समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

Monday, June 1, 2009

गिरेबां में झांकने की कोशिश-आलेख(gireban men jhankne ki koshish-hindi alekh)

आस्ट्रेलिया में भारतीयों पर हमले की घटना कोई नई बात नहीं है-कम से कम भारत लौटे एक युवक और युवती का टीवी साक्षात्कार में तो यही कहना था। सच बात तो यह है कि भारतीयों पर पश्चिमी देशों में भी हमले होते रहे हैं जिनके समाचार अक्सर समाचार पत्रों और टीवी चैनलों पर आते हैं। यह हमले निंदनीय है पर जिस तरह हमारे यहां के बुद्धिमान लोग इसमें नस्लवाद तथा राष्ट्रवाद की भावनायें उभारते हुए अपनी अभिव्यक्ति करते हैं उसका समर्थन भी नहीं किया जा सकता। आस्ट्रेलिया से लौटे जिस युवक और युवती ने साक्षात्कार दिया उन्होंने इसे नस्ल या राष्ट्र से जोड़ने इंकार करते हुए बताया कि
1.अक्सर यह घटनायें रात को घटती हैं जब आफिस या क्लब से लौटते हुए शराबी और बेकार नवयुवकों द्वारा ही इस तरह का आक्रमण किया जाता है। कई बार तो पैसा लेकर छोड़ा जाता है।
2.आस्ट्रे्रलिया के किसी संस्थान, विश्वविद्यालय, पुलिस तथा सरकार द्वारा ऐसी घटनाओं को समर्थन नहीं दिया जाता। आम जनता में भी कोई ऐसा विरोध नहीं है। यह हमले केवल भारतीयों पर ही नहीं बल्कि अन्य देशों के लोगों पर भी होते हैं। इतना ही नहीं आस्ट्रेलिया में पहले बसे कुछ लोग भी नये लोगों के प्रति कम दुर्भाव नहीं दिखाते। सीधे पहले भारतीय बसे लोगों का नाम नहीं लिया गया पर इशारों में इस तरफ संकेत किया गया।
भारत में जिस तरह समाचार पत्रों, टीवी चैनलों तथा अंतर्जाल पर लेखकों ने शुरुआत में जो इस विषय पर लिखा उससे उस युवक और युवती के बयान मेल नहीं खाते। यह हैरानी की बात है कि मुख्यधारा को चुनौती देने का दावा करने वाले हिंदी ब्लाग लेखक ने उसी के साथ मिलकर आस्ट्रेलिया को चरित्र को ही चुनौती दे डाली। अनेक हिंदी ब्लाग लेखकों के आक्रामक पाठ देखकर ऐसा लगा कि वह मुख्यधारा की तरह सतही वैचारिक धारा में बह रहे हैं पर एक आक्रामक पाठ पर एक ब्लाग लेखक की टिप्पणी ने कुछ अलग हटकर सोचने के लिये इस लेखक को बाध्य किया।
उस टिप्पणीकर्ता ने पहले तो आक्रामक पाठ का समर्थन किया पर अंत में भारत में जारी रैगिंग प्रथा का मुद्दा उठाया और उसे रोकने की मांग की। श्री बालासुब्रहण्म-यहां साभारपूर्वक सम्मान के साथ उनका नाम लिखा जा रहा है। अगर उन्हें आपत्ति हो तो यह नाम हटा दिया जायेगा-ने जिस ढंग से यह मुद्दा उठाया उससे एक बात तो लगी कि ब्लाग लेखकों में कुछ लोग अन्य देशों पर सवाल उठाने से पहले अपने समाज के गिरेबां में झांकने का प्रयास भी कर रहे हैं।
टीवी पर आस्ट्रेलिया से लौटे उस युवक युवती ने साफ कहा कि वह दोबारा वहां जाना चाहेंगे। उनका यह भी कहना था कि मंदी के कारण बेरोजगार आस्ट्रेलिय नवयुवक इन हमलों के लिये जिम्मेदार हैं पर उसके लिये समूचे आस्ट्रेलिया पर उंगली उठाना नहीं चाहिए।

मगर इस देश में ऐसे ही प्रचार किया जा रहा है। हम यहां रैगिंग का का मामला उठायें तो लगेगा कि यह एक तरह का सांस्कृतिक नस्लवाद है जिसे इस देश के कथित सभ्रांत वर्ग ने सहज मान लिया है। हां, इसे और क्या कहा जा सकता है? रैगिंग हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं है। इतना ही नहीं यहां प्रचलित किसी धर्म या विचार से उसका प्रवर्तन भी नहीं हुआ। जिस तरह वैलंटाईन डे, प्रेम दिवस, मित्र दिवस, पिता दिवस, और माता दिवस मनाने की अपने देश में परंपरा शुरू हुई है पर देश का एक बहुत बड़ा वर्ग इसमें दिलचस्पी नहीं लेता। जब यह दिवस मनाये जाते हें उस दिन देश के अखबार या टीवी पर इनका प्रचार देखें तो लगेगा कि हर आदमी बस इसमें ही लिप्त है। यही स्थिति रैगिंग की है। अधिकतर छात्र छात्रायें इसको पंसद नहीं करते पर विद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों में धनाढ्य और कथित सभ्रांत वर्ग के छात्र और छात्रायें अपनी शक्ति और सभ्यता दिखाने के लिये इसे अपनाते हुए दूसरों को भी मजबूर करते हैं। कितनी गंदी हरकतें होती हैं यह बताने की आवश्यकता नहीं है। किसी धार्मिक या सामाजिक संगठन ने उठकर कभी रैगिंग के नाम पर अनाचार करने वालों के खिलाफ यह कहते हुए प्रदर्शन नहीं किया कि यह हमारे धर्म या संस्कृति के विरुद्ध है-न ही किसी पीड़ित को सांत्वना दी। सारा समाज एक तरफ बैठा तमाशा देख रहा है और क्या मजाल कि देश का बुद्धिजीवी वर्ग इसके विरुद्ध को अभियाना छोड़े या सामाजिक या धार्मिक कार्यकर्ता विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में छात्रों से सतत संपर्क कर उन्हें समझायें कि ‘यह रैगिंग प्रथा हमारे धर्म के खिलाफ है‘ या कि ‘यह हमारी संस्कृति के खिलाफ है’।
आस्ट्रेलिया की जितनी जनसंख्या है उतनी तो हमारे देश में हर वर्ष आबादी में बढ़ जाती है। क्षेत्रफल की दृष्टि से आस्ट्रेलिया हमसे बहुत बड़ा है इसलिये इस बात की संभावना है कि आगे चलकर वहां एशियाई देशों के लोगों की संख्या निश्चित रूप से बढ़ेगी। वहां की कानून व्यवस्था भी इतनी खराब नहीं है कि बाहर से आये लोगों को संरक्षण नहीं दिये जाने की शिकायत मिलती हो। क्रिकेट में उसके खिलाड़ियों द्वारा किया गया नस्लवादी व्यवहार पूरे देश का प्रमाण नहीं माना जा सकता। जहां तक कानून व्यवस्था का सवाल है तो अपने देश में ही विदेशी युवतियों के साथ दुर्व्यवहार की अनेक घटनायें हो चुकी हैं पर किसी ने समूचे भारत को इसके लिये दोषी नहीं ठहराया। अगर विदेशी लोग भी अगर इस तरह की टिप्पणियां करते तो क्या हमें बुरा नहीं लगता?
चर्चा करते हुए याद आया कि हमारे हिंदी ब्लाग जगत के एक प्रसिद्ध ब्लाग लेखक भी आस्ट्रेलिया में रहते हैं। उनका कोई पाठ इस संबंध में नहीं दिखा-हो सकता है उन्होंने लिखा हो और इस लेखक की दृष्टि में नहीं आया हो। कहने का तात्पर्य है कि ऐसी घटनाओं की निंदा करते हुए लिखना कोई बुरी बात नहीं है पर पूरे राष्ट्र पर आक्षेप करना ठीक नहीं है। यह ठीक है कि आक्रामक पाठ लिखकर आप दूसरों को प्रभावित करना चाहते हैं पर कहने वाले सच तो कह ही जाते हैं। यह अलग बात है कि कोई पहले आपकी बात का समर्थन कर फिर अपनी बात इस ढंग से कह जाता है कि आप समझते नहीं पर दूसरा यह तसल्ली कर लेता है कि उसने अपनी बात कह दी।
अंतर्जाल पर लिखने-पढ़ने का यही एक मजा भी है। पाठों के साथ उनकी टिप्पणियों में भी कोई ऐसी बात हो सकती है जो आपको अलग से हटकर सोचने के लिये बाध्य कर देती है। बालासुब्रण्यम साहब की टिप्पणी बड़ी थी पर उसमें रैगिंग का मुद्दा उठाना इस बात का प्रमाण था कि हिंदी के ब्लाग लेखक अपने समाज के गिरेबां में झांकते नजर आयेंगे जो कि मुख्यधारा-समाचार पत्र पत्रिकाओं और टीवी चैनलों-में नहीं देखने को मिलता है।
..........................................
दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

1 comment:

समय said...

एक सही समझ रखी है आपने.
आपने जिस प्रवंचना को निशाना बनाया है उसी को आगे बढाया जा सकता है कि बहुसंख्यक मानसिकता अपने यहां के अल्पसंख्यकों से पेश आते हुए अलग रुख अपनाती है, और जहां वे खुद अल्पसंख्यक होते है वहां के लिए अलग रुख. अजीब दोगलापन होता है.
शुक्रिया आपका.

यह रचनाएँ जरूर पढ़ें

Related Posts with Thumbnails

हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर

यह रचनाएँ जरूर पढ़ें

Related Posts with Thumbnails

विशिष्ट पत्रिकाएँ