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Thursday, April 24, 2008

ज्ञान का व्यापार कर ले-हास्य कविता



पिता ने कहा अपने पुत्र से
‘बेटा नहीं लग रहा मन तेरा
स्कूल की पढ़ाई में तो
तो कहीं कोई गुरू ढूंढ ले
और जीवन का ज्ञान प्राप्त कर
अपना जीवन सफल कर ले’

पुत्र ने खुश होकर कहा
‘जी पिताजी आपने मेरे मन की बात कही
आज ही कोई गुरू ढूंढता हूं और
जो जीवन का ज्ञान देकर
मेरा जीवन सफल कर दे
चलूंगा उसी मार्ग पर
जहां मेरा मन सत्य के दर्शन कर ले’

सुनकर पिता को आया गुस्सा
और बोले
‘जब भी बात करना
उल्टी करना
मैं तुझे ज्ञान प्राप्त कर
उस मार्ग पर चलने के लिये नहीं कह रहा
मेरा मतलब तो यह है कि
तू भी ‘ज्ञान का व्यापार’ कर ले
अज्ञानियों के झुंड में उसे बेचकर
किसी तरह अपना घर भर ले’
....................................................
ज्ञान का व्यापार भी
अब बहुत फलफूल रहा है
जो बेचता है वह माया के झूले में झूल रहा है
कहने वाले भी कहें छोड़ दो
सुनने वाले भी दोहरायें कि
माया है महाठगिनी
नहीं है किसी की भगिनी
पकड़े हैं अपने हाथ में सभी अज्ञान
पर हर कोई ज्ञानी होने के अहंकार में फूल रहा है
....................................................

1 comment:

अतुल said...

ज्ञान का व्यापार भी
अब बहुत फलफूल रहा है
जो बेचता है वह माया के झूले में झूल रहा है

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