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Monday, April 14, 2008

क्रिकेट में अब वह रोमांच नहीं रहा

कानपुर में कल खत्म तीसरे टेस्ट मैच को देखकर तो ऐसा लगता है कि खिलाड़ी अब पांच दिवसीय मैचों में भी ट्वंटी-ट्वंटी जैसा खेलने चाहते हैं। पिच बहुत खराब थी या उस पर खेला नहीं जा सकता है यह केवल एक प्रचार ही लगता है। इसी पिच पर लक्ष्मण और गांगुली जमकर खेले और शायद इसलिये कि उनको अब इसका आभास हो गया है कि ट्वंटी-ट्वंटी के चक्क्र में रहे तो इससे भी जायेंगे। बाकी खिलाडी तो इसी चक्कर में है कि अब ट्वंटी-ट्वंटी का समय आ रहा है और उसके लिये इन्हीं टेस्ट मैचों में ही प्रयास किये जायें तो अच्छा है। चाहे कितनी भी सफाई दी जाये पर तीन दिन मे चार परियों का होना इस बात का प्रमाण है कि खिलाडि़यों में अब पिच पर टिक कर बल्लेबाजी करने की धीरज समाप्त हो गया है।
मैने यह मैच नहीं देखा। कल ऐसा लगा रहा कि भारत जीत रहा है तब काम से चला गया। जिस तरह राहुल द्रविड़ और गांगुली को खेलते देखा तो यह लगा कि पिच कैसी भी हो बल्लेबाज पर भी बहुत कुछ निर्भर होता है। संभव है कि अब ट्वंटी-ट्वंटी की जो प्रतियोगिता हो रही है उसके लिये कुछ खिलाड़ी तैयारी कर रहे हों और जिनको वहां पैसा कमाने का अवसर नहीं मिला हो वह इस प्रयास में रहे हो कि ट्वंटी-ट्वंटी के किसी प्रायोजक की नजर उस पर पड़ जाये। भारत जीत गया इससे कुछ लोगों को बहुत तसल्ली हो गयी होगी क्योंकि पिछले टेस्ट मैच में कुछ लोग भारत की हार पर रुआंसे हो गये होंगे। कुछ मिलाकर अब क्रिकेट के प्रशंसकों के दायरा सिमट रहा है और मुझे नहीं लगता कि इसकी किसी को फिक्र है। राष्ट्रीय भावना को इस खेल से जोड़ने का कोई मतलब नहीं रहा क्योंकि अब तो विदेशी खिलाड़ी भी इसमें कुछ देश के खिलाडियों के साथ मिलकर अपनी टीमों का मोर्चा संभालेंगे। भारत के संवेदनशील लोगों को यह गवारा नहीं होगा पर यह भी सच है कि आर्थिक उदारीकरण के इस युग में यह सब तो चलता रहेगा।
1983 में विश्व कप जीतने पर ही भारत में एकदिवसीय क्रिकेट मैच लोकप्रिय हुए थे और उसका कारण था कि लोगों में राष्ट्रप्रेम का भाव जाग उठा था। अब भले ही क्रिकेट में पैसा अधिक हो गया है पर उसका जो नया रूप सामने आ रहा है उसे देखते हुए उसमें ऐसी कोई भावना रखना अपने आपको धोखा देना होगा। हम जैसे लोगों के लिये तो अब भावनात्मक रूप से इस खेल में जुड़ना मुश्किल है जो हर बात में कुछ रोमांच तो चाहते हैं पर उसके साथ अपने क्षेत्र, प्रदेश और राष्ट्र की भावना की संतुष्टि चाहते हैं। अब तो इस खेल के साथ वही लोग जुड़ेंगे जो शुद्ध रूप से मनोरंजन तथा आर्थिक फायदे चाहते हैं।

3 comments:

Suresh Chandra Gupta said...

क्रिकेट को एक जेंटिलमैन खेल कहा जाता रहा है, पर अब तो वह एक खेल तक नहीं रहा. क्रिकेट अब एक पूरा व्यवसाय बन चुका है और व्यवसाय में रोमांच कहाँ? यदि खिलाड़िओं को तीन दिन खेल कर ही पूरा पैसा मिल जाता है तब पाँच दिन खेलने में क्यों बेकार करें?

रवीन्द्र प्रभात said...

सुरेश जी ने सही कहा की क्रिकेट अब व्यवसाय हो गया है और जहाँ व्यावसायिकता हावी हो जाए टू रोमांच स्वत: समाप्त हो जाता है !

अतुल said...

दलाली, गुलामी और तिकडम का खेल है.

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