों फीके है।।
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अपने बंद बस्ते में कबाड़ रखते हैं, खाली मस्तिष्क पर चेहरा झाड़ रखते हैं।
‘दीपकबापू’ कड़वे शब्द से बांटे वीभत्स रस, स्वयं मिठास का पहाड़ चखते हैं।।
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महल में बैठे तलवार हिला रहे हैं, घोड़ों की घास गधों को खिला रहे हैं।
‘दीपकबापू’ स्वर्ण पिंजरे में कैद स्वयं, यायावरों को विकास विष पिला रहे हैं।।
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जनकल्याण का अनुबंध चुनकर देते हैं, धंधेबाजों को जाल बुनकर देते हैं।
‘दीपकबापू’ लाचारी के मारे हम, सपने देखने की बजाय सुनकर लेते हैं।।
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पत्थर दिल भी फूलों जैसी बात करते हैं, मौका मिलते ही भीतरघात करते हैं।
‘दीपकबापू’ मोहब्बत के बाग सड़ा दिये, कातिल अपना नाम आशिक धरते हैं।।
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Friday, January 27, 2017

धोखे की हांडी-हिन्दी व्यंग्य कविता (Dhokkhe ki Handi-HindiVyangyakavita

सामान से भरी बंद बोरी
सौदागर मूंह मांगे दाम
बेच जाते हैं।

सपनों के खरीददार
जेब खाली करते
खोलने पर कबाड़ पाते हैं।

कहें दीपकबापू आग पर
धोखे की हांडी चढ़ती देखी
हमने कई बार
वह रोज मालिक बदलती
हम कहां ताड़ पाते हैं।
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