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Saturday 11 July 2009

अखबार की कतरन-व्यंग्य कविता (akhbar ki katran-hindi vyangya kavita)

दिन भर चाकरी कर
हर शाम अपने काम की
खबर देने अखबार के दफ्तर जाते हैं
सुबह पढ़ाते सभी को
फिर अखबार की कतरन
एलबम में सजाते हैं।
इसी तरह अपने कामयाबी के
प्रमाणपत्र सभी को दिखाते हैं।

सुनाते हैं दूसरों के कारनामे
अपने नाम से
टकराते हैं जाम अपना जाम से
सबूत के लिये
उधार के कारनामे अपने नाम लिखा लाते हैं।

चाहे कर ले कोई कितने भी जतन
लोग उनकी कद्र कहां करते हैं
जो अपने मियां मिट्ठू बन जाते हैं।

दूसरे की कामयाबी पर
रोटियां सैंकने की आदत है जिनकी
जरूरत होती है उनको ही
अखबार की कतरनों की
दिल से काम करने वाले
एक कामयाबी लेकर
दूसरी ओर बढ़ जाते हैं
उनके प्रमाण लोगों के
दिमाग के खुद ही छा जाते हैं।

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कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप
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