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Saturday, April 3, 2010

भूख और हवस-हिन्दी शायरी (bhookh aur havas-hindi shayri)

अपनी तबाही खुद करने पर
जब आमादा होता है इंसान,
हवस में ढूंढता है अमृत
चंद लफ्ज हमदर्दी के जताने वाले को
फरिश्ता समझ लेता है।
पेट की भूख तो मिटा देती है रोटी
पर हवस में अंधा इंसान
अपनी तकदीर अपने हाथ से बिगाड़ लेता है।
--------
रोटी के भूखे को एक टुकड़ा भी
खुश कर जायेगा,
आधा पेट भरने पर भी
वह खुश हो जायेगा।
मगर अपनी हवस में ढूंढते हैं तकदीर
वह हमेशा रहेगा भूखा
जब तक सामने से आकर कोई
आंख में नश्तर न चुभा जायेगा।
----------

कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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2 comments:

Shekhar kumawat said...

wow !!!!!!!!!

kintu amrit shabd ka acha stamal kiya aap ne

shekhar kumawat

http://kavyawani.blogspot.com/

दीपक भारतदीप said...
This comment has been removed by the author.

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