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Monday, October 31, 2011

घर और जिंदगी-हिंदी शायरी (ghar aur jindagi-hindi shayri)

आओ कुछ सपने देखें
अपने घर खुशियाँ आने की
गम तो पल पल मिल जाते हैं ज़माने में,
दूसरों को दर्द देना आसान है
वक्त लगता हैं बहुत किसी को हंसाने में,
कहैं दीपक बापू
कागज के घर बनाने में
गुजर जाती है जिंदगी
पल लगता है उसे जलाने में.

Sunday, October 16, 2011

गरीबी पर चिंत्तन-हिन्दी कविताएँ (garibi par chinttan or thought on powerty-hindi poem's or kaivtaen

अपने घर में सोने के भंडार
तुम भरवाते रहो,
गरीब इंसान की रोटी से
टुकड़ा टुकड़ा कर चुरवाते रहो,
जब तक बैठे हो महलों में
झौंपड़ियों को उजड़वाते रहो।
यह ज्यादा नहीं चलेगा,
ज़माने की भलाई करने के नाम पर
सिंहासनों पर बुत बनकर बैठे लोगों
सुनो जरा यह भी
किसी दिन इतिहास अपना रुख बदलेगा,
किसी दिन तुम्हारी शख्सियत का
काला चेहरा भी हो जायेगा दर्ज
तब तक भले ही अपने तारीफों के पुल
कागजों पर जुड़वाते रहो।
----------
वातानुकूलित कक्षों में बैठकर वह
देश से गरीबी हटाने के साथ
विकास दर बढ़ाने पर चिंत्तन करते हैं,
बहसों के बाद
कागजों पर दौलतमंदों के
घर भरने के लिये शब्द भरते हैं।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  'Bharatdeep',Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com
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Friday, October 7, 2011

सब्जी और चंदा-हिन्दी हास्य कविता (sabji aur chanda-hindi hasya kavita)

समाज सेवक की पत्नी ने कहा
‘‘सुनते हो जी!
आज नौकर छुट्टी पर गया है
तुम थैला लेकर जाओ,
उसमें
आलू , टमाटर और धनिया
खरीद कर लाना
जब घर वापस आओ।’’
समाज सेवक ने कहा
‘‘अभी तक तुम्हारे मस्तिष्क का विकास हुआ नहीं है,
घर पर खाना जरूरी है क्या
मेरे साथ चलो जहां में जा रहा हूं
खाने का होटल भी वहीं है,
अगर किसी ने देख लिया
थैले में हम सब्जी भर भरने लगे हैं,
तब दानदाता भी
हमारे थैले में पैसे की जगह

 आलू  और टमाटर भरने लगेंगे
छवि के दम पर चल रहा है अपना धंधा
वरना कौन लोग अपने सगे हैं,
नौकर एक दिन की छुट्टी पर गया है
तुम हमें हमेशा के लिये
समाज के धंधे से रिटायर न कराओ।’’
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Friday, September 23, 2011

देश के बिक जाने का खौफ-हिन्दी कविता (desh ke bik jane ka or terrar of sale of country-hindi kavita or poem)

यह खौफ क्यों सताता है तुमको
कि देश बिक जायेगा
कमबख्त, पहले लुटेरे
खुद लूटने आये इस देश का खजाना,
देश फिर भी फलाफूला
हो गये वह अपने देश रवाना,
अब उनके दलाल कमाकर दलाली
जमा कर रहे लुटेरों के घर दौलत,
फिर उधार उसे उधार लेकर आते हैं,
ब्याज भी यहीं से कमाते हैं
अपने बनकर पा रहे वफादार जैसी शौहरत
सब मिट जायेंगे एक दिन
देश फिर भी अपना कमाकर खायेगा
------------
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Monday, September 12, 2011

हिन्दी दिवस पर कविता और लघु व्यंग्य (hindi diwas or hindi divas par kavita aur laghukatha)

        एक आयोजक ने अपने कवि मित्र को अपनी संस्था में हिन्दी दिवस पर आयोजित कार्यक्रम का आमंत्रण देते हुए कहा-‘यार, तुम कल 12 बजे आना। बढ़िया कार्यकम हैं। कार्यक्रम के बाद नाश्ते वगैरह का आयोजन किया गया है। कार्यक्रम में काव्य पाठ भी होगा तुम उसे सुन सकते हों!
     कवि मित्र ने कहा-‘‘तुम कहो तो हम कविता भी कर देंगे।’
      आयोजक ने कहा-‘‘देखो, यह कार्यक्रम मेरे पैसे से नहीं हो रहा है। जिन लोगों ने पैसे दिये हैं वह कविता करेंगे। सभी बड़े लोग हैं और उनको इसी दिन अपनी हिन्दी में भड़ास निकालने का अवसर मिलता है। तुम तो बस, उपस्थिति देने आना जिससे मेरी भी इज्जत बढ़ेगी।’’
        कवि मित्र ने कहा-‘‘इससे क्या? तुम एक दो कविता सुनाने का अवसर हमें भी दो।’
मित्र ने कहा-‘‘तुम तो मेरी उन बड़े लोगों से दुश्मनी कराओगे। तुम मंच पर आकर शुद्ध हिन्दी में काव्य पाठ करोगे, उसमें जोरदार सुर भरोगे। वह बड़े लोग जो अपनी भड़ास हिन्दी में निकालने के लिये यही दिन पाते हैं, अपनी हंग्रेजी यानि आधी हिन्दी और अंग्रेजी में अपनी बात कहेंगे और बीच में तुम्हारी कविता सुन ली तो कुंठित हो जायेंगे। इसलिये तुम्हें मंच पर लाने का खतरा मैं नहीं उठा सकता।’’
      कवि मित्र ने कहा-‘‘मैं वहां नहीं आऊंगा। तुम फुरसत पा लो तो रात को मेरे घर आ जाना। मैं भी हिन्दी दिवस पर कवितायें सुनाने के लिये आदमी ढूंढ रहा हूं पर कोई मिल नहीं रहा सभी हिन्दी दिवस में जा रहे हैं। अनेक लोग तो ऐसे हैं जिनको चार चार जगह से निमंत्रण मिले हैं। वह जाने से पहले हर जगह मिलने वाले नाश्ते की सामग्री पता कर रहे हैं। जहां अच्छा होगा वहंी जायेंगे। अलबत्ता तुम अपने यहां मिलने वाले नाश्ते की चीजें बता दो मैं उन हिन्दी प्रेमियों को बता दूंगा जो इस दिन ऐसे कार्यक्रम ढूंढते हैं।
मित्र खिसियाकर रह गया।
हिन्दी दिवस पर प्रस्तुत एक क्षणिका
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उन्होंने अपने संस्थान में
हिन्दी धूमधाम से मनाया,
सभी वक्ताओं के भाषणों में
कहीं अंग्रेजी शब्द ठसे थे
तो किसी ने अंग्रेजी में ही
हिन्दी का महत्व बताया।
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Friday, September 2, 2011

भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचार-हिन्दी हास्य कवितायें (bhrashtachar aur bhrashtachar-hindi hasya kavita corruption and corrupted-hindi comic poem

वह ईमानदार हैं
इसलिये बिना दाम के
ईमान नहीं बेचते
मगर नेक हैं
मोलभाव नहीं करते।
................
एक आदमी ने दूसरे से पूछा
‘‘यार, हमारे जिम्मे जो काम हैं
उसे करने के लिये
हम लोगों से पैसा लेते हैं
कहीं इसी को तो भ्रष्टाचार नहीं कहा जाता है,
अगर यह सच है
छोड़ देते हैं यह काम
भ्रष्टाचारी कहलाना अब सहा नहीं जाता है।’’
दूसरे ने कहा
‘किस पागल ने हमारे काम को भ्रष्टाचार कहा है
काम के बदले दाम लेना
व्यापार कहलाता है,
जिसे नहीं मिलता वह
अपनी ईमानदारी को खुद ही सहलाता है,
वैसे मुझे नहीं मालुम भ्रष्टाचार किसे कहा जाता है,
पर लगता है कि कुछ लोग
बिना काम किये
पैसा लेते हैं,
फिर मुंह फेर लेते हैं,
ऐसे लोग मुफ्तखोर है या भिखारी
शायद दोनों को एक संबोधन देने के लिये
भ्रष्टाचारी कहकर पुकारा जाता है।’’
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Sunday, August 21, 2011

ईमानदारी की बही-हिन्दी हास्य कविता (imandari ki bahi or dayri of honesty-hindi hasya kavita or comic poem)

भ्रष्टाचारी ने ईमानदार को फटकारा
‘‘क्या पुराने जन्म के पापों का फल पा रहे हो,
बिना ऊपरी कमाई के जीवन गंवा रहे हो,
अरे
इसी जन्म में ही कोई अच्छा काम करते,
दान दक्षिणा  दूसरों को देकर
अपनी जेब भरने का काम भी करते,
लोग मुझे तुम्हारा दोस्त कहकर शरमाते हैं,
तुम्हारे बुरे हालात सभी जगह बताते हैं,
सच कहता हूं
तुम पर बहुत तरस आता है।’’
ईमानदार ने कहा
‘‘सच कहता हूं इसमें मेरा कोई दोष नहीं है,
घर में भी कोई इस बात पर कम रोष नहीं है,
जगह ऐसी मिली है
जहां कोई पैसा देने नहीं आता,
बस फाईलों का ढेर सामने बैठकर सताता,
ठोकपीटकर बनाया किस्मत ने ईमानदार,
वरना दौलत का बन जाता इजारेदार,
एक बात तुम्हारी बात सही है,
पुराने जन्म के पापों का फल है
अपनी ईमानदारी की बनी बही है,
यही तर्क अपनी दुर्भाग्य का समझ में आता है।
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Friday, August 12, 2011

आम आदमी की जाग्रति के बिना कोई आंदोलन सफल नहीं हो सकता -हिन्दी लेख (anna hazare ka aandolan aur aam aadmi-hindi lekh)

                  अन्ना हजारे का 16 अगस्त से महानायक के रूप में राष्ट के दृश्य पटल पर पुनः अवतरण हो रहा है। देश के समस्थ्त प्रचार माध्यम इस महानायक के महिमामंडल में लगे हुए हैं क्योंकि उनके आंदोलन के दौरान प्रचार प्रबंधकों ऐसी विषय सामग्री मिलेगी जो उनके प्रकाशन तथा प्रसारणों वालेक विज्ञापन के साथ काम आयेगी। उनके कई घंटे इस दौरान उनको विज्ञापन का संग्रह कर कमाई करने का अवसर देंगे। सच बात तो यह है कि हमारे देश के प्रचार माध्यमों की स्थापना में लक्ष्य विज्ञापनों को पाना ही होता है, मगर अभिव्यक्ति के झंडाबरदार होने की छवि की वजह से प्रचार प्रबंधक कुछ ऐसी विषय सामग्री भी प्रकाशित और प्रसारित करते हैं जिससे माध्यमों का पत्रकारिता संस्थान होने का प्रमाण दिख सके। अगर ऐसा न होता तो टीवी चैनल को अपने प्रसारणों में अब निर्धारित समाचार, विश्लेषण तथा चर्चा की न्यूनतम मात्रा होने का प्रचार नहीं करना पड़ता। उनको अपने प्रचार यह सािबत करना पड़ता है कि वह विज्ञापन चैनल नहीं बल्कि समाचार चैनल चलाते हैं कि और कम से कम उनके यहां इतने समाचार तो प्रसारित होते ही हैं।
              इसमें कोई संदेह नहीं है कि अन्ना हजारे और बाबा रामदेव व्यक्तित्व और कृतित्व की दृष्टि से सात्विक प्रवृत्ति के है। अन्ना हजारे अपनी धवल तो बाबा रामदेव अपनी धार्मिक छवि के कारण देश के जनमानस में निर्विवाद व्यक्तित्व के स्वामी हैं। दोनों के व्यक्तित्व पर कोई आक्षेप नहीं है ऐसे में उनका व्यक्तित्व किसी भी ऐसे मुद्दे को निरंतर बनाये रखने में अत्यंत सहायक है जो जनमानस से जुड़ा हो। इस समय भ्रष्टाचार का मुद्दा ज्वलंत बन गया है और इससे जनमानस प्रभावित भी है और समाचार के साथ विश्लेषण विज्ञापनों के साथ निरंतर प्रचार किया जा रहा है। इसके बाद हम टीवी चैनल और समाचार पत्रों की कार्यप्रणाली पर भी विचार करते हैं  जिसमें उनको जनमानस के बीच अपनी छवि बनाये रखना होती है। उनको रोज नवीनता चाहिए। नये चेहरे, नये विषय और नये रोमांच आज के प्रचार माध्यमों को रोज जुटाने हैं। ऐसे में कभी कभी तो यह लगता है कि पूर्वनियोजित समाचार बन रहे हैं। इसका संदेह इसलिये होता है कि हमने देखा है हमारे प्रचार प्रबंधकों के आदर्श पश्चिमी गोरे राष्ट्र हैं जहां ऐसी भी खबरों सुनने को मिलती हैं कि सनसनी फैलाने के लिये प्रचार कर्मियों ने हत्यायें तक करा डालीं। हमारे देश के लोगों में   यह दुस्साहस करने की पशुवृत्ति नहीं है। यह अच्छी बात है पर अहिंसक योजनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता। देश में जब पुराने चेहरों से उकताहट महसूस की जाने लगी तो उसी समय बाबा रामदेव और अन्ना हजारे का अपने मूल सक्रिय क्षेत्रों से हटकर भ्रष्टाचार विरोधी देतवा के रूप में अवतरण हुआ। बाबा रामदेव योग साधना सिखाते हुए पूरे विश्व में लोकप्रिय हो गये थे। उनके शिविरों के कार्यक्रमों का टीवी चैनलों पर प्रसारण हुआ तो समाचार पत्रों में भी खूब चर्चा हुई। इधर अन्ना हजारे भी अपने महाराष्ट्र प्रदेश में कुछ आंदोलनों से चर्चित होने के बाद फिर कहीं खोये रहे। ऐसे में अचानक दोनों ही भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के अगुआ बने या बनाये गये इसको लेकर सवाल उठता है। ऐसा लगता है कि इन दोनों के चेहरे का उपयोग शयद इसलिये हो रहा है ताकि भारत की छवि विश्व में धवल रहे जो कि कथित रूप से स्विस बैंकों में देश के लोगों के काला धन जमाने होने के कारण धूमिल हो रही है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि देश के आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक पुरुषों ने विश्व में अपनी छवि बनायी है पर लगता है कि उनको अन्य देशों के समक्क्षों के सामने अपने देश के भ्रष्ट आचरण के कारण शार्मिंदा होना पड़ता है। संभव है उनको मुर्दाकौम का शीर्षस्थ होने का ताना मिलता हो। इसलिये एक आंदोलन की आवश्यकता उनको अनुभव हुई जिससे यहां की जीवंत छवि बने और उनका सम्मान हो। ऐसे में आंदोलनों को अप्रत्यक्ष रूप से मदद देने से एक लाभ उनको तो यह होता है कि विश्व में उनकी छवि धवल होती है तो वही दूसरा लाभ यह है कि जनमानस मनोंरजन और आशा के दौर में व्यस्त रहता है और शिखर पुरुषों को अपने नियंत्रित समाज से अचानक विद्रोह की आशंका नहीं रहती। फिर प्रचार माध्यम तो उनके हाथ में तो उसमें विज्ञापित उत्पादों के भी वही निर्माता है। ऐसे में उनका विनिवेश कभी खाली नहीं जाता।
          बाबा रामदेव और अन्ना हजारे जनमानस के नायक हैं पर कहीं न कहीं उनके इर्दगिर्द ऐसे लोगों का जमावड़ा है जो पेशेवर अभियानकर्ता हैं और उनसे निष्काम भाव से काम करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। यही कारण है कि भले अन्ना साहेब और स्वामी रामदेव निच्छल भाव के हैं पर अपने सलाहकारों के कारण अनेक बार अपने अभियानों के संचालन के दौरान वैचरिक दृढ़ता का प्रदर्शन नहीं कर पाते। उनके अभियानों के दौरान वैचारिक लड़खड़ाहट की अनुभति होती है। मुख्य बात यह है कि अनेक बार ऐसा लगता है कि कहीं न कहीं दोनों के पेशेवर अभियानकर्ता सलाहकार देश के शिखर पुरुषों से अप्रत्यक्ष रूप से संचालित हैं। इनमें एक तो ऐसे हैं जो कभी नक्सलियों के समर्थन में आते हैं तो्र कभी कभी कश्मीर के उग्रतत्वों के साथ खड़े दिखते हैं। भारतीय धर्म पर व्यंग्यबाण कसते हैं। ऐसा लगता है कि अन्ना हजारे और बाबा रामदेव की धवल छवि की आड़ में कोई ऐसा ही समूह सक्रिय है जो ऐसे अभियानों को पेशेवर अंदाज में चला रहा है। टीवी पर एक संगीत कार्यक्रम में अन्ना साहेब की उपस्थित और राखियों पर छपे चेहरे से यह बात साफ लगती है कि कहीं न कहीं बाज़ार को भी उनकी जरूरत है। ऐसे में 16 अगस्त से चलने वाले अन्ना साहेब के आंदोलन के परिणामों की प्रतीक्षा करने के अलावा अन्य कोई निष्कर्ष करना जल्दबाजी है पर बाज़ार और प्रचार प्रबंधकों की इसमें सक्रिय होना फिलहाल दिख रहा है जिनकी शक्ति के चलते भ्रष्टाचार खत्म होना अस्वाभाविक बात लगती है।
            आखिरी बात यह है कि भ्रष्टाचार के लिये कानून पहले से ही बने हुए हैं। मुख्य बात यह है कि कानून लागू करने वाली व्यवस्था कैसी हो। दूसरी बात यह है कि समाज स्वयं लड़ने को तैयार नहीं है। क्या आपने कभी सुना है कि कोई अपने रिश्तेदार या मित्र का इसलिये बहिष्कार करता है कि उस पर भ्रष्टाचार का संदेह है।
         यकीनन नहीं! दूसरी बात यह है कि अगर हम गौर करें तो हमारे देश में कानूनों की संख्या इतनी अधिक है कि सामान्य आदमी की समझ में ही नहीं आता कि उसके पक्ष में कौनसी धारा है। बिना जागरुकता के भ्रष्टाचार मिट नहीं सकता और यह तभी संभव है कि जब संक्षिप्त कानून हों जिनको आम आदमी समझ सके। आम आदमी को लगता है कानून का विषय उसके लिये कठिन है इसलिये वह व्यवस्था को केवल शक्ति का प्रतीक मानते हुए उदासीन रहता है। बार बार यह दावा किया जाता है कि देश का विकास आखिरी आदमी तक पहुंचना चाहिए पर हमारा मानना है कि यह तभी संभव है जब देश में कानून इतना सरल और संक्षिप्त बने जिसे आम आदमी उसे समझ सके। सच तो यह है कि अपने को कम जानकार मानने की वजह से कोई आम आदमी भ्रष्टाचार से लड़ना नहीं चाहता। भ्रष्टाचार होने का एक कारण यह भी है कि समाज ने ही इसे मान्यता दी है और भ्रष्ट लोगों को हेय दृष्टि से देखने की आदत नहीं डाली। एक आम लेखक के रूप में हम देश के लिये हमेशा कामना करते हैं कि यहां सभी लोग खुशहाल रहें इसलिये जब कोई बड़ी हलचल होती है तो उस पर नज़र जाती है। हम अपेक्षा करते हैं कि अच्छा हो पर जब चिंतन करते हैं तो लगता है कि अभी दिल्ली दूर है। फिर भी आशायें जिंदा रखते हैं क्योंकि जिंदा रहने का सबसे अच्छा तरीका भी यही है।
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कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Friday, August 5, 2011

शान-ओ-शौकत-हिन्दी शायरी (shan-shaukat-hindi shayari)

ताउम्र भरते रहे तिजोरियाँ,
अब संभालने में गंवा रहे
क्योंकि शहर में हो रही चोरियाँ।
अपनी अमीरी पर लोग बेकार इतराते हैं,
उनकी शान-ओ-शौकत पर
उनके कारिंदे भी इठलाते हैं,
कहलाए साहूकार
न रात को नींद
न दिन में चैन
ढोते रहे सिर पर सोने के सिक्कों की बोरियाँ।
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Tuesday, August 2, 2011

अपना दर्द-हिन्दी शायरी (apna dard-hindi shayari)

अपना दर्द बयान करते करते
हमारी जुबां थक गयी
पर पता नहीं
गले तक मुसीबत में डूबे इस जहां में
किसी ने सुना कि नहीं,
लोगों के कान खुले दिखते हैं
मगर अपनी बात आप ही सुनते हैं
दूसरे का स्वर पहचानते हों
यह लगता नहीं,
हो सकता है
हमारी आवाज ही बेअसर हो कहीं
या जुबां लफ्ज असरदार बोलती नहीं।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Monday, July 18, 2011

इंसानियत की वर्दी मेंशैतान-हिन्दी शायरी (insaniyat ki vardi mein shaitan-hindi shayari)

कोयले की दलाली में ही
हाथ होते हैं काले,
वह तो सोने के दलाल होकर भी
काली नीयत हैं दिल में पाले,
मालिक होकर भी खुश होना
उनका ख्वाब नहीं है।
पेट में रोटी होने पर भी
पेटियां सोने से भरते रहने का सपना
जिंदा रखते हैं जो लोग
उन पर दौलत के अलावा
किसी का रुआब नहीं है।
----------------------------
सभी का जमीर गहरी नींद सो गया है,
इसलिये यकीन अब महंगा हो गया है।
भरोसेमंदों ही लूटने लगे हैं ज़माने के घर
इंसानियत की वर्दी में शैतान खो गया है।
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Monday, July 11, 2011

दुर्घटना में कमीशन का डंका-हिन्दी हास्य कविताएँ (durghatna mein commistion-hindi hasya kavitaen)

घायल का दर्द हो
चाहे टूटे आशिक का गम हो
बाज़ार के लिए कमाए का जरिया है,
लोगों के आँखों के सामने
पर्दे पर चलते नज़ारे
मुफ्त में नहीं चलते,
चीजों को खरीदने के
मशविरों के चिराग भी साथ जलते,
दौलतमंदों के घर की खुशियां हों
चाहे नटों के जन्मदिन
बन जाता है
हर समय कमाई का दरिया।
----------------
टीवी चैनल का संवाददाता
ज़ोर से चिल्लाया
"संपादक जी
बड़ी जोरदार रेल दुर्घटना हुई है
कई लोगों के मरने की आशंका है।"
सुनते ही संपादक ने खुश होकर
संवाददाता को आगे की खबर
थोड़ी देर बाद देने को कहा
और फिर अपने प्रबंधक से कहा
"जनाब, अपने विज्ञापन विभाग से कहें,
अगले 48 घंटे तक सजग रहें,
रेल दुर्घटना में जहां मरने के दर्द भी होंगे,
तो संजोग से बचे कुछ खुश मर्द भी होंगे,
इसलिए अपना समय अच्छा पास होगा
बजने वाला आपकी कमीशन का डंका है।
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Tuesday, July 5, 2011

लोग अदायें बदल देते हैं-हिन्दी शायरी (log adaen badal dete hain-hindi shayari)

खौफ आसमान से बिजली गिरने का नहीं है,
डर जमीन के धसकने का भी नहीं है,
नहीं घबड़ाते सांप के जहर से
फिर भी दिल घबड़ाता है
इस बात से
रोज मिलने वाले इंसानों में
कोई शैतान तो नहीं है।
------------
लोग नहीं बदलते चेहरा
बस, बयान बदल देते हैं,
बेशर्मी अब बुरी आदत नहीं कहलाती
कुछ मजबूरी
कुछ व्यापार बन गयी हैं बेदर्दी
लोग हालत बदलने के बहाने
अपनी अदायें बदल देते हैं।
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Monday, June 27, 2011

चोर और ज्योतिषी-हिन्दी हास्य कविता (chor aur jyotishi-hindi hasya kavita)

चोर पहुंचा और एक हजार का नोट
हाथ में देते हुए बोला
‘‘महाराज,
मेरा हाथ देकर बताओ
कौनसा धंधा करूं, यह समझाओ,
चोरी या जेब काटने का,
दिन बुरे चल रहे हैं
कब आ जाये दिन धूल चाटने का,
अनेक जगह सोने की चोरी की
पता चला सभी जगह नकली मिला माल,
खाली जा रहा है पूरा साल,
आपको देखा तो
भविष्य पूछने के लिये
एक हजार का नोट किसी की जेब काटकर आया,
किसी का धन चुरा सकते हैं
पर अक्ल नहीं
अब यह आपका काम देखकर समझ पाया।’’

ज्योतिषी ने नोट को घुमा फिराकर देखा
फिर उसे वापस थमाते हुए कहा
‘‘बेटा,
तुम्हारा हाथ देखने की जरूरत नहीं,
जन्मपत्री भी मत दिखाना कहीं,
तुम्हारी किस्मत अब साथ छोड़ रही है
असलियत की तरफ मोड़ रही है,
यह नोट भी नकली है,
पर जिंदगी तुम्हारी असली है,
इससे अच्छा है तुम कहीं
ठेला चलाने का धंधा प्रारंभ करो,
न अब बुरे कर्म का दंभ भरो,
रकम छोटी आयेगी,
पर सच को साथ लायेगी,
अब तुम जाओ,
अभी तक लोगों से लिया पैसा
पर तुम्हें मुफ्त में भविष्य बताया।
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Tuesday, June 21, 2011

तख्त के लिये मची जंग-हिन्दी कविता(takhta ke liye jung-hindi kavita

तख्त के लिये मची है चारों तरफ जंग,
इंसानों के मुंह खुले पर दिमाग हैं तंग।
सजे हुए सब चेहरे, ओढ़े चमकीले कपड़े
मगर सभी की नीयत का काला है रंग।
भरोसा के नाम, मिलता तोहफा धोखे का
सच की लय को भ्रम ने किया है भंग।
कहें दीपक बापू अंधों के आगे क्या रोना
समाज बड़ा है, पर बंधे है उसके सारे अंग।
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Monday, June 13, 2011

हास्य कविता-धर्म के धंधे में कोई कर नहीं है (hasya kavita-dharm ke dhandhe mein tax nahin hai)

चेले ने कहा गुरु से
‘गुरुजी,
अब तो आपकी सेवा में बहुत सारे
चेले आ गये हैं,
सभी आपके भक्तों को भा गये हैं,
मुझे अब समाज सेवा के लिये
आश्रम से बाहर जाने की
सहमति प्रदान करे,
किसी बड़ी संस्था में पद लेकर
आपका नाम रौशन करूं,
अनुमति प्रदान करें।’
सुनकर गुरु जी बोले
‘सीधी बात क्यों नहीं कहता
कि अब अपनी धार्मिक छवि को
नकदी में भुनाना चाहता है,
माया के लोभ में
ज्ञान को भुलाना चाहता है,
मगर भईये!
समाज सेवा में राजनीति चलती है,
बाहर लगते हैं जनकल्याण के नारे
अंदर कमीशन पाने की नीयत पलती है,
तुझे लग रहा है कि यह रास्ता सरल है,
मगर वहां बदनामी का खतरा हर पल है,
फिर तेरा अनुभव तो पूजा पाठ का है
राजनीति में एक तरह से तू तो उल्लू काठ का है,
वहां पहले से ही मौजूद बड़े बड़े धुरंधर हैं,
कुछ बाहर पेल रहे हैं डंड तो कुछ अंदर हैं,
उनकी आपस में तयशुदा होती जंग,
देखती है जनता बड़े चाव से
भले ही हालातों से तंग,
फिर तू समाज सेवा के नाम पर
कोई आंदोलन चलायेगा,
डंडे की मार खाकर यहीं लौट आयेगा,
भले ही मेरी वजह से
तेरे को कई समाज सेवक मानते हैं,
पर उनके इलाके में अगर तू घुसा
मार खायेगा
यह हम जानते हैं,
वहां जाकर नाकामी तेरे हाथ आयेगी,
यह बदनामी मेरे नाम के साथ भी जायेगी,
इसलिये अच्छा है
कहंी दूसरी जगह आश्रम बनाकर
तू भी स्वामी बन जा,
धर्म के धंधे में एक खंबे की तरह तन जा,
यहां डंडे का डर नहीं है,
कमाई पर कोई कर नहीं है,
अभी तक मैं अपना खजाना अकेला भरता था
अब अलग होकर दोनों ही
अपनी तिजोरी दुगुनी गति से भरें।’
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Sunday, June 5, 2011

दूसरों के दर्द से कब तक छिपोगे-हिन्दी साहित्यक कवितायें (doosron ke dard se kab tak chhipaoge-hindi litgerature poem)

तुम सुनना नहीं चाहते, पर तुम्हारे कान बंद करने से
जमाने के लोगों की दर्दीली आवाज बंद नहीं हो जायेगी,
देखना नहीं चाहते किसी की पीड़ा, पर आंखें बंद करने से
लोगों के जिस्म की भूख, केवल वादों से नहीं मिट जायेगी,
 चाहे जब छिप जाओ तुम वातानुकूलित कमरों में
बाहर की आग और आंधी दीवारें उनको भी कभी ढायेगी।
------------
न खेलो इस ज़माने से
लोगों को खिलौना मानकर,
दूसरों के दर्द को
अनदेखा न करो अच्छी तरह जानकर।
अपने हाथ से किये कसूरों  पर
चाहे कितनी सफाई देते रहो
कोई यकीन नहीं करेगा,
भले ही डर से कोई
सामने नहीं कहेगा,
कभी न कभी न उठेगा
तुम्हारे किये कसूरों का तूफान
गिरा देगा तुम्हारे महल
तब रहो आराम से चादर तानकर।
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Thursday, May 26, 2011

प्रलय का दिन-हिन्दी व्यंग्य लेख (pralaya ka din-hindi hasya vyangya

     अमेरिका के एक तथाकथित ज्योतिषी ने 21 मई 2011 को प्रलय का दिन घोषित किया, मगर हुआ कुछ नहीं। विशेषज्ञों ने पहले ही बता दिया था कि कोई भी ऐसी अंतरिक्षीय आपदा की संभावना नहीं है जिससे धरती नष्ट हो जाये। इसके बावजूद लोगो को भगवान की प्राार्थना के लिये प्रेरित किया गया। बाज़ार और उसके प्रचार माध्यम लोगों को इस तरह के अंधविश्वास से दूर होने की सलाह देते रहे जो कि उनके उस व्यवसायिक कौशल का परिणाम था जिसमें एक फालतु खबर तैयार कर उस चर्चा या बहस प्रस्तुति के दौरान अपने विज्ञापनों के लिये विषय सामग्री जुटाई जाती है।
     इस धरती पर अक्सर कुछ ऐसे लोग प्रकट होते हैं जो इसक नष्ट होने की भविष्यवाणी करते हैं। तारीखें बताते हैं पर उस दिन कुछ नहीं हेाता। इन भविष्यवाणियों में हमेशा ही अंतरिक्ष से आपदा प्रकट होने का संकेत होता है क्योंकि धरती की आपदाओं से मनुष्य जाति पूरी तरह विलुप्त होने का अंदेशा नहंी होता न ही वह प्रलय की परिधि में आती हैं। जहां तक धरती पर आने वाली प्राकृतिक आपदाओं की बात है तो वह तो आती रहती हैं क्योकि वह स्वयं ही उसका कारण बनती है। इस संसार में सांस लेने वाले लोग अपने जीवन में अनेक आपदाओं को झेल चुके होते हैं या फिर स्वयं दूसरी जगह देखकर भूल जाते हैं।
     यह संयोग ही है कि पश्चिम में रहने वाले एक फ्लाप ज्योतिषी ने यह भविष्यवाणी की। वह पहले ही एक ऐसी भविष्यवाणी कर चुका था जो प्रकट नहीं हुई इसकेे बावजूद भारतीय प्रचार माध्यम उसकी सनसनी को भुनाते रहे। दरअसल भारत में मई का महीना संकट का ही होता है। सूर्यनारायण सीधी आंखों से भारत की तरफ ताकते हुए ऐसे लगते हैं जैसे कि नाराज हों। वायुदेवता उनके अनुयायी होने की वजह से आग साथ लेकर निकलते हैं। जलदेवता सिकुड़ने लगते हैं जैसे कि विश्राम कर रहे हों। ऐसे में मनुष्य, पशु, पक्षी और जलवायु का प्रभावित होना स्वाभाविक है। एक दूसरी मुश्किल भी है कि इसी महीने में आंधी अक्सर चलती है। जमीन सूखी होने क कारण धूल इस कदर उठती है कि राहों पर चलना कठिन हो जाता है। यह संयोग ही है कि 21 मई 2011 को हमारे देश में विकट आधंी आई। ऐसी आंधी ने उत्तर भारत के अनेक शहरों का जीवन अस्तव्यस्त कर दिया। जमकर बरसात भी हुई। एक समय तो ऐसा लग रहा था कि आंधी कहीं अपने वेग से सीमेंट, ईंट और लोहे से बने मकान न पास में दबाकर चली जाये।
     ऐसे अवसर पर लोगों को 21 मई को प्रलय के दिन की भविष्यवाणी याद आई। आंधी, बरसात और अंधेरे से जूझ चुके लोग जब सुबह आपस में मिले तो प्रलय के दिन की भविष्यवाणी को याद कर रहे थे। एक ने हमसे कहा कि ‘ः21 मई को प्रलय के दिन की भविष्यवाणी सही निकली।
     हमने कहा कि ‘क्या हम स्वर्ग या नरक में मिल रहे हैं।’
     वह बोले-‘क्या मतलब?
     हमने कहा कि -‘प्रलय का मतलब होता है कि धरती पर जीवन का नष्ट होना। जहां तक हमारी जानकारी है उस समय धरती जलमग्न हो जाती है। जीवन की जगह जल अपना शासन करता है। अगर हम मान लें कि प्रलय की भविष्यवाणी सत्य हुई है तो इसका मतलब यह है कि हम धरती से लापता होकर कहीं दूसरी जगह मिल रहे हैं। वह दूसरी जगह स्वर्ग या नरक ही हो सकती है। जहां तक हमारे ज्ञान चक्षु देखते और कर्ण सुनते हैं वहां तक धरती के बाद यह दो ही स्थान है। जहां मनुष्य आता जाता है।
वह बोले-‘इसका मतलब तो हम नरक में मिल रहे हैं। देखो, हमारे घर की बिजली सारी रात गुल रही। बरसात की वजह से हमारी छत के एक भाग में छेद होने के कारण वहां से पानी टपकता रहा। सुबह पानी नहीं भरा। भरी दोपहर में कूलर की बात तो दूर पंखे की हवा तक नसीब नहीं हुई। हमारे लिये तो प्रलय जैसा समय था।’’
हमने कहा-‘पल में प्रलय होती है पर वह पल की नहीं होती बल्कि वह धरती से जीवन को ही समेट कर अपनी भूख शांत करती है। यह तो संकट आते जाते हैं इनसे क्या घबड़ाना?’’
        वह बोले-‘वह तो समेट कर ही चली जाती । गनीमत है कि हम सर्वशक्तिमान से प्रार्थना करते रहे। उन्होंने हमारी सुन ली तो बच गये। हमारी आस्था में बहुत शक्ति है जिसके कारण हम बच गये।’’
हमने हंसकर कहा-‘‘यहां आकर हमारे ज्ञानचक्षु अपना काम बंद कर देते हैं। आप कह रहे हैं कि आपकी आस्था में शक्ति है तो यकीनन होगी। हम तो यह कह रहे हैं कि आपकी आस्था में महान शक्ति है जो आप स्वयं ही नहीं सारा संसार बच गया।’’
      आज तक अनेक लोग आस्था और अंधविश्वास में अंतर नहीं कर पाये। यही कारण है कि ज्योतिष और भविष्यवाणी के आधार पर कोई भी बयान देकर अपना नाम कर लेता है। कभी कभी तो लगता है कि संसार में प्रलय की बात सुनकर लोग दुःखी कम खुश अधिक होते हैं। कम से कम अपने देश में तो यही लगता है। हमारे देश में अध्यात्मिक ज्ञान का विशाल भंडार है। यही कारण है कि हमारे लोग जानते हैं कि यहां आदमी अकेला आता और जाता है। लोग इस सच से इतना घबड़ाते हैं कि अपनी देह के नश्वर होने की बात को भुलाये ही रहते हैं। लोग इस बात को जानते हैं कि मृत्यु अवश्यंभावी है। अपनी मृत्यु के भय से सभी सहमे रहते है क्योंकि वह अकेला ही ले जाती है और सारा संसार यहीं धरा रहा जाता है। बस यहीं आकर हमारे देश के लोग त्रस्त हो जाते हैं कि उनके साथ कुछ नहीं जाता। हर कोई संसार का सुख अकेले भोगना चाहता है पर इससे भी किसी को खुशी नहीं होती। असली खुशी लोगों को तब मिलती है जब दूसरा के कष्ट हो। अपने पास किसी वस्तु होने का सुख तभी लोगों को मिलता है जब दूसरे के पास व न हो। लोगों की मनोवृत्ति यह है कि अगर अपनी एक आंख फूटने की कीमत पर दूसरे की दोनों फूटती हैं तो वह तैयार हो जाते हैं। प्रलय की बात उनको प्रसन्नता देती है क्योंकि यह संसार ही उनके साथ नष्ट होने वाला होता है। मतलब वह संसार के उन अंतिम लोगों में शामिल होना चाहते हैं जिनके भोग विलास के बाद यहां कुछ भी शेष नहीं रह जाता। उनको यह खुशी होती है कि यह संसार उनके बाद नहीं रहेगा। अपना अकेले जाना नहीं होगा बल्कि संगीसाथी भी साथ ही चलेंगे। इसलिये प्रलय के दिन को अपने सामने साकार होते देखना उनको सुखद अनुभूति हो सकता है।
        यही कारण है कि प्रलय की सनसनी भारत में बिकना कोई बड़ी बात नहीं है। सच बात तो यह है कि बाज़ार के सौदागर इस समय सारे संसार में दोनों हाथों से पैसा बटोर रहे हैं। वह चाहते हैं कि दुनियां के सारे आम मनुष्य फालतु की बातों में व्यस्त रहे। कहीं मनोरंजन तो कहीं सनसनी फैलाने के लिये फैलाने के लिये बकायत प्रायोजित साधनों का-यथा टीवी, फिल्म, समाचार पत्र पत्रिकायें तथा रेडियो-निर्माण किया गया है।
     कुछ लोगों ने प्रचार माध्यमों में सवाल किया था कि आखिर प्रलय के दिन का प्रचार करने वालों को पोस्टर आदि के लिये पैसा किसने दिया था। यह प्रश्न हमारे ब्लागों से उठायी गयी विचाराधारा से उपजा है। आतंकवाद को हमने ही अपने ब्लाग पर एक व्यापार कहा था। कुछ बुद्धिमान लोग अब उसे पढ़कर कह रहे हैं। पैसे के खेल में भीे कमीशन का खेल सभी जगह है। प्रलय के दिन के प्रचारकों को पैसा इसलिये ही मिला होगा कि दस पंद्रह दिन तक लोगों को व्यस्त रखो। इस पर भारत में मई का महीना तो वैसे ही प्रलय का छोटा भाई लगता है सो सनसनी तो फैलनी थी। बहरहाल अब कुछ दिन में बरसात का आगमन भी होना है। उस समय भी बाढ़ आदि का प्रकोप रहता है। ऐसे में अगर किसी को नाम करना हो तो वह जून जुलाई अगरस्त और सितंबर में कोई दिन प्रलय का घोषित कर सकता है। बाज़ार में वह भी बिक जायेगा।
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Tuesday, May 17, 2011

अपने बदन उघाड़ डाले-हिन्दी व्यंग्य कविता (apane badan ughad dale-hindi vyangya kavita)

महल बनाने के लिये
उन्होंने कई घर उजाड़ डाले,
पैसा उनका भगवान है
उसकी बंदगी करते हुए
कई बंदों के घर उन्होंने उजाड़ डाले,
खौफ उनके पैसे का है
उनके खरीदे हथियारबंदों ने
दया के मंदिर ही उखाड़ डाले।

फिर भी नहीं की
अक्लमंदों ने भगवान मानकर
उनकी बंदगी
तो उन्होंने फरिश्ते का भेष उतारकर
शैतान की तरह डराने के लिये
ज़माने के सामने
अपने बदन उघाड़ डाले।
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Saturday, May 14, 2011

शास्त्रों के अध्ययन से गूढ ज्ञान की प्राप्ति होती है-हिन्दू धर्म विचार

        इस संसार में भांति भांति प्रकार के लोग हैं, जिनमें कुछ तो मन की शुद्धता के लिए धर्म कर्म करते हैं तो कुछ दिखावा करते हैं।  कुछ लोग प्रत्यक्ष रूप से भक्ति   तथा यज्ञ करते नहीं दिखते हैं और न ही भक्त होने का पाखंड रचते हैं जबकि समाज में ऐसे लोगों की संख्या अधिक है जो धर्म के नाम पर कर्मकांड अथवा यज्ञ करने के लिये दबाव बनाते हैं। अनेक लोग बिना किसी दिखावे के सात्विक जीवन जीते हैं पर चूंकि वह हवन तथा यज्ञ आदि नहीं करते तो लोग उनको नास्तिक होने का ताना देते हैं। सच बात तो यह है कि यज्ञ तथा हवन आदि करने से अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि मनुष्य हृदय में तत्व ज्ञान धारण करे। इसके लिये प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिए। नियमित अध्ययन करने से जिज्ञासा बढ़ती है और अभ्यास से तत्वज्ञान का अनुभव हो जाता है।
              इस विषय पर मनुस्मृति में कहा गया है कि
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             यथायथा हि पुरुषः शास्त्रं समधिगच्छति।
              तथातथा विज्ञानाति विज्ञानं चास्य रोचते।।
            ‘‘जैसे जैसे कोई व्यक्ति शास्त्र का अभ्यास करता है वैसे ही उसे गूढ़ ज्ञान की प्राप्ति होती है और उसकी प्रवृत्ति और जिज्ञासा ज्ञान विज्ञान में बढ़ती जाती है।’’
              एक बात निश्चित है कि हमारे पुराने ग्रंथों में ज्ञान के साथ विज्ञान भी अंतर्निहित है। कुछ लोग आज विज्ञान के युग में भारतीय अध्यात्मिक दर्शन को हेय मानते हैं पर उनको यह पता ही नहीं कि विज्ञान का आधार भी तत्वज्ञान है जिसके कारण हमारे प्राचीन अध्यात्मिक ग्रंथ विज्ञान के विषय में सामग्री से परिपूर्ण हैं।
कुछ लोग मंदिर न जाने या यज्ञों तथा हवनों में सक्रिय भागीदारी न करने वाले लोगों पर कटाक्ष करते हैं पर यह उनका ही अज्ञान है।
इस विषय पर मनुस्मृति में कहा गया है कि
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‘‘शास्त्रों के ज्ञाता कुछ गृहस्थ यज्ञादि नहीं करते पर अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण कर अपनी अध्यात्मिक शक्ति में वृद्धि करते हैं। उनके लिये लिये नाक, जीभ, त्वचा, तथा कान पर संयम रखना ही एक तरह से महायज्ञ है।
                सच बात तो यह है कि धर्म तभी ही प्रशंसनीय है जब वह आचरण तथा कर्म में दृष्टिगोचर हो न कि केवल कर्मकांड और दिखावे में। कुछ लोग जो प्रतिदिन मंदिर जाते हैं वह दूसरों को अभक्त समझते हैं जो कि उनके अज्ञान का प्रमाण है। इतना ही नहीं कुछ तो लोग ऐसे हैं जो प्रतिदिन पूजा आदि करते हैं पर व्यवहार में ऐसा अहंकार दिखाते हैं जैसे कि वही भगवान के इकलौते भक्त हों। जो वास्तव में भक्त और ज्ञानी हैं वह दिखावे से अधिक आत्मनियंत्रण तथा आचरण से उसे प्रमाणित करते हैं।
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संकलक लेखक  एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
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शास्त्रों 
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