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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

Wednesday 4 November 2009

कदमों के निशान-हिंदी कविता (kadmon ke nishan-hindi vyangya kavita)

यूं तो दर-ब-दर भटकते रहे
इस नीले आसमान के नीचे।
कभी सोचा न था कि
इस दौर में भी छप रहे हैं
धरती पर हमारे कदमों के निशान पीछे।

पल पल अपने दर्द के साथ जीते रहे
अपने गम खुद ही पीते रहे
पर अल्फाजों में कभी नहीं कहे
जमाने ने चाहे
हमारे पांव बढ़ने से रोकने के लिये खींचे।

जब बैठते हुए मुड़कर देखा
तब दिल में हुई खुशी यह देखकर कि
उन जगहों पर अल्फाजों के शेर
खिले थे फूल की तरह
जिस रास्ते हम चले थे
हमारे पांवों से गिरे पसीने ने ही वह सींचे।
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अपनी चाहतों का
कभी पूरा करने का मौका ही न मिला
जब एक रुपया था जेब में
तब कीमत थी दो रुपया
जब दो था तब हो गयी चार।
पैमाने के नीचे ही
झूलते रहे
जिन्होंने हमेशा साथ निभाया
वही ख्वाहिशें हमेशा बनी रही यार।


कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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